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Saturday, 5 September 2026

बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह

 






बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह


डॉ. अतुला भास्कर हिंदी साहित्य-जगत् में एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्य की विविध विधाओं में आपका लेखन है, और एक विशेष स्थान रखता है। आपका सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह इस क्रम की एक कड़ी के रूप में सामने है।

कविताई जब जीवन के गहरे अनुभवों से साक्षात् करते हुए आकार पाती है, तब उसकी गहनता, उसका घनत्व अपना प्रभाव स्थापित करता है। जीवन के अनुभव भी यदि कोरे घटनाक्रम न होकर चिंतन की एक दृष्टि को लेकर कविताई में समा गए हों, तो बात कुछ और ही हो जाती है। इतना ही नहीं, निजता का फैलाव दूर तक होता है, जिसमें व्यष्टि भी समष्टि को लेकर चल पड़ती है। स्वयं की वेदना केवल अपनी नहीं होती, इसमें सारा परिवेश झलकता है। काव्य-संग्रह की अंतिम कविता भले ही अंतिम हो, किंतु यहाँ से बात प्रारंभ करने का आशय अलग ही है। डॉ. अतुला जी लिखती हैं-

दुनिया जिसको पूजती / विवशता समाधि पर झुकती । / प्रपंच-पाखंड षड्यंत्र, जन-जन को छलें । / दायित्वों से दूर कर, वैमनस्यता को गढ़ें । / मोहन तुमको आना होगा, / मानवता का पाठ पढ़ाना होगा ।

समय के बंधन का, जीवन की बँधी-बँधाई लीक का सुंदर चित्रण गुलदान के फूलों, फड़फड़ाते पन्नों और घड़ी की सुइयों से दिया गया है। ये बिंब अनूठे हैं, और जीवन की गति बहुत सहजता के साथ बताते हैं।

गुलदान में मुस्कुराते फूल / हवा से फड़फड़ाते पन्ने / जिंदगी की रफ्तार सुनाते / घड़ी का अनुशासन / सुइयों का खेल / अपनी लय / अपनी चाल / कभी दूर / कभी पास / कभी जुड़ाव / कभी बिखराव / सबक सिखाते / मिलें-बिछुड़ें / पर रुके नहीं ।।

मानव-जीवन भी वस्तुतः एक ऐसे बंधन में बँधा हुआ है, जो प्रत्यक्ष नहीं है। इस बंधन में बँधकर जिस विवशता, बेचैनी, व्याकुलता, संत्रास और तनाव में जीते हैं, उसे अपने परिवेश में, अपने आसपास सहज ही देखा जा सकता है। इस विषमता के मध्य डॉ. अतुला जी बहुत सरल बिंब के सहारे गूढ़ बात कहती हैं। गुलदान के पुष्प गुलदान के बंधन में रहकर भी मुस्कुराते हैं। पन्ने जिल्द में बँधे हैं, फिर भी फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व की अनुभूति कराते हैं घड़ी की सुईयाँ एक बँधी गति से चलती हैं, चलती ही जाती हैं। मानव का जीवन भी इन्हीं से सीख लेकर चल सकता है।

अतुला जी के काव्य-संग्रह की यह बड़ी विशेषता है, कि हर एक कविता एक कैनवस पर उतारे गए सरल-से, बहुत संयत और सौम्य-शांत आकार की तरह दिखती है। जटिल-से भड़कीले रंग-विन्यास यहाँ नहीं हैं। उनकी कविताएँ जीवन के सामान्य-से प्रसंगों को लेकर रची गईं हैं। दैनंदिन जीवन की गतिविधियाँ किस तरह से विचारों की वीथियाँ सहेजे होती हैं, अतुला जी की कविताओं में देख सकते हैं। संग्रह की दूसरी कविता से बानगी देखिए-

वो रास्ता / था जिससे / रोज का वास्ता / स्कूल का, / कालेज का, / यूनिवर्सिटी का, / मंजिल पर पहुँचा / क्यों दूर हो गया?

रास्ते और मंजिलें एक-दूसरे की पूरक भले ही हों, लेकिन एक बार में केवल एक ही साथ होता है। रास्ते पूरे होते हैं, तो मंजिल मिलती है और मंजिल मिल जाती है, तो रास्ते छूट जाते हैं। ऐसे ही छूट जाते हैं कई लोग, जो रास्ते में मिलते हैं। मंजिल की अपनी शर्तें होती हैं। वहाँ रास्ते के लोग साथ नहीं होते। मंजिल के साथ पाई हुई सफलता राह के अनेक साथियों को छोड़कर हासिल होती है। ‘रास्ता’ कविता इसी भावधारा में बुनी गई है। रास्ते और मंजिल की क्रमशः गति में कोई अवकाश नहीं है, शिकवा-शिकायत का, अपने-पराए का, किसी भावना में बँध रहने का.... गति यही है।

अतुला जी की कविताओं की यह बड़ी विशेषता है, कि वे जीवन के सरल-सहज ‘स्केच्स’ में चिंतन के रंग भरती हैं, जिनमें कहीं अध्यात्म भी होता है, तो कहीं पर दर्शन भी...। ‘आत्मा’ कविता में वे सवाल उठाती हैं, कि आखिर मृतक से भय क्यों है? मृतक का तुरंत ही क्रिया-कर्म कर दिया जाता है। वह चालाकी-बेईमानी-मक्कारी जैसे जीवधारियों के लक्षणों से दूर है। उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है, जो ऐसे दुर्गुणों से दूर है। वह तो शांत है, तटस्थ है। फिर भी यदि समाज ऐसा करता है, तो निःसंदेह समाज इन दुर्गुणों से विचलित नहीं है। जो इन दुर्गुणों से मुक्त है, जो शरीर के बंधन से मुक्त है, वह समाज के लिए विचलन उत्पन्न कर रहा है।कहा जा रहा है, कि समाज में विचलन दुर्गुणों के कारण नहीं, दुर्गुणों से मुक्ति के कारण है... समाज इन दुर्गुणों को स्वीकारता है, इनके साथ जीता है। एकदम अलग दृष्टि इस कविता में देखने को मिलती है। कवयित्री सीधे यह भी स्पष्ट कर देना चाहती है, कि हमारा समाज जीवन-धारियों के लक्षणों में दुर्गुणों को गिनता है।  

सवाल है कि / भय मृतक से क्यों? / चालाकी, बेईमानी / मक्कारी, छल औ कपट / जीवन धारियों के लक्षण / आत्मा की शांति / प्रार्थना और कामना / उसके लिए क्यों? / जो पहले ही से / पूर्णरूपेण शांत, / तटस्थ और निर्लेप।

विदाई समारोह में / उपस्थित अन्य जन / अशांत-व्याकुल-बेचैन, / चिंतातुर और परेशान ।

ऐसी ही एक अन्य कविता है- आदमी। आदमी जिस रूप को पाया है, उसके लिए वह दोषी नहीं है, क्योंकि रंग और रूप का गढ़ा जाना उसके हाथ में नहीं, लेकिन वह आदमी तो बन सकता है, आदमीपन तो उसके वश में है। मानवीयता के लिए किसी रंग किसी रूप की आवश्यकता नहीं होती, उलटे यह गुण रंग-रूप की विरूपता को ढक लेता है, लेकिन आदमीपन की चिंता अकसर रूप-सौंदर्य की चिंता के नीचे दबकर रह जाती है।

आदमी अपने रूप / के लिए नहीं / ‘आदमी’-पन के अभाव / के लिए दोषी । ‘आदमी’-पन का / वह स्वयं निर्माता / पर रूप बनाना / उसकी विवशता ।।

‘फर्क तो पड़ता है’ कविता भी मानव-स्वभाव की पड़ताल करती है। एक भेद, जो अपने और पराए के बीच होता है, वह भावनात्मक रूप से भी एक अंतर तैयार करता है। अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। जब इस अंतर को मिटाकर अपने लोग पराए जैसा व्यवहार करने लगें, तो मन को बहुत पीड़ा होती है। लेकिन आज के समय की यह भी कड़वी सच्चाई है।

