Sunday, 3 November 2013

इक्कीसवीं सदी में भारतीय शिक्षा : संभावनाएँ और चुनौतियाँ

इक्कीसवीं सदी में भारतीय शिक्षा : संभावनाएँ और चुनौतियाँ
शिक्षा-व्यवस्था के संदर्भ में भारतीय विचारधारा की सुदीर्घ परंपरा वैदिक काल से निरंतरता के साथ चलती रही है। भारत में अंग्रेजों के आगमन और 02 फरवरी, सन् 1935 को गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक की काउंसिल में मैकाले द्वारा प्रस्तुत किये गये सुझावों की भारतीय उपनिवेश में स्वीकार्यता ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की पुरातन-परंपरागत धारा को एकदम बदल दिया। मैकाले के सुझावों के आधार पर भारत में यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान की शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से भारतीय लोगों को दिये जाने का प्राविधान किया गया। इसके परिणामस्वरूप परंपरागत शिक्षा-व्यवस्था के स्थान पर मैकाले की योजना अपनी जड़ें मजबूत करती रही। इसके शुभ और अशुभ परिणाम भारतीय समाज में अनेक तरीकों से परिलक्षित होते रहे।
देश की आजादी के पहले ही आजाद देश की शिक्षा-व्यवस्था का स्पष्ट, व्यावहारिक और सर्वथा उपयोगी खाका खींचने का कार्य महात्मा गांधी ने किया। उन्होंने हिंद स्वराज में लिखा कि, अंग्रेजी बिलकुल ही न पढ़ने से हमारा काम चले, ऐसा समय नहीं रहा। अतः जो लोग अंग्रेजी पढ़ चुके हैं वे उस शिक्षा का सदुपयोग करें। जहाँ जरूरी मालूम हो वहाँ उससे काम लें। अंग्रेजों के साथ व्यवहार करने में, उन हिंदुस्तानियों के लिए जिनकी भाषा हम नहीं समझते, और अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे आजिज आ गये हैं। यह जानने के लिए हमें अंग्रेजी सीखनी चाहिए। जिन्होंने अंग्रेजी पढ़ ली है उन्हें चाहिए कि अपने बच्चों को पहले सदाचार और अपनी भाषा सिखाएँ। फिर हिंदुस्तान की एक दूसरी भाषा सिखाएँ। जब वे प्रौढ़ वय के हो जाएँ तब चाहें तो अंग्रेजी पढ़ सकते हैं। पर उद्देश्य यही हो कि हमारे लिए अंग्रेजी पढ़ना जरूरी न हो, उससे पैसा कमाना नहीं।1 अनेक विविधताओं से भरे भारत देश को एक राष्ट्र की भावना में बाँधने के लिए महात्मा गांधी ने भाषार्इ समन्वय और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के व्यवहार की पुरजोर वकालत की। आजादी पाने के बाद आजाद भारत के पहरुओं के लिए गांधी के विचार प्रासंगिक नहीं रहे और उनकी प्राथमिकताएँ एक बार फिर मैकाले मिनट्स के इर्द-गिर्द घूमने लगीं। आजाद भारत की शिक्षा-व्यवस्था भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्त्वों, सामाजिक न्याय, समता और समानता के अवसर जैसे शब्दों के आवरण में सिमटकर चलती रही। यहाँ मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद के व्यक्तिगत प्रयासों का उल्लेख करना आवश्यक होगा। भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गांधीवादी विचारों के अनुरूप भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में भारतीय संस्कृति की उपस्थिति को, शिक्षा की समतापूर्ण सर्वसुलभता को और शिक्षा के जनतंत्रीकरण को बढ़ावा दिया। आजाद भारत की शिक्षा व्यवस्था के दिशा निर्धारण में मौलाना आज़ाद की भूमिका अविस्मरणीय रही। शिक्षा पर राजनीतिक नियंत्रण ने गांधी और मौलाना आज़ाद के विचारों को, प्रयासों को ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहने दिया। बाद में डॉ. सर्वेपल्लि राधाकृष्णन, डॉ. संपूर्णानन्द, डॉ.दौलत सिंह कोठारी, डॉ. लक्ष्मणस्वामी मुदालियार, आचार्य राममूर्ति, आदि शिक्षाविदों के संयोजन में, नेतृत्व में अनेक समितियों और आयोगों ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के संदर्भ में अनेक सुझाव दिये, सुधार भी हुए।
