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Saturday, 22 August 2026

महामनीषी कवि हितैषी जी

 


महामनीषी कवि हितैषी जी


“आपका माधुर्य और प्रसाद गुण, भाषा की लचक, भावों की उड़ान और उसका विकट अर्थ तथा उसका सामंजस्य (तलाजमा) देखकर मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि (आप) हितैषी नहीं, महामनीषी हैं।”

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पंडित जगदंबा प्रसाद मिश्र, हितैषी जी को एक पत्र लिखा था, जिसकी उपरोक्त पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं। उन्नाव के प्रख्यात साहित्यसेवी बनवारी लाल दीक्षित ने हितैषी जी की पुस्तक दर्शना के प्रथम संस्करण की भूमिका लिखी है। इस भूमिका (पृष्ठ 13) में उपरोक्त कथन व प्रसंग को उद्धृत किया गया है। दर्शना हितैषी जी की बाद की कृति है। इसके पूर्व उनकी कुछ काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। इन काव्य-कृतियों के प्रकाशन से मिली ख्याति से कहीं अधिक प्रसिद्धि हितैषी जी को उनकी स्फुट कविताओं से मिल चुकी थी। विशेष रूप से स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों के जोश व उमंग को बढ़ाने वाली रचनाओं ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई थी। हितैषी जी की रची हुई पंक्तियाँ- शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले... को बिस्मिल जी सदैव गुनगुनाया करते थे।

हितैषी जी के जीवन में एक समय ऐसा था, जब उन्होंने एक तरह से बालहठ करते हुए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के पास अपनी कविता भेजी थी और उसे सरस्वती के मुख पृष्ठ पर छापने के लिए कहा था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्याकाश में ऐसे आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अच्छे-अच्छे कवियों व साहित्यकारों को सुधारा है, ठोंक-बजाकर हिंदी को श्रेष्ठ कवियों-साहित्यकारों की परंपरा दी है। आचार्य द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन-कार्य सँभाला और हिंदी की साहित्य-सर्जना को जागरण-सुधार की ओर उन्मुख किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र का नवजागरण द्विवेदी जी के सतत प्रयासों से सुधार की ओर.... जागरण-सुधार की ओर बढ़ता है। सरस्वती पत्रिका इसका माध्यम बनती है। हिंदी साहित्येतिहास के अध्येताओं को इसका सहज ज्ञान होगा। यहाँ इस तथ्य का उल्लेख करने का उद्देश्य सरस्वती पत्रिका के महत्त्व को रेखांकित करना और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुशासनबद्ध साहित्यिक अनुष्ठान को उद्धृत करना है। सरस्वती पत्रिका उन दिनों कवियों और साहित्यकारों के बीच बहुत बड़ा स्थान रखती थी। इसमें छपना बहुत गर्व की बात होती थी। इस पत्रिका के माध्यम से आचार्य द्विवेदी जी ने परिनिष्ठित व राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता रखने वाली मानक हिंदी को साहित्य में स्थापित करने का कार्य किया। यही खड़ी बोली कहलाई। अवधी, ब्रज, बुंदेली आदि का अद्भुत साम्य करके मानक-परिनिष्ठित खड़ी बोली, जिसे आज की हिंदी के रूप में जानते हैं, उसे आचार्य द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से स्थापित किया।

जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी जी ऐसी प्रतिष्ठित पत्रिका के मुखपृष्ठ पर अपनी कविता छापने का आग्रह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी से करते हैं। आचार्य द्विवेदी जी की सहृदयता का कहना ही क्या.... वे हितैषी जी के पत्र के उत्तर में लिखते हैं, कि- आप में प्रतिभा है, परंतु उसका विकास नहीं हुआ। उन्नाव में सनेही जी रहते हैं। तुम उनसे संशोधन प्राप्त करो। अभी तुम्हारी रचना मुख पृष्ठ तो क्या किसी भी पृष्ठ पर छपने योग्य नहीं। हाँ एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा कि सरस्वती का मुखपृष्ठ तुम्हारी रचना की प्रतीक्षा किया करेगा। (ब्रह्मलीन हितैषी, अजेय, साप्ताहिक हिंदुस्तान, 19 मई, 1957, पृ. 07)