संग्रह की कविताएँ स्त्री-मन का पाठ एकदम अलग तासीर में करती हैं। ‘चुप रहना’ कविता में स्त्री की नियति को बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया गया है। उम्र के किसी भी पड़ाव में उसके हिस्से केवल चुप रहना ही आता है। तमाम संघर्षों, समस्याओं और चुनौतियों के बाद भी वह अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होती, लेकिन बदले में उसे सब सहते हुए चुप रहना होता है। हर बेटी को अपने पिता का घर बहुत प्रिय होता है। वहाँ उसके बचपन की स्मृतियाँ सहेजी हुई होती हैं। बाबुल के घर का लगाव कविता के पहले हिस्से में यक्साँ है। माता-पिता के साथ बेटी मुखर होती है, लेकिन उसके जीवन का दूसरा पड़ाव उसके लिए मौन लेकर आता है। कविता का तीसरा भाग पाठकीय चेतना को झकझोर देता है। माँ का सारा त्याग और समर्पण अपने बच्चों के लिए है, लेकिन उम्र का पड़ाव कहें, पीढ़ियों का अंतर कहें, या बदलते समय की विवशता कहें, माँ चुप ही रह जाती है।

मैं माँ / ममतामयी आँचल / शीतल छाया / ढेरों आशीर्वाद / ढेरों मन्नतें / बहुत सारा प्यार / खूब सा दुलार / मुसीबतों की ढाल / माँ तो आखिर माँ / है एक शर्त / है चुप रहना / मन में ही रखना / कुछ नहीं कहना ।।

कविता-संग्रह से चुनकर कुछ कविताओं का अलग से उल्लेख करते हुए समूचे संग्रह पर बात करना आसान होगा। इस दृष्टि से अलग-अलग तासीर की कविताओं का ऊपर उल्लेख किया है। डॉ. अतुला जी की लेखनी विविध विषयों पर चली है। कहीं पर वे अतीत की परतों को खँगालती हैं, तो कहीं भविष्य का ताना-बाना बुनती हैं। उनकी एक कविता है- फतेहाबाद। अपने कर्मक्षेत्र को वे इस कविता के सहारे याद करती हैं। ‘हल्कू’ कविता में अलग-अलग कृतियों के पात्र एकसाथ आए हैं, जो आज के जटिल समय की चुनौतियों से साक्षात् कर रहे हैं।

संग्रह की कुछ कविताएँ, जैसे- खुश्क रोटी, माँ, जिम्मेदारी, औरत, घर....अलग तरीके से अपनी ओर खींचती हैं। कविताएँ तो क्या हैं, क्षणिकाएँ हैं....। एक साँस में पढ़ जाइए। लेकिन इसके बाद आप सरलता से निकलकर नहीं जा सकते। बहुत सामान्य-सी बातें, दैनंदिन जीवन की घटनाएँ इनमें हैं, लेकिन बहुत गहरे उतरकर अपना असर छोड़ती हैं, ‘सतसैया के दोहरे’ की तरह। बिहारी सतसई के दोहे बहुत छोटे थे- ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।’ अतुला जी की इन क्षणिकाओं के लिए यह उपमा मेरे हिसाब से बहुत सटीक बैठती है। पिता किस तरह अपने जीवन को गलाता है, अपने सुखों की कटौती करके कैसे बच्चों के लिए सुख जुटाता है। ‘खुश्क रोटी’ पढ़कर ऐसे अनुभव से आप गुजरेंगे, जिसे अपने साथ या अपने परिवेश के साथ घटता हुआ पाएँगे। इस दृष्टि से भी कविताएँ बड़े मार्के की हैं। जीवन का कड़वा यथार्थ परिवार के संदर्भों में दिखता है। समय और समाज की सच्चाई अनेक स्थानों पर देखी जा सकती है, लेकिन इतनी सहजता के साथ समय और परिवार की कड़वी सच्चाई को लेखनी के सहारे उतार पाना सिद्धहस्त सृजनधर्मी के वश की बात ही होती है, और कहना न होगा कि डॉ. अतुला जी ने अपनी रचनाधर्मिता को, अपने सृजन को इसी ऊँचाई पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है।

संग्रह का पहला हिस्सा समय और परिवार का दिखता है, तो दूसरे हिस्से में ‘मशाल’, ‘टीआरपी’, ‘शुक्रिया’, ‘परिचय’ और ‘सोशल मीडिया’ जैसी कविताएँ आती हैं। समय और समाज की सच्चाई अतुला जी के यहाँ घटनाओं के वर्णन तक सिमटी हुई नहीं हैं। कह सकते हैं, कि घटनाएँ तो केवल संदर्भ के लिए हैं। वस्तुतः विचारों की लंबी वीथिका इन छोटी-छोटी घटनाओं के बीच से गुजरकर जाती है। मानों किसी गलियारे से होकर जीवन के सफर को तय कर रहे हों, और गलियारे के दोनों ओर ऐसी घटनाओं की झलकियाँ दिखती जाएँ। कविताएँ पाठकीय चेतना को झंकृत कर देती हैं, सोचने के लिए विवश कर देती हैं। ‘सोशल मीडिया’ में व्यंग्य का हल्का-सा पुट जो है, वो ठहरकर सोचने के लिए विवश कर देता है, कि सोशल मीडिया के इस दौर में हम कहाँ पर हैं? कहना न होगा, कि कविता की निम्न पंक्तियाँ एक मानदंड ही बन जाती हैं, पाठक के लिए...। खुद का आकलन कर लेने के लिए..।

वाह!!! / आदर्श समाज / की ओर बढ़ते कदम / सभी परमज्ञानी ।

ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध,बेईमानी / सब पर विजय ।

चारों तरफ सब कुछ / अच्छा ही अच्छा ।

सुख में दुःख में / उपस्थिति जरूरी / अजी, बिलकुल नहीं / संदेश भेजें और / कर्त्तव्यपूर्ति सुगम ।

संग्रह के तीसरे हिस्से में ऐसी कविताएँ रखी जा सकती हैं, जिनमें विचारों की गहनता अपेक्षाकृत घनीभूत होती है। अतुला जी इन कविताओं में ऐसे प्रतीकों का प्रयोग करतीं हैं, जो वैचारिकी को सांद्र कर देते हैं। बानगी के तौर पर देखिए-

दोमुहाँ अजब संस्कार / संबंधों की बंजर भूमि / पर रेंगते व्यवहार.....

साधना की धूनी का , धुआँ है अखरता ।....

योग्य वही अभिनय के, जिनके अंग अंग हैं हिलते । / टूटी कमर है जिनकी उन्हें ही सिंहासन हैं मिलते ।

ऐसे समय में सावधानी / हमारी आस्तीनों में चौकस रहती है ।

संग्रह की अधिकांश कविताएँ भविष्य के प्रति आस्था को ध्वनित करती हैं। अनागत कविता आंदोलन के ध्येय-वाक्य की छवि संग्रह में दिखती है। कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना विभिन्न कविताओं में दिखती है। बानगी के तौर पर एक कविता का उल्लेख यहाँ पर करना होगा। ‘सांध्य वेला’ वस्तुतः संध्याकाल का सुंदर चित्र खींचती है, वह भी लयबद्धता के साथ..। यह ‘सांध्यवेला’ अपने साथ जिस सुखद कामना को लेकर आ रही है, वह सांध्यवेला को उजास की वेला बना देती है-

सुनसुन के नीड़ों से चिड़ियों का कलरव, / प्रियतम का पथ जोहे मतवाली हरपल ।।

समग्रतः, संग्रह की सभी कविताएँ ऐसा वितान रचती हैं, जिसमें जीवन के अलग-अलग रंग कहीं चटकीले, तो कहीं सुंदर-सौम्य होकर उभरते हैं। कविता-संग्रह की यह ऐसी विशिष्टता है, जो सहज ही प्रस्फुटित होती है और संग्रह से साक्षात् करते हुए पाठक को अपने आकर्षण में  बाँधती चली जाती है। कृति न केवल पठनीय है, अपितु संग्रहणीय भी है।

(डॉ. अतुला भास्कर की काव्य-कृति शब्द-सेतु, प्रकाशक ज्ञानगीता प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

Saturday, 22 August 2026

किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति

 


किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति


समाज की ओर दृष्टि रखकर साहित्य की सर्जना होती है। अतीत से लगाकर वर्तमान तक साहित्य की इस विशिष्टता को देखा जा सकता है। हिंदी के आधुनिक कालखंड में समाज और साहित्य के अंतर्संबंध और अधिक घने हो जाते हैं, क्योंकि इस कालखंड में साहित्य अपेक्षाकृत अधिक दायित्वपूर्ण बनकर समाज के सच्चे चित्र को, समाज की वास्तविकताओं को उकेरने लगता है। सामयिक सत्य और यथार्थ के चित्रण में गद्य की अनिवार्य आवश्यकता जहाँ एक ओर कविता को गद्यात्मक बनाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में अपना स्थान बनाने वाला हिंदी कथा-साहित्य समाज के निकट पहुँचता जाता है।

