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Saturday, 22 August 2026

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग

 


गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग


बरन-धरम गयो, आस्रम निवास तज्यो,

त्रासन चकित सो परावनो परो सो है।

करम उपासना कुबासना बिनास्यो, ज्ञान

बचन, बिराग बेष जगत हरो सो है॥

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग,

निगम नियोग ते सो केलि ही छरो सो है।

काय मन बचन सुभाय ‘तुलसी’ है जाहि,

रामनाम को भरोसो ताहि को भरोसो है॥84।।

(कवितावली, उत्तरकांड, गोस्वामी तुलसीदास)

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली 16वीं शताब्दी का ग्रंथ है। ब्रजभाषा में रचित इस ग्रंथ में श्रीरामचरितमानस की तरह सात कांड हैं। ग्रंथ में जगह-जगह पर सामयिक विषय परिलक्षित होते हैं। यह छंद भी सामयिक विषय से संबद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास अपने आसपास की स्थितियों का वर्णन इस छंद में कर रहे हैं। वे लिखते हैं, कि- “चारों वर्णों के धर्म नष्ट हो गए हैं। लोगों ने चारों आश्रमों में रहना छोड़ दिया है। अधर्म के डर से लोगों में भगदड़ मच गई है। बुरी इच्छाओं ने कर्म, उपासना, ज्ञान, वचन और वैराग्य वेष को नष्ट कर दिया है, सारा संसार छला हुआ दिखलाई देता है। गोरख ने योग जगाया है। लोगों ने भक्ति को भगा दिया है। निगम के नियोग, अर्थात् वेद आदि ग्रंथों के निर्देशों को खेल बनाकर छल रहे हैं। तुलसीदास कहते हैं, कि जिसको मन-वाणी-कर्म-स्वभाव से राम नाम का विश्वास है, उसी का विश्वास ठीक है।“ 1 छंद ध्वनित करता है, कि जिन धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों से लोग अपने जीवन के लिए मार्ग तय करते थे, उन्हें ही लोग विस्मृत कर बैठे हैं, या उन्हें ऐसा करने के लिए स्थितियों ने विवश कर दिया है। सामयिक स्थितियाँ प्रतिकूल हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित इन पंक्तियों का उल्लेख यहाँ करने का आशय नाथ पंथ के संदर्भ में उनके विचार और अभिमत का विश्लेषण करना है। इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए प्रायः नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ के द्वारा योग के जगाए जाने से भक्ति के प्रचलित स्वरूपों को लोगों के द्वारा त्याग दिए जाने, वेद-आधारित व्यवस्था को छोड़ देने तथा वर्णाश्रम, उपासना आदि को त्याग दिए जाने की बात कही जाती है। इन पंक्तियों का उल्लेख प्रायः इसी संदर्भ में किया भी जाता है। वस्तुतः गोरखनाथ के नाथ पंथ के उदय और विस्तार के साथ इन पंक्तियों के संदर्भ को देखने पर अलग ही पक्ष प्रकट होता है।