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के दो पत्रों के मध्य का अंतराल हितैषी जी के विराट साहित्यिक व्यक्तित्व के गढ़े जाने का कालखंड कहा जा सकता है। इस दृष्टि से अगर देखें, तो हितैषी जी अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व के साथ दिखाई देते हैं। आचार्य द्विवेदी जी की सीख को उन्होंने आत्मसात किया। आचार्य द्विवेदी जी का पत्र पाने के बाद हितैषी जी पंडित गयाप्रसाद सनेही से मिले और सनेही जी के प्रिय शिष्यों में से एक बने। आचार्य सनेही अभिनंदन ग्रंथ में श्रीनारायण चतुर्वेदी ने बहुत सुंदर बात लिखी है। वे लिखते हैं, कि सनेही जी द्विवेदी युग के स्वतंत्र आचार्य थे। इनके शिष्यों की संख्या आँकना बहुत कठिन है। सनेही जी के दो शिष्यों का वे विशेष उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं, कि हितैषी जी और अनूप जी ये दो सनेही जी के प्रिय शिष्य थे और यदि केवल ये दो शिष्य ही सनेही जी ने हिंदी साहित्य-जगत को दिए होते, तब भी हिंदी संसार उनका आभारी रहता। (आचार्य सनेही अभिनंदन ग्रंथ, 21 अगस्त, 1964, पृ. 68)

 हितैषी जी का नाम सनेही जी के शिष्यों में सबसे ऊपर आता है। सनेही जी के शिष्यों को मिलाकर सनेही-मंडल बना है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से साहित्य में मंडल की संकल्पना बनी थी। भारतेंदु-मंडल के कवि संगठित रूप से निश्चित और निर्धारित दिशा में, भावधारा में साहित्य-सेवा करते थे। ऐसा ही सनेही-मंडल में परिलक्षित होता है। सनेही-मंडल के आचार्य गयाप्रसाद शुक्ल सनेही भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं के रक्षण व संवर्धन के पक्षधर थे। रस, छंद व अलंकार की पुरातन परिपाटी को आधुनिक काव्याकाश में पुष्पित-पल्लवित करने के ध्येय के सनेही-मंडल के कवि देश की स्वाधीनता हेतु क्रांति का बिगुल बजाने का कार्य भी कर रहे थे। सनेही-मंडल के द्वारा ही मंचीय कविता प्रारंभ की गई, जो वीर रस की रचनाओं के सस्वर पाठ से सुप्त जनमानस के अंदर स्वाधीनता प्राप्ति की ललक जगाती थी। इन तीनों मुख्य प्रवृत्तियों के अनुशीलन में हितैषी जी खरे उतरे, और इसी कारण वे सनेही जी के प्रिय और अत्यंत निकट के शिष्य बने।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के उस मानक व परिनिष्ठित स्वरूप को स्थापित करने के यत्न में लगे हुए थे, जो राष्ट्रीय स्वरूप ले सके और जिससे हिंदी की बोलियों व उपबोलियों के विभेद दूर हो सकें। अवधी और ब्रज उन दिनों कवियों की प्रिय भाषा थी। द्विवेदी जी का आग्रह खड़ी बोली हिंदी में रचना करने का होता था। इसके लिए वे कवियों को प्रोत्साहित करते थे। हितैषी जी आचार्य द्विवेदी के आचार्यत्व से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में रचनाएँ लिखना प्रारंभ किया, और उनकी यह विशिष्टता उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई। इसी कारण आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी के मध्य घनिष्ठता और आत्मीयता स्थापित हुई। पूर्व में दो प्रसंगों का उल्लेख किया गया है। एक अन्य प्रसंग भी यहाँ उल्लेखनीय है, जो आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी की आत्मीय प्रगाढ़ता को उकेरता है। हितैषी जी ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर संस्मरण लिखा है। उसमें वे इस प्रसंग का उल्लेख करते हैं। एक बार हितैषी जी उमर खैयाम की रुबाइयों को आचार्य द्विवेदी जी को सुना रहे थे। तभी द्विवेदी जी ने एक भारी-भरकम शेर पढ़ा और उसका अर्थ हितैषी जी से पूछा। हितैषी जी लिखते हैं, कि मैंने भी रुष्ट होकर क्लिष्ट संस्कृत श्लोक पढ़ सुनाया और द्विवेदी जी से अर्थ की जिज्ञासा की। द्विवेदी जी ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन भवों में बल पड़ गये। हितैषी जी चुपके से घर चले आए। दूसरे दिन सबेरे ही आचार्य द्विवेदी जी हितैषी जी के घर पहुँच गए और बोले- भाई मैंने तुम्हारी कविता का आनंद न लेकर और उसकी ओर ध्यान न देकर व्यर्थ परीक्षा करनी चाही थी, यह मेरी भूल थी, मैं तुम्हें आज मनाने आया हूँ। हितैषी जी ने चरण छूकर अपनी भूल स्वीकार की और कहा कि मुझे कोई अधिकार ऐसा उत्तर देने का नहीं था, अतः मैं क्षमा किया जाऊँ। अंत में मुझे घर बैठे क्षमा मिल गई।