डॉ. विनय कुमार पाठक की नीरज बुक सेंटर, नई दिल्ली से सद्यः प्रकाशित कृति- ‘किन्नर-विमर्श : दशा और दिशा’, वैसे तो किन्नर-विमर्श पर केंद्रित है, लेकिन विषय की स्थापना के आधार को निर्मित करते हुए डॉ. पाठक द्वारा दी गईं उपरिवर्णित स्थापनाएँ हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में किन्नर-विमर्श के विविध पक्षों को प्रस्तुत करने का सहज वातावरण निर्मित करती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है, कि ‘विमर्श’ का आधार औपनिवेशिक और पाश्चात्य प्रभावों से बना है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श में मध्यकाल और उसके बाद औपनिवेशिक भारत, और वर्षों की गुलामी के कारण उपजी मानसिक विक्षिप्तता, विकृति और विद्रूपता की छाया दिखाई देती है। साहित्य में इसी कारण इनकी उपस्थिति अनेक तरीके से भले ही समय और समाज की यथार्थ स्थिति को दिखाती हों, एक विशिष्ट वर्ग बनाकर चर्चा या विमर्श का केंद्रीकरण करती हों, लेकिन इसके साथ आलोचनाएँ भी होती रही हैं, आज भी होती हैं। ‘विमर्शों’ का वास्तविक स्वरूप कैसा हो, सकारात्मक और समाज के लिए दिशा-निर्देशक पक्ष इनमें कैसे उद्घाटित हो, यथार्थ के चित्रण में अतिवाद और अतिकल्पनाशीलता के पक्षों को किस तरीके से नियंत्रित किया जाए, जैसे बिंदु साहित्य-चर्चा के विविध खेमों में उठते रहे हैं। इन्हें आज भी देखा जा रहा है।

स्थापित विमर्शों के अगले क्रम में, इक्कीसवीं सदी के साहित्य में नवोदित विमर्शों के लिए ये बिंदु महत्त्वपूर्ण भी हैं, और इन बिंदुओं पर नवागत-नवोदित विमर्शों की दिशा-दशा के निर्धारण की अपेक्षाएँ भी रही हैं। नवागत-नवोदित विमर्शों में अनेक स्थानों पर अल्पसंख्यक-विमर्श, कृषक-विमर्श, प्रवासी-विमर्श जैसे नाम सुने जाते हैं। कहीं-कहीं पर ये विमर्श चर्चा में आने के लिए भी उठाए जाते रहे हैं। दूसरी तरफ, विकलांग-विमर्श और किन्नर-विमर्श भी इक्कीसवीं सदी में चर्चित हुए। विकलांगों और किन्नरों की समाज में स्थिति को देखते हुए इनकी साहित्य में चर्चा अपेक्षित ही नहीं थी, अपितु साहित्य के माध्यम से इन दोनों वर्गों के लिए सोचा जाना, साहित्य के माध्यम से देखा जाना आवश्यक-अनिवार्य-अपेक्षित था। साहित्य ने इस दिशा में अपना दायित्व निभाया। इन दोनों विमर्शों के संदर्भ में बहुत गंभीर बात डॉ. पाठक ने अपनी कृति की भूमिका में लिखी है। वे लिखते हैं, कि- “जाति और लिंग से रहित विशुद्ध मानवतावादी दृष्टि पर आधारित ये दोनों नव्य विमर्श सर्वाधिक वंचित और उपेक्षित या कहें, वर्जित ही रहे हैं।” (भूमिका, पृ. 05)

डॉ. विनय कुमार पाठक का विकलांग-विमर्श के क्षेत्र में व्यापक साहित्यिक अवदान है। इतना ही नहीं, उनके द्वारा विकलांगों के कल्याणार्थ समाज-कार्यों को भी दिशा दी जा रही है। डॉ. पाठक ने इक्कीसवीं सदी के ज्वलंत और सामयिक विमर्श, अर्थात् किन्नर-विमर्श पर अपनी लेखनी चलाई है। इसके पीछे के कारण को भी वे अपनी कृति की भूमिका में स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं, कि- “स्त्री, दलित, आदिवासी और विकलांग समाज में रहते हुए अराजक व्यवस्था पर आक्रोश व अभिमत स्पष्ट करते रहे लेकिन किन्नर के लिये तो यह पीठिका ही नहीं थी, अर्थात् वे हाशिये में डाल दिये गये। जब तक ये बंद समाज में कुंद बने बैठे रहेंगे, तब तक इनके पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों, अफवाहों से निजात नहीं मिलेगी और इन्हें पूर्णतः जाने-समझे बिना इन पर विमर्श की दिशा ही उलझकर रह जायेगी। लैंगिक विकलांगता विकृति है, पहचान नहीं, इस तथ्य को समझकर ही किन्नर उत्कर्ष को स्पर्श कर सकता है और विमर्श भी सफल-सार्थक सिद्ध हो सकता है।” (भूमिका, पृ. 06)

अपनी कृति की भूमिका के अंश के रूप में डॉ. पाठक का यह कथन किन्नर-विमर्श की उस अनिवार्यता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, जिस ओर ध्यान दिये बिना किन्नरों पर बात नहीं हो सकती। डॉ. पाठक बड़ी सहजता के साथ यहाँ स्पष्ट करते हैं, कि अभी तक जितने भी विमर्श चर्चित हुए हैं, भले ही उनकी चर्चा का घनत्व कम या ज्यादा हो, लेकिन उनमें एक समानता रही है, कि वे ऐसे समूहों, वर्गों, समुदायों से संबंधित हैं, जो समाज में हैं, समाज का हिस्सा हैं। इसमें शारीरिक विकलांग भी आ जाते हैं। लेकिन किन्नर समुदाय ऐसा है, जो समाज से एकदम कटा हुआ है। समाज में उनका आगमन यदि होता भी है, तो एक रहस्यमयी जीवधारी के रूप में...। इसी कारण समाज उनके प्रति सहज नहीं रहता। अकसर उन्हें ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, कि वे विवश हो जाते हैं... अपने लोक में, अपने सीमित दायरे में सिमटने के लिए। इस दृष्टि से देखने पर किन्नर-समुदाय मानवीय दायरे में समाहित हो ही नहीं सका। अन्य विमर्शों के केंद्र में रहने वाले लोग अपने लिए लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, लेकिन किन्नर-समुदाय अपनी आवाज ही नहीं उठा सका, कारण उसका समाज से एकदम कटा हुआ होना है। यह भी एक पक्ष है, जिस कारण साहित्य की विविध विधाओं में भी किन्नर समुदाय रहस्यमय ही बना रहा है। डॉ. पाठक इसी कारण किन्नर-विमर्श को मानवीय धरातल पर चर्चा के लिए लाने की बात कहते हैं। वे आक्रोश, आंदोलन, असहमति, विद्रोह जैसी स्थितियों के लिए किन्नर-समाज को तैयार नहीं देखते। वे तो किन्नर-विमर्श को किन्नरों के जीवन को देखने की एक पीठिका के रूप में स्थापित करते हुए चलते हैं।

इस पीठिका के आधार को तैयार करने का यत्न डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में दिखता है, इस कारण इस कृति की भूमिका की अपनी विशिष्टता है, महत्त्व है। किन्नर के रूप में जन्म लेने वाले नवजात के परिवार से लगाकर समाज तक, और फिर किन्नर समुदाय के जीवन के विविध पक्षों तक डॉ. पाठक बड़ी पैनी दृष्टि दौड़ाते हैं, और बिंदुवार स्पष्ट भी करते हैं। इस कृति की भूमिका में ही सरकार के द्वारा किये गए विभिन्न प्रयासों का उल्लेख मिलता है, विभिन्न आँकड़े मिलते हैं। ये सभी अपना अलग महत्त्व रखते हैं।  भूमिका में ही डॉ. पाठक इक्कीस ऐसे बिंदुओं का उल्लेख करते हैं, जो सामान्य रूप से किन्नर-आधारित साहित्य में किन्नरों को लेकर दिखाई पड़ते हैं। ये इक्कीस बिंदु केवल हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की पड़ताल करके ही नहीं लिखे गए हैं, वरन् मराठी, तमिल और अन्य भाषाओं के साथ ही छत्तीसगढ़ी आदि के साहित्य से भी छनकर आए हैं। इस कारण इन इक्कीस बिंदुओं में किन्नर-आधारित साहित्य का निचोड़ परिलक्षित हो जाता है।