हिंदी साहित्येतिहास में नाथ साहित्य के पहले सिद्ध साहित्य का स्थान आता है। व्यवहार की दृष्टि से, साथ ही कालक्रमानुसार सिद्धों का समय पहले है, बाद में नाथपंथियों का समय आता है। साहित्य में इसी अनुरूप अध्ययन होता है।“सिद्ध साहित्य के रचयिता सहजयानी या वज्रयानी संप्रदाय के सिद्ध थे, जिन्होंने अपने संप्रदाय के विचारों एवं अपनी धार्मिक अनुभूतियों को प्रकाशित करने के लिए काव्य रचना की। सहजयान संप्रदाय का संबंध बौद्धधर्म की महायान शाखा की उस परंपरा से है जो तंत्र, मंत्र व अन्य गुह्य साधना-पद्धतियों को अपनाती हुई ईसा की 8वीं शताब्दी के लगभग अत्यंत विकृत होकर एक नये संप्रदाय के रूप में परिवर्तित हो गई थी। इसी संप्रदाय को 'सहजयान' या 'वज्रयान' कहा गया है तथा इसके अनुयायी साधक ही 'सिद्ध' कहलाते हैं।“ 2 सिद्धों की परंपरा का साहित्यिक रूप सिद्ध साहित्य के अंतर्गत आता है। इसमें पुरानी हिंदी में लिखे दोहे और चर्यापद हैं; जिनमें कमल, कुलिश, मुद्रा, रहस्य, पंच बिडाल, गुह्यतंत्र, महासुख आदि का वर्णन करते हुए साधना की सहज पद्धति को अपनाने की सीख दी जाती है। गणपतिचंद्र गुप्त ने सिद्ध साहित्य का विश्लेषण करते हुए सिद्ध सरहपा के मतानुसार स्पष्ट किया है, कि- “वस्तुतः सहजयान में जीवन की सहज वासनाओं की पूर्ति को ही साधना के सर्वोत्कृष्ट रूप से स्वीकार किया गया। सहज वासना या कामवासना की पूर्ति के लिये विभिन्न जाति की मुद्राओं या साधिकाओं के सहयोग से कमल-कुलिश साधना की जाती थी। यद्यपि आधुनिक युग के अनेक व्याख्याता इनकी साधना-पद्धति को आध्यात्मिक सिद्ध करने के लिए कमल, कुलिश, मुद्रा आदि शब्दों की नयी व्याख्या करने का प्रयास भी करते हैं किंतु वस्तुतः ये क्रमश: जननेंद्रिय, पुरुषेंद्रिय एवं नारी के ही पर्यायवाची हैं। सरहपाद ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि सुख से खाते-पीते एवं रमण करते हुए नित्य से चक्र को पूर्ण करते हुए इस धर्म में परलोक की साधना की जाती है। इसी प्रकार अन्य स्थान पर कमल-कुलिश साधना का भी रहस्य उद्घाटित करते हुए उन्होंने लिखा है- 'कमल और कुलिश को मध्य में स्थित करके सुरत विलास का जो आनंद लिया जाता है, त्रिभुवन में कौन उससे वंचित रह सकता है तथा किसकी आशा को वह पूरी नहीं करता!' अस्तु विभिन्न प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिद्ध की साधना-पद्धति वाममार्गी एवं भोग-विलास-प्रधान थी, यह दूसरी बात है कि हम खींच-तान कर उनके शब्दों की आध्यात्मिक व्याख्या भी कर डालें।“ 3

नाथ पंथ की उत्पत्ति के कारकों को भी इस तथ्य में देखा जा सकता है। नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ स्वयं भी सिद्ध परंपरा में आते हैं। उनके गुरु मछेंद्रनाथ भी सिद्धों में गिने जाते हैं। गोरखनाथ और उनके गुरु मछेंद्रनाथ को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कथाएँ भी प्रचलित हैं, जो विशेष रूप से नाथपंथियों में सुनी-सुनाई जाती हैं। ख्यातिलब्ध उपन्यासकार विश्वंभरनाथ उपाध्याय का बहुत चर्चित उपन्यास है- जाग मछंदर गोरख आया। यह उपन्यास सन् 1983 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास की कथावस्तु गोरखनाथ के द्वारा प्रवर्तित नाथ पंथ के संदर्भ में प्रकाश डालती है, साथ ही गोरखनाथ के समकाल का विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। “डॉ. विशंभरनाथ उपाध्याय के उपन्यास जाग मछंदर गोरख आया में नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु मछंदरनाथ और गोरखनाथ की कथा है, इसके साथ ही धर्म की आड़ में किए जाते कुकृत्यों पर तीखा प्रहार भी किया गया है। उपन्यास में एक ओर मत्स्येंद्रनाथ के साथ नर्मदा के विवाह के बाद कामरूप की रानी ललिता देवी और राजकुमारी प्रियंवदा के मायाजाल में उलझने और उससे मुक्त होने की कथा है, तो दूसरी ओर विदेशियों के संभावित आक्रमण की आशंका के कारण उत्तर भारत के राजाओं को संगठित करने में जुटे गोरखनाथ की कथा है। इस्लाम के नाम पर दूसरे देशों में लूटपाट करने, कब्जा जमाने वाले लोगों की खबर उपन्यास में कई जगह ली जाती है।“ 4

गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित-प्रचलित नाथ पंथ की उत्पत्ति का आधार उपरोक्त वर्णित दो स्थितियों में स्पष्ट होता है। नाथ परंपरा के अध्येताओं ने नाथ पंथ को गोरखनाथ से भी पहले का माना है।“विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नाथमत गोरखनाथ के पूर्व भी था, तथापि उसको एक व्यवस्थित और संगठित रूप देने का कार्य गोरखनाथ ने ही सर्वप्रथम किया और बाद का विकास प्रायः उन्हीं की खींची हुई रेखाओं पर होता रहा।“ 5  गोरखनाथ के परवर्ती कालखंड को देखें, तो नाथ-पंथ की रचनाओं की परंपरा लगभग 17वीं शती. तक विस्तृत रही है, तथापि गोरखनाथ की साधना-पद्धति, विचारधारा तथा गोरखनाथ का व्यक्तित्व ही उनमें मुखरित होता रहा है। नाथ पंथ का प्रारंभिक काल और साथ ही गोरक्षनाथ के साथ जुड़ी अनेक किंवदंतियाँ, कथाएँ और प्रसंग नाथ पंथ की पुरातनता को बताते हैं। “क्रुक्स ने एक परंपरा का उल्लेख किया है, जिसे ग्रियर्सन ने भी उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि गोरखनाथ सत्ययुग में पंजाब के पेशावर में, त्रेता में गोरखपुर में, द्वापर में द्वारिका के भी आगे हुरमुज में और कलिकाल में काठियावाड़ की गोरखमढ़ी में प्रादुर्भूत हुए थे।“ 6 इसी प्रकार गोरक्षनाथ की अनेक यात्राओं और वार्ताओं के प्रसंग भी मिलते हैं। अनेक प्रसंग ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व भी रखते हैं। नाथ पंथ की पुरातनता के लिए इन प्रसंगों का उल्लेख विशिष्ट स्थान रखता है। जालंधर (पंजाब) के साथ भी नाथ पंथ का संबंध मिलता है। चौरासी सिद्धों में गिने जाने वाले जालंधरपा को सिद्ध पंथ से अलग पंथ के प्रवर्तक के रूप में भी जाना जाता है।

नागेंद्रनाथ उपाध्याय ने अपने शोध में बारह नाथपंथियों के नामोल्लेख किए हैं। इनमें मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के साथ ही जालंधर, चर्पटि, भर्तृहरि, रेवण, चौरंगी, गोपीचंद, कान्हिप, गहिनी, निवृत्तिनाथ और ज्ञाननाथ का नाम आता है। इनमें से ज्ञाननाथ या ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र के वारकरी संत हैं और नाथ पंथ में भी आते हैं।7 सिद्ध, नाथ और परवर्ती वारकरी, मालकरी और निर्गुण आदि परंपराएँ एक-दूसरे से संबद्ध दिखाई देती हैं। वस्तुतः इन परंपराओं में वैचारिक भिन्नता और समय के अनुरूप पनपने वाली विकृतियाँ नए मतों और पंथों का मार्ग प्रशस्त करती प्रतीत होती हैं, जो कालांतर में अपना व्यापक रूप और अलग धारा प्रकट करती हैं। सिद्धों में जालंधरपा ने जिस वैचारिक भिन्नता को आधार बनाकर नाथ पंथ की भूमि तैयार की, कालांतर में वह गोरक्षनाथ के माध्यम से उर्वर बनी और पुष्पित-पल्लवित हुई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने विवेचन में स्पष्ट किया है, कि- “गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) भी गिन लिये गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया। योगियों की इस हिंदू शाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और बीभत्स विधानों से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव-शक्ति की भावना के कारण कुछ शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी-किसी ग्रंथ (जैसे, शक्ति संगम के तंत्र) में मिलती है। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में- राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत में 'बालनाथ का टीला' आया है।“ 8 नाथ संप्रदाय के ग्रंथों में जलंधरनाथ को ही बालनाथ के नाम से बताया गया है। मछिंदरनाथ बालनाथ के शिष्य थे, और गोरखनाथ मछिंदरनाथ के शिष्य थे। इस तरह जलंधरनाथ से सिद्धों में विचार-व्यवहार आधारित भेद पनपता है, जो गोरखनाथ के समय में स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है।

