अवधेश
अवध में आता है...
घर में तपसी की तरह देख भरत का वेष ।
ब्राह्मण भूला अपनपौ-पुलकित हुआ विशेष ।।
बोला- “राजर्षि, सुनो जिसका तुम ध्यान
रात- दिन करते हो ।
जिसके
दर्शन को भरतलाल माला पर
घड़ियाँ गिनते हो ।।
पुष्पक
पर वानर-मण्डल में-जो
अपनी छटा दिखाता है ।
लक्ष्मण सीता के
सहित वही अवधेश
अवध में आता है।।
मधुर वचन यह विप्र के थे मधुरस की धार ।
मरते
विरही में हुआ-नव
जीवन-सञ्चार ।।
(राजतिलक, उत्तरकांड, राधेश्याम रामायण)
रामकथा
में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वन से लौटने का प्रसंग बड़े महत्त्व का है। हर
युग में, प्रत्येक काल में, विभिन्न कालखंडों में रची गई रामकथाओं में, वाल्मीकि
रामायण से लगाकर आज के समय की रामकथाओं तक.... यहाँ तक कि गद्यात्मक-औपन्यासिक
रामकथाओं तक में श्रीराम का अयोध्या आना न केवल वर्णित है, वरन् दिव्य और भव्य
स्वरूप लिए हुए है। गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यंत रुचिकर और मार्मिक वर्णन इस
प्रसंग को लेकर किया है। विभिन्न रामकथाओं में यह प्रसंग अपने-अपने तरीके से
कवियों-भक्तकवियों द्वारा कहा गया है।
राधेश्याम
कथावाचक द्वारा रचित राधेश्याम रामायण में यह प्रसंग अत्यंत रुचिकर हो उठा है।
नेपाल के राजपरिवार से कथावाचस्पति की पदवी प्राप्त, कीर्तन कलानिधि,
काव्यकलाभूषण, श्रीहरिकथा विशारद, कविरत्न राधेश्याम कथावाचक विरचित रामायण का
आधुनिक काल में विशेष महत्त्व है। उनकी रामकथा तुलसी के मानस की लोकप्रियता और
लोकव्याप्ति के स्तर पर भले न हो, किंतु आम जन तक अत्यंत सरल और सहज भाषा-शैली में
पहुँचती है।
राधेश्याम
कथावाचक ने श्रीराम के अयोध्या आगमन की कथा का अत्यंत रुचिकर वर्णन क्षेपक कथा के
संयोजन के साथ किया है। तुलसी के मानस में यह प्रसंग नहीं आता है। राधेश्याम
रामायण में प्रसंग आता है, कि अयोध्या पहुँचने के पहले श्रीराम का विमान, पुष्पक
विमान चित्रकूट पहुँचता है। राधेश्याम रामायण के लङ्का कांड में रावण-वध की कथा
आती है। रावण के वध के उपरांत श्रीराम लङ्का का राजपाट विभीषण को सौंपकर अयोध्या
चलने को तैयार होते हैं। लेकिन श्रीराम के सहयोगी रहे वानर, भालू, रीछ आदि रामादल
राम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। वे सब भी राम के साथ चलने के लिए अनुरोध
करते हैं। हनुमान, विभीषण, सुग्रीव आदि राम के प्रेम में इतने विह्वल हो उठे थे,
कि राम को एक क्षण के लिए भी छोड़ना नहीं चाहते थे। अंततः राम सभी को लेकर अयोध्या
की ओर चल पड़ते हैं। राधेश्याम कथावाचक कहते हैं-
इस प्रकार निज जनों को लेकर अपने साथ ।
सुमिर गजानन गौरि शिव चले अवध रघुनाथ ।।
चित्रकूट के निकट जब पहुँचा पुष्पक-यान ।
तब बोले हनुमान
से कृपासिन्धु भगवान ।।
रहा एक दिन अवधि में पहुँचो अवध-प्रदेश ।
शीघ्र परमप्रिय भरत को पहुँचाओ सन्देश ।।
जो आज्ञा कहकर चले
पवनतनय सानन्द ।।
वाल्मीकि मुनि से इधर भेंटे रघुकुलचन्द ।।
मुनि बोले जग को अभी मिला नहीं विश्राम ।
अभी हुआ ही है कहाँ- रावण का वध राम?