किन्रर-विमर्श की चर्चा करने से पहले डॉ. विनय कुमार पाठक ने उन स्थितियों को परखने का यत्न भी किया है, जो विमर्श का नाम लिए बिना किन्नरों की उपस्थिति को साहित्य में रेखांकित करती हैं। इस दृष्टि से उनके द्वारा प्रसाद के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ का उल्लेख अत्यंत प्रासंगिक बन पड़ा है। इसके साथ ही वे अत्यंत क्रांतिकारी लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, इस्मत चुगताई और यशपाल की उन कृतियों का उल्लेख भी करते हैं, जिनमें किन्नरों के जीवन की झलक मिलती है। ये रचनाएँ आभास देती हैं, समाज के प्रति साहित्य की दायित्ववान दृष्टि का, जो बिना किसी विमर्श का नाम लिए हुए किन्नरों के जीवन की यथार्थ स्थिति को देखती है। इस कारण डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में इन रचनाओं का उल्लेख अपनी प्रासंगिकता को सुनिश्चित कर देता है। डॉ. पाठक ने इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ के लगभग दर्जन भर कवियों-कथाकारों का नामोल्लेख भी किया है।

 डॉ. विनय कुमार पाठक अपनी कृति की भूमिका में एक प्रसंग का वर्णन करते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से वे एक ऐसी दिशा-निर्देशक बात कहते हैं, जिसका संबंध किन्नर-विमर्श से भले हो, लेकिन वह अन्य विमर्शों के लिए भी संकेत के रूप में है। इस प्रसंग का उल्लेख भी यहाँ पर उल्लेख किया जाना आवश्यक लगता है। डॉ. पाठक लिखते हैं, कि किन्नर विमर्श विषयक इस ग्रंथ को प्रकाशन के लिए भेजने के समय एक सज्जन ने प्रश्न उठाया, कि ऐसे विमर्शों से किन्नरों का भला होगा? वस्तुतः, ऐसे प्रश्न अनपेक्षित नहीं होते, सहज ही होते हैं। इनके उत्तर भी सहज भाव की अपेक्षा रखते हैं। ऐसा करते हुए डॉ. पाठक जिस उत्तर को लिखते हैं, वह स्वयं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं- “विकलांग-विमर्श में मैंने इसका सकारात्मक परिवर्तन देखा और किन्नर-विमर्श के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ और सूत्र-रूप में संस्थित होकर मैंने कहा कि किन्नर का जीवन यदि स्याह अँधेरे में आच्छन्न है तो विमर्श उसमें सपने जगाने का काम तो कर ही सकता है, संघर्ष के कँटीले-पथरीले पथ में आहत होने पर उसे कराहने के लिए तो प्रेरित कर ही सकता है, भले कोई उपचार के लिए उपस्थित न हो लेकिन समाज और सरकार के प्रति संवेदना का भाव तो संचरित कर ही सकता है।” (भूमिका, पृ. 17-18)

डॉ. पाठक का उपरोक्त कथन किन्नर-विमर्श के संदर्भ में ऐसे भावनात्मक और दिशा-निर्देशक तत्त्वों को समेटे हुए है, जो किन्नर-विमर्श के नाम पर मानवीय, संवेदनापूर्ण और पुण्य-पवित्र ध्येय पर आधृत संघर्ष को उसकी दिशा से भटकने से रोकने और साहित्य के साथ ही समाज के सकारात्मक परिणामों को निकालकर लाने के लिए संकेत करते हैं। इन तमाम कारणों से इस कृति की भूमिका का अपना विशेष महत्त्व है।

आज के समय में किन्नर समुदाय के जीवन और उनकी दशा पर अनेक कार्य हो रहे हैं। इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। धरातल पर ये प्रयास सार्थक रूप में परिलक्षित भी हो रहे हैं। इस प्रयासों के साथ ही साहित्य भी अपनी भूमिका निभा रहा है, फलस्वरूप किन्नर विमर्श आजकर चर्चा में है। यह ऐसा अध्ययन-क्षेत्र है, जिसको व्यवस्थित रूप देना और इसको सार्थक-सर्वाङ्गपूर्ण रूप में अध्येताओं के लिए उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. पाठक ने इस आवश्यकता को न केवल समझा, वरन् अपनी कृति- ‘किन्नर विमर्श : दशा और दिशा’ के माध्यम से पूरा करने का सफल प्रयास भी किया है।

इस कृति में डॉ. पाठक ने आत्मकथा और नाटक जैसी अल्प-चर्चित विधाओं में भी किन्नरों के जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को; किन्नर-विमर्श से संबद्ध विविध आयामों देखा-परखा है, समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इतना ही नहीं, यह कृति सिनेमा में भी किन्नरों के जीवन को देखती है। उपन्यास, कहानी और कविता ऐसी विधाएँ हैं, जिनमें विमर्शों का सर्वाधिक प्रभाव और प्रस्तुति दिखती है। सामान्यतः विमर्शों की चर्चाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती भी हैं।

हिंदी कथा-साहित्य में किन्नरों के जीवन की उपस्थिति और पड़ताल का व्यापक अध्ययन डॉ. पाठक की इस कृति में दिखता है। विशेष रूप से हिंदी कहानियों के विविध पक्षों को उन्होंने देखा है, प्रस्तुत किया है। हिंदी कहानियों में समय के सत्य और यथार्थ का सर्वांगपूर्ण चित्रण आज की हिंदी कहानी को जहाँ एक ओर हिंदी की विविध विधाओं के बीच उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर समय और समाज से जुड़े विविध विषयों का चित्रण हिंदी कहानी की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता को स्थापित करता है। हिंदी कहानी में विविध विमर्शों सहित किन्नर-विमर्श की उपस्थिति भी इसका ही एक पक्ष है।

हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी कहानी में यदि विविध विमर्शों की चर्चा करें, तो स्पष्ट होता है, कि समय और समाज की सच्चाइयों के निरंतर निकट जाने का यत्न ही विविध विमर्शों की उत्पत्ति और विस्तार-विकास का आधार बना है। समकालीन समाज में महिलाओं की दयनीय दशा को रेखांकित करने-उभारने के लिए यदि स्त्री-विमर्श अस्तित्व में आया, तो दलितों की बात करने हेतु दलित-विमर्श की शुरुआत हुई। बाद में आदिवासियों के जीवन और उनके संघर्षों को लेकर आदिवासी-जनजातीय विमर्श की बात भी होने लगी। विमर्शों के माध्यम से वर्ग-विशेष की समस्याओं, स्थितियों और जीवन की जटिलताओं को एक विशिष्ट दायरे में समेटकर पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है। इन विमर्शों पर जितना कथा-साहित्य रचा गया है, उतनी ही रचे गए साहित्य पर चर्चा और समीक्षा-आलोचना हुई है।

आज की हिंदी कहानियों में ‘किन्नरों’ की दशा और दिशा के साथ ही किन्नर-विमर्श के प्रभाव-प्रसार की समीक्षा करने हेतु डॉ. पाठक ने अलग-अलग कलेवर वाली दो दर्जन से अधिक कहानियों का चयन किया है। ये कहानियाँ कथ्य, चरित्र, परिवेश की विविधता और वैचित्र्य के स्तर पर इस प्रकार की हैं, जिन्हें ‘किन्नर-विमर्श’ की प्रतिनिधि कहानियों के तौर पर रखा-देखा जा सकता है।

कृति में ली गई कहानियों में से कुछ के कथ्य को बानगी के रूप में यहाँ पर देखा जा सकता है। इसमें किरन सिंह की कहानी ‘संध्या’ की नायिका संध्या की लैंगिक विकलांगता का दंश झेलते माता-पिता हैं, तो दूसरी ओर शिवप्रसाद सिंह की कहानी के ‘बिंदा महाराज’ का नायक है। ये सभी अपनी विवशता को उस क्रूर समाज में भोगते हैं, जिसमें संवेदनहीनता है, अवसरवादिता है और क्रूर-तीक्ष्ण व्यंग्य हैं। अंजना वर्मा की कहानी ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ की सुंदरी की लैंगिक विकलांगता ही उसे अपने परिवार से दूर कर देती है। यह दूरी आपसी प्रेम को भले ही समाप्त न कर पाए, लेकिन समाज से छिपकर मिलने की विवशता में जरूर बाँध देती है। ऐसी स्थितियाँ समाज में हमें देखने को मिलती हैं। समाज इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं रखता।