यह प्रसंग उस समय के साहित्यकारों की सहजता को स्पष्ट करता है। आचार्य द्विवेदी जी अपनी सहजता और सरलता में हिमालय से कम न थे। दूसरी ओर हितैषी जी भी अपनी मर्यादा को समझते थे। आज के समय में ऐसे प्रसंग कल्पनातीत लगते हैं। दूसरी बड़ी बता यहाँ यह भी स्पष्ट होती है, कि आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी के मध्य अत्यंत घनिष्ठ और आत्मीय संबंध थे। ऐसी ही आत्मीय प्रगाढ़ता सनेही जी के साथ हितैषी जी की थी। गयाप्रसाद शुक्ल सनेही तो भारतीय काव्यशास्त्र के आधुनिक आचार्य ही थे। कवित्त, सवैया, घनाक्षरी आदि में अर्थपूर्ण व वैचारिक गांभीर्य के साथ एक से बढ़कर एक पदों के सृजन के साथ ही देशभक्तिपूर्ण रचनाएँ सनेही मंडल की अन्यतम् विशिष्टता थी। डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ ने अपने शोध-प्रबंध में सनेही जी द्वारा प्रवर्तित विशिष्ट सवैया को रेखांकित किया है। इस सवैया में 25 वर्ण थे। निशंक जी ने इसे सनेही जी की मौलिक देन बताया है और इस विशिष्ट सवैया को ‘सनेही सवैया’ नाम दिया है। सनेही-मंडल के कवियों और विशेष रूप से आचार्य सनेही जी के प्रभाव के कारण कानपुर छंदशास्त्र के आधुनिक संस्करण का प्रमुख केंद्र ही बन गया था। हितैषी जी स्वयं मात्रिक छंद के महारथी थे। वैकाली काव्य-संग्रह से उनकी एक बानगी यहाँ प्रस्तुत करते हुए बात को विस्तार देते हैं-

वैकाली !

वैकाली !

कितने कितने दीप सँजोए ?

कितने प्रहसित, कितने रोए ?

कितने पाए, कितने खोए ?

कितने जागे, कितने सोए ?

दृष्टि पसारे,

कार्य तुम्हारे,

तम तंत्रालय से अपलक हम

देख रहे हैं अगणित तारे ।।

छंदशास्त्र और भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं के आधुनिक संस्करण के प्रणेता सनेही जी व उनके सनेही-मंडल की विशिष्टताओं को अपने सृजन में उतारते हुए हितैषी जी सनेही मंडल के नामचीन कवि बनते हैं, साथ ही सनेही जी के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं। हितैषी जी को घनाक्षरी और सवैया में सिद्धि प्राप्त थी। काव्य-सौष्ठव, प्रांजल भाषा और भावाभिव्यक्ति... इन तीनों का अद्भुत समन्वय हितैषी जी के काव्य में परिलक्षित होता है।

जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ जी के व्यक्तित्व व कृतित्व का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर विस्तार आचार्य द्विवेदी जी और आचार्य सनेही जी के मध्य और द्विवेदी युग से छायावाद और छायावादोत्तर काल में होता है। हितैषी जी आचार्य द्विवेदी और आचार्य सनेही के दो ध्रुवों के मध्य में दिखते हैं। पूर्व के प्रसंगों में उल्लेख किया गया है, कि हिंदी साहित्य का पुराना और प्रारंभिक समय साहित्यकारों की सहजता और सरलता का था। मतभेद और विवाद नहीं होते थे। आचार्य द्विवेदी जी मानक और खड़ी बोली हिंदी के प्रबल पक्षधर थे और कवियों-साहित्यकारों को खड़ी बोली हिंदी में ही लिखने के लिए प्रेरित करते थे। दूसरी ओर सनेही जी का आचार्यत्व छंदशास्त्रीय विधानों पर केंद्रित था। आचार्य द्विवेदी जी के प्रिय, आत्मीय और आचार्य सनेही जी के परम शिष्य हितैषी जी इन दोनों आचार्यों के समन्वय का साक्षात् स्वरूप प्रतीत होते हैं, दो ध्रुवों के मध्य-बिंदु प्रतीत होते हैं।

हितैषी जी ने एक से बढ़कर एक छंद लिखे हैं, मात्रिक छंदों में नए-नए प्रयोग भी किए हैं..... और सबसे बड़ी बात, कि आचार्य द्विवेदी जी के आवाहन को आत्मसात करते हुए खड़ी बोली हिंदी में लिखा है। हितैषी जी की इस विशिष्टता को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ- ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में रेखांकित किया है। वे लिखते हैं कि- “खड़ी बोली के कवित्तों और सवैयों में ‘हितैषी जी’ वही सरलता, वही लचक, वही भाव भंगी लाये हैं, जो बृज भाषा के कवित्तों और सवैयों में पायी जाती है। इस बात में इनका स्थान निराला है। यदि खड़ी बोली की कविता आरंभ में ऐसी ही सजीवता के साथ चली होती, जैसी इनकी रचनाओं में पायी जाती है तो उसे रूखी और नीरस कोई न कहता। रचनाओं का रंग-रूप अनूठा और आकर्षक होने पर भी अजनबी नहीं है। शैली वही पुराने उस्तादों के कवित्त सवैयों की है, जिसमें वाग्धारा अंतिम चरण पर जाकर चमक उठती है।“

शुक्ल जी का सूक्ष्म अवलोकन और उनकी पारखी दृष्टि हितैषी जी की काव्य-प्रतिभा को लेकर ऐसा संकेत करती है, जो खड़ी बोली हिंदी को साहित्य की भाषा के रूप में स्थापित किए जाने के विविध यत्नों और प्रसंगों-विषयों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। अवधी और बृज आदि में रचनाएँ करने का लोभ कवियों में इसी कारण था, कि इनमें सरसता और कोमलता आ जाती थी। खड़ी बोली को साहित्य में स्थापित करने की दिशा में बड़ा अवरोध भी इस बोली का खरापन था। हितैषी जी जैसे हिंदीसेवी कुछ पहले यदि खड़ी बोली हिंदी को मिल गए होते, खड़ी बोली हिंदी के लिए साहित्य की राह आसान हो गई होती। आचार्य द्विवेदी जी ने भी जब इस तथ्य को समझा होगा, तब सहजता से ही उन्होंने हितैषी जी को महामनीषी कह दिया होगा।

