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Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।


Friday, 5 September 2025

 

अपराजेय योद्धा श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ भट्ट

हिंदवी साम्राज्य के स्वप्न को साकार करने वाले अपराजेय योद्धा श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ भट्ट की पुण्यतिथि पर विगत 28 अप्रैल को रावेरखेड़ी में भव्य आयोजन हुआ। मध्यप्रदेश के खारगौन जनपद में रावेरखेड़ी नर्मदा के तट पर स्थित एक अनजाना-सा गाँव है, लेकिन हिंदवी साम्राज्य के अपराजेय योद्धा की समाधि ने इस गाँव को न केवल वैश्विक मानचित्र पर उकेरा है, वरन् भारतीय शौर्य और सनातन आस्था के समर्पित जनों के लिए तीर्थ की भाँति पूज्यनीय बनाया है।

दिल्ली से विजय-पताका फहराते हुए लौट रहे पेशवा बाजीराव का पड़ाव रावेरखेड़ी में पड़ा था। यहीं उनका स्वास्थ खराब हुआ और 28 अप्रैल, 1740 को उन्होंने देवलोकगमन किया। श्रीमंत के स्वामिभक्त ग्वालियर के सिंधिया राजे ने उनकी समाधि बनवाई। समाधि-स्थल भव्य किले के रूप में है, लेकिन यह स्थान और साथ ही रावेरखेड़ी इतिहास के पन्नों में अनजाना-सा रहा है। सच्चाई तो यह है, कि बाजीराव पेशवा को भी कम लोग ही जानते होंगे। वर्ष 2015 में एक फिल्म आई थी- बाजीराव मस्तानी। यह फिल्म नागनाथ इनामदार के मराठी उपन्यास राऊ पर केंद्रित थी। इस फिल्म ने बाजीराव पेशवा का जैसा परिचय समाज को देने का प्रयास किया, वह भारत के गौरवपूर्ण अतीत का अनुशीलन और समाज का सच से निदर्शन नहीं करा सका है। पेशवा बाजीराव की अद्भुत युद्धकला, उनका संगठन-कौशल, उनका शौर्य और पराक्रम, उनकी वीरता के अनेक गौरवपूर्ण अध्यायों पर एक मनगढंत प्रेमकथा का आवरण डाला गया है। मस्तानी बुंदेल-केसरी वीर छत्रसाल की धर्म-पुत्री थी, और पराक्रम में भी किसी से कम नहीं थी। महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को अपना पुत्र मानते हुए बुंदेलखंड के राज्य का एक तिहाई भाग बाजीराव पेशवा को दिया था। कुँवरि मस्तानी ने महाराजा छत्रसाल के गुरु महामति प्राणनाथ द्वारा प्रवर्तित प्रणामी संप्रदाय की विधिवत् दीक्षा ली थी। बाजीराव पेशवा और मस्तानी कुँवरि के संबंध अतीत की सच्चाई हैं, लेकिन इनका केवल कल्पनाजन्य विस्तार ही कथा-उपन्यासों और फिल्मों तक आता है। खेदजनक तो यह है, कि बाजीराव-मस्तानी के संबंधों का सम्यक मूल्यांकन और ऐतिहासिक शोधपरक अध्ययन इतिहासकारों के अध्ययन-क्षेत्र में नहीं आ सका। फलतः सही व सर्वाङ्गपूर्ण जानकारी का अभाव हमारे चरितनायक को, भारतीय शौर्य की गौरवशाली परंपरा के प्रमुख मानबिंदु को, बाजीराव बल्लाळ भट्ट को अपेक्षित मान नहीं दिला सका।

सैन्य-अध्ययन में बहुत प्रचलित युद्ध-तकनीक है- ब्लिट्जक्रेग। हिंदी में इसे विद्युतगति युद्ध कह सकते हैं। इस युद्ध पद्धति के जनक पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति के द्वारा मुगलों को अनेक युद्धों में परास्त किया था। उनकी इस युद्ध-पद्धति को सामयिक आवश्यकता और अनिवार्यता के अनुरूप विस्तारित करते हुए श्रीमंत बाजीराव ने बिजली की गति से शत्रु पर टूट पड़ने की युद्ध पद्धति को अपनाया। शत्रु जब तक युद्ध के हालात को समझ पाए, तब तक शत्रु पर चारों ओर से एकसाथ आक्रमण कर देना। उनकी इसी युद्ध पद्धति के कारण उन्हें हर युद्ध में विजयश्री मिली। ब्रिटिश सेना के फील्ड मार्शल बर्नार्ड लॉ मांटगोमरी द्वितीय विश्वयुद्ध के सबसे सफल और प्रमुख कमांडर थे। जनरल मांटगोमरी की प्रसिद्ध पुस्तक है- हिस्ट्री आफ वारफेयर। इस पुस्तक में उन्होंने बाजीराव पेशवा की अश्वसेना सहित उनकी बिजली-युद्ध पद्धति की बहुत प्रशंसा की है। वे लिखते हैं, कि- “पेशवा बाजीराव प्रथम एक भी युद्ध नहीं हारे। वे सदैव संख्याबल में कम, किंतु कुशल घुड़सवार सैनिकों के साथ बिजली की गति से आक्रमण कर दुश्मन की लाखों की सेना को परास्त कर देते थे।“

28 फरवरी, 1728 को संभाजीनगर (पूर्ववर्ती औरंगाबाद) के निकट पालखेड़ गाँव के समीप हुए पालखेड़ का युद्ध उनके इस रणकौशल का उत्कृष्टतम उदाहरण है। पालखेड़ के युद्ध में उनकी नवोन्मेषी युद्धनीति, रणनीति और राजनीतिक कुशलता का अद्भुत साम्य देखने को मिलता है। इसी कारण पालखेड़ का युद्ध विश्व के चर्चित और प्रसिद्ध युद्धों में अपना स्थान भी रखता है और आज भी ‘केस-स्टडी’ के रूप में पढ़ा-पढ़ाया जाता है। ब्रिटेन और अमरीका में आज भी सैन्य-अध्ययन के अंतर्गत पालखेड़ का युद्ध ‘केस-स्टडी’ के रूप में पढ़ाया जाता है।

