अजय प्रसून के काव्य में अनागत : एक अनुशीलन
आने वाला सामने अनागतीय सत्य है,
क्रूर काल अट्टहास करके करता नृत्य है ।
चल रहा है एक युद्ध आज अपने आप से,
बाज आ रहा न कोई व्यर्थ के प्रलाप से ।
जीत दे या हार दे धैर्य का सितार दे,
पूर्व सोचों की नदी
से तू हमें उबार दे ।
प्रार्थना यही है मातु शारदे नेक हम बनें मन उदार दे ।1
समकालीन हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. अजय प्रसून की
कृति- ‘कम नहीं बोलेंगी गजलें’ की यह पहली कविता है। भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा
के अनुरूप प्रसून जी ने कृति के प्रारंभ में वाग्देवी सरस्वती के प्रति अपने
श्रद्धासिक्त भावों को अर्पित किया है। इस
भावांजलि के उत्तरार्ध में अनागत के भावों का निदर्शन द्रष्टव्य है। वाणी की देवी
के प्रति, माँ शारदा के प्रति आस्था विचारों की अभिव्यक्ति के लिए साहस भी देती है
और साथ ही मन-वाणी-कर्म की शुद्धि करते हुए कार्य की सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करती
है। अनागत के साथ भी आस्था का भाव जुड़ता है। वस्तुतः अनागत और आस्था एक-दूसरे के
पूरक हैं। आस्था के बिना अनागत का भाव अपनी संपूर्णता में नहीं आ सकता। इसी कारण
कवि माँ शारदा के सम्मुख विनत भाव से कहता है, कि आने वाला समय अनागतीय सत्य है।
आने वाला समय कैसा होगा, क्या होगा... यह नहीं पता, लेकिन इस समय को आना ही है।
वर्तमान का क्रूर समय विकट है, अट्टहास करके नृत्य कर रहा है। इस विकट समय में
स्वयं से व्यक्ति लड़ रहा है। व्यर्थ के प्रलाप, अकारण का रोना-धोना.... समय की
विषमता के मध्य मिलने वाले तरह-तरह के कष्टों और दुःखों की स्थितियाँ वर्तमान में
हैं। वर्तमान की इन विकट स्थितियों से जीतने की अभिलाषा या हारने की वेदना के लिए
मैं आपसे निवेदन नहीं करता हूँ। हे माँ शारदे! मुझे आप केवल धैर्य प्रदान करें।
पूर्व की सोचों से, अतीत की भयावह स्मृतियों और चिंताओं की गहरी नदी से आप हमें
उबार दें।
वर्तमान से जूझने के लिए धैर्य, अतीत से दो-दो हाथ करने के
लिए दुःखद स्मृतियों का लोप और अनागतीय सत्य के लिए आस्था...। कवि अपनी आराध्य माँ
शारदा से यही माँगता है। यह प्रार्थना-मात्र नहीं है, वरन् अनागत कविता की
अंतर्निहित चेतना है, अनागत कविता का सार है। अनागत कविता आंदोलन अतीत, वर्तमान और
भविष्यत् की जिन स्थितियों को उकेरता है, उन्हें यहाँ देखा जा सकता है। अनागत,
अनागत कविता और अनागत कविता आंदोलन को विस्तार से समझने पर बात अधिक स्पष्ट हो
सकेगी।
अनागत का आशय नहीं आए हुए से है.... अन् आगत से है, आने
वाले समय से है। तीनों काल में अतीत, वर्तमान और भविष्य होते हैं। यदि भविष्य की
बात करें, तो उसका विस्तार बहुत लंबा हो सकता है.... युगों के सदृश हो सकता है।
दूसरी ओर अनागत वर्तमान के अत्यंत निकट का
है। हर एक क्षण अतीत होता जाता है, सामने जो है, वह वर्तमान होता है, और आने वाला
क्षण अनागत है। समय की घड़ी में यही गति पल-प्रतिपल चलती रहती है। अतीत की बातें,
स्मृतियाँ, घटनाएँ आदि वर्तमान को प्रभावित करती हैं। वर्तमान को प्रत्यक्ष रहने
वाली बातें, घटनाएँ और स्थितियाँ भी प्रभावित करती हैं। इस तरह वर्तमान में अतीत
और वर्तमान दोनों की बातें, स्थितियाँ व घटनाएँ रहती हैं। अनागत कैसा होगा, यह तय
नहीं है, क्योंकि यह हमारा देखा हुआ नहीं है, जाना हुआ नहीं है। ऐसी दशा में
वर्तमान (जिसमें अतीत की छाया भी है) में रहते-जीते हुए अनागत के लिए यदि
नकारात्मकता मन-विचार-कर्म में रहेगी, तो अवश्य ही आने वाला कल भी सुखद नहीं रह
पाएगा। इसके लिए सुखद भविष्य की कामना का मार्ग है। अनागत कविता का ध्येय भी यही
है- कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना। इसको विश्लेषित करते हुए डॉ.
