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Saturday, 5 September 2026

बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह

 






बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह


डॉ. अतुला भास्कर हिंदी साहित्य-जगत् में एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्य की विविध विधाओं में आपका लेखन है, और एक विशेष स्थान रखता है। आपका सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह इस क्रम की एक कड़ी के रूप में सामने है।

कविताई जब जीवन के गहरे अनुभवों से साक्षात् करते हुए आकार पाती है, तब उसकी गहनता, उसका घनत्व अपना प्रभाव स्थापित करता है। जीवन के अनुभव भी यदि कोरे घटनाक्रम न होकर चिंतन की एक दृष्टि को लेकर कविताई में समा गए हों, तो बात कुछ और ही हो जाती है। इतना ही नहीं, निजता का फैलाव दूर तक होता है, जिसमें व्यष्टि भी समष्टि को लेकर चल पड़ती है। स्वयं की वेदना केवल अपनी नहीं होती, इसमें सारा परिवेश झलकता है। काव्य-संग्रह की अंतिम कविता भले ही अंतिम हो, किंतु यहाँ से बात प्रारंभ करने का आशय अलग ही है। डॉ. अतुला जी लिखती हैं-

दुनिया जिसको पूजती / विवशता समाधि पर झुकती । / प्रपंच-पाखंड षड्यंत्र, जन-जन को छलें । / दायित्वों से दूर कर, वैमनस्यता को गढ़ें । / मोहन तुमको आना होगा, / मानवता का पाठ पढ़ाना होगा ।

समय के बंधन का, जीवन की बँधी-बँधाई लीक का सुंदर चित्रण गुलदान के फूलों, फड़फड़ाते पन्नों और घड़ी की सुइयों से दिया गया है। ये बिंब अनूठे हैं, और जीवन की गति बहुत सहजता के साथ बताते हैं।

गुलदान में मुस्कुराते फूल / हवा से फड़फड़ाते पन्ने / जिंदगी की रफ्तार सुनाते / घड़ी का अनुशासन / सुइयों का खेल / अपनी लय / अपनी चाल / कभी दूर / कभी पास / कभी जुड़ाव / कभी बिखराव / सबक सिखाते / मिलें-बिछुड़ें / पर रुके नहीं ।।

मानव-जीवन भी वस्तुतः एक ऐसे बंधन में बँधा हुआ है, जो प्रत्यक्ष नहीं है। इस बंधन में बँधकर जिस विवशता, बेचैनी, व्याकुलता, संत्रास और तनाव में जीते हैं, उसे अपने परिवेश में, अपने आसपास सहज ही देखा जा सकता है। इस विषमता के मध्य डॉ. अतुला जी बहुत सरल बिंब के सहारे गूढ़ बात कहती हैं। गुलदान के पुष्प गुलदान के बंधन में रहकर भी मुस्कुराते हैं। पन्ने जिल्द में बँधे हैं, फिर भी फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व की अनुभूति कराते हैं घड़ी की सुईयाँ एक बँधी गति से चलती हैं, चलती ही जाती हैं। मानव का जीवन भी इन्हीं से सीख लेकर चल सकता है।

अतुला जी के काव्य-संग्रह की यह बड़ी विशेषता है, कि हर एक कविता एक कैनवस पर उतारे गए सरल-से, बहुत संयत और सौम्य-शांत आकार की तरह दिखती है। जटिल-से भड़कीले रंग-विन्यास यहाँ नहीं हैं। उनकी कविताएँ जीवन के सामान्य-से प्रसंगों को लेकर रची गईं हैं। दैनंदिन जीवन की गतिविधियाँ किस तरह से विचारों की वीथियाँ सहेजे होती हैं, अतुला जी की कविताओं में देख सकते हैं। संग्रह की दूसरी कविता से बानगी देखिए-

वो रास्ता / था जिससे / रोज का वास्ता / स्कूल का, / कालेज का, / यूनिवर्सिटी का, / मंजिल पर पहुँचा / क्यों दूर हो गया?

रास्ते और मंजिलें एक-दूसरे की पूरक भले ही हों, लेकिन एक बार में केवल एक ही साथ होता है। रास्ते पूरे होते हैं, तो मंजिल मिलती है और मंजिल मिल जाती है, तो रास्ते छूट जाते हैं। ऐसे ही छूट जाते हैं कई लोग, जो रास्ते में मिलते हैं। मंजिल की अपनी शर्तें होती हैं। वहाँ रास्ते के लोग साथ नहीं होते। मंजिल के साथ पाई हुई सफलता राह के अनेक साथियों को छोड़कर हासिल होती है। ‘रास्ता’ कविता इसी भावधारा में बुनी गई है। रास्ते और मंजिल की क्रमशः गति में कोई अवकाश नहीं है, शिकवा-शिकायत का, अपने-पराए का, किसी भावना में बँध रहने का.... गति यही है।