आजाद भारत की शिक्षा-व्यवस्था के लिए इन मनीषियों के सुझाव सार्थक हुए, उपयोगी भी हुए, किन्तु शिक्षा के विशुद्ध भारतीय स्वरूप को शेष रख पाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम नहीं ला सके। फलतः शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य भौतिक संसाधनों को उपलब्ध कर पाने और व्यक्तिगत स्वार्थों को पूर्ण कर पाने की चेष्टाओं में निहित हो गया। लिंग आधारित, अवसर आधारित और जाति-धर्म-पंथ आधारित असमानताएँ अलोकतांत्रिक अवधारणा के प्रतीकों के रूप में आजाद भारत की शिक्षा व्यवस्था पर हावी रहीं। नब्बे के दशक में आए आर्थिक उदारीकरण, विनिवेश, विश्वव्यापारीकरण और बहुराष्ट्रीकरण के कारण भारतीय समाज में और साथ ही भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव आने लगा।
इक्कीसवीं सदी की भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का स्वरूप इन्हीं सब बदलावों को साथ लेकर बना है। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत ही बहुराष्ट्रीकरण, आर्थिक उदारीकरण और इनके कारण आर्इ सूचना-संचार क्रांति के व्यापक प्रभावों को लेकर हुर्इ। मैकाले मिनट्स के साथ बदली परंपरागत भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को एक बार फिर बदलने का कार्य विश्वग्राम संस्कृति ने किया। विज्ञान, दर्शन और मानविकी के विषयों की प्रासंगिता पर प्रश्न-चिन्ह लगने लगे और अनेक नये विषयों, पाठ्यक्रमों, शिक्षण-प्रशिक्षण प्रविधियों और तकनीकों का आगमन शिक्षा-व्यवस्था में हुआ। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित हुए अंतरराष्ट्रीय पब्लिक स्कूल शिक्षा के वैश्विक स्वरूप के ऐसे ज्वलंत प्रतिमान हैं, जो बचपन में ही यूरोप और अमेरिका, आदि देशों के शैक्षिक भ्रमण के साथ ही बच्चों को ग्रीन कार्ड का सुंदर सपना दिखा देते हैं। माध्यमिक और उच्च शिक्षा-स्तर पर विदेशों में अध्ययन करना आज का स्टेटस सिंबल है। जो विद्यार्थी अध्ययन के लिए विदेश नहीं जा सकते, उनके लिए देश में ही स्थापित हुए निजी विश्वविद्यालयों में वैश्विक स्तर के ऐसे नए-नए पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं, जिनके साथ प्लेसमेंट की सुनिश्चतता भी जुड़ी होती है। इसके लिए कर्ज पाना भी कठिन नहीं रहा है।
प्रबंधन और तकनीकी उच्च शिक्षा हेतु स्थापित छह भारतीय संस्थान (आर्इआर्इएम) व नौ भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान (आर्इआर्इटी) देश में ही नहीं, विदेशों में भी ख्याति रखते हैं। इन संस्थानों से पढ़कर निकले छात्र देश में ही नहीं, विदेशों में भी उच्च पदों पर कार्य कर रहे हैं। इसी तरह चिकित्सा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, सूचना-तकनीकी और कम्प्यूटर विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में भारतीय मेधा की काबिलियत वैश्विक स्तर पर स्थपित हुर्इ है। आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 1998 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से निकले कम्प्यूटर इंजीनियरों में से लगभग तीस प्रतिशत कम्प्यूटर इंजीनियर अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में काम कर रहे हैं। भारत के हर दस में से चार सॉफ़्टवेयर इंजीनियर विदेशों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। विगत पंद्रह वर्षों में ये आँकड़े तेजी से बदले हैं।