अश्विनीकुमार शुक्ल अपने संपादकीय आलेख में लिखते हैं-
“अनागत कविता’ के विषयों में– भविष्य का अनुमान, समाज के भावी स्वरूप का चिंतन, राष्ट्र की दिशाओं का अनुमान, राष्ट्र के स्वरूप का चिंतन, समग्र मानवता का हित-चिंतन, आने वाली पीढ़ियों के जीवन की
कल्पना, व्यक्ति की मनोदशा और मानव मन की भावनाओं
को परखने का सामर्थ्य आदि शामिल हैं। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि 'अनागत कविता' की वैचारिकता में वर्तमान को
चित्रित करने के लिए निराशा, संत्रास और दुरावस्था के भाव भी शब्दांकित
किए जाते हैं और उनसे उबरने तथा पार पाने के लिए ही भावी अच्छे सपने उकेरे जाते
हैं। यही कारण है कि ‘कठिन
वर्तमान जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कल्पना को साकार करना’ ‘अनागत कविता’ का ध्येय वाक्य बन जाता है। आशय
यह है कि इस कविता में संदर्भित वर्तमान में नकारात्मक
भावों-विचारों-तथ्यों का निरूपण होता है, जबकि इसमें वर्णित भविष्य में आशावादिता और सकारात्मकता व्याप्त
होती है।”2
अनागत कविता के इस भाव को हिंदी के काव्याकाश में आंदोलन के
रूप में खड़ा करने का श्रेय डॉ. अजय प्रसून को जाता है। सन् 1972-73 के आसपास डॉ.
प्रसून जी ने अनागत कविता आंदोलन की संकल्पना गढ़ी थी। बाद के वर्षों में अनागत
कविता आंदोलन विधिवत् साहित्यिक आंदोलन बनकर उभरा। अनेक कवियों और रचनाकारों ने इस
आंदोलन को अपने साहित्यिक अवदान से समृद्ध किया। अनागत कविता आंदोलन के
प्रेरक-प्रवर्तक डॉ. अजय प्रसून की अनेक काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हुईं। उस समय की
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ताम्रपर्णी सहित विभिन्न पत्रिकाओं के अनागत कविता
आंदोलन पर केंद्रित अंक प्रकाशित हुए। यह क्रम अनवरत चलता रहा और वर्तमान में भी
इसे देखा जा सकता है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि का विहंगावलोकन करें, तो साठोत्तरी
कविता की प्रवृत्तियों में मोहभंग, संत्रास, घुटन, पीड़ा, एकाकीपन, नीरसता आदि
परिलक्षित होती हैं। सीधे अर्थों में नकारात्मकता का बड़ा कैनवास साठोत्तरी कविता
में दिखता है। दूसरी ओर मानवीय स्वभाव और जिजीविषा है। अनेक कष्टों, दुःखों,
पीड़ाओं और चिंताओं में रहते हुए भी मानव-मन आने वाले कल के सुखद होने की आशा लिए
रहता है। यही आशा जीवन जीने का सहारा होती है, संबल बनती है। मानव-मन में निहित यह
आशा एक प्रकार की सकारात्मक चेतना है, आस्था का पवित्र स्वरूप है। जीवन की अनेक
विषमताओं, क्रूरताओं और जटिलताओं के कठिन प्रहारों से यह चेतना छलनी होती है, आशा
टूटती है और हताशा-निराशा उपजती है। यदि आज के नितांत भौतिकतावादी और अर्थप्रधान
परिवेश को देखें, तो युवा, वृद्ध, महिलाएँ और यहाँ तक कि बच्चे भी हताशा-निराशा व
मानसिक अवसाद से पीड़ित हैं। साहित्य का दायित्व बनता है, कि वह इस स्थिति से
जूझने के लिए राह सुझाए। आने वाले सुखमय कल की कामना के सूखते स्रोत को अपने अवदान
से भरने का यत्न करे। मानव का स्वभाव कहीं अचेतन में भी जिजीविषा को लिए रहता है,
क्योंकि इसी के बल पर मानव टिका है, मानव-सभ्यता और जीवन टिका है। इस मानवीय
स्वभाव के सहज चित्रण की रिक्तता को प्रसून जी के अनागत कविता आंदोलन ने भरने का
प्रयास किया है। प्रसून जी की अनेक कविताओं में यह तथ्य उभरकर सामने आता है। देखिए
एक बानगी-
उदासी के शिलालेखों
की काफी माँग हाटों में,
हमारा आपका चेहरा नहीं मकड़ी का जाला है !