पिता बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के उपरांत छत्रपति शाहूजी महाराज के समक्ष पेशवा के पद को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया था। उस समय बाजीराव की आयु 19 वर्ष के आसपास थी। अल्पवय के बाजीराव की वीरता और कर्मठता ने शाहूजी महाराज को बहुत प्रभावित किया, और उन्होंने बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया। इसके उपरांत बीस वर्षों तक बाजीराव पेशवा ने कभी अपनी कमर की तलवार नहीं खोली, कभी अश्व की सवारी नहीं छोड़ी और अटक से कटक तक भगवा ध्वज फहराकर शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज के स्वप्न को साकार किया। विश्व का इतिहास साक्षी है, कि शक्तिशाली सेनापति हो या सामान्य-सा सैनिक, या फिर परिवार का ही व्यक्ति... अवसर पाते ही सत्ता हथियाने के प्रयास प्रारंभ कर देता है। भारत का मध्यकाल तो ऐसे विश्वासघातों से भरा पड़ा है, जहाँ सत्ता पाने के लिए भाई अपने भाइयों को मार डालता है, पिता को बंदी बना लेता है... भतीजा अपने चाचा की धोखे से हत्या कर देता है, आदि...आदि। इसी मध्यकाल में अप्रतिम योद्धा बाजीराव बल्लाळ भट्ट की स्वामिभक्ति, उनका त्याग और समर्पण, आदर्श और नैतिकता की अक्षय कीर्ति सनातन भारतीय परंपरा के, उदात्त भारतीय जीवन-पद्धति और जीवन दर्शन के जीवंत-जागृत साक्ष्य के रूप में हमारे समक्ष है। पेशवा बाजीराव की प्रधान मुद्रा में अंकित एक-एक शब्द उनके विराट व्यक्तित्व को उद्घोषित करता है। उनकी मुद्रा में अंकित है-

“श्रीराजा शाहूजी नरपती हर्षनिधान-बाजीराव बल्लाळ पंतप्रधान”

पंतप्रधान बाजीराव बल्लाळ छत्रपति शाहूजी महाराज की ओर से मुद्रा अंकित करते हैं। दक्षिण से उत्तर तक अपने अश्वों की पदचाप से विधर्मी आक्रांताओं द्वारा पददलित भारतभूमि को स्वातंत्र्य का अमृतपान कराने वाले इस अपराजेय योद्धा ने कभी भी राज्यलिप्सा नहीं पाली, कभी भी यश की लालसा नहीं पाली...। अखंड भारत के लिए, हिंदवी स्वराज के लिए अपने तन-मन को गलाया, समर्पित किया। बाजीराव पेशवा को ‘राऊ’ कहकर पुकारा जाता था। ‘राऊ’ अर्थात् सरदारों में सर्वश्रेष्ठ...। यह उपाधि उन पर खरी बैठती थी। मराठा साम्राज्य का विस्तार और म्लेच्छ आक्रांताओं की कुत्सित चालों व नीतियों का दमन करते हुए दिल्ली तक अपनी कीर्ति-पताका फहराने वाले बाजीराव पेशवा को ‘महाराष्ट्र केसरी’, ‘हिंद केसरी’ के रूप में हम जानते हैं। ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते हुए सिंह की भाँति विधर्मियों पर टूट पड़ने वाले श्रीमंत बाजीराव ने मुगलों को दिल्ली के आसपास तक सीमित कर दिया था। इतना ही नहीं, पेशवा बाजीराव के भय से मुगल शासकों को दिल्ली भी हाथ से जाती दिख रही थी। पेशवा बाजीराव ने ही समूचे भारतदेश की अखंडता और हिंदू राजसत्ता पर आधृत हिंदू पदपादशाही का सिद्धांत दिया था, जिसका विस्तार के साथ उल्लेख स्वातंत्र्यवीर सावरकर की इसी नाम से रचित पुस्तक में मिलता है। पेशवा बाजीराव का ही पराक्रम था, कि उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में शक्तिकेंद्र स्थापित किए। होलकर, पवार, सिंधिया, गायकवाड़, शिंदे आदि वीर राजे-रजवाड़े पेशवा बाजीराव के प्रयासों से ही सशक्त और समर्थ होकर सक्रिय हुए।

 अप्रतिम योद्धा, माँ भारती के अमर सपूत, भारतीय शौर्य परंपरा के संवाहक, शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज को साकार करने वाले पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट को हमारी नई पीढ़ी कितना जानती है? यह प्रश्न हमारे सामने है। निःसंदेह ‘फिल्मी नैरेटिव’ ने बहुत गलत संदेश दिया है, जिसका सुधार करना हमारा दायित्य है। हमारा इतिहास केवल पराजय का इतिहास नहीं है, जैसा कि बताया जाता है, पढ़ाया जाता है। हमारा इतिहास पेशवा बाजीराव जैसे महान योद्धाओं की अपरिमित शौर्यगाथाओं से भरा हुआ है। पेशवा बाजीराव ने अपने लगभग चालीस वर्ष के छोटे-से जीवन में, बीस वर्ष के अंतराल में चालीस लड़ाइयाँ लड़ीं, और सभी में विजय प्राप्त की। विश्व इतिहास में सिकंदर को महान बताया जाता है, अपराजेय बताया जाता है। लेकिन वह भी परास्त हुआ था, भारत को जीतने का उसका सपना कभी सच नहीं हो सका था। यहाँ से उसे वापस लौटकर जाना पड़ा था। ऐसे में जो जीता, वो सिकंदर कैसे हुआ? पेशवा बाजीराव ने शत प्रतिशत युद्ध जीते। इसलिए जो जीता, वह बाजीराव कहा जाना चाहिए।