अतुला जी की कविताओं की यह बड़ी विशेषता है, कि वे जीवन के सरल-सहज ‘स्केच्स’ में चिंतन के रंग भरती हैं, जिनमें कहीं अध्यात्म भी होता है, तो कहीं पर दर्शन भी...। ‘आत्मा’ कविता में वे सवाल उठाती हैं, कि आखिर मृतक से भय क्यों है? मृतक का तुरंत ही क्रिया-कर्म कर दिया जाता है। वह चालाकी-बेईमानी-मक्कारी जैसे जीवधारियों के लक्षणों से दूर है। उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है, जो ऐसे दुर्गुणों से दूर है। वह तो शांत है, तटस्थ है। फिर भी यदि समाज ऐसा करता है, तो निःसंदेह समाज इन दुर्गुणों से विचलित नहीं है। जो इन दुर्गुणों से मुक्त है, जो शरीर के बंधन से मुक्त है, वह समाज के लिए विचलन उत्पन्न कर रहा है।कहा जा रहा है, कि समाज में विचलन दुर्गुणों के कारण नहीं, दुर्गुणों से मुक्ति के कारण है... समाज इन दुर्गुणों को स्वीकारता है, इनके साथ जीता है। एकदम अलग दृष्टि इस कविता में देखने को मिलती है। कवयित्री सीधे यह भी स्पष्ट कर देना चाहती है, कि हमारा समाज जीवन-धारियों के लक्षणों में दुर्गुणों को गिनता है।  

सवाल है कि / भय मृतक से क्यों? / चालाकी, बेईमानी / मक्कारी, छल औ कपट / जीवन धारियों के लक्षण / आत्मा की शांति / प्रार्थना और कामना / उसके लिए क्यों? / जो पहले ही से / पूर्णरूपेण शांत, / तटस्थ और निर्लेप।

विदाई समारोह में / उपस्थित अन्य जन / अशांत-व्याकुल-बेचैन, / चिंतातुर और परेशान ।

ऐसी ही एक अन्य कविता है- आदमी। आदमी जिस रूप को पाया है, उसके लिए वह दोषी नहीं है, क्योंकि रंग और रूप का गढ़ा जाना उसके हाथ में नहीं, लेकिन वह आदमी तो बन सकता है, आदमीपन तो उसके वश में है। मानवीयता के लिए किसी रंग किसी रूप की आवश्यकता नहीं होती, उलटे यह गुण रंग-रूप की विरूपता को ढक लेता है, लेकिन आदमीपन की चिंता अकसर रूप-सौंदर्य की चिंता के नीचे दबकर रह जाती है।

आदमी अपने रूप / के लिए नहीं / ‘आदमी’-पन के अभाव / के लिए दोषी । ‘आदमी’-पन का / वह स्वयं निर्माता / पर रूप बनाना / उसकी विवशता ।।

‘फर्क तो पड़ता है’ कविता भी मानव-स्वभाव की पड़ताल करती है। एक भेद, जो अपने और पराए के बीच होता है, वह भावनात्मक रूप से भी एक अंतर तैयार करता है। अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। जब इस अंतर को मिटाकर अपने लोग पराए जैसा व्यवहार करने लगें, तो मन को बहुत पीड़ा होती है। लेकिन आज के समय की यह भी कड़वी सच्चाई है।

संग्रह की कविताएँ स्त्री-मन का पाठ एकदम अलग तासीर में करती हैं। ‘चुप रहना’ कविता में स्त्री की नियति को बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया गया है। उम्र के किसी भी पड़ाव में उसके हिस्से केवल चुप रहना ही आता है। तमाम संघर्षों, समस्याओं और चुनौतियों के बाद भी वह अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होती, लेकिन बदले में उसे सब सहते हुए चुप रहना होता है। हर बेटी को अपने पिता का घर बहुत प्रिय होता है। वहाँ उसके बचपन की स्मृतियाँ सहेजी हुई होती हैं। बाबुल के घर का लगाव कविता के पहले हिस्से में यक्साँ है। माता-पिता के साथ बेटी मुखर होती है, लेकिन उसके जीवन का दूसरा पड़ाव उसके लिए मौन लेकर आता है। कविता का तीसरा भाग पाठकीय चेतना को झकझोर देता है। माँ का सारा त्याग और समर्पण अपने बच्चों के लिए है, लेकिन उम्र का पड़ाव कहें, पीढ़ियों का अंतर कहें, या बदलते समय की विवशता कहें, माँ चुप ही रह जाती है।

मैं माँ / ममतामयी आँचल / शीतल छाया / ढेरों आशीर्वाद / ढेरों मन्नतें / बहुत सारा प्यार / खूब सा दुलार / मुसीबतों की ढाल / माँ तो आखिर माँ / है एक शर्त / है चुप रहना / मन में ही रखना / कुछ नहीं कहना ।।

कविता-संग्रह से चुनकर कुछ कविताओं का अलग से उल्लेख करते हुए समूचे संग्रह पर बात करना आसान होगा। इस दृष्टि से अलग-अलग तासीर की कविताओं का ऊपर उल्लेख किया है। डॉ. अतुला जी की लेखनी विविध विषयों पर चली है। कहीं पर वे अतीत की परतों को खँगालती हैं, तो कहीं भविष्य का ताना-बाना बुनती हैं। उनकी एक कविता है- फतेहाबाद। अपने कर्मक्षेत्र को वे इस कविता के सहारे याद करती हैं। ‘हल्कू’ कविता में अलग-अलग कृतियों के पात्र एकसाथ आए हैं, जो आज के जटिल समय की चुनौतियों से साक्षात् कर रहे हैं।