अनिश्चय और आशंका
उगे दो फूल
साँसों में,
अनागत के लिये फिर भी अभी काफी उजाला है !3
इसी प्रकार वे अपनी हिंदी गजल में स्पष्ट करते हैं, कि
प्रकृति का संदेश भी यही है। अनेक संकटों व समस्याओं के मध्य कहीं-न-कहीं जीवन की
सकारात्मकता का संकेत प्रकृति से मिलता है, जिसे गहन अंतर्दृष्टि से देखने की
आवश्यकता है-
जगह-जगह पर तक्षक-केंचुल
जगह-जगह पर सर्पदंश है,
जगह-जगह पर दुःख की गाथा जगह-जगह पर दुष्ट कंस है !
+ + +
बड़े यशस्वी बड़े
मनस्वी रहा न
कोई यहाँ तपस्वी,
सभी काल के
ग्रास बने हैं
समय अरे कितना नृशंस है !
फिर भी जीवन
नदिया-झरना-पर्वत-बादल-सागर-पानी,
कोख उषा की रश्मिमयी है नयन-नयन में ज्योति अंश है !4
अजय प्रसून की अनागत कविताओं में प्रकृति की चिरंतनता का
संदेश अनागत की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए चलता है। वे प्रकृति के सुंदर
चित्रों को उकेरते हुए अनागत की बात कहते हैं। प्रसून जी की विभिन्न कविताओं में
प्रकृति के सुंदर चित्र हैं। प्रकृति के रमणीक वर्णन के साथ ही वे प्रकृति के
विभिन्न उपादानों का सहारा लेकर अनागत की संकल्पना को स्पष्ट करते हैं। जीवन के
दुःख-सुख और उतार-चढ़ाव को वे प्रकृति के विविध प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते
हैं-
जिसमें पतझर को वसंत को, ग्रीष्म शिशिर को जीना है,
जीवन है वह नदी कि जिसका जल अंजुरी भर पीना है ।5
जीवन नदी के समान गतिशील है। नदी के प्रवाह में भी बाधाएँ
आती हैं, लेकिन वह उन बाधाओं से टकराती है, निरंतर आगे बढ़ती जाती है। मानव का
जीवन भी ऐसा ही हो, यह कामना इन पंक्तियों में प्रकट होती है। प्रकृति के बहुरंगी
चित्रों को उकेरते हुए प्रसून जी दर्शन के गहन चिंतन में भी उतर पड़ते हैं। अनागत
की अवधारणा शास्त्रीय दर्शन से समृद्ध है। प्रकृति के साथ दार्शनिक पक्ष को,
अध्यात्म और तत्त्व-चिंतन को जोड़ते हुए सहज भाव से गहन बात को कह जाना प्रसून जी
की लेखनी की अन्यतम् विशिष्टता है। प्रसून जी की लंबी गद्य कविता है- एक दिन आना
हमारे पास। इस कविता का एक अंश देखिए-
एक दिन आना हमारे पास तुमको भेंट में देंगे / हिमालय की
अपरिमित संपदाओं का असीमित कोश / जिसमें जिंदगी के अनुभवों के ग्रंथ होंगे / मंत्र
होंगे सूर्य के होंठों से निकले और होंगे / आत्मा की वेदिका में चल रहे अविरल हवन
से / एक अनहद नाद साँसों में भरे / अविचल तपस्यारत प्रकृति के संत के अंदर / मंथन
से दिशाओं में सुगंधित वायु जैसे महमहाते / साधनारत गुनगुनाते श्लोक जो / सुखमय
अनागत का सुखद आकाश रच करके / तिमिर की यातनाओं के शताधिक चक्रव्यूहों से / गुजरते
पाँव धरते शब्द की सामर्थ्य को / धारे हृदय में त्रासदी के अंग लगकर भी / सदा ही
साफ बच करके / तुम्हें देंगे दिशा ऐसी कि जीवन सार्थक लगने लगेगा / तुमको तय है
सोच भी सकते नहीं तुम / वह दिशा होगी भला कैसी / सुबह की रोशनी जैसी ।।6