माया का सागर चहुँ दिशि है-उसमें शरीर यह
लङ्का है ।
बैठा है अहङ्कार
रावण, जो बजा रहा
निज डङ्का है ।।
घननाद स्वार्थ का है इसमें, आलस है
कुम्भकरण भगवन् ।
वध करो कृपा शर से इनको तब हो भू-भारहरण
भगवन् ।।
जन का जब इस भाँति हो पूर्ण सफल सब काज ।
तब मेरे मन
अवध में करो बैठकर राज ।।
यहाँ
राधेश्याम कथावाचक लङ्का काण्ड की कथा को विराम देते हैं। मुनि वाल्मीकि रामायण के
रचयिता हैं, रामकथा के आद्य प्रस्तोता हैं। राधेश्याम कथावाचक श्रीराम के आद्यकवि
वाल्मीकि से मिलन के प्रसंग को सायास वर्णित करते हैं। श्रीअयोध्याजी में विराजमान
श्रीराम का लोकरक्षक स्वरूप इस भेंट में उभरता है। यहाँ सरल-सहज भाव से राधेश्याम
कथावाचक मन रूपी अयोध्या का वर्णन कर रहे हैं। मन रूपी अवध में विराजमान होने वाले
राम माया के सागर के मध्य स्थापित इस शरीर रूपी लंका के अधिपति अहङ्कार रूपी रावण,
स्वार्थ रूपी घननाद, आलस्य रूपी कुंभकर्ण का वध करके आने वाले हैं। मन रूपी
अयोध्या में राम तभी विराजमान होते हैं, जब इन कायिक-वाचिक-मानसिक विकृतियों का
शमन हो जाता है। आद्यकवि वाल्मीकि की मनोकामना भी तभी पूर्ण होती है, रामकथा का
आशय भी तभी सिद्ध-सफल होता है।
दूसरी
ओर भरत जी हैं। अयोध्या में विरक्त संन्यासी की तरह जीवन बिता रहे हैं। रामभक्त
हनुमान उन्हें यह बताने के लिए जाते हैं, कि श्रीराम अवध में आ रहे हैं। भरत यहाँ
आत्मा के सदृश उपस्थित हैं। जिस प्रकार आत्मा अपने परमात्मा से मिलन को व्याकुल
रहती है, वैसी ही व्याकुलता में वियोगी-सा जीवन बिताते हुए भरतजी की आशा का घट भर
आया है। वे कहते हैं-
योगी की भाँति-देह तजकर-आत्मा के तार
मिलाने हैं ।
आराध्यदेव के चरणों
में-प्राणों के फूल चढ़ाने हैं ।।
पर नहीं, भूल है, यह पूजा—होगी उनको स्वीकार नहीं ।
तू तो रक्षक है अवधि तलक-तन पर तेरा
अधिकार नहीं ।।
अतएव पवन, जल, सूर्य, चन्द्र,
इन सबको साक्षी करता हूँ ।
प्रभु के चरणों की शपथ-सहित अन्तिम प्रण
यह ही करता हूँ ।।
चौदह वर्षों की अवधि बिता-यदि नाथ अवध में
आयेंगे—
तो इस शरीर
को छोड़ प्राण उनके चरणों में जायेंगे ।।
भरतजी
के वियोग की पराकाष्ठा पार हो रही है, क्योंकि श्रीराम की वनवास की अवधि पूरी हो
चुकी है। उनके आगमन की प्रतीक्षा है। भरतलाल चित्रकूट में श्रीराम से यह कहकर आए
थे, कि मैं अवधि भर के लिए अयोध्या का पालन करूँगा। श्रीराम ने भी- ‘पालहु अवध
अवधि भर जाई...’ कहकर भरत को चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजपाट सँभालने के लिए कहा
था। चित्रकूट दो भाइयों के प्रेम की पराकाष्ठा का साक्षी बना था। संभवतः इसी कारण