इक्कीसवीं सदी में भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में उभरे सूचना-तकनीकी-चिकित्सा-संचार और प्रबंधन के अध्ययन को व्यवस्थित करने का कार्य प्रमुख रूप से राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने किया। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रमुख प्रेरक बल के रूप में ज्ञान को स्वीकार करते हुए, वैश्विक स्तर पर एक प्रतियोगी खिलाड़ी के रूप में उभरने की भारत की क्षमता की ज्ञान संसाधनों पर निर्भरता को स्वीकार करते हुए और 25 वर्ष से कम आयु के 55 करोड़ युवकों सहित भारत की मानवीय पूँजी को सामर्थ्यवान बनाने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए 13 जून, सन् 2005 को श्री सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन किया गया। सन् 2006 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने सिफारिशें दीं कि पुस्तकालय, अनुवाद, अंग्रेजी भाषा अध्यापन, राष्ट्रीय ज्ञान तंत्र (नेटवर्क), शिक्षा का अधिकार, व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण, उच्चतर शिक्षा, राष्ट्रीय विज्ञान और समाज विज्ञान प्रतिष्ठान तथा र्इ-अधिकारिता के क्षेत्रों में त्वरित विकास किया जाए। सन् 2007, 2008 और 2009 में क्रमशः मुक्त शैक्षिक पाठ्य विवरण, प्रबंध शिक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार, नवाचार; स्कूल शिक्षा, उत्तम पी-एच.डी., उद्यमशीलता; कृषि, जीवन-स्तर में सुधार लाना आदि प्रमुख सिफारिशें दी गर्इं।2 प्रधानमंत्री के सलाहकार के रूप में कार्य करने वाले राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्रत्येक राज्य में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय, एक चिकित्सा संस्थान, एक प्रबन्धन संस्थान और एक प्रौद्योगिकी संस्थान खोलने की दिशा में प्रयास किये गये और इनमें अपेक्षित सफलता भी प्राप्त हुर्इ।
शिक्षा-व्यवस्था के निजीकरण की अवधारणा के विकसित होने के साथ ही निजी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, इण्टर कॉलेजों और पब्लिक स्कूलों की संख्या भी देश में तेजी से बढ़ी है। शिक्षा के निजीकरण ने जहाँ एक ओर ज्ञान की सुलभता के अवसरों की वृद्धि की है, वहीं दूसरी ओर शिक्षण-प्रशिक्षण प्रविधियों, शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक के अनुप्रयोगों, कक्षाओं के स्वरूप बदलावों, सूचनाओं की असीमित उपलब्धताओं और व्यावहारिकताओं को, खुलेपन को बढ़ावा दिया है। जाति-धर्म-लिंग और आर्थिक असमानता आदि का विभेद आज उतनी शिद्दत के साथ दिखार्इ नहीं पड़ता है, जितना कि देश की आजादी के तीस-चालीस वर्ष बाद हुआ करता था।
निश्चित रूप से यह इक्कीसवीं सदी की भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की संभावनाओं का सुखद पक्ष है, सकारात्मक पक्ष है। 21 वीं सदी में शिक्षा का आश्चर्यजनक रूप से प्रचार एवं प्रसार हुआ है व साक्षरता का स्तर बढ़ा है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम हमें 14 वीं लोकसभा के चुनाव में भी देखने को मिला है। अब तक की चुनी गर्इ सभी लोकसभाओं से अधिक शिक्षित व्यक्ति चुनकर लोकसभा के सदस्य बने हैं। आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार में 21 वीं सदी में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अत्यधिक तीव्रता प्रदान की है। सन् 1951 में जहाँ केवल 16.67 प्रतिशत साक्षरता थी, वहीं 2001 में 65.38 प्रतिशत साक्षरता हो गर्इ है। अब शिक्षा किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं अपितु सर्वसुलभहै।3