संग्रह की कुछ कविताएँ, जैसे- खुश्क रोटी, माँ, जिम्मेदारी, औरत, घर....अलग तरीके से अपनी ओर खींचती हैं। कविताएँ तो क्या हैं, क्षणिकाएँ हैं....। एक साँस में पढ़ जाइए। लेकिन इसके बाद आप सरलता से निकलकर नहीं जा सकते। बहुत सामान्य-सी बातें, दैनंदिन जीवन की घटनाएँ इनमें हैं, लेकिन बहुत गहरे उतरकर अपना असर छोड़ती हैं, ‘सतसैया के दोहरे’ की तरह। बिहारी सतसई के दोहे बहुत छोटे थे- ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।’ अतुला जी की इन क्षणिकाओं के लिए यह उपमा मेरे हिसाब से बहुत सटीक बैठती है। पिता किस तरह अपने जीवन को गलाता है, अपने सुखों की कटौती करके कैसे बच्चों के लिए सुख जुटाता है। ‘खुश्क रोटी’ पढ़कर ऐसे अनुभव से आप गुजरेंगे, जिसे अपने साथ या अपने परिवेश के साथ घटता हुआ पाएँगे। इस दृष्टि से भी कविताएँ बड़े मार्के की हैं। जीवन का कड़वा यथार्थ परिवार के संदर्भों में दिखता है। समय और समाज की सच्चाई अनेक स्थानों पर देखी जा सकती है, लेकिन इतनी सहजता के साथ समय और परिवार की कड़वी सच्चाई को लेखनी के सहारे उतार पाना सिद्धहस्त सृजनधर्मी के वश की बात ही होती है, और कहना न होगा कि डॉ. अतुला जी ने अपनी रचनाधर्मिता को, अपने सृजन को इसी ऊँचाई पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है।

संग्रह का पहला हिस्सा समय और परिवार का दिखता है, तो दूसरे हिस्से में ‘मशाल’, ‘टीआरपी’, ‘शुक्रिया’, ‘परिचय’ और ‘सोशल मीडिया’ जैसी कविताएँ आती हैं। समय और समाज की सच्चाई अतुला जी के यहाँ घटनाओं के वर्णन तक सिमटी हुई नहीं हैं। कह सकते हैं, कि घटनाएँ तो केवल संदर्भ के लिए हैं। वस्तुतः विचारों की लंबी वीथिका इन छोटी-छोटी घटनाओं के बीच से गुजरकर जाती है। मानों किसी गलियारे से होकर जीवन के सफर को तय कर रहे हों, और गलियारे के दोनों ओर ऐसी घटनाओं की झलकियाँ दिखती जाएँ। कविताएँ पाठकीय चेतना को झंकृत कर देती हैं, सोचने के लिए विवश कर देती हैं। ‘सोशल मीडिया’ में व्यंग्य का हल्का-सा पुट जो है, वो ठहरकर सोचने के लिए विवश कर देता है, कि सोशल मीडिया के इस दौर में हम कहाँ पर हैं? कहना न होगा, कि कविता की निम्न पंक्तियाँ एक मानदंड ही बन जाती हैं, पाठक के लिए...। खुद का आकलन कर लेने के लिए..।

वाह!!! / आदर्श समाज / की ओर बढ़ते कदम / सभी परमज्ञानी ।

ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध,बेईमानी / सब पर विजय ।

चारों तरफ सब कुछ / अच्छा ही अच्छा ।

सुख में दुःख में / उपस्थिति जरूरी / अजी, बिलकुल नहीं / संदेश भेजें और / कर्त्तव्यपूर्ति सुगम ।

संग्रह के तीसरे हिस्से में ऐसी कविताएँ रखी जा सकती हैं, जिनमें विचारों की गहनता अपेक्षाकृत घनीभूत होती है। अतुला जी इन कविताओं में ऐसे प्रतीकों का प्रयोग करतीं हैं, जो वैचारिकी को सांद्र कर देते हैं। बानगी के तौर पर देखिए-

दोमुहाँ अजब संस्कार / संबंधों की बंजर भूमि / पर रेंगते व्यवहार.....

साधना की धूनी का , धुआँ है अखरता ।....

योग्य वही अभिनय के, जिनके अंग अंग हैं हिलते । / टूटी कमर है जिनकी उन्हें ही सिंहासन हैं मिलते ।

ऐसे समय में सावधानी / हमारी आस्तीनों में चौकस रहती है ।

संग्रह की अधिकांश कविताएँ भविष्य के प्रति आस्था को ध्वनित करती हैं। अनागत कविता आंदोलन के ध्येय-वाक्य की छवि संग्रह में दिखती है। कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना विभिन्न कविताओं में दिखती है। बानगी के तौर पर एक कविता का उल्लेख यहाँ पर करना होगा। ‘सांध्य वेला’ वस्तुतः संध्याकाल का सुंदर चित्र खींचती है, वह भी लयबद्धता के साथ..। यह ‘सांध्यवेला’ अपने साथ जिस सुखद कामना को लेकर आ रही है, वह सांध्यवेला को उजास की वेला बना देती है-