ललित शर्मा की कहानी ‘रतियावन की चेली’, डॉ. लवलेश दत्त की कहानी ‘नेग’ और पद्मा शर्मा की कहानी ‘इज्जत के रहबर’ में किन्नर समाज में झाँकने का प्रयास हुआ है। महेंद्र भीष्म की कहानी ‘त्रासदी’ एकदम अलग तासीर की कहना है। यह दयनीय और दीन-हीन किन्नर समाज का दूसरा पहलू दिखाती है। किन्नर सुंदरी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए रति को बलात्कारियों से बचाती है। डॉ. पाठक इस कहानी पर टिप्पणी लिखते हैं, कि- जिस किन्नर को समाज अधूरा समझकर तिरस्कृत करता है, वही किन्नर आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण मानव की मदद को आ खड़ा होता है। यह बात अलग है, कि किन्नर की नेकनीयती के बदले में उसे किन्नरेतर समाज से उपेक्षा और अपमान ही मिलता है। विजेंद्र प्रताप सिंह की कहानी ‘संकल्प’ का मधुर अपनी लैंगिक-विकलांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनाता, वरन् अपने घर-परिवार की प्रगति के लिए निरंतर संलग्न रहता है। समाज की रक्षा करने वाला पुलिसकर्मी उसके साथ बलात्कार करता है, और यहाँ से मधुर के जीवन की दिशा बदल जाती है। वह अपने लिए एक लाख रुपये इकट्ठे करके अपना लिंग परिवर्तन कराकर माधुरी बन जाती है। मधुर के द्वारा कराया गया लिंग-परिवर्तन केवल उसके लिए ही नहीं, वरन् अनेक लोगों के लिए एक बड़े परिवर्तन की लहर लेकर आता है। कई लैंगिक-विकलांग लोग अपना आपरेशन कराने के लिए आगे आते हैं, तो दूसरी तरफ चिकित्सक भी इस काम में अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर संलग्न होते हैं।

राही मासूम रज़ा की कहानी ‘खलीक अहमद बुआ’ अपने शीर्षक में ही किन्नर का अर्थ द्योतित करती है। इस कहानी में यह बताने की कोशिश की गई है, कि खलीक अहमद बुआ नाम में जिस तरह एक पुरुष और एक स्त्री निहित है, उसी तरह कहानी के नायक में भी संवेदनशीलता, भावुकता और विश्वसनीयता समाहित है। पुरुष और स्त्री, दोनों के आदर्श गुण समाहित हैं। ऐसी ही एक कहानी सलाम बिन रजाक की है- ‘बीच के लोग’। इस कहानी में व्यंग्यात्मक लहजे में यह बताने की कोशिश की गई है, कि स्त्री-और पुरुष के बीच बँटे समाज में उन लोगों की कोई अहमियत नहीं होती, जो बीच के होते हैं, अर्थात् न स्त्री होते हैं, और ना ही पुरुष होते हैं। यह कहानी ‘किन्नर’ शब्द पर भी अपनी असहमति दर्ज कराती है।

कुसुम अंसल की कहानी ‘ई मुर्दन का गाँव’ में किन्नर समाज की दयनीय दशा को दिखाते हुए माता-पिता द्वारा अपने लैंगिक-विकलांग बच्चे को किन्नर समाज से बचाने का यत्न करते हुए दिखाया गया है। करतार सिंह दुग्गल की पंजाबी कहानी ‘हम जिनस’ में माता-पिता अपनी संतान कस्तूरी की लैंगिक-विकलांगता को समाज से छिपाकर अपने पास रखना चाहते हैं और हिजड़ा समुदाय उसे अपने साथ ले जाने पर अड़ा रहता है। विनोद मिश्र सुरमणि की कहानी ‘सुनो तुम मुझसे वादा करो’ भी कुछ इसी प्रकार की भावभूमि में रची गई है। कहानी उन वृहन्नलाओं की चिंता करती है, जिनसे समाज आशीष और सुख-समृद्धि की कामना तो करता है, लेकिन वृहन्नलाओं के जीवन की जटिलताओं की चिंता नहीं करता है।

डॉ. क्रांति कुमार सिन्हा की कहानी ‘नियति एक किन्नर की’ एकदम अलग तासीर की कहानी है, जो समाज की कड़वी सच्चाई को खुलकर सामने रखती है। कहानी के राजशेखर जी अपनी लैंगिक-विकलांग संतति से बहुत लगाव रखते हैं, लेकिन जब उन्हें समाज में बदनामी की चिंता होने लगती है, तो वे अपने कलेजे के टुकड़े को हिंजड़ा समुदाय को सौंपने में जरा-सी भी देर नहीं करते हैं। जवाहरलाल कौल ‘व्यग्र’ की कहानी ‘ज्योति सूना नयन’ एक उम्मीद जगाती है। इसमें शारीरिक विकलांग और लैंगिक-विकलांग एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। वस्तुतः विकलांगता दोनों ही हैं, लेकिन शारीरिक विकलांग कुछ हद तक अपने जीवन को सम्मानपूर्वक जी लेते हैं, जबकि लैंगिक-विकलांग के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। दोनों का एकसाथ मिलकर जीवन बिताना भविष्य की सुखद उम्मीद जताता है।

डॉ. पाठक ने यमदीप, मैं भी औरत हूँ, तीसरी ताली, किन्नर कथा, गुलाम मंडी, मैं पायल, पोस्ट बाक्स नं. 203 नाला सोपारा, जिंदगी 50-50, अस्तित्व, दरमियाना, आधा आदमी, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मैं क्यों नहीं और वाडामल्लि, आदि उपन्यासों को लेकर हिंदी उपन्यासों में किन्नरों के जीवन और उनके संघर्षों का विश्लेषण किया है। बात के विस्तार में जाने के स्थान पर यहाँ यह कहना अपेक्षित होगा, कि हिंदी कहानियों की तरह से ही उपन्यासों में किन्नरों के जीवन के अलग-अलग रंग दिखते हैं। उनके जीवन-संघर्ष के विविध पक्ष दिखते हैं। इसी तरह अधूरी देह, अस्तित्व और पहचान, शिखंडी, पंखुड़िया : अंतर्द्वंद्व आदि प्रतिनिधि कविताओं के माध्यम से किन्नर-जीवन के विविध पक्षों को देखा-परखा और विश्लेषित किया गया है।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा, और किन्नर-समुदाय से...। निश्चित रूप से यह दुर्लभ और कल्पनातीत संयोग कहा जाएगा। फिर भी किन्नर-विमर्श के संदर्भ में आत्मकथा विधा को डॉ. पाठक ने इस कृति में समेटा है। किन्नर-विमर्श के अंतर्गत- किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी... और मानोबी बंधोपाध्याय की आत्मकथा पुरुष तन में फँसा मेरा नारी-मन; इन दो आत्मकथाओं को लिया गया है। आत्मकथा विधा में इन दो कृतियों के अतिरिक्त संभवतः दूसरी कृतियाँ होंगी भी नहीं..। इसके बाद भी डॉ. पाठक ने इस विधा को इस कृति में समेटा है, कारण आत्मकथा विधा में किन्नरों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके, क्योंकि किन्नरों के द्वारा लिखा गया स्वाभाविक रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, दूसरे लोगों द्वारा लिखी गई बातों की अपेक्षा..। किन्नर समुदाय अपने जीवन-संघर्षों को लिपिबद्ध कर सकें, इसके लिए प्रेरित हों.., डॉ. विनय कुमार पाठक की यह दृष्टि निःसंदेह प्रभावित करती है।

डॉ. पाठक ने किन्नर-केंद्रित नाटकों में आग के सात फेरे और हरारत, इन दो नाटकों को लिया है। इसी तरह किन्नर-केंद्रित और मुख्य कथा के साथ जुड़े किन्नर-पात्रों के जीवन के चित्र खींचते सिनेमा और नाटकों का विश्लेषण इस कृति में किया गया है। यद्यपि इनकी संख्या कम है, लेकिन इन विधाओं में भी किन्नरों के जीवन को देखने का काम स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा के बड़े फलक से निकालकर डॉ. पाठक ने लगभग दर्जन भर उन फिल्मों का उल्लेख इस कृति में किया है, जो किन्नर-विमर्श के लिए, इस दिशा में सार्थक चर्चा के लिए महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं।

इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों के बीच सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक विमर्श के रूप में देखे जाने वाले किन्नर-विमर्श के संदर्भ में डॉ. विनय कुमार पाठक की यह कृति उन सभी विधाओं को समेटकर एक व्यापक विश्लेषण और समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिनकी न केवल साहित्य में, वरन् समाज में अत्यंत मजबूत स्थिति है। यह कृति एक संदेश भी देती है, कि ऐसी विधाएँ, जो साहित्य के साथ ही समाज को संदेश दे सकती हैं, उनमें आज तक भले ही कम काम हुआ हो, लेकिन संभावनाएँ असीमित-अपरिमित हैं। इस दृष्टि से भी डॉ. पाठक की इस कृति को किन्नर-विमर्श पर आधारित पहली समीक्षात्मक-आलोचनात्मक कृति कहा जा सकता है।

इस कृति का पहला अध्याय, जिसकी चर्चा हमने यत्नपूर्वक अंत में की है, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अध्याय को छोड़कर न तो इस कृति पर बात पूरी होती है, और न ही ‘किन्नर-विमर्श’ पर बात पूरी हो सकेगी। यह अध्याय है- ‘किन्नर : आशय और अवधारणा’। इस अध्याय में किन्नरों के स्वरूप-विवेचन के साथ ही ऐतिहासिक पीठिका, मूल निवास, मानवाधिकार और परंपरागत जीवन आदि विविध विषयों-बिंदुओं को समेटने का यत्न डॉ. पाठक ने किया है।

‘किन्नर-विमर्श’ अपने नाम के अनुरूप किन्नरों के जीवन और उनकी सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न विषयों पर केंद्रित है। लेकिन ‘किन्नर’ नाम को लेकर अकसर विवाद उठता रहा है। वस्तुतः ‘किन्नर’ एक ऐसी मानव-प्रजाति है; जो गीत-संगीत में रुचि रखती है, जो हिमालय के तराई क्षेत्रों में पाई जाती है। किन्नर पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बहुत ही कम होने के कारण ये ‘किं-नर?’ से ‘किन्नर’ बन गए। किन्नर-विमर्श में जिन ‘किन्नरों’ की बात की जाती है, उनसे ये अलग होते हैं, लेकिन नाम-साम्य के कारण विवाद की स्थितियाँ बनती हैं।

संभवतः इस स्थिति को जानते-समझते हुए डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी कृति के पहले अध्याय में एक विकल्प दिया है। वे ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए ‘लैंगिक विकलांग विमर्श’ नाम भी देते हैं। यह नाम कई अर्थों में प्रासंगिक लगता है, क्योंकि इस विमर्श में उन लोगों के जीवन को दर्शाया गया है, जो लैंगिक असामान्यता का जीवन जी रहे होते हैं। यद्यपि ‘किन्नर-विमर्श’ आज के समय में रूढ़ हो गया है, इस कारण ‘लैंगिक-विकलांग’ और ‘पार-यौनिक’ (ट्रांसजेंडर) के साथ ही ‘असामान्य यौन-विकृत’ और ‘यौन-मनोविकृत’ के स्थान पर ‘किन्नर-विमर्श’ ही व्यवहृत होता है। डॉ. पाठक ने भले ही दूसरे नाम सुझाए हों, और संदर्भित विषय में चर्चा के विविध पक्षों को निष्पक्षता के साथ स्थान दिया हो, किंतु वे पौराणिक प्रसंगों, भारतीय वाङ्मय के उदाहरणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ ‘किन्नर’ शब्द के व्यवहार को पुष्ट करते हैं, समर्थन देते हैं। ‘किन्नर-विमर्श’ की साहित्यिक स्थापना के लिए विस्तृत-व्यापक आधार तैयार करते हुए प्राचीन भारतीय वाङ्मय और लोकजीवन के साथ ही वे मध्यकालीन समाज में ‘किन्नरों’ की स्थिति का विशद-व्यापक विश्लेषण करते हैं। वे ‘थर्ड जेंडर’, ‘गे’, ‘लेस्बियन’, ‘लैंगिक-विकलांग’ आदि का उल्लेख करते हुए ‘किन्नर-विमर्श’ की वैचारिक भूमि का निर्माण करते हैं।

उल्लेखनीय है, कि हमारे संस्कारों और लोकजीवन के विभिन्न पक्षों के साथ किन्नरों का संबंध रहा है। भारतीय वाङ्मय और पौराणिक ग्रंथों में किन्नरों की सम्मानजनक स्थिति को दर्शाया गया है। लोग इनके प्रति आस्थावान रहते हैं। किन्नर अखाड़ों का अस्तित्व और विभिन्न रीति-रिवाजों में इनको दिया जाने वाला सम्मान हमारी परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है। लोकजीवन में ये स्थितियाँ आज भी दिखती हैं। मध्यकाल में यह समुदाय हरम के पहरेदार की भूमिका में सिमटकर रह गया। बाद के वर्षों में यह समुदाय अपने जीवन के लिए जटिल होती स्थितियों के साथ जीने को विवश होता गया। डॉ. पाठक ने अनेक उद्धरणों और लोकगीतों-लोकपरंपराओं आदि का उल्लेख करते हुए तमाम अनजानी बातों को समेटकर किन्नर-समुदाय के कालक्रमानुसार इतिहास को अनौपचारिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस कारण यह अध्याय महत्त्वपूर्ण है, और किन्नर-विमर्श के अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इस विश्लेषण के साथ वे संकेत भी देते हैं, कि मनोविकृतियों के कारण असामान्य लैंगिक व्यवहार करने वाले, छद्म किन्नर बनने वाले लोगों और ‘किन्नरों’ में बड़ी विभाजक रेखा खिंची हुई है। किन्नर-विमर्श के संदर्भ में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

समग्रतः, किन्नर विमर्श के वैचारिक आधार की तैयारी के लिए डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा चयनित समस्त सामग्री, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, सिनेमा आदि विमर्श के फलक को विस्तार ही नहीं देते, वरन् अनेक अनछुई सच्चाइयों को प्रकट भी करते हैं। डॉ. पाठक ने अपनी कृति में जिस प्रकार खाका खींचा है, वह निःसंदेह ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। इस कृति को ‘किन्नर-विमर्श’ का दिशा-निर्देशक ग्रंथ कह सकते हैं। और एक बार फिर डॉ. विनय कुमार पाठक को ऐसे सिद्धहस्त समीक्षक-आलोचक कह सकते हैं, जिन्होंने बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों को स्थापित करने और साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा के लिए उपलब्ध कराने का काम किया है।

(पुस्तक- किन्नर आलोचना के शिखर : डॉ. विनय कुमार पाठक, संपादक- डॉ. अनिता सिंह, प्रकाशक- माया प्रकाशन, वर्ष- 2024 में प्रकाशित)

                                                                                    -राहुल मिश्र

Friday, 5 September 2025

हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों का प्रभाव


हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों का प्रभाव


हिंदी साहित्य के वर्तमान में उपन्यास विधा की उत्पत्ति और विकास सर्वथा नवीन भावबोध और भारतीय नवजागरण के प्रयासों से अनुप्राणित है। इस कारण भारतीय नवजागरण से संबद्ध विचारकों-समाजसेवकों के प्रयासों और उनके विचारों का उपन्यास विधा में प्रतिफलित होना भी सर्वथा प्रासंगिक और युक्तिपूर्ण है। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास प्रायः अंग्रेजी और बांगला से अनूदित थे और उनमें इसी अनुरूप कथ्य का प्रतिपादन भी किया गया था। हिंदी के प्रारंभिक मौलिक उपन्यासों का क्रम प्रायः 1900 ई. से शुरू होता है और 1950 ई. तक के उपन्यासों को हिंदी के प्रारंभिक मौलिक उपन्यास कहा जा सकता है। सन् 1900 से 1915-16 की अवधि में एक ओर तिलिस्मी-ऐयारी-जासूसी कथानक वाले उपन्यासों का प्रभाव देखने को मिलता है, तो दूसरी ओर भारतीय नवजागरण के प्रभावों के फलस्वरूप सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित नीतिवादी-शिक्षाप्रद-उपदेशात्मक उपन्यासों का। इस अवधि के उपन्यासों में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध के स्थान पर उसके कारण उपजी समस्याओं को उच्च मध्यवर्गीय समाज के सीमित दायरे में रखकर चित्रित किया गया है। “इस अवधि का उपन्यास देश के उस विशाल जनसमुदाय से कटा हुआ है, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के शोषणचक्र में पिस रहा था। यह जनसमुदाय किसानों का था, जो मुख्यतः गाँवों में रहता था और विदेशी सरकार, जमींदार, महाजन और पुरोहित, सबका भक्ष्य बना हुआ था। किशोरीलाल गोस्वामी, भुवनेश्वर मिश्र, महता लज्जाराम शर्मा आदि कुछ उपन्यासकारों ने किसानों पर जमींदारों के अत्याचार, ग्रामीणों की निर्धनता, अशिक्षा तथा उनकी दीनहीन स्थिति का यत्रतत्र चित्रण किया है, किंतु यथार्थ के इस ज्वलंत पक्ष पर उनकी सर्जनात्मक दृष्टि नहीं पड़ी।”1 गोपालकृष्ण गोखले द्वारा स्थापित भारत सेवक समाज, जी. के. देवघर द्वारा स्थापित सेवासदन, राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज और केशवचंद्र सेन की प्रेरणा से स्थापित प्रार्थना समाज सहित दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने धार्मिक प्रेरणा और अतीत के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक स्वरूप का समाज-सुधार के क्षेत्र में प्रयोग किया, जो इस अवधि के उपन्यासों में परिलक्षित होता रहा।

