Wednesday 19 August 2015

नागवंशीय शासक और उनसे जुड़ी नागपूजा की परंपरा

नागवंशीय शासक और उनसे जुड़ी नागपूजा की परंपरा
सावन के शुक्लपक्ष की पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि को कल्कि अवतार जन्म और तक्षक पूजा के लिए भी जाना जाता है। हिंदू और जैन धर्मों में नागपूजा का बड़ा महत्त्व है। हिंदुओं के आराध्य शिव ने नाग को अपने गले में धारण किया, श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्त कराकर कालिया नाग को मोक्ष प्रदान किया, गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं नागों में अनंत (शेषनाग) हूँ। विष्णु ने भी शेष-शयन करके नागों के प्रति धार्मिक आस्था को स्थापित किया है। जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ को शेषनाग पर बैठे हुए दर्शाया गया है। पुराणों में बताया गया है कि हमारी धरती शेषनाग के फन के ऊपर टिकी हुई है। इस तरह नाग हमारी धार्मिक आस्था से जुड़े हैं और इसी कारण नाग पंचमी का भी अपना विशिष्ट धार्मिक महत्त्व है। इसके साथ ही नाग पंचमी किसानों और खेती-किसानी से जुड़े लोगों के लिए हिंदू नववर्ष के मुताबिक पहला त्योहार होता है।
अगर इतिहास के दृष्टिकोण से देखें, तब भी नागवंश का अतीत महाभारत काल से भी पुराना नजर आता है। महाभारत काल में पूरे भारत, खासतौर पर हिमालय पर्वत उपत्यकाओं और कैलास पर्वत से लगे भूक्षेत्रों में इनका प्रभुत्त्व था। पौराणिक मान्यता के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री और कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू ने कश्मीर में आठ पुत्रों- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक को जन्म दिया था। इन्होंने समूचे कश्मीर में अपना राज्य स्थापित किया। नागवंशावली में शेषनाग को नागों का पहला राजा माना जाता है। शेषनाग को अनंत नाम से भी जाना जाता है। कश्मीर का अनंतनाग नगरी इनकी राजधानी हुआ करती थी। वैसे ही तक्षशिला नगरी तक्षक नाग की राजधानी हुआ करती थी। मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। वासुकि का राज्य कैलास पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। नागवंशावली में यह क्रम कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनंत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना आदि शासकों से होते हुए चलता रहा। ये सभी नाग को पूजने वाले नागकुल थे, इसीलिए इन्होंने नागों की प्रजातियों पर अपने कुल का नाम रखा। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इनका राज्य था। छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नागवंशियों का उल्लेख मिलता है। मध्यप्रदेश के विदिशा में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि(यशनंदि) आदि नागवंशीय राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। नाग जनजाति का शासन नर्मदा नदी घाटी में भी था। हैहयों ने नागवंश को पराजित कर दिया था, बाद में कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद नागों ने अपना राज्य फिर से स्थापित किया और ये नवनाग कहलाए। इन नवनागों ने अपने राज्य का विस्तार मथुरा, विदिशा, कांतिपुरी (कुंतवार) व पद्मावती (पवैया) तक कर लिया था। नागा आदिवासियों का संबंध भी नागों से ही माना जाता है। कुछ लोग नागदा नामक ग्राम को नागदाह की घटना, यानि जनमेजय के नागयज्ञ से जोड़ते हैं। इनके साथ ही आज भी कई परिवारों में सर्प को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। मालवा क्षेत्र में कई गाँवों में उनके चबूतरे बने हुए हैं। जनभाषा में उन्हें भीलट बाबा भी कहते हैं। कांगड़ा, कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नागवंशीय जातियाँ आज भी हैं। भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासियों के उपनामों, जैसे- धूमल, कालिया, अनंत और फाहल आदि पर गौर करें, तो भारत में समृद्ध नागवंशीय परंपरा के वजूद को आज भी देखा जा सकता है। नागों ने अपने शासनकाल के दौरान वृषभ, त्रिशूल और सर्प के चित्रांकित सिक्के भी चलाए थे, जो खुदाई के दौरान यदा-कदा मिलते रहते हैं। नागकालीन सिक्के काकिणी के नाम से जाने जाते थे, जो अलग-अलग भार के होते थे। इस तरह एक लंबे कालखंड का जिक्र किया जा सकता है, जब समूचे अखंड भारत में और भारत के बाहर भी कई स्थानों पर नागवंशीय शासकों ने अपनी विजय पताका फहराई।
नागवंश की एक शाखा भारशिव भी है। सिर पर शिवलिंग धारण किए प्रतिमाएँ इनका प्रतीक है। नागवंश की इस शाखा के सबसे प्रतापी शासक धाराधीश मंजु थे। इनका राज्य उस समय धारा नगरी (वर्तमान धार) तक विस्तृत था, इसी कारण इन्हें धाराधीश की उपाधि मिली। मंजु के राज्यकाल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व रहा। गणपति नाग इस वंश का अंतिम शासक था। विंध्य पर्वत श्रेणी की तलहटी में गुप्त शासकों का परोक्ष शासन था, उस समय नागवंशी शासक उनके मांडलिक हुआ करते थे। दोनों राजवंशों के बीच रोटी-बेटी के संबंध कायम थे। चूँकि नागवंशी शासक अदिवासी जीवन बिताते थे और विदेशी आक्रांताओं से अपनी पहचान को बचाने के लिए प्राय: युद्ध में व्यस्त रहते थे, इस कारण उनके शासन के प्रतीक नहीं के बराबर ही मिलते हैं। चित्रकूट (उत्तरप्रदेश) के चर ग्राम का सोमनाथ मंदिर इसी कारण अद्वितीय स्थान रखता है, क्योंकि यह मंदिर भारत के समृद्ध नागवंश का दुर्लभ प्रतीक है। बीहड़ों ने इस मंदिर को बचाने का और साथ ही गुमनाम बनाए रखने का काम किया, किंतु अब इस मंदिर की स्थिति ऐसी है कि यदि इसे तत्काल सुरक्षित नहीं किया जाता, तो यह प्रतीक नष्ट हो जाएगा। बुंदेलखंड क्षेत्र के अनेक स्थान-नाम, जैसे- नचकांचन (नचना कुठार) पन्ना, भारगढ़ (बरगढ़), नगनेधी, भारकोट (बरकोठ) और भारगढ़ (बारीगढ़) आदि इस क्षेत्र में नागवंश के शासन-सूत्र की कड़ी को प्रमाणित करते हैं। इस तथ्य को भी नहीं नकारा जा सकता कि इस क्षेत्र में ऐतिहासिक खोज करके पुरातन भारत की समृद्धि को जानने-समझने की जितनी बड़ी जरूरत थी, उतना ही कम कार्य इस क्षेत्र में किया गया है।
यह बात तो इतिहास की है, मगर इससे जुड़ा हुआ सांस्कृतिक-धार्मिक और पारिस्थितिकी तंत्रीय-पर्यावरणीय पक्ष भी है। नागवंशीय राजा सर्पपूजक थे। नागवंशियों के काल में सर्प की प्रतिमाएँ अनेक स्थानों पर स्थापित की गई थीं और आज भी कई जगह स्थापित हैं। ऐसा लगता है कि नदी, पर्वत, वृक्ष और तमाम जीव-जंतुओं के साथ ही नाग (सर्प) को धार्मिक आस्था के साथ जोड़कर तत्कालीन शासकों ने धरती के प्रति और अपनी आने वाली पीढ़ी के प्रति जितनी जिम्मेदारी का परिचय दिया था, वह आज भी हमारे लिए मिसाल है। शायद नागवंशी शासकों को आज के जीवविज्ञानियों से ज्यादा अनुभव था, जिस कारण खेती-किसानी में और धरती के पारिस्थितिकी तंत्र में नागों के योगदान की महत्ता को समझते हुए उन्होंने नागों के नाम पर अपने वंश चलाए और आम जनता को नागों के प्रति आस्थावान बनाने के लिए नागपंचमी के रूप में पूजा का विधान भी प्रचलित-प्रसारित किया।
हजारों-हजार वर्षों तक यह परंपरा अबाध रूप से चलती ही रही। देश में विदेशी आक्रांता आए भी, बस भी गए और चले भी गए, किंतु हम धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं भूले। जब अंग्रेजों ने भारत में भू-बंदोबस्त लागू किया, तब भी यह परंपरा चलती रही। दूसरी जगहों के लिए बता पाना तो कठिन है, मगर बुंदेलखंड क्षेत्र में इस परंपरा को देखा जा सकता है। अपने बचपन में, जब चीजों को उनकी सार्थकता के नजरिये से देखना नहीं आता था, तब वे चीजें बड़े अलग तरीके से रोमांचित करती थीं। और आज बचपन की उन यादों को सोचता हूँ तो लगता है कि हमारी पीढ़ी ने अपने अतीत से मिली नसीहतों को, उनके द्वारा हमारे प्रति बरती गई जिम्मेदारियों को इस तरह ताक पर रख दिया है, मानो अपनी आने वाली पीढ़ी को पुरानी अच्छी चीजें सौंपने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर आकर खतम ही हो गई हो।
हमारे बचपन में, जब नागपंचमी का पर्व आता था, तब बड़ा उल्लास-उत्साह होता था। यह केवल बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी होता था। उनमें खासतौर से, जो खेती-किसानी से जुड़े होते थे। जो बड़े काश्तकार होते थे, उनके घर पर गाँव के लेखपाल-पटवारी जाते थे। उनके पास छापाखाने का छपा हुआ नागदेवता का चित्र होता था, जिसे वे दरवाजे के ऊपर गोबर से चिपकाते थे। फिर नागदेवता के चित्र की बड़े विधि-विधान से पूजा होती थी। सभी लोग कामना करते थे कि नई फसल, जो हमारे खेतों में तैयार होने जा रही है, उसे चूहों से बचाने के लिए नागदेवता कृपा करेंगे। बाद में सभी लोग पकवानों का मजा लेते थे। यह क्रम अपने घर पर कई बार देखा, अब तो यादों में ही देखने को मिलता है। बहुराष्ट्रीयकरण ने खेती-किसानी के तौर-तरीकों को बदल दिया है, किसानों को बदल दिया है। व्यवस्था में लगे घुन ने पटवारी-लेखपालों को बदल दिया है। बदलाव की इस बयार में नागदेवता पूज्यनीय तो रहेंगे नहीं, निरीह जरूर हो जाएँगे, इस धरती पर अपने वजूद को बचाने के लिए। पेटा और सेव द एनीमल जैसी संस्थाओं ने कब से इसकी चेतावनी भी जारी कर रखी है। मगर मानव ने इस प्लैनेट को केवल अपने लिए ही समझ रखा है। फिर पारिस्थितिकी-तंत्र की कड़ियाँ टूट जाने पर मानव का वजूद कैसे बचेगा, कोई नहीं जानता।
नागवंश के सूत्र भी हैं, उनके वंशज भी हैं और जरूरत भी है कि नागपंचमी के पीछे छिपे पवित्र उद्देश्य को पहचाना जाए और पूरी आस्था के साथ, पूरी श्रद्धा के साथ नागपंचमी मनाई जाए, सर्पों की प्रजातियों को बचाया जाए।
डॉ. राहुल मिश्र
(नूतनवाग्धारा, अंक- 22-23 में प्रकाशित)