सुनसुन के नीड़ों से चिड़ियों का कलरव, / प्रियतम का पथ जोहे मतवाली हरपल ।।

समग्रतः, संग्रह की सभी कविताएँ ऐसा वितान रचती हैं, जिसमें जीवन के अलग-अलग रंग कहीं चटकीले, तो कहीं सुंदर-सौम्य होकर उभरते हैं। कविता-संग्रह की यह ऐसी विशिष्टता है, जो सहज ही प्रस्फुटित होती है और संग्रह से साक्षात् करते हुए पाठक को अपने आकर्षण में  बाँधती चली जाती है। कृति न केवल पठनीय है, अपितु संग्रहणीय भी है।

(डॉ. अतुला भास्कर की काव्य-कृति शब्द-सेतु, प्रकाशक ज्ञानगीता प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

अब जमाने को खबर कर दो कि ‘नीरज’ गा रहा है...

 


अब जमाने को खबर कर दो कि ‘नीरज’ गा रहा है...

शोषणों की हाट से लाशें हटाओ,
मरघटों को खेत की खुशबू सुँघाओ,
पतझरों में फूल के घुँघरू बजाओ,
हर कलम की नोक पर मैं देखता हूँ,
स्वर्ग का नक्शा उतरता आ रहा है।
अब जमाने को खबर कर दो कि 'नीरज' गा रहा है ।1

ये पंक्तियाँ पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ के बहुत चर्चित गीत की हैं। इन पंक्तियों को सप्रयोजन उद्धृत करते हुए बात को प्रारंभ किया है। पंक्तियाँ लेखनी में उस ऊर्जा के प्रवाह की बात कर रहीं हैं, जो अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार करती है। नीरज जी का यह गीत आह्वान-गीत भी है, जो अनेक गीतकारों का आह्वान करता है- गीत में वह सामर्थ्य उत्पन्न हो, कि वह जन-जन की वाणी बने। गीतकार केवल प्रेम तक सिमट न जाए, वह प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री न माल ले...। गीतकार के गीतों में यथार्थ उतरे, जीवन का संघर्ष और जीवनीय शक्ति उतरे, नीरज ऐसी कामना भी करते हैं।

एक सामान्य पाठक और नीरज के गीतों पर मुग्ध होने वाले सामान्य श्रोता तक संभवतः उपरोक्त वर्णित भाव संप्रेषित होगा। लेकिन एक स्थान पर इस गीत के साथ नीरज जी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन अलग ही किया गया है। उसे उद्धृत करने से विषयगत संदर्भ अधिक स्पष्ट हो सकेगा। रमेश रंजक अपनी पुस्तक- ‘नये गीत का उद्भव और विकास’ में लिखते हैं-

“नीरज की खुद्दारी लोकप्रियता के दंभ में से फूटती है-

खबर कर दो जमाने को नीरज गा रहा है।

यह पंक्ति उनकी लोकप्रियता का ही दंभ है जो ‘मैं ही चुप हो गया अगर तो युग का कीर्तन कौन करेगा’ तक अपनी लोकप्रियता की आड़ में सर्जक की खुद्दारी का भ्रम फैलाती चली जाती है, जबकि त्यागी (रामावतार त्यागी) की खुद्दारी एक सर्जक की खुद्दारी है, इसलिए वह पाठक और श्रोता दोनों को ही प्रिय है।”2

एक गीतकार की दूसरे गीतकार से तुलना करती हुई इस टिप्पणी से गीतकार नीरज जी के कृतित्व पर आलोचक की पूर्वाग्रही दृष्टि का आभास होता है। काव्य-गोष्ठियों, गीतों के समारोहों आदि में मधुर और सधे हुए कंठ से गीतों-कविताओं को प्रस्तुत करने वाले कवि और गीतकार श्रोताओं को अपने आकर्षण में बाँधने की सामर्थ्य रखते हैं। गीतकार नीरज के कंठ में वह मधुरता थी, जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक तेजी से पहुँचाया। मंचीय कविता का कवि साहित्य के स्थापित कवियों से अधिक ख्याति अर्जित कर रहा था। यह भी एक बड़ा कारक उपरोक्त टिप्पणी के पीछे दिखता है। संदर्भगत विषय पर उल्लेख करना उचित होगा, कि प्रसिद्धि के शीर्ष तक पहुँचने वाले कवि नीरज के लिए यह प्रसिद्धि भी अनेक आलोचनाओं, विरोधों, कटूक्तियों और चुनौतियों से भरी रही है। जाने-माने कवि व आलोचक शेरजंग गर्ग द्वारा संपादित पुस्तक है- हमारे लोकप्रिय गीतकार : गोपालदास नीरज। इस कृति की भूमिका में संपादक ने विस्तार के साथ नीरज जी के सृजन को विश्लेषित किया है। वे लिखते हैं-

“उनके फिल्मी गीत भी इस कदर सराहे गए कि ईर्ष्यालुओं की भीड़ लग गई। हुआ यों कि हिंदी गीतकारों में प्रदीप, नेपाली, नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, इंदीवर के साथ-साथ ‘नीरज’ भी एक स्टार गीतकार बन चुके थे।