‘जो जीता, वो बाजीराव’ का उद्घोष करते हुए पेशवा बाजीराव के प्रति आस्थावान देशभक्तों का एकत्रीकरण रावेरखेड़ी में हुआ। सनातन भारतीय परंपरा के रक्षक, रण-धुरंधर, पराक्रमी, अद्वितीय योद्धा, हिंद केसरी, प्रबल प्रतापी पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट का समाधि-स्थल उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम के कारण 28 अप्रैल को चर्चा में आया, यहाँ चहल-पहल हुई, लेकिन शेष समय में यह पवित्र स्थल उपेक्षित ही रहता है। ज्ञात हुआ है, कि कुछ समय पूर्व कुछ जागरूक लोगों के प्रयासों से आवागमन के साधन सुलभ हुए हैं, लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। विशेष रूप से अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे अद्वितीय नायक, अपराजेय योद्धा के बारे में बताया जाना.....।

-राहुल मिश्र

(पाञ्चजन्य, नई दिल्ली में प्रकाशित, ज्येष्ठ कृष्ण 5, वि.सं. 2082, युगाब्द 5127 तदनुसार 18 मई, 2025)

Wednesday, 19 March 2025

प्रात लेइ जो नाम हमारा....

 

प्रात लेइ जो नाम हमारा....

श्रीरामचरितमानस के सुंदर कांड में अत्यंत रुचिकर प्रसंग आता है। प्रसंग माता सीता का पता लगाने के लिए हनुमान जी को लंका भेजने का है। हनुमान अपने बल को भूले हुए बैठे हैं। जामवंत के याद दिलाने पर उन्हें अपनी शक्ति का अनुभव होता है। वे तुरंत लंका के लिए प्रस्थान करते हैं। मार्ग में अनेक बाधाएँ और संकट आए, जिनको पार करके भक्तप्रवर हनुमान लंका पहुँचते हैं। लंका राक्षसों की नगरी है। वहाँ भले लोग कैसे मिलेंगे? एक अजनबी की भाँति हनुमान लंका में प्रवेश करते हैं। स्थान-स्थान पर बाधाएँ हैं, पहरे हैं, राक्षसों की क्रूरता के चिह्न हैं....। ऐसे विकट-भयावह स्थान पर माता सीता कैसे जीवन बिता रहीं हैं...., यह चिंता भी हनुमान को होती है।

सुख और समृद्धि भले ही एक-दूसरे के साथ जोड़कर व्यवहृत हों, लेकिन समृद्धि होने से सुख सुनिश्चित नहीं हो जाता। लंका नगरी में संपन्नता की कोई कमी नहीं है। हनुमान जी पूरी लंका नगरी का भ्रमण करते हैं। बाबा तुलसी ने बहुत संक्षेप में वर्णन किया है, लेकिन आद्यकवि वाल्मीकि ने रामायण में लंका का विशद-व्यापक वर्णन किया है। लंका नगरी की समृद्धि का वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वहाँ समृद्धि के अनेक प्रतिमान हैं, लेकिन सुख की अनुभूति नहीं मिलती.... उल्लास, उमंग, हर्ष, आत्मिक शांति और जीवंतता नहीं दिखती। आद्यकवि वाल्मीकि ने संपन्नता का वर्णन करते हुए इस पक्ष को विशेष रूप से इंगित किया है। गोस्वामी जी केवल संकेत देते हुए आगे बढ़ जाते हैं, और हनुमान-विभीषण संवाद का विस्तृत वर्णन करते हैं। उनकी दृष्टि सत्संग के वैशिष्ट्य को स्थापित करने में केंद्रित होती है। गोस्वामी जी हनुमान और विभीषण के मध्य संवाद के माध्यम से सद्भावना, सहकार, समन्वय और समरसता को उकेरते हैं। गोस्वामी जी मानस में वर्णन करते हैं, कि लंका नगरी में भ्रमण करते हुए हनुमान को कहीं भी भले लोग नहीं दिखते। एक घर ऐसा दिखाई दे जाता है, जो हनुमान जी की धारण को बदल देता है। उस घर के बाहर रामायुध अंकित है,और तुलसी का चौरा भी है। यह देखकर हनुमान जी को भरोसा हो जाता है, कि यहाँ संत-सज्जन व्यक्ति का निवास है। वे पुकारते हैं। विभीषण भी उनके राम-नाम स्मरण को सुनकर हर्षित होते हैं। दोनों रामभक्त बैठते हैं।


हनुमान और विभीषण का संवाद वाल्मीकि रामायण में नहीं है... अध्यात्म रामायण में भी नहीं है।
गोस्वामी जी सायास इस प्रसंग को लाते हैं। उनका उद्देश्य भक्ति-भावना की पुष्टि का तो है ही, साथ ही वे सामयिक संदर्भों की ओर भी संकेत करते हैं। हनुमान और विभीषण के मध्य संवाद अत्यंत रुचिकर है। राम के दो अनन्य भक्त मिलते हैं। विभीषण अपने मन की वेदना कहते हैं। हनुमान उन्हें सांत्वना देते हैं-

कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबही बिधि हीना ।।

 प्रात  लेइ  जो नाम  हमारा ।  तेहि दिन  ताहि न मिलै अहारा ।।

अस मैं अधम सखा सुनु मोहूँ पर रघुबीर ।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।।