लंका से लोट रहे श्रीराम को चित्रकूट आते ही भरतलाल का ध्यान हो आता है। भरतलाल की
भावुकता, उनके प्रेम में पगे वचन, उनका त्याग, उनकी सहजता और चित्रकूट के परिवेश
में हुई बड़ी पंचायत का स्मरण श्रीराम को हुआ होगा। बाबा तुलसी के मानस में प्रसंग
आता है, कि जब श्रीराम लंका से समस्त रामादल के साथ चलते हैं, तो रास्ते में वे
विभिन्न स्थानों का परिचय कराते हैं। कहाँ पर कौन-सी घटना घटित हुई, बताते चलते
हैं। चित्रकूट में पहुँचते ही वे भावुक हो जाते हैं, और इसी कारण वे अपने प्रिय हनुमान
को कहते हैं, कि अयोध्या जाकर संदेश दो। हमारे पहुँचने की सूचना भरतलाल जी को दे
दो।
कथा
का विस्तार होता है। कथा लोक से रस संचय करके शिष्ट साहित्य में आती है। लोक में
कथा का आस्वाद काशी की रामलीला में मिलता है। काशी शिव की ही नगरी नहीं, राम की
नगरी भी है। जिस तरह वाल्मीकि रामायण से लगाकर बाबा तुलसी के मानस और आज के समय की
राधेश्याम रामायण में रामकथा के साथ शिव और पार्वती चलते हैं, कथा प्रस्तोता और
श्रोता के रूप में उपस्थित रहते हैं, वैसे ही काशी में देखने को मिलता है।
विश्वनाथ की नगरी में नाटी इमली की रामलीला होती है। यह लीला भरत मिलाप की लीला
है। राम के वन से लौटने के बाद भरतलाल से मिलने का प्रसंग यहाँ आता है।
राधेश्याम
कथावाचक अत्यंत रुचिकर वितान बुनते हैं। ब्राह्मण वेशधारी हनुमान भरतजी के समक्ष
उपस्थित हैं, और बता रहे हैं कि जिसके वियोग में संन्यासी जैसा जीवन बिता रहे थे,
वह अब आने ही वाला है। ब्राह्मण वेश में हनुमान की बात सुनकर भरतजी उनसे परिचय
बताने को कहते हैं। हनुमान अपना परिचय छिपा नहीं पाते और दोनों अनन्य रामभक्तों का
मेल आह्लादित कर देता है। भरतलाल जी से यह सूचना समूची अयोध्याधाम तक जाती है।
उमंग-उल्लास समूचे परिवेश में व्याप्त हो जाता है। राधेश्याम कथावाचक लिखते हैं-
पाते
ही यह सूचना
आते हैं- ‘श्रीराम’ ।
अवधपुरी बननेलगी एक अलौकिक धाम ।।
+ + + +
राम-दरस
की प्रजा में
ऐसी उठी उमङ्ग ।
छोड़ छोड़ गृह कार्य सब-चले भरत के सङ्ग
।।
अयोध्या
नगरी में पुष्पक विमान उतरता है। श्रीराम समग्र रामादल के साथ उतरते हैं, अपनी
मातृभूमि को प्रणाम करते हैं। अयोध्या नगरी का अपार जनसमुदाय अपने राम की अगवानी
करने के लिए खड़ा है। भरतलाल भी उपस्थित हैं। भरतलाल की दशा का बड़ा मार्मिक वर्णन
राधेश्याम कथावाचक करते हैं-
शत-शत कण्ठों से उसी समय रघुपति की
जय-जयकार हुई ।
फिर धीरे-धीरे- ‘मेरे प्रभु’ -यह मीठी-सी
झङ्कार हुई ।।
उस अवध-तपस्वी की गति पर-उपमा सकुचाकर आती
है ।
मानों सागर से
मिलने को गङ्गा
की धारा जाती
है ।।
जब चित्रकूट में था
मिलाप तब