Thursday 28 May 2015

हिंदी आलोचना का विकास-क्रम और भविष्य की दिशा-दशा




हिंदी आलोचना का विकास-क्रम और भविष्य की दिशा-दशा

आलोचना शब्द की उत्पत्ति लुच् धातु से हुई है। इसका अर्थ होता है, देखना। समाज और साहित्य के मध्य स्थापित संबंधों को देखने का कार्य आलोचना के माध्यम से होता है। साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता को स्थापित करते हुए पाठकों के बीच साहित्य को ले जाना और इस संबंध को उत्तरोत्तर विकसित करते जाना आलोचना की बुनियादी प्राथमिकता होती है। इस कारण आलोचना स्वतंत्र साहित्यिक विधा होती है। भारतीय साहित्य में आलोचना की दीर्घ एवं विकसित परंपरा काव्य-तत्त्व के अनुसंधान की जिज्ञासा को तृप्त करने हेतु विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से संपृक्त रहकर निरंतर प्रवाहित होती रही है। इस कारण उसका स्वरूप शास्त्रीय एवं सैद्धांतिक रहा है। भारतीय आलोचना रचनाओं के परीक्षण या मूल्यांकन मात्र तक सीमित नहीं रही। संभवतः इन्ही कारणों से भारतीय आलोचना को ‘अलंकार-शास्त्र’ या ‘काव्य-शास्त्र’ जैसे स्वतंत्र शास्त्र के रूप में, स्वतंत्र विधा के रूप में जाना जाता है।
रस-सिद्धांत की स्थापना करने वाली आचार्य भरत मुनि की रचना नाट्यशास्त्र (लगभग 150 ई.) को भारतीय साहित्य में आलोचना की सर्वप्रथम कृति माना जाता है। भरत मुनि ने इस सिद्धांत की स्थूल रूप-रेखा ही प्रस्तुत की थी, किंतु परवर्ती विद्वानों- भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनवगुप्त, धनंजय, विश्वनाथ प्रभृति- ने इसके विभिन्न पक्षों का और अधिक विश्लेषण-विवेचन प्रस्तुत करते हुए इसे पर्याप्त स्पष्ट एवं विकसित रूप प्रदान किया है। वस्तुतः रस-सिद्धांत भारतीय साहित्यशास्त्र की सर्वोत्तम एवं गौरवपूर्ण उपलब्धि है, जिस पर परवर्ती युग का अधिकांश आलोचनात्मक साहित्य आधारित है।1
अलंकार सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत, वक्रोक्ति सिद्धांत आदि के निरूपण, व्याख्या, समन्वय और संशोधन का क्रम भरत मुनि से लेकर सत्रहवीं शती के अंत तक चलता रहा। उदाहरण या सूक्ति के माध्यम से कुछ विशिष्ट कृतियों के सामान्य गुण-दोषों की स्फुट चर्चा के अतिरिक्त विस्तृत समीक्षा इस कालखंड में प्राप्त नहीं होती है। संस्कृत के ‘काव्यशास्त्र’ या ‘क्रियाकल्प’ से रस-संचय करके प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं के साहित्यकारों ने इस विधा को समृद्ध किया। हिंदी-काव्य के विकास के कालखंड में, मध्यकाल में केशव, चिंतामणि, भिखारीदास आदि कवियों ने संस्कृत काव्यशास्त्र के कुछ प्रमुख एवं प्रचलित सिद्धांतों को लेकर ग्रंथों की रचना की। हिंदी के आधुनिक काल की शुरुआत के पूर्व हिंदी पद्य में रचे गए काव्यशास्त्रीय ग्रंथ भले ही मौलिक न रहे हों और संस्कृत काव्यशास्त्र के पद्यानुवाद तक सीमित रह गए हों, तथापि भारतीय साहित्य की काव्यशास्त्रीय परंपरा को हिंदी के आधुनिक युग से जोड़ने की कड़ी का दायित्व इन ग्रंथों ने निभाया है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
हिंदी के आधुनिक युग की शुरुआत के साथ साहित्य में अनेक बदलाव परिलक्षित होते हैं। आधुनिक युग में गद्य का विस्तार और विकास भी होता है। हिंदी साहित्य के आधुनिक स्वरूप के उदय एवं इसके विस्तार में भारतेंदु हरिश्चंद्र का अमूल्य योगदान है। आधुनिक हिंदी साहित्य के जन्मदाता एवं पोषक विराट् साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य के सभी उपेक्षित अंगों का विकास किया था, अतः आलोचना साहित्य भी उनके युग-परिवर्तनकारी करों के स्पर्श से वंचित कैसे रह सकता था। यदि संस्कृत के प्रथम आचार्य भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ लिखा तो आधुनिक हिंदी के जनक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘नाटक’ की रचना की।2  सन् 1883 में प्रकाशित इस कृति में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्र के साथ ही यूरोप के नाट्यसाहित्य का उल्लेख करते हुए पाश्चात्य समीक्षा-साहित्य का समन्वय भारतीय साहित्य-शास्त्र के साथ किया। यह ऐसा प्रस्थान-बिंदु कहा जा सकता है, जहाँ से आधुनिक आलोचना विधा की शुरुआत मानी जाती है। प्रारंभिक हिंदी आलोचना संस्कृत आलोचना पर ही आधारित थी। जब तक खड़ीबोली का उदय हुआ तब तक विदेशी साहित्य से हम प्रभावित होने लगे थे। खासकर हिंदी गद्य साहित्य के साथ ऐसा हुआ और उसके लिए जिस आलोचना का उदय हुआ, वह कई मामलों में पश्चिम की हू-ब-हू नकल था। साहित्य और आलोचना दोनों पर पश्चिम के साहित्य और आलोचना के न केवल प्रभाव को देखा जा सकता है, वरन् कई बार पूरे-पूरे अनुवाद को हम पाते हैं।3 भारतेंदु युग में विकसित हुई साहित्यिक विधाओं का पोषण प्रायः अनूदित साहित्य के माध्यम से हुआ। इस कारण आलोचना की नवोदित धारा पर भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। यदि सकारात्मक पक्ष को देखा जाए तो आलोचना के क्षेत्र में नवीन संभावनाओं के सृजन हेतु भारतेंदु और उनकी परंपरा में चलने वाले बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन, बालकृष्ण भट्ट, गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, और अंबिकादत्त व्यास आदि ने अमूल्य योगदान दिया। आनंद कादंबिनी और हिंदी प्रदीप पत्रिकाओं में प्रकाशित आलोचनाओं को हिंदी आलोचना की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।
हिंदी आलोचना के विकास का दूसरा चरण द्विवेदी युग से शुरू होता है। सरस्वती के संपादक के रूप में सन् 1930 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का हिंदी आलोचना के क्षेत्र में अवतरण हुआ। उन्होंने संस्कृत के कई कवियों की समीक्षा की। उनके द्वारा रचित ‘विक्रमांकदेव चरित’ ‘नैषधचरित चर्चा’ और ‘कालिदास की निरंकुशता’ आदि निबंध कृतियों के परिचय के साथ ही कृति और कवि, दोनों के गुण-दोषों का निष्पक्ष विवेचन करते हैं। ‘कवि और कविता’ नामक निबंध में द्विवेदी जी ने कवि-कर्म और कवि-कर्म की परिणति, दोनों की स्पष्ट, व्यावहारिक और सामयिक आलोचना करके जो निष्कर्ष दिए हैं, वे वर्तमान में भी प्रासंगिक बने हुए हैं। द्विवेदी युग के अन्य प्रसिद्ध आलोचकों में मिश्र बंधु (गणेशबिहारी मिश्र, श्यामबिहारी मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र), पं. पद्मसिंह शर्मा, कृष्णबिहारी मिश्र और लाला भगवानदीन का नाम आता है। मिश्र बंधु द्वारा रचित हिंदी नवरत्न, मिश्र बंधु विनोद; पद्मसिंह शर्मा द्वारा रचित बिहारी सतसई की भूमिका; कृष्णबिहारी मिश्र द्वारा रचित देव और बिहारी तथा लाला भगवानदीन द्वारा रचित बिहारी और देव आदि ग्रंथ हिंदी आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्व रखते हैं। वस्तुतः द्विवेदी-युगीन साहित्य भारतेंदु-युगीन साहित्य की ही भाँति प्रेरणा देने का कार्य अधिक करता है। उस काल की प्रधान दृष्टि यही थी,  आलोचना भी इस दृष्टि से प्रभावित थी। आचार्य द्विवेदी इसका प्रतिनिधित्व करते थे। चूँकि पुनर्जागरणकालीन भारत आगे बढ़ने के लिए कृत संकल्प था, अतः रीतिकालीन प्रवृत्तियों पर नई यानि वैज्ञानिक और सामाजिक प्रवृत्तियाँ हावी हो रहीं थीं। भारतेंदु द्वारा प्रारंभ किए हुए कार्य को आचार्य द्विवेदी ने आगे बढ़ाया- मुख्यतः आलोचना और संपादन के क्षेत्र में।4