मैं कौन-सा बहुत कुलीन व्यक्ति हूँ...। आप ही बताइए...। मैं तो चंचल कपि हूँ, और सभी स्तरों से हीन हूँ, तुच्छ हूँ। मैं मानव नहीं हूँ, मैं गुणवान भी नहीं हूँ। मेरी चंचलता ऐसी है, कि जिसके लिए मुझे श्राप तक दिया जा चुका है...। मैं अधम हूँ, हेय हूँ। मेरा नाम तक लेने से लोग कतराते हैं। अगर कोई सुबह मेरा नाम ले लेता है, तो उसे उस दिन भोजन तक नहीं मिलता...। ऐसे अधम और हीन वानर पर भी श्रीराम की कृपा है। श्रीराम की कृपा का स्मरण कर हनुमान के नयन भावविभोर होकर अश्रु-प्लावित हो जाते हैं। हनुमान और विभीषण के मध्य का संवाद दो संतों के मध्य हो रही चर्चा के जैसा प्रतीत होता है, सत्संग का रूप ले लेता है। विभीषण कह रहे हैं-

क्या मुझ अनाथ निशचर के भी- रघुनाथ बनेंगे नाथ कभी ।

क्या मुझसे अधम दास को भी रक्खेंगे राघव साथ कभी ।।

विभीषण की वेदना वानरश्रेष्ठ हनुमान के सम्मुख प्रकट होती है। विभीषण कहते हैं, कि मैं तो लंका नगरी में वैसे ही रह रहा हूँ, जैसे दाँतों के मध्य जीभ होती है। राधेश्याम कथावाचक इस वार्ता को रुचिकर बनाते हैं। राधेश्याम रामायण में संवाद चलता है-

कपि बोले मुँह की बत्तीसी सब टूट फूट गिर जाएगी ।

पर, जिह्वा-जीवनभर रहकर-श्रीराम-नाम गुण गाएगी ।।

भक्त विभीषण, धन्य तुम, धन्य तुम्हारा प्रेम !

धन्य तुम्हारी धारणा, धन्य तुम्हारा नेम !!

जो सज्जन हैं, सत्संगी है, वे कहीं छिपाए छिपते हैं?

एक ही पन्थ के दो पन्थी-इस प्रकार देखो मिलते हैं ।।

विभीषण और हनुमान भ्रातृ-प्रेम में आबद्ध हो जाते हैं। राम का नाम दोनों के मध्य संबंधों को स्थापित करने का माध्यम बनता है। कबीर का एक बहुत प्रसिद्ध पद है-

कबीर हरदी पीयरी, चूना उज्जल भाइ ।

राम सनेही यूँ मिले दून्यू बरन गँवाइ ।।

संबंधों में मर्यादा ही तो राम-सनेह है, भगवान श्रीराम मर्यादा के प्रतीक हैं। कर्म की मर्यादा, धर्म की मर्यादा, नीति-नैतिकता के पालन की मर्यादा ही तो राम से व्याख्यायित होती है। संबंधों की मर्यादा टूटने पर ही विभीषण अपने घर में तिरस्कृत हैं। लंका नगरी की समृद्धि अमर्यादित कार्य-व्यवहारों के कारण ही अपनी आभा खो बैठी है। भौतिक संपन्नता एक ऐसे खोखलेपन के साथ लंका नगरी में देखी जा सकती है, जहाँ उद्दंडता है, उच्छृंखलता है, मनमानी है, मनमौजीपन है। यह रामकथा के अंत में विशेष रूप से प्रकट होती है। रावण के वध के उपरांत मंदोदरी विलाप करती है-

राम विमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनहारा ।।

गोस्वामी तुलसीदास यदि चाहते, तो हनुमान और विभीषण की भेंट का सामान्य और प्रसंगानुकूल वर्णन करके कथा को आगे बढ़ा देते, लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं। उनके सामने हनुमान और विभीषण की भेंट का प्रसंग कथा के अंतर्गत आने वाले मात्र एक पड़ाव की भाँति नहीं है। बाबा तुलसी की दृष्टि दूर तक जाती है। गोस्वामी जी रामायण काल तक ही नहीं रहते, वे वर्तमान से भी जुड़ते हैं। रामकथा को सामयिक बनाते हैं। गोस्वामी जी का समय अनेक संघर्षों से भरा हुआ था। समूचा भक्ति आंदोलन ही जन-जन को चैतन्य बनाने के लिए था, क्रूर आक्रांताओं से आहत भारतीय जनसमुदाय के पथ-प्रदर्शक की भूमिका में था। गोस्वामी जी की दृष्टि भी यही थी। उन्हें समग्र भारतीय समाज को, सनातन परंपरा के सभी घटकों-अंगों को संगठित करना था, जोड़ना था। इसी कारण वे श्रीराम के ’सर्वभूत हिते रतः’ के भाव को प्रमुख रूप से प्रस्तुत करते हैं। श्रीराम सभी के हित में संलग्न हैं, ऐसा इस प्रसंग में ध्वनित होता है। वस्तुतः सुंदरकांड इसी कारण सुंदर कांड है, क्योंकि इसमें अनेक लोगों की संघटना है, कई लोगों का जुड़ाव है। यहाँ जाति-प्रजाति का, उत्तर-दक्षिण का, नर-वानर का भेद नहीं है। यहाँ सभी एक होते हैं, जुटते हैं... और राम काज के लिए जुटते हैं। जिसके पास जो कुछ भी है, उसको लेकर वो जुटता है, अपना योगदान देता है।

गोस्वामी तुलसीदास जब हनुमान और विभीषण के मध्य संवाद को प्रस्तुत करते हैं, तो उनकी दृष्टि इस जुड़ाव की ओर होती है। विभीषण को लगता है, कि वो कैसे जुड़ पाएँगे। वे तो बहुत दूर पड़े हुए हैं। उनके साथ रावण का नाम जुड़ा हुआ है। क्रूर-आततायी रावण का भाई विभीषण राम का प्रिय कैसे हो सकता है? रावण ने सीता का हरण किया है। सीता लंका में बंदी हैं, और विभीषण लंकेश के भाई....। राम तो कभी भी विभीषण को स्वीकार नहीं करेंगे। विभीषण भले ही स्वयं में सही हैं, सीधे-सच्चे हैं। रावण से उनका सैद्धांतिक मतभेद है। वे रावण की नीतियों के विरुद्ध हैं। इसी कारण लंका में उपेक्षित और तिरस्कृत जीवन जी रहे हैं, लेकिन रावण के साथ संबंध विख्यात है। संगति का असर है, जो विभीषण को भी राक्षसों की श्रेणी में रखता है।