विजयी थे श्रीरघुराई
।
पर यहाँ चरण छूकर पहले-जय भरतलालजी ने पाई ।।
दोनों के रूप साँवले थे, दोनों के तन पर गाती थीं ।
चौदह वर्षों के यतियों की-एड़ी तक जटा
सुहाती थीं ।।
जब मिले परस्पर दोनों
ही दोनों को दर्शक भूल गए ।
श्रीराम कौन? श्रीभरत कौन? यह चतुरानन तक
भूल गए ।।
इस भ्रात-मिलन ने रंग बदला, जब अपने आप
अयोध्या का ।
शारदा पुकार उठी तब- ‘यह है भरत-मिलाप
अयोध्या का’ ।।
भरत-मिलाप
के दो प्रसंग हैं। पहला भरत-मिलाप चित्रकूट में होता है, और दूसरा अयोध्या में...।
श्रीराम अयोध्या आगमन के बाद सभी से मिलते हैं। माताओं से मिलते हैं, शत्रुघ्न से
मिलते हैं, नगरवासियों से मिलते हैं, लेकिन भरत से मिलना अलग ही भाव रखता है।
चित्रकूट में हुए भरत-मिलाप की पूर्णता अयोध्या के भरत-मिलाप से होती है। लोक के
लिए यह प्रसंग अन्यतम है, विशिष्ट है। वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला में यह
प्रसंग खेला जाता है, और वह भी एक विशिष्ट रंग से...ढंग से...।
वाराणसी
की नाटी इमली की रामलीला में भरत जिद पर अड़े हुए हैं। भरतजी चित्रकूट में भी जिद
पर अड़े थे, किंतु विजय राम की हुई थी। यहाँ भरतजी की जिद पूरी होती है। भरत कहते
हैं, कि यदि सूर्य के अस्त होने के पहले श्रीराम मुझसे मिलने नहीं आए, मेरे पास
नहीं आए, तो मैं प्राण त्याग दूँगा। श्रीराम को भरतजी की इस जिद का पता है, किंतु
सभी से मिलते-मिलते बहुत देर हो जाती है। सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो जाते हैं। मात्र
कुछ क्षण ही सूर्यास्त में शेष रहते हैं, तभी श्रीराम को भरतजी की सुध आती है। वे
दौड़ पड़ते हैं। भरतलाल श्रीराम को दौड़कर आते देखते हैं, तो वे भी दौड़ पड़ते
हैं। जिस स्थान पर अस्त होते सूर्य की अंतिम रश्मियाँ गिर रही होती हैं, उसी स्थान
पर भरत और राम आलिंगनबद्ध हो जाते हैं। उपस्थित जनसमुदाय श्रीराम और भरतलाल की
जय-जयकार करता है। वाराणसी की नाटी इमली की इस रामलीला को देखने वाराणसी के महाराज
पधारते हैं।
यह
प्रसंग लोक की धरोहर है, जिसके निहित अर्थ लोक को जीवनीय शक्ति देते हैं। भाइयों
के प्रेम की अद्भुत अनूठी गाथा से लोक को यह प्रसंग जोड़ता है। अध्यात्म का पक्ष
भी इसमें निहित है। आत्मा भरतलाल के सदृश जब निर्लिप्त होकर, पूर्ण समर्पण भाव से
परमात्मा से मिलने के लिए आतुर हो जाती है, तब परमात्मा स्वयं अंगीकार करते हैं।
वह क्षण अनेक आशाओं के अस्त हो जाने का होता है, किंतु मन की सकारात्मक शक्ति के
साथ जीवंत अंतिम रश्मि निराश नहीं होने देती, हताश नहीं होने देती।
अयोध्या
नगरी में श्रीराम का आगमन मात्र भौतिक घटना नहीं रह जाती, एक युग की-एक काल की घटना-मात्र