हिंदी साहित्य के शुरुआती कालखंड में, भारतेंदु युग में रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा में सैद्धांतिक आलोचना के अतिरिक्त ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली गद्य में लिखी गई टीकाओं और इतिहास ग्रंथों में कवि-परिचय के रूप में लिखी गई परिचयात्मक आलोचना का सूत्रपात हुआ। द्विवेदी युग में सैद्धांतिक आलोचना, परिचयात्मक आलोचना के अतिरिक्त तुलनात्मक एवं मूल्यांकनपरक आलोचना, अन्वेषण एवं अनुसंधानपरक आलोचना तथा व्याख्यात्मक आलोचना का विकास हुआ। द्विवेदी युग के परवर्ती छायावाद युग में साहित्य की अन्य विधाओं के नए दौर में प्रवेश करने के साथ ही हिंदी आलोचना में भी एक नए युग का सूत्रपात हुआ। उपन्यास और कहानी विधाओं के विकास के साथ ही कविता और नाटक में उदित होती नवीन प्रवृत्तियों के विवेचन और विश्लेषण हेतु आलोचना विधा की अनिवार्यता नए ढंग से स्थापित हुई और आलोचना विधा का विकास-विस्तार सामयिक आवश्यकता बनकर उभरा। इसके साथ छायावादी काव्य-प्रवृत्ति अपने अनूठेपन के कारण आलोचना के केंद्र में आई और इसके पक्ष-विपक्ष में प्रकाशित हुई आलोचनाओं ने आलोचना विधा के विस्तार में अप्रत्याशित योगदान दिया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस कालखंड में सैद्धांतिक आलोचना को भारतीय साहित्य-चिंतन परंपरा और पाश्चात्य साहित्य चिंतन परंपरा के समन्वय से समृद्ध करके गांभीर्य और वैविध्य प्रदान किया। आचार्य शुक्ल ने गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास और जायसी के काव्य-गुणों के विवेचन के साथ ही हिंदी साहित्य का इतिहास और चिंतामणि आदि ग्रंथों का सृजन करके सैद्धांतिक आलोचना के साथ ही ऐतिहासिक और व्यावहारिक आलोचना के विकास में योगदान दिया। शुक्ल जी की परंपरा में चलते हुए कृष्णशंकर शुक्ल, विश्वनाथप्रसाद मिश्र, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, डॉ. गुलाबराय, आचार्य बलदेव उपाध्याय और रामदहिन मिश्र आदि आलोचकों ने अपने प्रयासों से हिंदी आलोचना को समृद्ध किया।
डॉ. नगेंद्र भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल से प्रभावित थे। वे मूलतः रसवादी आलोचक माने जाते हैं। डॉ. नगेंद्र ने सैद्धांतिक आलोचना के साथ ही व्यावहारिक और मनोविश्लेषणात्मक आलोचना के क्षेत्र में योगदान दिया। भारतीय साहित्यशास्त्र के साथ पाश्चात्य साहित्यशास्त्र के समन्वय और इनके समन्वित रूप को प्रकाश में लाने का अभूतपूर्व कार्य डॉ. नगेंद्र ने किया। डॉ. नगेंद्र को छायावाद के पक्षधर आलोचक के रूप में भी जाना जाता है। डॉ. नगेंद्र के साथ ही आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और शांतिप्रिय द्विवेदी ने छायावाद का पक्ष लिया। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी छायावादी, स्वच्छंदतावादी, रसवादी, सौष्ठववादी और अध्यात्मवादी समीक्षक माने जाते हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी कृति, हिंदी साहित्य की भूमिका(1940 ई.) के माध्यम से ऐतिहासिक आलोचना को स्थापित किया। कबीर, सूर और तुलसी आदि के मूल्यांकन में द्विवेदी जी की मानवतावादी और समाजकेंद्रित आलोचनात्मक दृष्टि देखने को मिलती है। बाबू गुलाबराय ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की सैद्धांतिक आलोचना का अनुसरण करने के साथ ही व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के परवर्ती युग में हिंदी आलोचना का क्षितिज व्यापक होता गया। आलोचना की विविध पद्धतियों और अलग-अलग दिशाओं में अनेक आलोचक सक्रिय हुए। अनेक आलोचकों को किसी एक वर्ग में रख पाना भी शुक्लोत्तर युग में संभव नहीं रहा। अब तक चली आ रही आलोचनात्मक पद्धतियों से हटकर मार्क्सवादी आलोचना, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आलोचना, शैलीवैज्ञानिक आलोचना और नई आलोचना जैसी नवीन पद्धतियों का विस्तार हुआ। शिवदानसिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त और डॉ. रामविलास शर्मा मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिनिधि आलोचक माने जाते हैं। डॉ. देवराज, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और देवराज उपाध्याय दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाते हैं। मार्क्सवाद और मनोविश्लेषणवाद जैसी आलोचना की ऐतिहासिक पद्धतियों का निषेध कर ‘नयी आलोचना’ पनपने लगी। साहित्य में रूपवादी आलोचना, शैलीविज्ञान, संरचनावादी, नयी समीक्षा से भाषावादी आलोचना का तुमुलनाद गूँज उठा। इस बीच अच्छी बात यह हुई कि अब आलोचना केवल कविता-केंद्रित आलोचना न रहकर उपन्यास, कहानी, नाटक, रंगमंच, निबंध, रेखाचित्र आदि सभी गद्य विधाओं को साथ लेकर बढ़ने व पनपने लगी। इस स्थिति ने हिंदी-आलोचना का सैद्धांतिक और व्यावहारिक स्तर पर क्षेत्र काफी विस्तृत कर दिया है।5  
साहित्य की विविध विधाओं की आलोचना के प्रकाश में आने के साथ ही आलोचना विधा में सक्रिय विद्वानों की संख्या भी तीव्र गति से बढ़ी है। उन सभी का उल्लेख कर पाना भी संभव नहीं है, किंतु इतना अवश्य है कि आलोचना के क्षेत्र-विस्तार का यह सुखद पक्ष है। नाटक और रंगमंच सहित गद्य की विविध विधाओं से जुड़े साहित्यकारों की हिंदी आलोचना में उपस्थिति ने विविधता का, विचारों का फैलाव किया है। साहित्यिक पत्रिकाओं का योगदान भी हिंदी आलोचना के विकास में अभूतपूर्व है। सरस्वती, प्रतीक, आलोचना आदि पत्रिकाओं के बाद नये पत्ते, नयी कविता, निकष, कखग, पहल, दस्तावेज, पूर्वग्रह और समास आदि पत्रिकाओं ने साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से आलोचना को सर्वथा नवीन आयाम दिया है। साहित्यिक पत्रकारिता के साथ अंतरक्रिया में, और उससे स्वतंत्र भी, हिंदी आलोचना ने यों एक लंबी यात्रा की है। भारतेंदु तथा प्रेमघन के साथ शास्त्रीय और गुण-दोष कथन शैली से आरंभ करके आलोचना मिश्र बंधुओं के साथ निर्णयात्मक, और पद्मसिंह शर्मा के साथ तुलनात्मक दौर में आती है। फिर रामचंद्र शुक्ल के माध्यम से अपने व्याख्यात्मक-विवेचनात्मक रूप में एकबारगी वयस्क होकर वह विकास की कई नई दिशाओं को एकसाथ उद्घाटित करती है। और इसी क्रम में आगे अर्थ संवर्धन की या कि सर्जनात्मक भूमिका अपनाकर अपने रूप में गुणात्मक परिवर्तन लाती है।6 हिंदी आलोचना के इस विस्तार और तथाकथित नई आलोचना को ‘विश्वग्राम’ की अवधारणा के मानदंड पर खरा उतरते हुए भी अनुभूत किया जा सकता है।