इस प्रकार 1900 से 1915-16 की अवधि में नवजागरण की दिशा और दशा सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक सक्रियता के दो अलग-अलग वर्गों में बँटी थी। इसके परिणामस्वरूप एक ओर बालगंगाधर तिलक और उनके समर्थकों ने राजनीतिक सक्रियता को प्रश्रय दिया, तो दूसरी ओर गोपालकृष्ण गोखले जैसे राजनीतिज्ञों ने समाज-कार्य को। एक लक्ष्य की ओर चलती दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ समाज को सही दिशा देने के स्थान पर दिग्भ्रम जैसी स्थितियों का सर्जन कर रही थीं। ऐसे समय में आगमन होता है, महात्मा गांधी का। दक्षिण अफ्रीका से संत बनकर लौटे गांधी जी ने परस्पर विरोधी तत्त्वों को समीप लाने और उन्हें अपनी ताकत बनाने का प्रयोग किया। “गांधी जी ने सामाजिक समस्याओं तथा राजनीतिक प्रश्नों को एक समन्वित रूप दे दिया था। इसीलिए गांधी जी खादी, हिंदू-मुसलिम एकता तथा अछूतोद्धार, स्वराज्य के तीन स्तंभ मानते थे।”2 तत्कालीन भारतीय राजनीति और भारतीय समाजनीति पर गांधी जी की स्वराज्य की अवधारणा न केवल स्थापित हुई, वरन् तीव्रता के साथ जनस्वीकार्य भी हुई। साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा। “गांधी जी के विचारों एवं जीवन-दृष्टि के आधार पर औपन्यासिक चरित्रों का प्रतिरूप बनाया गया, गांधी जी के जीवन की घटनाओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत किया गया, गांधी जी द्वारा प्रवर्तित राष्ट्रीय आंदोलनों का चित्ररूप दर्शन कराया गया, गांधी जी के कुछ सिद्धांतों की मीमांसा करने के लिए कथाओं की संरचना की गई। उदाहरणस्वरूप- हृदय-परिवर्तन, अहिंसक प्रतिरोध, सत्य का स्वरूप-विवेचन, ट्रस्टीशिप की परिकल्पना, औद्योगिक विकास के दौरान बढ़ने वाली अनैतिकता, दलित-पीड़ित-पतित-शोषित समाज के प्रति सहानुभूति आदि।”3 हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों के द्वितीय सोपान में गांधी-दर्शन और गांधीवाद के आगमन को साहित्य और समाज में बड़े क्रांतिकारी बदलाव से कम नहीं कहा जा सकता है।

‘परीक्षागुरु’ से ‘सेवासदन’ तक, अर्थात् 1882 से 1916 तक हिंदी उपन्यास साहित्य को प्रयोगकाल कहा जा सकता है। इस काल के उपन्यासों की सृष्टि किसी साहित्यिक उद्देश्य को सम्मुख रखकर नहीं की गई थी, वरन् नीति, शिक्षा, प्रेम, रोमांस, तिलिस्म और जासूसी प्रवृत्तियों का चित्रण करके जनता का मनोरंजन करना अथवा कौतूहल की सृष्टि करना मात्र था।4 ‘सेवासदन’ के साथ प्रेमचंद द्वारा हिंदी उपन्यास-लेखन का प्रारंभ किया जाना और राजनीतिक-समाजसेवक के रूप में महात्मा गांधी का भारत में आगमन, दो ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य और भारतीय समाज, दोनों के लिए युगांतकारी कहा जा सकता है।

प्रेमचंद का उपन्यास ‘सेवासदन’ सन् 1918 में हिंदी में प्रकाशित हुआ और समाज में उपेक्षित ‘आधी दुनिया’ के जटिल यथार्थ को पहली बार देखने का प्रयास हुआ। गांधी जी महिलाओं की दयनीय दशा को लेकर चिंतित थे, और वे महिलाओं को पुरुषों के समान सामाजिक मान-प्रतिष्ठा और अधिकार दिलाने के प्रबल पक्षधर थे। इसी कारण उन्होंने स्त्री-अशिक्षा और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया। “1930 ई. में गांधी जी ने स्त्रियों को विदेशी वस्तुओं की दुकानों, शराबघरों और सरकारी संस्थानों पर धरना देने का संदेश दिया। इस आह्वान पर हजारों स्त्रियों ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया और जेल गयीं। खुद प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी भी जेल गयीं। इसका असर प्रेमचंद के उपन्यासों के नारी पात्रों पर भी दिखाई देता है।”5 इसी कारण दहेज प्रथा और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्याओं को केंद्र में रखकर लिखा गया ‘सेवासदन’ गांधी जी के विचारों के समीप का प्रकट होता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में ‘सेवासदन’ की शांता; ‘गोदान’ की मालती; ‘कर्मभूमि’ की सुखदा, मुन्नी, नैना, रेणुका देवी, पठानिन और सकीना तथा ‘प्रेमाश्रम’ की श्रद्धा और विद्या आदि ऐसी नारी-पात्र हैं, जिनके माध्यम से प्रेमचंद ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से गांधी जी के नारी-विषयक विचारों को प्रकट करने का प्रयास किया है।

प्रेमचंद अपने उपन्यासों के नारी पात्रों के साथ ही अन्य पात्रों के माध्यम से भी गांधीवादी चिंतन और तत्कालीन आंदोलनों के प्रभावों को प्रकट करते हैं। “गांधी विदेशी शिक्षा-प्रणाली, विदेशी औद्योगीकरण, शहरीकरण के प्रबल विरोधी थे, प्रेमचंद ने ज़मींदार-किसान, अमीर-गरीब का भेद तो दिखाया है, लेकिन उसे वर्ग-भेद का रूप नहीं दिया है और न ही वर्ग-संघर्ष और क्रांति के जरिये उसका समाधान प्रस्तुत किया। अहिंसात्मक सत्याग्रह और हृदय परिवर्तन ही उनके समाज-परिवर्तन के साधन रहे थे। जहाँ ऐसा होने की संभावना नहीं है, वहाँ उन्होंने यथार्थ का दामन नहीं छोड़ा है, लेकिन हिंसा को प्रश्रय नहीं दिया है। प्रेमचंद गांधी के ‘वर्ग-समन्वय’ के सिद्धांत पर, ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत पर भी यकीन करते थे।”6 प्रेमचंद के लगभग सभी उपन्यासों में गांधीवाद के दर्शन होते हैं। यहाँ ‘प्रेमाश्रम’ के प्रेमशंकर, ‘कर्मभूमि’ के अमरकांत, ‘रंगभूमि’ के सूरदास और ‘कायाकल्प’ के चक्रधर का उल्लेख किया जा सकता है, जिनके माध्यम से प्रेमचंद गांधी जी के विचारों को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