नहीं रह जाती। यह काल की परिधि को पार करती है। यह भौतिक-सांसारिक पक्ष से ऊपर
उठकर आध्यात्मिक धरातल पर देखी जाती है, अनुभव की जाती है। इसी कारण विभिन्न
रामकथाकारों ने, अनेक भक्त कवियों ने श्रीराम के अयोध्या आगमन का वर्णन किया है।
अयोध्या में श्रीराम के आगमन का प्रसंग विभिन्न रामकथाओं में बड़ा स्थान रखता है।
यदि इस प्रसंग की गहराई में उतरकर देखें, इस प्रसंग के अंतर्निहित तत्त्वों का
विवेचन करें तो यह स्पष्ट होता है कि जब-जब श्री राम अहंकार रूपी रावण को मार
करके, शरीर रूपी लंका में लगी हुई व्याधियों का शमन करके, स्वार्थ रूपी मेघनाथ को
मारकर विजयश्री प्राप्त करके आते हैं, तब मन-मंदिर रुपी अयोध्या प्रसन्न हो जाती
है, उल्लास से भर जाती है।
विभिन्न
भक्तकवियों ने, रामकथा के गायको ने इस प्रसंग को गाया है। आज के संदर्भ में भी यह
प्रसंग अपने महत्त्व को रेखांकित करता है, बताता है। आज देश-विदेश में श्रीराम के
अयोध्या आगमन की चर्चा है। आज के समय में भी श्री राम के आगमन का जो प्रसंग है, वह
इन्हीं अर्थों में जाकर जुड़ जाता है और आज की पीढ़ी को, हम सबको यह संदेश देता है
कि एक परिवार के, एक समाज के, एक राष्ट्र के सूत्र जो बिखर गए थे, वे किस तरह से
एक साथ जुड़ जाते हैं। राम भरत से मिलते हैं और भरत व राम इस तरह एकाकार हो जाते
हैं कि कोई भी यह नहीं पहचान पाता कि कौन राम हैं, कौन भरत हैं..।
‘जाकी
रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’
श्रीराम
सबसे मिलते हैं, लेकिन राम का मिलना सामने वाले की भावना के अनुरूप है। उस समय जब
श्रीराम अयोध्या आए होंगे, तब भी यही सत्य था, और आज भी यही सच है। अयोध्या में
श्रीराम का आगमन भले ही कुछ लोगों के लिए आलोचना का विषय हो, लेकिन कल्पना करें...
आज भी श्रीराम सबसे वैसे ही मिल रहे हैं जैसी उनकी भावना है। हमारे लिए, वृहत्तर
भारतीय समाज के लिए, जो भारतभूमि के प्रति अपनी गहन आस्था रखता है, उसके लिए
श्रीराम का अयोध्या आगमन सारे परिवार के एक हो जाने के लिए है। विश्व-बंधुत्व की
भावना को सुदृढ़ और साकार करने के लिए है। श्रीराम का आगमन मन के कलुष-कल्मष को धो
रहा है, निर्विकार कर रहा है, निर्लिप्त कर रहा है, प्रेम के निर्झर को अविरल बना
रहा है। ऐसी कामना को लेकर, इस भावना को लेकर लोक आज एक बार फिर श्रीराम के
अयोध्या आगमन का उत्सव मना रहा है। सुंदर अयोध्या सज रही है। मन-मंदिर प्रफुल्लित
है, आह्लादित है।
(हिंदी प्रचार प्रसार सोसायटी, अमृतसर के मुखपत्र बरोह के जुलाई 24-मार्च 25 अंक में प्रकाशित)
- राहुल मिश्र

No comments:
Post a Comment