हनुमान भी शापित हैं। बचपन में उन्हें श्राप मिला था, कि वे अपने बल को भूल जाएँगे। उनकी बाल सुलभ चंचलता थी, कि उन्होंने सूर्य को अपना ग्रास बना लिया था। साधु-संन्यासियों के आश्रमों में वे खूब उछल-कूद मचाते थे, जिससे साधनारत संन्यासियों का ध्यानभंग होता था। फलतः उन्हें श्राप मिला, कि वे बल को भूल जाएँगे और यदि कोई उन्हें स्मरण कराएगा, तभी वे अपने बल को जानेंगे, और बल का प्रयोग कर सकेंगे। इसे श्राप कहें, या व्यवहार को संयमित करने की सीख...। इसके बाद हनुमान जी का व्यवहार एकदम बदल गया। वे संत प्रवृत्ति के हो गए। सुंदरकांड में जब जामवंत ने उन्हें बल का स्मरण कराया, तो वे अपनी सामर्थ्य को जानकर प्रसन्न हुए और राम-काज में अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग करने हेतु प्रस्तुत हुए। हनुमान जी के बल का वर्णन प्रायः सभी रामकथाओं में मिलता है। तमिल में हनुमान का एक नाम ‘तिरुवड़ि’ है। तिरुवड़ि, अर्थात् विष्णुपाद....। कंब रामायण में प्रसंग आता है, कि समुद्र पार करने के लिए हनुमान ने विराट रूप धारण किया। जिस तरह धरती को नाप लेने के लिए भगवान विष्णु के वामन अवतार ने अपना लंबा डग रखा था, वैसे ही यहाँ हनुमान ने रखा है। इसी कारण हनुमान तिरुवड़ि हैं, विष्णुपाद हैं।

कंब रामायण की स्थापना के अनुसार हनुमान विष्णु के स्वरूप हैं। उन्हें शिव का अवतार भी माना जाता है। वैष्णव सी भक्ति और शैव सी शक्ति का समन्वित रूप हनुमान का है। लंका नगरी में विभीषण के साथ सत्संग में वैष्णव और लंका के ध्वंस में शिव के अवतार हनुमान....। विभीषण के साथ संवाद में हनुमान राम के अनन्य भक्त और वैष्णव संत के सदृश प्रतीत होते हैं। वे विभीषण को अपनी ओर से आश्वासन देते हैं, कि राम उन्हें अवश्य स्वीकार करेंगे। राम और रामादल के मध्य संबंधों की निकटता इतनी है, कि हनुमान को आश्वासन देने के लिए राम की अनुमति आवश्यकता नहीं होती। राम सभी के लिए सहज हैं, सुलभ हैं।

गोस्वामी तुलसीदास हनुमान और विभीषण के मध्य संवाद के माध्यम से संगठन की शक्ति को व्याख्यायित करते हैं। श्रीराम किसी से किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करते। हनुमान जैसे शापित और मानवेतर जीव भी राम के लिए प्रिय हैं, अनन्य हैं। और इतने निकट हैं, कि हनुमान बेधड़क राम की ओर से विभीषण को आश्वासन दे रहे हैं। राम की संगठन-शक्ति सभी को लेकर बनती है। वहाँ कोई भेदभाव नहीं है। सभी समान हैं, सभी के लिए अधिकार भी समान हैं।

गोस्वामी जी का सम-काल अनेक विषमताओं से भरा था। विशेष रूप से म्लेच्छ आक्रांताओं के समक्ष भारतीय समाज अनेक वर्गों उपवर्गों में बँटा हुआ था। इस कारण भारतीय समाज दिशाहीन होकर, असंगित रहकर क्रूर आक्रांताओं के आघातों को झेल रहा था, क्षत-विक्षत हो रहा था। ऐसी विषम स्थिति में सभी को संगठित करने की आवश्यकता थी। मत-पंथ के नाम पर, जाति-उपजाति के नाम पर भेदभाव के खतरे गोस्वामी जी के सामने स्पष्ट थे। इस कारण वे सभी विभेदों को दूर करके एक होने की बात कहते हैं। हनुमान और विभीषण के मध्य संवाद को इसका एक अंग कह सकते हैं। प्रायः गोस्वामी जी पर वर्ण-भेद के आक्षेप लगाए जाते रहे हैं। यह प्रसंग इन आक्षेपों का भी खुलकर उत्तर देता है। भक्तकवि तुलसीदास के आराध्य राम समाज के सभी वर्गों के हैं। राम के सम्मुख कोई भेद नहीं है। श्रीरामचरितमानस की पूरी कथा में स्थान-स्थान पर ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं। सुंदरकांड विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ रामादल की संगठन-शक्ति प्रकट होती है। जामवंत, सुग्रीव, नल, नील, अंगद आदि सभी स्वतः स्फूर्त ऊर्जा से रामकाज में संल्गन होते हैं। क्रूरकर्मा, आततायी रावण पर विजय पाने के लिए सभी अपनी-अपनी सामर्थ्य-भर योगदान देते हैं। विभीषण भी रामादल में आ जाते हैं। जब गोस्वामी जी के आराध्य किसी से भेद नहीं करते, तो गोस्वामी जी कैसे वर्ण-भेद कर सकते हैं?