सिद्धों के द्वारा सहजयान के रूप में वामाचार और तंत्र-साधना का प्रयोग किया जा रहा था, और इस प्रयोग के कारण धार्मिक शुचिता व पवित्रता के स्थान पर रहस्यमयी बातें; नाद, बिंदु, घट, सुरति, निरति आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए गुह्य-गूढ़ चिंतन व दर्शन की बातें सिद्ध साहित्य में दिखाई देने लगीं। इनके कारण उपजने वाली असहजता के मध्य सिद्धों को लेकर भ्रांतियाँ व विकृतियाँ पनपने लगीं। समाज को सही रास्ता दिखाने के स्थान पर चमत्कार और चमत्कारिक घटनाओं को महत्त्व मिलने लगा। सहजयान के नाम पर रचलित हो चली भोगवादी प्रवृत्ति के स्थान पर योग को और साधना-पद्धतियों में प्रचलित हो चली उच्छृंखलता के स्थान पर कड़े अनुशासन को महत्त्व देते हुए गोरखनाथ ने नाथ पंथ को प्रचलित किया। साधना में अनुशासन और योग-परंपरा भारतीय साधना-पद्धति में प्रचलित रही है। शिव को योग का अधिष्ठाता माना जाता है। भारतीय योग-साधना के प्रवर्तक पतंजलि माने जाते हैं। नाथ पंथियों ने अनुशासन के लिए पतंजलि की योग-साधना को आत्मसात् किया, यद्यपि अनेक विद्वान पतंजलि के योगशास्त्र और नाथपंथियों के योग के मध्य कुछ भिन्नताओं को देखते हुए दोनों को अलग मानते हैं, तथापि इस विभेद को देश-काल-स्थिति के कारकों के साथ देखते हुए मूल-आधार को ग्रहण करना चाहिए। नाथपंथ का लक्ष्य महासुख या सहजसुख नहीं, वरन् अमरत्व और शिवत्व को पाना था। गोरक्षनाथ शिव के अवतार माने जाते हैं। मन की शुद्धता, चित्त के विकारों का शमन मन को शुद्ध करने के लिए अनिवार्य माना जाता है। गोरखनाथ का कथन है-

“नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा ।

ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा ।।“ 9

नाथ पंथ के सहित्य का परिचय गोरखबानी के इस उद्धरण के साथ दिया जाता है। गोरखनाथ के द्वारा इन दो पंक्तियों में न केवल नाथ पंथ की वैचारिक पृष्ठभूमि को, वरन् सामयिक संदर्भ को भी बताया गया है। सामने विभिन्न प्रकार की भोग-विलास की वस्तुएँ हैं। पीछे छूट गया सहज अखाड़ा (सहजयानी) है। इन दोनों स्थितियों के मध्य मन को स्थिर करना है। मन को शुद्ध करना है। चित्त के विकारों का शमन करना है। ऐसा करने पर ही मन में, चित्त में शिव और शिवत्व का भंडार भरेगा। नाथ पंथ भौतिकता के सुख-साधनों के मध्य चित्त को स्थिर करने और विकारों से मुक्त करने की साधना पर बल देता है।

‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’, अर्थात् जैसा ब्रह्मांड में है, वैसा ही शरीर में विद्यमान है। नाथ पंथ में इस भावधारा की प्रबलता दिखाई देती है। ब्रह्मांड में खोजने की अपेक्षा पिंड, अर्थात् शरीर में खोजने की बात नाथ पंथ में कही जाती है। यह अद्वय का सिद्धांत है। यह एकरसता का, एकरूपता का सिद्धांत है। यद्यपि यह सिद्धांत भारतीय दर्शन और चिंतन धारा में पुरातनकाल से रहा है, तथापि अनेक मतों-पंथों के वैचारिक संक्रमण के मध्य इस सिद्धांत का पुनर्पाठ हमें नाथ पंथ में ही देखने को मिलता है। कबीर आदि संतों ने अनेक स्थानों पर शरीर को गढ़, कोट आदि रूपकों से अभिव्यंजित किया है। नाथ पंथियों ने शरीर में ब्रह्माण्ड के तत्त्वों का व्यापक चित्रण किया है। संतों के लिए कायसाधना की अपेक्षा मन के विचलन को नियंत्रित करते हुए भक्ति के भाव के साथ जोड़ना अपेक्षित था। इस कारण संतों ने आवश्यकतानुसार ही इस सिद्धांत का वर्णन किया है।

नाथ पंथ का साहित्य उपरोक्त विशिष्टताओं को साथ लेकर विकसित और समृद्ध हुआ है। मुक्तक गीति शैली में नाथ संतों ने अपनी रचनाएँ की हैं। महाराष्ट्र में नाथ पंथ के साधक के रूप में ज्ञानदेव को हम जानते हैं। ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर की रची हुई ज्ञानेश्वरी गीता में नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। उत्तर भारत की ओर चलने वाली संत परंपरा के प्रमुख कवि के रूप में ज्ञानेश्वर और उनके साथ ही संत एकनाथ, संत तुकाराम प्रभृति संत कवियों ने उत्तर भारत में भक्तियुग का आह्वान किया। संत कबीर और उनके परवर्ती संत कवियों की बानियों में नाथ परंपरा के अंश परिलक्षित होते हैं। भक्ति काल के संत कवियों की बानियों में, रचनाओं में भाव पक्ष का भवन नाथ पंथ की भावभूमि से बना है। नाथ पंथ की भाषा और छंद विधान ने संत साहित्य को दिशा दिखाई है।