प्रेमचंद ने जिस राजनीतिक-सामाजिक चेतना को व्यक्त करने की परंपरा की शुरुआत की, उसे आगे बढ़ाने का कार्य उनके समकालीन और परवर्ती उपन्यासकारों ने किया। हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचंद पहले ऐसे उपन्यासकार भी थे, जिन्होंने गांधीवाद को उपन्यास विधा में स्थापित करने का सफल प्रयास किया। प्रेमचंद के साथ ही उनके समकालीन श्री नाथ सिंह ने गांधीवादी दृष्टिकोण से अनेक उपन्यासों की रचना की। उनके ‘उलझन’, ‘जागरण’, ‘प्रभावती’, ‘प्रजामण्डल’ आदि उपन्यासों में ग्राम-सुधार, नारी उद्धार, अछूतोद्धार जैसे विषय हैं।7 गांधीवादी विचारधारा को कविताओं के साथ ही उपन्यासों में उतारने वाले सियारामशरण गुप्त के दो उपन्यासों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। ‘गोद’ उपन्यास में उन्होंने नारी की दयनीय सामाजिक स्थिति का चित्रण करते हुए नारी स्वातंत्र्य के विषय को गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप प्रकट किया है। उनके दूसरे उपन्यास ‘अंतिम आकांक्षा’ में सामाजिक विषमता के प्रश्न को उठाया गया है। इस उपन्यास में रामलाल निर्धन, निम्नवर्गीय पात्र है, जिसके प्रति समाज के अभिजात्य वर्ग की मानवीय सहानुभूति का उपजना गुप्त जी के गांधीवादी दृष्टिकोण को संकेतित करता है।8 

गुरुदत्त ने अपने उपन्यास ‘स्वराज्य दान’ में अहिंसा के महत्त्व को स्थापित करने का प्रयास किया है, साथ ही उनके ‘स्वाधीनता के पथ पर’, ‘पथिक’ और ‘भावुकता का मूल्य’ आदि उपन्यासों में विभिन्न सामाजिक समस्याओं का चित्रण है। जगदीश झा विमल के उपन्यास ‘खरा सोना’, ‘आशा पर पानी’, ‘लीलावती’ और ‘गरीब’, जहाँ एक ओर प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर गांधी जी के विचारों को भी प्रकट करते हैं। प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने ‘विजय’, ‘विकास’ और ‘बयालीस’ आदि उपन्यासों में राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं का हल गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप प्रस्तुत करके हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों की उपस्थिति को दृढ़ता प्रदान की है। ऋषभचरण जैन का उपन्यास ‘सत्याग्रह’ दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन के जरिए गांधीवादी विचारों को प्रकट करता है। उनके अन्य उपन्यासों में ‘मयखाना’ और ‘तीन इक्के’ भी उल्लेखनीय हैं, जिनमें शराबखोरी और जुआखोरी के दुर्गुणों का चित्रण हुआ है।

उस दौर के अन्य प्रसिद्ध उपन्यासकार, ‘उग्र’ पर नग्नता का आरोप लगता रहा है, किंतु उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ गांधीवादी विचारों का चित्रण अपने उपन्यासों में किया है। “पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ राजनीतिक धरातल पर गांधी जी के विचारों से प्रभावित थे। वह दो उपन्यासों, ‘चन्द हसीनों के खतूत’ तथा ‘सरकार तुम्हारी आँखों में’, हिंदू-मुसलिम एकता के उद्देश्य से लिखते हैं। ‘शराबी’ उपन्यास मद्यनिषेध विषय पर लिखा गया है, जो राष्ट्रीय कांग्रेस का मुख्य रचनात्मक कार्यक्रम था। ‘मनुष्यानंद’ उपन्यास में अछूतोद्धार आंदोलन चलता है।”9 उषादेवी मित्रा के उपन्यासों, ‘वचन का मोल’, ‘जीवन की मुसकान’ और ‘पथचारी’ में नारी-जीवन की ऐसी विषमताएँ उभरती हैं, जिनका सीधा संबंध गांधी जी के नारी-विषयक विचारों से जुड़ा है। “परिवार से सामाजिक आंदोलनों की ओर आती भारतीय स्त्री की संक्रमणकालीन मनोदशाओं का अंकन उषादेवी मित्रा ने पर्याप्त विश्वसनीय रूप में किया है।”10

इसी प्रकार निराला कृत ‘अलका’, जयशंकर प्रसाद कृत ‘तितली’ और ‘कंकाल’, वृंदावनलाल वर्मा  कृत ‘प्रत्यागत’ और ‘कुण्डली-चक्र’, भगवतीप्रसाद वाजपेयी कृत ‘पतिता की साधना’, जैनेन्द्र कृत ‘सुनीता’, चतुरसेन शास्त्री कृत ‘आत्मदाह’, भवानीदयाल कृत ‘नेटाली हिंदू’ और मन्नन द्विवेदी कृत ‘कल्याणी’ में गांधी जी के विचार कहीं सीधे तौर पर, तो कहीं प्रतीकात्मक रूप में स्थापित होते हैं। कृष्णलाल वर्मा कृत ‘पुनरुत्थान’, धनीराम प्रेम कृत ‘मेरा देश’, मोहिनी मोहन कृत ‘देशोद्धार’ और छविनाथ पांडेय कृत ‘प्रोत्साहन’ आदि उपन्यासों में स्वाधीनता आंदोलन तथा गांधीवादी विचारों का खुला प्रतिपादन किया गया है।11 यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि प्रयोगवाद की अवधारणा के जनक अज्ञेय का उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’, गांधी जी के अछूतोद्धार के विचार को नए प्रयोग के साथ प्रकट करता है। इस उपन्यास का नायक शेखर है। “विद्रोही शेखर ब्राह्मण छात्रों का छात्रावास छोड़कर अछूत छात्रों के छात्रावास में रहने लगता है। वह सदाशिव, राघवन आदि अछूत छात्रों की सहायता से अछूतोद्धार-समिति का निर्माण करता है, तथा अछूत बालकों के लिए स्कूल खोलकर स्वयं पढ़ाता है। सवर्ण एवं रूढ़िवादी वर्ग से संघर्ष संगठित रूप में ही किया जा सकता है, लेकिन शेखर वैयक्तिक धरातल पर समाज को चुनौती देता है।”12

गांधी जी और गांधीवादी विचारधारा के संबंध में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहते हैं कि- “दुनिया में मैं महात्मा गांधी को सबसे बड़ा मानता हूँ। उनका ध्येय भी यही है कि मजदूर और किसान सुखी हों। वह इन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए आंदोलन चला रहे हैं, मैं लिखकर उनकी हिमायत कर रहा हूँ।”13 संभवतः इसी कारण हिंदी उपन्यासों के क्षेत्र में प्रेमचंद ऐसे पहले उपन्यासकार बने, जिन्होंने गांधी जी के विचारों को हिंदी उपन्यासों में प्रतिष्ठापित करने का कार्य किया। प्रेमचंद के समकालीन और उनके परवर्ती उपन्यासकारों ने इस परंपरा को विकसित करने में योगदान दिया। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में, सन् 1916 से 1950 ई. तक हिंदी उपन्यासों में जितनी शिद्दत के साथ गांधी जी के सिद्धांत और उनकी विचारधारा प्रकट होती है, उसका दर्शन परवर्ती कालखंडों में दुर्लभ होता गया, यही इस कालखंड की विशेषता है, विशिष्टता है।

संदर्भ-

1.    गोपाल राय, रोमांस, पाठक और उपन्यास, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 123-124,

2.    डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 109,

3.    वेब रेफ़रेंस- http://www.hindi.mkgandhi.org/gmarg/chap20.htm

4.    डॉ. सरोजनी त्रिपाठी, प्रेमचंद के हिंदी उपन्यासों में वस्तु-विन्यास का विकास, आधुनिक हिंदी उपन्यास में वस्तु-विन्यास, ग्रन्थम, कानपुर, प्रथम सं. 1973, पृ. 108,

5.    गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 136,

6.    राजम नटराजम पिल्लै, प्रेमचंद और गांधीवादी दर्शन, प्रेमचंद के आयाम, संपादक- ए. अरविंदाक्षन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2006, पृ. 264,

7.    डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, हिंदी उपन्यास का विकास, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, बारहवाँ सं. 2010, पृ. 426,

8.    गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 157,

9.    डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 262,

10.         मधुरेश प्रेमचंद युगीन अन्य उपन्यासकार, हिंदी उपन्यास का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 2009, पृ. 65,

11.         गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 166,

12.         डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 368,

13.         क़मर रईस, प्रेमचंद : विचार-यात्रा, प्रेमचंद : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, संपादक- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह एवं रेखा अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2006, पृ. 452 ।


-राहुल मिश्र


(हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई द्वारा प्रकाशित होने वाली पत्रिका हिंदुस्तानी ज़बान के मार्च, 2025 अंक में प्रकाशित)