भक्तकवि गोस्वामी तुलसीदास के आराध्य श्रीराम सभी को साथ लेकर चलते हैं। गोस्वामी जी इस वैशिष्ट्य को न केवल उभारते हैं, वरन् अपने समकाल में पनपती विकृतियों विषमताओं के मध्य संदेश देते हैं, संगठित होने का, समन्वय और सहकार के भाव को साथ लेकर धर्मार्थ कार्य के लिए संलग्न होने का, बिना विलंब किए हुए विकृति-कुसंगति को त्यागकर धर्मोन्मुख होने का, और नीति-नैतिकता के मार्ग पर चलने का।

-राहुल मिश्र

(त्रैमासिक साहित्य परिक्रमा के आश्विन-मार्गशीष, युगाब्द 5126 तदनुसार अक्टूबर-दिसंबर, 2024, वर्ष- 25, अंक- 02 में प्रकाशित)





Saturday, 1 June 2024

लोक के राम, राम का लोक

 

लोक के राम, राम का लोक

राम लखन दोऊ भैया ही भैयासाधू बने चले जायँ मोरे लाल ।
चलत-चलत साधू बागन पहुँचेमालिन ने लए बिलमाए मोरे लाल। राम लखन...

घड़ी एक छाया में बिलमायो साधू, गजरा गुआएँ चले जाओ मोरे लाल। राम लखन...
जब वे साधू तालन पहुँचेधोबिन ने लए बिलमाए मोरे लाल। राम लखन...
चलत-चलत साधू महलन पहुँचेरानी ने लए बिलमाए मोरे लाल। राम लखन...
घड़ी एक छाया में बिलमायो साधूमहलन की शोभा बढ़ाओ मोरे लाल। राम लखन...
    बुंदेलखंड की अत्यंत प्रचलित लोकधुन में गाया जाने वाला यह लोकगीत भी बहुत ही प्रचलित है। आज भी प्रायः इस लोकगीत को सुनकर भाव-विह्वल हो जाना होता है। इस लोकगीत में वन की ओर जाते रामसीता और लक्ष्मण को देखकर बुंदेलखंड के वासी अपने मनोभावों को व्यक्त करते हैं। उनके लिए राम और लक्ष्मण सीधे-सरल राजकुमार हैंजो विपत्ति की मार सह रहे हैं। उन्हें साधु वेश धरकर वन को जाना पड़ रहा है। जिन रास्तों से वे जा रहे हैंउन रास्तों पर अलग-अलग लोग उन्हें देखकर व्यथित हो रहे हैंभावुक हो रहे हैंऔर कुछ क्षण विश्राम कर लेने का अनुरोध कर रहे हैं। इसी तरह बुंदेली में एक भजन भी है-

छैंयाँ बिलमा1 लेव बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।

लाला लखनलाल कुम्हलाने, सिय के हुइहैं पाँव पिराने,

तनक बैठ तो जाव बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।।

खाओ अचार2, गुलेंदे, महुआ, यहै कुआँ का पानी मिठौआ ।

पानी तो पी लेव बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।।

रस्ता तुम्हरी देखी नइयाँ, बीहड़ तऊ पै है बिलगैयाँ3

मृदुल संग लै लेव बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।।

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1. आराम करना, 2. चिरौंजी, 3. भटकाने वाली

भजन के ये पद बुंदेलखंड अंचल की अपनी लोक-परंपरा के अभिन्न अंग हैं। अयोध्या नगरी से वन की ओर जा रहे राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर बरबस ही मुख से निकल पड़े ये शब्द बुंदेलखंड की प्रभाती गायकी और भजन गायकी की परंपरा में कब से हैं, यह बता पाना कठिन है, किंतु गीत के इन बोलों में छिपे भाव युगों-युगों के जीवन की कथा को कह जाते हैं। बाबा तुलसी ने इसी भाव के साहित्यिक रूप का सर्जन किया है, ‘पुर तें निकसीं रघुवीर वधू, धरि धीर दये मग में डग द्वय...’ कहकर। यहाँ गाँव के सीधे-सरल लोग हैं, जो राजकुमारों के द्वारा वनवासी का वेश धारण करके वन की ओर जाते देखकर उनका सानिध्य पाना चाहते हैं। इसी कारण वे बड़ी सरलता के साथ राम से कहते हैं- थोड़ी देर आराम तो कर लो। ओ पथिक! तुम्हारे साथ चल रहे राजकुमार लक्ष्मण का चेहरा थकान के कारण कुम्हला गया है। सीता जी के पैरों में दर्द होने लगा होगा, इसलिए थोड़ी देर आराम कर लो। हमारे पास आपको खिलाने के लिए राजमहलों में बनने वाले व्यंजन तो नहीं है, मगर वन में मिलने वाले भोज्य पदार्थ आपके लिए सहर्ष प्रस्तुत हैं। चिरौंजी, गुलेंदा, महुआ आदि बुंदेलखंड अंचल में बहुत उपजता है। हम आदिवासियों के लिए यही व्यंजन हैं- महुआ मेवा, बेर कलेवा, गुलगुच बड़ी मिठाई....। अयोध्या के वनगामी राजवंशियों, आप इन्हें ग्रहण करें, और इस मीठे जल वाले कुएँ का पानी पियें। आगे का रास्ता कठिन है, इसलिए यहाँ पर थोड़ा आराम कर लेना आपके लिए उचित होगा।


यही भाव तुलसी के मानस में देखने को मिलते हैं। वहाँ कोल-किरातों को राम के आगमन की सूचना मिलती है, तो वे स्वागत के लिए पहुँच जाते हैं। मानस में तुलसी लिखते हैं-

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ।।

कंद मूल फल भरि भरि दोना । चले रंक जनु लूटन सोना ।।

धन्य भूमि बन पंथ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम धारा ।।

धन्य बिहग मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ।।

जब तें आइ रहे रघुनायक । तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ।।

फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना । मंजु बलित बर बेलि बिताना ।।