गोस्वामी तुलसीदास की वैष्णव भक्ति-भावना और सगुणोपासना नाथ पंथ से किंचित् अलग दिखती है, तथापि वे नाथ पंथ की निर्गुणोपासना और योग के प्रति आस्थावान हैं। गोस्वामी तुलसीदास की निर्गुणोपासना के स्थान पर सगुणोपासना और योग के स्थान पर नवधा भक्ति के प्रति अनुराग और अभिव्यक्ति को यत्र-तत्र विरोध के रूप में देख लिया जाता है। यदि तथ्यात्मक चिंतन के साथ पक्षपात और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखें, तो नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास के साथ ही सगुणोपासक अन्य भक्त कवियों में भी देखी जा सकती हैं। उदाहरणार्थ नाथ पंथ का ‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’ का सिद्धांत गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस में मिलता है। यह सिद्धांत बाबा तुलसी के द्वारा अपने आराध्य की विराटता को प्रकट करने का माध्यम बनता है। वे लिखते हैं-

“ब्रह्मांड  निकाया   निर्मित  माया  रोम  रोम  प्रति  बेद कहै ।

मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ।।“ 10

“देखरावा मातहिं निज अद्भूत रूप अखंड ।

रोम रोम  प्रति  लागे   कोटि कोटि  ब्रह्मंड ।।“ 11

गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी के प्रारंभ में संतों के व्यक्तित्व और उनके जीवन का अत्यंत सरस वर्णन मिलता है। इस कृति के प्रारंभ में ही वे लिखते हैं-

“अज अद्वैत अनाम, अलखरूप गुन रहित जो।

मायापति सोइ राम, दास हेतु नर तनु धरेउ ।।“ 12

तुलसी की समन्वय की भावना यहाँ कोई भेद नहीं करती है। वे अलखरूप (गुरु गोरखनाथ द्वारा ईश-स्मरण के लिए ‘अलख निरंजन’ का उद्घोष प्रचलित-प्रसारित किया गया था।) में भी अपने आराध्य को देखते हैं, निर्गुण रूप में भी अपने आराध्य को पाते हैं। इन उद्धरणों के साथ आलेख के प्रारंभ में उल्लिखित पद में अभिव्यंजित भाव को समझ सकते हैं। वहाँ पर वैष्णव भक्त तुलसी की भक्ति भावना प्रबल रूप में परिलक्षित होती है, व उनकी चिंता भी प्रकट होती है, लेकिन उस चिंता के मध्य गोरख के योग का प्रसार सकारात्मक रूप में दिखता है। बाबा तुलसी की समन्वयकारी भावना उस समय के प्रचलित सभी भक्ति-योग रूपों को लेकर चलती है।

भक्ति की सगुण धारा के प्रमुख कवि के रूप में गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व में नाथ पंथ की वैचारिक उपस्थिति के उपरोक्त विश्लेषण के साथ ही संत काव्य या भक्ति की निर्गुण काव्यधारा की निर्मिति में नाथ पंथ का योग स्वतः प्रमाणित है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवि कबीर स्वयं को नाथ पंथ का अंग-अंश मानते हैं। वे स्वीकारते हैं-

“गोरष भरथरि गोपीचंदा । ता मन सो मिलि करै अनंदा ।।

अकल निरंजन सकल सरीरा । ता मन सो मिलि रहा कबीरा ।।“ 13

कबीर के सभी काव्य-रूप, यथा- साखी, पद, रमैनी, बावनी, चौंतीसा, तिथि, बसंत, चाँचर, हिंडोला आदि प्रायः गोरखबानी से ही आए हैं। समस्त संत-साहित्य में हठयोग की शब्दावली विस्तृत है। गुरु नानक के सबद-कीर्तन में भी नाथ पंथ का प्रभाव परिलक्षित होता है। हिंदी के भक्तिकाल में नाथ पंथ की साधना-पद्धति, योग, चिंतन और ध्यान-मनन समग्र विविधता एवं व्यापकता के साथ परिलक्षित होते हैं।