इक्कीसवीं शताब्दी की भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की संभावनाएँ जितनी सुखद और सकारात्मक हैं, उतनी ही अधिक चुनौतियाँ भी हैं। इक्कसीवीं सदी की भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को समझने के लिए यूनेस्को द्वारा गठित डेलोर्स आयोग के सन् 1996 मेंप्रस्तुत प्रतिवेदन- लर्निंग- द ट्रेज़र विदिन पर नजर डालनी होगी। आयोग ने विश्व स्तर पर प्रत्येक राष्ट्र के समक्ष तीन संकट देखे हैं- आर्थिक संकट, प्रगति की अवधारणा संकट और किसी-न-किसी प्रकार का नैतिक संकट। आयोग का यह निष्कर्ष निर्विवाद है। भारत के समक्ष भी ये तीनों संकट विशाल या यों कहें, विकराल रूप से उपस्थित हैं।...असमानता और गरीबी तब तक कैसे घटेंगी जब तक विश्व को केवल एक बाजार माना जायेगा। भौतिक उपलब्धियों की होड़ बढ़ती जाएगी। मानवीय संवेदनाएँ घट रहीं हैं। लोग एक-दूसरे के पास नहीं आ रहे हैं, शायद दूर होते जा रहे हैं। लोग एक दूसरे से क्षणों में संपर्क स्थपित कर सकते हैं, दूरियों की परिभाषाएँ बदल गईं हैं। विश्व भर में किसी भी जगह क्षण भर में संपर्क स्थपित कर पाना वास्तविकता है। फिर भी हम पड़ोसियों जैसा व्यवहार क्यों नहीं कर पा रहे हैं, वी हैव बिकम नेबर्स नॉट नेबरली।4
भारत की आजादी के ठीक पहले भारतीय लोगों की आपस में दूरियाँ बढ़ रहीं थीं, परिणामस्वरूप देश विभाजित हुआ। आजाद भारत में भी क्षेत्र, भाषा और तहजीब पर आधारित विभेद महात्मा गांधी की स्वराज की कामना को खंडित करता रहा। तमाम मनीषियों के अनथक प्रयासों ने इसे कम अवश्य किया, मगर इसे समाप्त करने में सफलता नहीं दिलार्इ। इक्कीसवीं सदी में शिक्षित भारतीय समाज आज फिर से भाषार्इ-जातीय-धार्मिक-क्षेत्रीय-प्रांतीय और ऐसे ही अनेक विभेदों में बँट रहा है। इसका प्रमुख कारण पुरातन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में निहित मूल्यों का वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था में नहीं होना है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय एकता की शिक्षा की नवीन अवधारणा की स्थापना का अभाव भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। डॉ. ईश्वरदयाल गुप्त लिखते हैं कि, राष्ट्रीय एकता की शिक्षा वास्तव में भारत की शिक्षा प्रणाली में एक नवीन प्रयोग है। जिसके नवीन परिणाम अभी तक संतोषप्रद नहीं रहे हैं। पहले पच्चीस वर्ष तो उसे परिभाषित करने में ही लगे। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो शताब्दियों बाद एक आशा बँधी कि नये परिवेश में नये उत्साह के साथ हम एक-दूसरे की विविधताओं के सौंदर्य को सराहेंगे, लेकिन इन आशओं को मृग-तृष्णा सिद्ध होने में अधिक समय नहीं लगा।5
देश की आजादी के बाद देश की सांस्कृतिक विविधता को और अपनी अनूठी राष्ट्रीय संस्कृति की पहचान को सुरक्षित रख पाने, संरक्षित और संवर्द्धित कर पाने की अभिलाषा भी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकी। 21वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि शिक्षा के प्रचार तथा प्रसार की सार्वभौमिक आवश्यकता अब सर्वमान्य है। यह भी आधिकारिक तौर पर विश्व के सभी देश स्वीकार कर चुके हैं कि प्रत्येक देश की शिक्षा-व्यवस्था की जड़ें उसकी ‘अपनी’ संस्कृति में स्थापित होनी चाहिए और उसकी प्रतिबद्धता प्रगति तथा भविष्य के लिए स्पष्ट और उजागर होनी चाहिए। यह तभी संभव होगा, जब देश की नीतियाँ, विशेषकर शिक्षा नीतियाँ, शिक्षा और संस्कृति के जुड़ाव की आवश्यकता को स्वीकार करें और इस जुड़ाव में नर्इ पीढ़ी की आस्था उत्पन्न करने का प्रयास करें। ऐसा न करने या न कर पाने पर अंतर ‘संस्कारों’ में ही आता है और वही अपने प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में दिखाता है।6