हिंदी आलोचना के भविष्य की दशा-दिशा का विवेचन करने के पूर्व आलोचना के वर्तमान, अर्थात् नई आलोचना की प्रवृत्ति का मूल्यांकन करना समीचीन होगा। प्रगतिवादी आलोचना के बाद अस्तित्व में आई नई आलोचना में व्यक्तिवाद और पूँजीवाद की प्रबलता है। इस आलोचना में भारतीय काव्यशास्त्र लगभग पूर्णतः उपेक्षित हो गया है और वह पश्चिमी चिंतन और आलोचना पर पूर्णतः निर्भर हो गई है। ‘नई आलोचना’ ही नहीं, स्वातंत्र्योत्तर काल की नई लगभग संपूर्ण हिंदी आलोचना एक ओर पश्चिमी आलोचकों, दूसरी ओर अस्तित्ववाद, मानववाद, यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, प्रभाववाद, आधुनिकतावाद, उत्तरआधुनिकतावाद, संरचनावाद इत्यादि वादों और तीसरी ओर ‘नई आलोचना’, नवअरस्तूवादी आलोचना, शैलीविज्ञान, समाजशास्त्रीय आलोचना आदि पश्चिमी आलोचना-पद्धतियों का लगभग पूर्णतः अनुसरण करने लग गई है।7 पश्चिम के विचार और वस्तुओं का अनुकरण करना और पाश्चात्य अंधानुकरण में पड़कर अपने संसाधनों को गौण मानना आजकल की प्रवृत्ति बन गई है और आधुनिकता का, उत्तर आधुनिकता का पर्याय बन गई है। हिंदी आलोचना के क्षेत्र में भी यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि आज के वैश्वीकृत समाज में आलोचना के पुराने मानदंड बड़े काम के नहीं सिद्ध हो सकते। किसी भी आलोचना-पद्धति का स्थिर और जड़ होना गतिशील साहित्य का अवरोधक होता है, परंतु ‘आलोचना के पुराने औजार बाक्स’ में कुछ उपकरण हो सकते हैं, जो थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ भारतीय उत्तर-आधुनिक आलोचना को नया रूप दे सकने में समर्थ हों।8
हिंदी आलोचना के क्षेत्र में पुरानी पीढ़ी के आलोचकों की सक्रियता ही सम्प्रति दिखाई देती है। युवा पीढ़ी के आलोचकों की संख्या लगभग नहीं के बराबर है। उनकी उपस्थिति भी जो है, उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी तरफ साहित्यिक अनुशासन और साहित्यिक लगाव की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। अखबारों में साहित्य के लिए जगह नहीं। पत्रकार और रचनाकार का जैसा रचनात्मक संबंध पिछली सदी के पूर्वार्द्ध के बरसों में निर्मित हुआ था, वह पूरी तरह विघटित हो चुका है। उनके बीच अपाट्य खाई खुद गई है। अनियतकालीन पत्रिकाओं की बाढ़ वास्तविक सर्जक या आलोचकीय प्रतिभा की पहचान या प्रतिष्ठा को सुनिश्चित करने में असमर्थ है। ‘अपनी डफली अपना राग’ वाला मुहावरा हू-ब-हू चरितार्थ हो रहा है।9 पश्चिमी साहित्य ने अतिवाद से बचते हुए साहित्य के अनुशासन को इस तरह से स्थापित किया है कि उनका आलोचनाशास्त्र श्रेष्ठ विधा के रूप में विकसित हुआ। हिंदी में यह काम हुआ, किंतु बहुत बाद में और अत्यंत मंथर गति से। वाद, विमर्श और समाजशास्त्रीय दर्शन की परिधियों को तोड़कर आलोचना-बोध के सर्वमान्य प्रादर्श के निर्माण की महती आवश्यकता वर्तमान में है। इस कमी के कारण साहित्य और पाठक के बीच की दूरी बढ़ रही है। हालाँकि इसका एक बड़ा कारण हिंदीभाषी क्षेत्रों में व्याप्त अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और ऐसे ही कई सामाजिक कारण भी हैं, इसके बावजूद आलोचना के दायित्व को भुलाया नहीं जा सकता है। सामयिक साहित्य यदि सामान्य हिंदी पाठक के लिए बोधगम्य नहीं होता तो इसका बहुत बड़ा उत्तरदायित्व हिंदी आलोचना पर है। साहित्य में बढ़ती हुई दुरूहता, दुर्बोधता, सूक्ष्मता, प्रतीकात्मकता और बिंब-विधान की प्रमुखता आदि के कारण आज का साहित्य- विशेषतः कविता, नाटक और कहानी- सामान्य पाठक के लिए अलंघ्य पर्वत शिखर बनता जा रहा है। आलोचना उसकी सहायता नहीं कर रही। आलोचना में भी असाधारण शब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। पाठक का दिग्भ्रमित होना आलोचना की विफलता है।10  
वर्तमान आलोचना के साथ ‘चौककवाद’ का पक्ष भी जुड़ा है। बहुत सारे साहित्यकार अपनी प्रसिद्धि के लिए, चर्चा में बने रहने के लिए प्रायः उन बातों का जिक्र करते हैं, जो साहित्य की मर्यादा के एकदम विपरीत होती हैं। इसके अतिरिक्त स्वयं को स्थापित करने के लिए दूसरे को अपमानित करने, लांछन लगाने की हद तक भी कई साहित्यकार, आलोचक पहुँच जाते हैं। मूल्यहीनता की यह स्थिति भी हिंदी आलोचना के वर्तमान एवं भविष्य के लिए घातक है।
समग्रतः, भारतीय साहित्यशास्त्र की समृद्ध परंपरा से रस-संचय कर विकसित हुई हिंदी आलोचना अपने उद्भव के साथ ही साहित्य और समाज के मध्य सेतु बनकर, साहित्य की स्वीकार्यता का मानदंड बनकर अपने दायित्वों का सम्यक् पालन करती रही है। ‘विश्वग्राम’ की संकल्पना के साहित्यिक पक्ष के रूप में पाश्चात्य चिंतनधारा को आत्मसात् करते हुए भारतीय साहित्यशास्त्र के साथ सामंजस्य बैठाकर हिंदी आलोचना के भविष्य को समृद्ध किया जा सकता है। हिंदी आलोचना के सफल, सार्थक भविष्य के लिए पुरानी पीढ़ी के आलोचकों द्वारा युवा आलोचकों को प्रोत्साहन देना और संसाधन उपलब्ध कराना अपेक्षित है तो युवा आलोचकों को मूल्यहीनता, अनुशासनहीनता, चौककवाद और विचारों की संकीर्णता से ऊपर उठकर पक्षपात रहित होकर आलोचना के दायित्व का निर्वहन करना होगा। इन प्रयासों के माध्यम से हिंदी आलोचना के भविष्य की दिशा भटकाव से बचते हुए समृद्धि की ओर उन्मुख होगी और हिंदी आलोचना विधा अपनी सार्थकता के साथ स्थापित हो सकेगी।
संदर्भ-
1.                       हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, द्वितीय खंड, गणपतिचंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, वर्ष 2004, पृ. 475
2.                       वही, पृ. 476
3.                       वेब रेफ़रेंस www.srijangatha.com/mulyankan13 july2011
4.                       हिंदी आलोचना, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दसवीं आवृत्ति वर्ष 2007, पृ. 31
5.                       हिंदी साहित्य का इतिहास, संपा. डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा (उप्र), वर्ष 2011, पृ. 786
6.                       हिंदी गद्य : विन्यास और विकास, डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, वर्ष 2002, पृ. 220
7.                       हिंदी साहित्य का इतिहास, संपा. डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा (उप्र), वर्ष 2011,  पृ. 801-802
8.                       समकालीन आलोचना का दायित्व, भवदेव पांडेय, मित्र : एक, संपा. मिथिलेश्वर, अंक-1 वर्ष 2003, पृ. 73
9.                       बदलते परिप्रेक्ष्य में आलोचना की अपेक्षित भूमिका, रमेशचंद्र शाह, मित्र : एक, संपा. मिथिलेश्वर, अंक-1 वर्ष 2003, पृ. 92