वह महामानव, जो अपरिमित अनुभवों और चिंतन-मनन की विविध
धाराओं को स्वयं में समाहित किये हुए है, सहज भाव से अपने संचय को मानवता के लिए
देना चाहता है, सौंपना चाहता है। महामानव की यह थाती सुखमय अनागत की है, तिमिर की
यातनाओं के मध्य दीप्त रश्मि की है, सुबह की रोशनी की है। इस अनागत को सौंपने हेतु
कवि आमंत्रित करता है।
प्रसून जी की कविताओं में चिंतन की धारा सतत प्रवाहित होती
दिखती है। जीवन के गहन अनुभवों की निधि उनकी कविताओं में आकार पाती है। यह चिंतन
सहज नहीं है। इसको समझने के लिए गहरे उतरना पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे कि सिद्धि
पाने के लिए कठिन साधना का मार्ग हो। सुखमय अनागत का सुखद आकाश भी तिमिर की शताधिक
यातनाओं के चक्रव्यूह से निकलकर ही दिखता है। बिना यातना के, कष्टों और
प्रताड़नाओं के बिना सुखमय भविष्य सहज नहीं। प्रकृति का चक्र ऋतुओं के परिवर्तन का
चक्र मात्र नहीं रह जाता, वरन् यहाँ वह जीवन के सुख और दुःख की, उतार और चढ़ाव की
गति का द्योतक भी बन जाता है।
अनागत कविता सनातन भारतीय जीवन-दर्शन से अनुप्राणित है। जब
सुखद भविष्य की कामना की बात आती है तब वर्तमान का पक्ष अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो
जाता है। वर्तमान कठिन है, लेकिन इस कठिन वर्तमान से हार मानकर नहीं बैठना है।
अनागत कविता वर्तमान से संघर्ष को सुखद भविष्य की कामना के लिए महत्त्वपूर्ण कहती
है। सीधे अर्थों में यह कर्म के प्रति आस्थावान होने का संदेश देती है। कठिन
वर्तमान से दो-चार होना है, संघर्ष करते हुए कर्म-पथ पर प्रवृत्त होना है। कर्म के फल की आशा त्यागकर कर्म में
प्रवृत्त होना है। प्रसून जी की कविताओं में यह संदेश परिलक्षित होता है। वे लिखते
हैं-
साथ सभी के छल होता है, / हर मुश्किल का हल होता है ।
अपनी मंजिल को पा लेना, / इतना कहाँ सरल होता है ।
कभी अधर पर अमृत का प्याला, / तीखा कभी गरल होता है ।
जो भी होगा सुखमय होगा, /
होने दो जो कल होता है ।7
एक ओर कर्म पर भरोसा, तो दूसरी ओर प्रबल आत्मविश्वास अनागत
कविता में मुखरित होते हैं। दोनों ही एक दूसरे के लिए अनिवार्य हैं। प्रबल
आत्मविश्वास कर्म की श्रेष्ठता का, कर्म की सफलता का मानक बनता है, तो दूसरी ओर
कर्म में संलग्न होने की प्रवृत्ति आलस्य को त्यागकर आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यह
आत्मविश्वास भी प्रसून जी की कविताओं में मुखरित होता है। वे लिखते हैं-
मधुवनों की देह का शृंगार हम होंगे, / पतझरों के वास्ते
अंगार हम होंगे ।
वे सुनें जो कैद सूरज को किये बैठे, / कल सुनहरी धूप के
हकदार हम होंगे ।8
इसी प्रकार वे ‘नये तेवर दिखेंगे कल’ शीर्षक गीत में लिखते हैं-
नये तेवर दिखेंगे कल मचलती धार के जल में, / उगेंगे कल नये
सपने फलेंगी कल नयी कलमें ।
अजय बनकर विजय पाना हमारी कामना होगी, / इरादों का सँवर