परंतु यह भी एक सच्चाई है कि साहित्य की दुनिया में समीक्षकों, आलोचकों ने ‘नीरज’ को अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया। उन्हें मात्र कवि सम्मेलनी और नई काव्य चेतना से बेखबर बताया। उस समय के अधिकांश गीत कवियों को ‘गीतकार’ की संज्ञा देकर उपेक्षा भाव से खारिज कर दिया गया। ‘गीतकार’ शब्द के प्रयोग में निहित उपेक्षा की गंध छिपी नहीं रह सकी। इससे ‘नीरज’ के अहं को ठेस लगी और उन्होंने मात्र प्रयोगशील छंद विहीन, व्यक्तिवादी कविता को ही काव्य मानने वाले समीक्षकों के प्रति निम्नांकित आक्रोश व्यक्त किया है-

दोस्त ! तुम ठीक ही कहते हो / सचमुच मैं कवि नहीं हूँ ! / होते हैं कवि, वे नहीं गाते हैं / दुखी दलित जनता के पास नहीं जाते हैं, / जाते भी हैं, तो शरमाते हैं ।”3

नीरज जी गीतों के बड़े पक्षकार थे। उन्होंने गीतों को शृंगारिकता की पहचान से अलग करते हुए व्यापक सामाजिक व मानवीय सरोकारों के साथ जोड़ा। समीक्षकों व आलोचकों द्वारा गीतों की उपेक्षा पर नीरज जी की प्रतिक्रिया इस तथ्य को स्पष्ट करती है। कविता के प्रति उनकी दृष्टि स्पष्ट है। विशेष रूप से गद्य-कविता, जो आधुनिक प्रगतिशील साहित्य की परिचायक थी; साथ ही हिंदी काव्य-जगत में यत्नपूर्वक स्थापित किए जाने वाले पाश्चात्य प्रभावों का मुखर विरोध उनकी लेखनी में दिखता है।

“कविता के संबंध में ‘नीरज’ ने ‘दर्द दिया है’ की भूमिका में कहा है- जब लिखने के लिए लिखा जाता है तब जो कुछ लिखा जाता है उसका नाम है गद्य। पर जब लिखे बिना न रहा जाए और जो खुद लिख-लिख जाए उसका नाम है कविता। मेरे जीवन में कविता लिखी नहीं गई खुद ‘लिख-लिख’ गई है, ऐसे ही जैसे पहाड़ों पर निर्झर और फूलों पर ओस की कहानी। जिस प्रकार ‘जल-जलकर बुझ जाना’ दीपक की विवशता है। उसी प्रकार ‘गा-गाकर चुप हो जाना’ मेरे जीवन की मजबूरी है। गा-गाकर चुप हो जाने की इस मजबूरी के कारण ही नीरज ने जो भी लिखा है गाकर लिखा है, गाते हुए लिखा है।”4

गीतकार नीरज के कृतित्व के अनेक पक्ष हैं। उनकी पहचान एक गीतकार के रूप में है, और यह भी नितांत सत्य है, कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बनी है। उनकी दूसरी पहचान मंच के कवि की है। मंचीय कविता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में वे जाने जाते हैं। फिल्मी गीत और मंचीय कविताएँ-गीत आदि साहित्य द्वारा मान्य की गई कविता के दूसरे छोर में दिखती या रखी जाती रहीं हैं। आलोचकों व समीक्षकों के लिए फिल्मी गीतों और मंचीय कविताओं आदि को स्वीकार करना कठिन रहा है। इस कारण नीरज जी का कवि-रूप अधिक उभरकर सामने नहीं आ सका। लेकिन उनकी स्पष्ट दृष्टि हिंदी काव्य-जगत को समृद्ध करने वाली है। एक भावुक और सहृदय कवि ही कविता की इतनी स्पष्ट और सरल व्याख्या कर सकता है। कविता सहज ही ‘लिख-लिख’ जाती है, यह कथन आद्यकवि वाल्मीकि के ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगः ....’ का स्मरण करा देती है। क्रोंच के वध से आहत होकर वाल्मीकि के मुख से अनायास फूट पड़ने वाले ये शब्द ही तो पहली कविता बने थे।

पद्मश्री गोपालदास नीरज का जीवन अनेक संघर्षों की गाथा है। बचपन से ही उन्होंने अनेक कष्ट भोगे, उपेक्षाएँ-प्रताड़नाएँ सहन कीं, आर्थिक अभावों से दो-चार हुए और ऐसी जटिलताओं के बीच अपने जीवन-संघर्ष में कभी हार नहीं मानी। उनका जीवन-संघर्ष उनकी कविताओं में झलकता है। समय की त्रासद स्थितियों के साथ एकाकार उनके जीवन का संघर्ष उनका निजी नहीं रह जाता, प्रत्युत् उसमें वृहत्तर समाज का संघर्ष परिलक्षित होता है। नीरज की कविताएँ और उनके गीत इन्हीं संघर्षों से निकले हैं। इसी कारण वे डटकर कहते हैं-

“अँधियारा जिससे शरमाये / उजियारा जिसको ललचाये, / ऐसा दो दो दर्द मुझे तुम / मेरा गीत दिया बन जाये ! ।