10.                   स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली, वर्ष 1996, पृ. 207

डॉ. राहुल मिश्र

(प्रताप महाविद्यालय, अमलनेर, जलगाँव (महाराष्ट्र) में आयोजित नगेंद्र और समकालीन आलोचना की दिशाएँ,  राष्ट्रीय परिसंवाद, दिनांक 03-04 मार्च, 2014 में प्रस्तुत शोध-पत्र)


Monday 20 April 2015

हिंदीतर साहित्यानुवाद : अनिवार्यता, संभावना और चुनौती


हिंदीतर साहित्यानुवाद : अनिवार्यता, संभावना और चुनौती

अनुवाद/मात्र भाषान्तर नहीं/वह सेतु है!
एक मन को दूसरे से/जोड़ने का,/परस्पर अजनबीपन तोड़ने का!
विश्व-मानव के/शिथिल सम्बन्ध-सूत्रों को/पिरोने और कसकर बाँधने का,/आत्म-हित में/दृढ़ अटूट प्रगाढ़/मैत्री साधने का!
अनुवाद-/साधन है/देशान्तरों के व्यक्तियों के/बीच निर्मित/अतल गहराइयों में/पैठने का,/निःशंक हो/द्विविधा रहित/मिल बैठने का
लाखों-करोड़ों मानवों के मध्य सह-संवाद है/अनुवाद
अनजान मानव-लोक के/बाहर व भीतर व्याप्त/गहरे अँधेरे का/दमकती रोशनी में/सफल रूपांतर/नहीं है/मात्र भाषान्तर!
माध्यम है-/अपरिचय को/गहन आत्मीयता में बदलने का,/हर संकीर्णता से मुक्त हो/बाहर निकलने का!
सभ्यता-संस्कार है!/अनुवाद
भाषिक चेतना का/शक्त एक प्रतीक है,/सम्प्रेषण विधा का/एक रूप सटीक है!
अनुवाद-/मानव-विवेक/प्रतिष्ठ सार्थक केतु है!
अनुवाद-/मात्र भाषान्तर नहीं;/वह सेतु है।1
डॉ. महेंद्र भटनागर की कविता की उपरोक्त पंक्तियाँ अनुवाद के वैशिष्ट्य को रेखांकित करतीं हैं। अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में परिवर्तन मात्र नहीं है, बल्कि देश-दुनिया के अंतराल को पाटकर एक-दूसरे के नजदीक लाने, एक-दूसरे की संस्कृति-ज्ञान-विज्ञान को जानने-समझने का माध्यम होता है। अनुवाद संवाद की उस शक्ति को धारण करता है, जो सभ्यता के क्रमिक विकास को, भाषाई चेतना को और संप्रेषण विधा को गति देता है। अपने इसी वैशिष्ट्य के कारण अनुवाद को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है, अनुवाद को विज्ञान कहा जाता है।
विश्व की विभिन्न भाषाओं में रचे गए उत्कृष्ट साहित्य के अनुवाद का क्रम मध्यकाल से अनवरत जारी है। भाषाओं का क्रमिक विकास मानव के सांस्कृतिक विकास से संबद्ध है। हम जिन भाषाओं से आज परिचित हैं, वे चाहे संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, सीरियाई, फारसी, चीनी में से कोई भी भाषा हो, वे सभी उन्नत भाषाएँ हैं। भाषिक प्रतीकों और उनके रूढ़ अर्थों के लिए एक सामुदायिक जीवन का अस्तित्व अनिवार्य है। इसी से जैसे-जैसे अलग-अलग समुदाय अस्तित्व में आते गए होंगे, उनके थोड़े-बहुत भेदों के साथ अपनी-अपनी भाषाएँ भी विकसित होती गई होंगी और परस्पर संपर्क के लिए उनमें अनुवाद की आवश्यकता भी पड़ने लगी होगी। इस प्रकार यही कहा जा सकता है कि अनुवाद की परंपरा बहुत प्राचीनकाल से चली आ रही होगी।2  संस्कृत साहित्य, विशेषकर रामकथा साहित्य के अरबी-फारसी भाषाओं सहित विश्व की अन्य भाषाओं भोटी, मंदारिन आदि भाषाओं में और भारत की अन्य भाषाओं में अनुवाद इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप हुए, जो आज भी अपना साहित्यिक महत्त्व रखते हैं। तत्कालीन संसाधनों के उपयोग के माध्यम से अनुवाद की जटिल प्रक्रिया को संपन्न करके विविध भाषाओं के साहित्य-भंडार को समृद्ध करने के प्रयास उस समय के साहित्यकारों के अद्भुत जीवट को भी प्रकट करते हैं। भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में अनुवाद विज्ञान का दूसरा युग अंग्रेजी औपनिवेशिक काल में उदित होता है।
भारत के उपनिवेशीकरण के दौरान भारतीय समाज, कानून, संस्कृति, परंपरा, इतिहास और धर्म-दर्शन को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात् करने की तीव्र प्रक्रिया की शुरुआत हुई। इसकी दो धाराएँ थीं। पहली धारा भारतीयता से युक्त थी और दूसरी धारा अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से चंद भारतीयों की औपनिवेशिक भारतीय निष्ठा को तुष्ट कर रही थी। इस धारा के माध्यम से हुए अनुवाद को भारत और भारतीयता विषयक ज्ञान का मूल स्रोत मानने के कारण एकांतिक और अनुकरणपरक भारतीयता का निर्माण हुआ। अनुवाद की मूल भावना, आत्मसातीकरण के पीछे छूट जाने के कारण साहित्य के क्षेत्र में अनेक विसंगतियाँ उत्पन्न हुईं। इसके विरोध में एक लहर सन् 1857 के बाद के हिंदी साहित्य में देखने को मिलती है। हिंदीतर साहित्य के हिंदी अनुवाद की विशुद्ध राष्ट्रवादी धारा का सृजन भी इसी कालखंड में हुआ। इस धारा के अग्रणी साहित्कारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम आता है।
उपनिवेशवादियों ने अनुवाद को भारतीय परंपरा और मानस पर कब्जा करने का साधन बनाया था तो भारतीय नवजागरण के विचारकों ने अनुवाद को अपनी परंपरा की मुक्ति और स्वत्व की पहचान का माध्यम बनाया। भारतीय लेखक अनुवाद को औपनिवेशिक प्रभावों के विरुद्ध प्रतिरोध के साधन के रूप में विकसित कर रहे थे। साथ ही वे आधुनिक चिंतन और ज्ञान-विज्ञान से भारतीय समाज को परिचित कराने के लिए भी अनुवाद का काम कर रहे थे।.....
हिंदी नवजागरण के दौरान हिंदी में सबसे अधिक अनुवाद बांग्ला से हुआ; रचनात्मक साहित्य और राजनीतिक-सामाजिक चिंतन की पुस्तकों का भी।3
हिंदीतर साहित्य के हिंदी में अनुवाद ने हिंदी के विकास और विस्तार की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया। भारतीय नवजागरण के साहित्यिक अवदान का बड़ा पक्ष अनुवाद के माध्यम से साहित्यिक समृद्धि और समाज को संघर्ष करने की नई दिशा देने के लिए जाना जाता है। देश की आजादी के बाद के वर्षों में देखा जाए तो हिंदीतर साहित्यानुवाद अपनी मंथर गति से चलता रहा। विश्व-साहित्य के अनुवाद की दिशा में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, रूसी, जर्मन, चीनी और इटालियन आदि भाषाएँ अग्रणी रहीं हैं। विश्व-साहित्य की प्रमुख और चर्चित पुस्तकें, विशेषकर अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें स्फुट रूप से हिंदी में अनूदित होती रहीं। दूसरी और भारतीय भाषाओं में लिखे गए उत्कृष्ट एवं चर्चित साहित्य का हिंदी में अनुवाद भी हुआ। हिंदी साहित्य के भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद की स्थिति भी कमोबेश सामान्य ही रही है।
हिंदीतर साहित्यानुवाद के नए दौर की शुरुआत सूचना-संचार क्रांति के आगमन के साथ होती है। वैज्ञानिक आविष्कारों एवं सूचना क्रांति के इस दौर में ज्यों-ज्यों विश्व दृष्टि का निर्माण होने लगा है, मानवीय जीवन के सरोकार एक सीमित क्षेत्र से बाहर निकलकर विश्वव्यापी स्तर पर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने लगे हैं। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही है कि संसार के विभिन्न वर्गों के समस्त लोग एक-दूसरे को जानने-पहचानने के लिए उत्सुक हों। इसके परिणामस्वरूप चिकित्सा, तकनीकी, वैज्ञानिक-दार्शनिक एवं साहित्यिक आदान-प्रदान होने के कारण मानव के जीवन-मूल्यों एवं अंतरराष्ट्रीय सोच के परस्पर संवाद से अजनबीपन का कोहरा छँटने लगा है। भौगोलिक सीमाओं के आर-पार एक परिचित एवं आत्मीय वातावरण बनने लगा है। एक देश अथवा संस्कृति की भाषा अपनी साहित्यिक एवं तकनीकी उपलब्धियों को किसी दूसरे देश, भाषा आथवा संस्कृति तक पहुँचाने के लिए अनुवाद का ही सहारा लेते हैं। और एक नई सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा चल पड़ी।4