शिक्षा में नैतिक मूल्यों की कमी, राष्ट्रीय एकता के अभाव और शिक्षा की ‘अपनी’ संस्कृति से दूरी, इन चुनौतियों की जड़ों को तलाशने का प्रयास करते हुए हमें इक्कीसवीं सदी की शिक्षा-व्यवस्था के उन दो आधारों को देखना होगा, जो सरकारी और निजी व्यवस्था में बँटे हुए हैं। सरकारी शिक्षा-व्यवस्था पूरी तरह से नौकरशाही पर निर्भर है। नौकरशाही का संचलन भी राजनीति-केंद्रित है। इस कारण सत्ताधारी राजनीतिक दल अपनी विचारधारा का सामाजिक प्रयोग सरकारी शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से करते हैं। अनेक राज्य सरकारों से लगाकर केंद्र सरकार तक फैली इस मानसिकता को बड़ी सहजता के साथ देखा जा सकता है। दूसरी ओर निजी शिक्षा-व्यवस्था है, जिसमें पूँजीपतियों का वर्चस्व कायम है। सरकारें संसाधनों की कमी से ग्रस्त हैं। अत: प्राइवेट रूप से शिक्षा-व्यवस्था करने वालों के समुदाय में वृद्धि हो रही है। कर्इ दशकों तक ‘व्यापारी’ रहे लोग एकाएक शिक्षा में रुचि लेने लगे हैं। वे इसे अधिक फायदे का सौदा समझते हैं और व्यापार के अनुभवों का उपयोग करते हुए संस्थाओं के भव्य भवन खड़े कर देते हैं। संपर्क-सूत्रों का उपयोग करते हैं और शिक्षाविद् बनकर सम्मान के अधिकारी बन जाते हैं। 2006 में ग्यारह हजार भारतवासी नये करोड़पति बने। अत: शिक्षा में शुल्क कितना ही बढ़ाया जाए, ऐसे लोगों को ग्राहक तो मिलते ही रहेंगे। मेरा आशय यह नहीं है कि प्राइवेट स्कूलों (जिन्हें कहा तो पब्लिक स्कूल ही जाता है) को चलाने वाले या नए छत्तीसगढ़ी विश्वविद्यालय चलाने वाले सब इसी श्रेणी में आते हैं। वस्तुस्थिति से परिचित तो सभी हैं। यहाँ यह भी याद रखना होगा कि इन स्कूलों में अभी भी संबंधित स्कूल बोर्ड की सालाना परीक्षा के कारण अंकों का उपलब्धि स्तर अधिक रहता है। स्वायत्तशासी विश्वविद्यालयों को तो सब कुछ स्वयं ही निर्णीत करना होता है। परिणास्वरूप पढ़ाने के अध्यापक तथा दिखाने के अध्यापक जैसी श्रेणियों का प्रादुर्भाव हुआ है। यह एक परिस्थितिजन्य नवाचार है, जिसमें प्रबंधन, संस्थान और शिक्षार्थी सभी प्रसन्न-मुक्त रहते हैं।7
निजी और सरकारी, दोनों शिक्षा-व्यवस्थाओं में आर्इ विकृतियों का कारण शिक्षविदों और समाज के विविध वर्गों के जागरूक प्रतिनिधियों का शिक्षा-व्यवस्था से दूर हो जाना है। आर्थिक हित, वैचारिक हित और वैयक्तिक स्वार्थ साधन के बँधे-बँधाए साँचों में परिवर्तन की संभावनाओं का शून्य होते जाना जनतांत्रिक व्यवस्था के सिद्धांतों के विपरीत होता है। शिक्षा में इसी कारण जनतांत्रिक व्यवस्था का अभाव गहराता जा रहा है। इसके परिणास्वरूप नर्इ पीढ़ी का जनतांत्रिक मूल्यों से विश्वास उठता जा रहा है। इस संदर्भ में प्रो. रामसकल पाण्डेय अपना मत व्यक्त करते हैं कि, वर्तमान शिक्षा बालक में जनतंत्र के प्रति आस्था नहीं उत्पन्न कर पाती अत: इस शिक्षा में परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें उस शिक्षा को महत्त्व देना चाहिए, जो कुशल नागरिक का निर्माण करे। इस प्रकार की शिक्षा में केवल विषय-ज्ञान का महत्त्व नहीं होगा। बालकों को जीवन के सभी अनुभवों की शिक्षा मिलनी चाहिए और उन अनुभवों के अभ्यास के लिए अवसर मिलना चाहिए। बालक को शिक्षा इसलिए नहीं देनी है कि अनेक उपाधियों से वह अपने नाम को अलंकृत कर सकें। वरन् इसलिए शिक्षा देनी है कि वह व्यवहारकुशल बन सकें और जीवन में ज्ञान का उपयोग कर सकें।8