उनकी लाठी बने लेखनी / जो डगमगा रहे राहों पर, / हृदय बने उनका सिंहासन / देश उठाये जो बाँहों पर ।

श्रम के चरण चूम आयी / वह धूल करे मस्तक पर टीका, / काव्य बने वह कर्म, कल्पना- / से जो पूर्व क्रिया बन जाये ! ।“5

कवि नीरज की कविताओं और गीतों में अभिव्यक्त पीड़ा और कष्टों के साथ ही विद्रोह का भाव व्यक्त होता है। वे अपने सृजन में समय के सत्य से स्वयं को एकाकार करते हुए दिखते हैं। उनके जीवन की भोगी हुई सच्चाई उनकी लेखनी को अधिक सामर्थ्यवान बनाती है। वे संपूर्ण मानवता के दुःख-दर्द के साथ ही सामयिक संदर्भों के प्रति भी जागरूक रहते हैं। कवि नीरज के कृतित्व के साथ ‘नीरज की पाती’ का अनूठा संयोग है। इसी नाम से प्रकाशित उनकी कृति भी है। इसमें नीरज की पंद्रह पातियाँ संकलित हैं। अलग-अलग संदर्भों में लिखी ये पातियाँ कवि नीरज के कृतित्व को समझने के साथ ही सजग, सक्रिय कवि के रूप में नीरज के सृजन से साक्षात्कार कराती हैं। देश-दुनिया में हो रही घटनाओं के साथ ही भारतीय समाज-जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को वे अपनी पातियों का विषय बनाते हैं। नीरज की पाती में एक पाती है- काश्मीर के नाम। वे काश्मीर की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हैं। राजनीतिक कारणों से काश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता पर लग गए ग्रहण पर वे कटाक्ष भी करते हैं, और साथ ही काश्मीर का आह्वान भी करते हैं, कि वह विभाजनकारी प्रवृत्तियों का प्रतिकार करने हेतु तत्पर हो। वे लिखते हैं-

“भँवरो की गुनगुन वाले ।

फूलों की रुनझुन वाले ।

पाटल रूप रतन वाले ।

ओ शरमीले काश्मीर उठ । दुश्मन को ललकार दे ।

झूम उठे खैबर-हिन्दूकुश, ऐसी नयी बहार दे !

सरहद पर बारूद लिये है आँधी खड़ी तलाश में,

घुला हुआ है जहर हवा में, धुँआ घिरा आकाश में,

लंदन से वाशिंगटन और कराची से लाहौर तक

तुझे मिटाने की हर कोशिश है मजहबी लिबास में

चढ़ती हुई उमर वाले ।
उठती हुई लहर वाले ।
उगती हुई सहर वाले ।“6

कवि नीरज जटिल और गूढ़ बातों को अत्यंत सहजता के साथ कह देने में सक्षम हैं। उपरोक्त पंक्तियों में काश्मीर-समस्या पर उनका संकेत अनेक लंबे-चौड़े वक्तव्यों से कहीं अधिक गहनता लिए हुए है। वे अत्यंत सहजता के साथ काश्मीर की समस्या को रेखांकित कर देते हैं। इसी क्रम में उनकी अगली पाती है- पाकिस्तान के नाम। इस पाती में वे पाकिस्तान को उसकी करतूतों के लिए चेताते हैं। वे धर्म के नाम पर उत्पन्न हुए विभेद को मानवता के लिए कलंक बताते हुए पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देते हैं। वे कहते हैं-

“है घृणा अंधी, न सहती रोशनी उसकी नजर है,

वह न यह भी जानती मस्जिद किधर-मन्दिर किधर है?

वह बढ़ी यदि तो दुबारा कारवाँ वीरान होगा

हम भले हों, किन्तु धरती पर नहीं इन्सान होगा ।“7

दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी नीति के नाम और पुर्तगाल के नाम पातियों में कवि नीरज ने तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय विषयों को उठाया है। इन पातियों में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ज्वलंत विषयों का संकलन नीरज जी की समसामयिक विषयों पर जागरूकता और एक समर्पित भारतीय की भावना का दर्शन होता है।

नीरज की पाती में कवि नीरज का दार्शनिक-आध्यात्मिक पक्ष भी स्पष्ट होता है। यह उनके व्यक्तित्व की अनूठी विशेषता है, जो प्रायः अचर्चित रही है। कवि नीरज का स्वभाव गहन चिंतन में डूबे अध्येता की भाँति रहा है। उनके चिंतन की दृष्टि आध्यात्मिक पुट लिए हुए है। इसके साथ ही उनकी अन्यतम विशिष्टता है- चिंतन-दृष्टि के साथ यथार्थ का तालमेल। वे जीवन की कठिनाइयों के मध्य स्वयं को रखकर विचार करते हैं, और चिंतन की अपनी दृष्टि से जीवन का सहज मार्ग तलाशने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि से उनकी पाती- ‘कल्पना के नाम’ विशेष उल्लेखनीय है। इसमें वे कल्पना और यथार्थ के दोनों विपरीत ध्रुवों की पड़ताल करते हुए कल्पना में जीने वाले लोगों को यथार्थ के धरातल पर उतरने का संकेत करते हैं। वे लिखते हैं-