सूचना-क्रांति के इस दौर में स्थापित हुई ‘विश्वग्राम’ की अवधारणा का साहित्यिक पक्ष बहुत रोचक है। आज विश्व-साहित्य को पढ़ने की ललक नए ढंग से बढ़ी है। इस कारण विश्व-भर में साहित्यिक अनुवाद की माँग भी बढ़ रही है। भारत जैसे बहुभाषी और विविध संस्कृतियों वाले देश में सांस्कृतिक समन्वय, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और एकता को बढ़ावा देने की दिशा में भी साहित्यिक अनुवाद का अमूल्य योगदान है। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी, चीनी एवं अरबी के अतिरिक्त हिंदी, स्पेनिश आदि भाषाओं का महत्त्व अनुवाद के क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। विश्व की प्रमुख और प्रभावी भाषा के रूप में हिंदी के वर्चस्व की स्थापना के साथ ही हिंदीतर साहित्य के हिंदी में अनुवाद का महत्त्व नए सिरे से स्थापित हुआ है। ऐसे में हिंदी का और हिंदी के साहित्यकारों को दायित्व भी बढ़ा है। विश्व की प्रमुख भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने के लिए और विश्व-भर में फैले हिंदीभाषी लोगों को विश्व-ज्ञान के विविध आयामों से जोड़ने के लिए अनुवाद के सशक्त माध्यम की उपयोगिता स्वतः प्रमाणित है।
बीबीसी, लंदन के हिंदी प्रभाग द्वारा वर्ष 2013 के समापन पर साल-भर में हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों का लेखा-जोखा तैयार किया गया और पुस्तकों की समीक्षा करके निष्कर्ष दिया गया है कि वर्ष 2013 में मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा अनूदित पुस्तकों की उपस्थिति प्रभावपूर्ण और सार्थक रही है।5 बीबीसी द्वारा जारी किया गाया यह सर्वेक्षण हिंदीतर साहित्यानुवाद की संभावनाओं के सुखद पक्ष को उद्घाटित करता है। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं, विशेषकर अनुवाद, नया ज्ञानोदय, मित्र, वागर्थ और आजकल ने हिंदीतर साहित्यानुवाद की अनिवार्यता और आवश्यकता को जानते-समझते हुए विश्व-साहित्य के साथ ही भारतीय भाषाओं के साहित्य के अनुवादों को प्रकाशित करने का कार्य किया है। वर्ष-भर में हिंदी में प्रकाशित होने वाली अनूदित पुस्तकों की संख्या भी पर्याप्त होती है।
कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि साहित्यिक विधाओं के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान की अन्य विधाओं तथा नवीनतम तकनीकी, नवीनतम शोध और लुप्तप्राय साहित्य के अनुवाद की दिशा में कार्य करने की असीमित संभावनाएँ अभी भी शेष हैं। सूचना-संचार क्रांति के इस दौर में ज्ञान की और सूचनाओं की अपरिमित उपलब्धता के बीच ‘मल्टी डिसिप्लिनरी स्टडी’ का पक्ष तेजी से उभरा है। ऐसी स्थिति में बेहतर अनुवाद रचने के लिए अनुवादकों का नवीनतम ज्ञान से युक्त होना अनिवार्य हो गया है। इंटरनेट पर उपलब्ध विविध संसाधनों (सॉफ्टवेयर, एप्लीकेशंस आदि) के उपयोग द्वारा हिंदीतर साहित्यानुवाद में नवोदित असीमित संभावनाओं को मूर्त रूप दिया जा सकता है।
हिंदीतर साहित्यानुवाद में निहित संभावनाओं के साथ ही चुनौतियों का पक्ष भी गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतः सुखाय या जीविकोपार्जन हेतु अनुवाद कार्य के प्रति समर्पित होने वाला अनुवादक अब परकाया-प्रवेश की प्रक्रिया से गुजरने लगा है। इस प्रक्रिया से गुजरने का धैर्य और क्षमता किसी साधक के पास ही हो सकती है। अनुवाद करने की मूलभूत शर्त है- ईमानदारी और निष्ठा। यदि अनुवादक को हम एक सेतु निर्माण करने वाले के रूप में देखें तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूरी ईमानदारी से पुख्ता और चिरस्थाई सेतु का निर्माण करे।6 
साहित्य, विज्ञान, वाणिज्य, जनसंचार और तकनीकी आदि के हिंदी अनुवाद के लिए योग्यता और दक्षता भी भिन्न होती है। इनके लिए वांछित ईमानदारी, निष्ठा,धैर्य और समर्पण के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान की प्रत्येक धारा में अनुवाद के लिए अलग-अलग जटिलताएँ और चुनौतियाँ हैं। कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास आदि रचनाओं के अनुवादक के भीतर दो भाषाओं की टकराहट, अनुवाद विशेष का व्यक्तित्व, उसकी संवेदना और भाषायी समझ, मूल रचना का सौंदर्यपरक वैशिष्ट्य तथा उनका सर्जनात्मक रूपांतरण अपनी विशिष्ट अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। इससे रचना अपनी विषयवस्तु से अलग होकर एक काव्यवस्तु बन जाती है। इसलिए साहित्यिक अनुवाद बड़ा ही दुष्कर और जटिल कार्य है, जिसके लिए असाधारण प्रतिभा, क्षमता और अभ्यास, तीनों की अपेक्षा रहती है।7  
वैज्ञानिक साहित्य के अनुवादकों का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। वैज्ञानिक अनुवादक से यह अपेक्षा रहती है कि वह भाषाविद् के साथ-साथ विषयविद् भी हो। वैज्ञानिक विषय के जानकार अंग्रेजी में अधिक हैं तो हिंदी में नगण्य और हिंदी भाषा के विद्वान हैं तो विषय में प्रायः शून्य।8 विज्ञान-साहित्य के हिंदी अनुवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी और पारिभाषिक शब्दावली के अभाव की है। यद्यपि भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली आयोग ने इस दिशा में सकारात्मक कार्य किया है, तथापि अभाव की स्थिति आज भी बनी हुई है। अंग्रेजी और विश्व की अन्य भाषाओं में विज्ञान-लेखन की पर्गति बहुत तीव्र गति से हो रही है। नए-नए आविष्कार और नवीनतम ज्ञान को अनुवाद के माध्यम से हिंदी में उपलब्ध कराने के लिए तेज-तर्रार और समर्पित युवाओं की बड़ी कमी है। इसके साथ ही नए लोगों द्वारा इस क्षेत्र में किए गए कार्यों को प्रोत्साहित करने, उन्हें मंच प्रदान करने और आगे बढ़ने के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की सबसे बड़ी कमी भी है, जो इस दिशा की प्रगति को बड़े बर्बर तरीके से बाधित कर देती है। विज्ञान-साहित्य की तरह वाणिज्यिक-साहित्य के क्षेत्र में भी उत्कृष्ट और पर्याप्त अनुवाद की कमी है।
जनसंचार के क्षेत्र में परंपरागत माध्यमों, यथा- लोक रंगमंच, लोकगीत, उत्सव, लोकनाट्य आदि के अनुवाद तथा आधुनिक माध्यमों, यथा- टेलिविजन, रेडियो, इंटरनेट, समाचार पत्र आदि के अनुवाद के लिए अलग अपेक्षाएँ होती हैं, क्योंकि इनका संबंध समाज के सभी वर्गों (शिक्षित, अशिक्षित, बूढ़े, बालक, महिलाएँ, अमीर-गरीब आदि) से होता है। इसलिए जनसंचार का अनुवाद शब्दानुवाद की अपेक्षा भावानुवाद पर अधिक बल देता है। इसके अतिरिक्त संप्रेषणीयता, बोधगम्यता, सहजता, रोचकता और सर्वजन सुलभता के गुण भी वांछित होते हैं।
एक भाषा से उसकी आत्मा निकालकर दूसरी भाषा में सुरक्षित रूप से प्रत्यारोपित करने का दुष्कर कार्य अनुवादक को करना पड़ता है। लेखक के विचारों और उसके भावों का अनुवाद में आत्मसातीकरण करना जटिल कार्य होता है। मराठी के प्रसिद्ध नाटककार और रंगकर्मी मामा वरेरकर (भार्गवराम विट्ठल वरेरकर) की उक्ति- लेखक होना आसान है, किंतु अनुवादक होना अत्यंत कठिन है, इस संदर्भ में सर्वथा उपयुक्त और सटीक प्रतीत होती है। हिंदीतर साहित्यानुवाद के परंपरागत स्वरूप से आगे बढ़ते हुए सूचना-संचार क्रांति के वर्तमान युग में हिंदी अनुवादकों के लिए एक ओर जहाँ संभावनाओं का असीमित विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। हिंदीतर साहित्यानुवाद की वर्तमान में प्रासंगिकता और अनिवार्यता को अनुभूत करते हुए इस दिशा में जिस गति से प्रगति हुई है, उसे यदि संतोषजनक नहीं कहा जा सकता तब भी भविष्य की सुखद संभावनाओं के सफल-सार्थक लक्षण के रूप में अवश्य देखा जा सकता है।
संदर्भ-
1. वेब रेफरेंस www.kavitakosh.org/kk/अनुवाद :एक सेतु/महेंद्र भटनागर
2. साहित्यानुवाद : संवाद और संवेदना, संपा. डॉ. आरसु, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995, पृ. 30
3. वेब रेफ़रेंस hi.wikipedia.org/wiki/अनुवाद
4. वेब रेफ़रेंस anuvaadak.blogpost.in/2010102/blog-post.html
6. वेब रेफ़रेंस anuvaadak.blogpost.in/2010102/blog-post.html
7. अनुवाद विज्ञान की भूमिका, कृष्णकुमार गोस्वामी,राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2008, पृ. 302
8. वही, पृ. 309