जाना हमारी भावना होगी ।
प्रसून ऐसे भी दिन आयेंगे मन के छंद महकेंगे, / नयी होगी
चमक कल बाग की हर एक कोपल में ।9
अनागत कविता को स्पष्ट करते हुए प्रो. कौशलनाथ उपाध्याय
कहते हैं, कि- “ अनागत की कविता हमें सूर्य का पर्याय बनने के लिए प्रेरित करती
है। अँधेरे से उबरने की बात करती है। शूल चुभते हैं तो चुभें, लेकिन आस्था की
रश्मियों को हमें टूटने नहीं देना है। अक्षरों को हमें वो ताकत देनी है, जिस ताकत
के बल पर वह मानवता का कल्याण कर सके।”10 अनागत कविता वस्तुतः मानवता
की कविता है, भारतीय सनातन जीवन पद्धति और दर्शन के सूत्रों पर केंद्रित कविता है।
इस कारण मानवता और मनुष्यता का चिंतन अनागत कविता में परिलक्षित होता है।
वर्तमान जीवन की क्रूर और जटिल विषमताओं के बीच जब मनुष्य
के लिए जीवन जीना दुष्कर हो जाए, तब साहित्य का दायित्व अधिक बढ़ जाता है। साहित्य
से अपेक्षित होता है, कि वह समाज को प्रेरणा प्रदान करे। भारतीय वाङ्मय से लगाकर
संत साहित्य तक, भक्ति-साहित्य तक प्रेरणा का यह स्वर गुंजायमान होता रहा है।
स्वतंत्रतापूर्व और स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में यह परंपरा स्फुट रूप में,
किस-न-किसी तरह से जीवंत रही है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अनागत कविता
आंदोलन ने इस परंपरा के निर्वहन में अपनी सामर्थ्य भर योगदान दिया है। अनागत कविता
आंदोलन के प्रेरक-प्रवर्तक होने के नाते प्रसून जी की अनेक कविताएँ प्रेरणापरक
उद्बोधन करती हैं। प्रसून जी की बहुत चर्चित कविता है- सुख के सपने देख मछेरे। इसी
कविता से कुछ पंक्तियाँ बानगी के रूप में प्रस्तुत हैं-
सुख के सपने देख मछेरे! गुन-गुन गाये जा,
पायेगा तू सोन
मछरिया गीत सुनाये जा ।
बैठ निराशा वाले रथ में लक्ष्य विहीन न हो,
असफलताओं के दर्पण में इतना लीन न हो ।
साथ ये मौसम देगा तू मन को बहलाये जा ।।11
ऐसा ही एक और गीत द्रष्टव्य है-
सुनने वाले सभी प्रफुल्लित आनंदित जन जन हो जाये,
ऐसे गीत सुनाते जायें जीवन धन्य मगन हो जाये!
ओझल उदासीनता सारी मन की नगरी की करनी है,
दीन दुखी बेबस की पीड़ा मिलकर हम सबको हरनी है ।
हमें सृष्टि के हर हिस्से की रखवाली भी करनी होगी,
ऐसी करें कामना जग में सबमें अपनापन हो जाये ।12
अनागत कविता ने अपने लिए जिस दायित्व को चुना है, वह अद्भुत
है। यहाँ स्व के हित व कल्याण का भाव नहीं है। कविता को सभी के हित व कल्याण के
लिए प्रवृत्त होना है। उदासीनता को ओझल करना है, सभी के मन में उमंग और उल्लास
भरना है। दीनों-दुखियारों की पीड़ा को हरना है। इतना ही नहीं... मानवेतर तक की,
सृष्टि के हर हिस्से की रखवाली करनी है। अनागत कविता का यह दायित्वबोध मानवता के
हित की ओर उन्मुख है, समस्त जगत् के हित की भावना से आलोकित है।
अनागत कविता आंदोलन के प्रेरक व प्रवर्तक के रूप में डॉ.