“भूख ने चाटकर ठठरी कर दी कंचन काया,

भर दिया प्यास ने लावा सूखे प्राणों में ।

पर वो होगी साकार एक दिन इसलिए,

मैं खड़ा रहा इन जलते रेगिस्तानों में ।“8

इसी क्रम में वे आगे यथार्थ की बात करते हैं-

“मेरे यथार्थ आ ! तू कुरूप ही सही मगर,

तुझमें से ही जीवन की तो आहट आती है ।

तेरे तन पर रेशम न सही, टाट ही सही,

पर थकी साँस छाँह तो वहाँ पाती है ।”9

कवि का स्पष्ट संकेत उन लोगों के लिए है, जो यथार्थ से विमुख होकर कल्पना-जगत में गोते लगाते रहते हैं और अंत में अपने जीवन में हताश व निराश होकर कठिनाई में पड़ जाते हैं। नीरज जी की यह दृष्टि निःसंदेह उनके जीवन-संघर्षों और कठिन चुनौतियों से जुटाए गए अनुभवों के फलस्वरूप विकसित हुई है।

नीरज की एक पाती समकालीन गीतकारों के नाम भी है। यह पाती अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रसंगवश उल्लेख करना होगा, कि कवि नीरज की रचनाओं में अन्याय के साथ ही कुटिलतापूर्ण-पक्षपातपूर्ण-द्वेषजनित व्यवहार के विरुद्ध तीव्र प्रतिकार का स्वर मुखर होता है; लेकिन यह प्रतिकार, यह विद्रोह कहीं पर भी अपनी सीमा नहीं लाँघता है..... शालीन और संयत रहता है। यह कवि नीरज के व्यक्तित्व की भी अन्यतम विशिष्टता है। ‘समकालीन गीतकार के नाम’ में इसे देखा जा सकता है। वे लिखते हैं-

“है गीत सृष्टि का दर्पण, अर्पण आत्मा का

वह नहीं मरा है, नहीं कभी मर सकता है ।

यह गद्य-बुद्धि का वैभव दुर्ग गढ़े कितने

बिन राग न कोई रीता घट भर सकता है ।

हर श्वाँस एक बाँसुरी, देह हर वृन्दावन

हर प्राण कृष्ण, हर आयु एक ग्वालिनिया है

पर जिसकी लय पर थिरक रही है हर मटकी

वह और न कुछ, बस गीत बताती दुनिया है ।“10

समकालीन गीतकार के नाम इस लंबी पाती में नीरज जी ने गीतकारों को संबोधित करते हुए अपनी बात कहते-कहते अपने समय के उन साहित्यकारों, समीक्षकों, आलोचकों की भी अच्छी खबर ली है, जो आत्ममुग्धता में स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, अन्य के प्रति उनके मन में अच्छे भाव व विचार नहीं रहते। गीतकारों के प्रति समीक्षकों-आलोचकों के विचार का उल्लेख इसी आलेख में पहले भी किया है, जो संदर्भगत विषय में भी ध्यातव्य है। इसी तरह गद्य-कविता का उल्लेख भी नीरज जी ने किया है। वे स्पष्ट करते हैं, कि गीतकार भले ही उपेक्षित हो जाएँ, लेकिन यह सत्य है, कि गीत का महत्त्व सदा-सर्वदा रहेगा। ‘गद्य-बुद्धि का वैभव’ भले ही अपने दुर्ग गढ़ ले, लेकिन रीता घट तो राग ही भर सकता है। गीत ही है, जिसकी लय पर हर कोई थिरकता है। इस तरह नीरज गीतों का महत्त्व स्थापित करते हैं, और गीतकारों को प्रेरणा देते हैं, कि वे आलोचनाओं से हताशा व निराशा हुए बिना गीतों का सृजन करते रहें, जीवन के उल्लास व उमंग को.... सकारात्मक बातों को गीतों में उतारते रहें।

नीरज जी के गीतों का विपुल संसार है। सामयिक-सामाजिक संदर्भों के साथ ही नीति-नैतिकता-मानवता से जुड़े उनके अनेक फिल्मी गीत लोकप्रिय हुए हैं। इन गीतों पर फिल्मी गीत होने का ठप्पा लगा होने के कारण ये साहित्यिक दृष्टि से विश्लेषित-विवेचित नहीं हुए। इनमें से एक गीत का प्रसंग प्रायः चर्चा में आता है। इसका उल्लेख राजीव कुमार श्रीवास्तव अपने संस्मरण में करते हैं। वे लिखते हैं- “मनोज कुमार अभिनीत फिल्म ‘पहचान’ (1970) में शंकर-जयकिशन के संगीत में जिस एक गीत ने संगीत प्रेमियों के अधर पर अपना डेरा लगाया था वो मुकेश के स्वर में एक कालजयी रचना बनकर आज भी मानवता का पाठ पढ़ा रही है- ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ’... इस पंक्ति के लिए नीरज स्वयं अंतिम समय तक कहा करते थे कि यह मेरे जीवन का सूत्र वाक्य है।”11