कोल किरातों के लिए राम, लक्ष्मण और सीता का चित्रकूट के वनक्षेत्र में पहुँचना, चित्रकूट के परिक्षेत्र में आना इस प्रकार है, जैसे कोई नई निधि, नई संपत्ति घर में आ गई हो। वे इस संपत्ति के आ जाने पर इतने हर्षित हैं, कि उन्हें स्वागत करने की विधि भी समझ नहीं आ रही। वे पत्तों से दोना बनाकर उनमें कंद-मूल-फल भरकर लिए जा रहे हैं। बाबा तुलसी सुंदर चित्र खींचते हैं। वनवासी जन इस तरह से उमंग में भरकर जा रहे हैं, जैसे रंक को खजाना ही मिल गया हो। उनके उल्लास का कोई ठिकाना नहीं है। जन समुदाय तो उमंग और उल्लास में भरा हुआ है ही, साथ ही चित्रकूट की पुण्यश्लोका धरा भी मुदित हो गई है। समूचा वनप्रांतर प्रसन्न हो उठा है। बाबा तुलसी कहते हैं, कि जहाँ-जहाँ श्रीराम अपने चरण रख रहे हैं, वहाँ के मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, धरती-नदी-ताल-सरिता आदि सभी स्वयं को बड़भागी मान रहे हैं। चित्रकूट के वन प्रांतर में श्रीराम को निहारकर पशु-पक्षियों के साथ ही समस्त वनवासी अपने जन्म को सार्थक मान रहे हैं, जन्म को सफल मान रहे हैं। श्रीराम ने जब से चित्रकूट में अपना निवास बनाया है, तब से वन मंगलदायक हो गया है। मनुष्य ही नहीं, वनस्पतियाँ भी उल्लास और उमंग से भर गईं हैं।

बाबा तुलसी ने श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के चित्रकूट निवास की बहुत सुंदर और रुचिकर कथा कही है। एक उत्सव का वातावरण चित्रकूट में बना हुआ प्रतीत होता है। यद्यपि चित्रकूट की महिमा और माहात्म्य श्रीराम के आगमन के पूर्व ही स्थापित था। इसी कारण प्रयाग के तट पर भरद्वाज ऋषि ने श्रीराम के द्वारा निवास हेतु उचित स्थल के संबंध में पूछे जाने पर चित्रकूट में निवास करने के लिए कहा था-

चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।।

सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहरि बिहारू ।।

बाबा तुलसी के मानस में लोक-परंपरा से रस-संचित अनेक प्रसंग देखने को मिलते हैं। ऐसे अनेक प्रसंगों के बीच वनवासी राम, लक्ष्मण और सीता का प्रसंग सर्वाधिक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत होता है। मानस में एक अन्य प्रसंग आता है- केवट और राम के बीच संवाद का। अयोध्या के राजकुमार राम भले ही वनवासी के वेश में हों, किंतु वे अयोध्या राजपरिवार के सम्मानित सदस्य और अयोध्या के भावी राजा हैं। इसके बावजूद जब वे केवट से नाव लाने के लिए कहते हैं, तब केवट उन्हें ऐसी सादगी से उत्तर देता है, कि राजा और प्रजा के बीच का भेद दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं पड़ता है-

पात भरी सहरी, सकल सुत बारे-बारे, केवट की जाति, कछु वेद न पढ़ाइहौं ।।

परिवारे मेरो याहि लागि  राजा जू, हौं  दीन वित्तविहीन, कैसे दूसरी गढ़ाइहौं ।।

गौतम की धरनी ज्यों तरनि तरेंगी मेरी, प्रभु से विवादु ह्वै के वाद ना बढ़ाइहौं ।।

तुलसी के ईस राम रावरे से साँची कहौं, बिना पग धोए नाथ नाव न चढ़ाइहौं।।

यहाँ केवट के कहने का अभिप्राय यह भी है, कि आप भले ही अयोध्या के होने वाले राजा हों, किंतु इस समय आप वनवासी हैं, और मेरी एकमात्र नाव के पत्थर बन जाने पर आपसे भी कोई मदद मुझे नहीं मिल सकेगी। इस कारण मैं आपके चरण धोने के बाद ही आपको नाव में चढ़ने दूँगा। जब कभी राजशाही और मध्ययुगीन बर्बरता की बात आती है, तब राम और केवट संवाद अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। निश्चित रूप से राम और केवट का संवाद भी लोक-परंपरा से शिष्ट साहित्य में, तुलसी के मानस में पहुँचा होगा, क्योंकि लोक-परंपरा में विकसित प्रकीर्ण साहित्य की यह बड़ी विशेषता होती है, कि वहाँ ऊँच-नीच का, राजा-रंक का भेद नहीं होता है। वहाँ समानता-समरसता के दर्शन होते हैं।

केवट और राम के बीच संवाद का लोक-पक्ष अत्यंत रुचिकर है। एक ओर केवट को अपनी नाव की चिंता होती है; वह राम के पाँव पखारकर ही उन्हें नाव में चढ़ाने की बात कहता है, निवेदन करता है। दूसरी ओर नाव में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के विराजमान हो जाने के बाद जब नाव चलती है, तो बिना किसी बाधा के उन्हें पार उतारने के लिए केवट चिंतित होता है। लोक की दृष्टि इस ओर जाती है।

लोकगीत गाया जाता है-

मोरी नइया में लक्षिमन राम, ओ गंगा मइया धीरे बहो...।

केवट की नैया, भागीरथ की गंगा......, राजा दशरथ के लक्षिमन राम...