इक्कीसवीं सदी में भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की चुनौतियों के संदर्भों की चर्चा करते हुए आवश्यक होगा कि उस वर्ग की विचारधारा को भी जान-समझ लिया जाए, जिससे देश, काल समाज की अपेक्षाएँ अपने व्यापक सरोकारों के साथ जुड़ी होती हैं। उस वर्ग को बुद्धिजीवी के रूप में जाना जाता है। नानी पालखीवाला के शब्दों में, दुर्भाग्यवश आज अपने युग में हमने बुद्धिजीवी का मोल घटा डाला है और इस शब्द को मिट्टी में मिला दिया है। आज ‘बुद्धिजीवी’ का अर्थ बदल गया है। आज बुद्धिजीवी वह व्यक्ति है जो इतना चतुर एवं चालाक है कि भाँप सके कि रोटी का कौन सा भाग चिकना चुपड़ा है।9
समग्रतः, इक्कीसवीं सदी की भारतीय शिक्षा-व्यवस्था अनेक चुनौतियों के बावजूद सकारात्मक दिशा में असीमित संभावनाओं को स्वयं में समेटे हुए आगे बढ़ रही है। अनुभवों से और स्थिति  की अनिवार्यताओं से सीखने की पुरातन स्थापित अवधारणा का अनुगमन करते हुए नैतिक मूल्यों की सीख आज की पीढ़ी को स्वतः प्राप्त हो रही है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों पर सरकारी अमल शिक्षा-व्यवस्था को निश्चित रूप से सकारात्मक दिशा में ले जाएगा। व्यवस्था-सुधार के प्रति, नैतिक मूल्यों की स्थापना के प्रति और राष्ट्रीय एकता की भावना के प्रति युवा-आग्रह का स्वर गाहे-ब-गाहे सुनार्इ दे जाता है। यह निश्चित रूप से सापेक्ष परिणाम का शुभ संकेत है। युवा शक्ति के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी भारत निश्चित रूप से विश्व-शक्ति बनकर उभरेगा, यह संभावना नकारी नहीं जा सकती। इतना अवश्य है कि पीढ़ियों के टकराव को, विविध विभेदों के संक्रमण को रोकने का दायित्व राष्ट्र के हित में सभी को निभाना होगा। अंत में, अल्लामा इकबाल की लिखी दो पंक्तियाँ, जो बहुत कुछ कह जाती हैं, नसीहत दे जाती हैं--
   आइने नौ से डरना,  तर्ज़-ए-कुहन पर अड़ना।
मंज़िल यही कठिन है,  कौमों की ज़िंदगी में।।
संदर्भ-
1    हिन्द स्वराज, महात्मा गांधी, अनु. कालिका प्रसाद, सस्ता साहित्य मंडल प्रका., नई दिल्ली, 2010, पृष्ठ- 82
4    शैक्षिक परिवर्तन का यथार्थ, शिक्षा के सार्थक सरोकार, प्रो. जगमोहन सिंह राजपूत, विद्या विहार, नई दिल्ली, 
      2006, पृष्ठ- 81-82  
5    आधुनिक भारतीय शिक्षा : समस्या चिंतन, शिक्षा प्रणाली : लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की समस्या,              
      डॉ. ईश्वरदयाल गुप्त, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़, 1991, पृष्ठ- 198
6    क्यों तनावग्रस्त है शिक्षा-व्यवस्था ?, शिक्षा से दूर होते मूल्य एवं संवेदनाएँ, प्रो. जगमोहन सिंह राजपूत,
      किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ- 36 
7    वही,  पृष्ठ- 12 
8    आधुनिक भारतीय शिक्षा दर्शन, भारतीय जनतंत्र और शिक्षा (व्याख्यान), प्रो. रामसकल पाण्डेय, केंद्रीय हिंदी
      संस्थान, आगरा, 1988, पृष्ठ- 40
9    हम भारत के लोग, बुद्धिजीवी का विश्वासघात, नानी पालखीवाला, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली, 1991,  
      पृष्ठ- 19
डॉ. राहुल मिश्र
(केंद्रीय बौद्ध विद्या संस्थान, लेह-लदाख में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी, 01-04 जुलाई, 2013 में प्रस्तुत शोध-पत्र, लदाख प्रभा-18 में प्रकाशित)

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