कवि नीरज ने हिंदी सिनेमा के गीतों को नई दिशा देने का काम किया है। हिंदी सिनेमा के गीतकारों की कड़ी में नीरज अलग ही पहचान बनाते हैं। गीतों के विशाल भंडार में कुछ ऐसे गीत भी हैं, जिनके साथ हिंदी सिनेमा के गौरवपूर्ण अतीत का अध्याय जुड़ा है। राजकपूर की बहुचर्चित फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गाना- ‘ए भाई ! जरा देख के चलो.. आगे ही नहीं पीछे भी.. ऊपर ही नहीं नीचे भी....’ नीरज ने लिखा था, और यह अपनी तरह का अनूठा गाना है, जिसमें गीत के मुखड़े, लय, ताल आदि एकदम अलग हैं। गाने को संगीत भी नीरज जी ने ही दिया था। गाने की विशेषता यह है, कि यह जोकर के चरित्र पर सटीक बैठता है, और इस संसार की रीति-नीति को देखते हुए सँभलकर चलने की सीख अनूठे तरीके से देता है।

ऐसा ही दूसरा प्रसंग देवानंद की फिल्म ‘गैम्बलर’ के गीत- ‘चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है, देखो देखो टूटे ना...’ को लेकर है। इसी गीत में आगे नीरज जी ने लिखा है- ‘मेरा प्यार है चूड़ी जैसा जिसका ओर न छोर, यहाँ नहीं वहाँ नहीं देखो कभी टूटे नहीं... जीवन की ये डोर...’। नीरज ने निःछल-निःस्वार्थ प्रेम की चिरंतनता को अत्यंत सहज भाव से कह दिया है। प्रेम की एकदम अनूठी और अलग परिभाषा ही यहाँ देखी जा सकती है।

ऐसे अनेक प्रसंग कवि नीरज के साथ जुड़े हुए हैं। उनकी कविताएँ, उनके गीत भावों और विचारों की गहराई लिए हुए हैं। हिंदी सिनेमा के लिए उन्होंने ऐसे गीत रचे हैं, जिनसे हिंदी सिनेमा समृद्ध हुआ है। इसके साथ ही हिंदी के काव्य-मंचों को उन्होंने अपने गीतों से एक नया आयाम दिया है। कवि नीरज को सुनने के लिए लोग घंटों प्रतीक्षा करने और लंबी यात्राएँ करने के लिए तत्पर रहते थे। इसके साथ ही हिंदी के काव्य-संसार को अपनी ‘गीतिकाओं’ के माध्यम से नई विधा देने वाले कवि नीरज का साहित्यिक अवदान भी कम नहीं है। भारत और भारतीयता की पहचान को अपने गीतों के माध्यम से, हिंदी की सेवा के माध्यम से विश्वमंच पर स्थापित करने वाले कवि नीरज जीवन-पर्यंत सिद्धांतों पर अडिग रहे, मानवता की सेवा के लिए समर्पित रहे, और आवश्यकता पड़ने पर हर समय मोर्चे पर अड़े भी रहे। कवि नीरज की निम्न पंक्तियाँ उनको ही समर्पित हैं-

इस सभा की साजिशों से तंग आकर, चोट खाकर

गीत गाए ही बिना जो हैं गए वापिस मुसाफिर

और वे जो हाथ में मिजराब पहले मुशकिलों की

 दे रहे हैं जिंदगी के साज को सबसे नया स्वर

मौर तुम लाओ न लाओ

नेग तुम पाओ न पाओ

हम उन्हें इस दौर का दूल्हा बनाकर ही उठेंगे

विश्व चाहे या ना चाहे, लोग समझें या ना समझें

आ गये हैं हम यहाँ तो गीत गाकर ही उठेंगे ।


संदर्भ-

1.     वेब रेफरेंस, कविता कोश, नीरज गा रहा है, गोपालदास नीरज,

2.     रंजक, रमेश, नवगीत में छायावादी अवशेष, नये गीत का उद्भव और विकास, पुस्तकायन, नयी दिल्ली, सं. 2002, पृ. 59-60,

3.     हमारे लोकप्रिय गीतकार : गोपालदास नीरज, गोपालदास ‘नीरज’ : प्रेमगीतों का मसीहा, संपादक शेरजंग गर्ग, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, सं. 2004, पृ. 02-03,

4.     वही, पृ. 03,

5.     नीरज, गोपालदास, मेरा गीत दिया बन जाये, नीरज रचनावली खंड- 2,आत्माराम एंड संस, दिल्ली, सं. 2010, पृ. 16,

6.     नीरज, गोपालदास, काश्मीर के नाम, नीरज की पाती, आत्माराम एंड संस, दिल्ली, सं. 1990, पृ. 36,

7.     वही, पाकिस्तान के नाम, पृ. 44,

8.     वही, कल्पना के नाम, पृ. 51,

9.     वही, पृ. 54,

10.  वही, समकालीन गीतकार के नाम, पृ. 62,

11.  श्रीवास्तव, राजीव, ...कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे, आजकल, वर्ष- 80, अंक- 9, जनवरी 2025, पृ. 15 ।

 

(त्रैमासिक पत्रिका समीचीन, मुंबई के अक्टूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र