(हमदर्द पब्लिक लाइब्रेरी, बीड, महाराष्ट्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, दिनांक- 08 से 09 फरवरी, 2014 में प्रस्तुत)

डॉ. राहुल मिश्र

Wednesday 11 February 2015

एक देश के ‘पिघलते’ अस्तित्व की दास्तान

एक देश के ‘पिघलते’ अस्तित्व की दास्तान
हिंदी कथा-साहित्य-जगत् में कामतानाथ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे जितने बढ़िया कथाकार हैं, उतने ही उम्दा उपन्यासकार भी हैं। समग्रता और बड़ी सरलता के साथ वर्तमान के जटिल यथार्थ को जितनी बेबाकी के साथ वे अपनी कहानियों में प्रस्तुत कर देते हैं; वही खुलापन, संपूर्णता, सहजता और यथार्थ का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण उनके उपन्यासों में दिखाई देता है। चाहे ‘एक और हिंदुस्तान’ हो या फिर धार्मिक पाखंड पर केंद्रित ‘समुद्र तट पर खुलने वाली खिड़की’, दोनों उपन्यासों में वे समय की ज्वलंत समस्याओं से टकराते नजर आते हैं। स्वाधीनता संग्राम को केंद्र में रखकर लिखे गए उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘काल-कथा’ के माध्यम से वे यथार्थवादी और जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराते उपन्यासकार के रूप में स्थापित होते हैं। कामतानाथ का ताजा उपन्यास ‘पिघलेगी बर्फ’ उनके इसी लेखकीय कौशल का विस्तार है। इस उपन्यास में एक देश के स्वर्णिम अतीत से लेकर दयनीय वर्तमान तक का समूचा आख्यान है।
दुर्गम इलाकों की जोखिम भरी यात्राओं के वृत्तांत के रूप में रचित कामतानाथ का यह नया उपन्यास- ‘पिघलेगी बर्फ’ हिमालय की तराई में बसे तिब्बत देश की संस्कृति और अस्तित्व के स्वर्णिम अतीत व क्रमिक विनाश के दयनीय वर्तमान को समग्रता के साथ प्रस्तुत करता है। समीक्ष्य उपन्यास में तिब्बती जनमानस के विशद विवरण, तिब्बत की सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टताओं के साथ ही राजनीतिक कारणों और बड़े-शक्तिशाली देश की सत्तालोलुपता के कारण तिब्बत के अस्तित्व की मार्मिक पतनगाथा को सहज, सरल और रोमांचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास के नायक की जोखिम भरी दुर्गम पहाड़ी यात्राओं के साथ ही कथा का विस्तार होता है, साथ ही जीवन-संघर्ष की विकट स्थितियों से साक्षात्कार भी होता है।
कथानायक घर छोड़कर भागता है और ब्रिटिश फौज में भरती हो जाता है। फौज के साथ लंबी समुद्री यात्राओं, देश में चलती स्वाधीनता संग्राम की लहर, आजाद हिंद फौज के गठन की सूचनाओं के साथ ही लड़ाइयों और फौजी कार्यवाहियों से थक-हारकर कथानायक का पलायन होता है। बर्मा, आसाम और मलाया के बीहड़ों-जंगलों में भटकते हुए और फिर बर्फीले, दुर्गम पहाड़ी-मैदानी रास्तों से होते हुए तिब्बत तक के लंबे मार्ग में जिंदगी और मौत से जूझते कथानायक का भगोड़ापन और पलायन की प्रवृत्ति, परिस्थितियों से डरकर भागते रहने की स्थितियाँ बेशक अलग ‘थीम’ है, किंतु यात्राओं के विशद वर्णन के बीच इसकी प्रभावोत्पादकता कम हो जाती है।
कथानायक के तिब्बत पहुँचने के साथ ही उपन्यास एक नया मोड़ ले लेता है। उपन्यास में तिब्बत का वृहद विवरण यहीं से परत-दर-परत खुलता चला जाता है। तिब्बती जनजीवन की ढेरों बातें, तिब्बतियों का रहन-सहन, वेशभूषा, सामाजिक संरचना और दैनंदिन क्रियाकलाप जीवंत हो उठते हैं। यात्रा-प्रसंगों के साथ ही तिब्बत की भौगोलिक संरचना और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के विविध पक्ष रोचक जानकारियों के जादूई पिटारे की तरह खुलते चले जाते हैं। तिब्बत के धार्मिक परिवेश, रीति-रिवाज और मान्यताओं का वर्णन भी व्यापक रूप से उपन्यास में होता है। तिब्बतियों के आय के स्रोत, यातायात के साधन और तिब्बतियों की विविध आर्थिक समस्याओं की समूची जानकारी भी उपन्यास में उपलब्ध हो जाती है।
उपन्यास में खास तौर पर उन राजनीतिक पक्षों को उजागर करने का प्रयास किया गया है, जिनके कारण लगभग चालीस-पैंतालीस वर्षों के अंदर ही तिब्बत देश अपने पड़ोसी और शक्तिशाली देश की सत्तालोलुपता का शिकार हो गया। चीन की विस्तारवादी नीति ने समूचे तिब्बत को, एक जीवित राष्ट्र को निगल लिया। एक जीवंत संस्कृति का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया। तिब्बत राष्ट्र के मुखिया दलाई लामा को अपना वतन छोड़ना पड़ा। चीन ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा, पोटाला राजमहल और बौद्ध विहारों सहित समूचे तिब्बत की काया ही पलट दी। भारत ने भी तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता दे दी। कुल मिलाकर तिब्बत की वर्तमान दयनीय राजनीतिक स्थिति और वर्तमान के इस ज्वलंत वैश्विक मुद्दे को सटीक और प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करने में उपन्यासकार ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसा क्लिष्ट राजनीतिक विमर्श भले ही उपन्यास को बोझिल और उबाऊ बनाता हो, किंतु भाषा की सहजता और प्रवाहपूर्ण शैली बड़ी आसानी से तिब्बत देश की ज्वलंत राजनीतिक समस्या और उसके अस्तित्व पर मँडराते संकट से पाठकों को अवगत करा देती है।
इन सबके बीच कथानायक और एक तिब्बती युवती के बीच प्रेम-प्रसंग भी चलता रहता है। तमाम बंधन, भटकाव और मानसिक ऊहापोह की स्थितियों से गुजरते हुए अंततः दोनों का विवाह भी हो जाता है। कथानायक की सपत्नीक वापसी, रास्ते में बच्चे की मौत और फिर दुर्गम रास्ते पर चलते-चलते हैजे के कारण पत्नी की मौत के प्रसंग उपन्यास का विस्तार भले ही करते हों, किंतु कथात्मकता का प्रभाव डालने में कामयाब नहीं हो पाते। तिब्बत का सांगोपांग चित्रण और यात्रा-वृत्तांतों की भरमार के कारण कथा-प्रसंगों की संवेदना, पात्रों के सरोकार और चारित्रिक अंतर्विरोध उपन्यास में कहीं दबे-से रह जाते हैं।
उपन्यास के अंत तक पहुँचते-पहुँचते भारत के विभाजन का दर्द भी साफ हो जाता है। एक ओर तिब्बत की दयनीय, अस्तित्वहीन स्थिति और दूसरी ओर अखंड भारत के विभाजन के फलस्वरूप उपजी प्रश्नाकुलताएँ और इन सबके बीच कथानायक के सपनों के संसार के उजड़ जाने व सुखद भविष्य की कामनाओं के बिखर जाने की स्थितियाँ भगोड़ेपन और पलायनवादी मानसिकता के साथ मिलकर अजीब विकृति पैदा कर देती है। अंततः उपन्यास गहरे अवसाद और उदासी में डूब जाता है। उपन्यास के अंत में रोमांचक कथा-यात्राओं के स्थान पर गहरा विषाद, मोहभंग और विरक्ति आ जाती है। दुनियावी छल-प्रपंचों और षड्यंत्रकारी घातक स्थितियों का ‘फ्लैश बैक’ देकर उपन्यास पूर्ण हो जाता है। उपन्यास के प्रारंभ से लेकर अंत तक निरंतर चलते रहने वाले यात्रा-प्रसंगों के बीच कथा का प्रभाव भले ही कम हो, किंतु जिस सहजता और प्रवाह के साथ, प्रामाणिक तथ्यों और जानकारियों के साथ तिब्बत देश के क्रमिक विनाश को रेखांकित किया गया है, वह निःसंदेह बेजोड़ है। उपन्यासकार ने इतिहास, वर्तमान और वर्तमान की ज्वलंत समस्या (तिब्बत-समस्या) को समेटकर सक्षम और सफल कृति दी है। उपन्यास की मुहावरेदार, सरल और सुग्राह्य भाषा-शैली और शिल्प के वैशिष्टय ने समीक्ष्य कृति को पठनीय और रोचक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

समीक्ष्य कृति- पिघलेगी बर्फ, कामतानाथ, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006, मूल्य- 155 रुपये 

                                                                  डॉ. राहुल मिश्र



(वाग्धारा, बाँदा के जनवरी-जून 2008 के अंक में प्रकाशित)