वस्तुतः, गोरखनाथ के द्वारा नाथ पंथ को समृद्ध-सशक्त बनाए जाने का प्रमुख कारण सिद्धों-वज्रयानियों-सहजयानियों द्वारा फैलाई जा रही विकृतियों का प्रतिकार करना था। वामाचार में सन्नद्ध अपने गुरु को भी वे विकृति से निकालने का कार्य करते हैं। ‘जाग मछंदर गोरख आया...’ में यही तथ्य दिखता है। नाथ पंथ का ध्येय लोकजीवन का परिमार्जन है। यह अलग बात है, कि विभिन्न आलोचकों-अध्येताओं की दृष्टि में उनका हठयोग और उनकी साधना-पद्धति जीवन की स्वाभाविक स्थिति, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के सामान्य एवं सुव्यवस्थित रूप के साथ संबधित नहीं है। कुछ आलोचक, साहित्येतिहासकार नाथ पंथ के साहित्यिक अवदान को भक्ति-विषयक कहकर एकांगी और साहित्येतर की श्रेणी में रखते हैं। इन दोनों ही स्थितियों के विपरीत नाथ पंथ के साहित्य को भक्ति साहित्य और हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के लिए अवदान के संदर्भों के साथ विश्लेषित करने पर एक विस्तृत एवं समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। नाथ पंथ निष्पक्ष एवं लोकानुरागी, लोकहितकारी आध्यात्मिक क्रांति के रूप में उस विषम काल में दिखाई देता है, जब विधर्मी विदेशी आक्रांताओं के साथ ही देश के अंदर पंथाधारित (वज्रयान, सहजयान आदि में पनपी) धार्मिक विकृतियाँ लोक चेतना और लोकजीवन को दिशाविहीन कर रहीं थीं। हिंदी का भक्तिकाल नाथ पंथ की आध्यात्मिक चेतना से रस-संचय कर लोक के पथ का मार्गदर्शन करता है, तो इसमें नाथ-साहित्य के बृहत्-विशद-व्यापक योगदान को देखा जाना अपेक्षित व अनिवार्य हो जाता है। इसके साथ ही नाथ-साहित्य के व्यापक विश्लेषण एवं शोध की अपरिमित संभावनाएँ दिखाई देती हैं, जिनको कार्यरूप में परिणत कर नाथ-साहित्य के समाज-सापेक्ष, लोक-सापेक्ष यथार्थपूर्ण एवं तर्कपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन-प्रकटीकरण किया जा सकता है।


संदर्भ-

1. गोस्वामी तुलसीदासकृत कवितावली सटीक, उत्तरकांड, टीकाकार पं. गणेश पांडेय, ठा. सूर्यनाथ सिंह ‘विशारद’, छात्रहितकारी पुस्तकमाला, प्रयाग, सं. 1936, पृ. 173,

2. गणपतिचंद्र गुप्त, पूर्ववर्ती भारतीय साहित्य एवं उसका प्रभाव, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, प्रथम खंड, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, सं. 2010, पृ. 44,

3. वही, पृ. 45,

4. राहुल मिश्र, आठवें दशक के बाद के उपन्यासों के कथ्यात्मक चिंतन के संदर्भ, हिंदी कथा-साहित्य : आठवें दशक के बाद, ग्रंथकेतन, नई दिल्ली, सं. 2009, पृ. 174,

5. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथों और संतों के जातीय और सामाजिक संबंध, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 57,

6. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गोरक्षनाथ (गोरखनाथ), नाथ-संप्रदाय, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, सं. 1950, पृ. 97,

7. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथ और संत साहित्य, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 33,

8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं. 2015, पृ. 29-30,

9. डॉ. नगेन्द्र (संपादक), आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली सं. 2004, पृ. 67,

10. गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस, बालकांड, दोहा 192, लोकभारती टीका, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, पृ. 210,  

11. वही, दोहा 201, पृ. 218,

12. गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी, सो. 04, तुलसी ग्रंथावली, प्रथम भाग, सं. पं. महावीर प्रसाद मालवीय ‘वैद्य’, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग, सं. संवत् 1981 वि., पृ. 05,

13. श्यामसुंदर दासकृत कबीर ग्रंथावली, प्रस्तावना, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 1985, पृ. 38 ।

(हिंदी विभाग, कालिकट विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका 'शोध प्रयाण' के प्रवेशांक, मार्च- 2024 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र 

Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।