गंगा मइया धीरे बहो..., मोरी नइया में लक्षिमन राम..।

रामकथा में दो प्रसंग और आते हैं। पहला अहल्या के उद्धार का है, और दूसरा शबरी की प्रतीक्षा का है। अहल्या का प्रसंग राम वनगमन के पूर्व आता है, जब राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम में जाते हैं। मार्ग में गुरु विश्वामित्र अहल्या से परिचय कराते हैं। पद्मश्री नरेंद्र कोहली द्वारा अपनी गद्यात्मक रामकथा- ‘अभ्युदय’ में अहल्या उद्धार का तर्कपूर्ण और अत्यंत व्यावहारिक वर्णन किया गया है। गौतम ऋषि के सूने पड़े आश्रम में अहल्या श्रापित जीवन बिता रही है। उसका जीवन प्रायः प्रस्तर-सदृश हो गया है। उसको समाज से बहिष्कृत कर दिया गया है। इंद्र के अपराध का दंड अहल्या को भोगना पड़ रहा है। गौतम ऋषि भी उस दंड को भोग रहे हैं, उनके पुत्र शतानंद भी इस दंड को भोग रहे हैं। गुरु विश्वामित्र अहल्या के साथ हुए अन्याय को जानते थे, और यह भी उन्हें ज्ञात था, कि अयोध्या के राजकुमार और मिथिला के होने वाले जमाई के माध्यम से यदि अहल्या को समाज में पुनः प्रतिष्ठा दिलाई जाएगी, तो सभी को स्वीकार्य होगी। बाद में श्रीराम और लक्ष्मण ने सिद्धाश्रम में राक्षसों का वध करके अपने शौर्य का परिचय दिया था, समाज में आदरपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। केवट प्रसंग प्रकारांतर से राम के शौर्यभाव और वीरतापूर्ण कार्य का स्मरण ही था।

इसी प्रकार शबरी के जूठे बेर खाने का प्रसंग भी आता है। शबरी के पास तक राम की ख्याति पहुँची थी। लोकरक्षक, जन-जन के प्रिय श्रीराम उस वृद्धा शबरी की कुटिया में अवश्य पधारेंगे, यह भरोसा लिए शबरी अपना जीवन बिता रही थी। कहीं अपने आराध्य राम को वह खट्टे बेर न खिला दे, इस भाव से वह चखकर उन बेरों को ही राम को दे रही है, जो मीठे हैं, सुस्वादु हैं। यह आत्मीयता, यह लगाव सहज नहीं है, वरन् अनेक अर्थों को स्वयं में समाहित किए हुए है। एक और श्रीराम का शौर्यभाव है, उनका लोकरक्षक स्वरूप है, तो दूसरी ओर श्रीराम के व्यक्तित्व की सहजता है, सरलता है। इसी कारण शबरी के जूठे बेर उन्हें स्वीकार्य होते हैं। इसी कारण केवट की व्यंग्यपूर्ण बातें उन्हें चुभती नहीं हैं। यही कारण है, कि चित्रकूट के वनवासी बेर, गुलेंदा, कचरियाँ, महुआ, कंद, मूल, फल आदि दोनों में भर-भरकर लाते हैं, और राम का स्वागत करते हैं।

तुलसी के मानस में वनवासी राम का सौंदर्य, विशेषकर समरसता-सौहार्द-समन्वय में घुल-मिलकर विकसित हुआ कर्म का सौंदर्य अपने आकर्षण में बरबस ही बाँध लेता है। वनवासी राम की सफलता का श्रेय भी इसी वैशिष्ट्य को जाता है। तुलसी के मानस सहित अन्य रामकथाओं में वनगमन प्रसंग इसी कारण अपना विशेष महत्त्व रखता है। श्रीराम के प्रति लोक का अनुराग, लोक का आत्मीय भाव किसी एक कालखंड या किसी एक युग में सिमटा हुआ नहीं है। इसका विस्तार काल और भूगोल की परिधि से बाहर है, व्यापक है। राम और कृष्ण के प्रति लोक की आस्था तब प्रबल होती है, जब वे लोक से जुड़ते हैं। वनवासी राम के साथ चित्रकूट के वन प्रांतर से लगाकर दंडक वन तक, किष्किंधा तक अपार जनसमुदाय जुड़ता है। राम के पास सेना की ताकत नहीं थी। राम लोक की शक्ति से समृद्ध हुए और रावण जैसे क्रूर, आततायी शासक को परास्त किया। विभिन्न वन्य जातियाँ, वनवासी समूह राम के साथ इस तरह से जुड़े, कि लंका विजय के उपरांत सभी अयोध्या तक पहुँचे और राम के साथ ही जीवन-पर्यंत रहने की कामना करने लगे। राम ने ही उन्हें अपने-अपने घर जाकर कर्म में संलग्न होने के लिए कहा। राम के राज्यभिषेक के बाद सभी बहुत भारी मन से विदा हुए। यह आत्मीय लगाव राम के लोक को गढ़ता है, और लोक के राम इसी आत्मीय भाव से बनते हैं। लोकरक्षक, मर्यादापुरुषोत्तम राम इसी कारण लोक के हैं, लोकजीवन में वे अपनी उपस्थिति से, अपने नाम से श्रेष्ठतम मानवीय आदर्शों और संस्कारों को स्थापित करते हैं। ‘राम-राम’ और ‘जय रामजी की’ जैसे अभिवादन परस्पर संबंधों में शुचिता और मर्यादा की कामना लिए होते हैं। लोकगीतों में, लोककथाओं में, और साथ ही लोकजीवन में राम की उपस्थिति लोक को जीवनीय शक्ति देती है, जीवन का पथ प्रदर्शित करती है। अवधी के आल्हा में पंक्तियाँ आती हैं-

राम का नाम बड़ो जग में, सोई राम के नाम रटै नर नारी ।।

राम के नाम तरी सबरी, बहु तार्यो अजामिल के खल भारी ।।

राम का नाम लियो हनुमान ने, सोने के लंका राख कै डारी ।।

     औ टेम व नेम से नाम जपौ, राम का नाम बड़ा हितकारी ।।

-डॉ. राहुल मिश्र

(राष्ट्रधर्म, लखनऊ, मासिक पत्रिका के पौष, वि.सं. 2080 तदनुसार जनवरी, 2024 अंक में प्रकाशित)