अजय प्रसून ने जिस वैचारिक आंदोलन को हिंदी साहित्य के समक्ष प्रस्तुत किया, वह
भारतीय जीवन-दर्शन और भारतीय चिंतन परंपरा का महत्त्वपूर्ण अंग है। कर्मफल का
सिद्धांत, जीवन में सकारात्मकता का प्रवाह, मानवता की भावना, मनुष्यता की रक्षा,
आस्था और आत्मविश्वास के भाव प्रसून जी की रचनाओं में मुखर होते हैं। कठिन वर्तमान
को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना पर केंद्रित प्रसून जी की रचनाएँ साहित्य के
दायित्व का निर्वहन करते हुए समाज को दिशा भी दिखाती हैं, विचलित-व्यथित जनों
को जीवन जीने की राह भी बताती हैं, अनागत
के चिंतन से भी जोड़ती हैं। यहाँ यह भी बताना प्रासंगिक होगा, कि प्रसून जी मंच के
भी सिद्धहस्त कवि हैं। उनको सुनने के लिए लंबी प्रतीक्षा करने वालों की आज भी कमी
नहीं है। काव्य-मंचों से प्रायः सुनी-सुनाई जाने वाली प्रसून जी की प्रतिनिधि
कविता की निम्न पंक्तियाँ उनके काव्य-कौशल्य की बानगी हैं-
एक राह खोजिए हजार राहें पाइयेगा
लक्ष्य बिखरे पड़े हैं कितने स्वराज के
जिंदगी को कर्म में ही लीन होने दीजिए तो
द्वार खुल जायेंगे
ही मुक्ति के जहाज के ।।13
संदर्भ-
1. डॉ. अजय प्रसून, प्रार्थना यही है मातु शारदे, कालजयी हम प्यास लिये (अनागत गीत संग्रह), प्रका. अ.भा. अनागत साहित्य संस्थान, लखनऊ, सं. 2017, पृ. 22,
2. डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल, संपादकीय, नूतनवाग्धारा, बाँदा, अंक- 44-48, वर्ष- 14, दिसंबर- 2021, पृ. 07,
3. डॉ. अजय प्रसून, अनागत के लिये फिर भी..., आँसुओं का बयान जारी है (हिंदी गजल संग्रह), ममता प्रसून, लखनऊ, सं. 1997, पृ. 106,
4. डॉ. अजय प्रसून, जहाँ विगत है वहीं भविष्यत्..., आँसुओं का बयान जारी है (हिंदी गजल संग्रह), ममता प्रसून, लखनऊ, सं. 1997, पृ. 79,
5. डॉ. अजय प्रसून, जीवन है वह नदी, कालजयी हम प्यास लिये (अनागत गीत संग्रह), प्रका. अ.भा. अनागत साहित्य संस्थान, लखनऊ, सं. 2017, पृ. 119,
6. डॉ. अजय प्रसून, एक दिन आना हमारे पास, बाँसुरी की भीतरी तह में (अनागत कविता संग्रह), प्रका. अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान, लखनऊ सं. 1993, पृ. 29,
7. डॉ. अजय प्रसून, हर मुश्किल का हल होता है, आँसुओं का बयान जारी है (हिंदी गजल संग्रह), ममता प्रसून, लखनऊ, सं. 1997, पृ. 54,
8. डॉ. अजय प्रसून, भोर की पहली किरन का...., आँसुओं का बयान जारी है (हिंदी गजल संग्रह), ममता प्रसून, लखनऊ, सं. 1997, पृ. 68,
9. डॉ. अजय प्रसून, नये तेवर दिखेंगे कल, दर्पण शिलालेख हो जाये, भारतीय ज्ञान वीथिका, लखनऊ, सं. 1996, पृ. 45,
10. प्रो. कौशलनाथ उपाध्याय, अनागत की कविता आँधी में दीप जलाती है..., नूतनवाग्धारा, बाँदा, संपा. डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल, अंक- 44-48, वर्ष- 14, दिसंबर- 2021, पृ. 17,
11. डॉ. अजय प्रसून, सुख के सपने देख मछेरे, दर्पण शिलालेख हो जाये, भारतीय ज्ञान वीथिका, लखनऊ, सं. 1996, पृ. 36,
12. डॉ. अजय प्रसून, जीवन है वह नदी, कालजयी हम प्यास लिये (अनागत गीत संग्रह), प्रका. अ.भा. अनागत साहित्य संस्थान, लखनऊ, सं. 2017, पृ. 111,
13. अजय प्रसून, साहित्यिक पत्रिका दस्तावेज में प्रकाशित, अंक-51, जुलाई-2019।
{इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य (प्राचार्य डॉ. रावसाहेब जाधव अभिनंदन ग्रंथ), वान्या पब्लिकेशंस, कानपुर, संस्करण- 2025 में प्रकाशित}
- राहुल मिश्र

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