Saturday 3 January 2015

संघर्ष बस संघर्ष : कविताओं में यथार्थ के स्पंदन

संघर्ष बस संघर्ष : कविताओं में यथार्थ के स्पंदन

संघर्ष ऐसी प्रक्रिया है, जो समाज की छोटी से छोटी इकाई से लगाकर बड़ी से बड़ी इकाई तक, स्वयं में सामाजिक इकाई बनकर रह गए आज के व्यक्ति तक इस तरह चलती है, जो कभी असंतोष, असहमति, पीड़ा, विद्रोह को जन्म देती है तो कभी जीवन को गति और सार्थकता देती है। यह प्रक्रिया मानव-मात्र में ही नहीं, समस्त जड़-चेतन में व्याप्त है, युगों-युगों से। संघर्ष की अभिव्यक्ति के विविध माध्यम संघर्ष की सार्थकता के प्रतिमान बनते हैं। जीवन के इस गुण-धर्म से साहित्यकार का वास्ता भी युगों-युगों का है। ऐसे में आज के साहित्यकार का संघर्ष की प्रक्रिया से गहरा जुड़ाव होना स्वतः-स्वाभाविक है।
संघर्ष के साथ आज की कविता का संबंध वर्तमान युगबोध के सापेक्ष है। जीवन की यातनाओं को, भोगे हुए यथार्थ को, समाज की विसंगतियों को और परिवर्तित होते मूल्यों के संक्रमण को कविता में उसी शिद्दत के साथ प्रस्तुत करने, प्रकट करने का सार्थक प्रयास अमृतसर (पंजाब) निवासी शुभदर्शन की काव्य-कृति ‘संघर्ष बस संघर्ष’ में हुआ है। एक जागरूक पत्रकार अपने समय के यथार्थ को, अपने परिवेश को विविध आयामों से देखता भी है, विश्लेषण भी करता है और सत्यान्वेषण की कामना से संप्रेषित भी करता है। ‘संघर्ष बस संघर्ष’ कृति के रचनाकार शुभदर्शन एक पत्रकार होने के नाते स्वयं को इन्ही विशिष्टताओं के साथ कवि-कर्म में उतारते हैं। इसी कारण शुभदर्शन का समीक्ष्य काव्य-संग्रह एक जरूरी दस्तावेज़ भी बन जाता है और यथार्थ को परखने का एक मानदंड भी बन जाता है।
‘संघर्ष बस संघर्ष’ में कवि-पत्रकार शुभदर्शन की सैंतीस कविताएँ संकलित हैं। संग्रह की पहली कविता- घुटन के पैबंद में ही व्यवस्था की विद्रूपताओं के बीच घुटते रहने की पीड़ा फूट पड़ती है-
कब खुलेगा दरवाजा/कब देगा कोई दस्तक/उलाहनों की संकरी गली में/लगी उम्मीदों की हाट पर।। (पृ.19)
भोली थी माँ कविता में माँ के बहाने आधी दुनिया के उस दर्द को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे भोगते रहना कभी मजबूरी लगता है, कभी सरल स्वभाव लगता है तो कभी भावनाओं का व्यापार लगता है। भोली-सी माँ जख्म़ों की चारदीवारी और दुख की छत को घर समझते हुए सबकुछ सहती जाती है। कभी परिवार के लिए, कभी बच्चों की खातिर अपने जीवन को गलाते हुए जब माँ रूपी सुरक्षा कवच टूट जाता है, तब उपजने वाली रिक्तता अहसास दिलाती है कि माँ का होना जीवन में कितनी अहमियत रखता है। वसीयत से मनफी, तस्वीर में अहसास नहीं होता, जड़ उखड़ने से और संघर्ष की विरासत कविताओं में माँ के साथ जुड़कर यथार्थ के विविध आयाम इस तरह प्रस्तुत होते हैं कि एक-एक शब्द चलचित्र के एक-एक दृश्य की तरह दौड़ता नज़र आता है। एक ओर माँ है, सबकुछ न्योछावर करती हुई और दूसरी ओर आज के युग का कृष्णा है-
कृष्ण की खाल में/आ चुका है कंस/कैसे निभेगा/गोपियों का साथ/बलात्कार व सैक्स हिंसा में/बदल गईं हैं--अठखेलियाँ/भारी हो गया है/पाप का गोवर्धन/पूतना का दूध पीते-पीते/अब मथुरा नहीं जाएगा कृष्ण/न ही करेगा वध/किसी कंस का/वह तो व्यस्त है/भरने तिजोरी/स्विस बैंकों के चेस्ट।। (कब बड़े होगे कृष्णा, पृ.123)
माँ के बहाने कवि ने घटती संवेदना, जड़ से उखड़ते जाने की त्रासदी, संस्कारों के संक्रमण, पलायन, गँवई-गाँव की विरासत के बिखराव और मानवीय मूल्यों के विघटन की स्थितियों को परखा है। संस्कार का सॉफ्टवेयर! कविता कंप्यूटर के युग में इन्ही स्थितियों का मार्मिक चित्रण करती है।
शुभदर्शन की कविताओं में गौरैया चिड़िया के रूप में एक और प्रतीक है। गाँवों के घरों में, लोगों के आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव के बीच गौरैया का भी स्थान है। वह मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं की संवाहक है। शहरीकरण, आधुनिकीकरण और सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों का संक्रमण उस गौरैया के लिए घातक बन जाता है। शहर की ओर गौरैया और सैय्याद गौरैया कविताएँ इस प्रतीक को साथ लेकर ऐसा ताना-बाना बुनतीं हैं कि समाज की मानसिकता में आ रहे बदलाव की पूरी तसवीर नज़रों के सामने आ जाती है। इस बदलाव से टकराता कवि अभिशप्त अभिमन्यु बनकर हारने को विवश हो जाता है, फिर भी उसके हाथ में गांडीव थमा दिया जाता है, संघर्षरत रहने के लिए। इसी संघर्ष को, हारकर भी निरंतर संघर्षरत रहने की विवशता को, या अनिवार्यता को कवि अपने लोगों के साथ बाँटता भी है और समाज की मानसिकता का पर्दाफाश भी करता है-
इतने उतावले क्यों हो/दोस्त/इत्मीनान रखो/तुमसे वादा किया है/सच बताने का/--बताऊँगा/जरा रुको/अभी मुझे पूरी करनी है/--आत्मकथा/शायद वहीं से मिल जाएं तुम्हें/उन सवालों के उत्तर/जो/समय-समय पर/तुमने उछाले थे/भरी सभा में/मुझे जलील करने। (आत्मकथा, पृ.89)
समीक्ष्य कृति में कवि का संघर्ष वर्तमान के यथार्थ की विकृतियों के साथ भी होता है और वैचारिकता के स्तर पर जीवन जीने के दर्शन-पक्ष पर उभरती विकृतियों के स्तर पर भी होता है। इसमें सबसे अधिक कचोटने वाली स्थिति संवेदनहीनता की बनती है, जब व्यक्ति अपने परिवेश में घटित होने वाली घटनाओं से इस प्रकार विलग हो जाता है, मानो वह संज्ञाशून्य हो-
भागम-दौड़ के युग में/खिलौना बने संस्कार/चलती-फिरती मूरतें/क्या फर्क है--दोनों में /सोचता है राजा
वे भागदौड़ कर रहे हैं/और हम बिसात पर बैठे निभा रहे हैं/--फ़र्ज/नचा रहे हैं लोगों को/वे भी संवेदनहीन/--हम भी।। (संवेदनाहीन, पृ.86-87)
कवि निहायत दार्शनिक अंदाज़ में कहता है-
संवेदना रिश्तों में होती है/संवेदना घर में होती है/मानवता में भी होती है/--संवेदना/पर दोस्त/जब तन जाती है/अवसादों की भृकुटी/तो मजबूर हो जाता है/--आदमी/उसी संवेदना का गला दबाने/जिसके दावे करते/नहीं थकती जुबान।। (संवेदना और व्यवहार, पृ.88)
समीक्ष्य कृति की लगभग सभी कविताएँ दैनंदिन जीवन की, अपने आस-पास की अनेक स्थूल-सूक्ष्म घटनाओं का तार्किक-भावुक परीक्षण-अन्वेषण करतीं हैं। इनके साथ ही दर्शन का पक्ष भी जुड़ा है, जो सहजता के साथ रास्ता दिखाने का प्रयास भी करता है, बिना उपदेशात्मक प्रपंच का परचम उठाए हुए। बहुआयामी-बहुविध संघर्ष का स्वरूप कविताओं में ऐसा है, जिसे बदलाव की उम्मीद है, जिसमें सकारात्मक वैचारिकी का ऐसा पक्ष है, जो पाठक के मन को उद्वेलित किए बिना नहीं छोड़ता। ‘संघर्ष बस संघर्ष’ की कविताएँ पाठक की संवेदना को झंकृत कर संघर्ष की ओर उन्मुख कर देतीं हैं। गहन मंथन के लिए प्रेरित कर देतीं हैं।
समीक्ष्य कृति की शुरुआत में ही डॉ. रमेश कुंतल मेघ द्वारा किया गया विश्लेषण है। इसके जरिए पुस्तक की प्रभावोत्पादकता में बढ़ोत्तरी हो जाती है। ब्लर्ब पर डॉ. पांडेय शशिभूषण शीतांशु और डॉ. हुकुमचंद राजपाल की टिप्पणियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन सभी को मिलाकर पुस्तक को पढ़ने से पहले पाठक के मन में एक वैचारिक माहौल बन जाता है और पुस्तक अपने उद्देश्य तक सहृदय पाठक को पहुँचाने में सफल हो जाती है। शुभदर्शन की कृति ‘संघर्ष बस संघर्ष’ इसी कारण हिंदी साहित्य के लिए, समय के इतिहास के लिए और वर्तमान के संदर्भ के लिए महत्त्वपूर्ण भी है, संग्रहणीय भी है।
(संघर्ष बस संघर्ष, शुभदर्शन, युक्ति प्रकाशन, दिल्ली-85, वर्ष- 2011, मूल्य- 250/-)

डॉ. राहुल मिश्र