हितैषी जी ने संस्कृत काव्यशास्त्रीय परंपरा के आधुनिक नवोन्मेषी स्वरूप से साक्षात्कार कराया। इसके साथ ही छंदशास्त्र के विधान को खड़ी बोली हिंदी में उतारने हेतु यत्न किए, और अपनी रचनाओं से इसे समृद्ध भी किया। इसी क्रम में यह भी जानना रुचिकर और प्रसंगानुकूल होगा, कि हितैषी जी शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। ऐसा नहीं है, कि उनकी यह प्रतिबद्धता अन्य भाषाओं के प्रति उनके लगाव को कम करती हो। हितैषी जी को फारसी का भी अच्छा ज्ञान था, और उन्होंने इसमें रचनाएँ भी की हैं। हितैषी जी ने उर्दू में भी खूब रचनाएँ की हैं। उमर खैयाम की रुबाइयों का हिंदी अनुवाद, जो उस समय उपलब्ध था, वह अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित था। हितैषी जी ने सीधे फारसी से हिंदी में रुबाइयों का अनुवाद किया था। उनका यह अनुवाद ‘मधु मंदिर’ नाम से था, जो बहुत लंबे अंतराल के बाद सन् 2022 में डॉ. हरिनारायण चौरसिया के प्रयासों से प्रकाशित हुआ। इसी तरह अंग्रेजी पर भी हितैषी जी की अच्छी पकड़ थी। अंग्रेजी कविता के विन्यास से भी वे परिचित थे। उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के प्रति उनका सम्मान अपने स्थान पर था, लेकिन हिंदी के लिए उनके मन में असीम श्रद्धा थी, जैसी कि एक माँ के प्रति पुत्र की होती है। इसके लिए वे किसी से भी समझौता नहीं करते थे। गांधी जी ने हिंदुस्तानी भाषा को हिंदी के विकल्प के रूप में रखा था। इसकी लिपि तो देवनागरी थी, लेकिन उर्दू और अरबी-फारसी के शब्दों व वाक्य-विन्यासों को सायास रखा गया था। इस तरह हिंदी का संस्कृतनिष्ठ-तत्सम स्वरूप लेखन व बोलचाल से बाहर होने लगा था। हितैषी जी ने इसका प्रबल विरोध किया। उन्होंने हिंदी का पक्ष लेते हुए यह भी स्थापित किया, कि भाषा स्वाभाविक रूप से ही अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर लेती है, लेकिन तुष्टीकरण या राजनीति से प्रेरित होकर भाषा के स्वरूप को बिगाड़ना उचित नहीं है। हिंदी के स्थान पर  हिंदुस्तानी को थोपना उचित नहीं है। हितैषी जी स्वयं हिंदी में लेखन के समर्थन में डटे रहे, दृढ़ रहे, और अपने साथ के सभी साहित्यसेवियों, कवियों, रचनाकारों को विशुद्ध हिंदी में रचनाएँ करने के लिए आजीवन प्रेरित भी करते रहे।

हितैषी जी छायावाद की कल्पनाशीलता के पक्षधर कभी नहीं रहे। हितैषी जी छायावाद के कालखंड में भी लेखन में सक्रिय थे, लेकिन उनकी रचनाओं की भाव-भंगिमा छायावाद की प्रचलित प्रवृत्ति से मेल नहीं खाती थी। देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित क्रांतिकारी का भाव सदैव उन्हें यथार्थ के धरातल पर, देश की सेवा के व्रत पर और समाज के हित की दिशा पर केंद्रित किए रहा। हरिवंशराय बच्चन की ‘मधुशाला’ और ‘मधुबाला’ की कविताएँ उन दिनों अपना अलग ही रंग जमाए हुए थीं। इनका रंग भले ही लोगों को आकर्षित कर ले, लेकिन अनेक लोगों को सोचने पर विवश भी कर देता था कि ‘मधुशाला’ और ‘मधुबाला’ से राष्ट्र और समाज को आखिर मिल क्या रहा है.... समाज को कौन-सी दिशा दी जा रही है? समूचे राष्ट्र की भाषा, क्रांति की भाषा हिंदी में शराब की महिमा गाई जा रही है...। हितैषी जी को भी यह नहीं भाया और अपने स्वभावानुसार उन्होंने मुखर प्रतिकार किया। हितैषी जी की ‘ताड़ीबाला’ और ‘ताड़ीशाला’ इसी प्रतिकार की अभिव्यक्ति हैं। इसी में वे लिखते हैं-

पहले है मीठा फिर कड़ुआ, केवल मधु ही मधु नाम रहा ।

मधुपायी के जीवन को कटु, करना ही इसका काम रहा ।

हितैषी जी को सम्मान व पुरस्कार की लालसा तो कभी रही ही नहीं, उन्होंने अपने रचनाकर्म के समर्थन की, समीक्षकों व आलोचकों द्वारा महत्त्व दिए जाने या नहीं दिए जाने की भी कभी कोई चिंता नहीं की। हितैषी जी की क्रांतिकारी लेखनी अपने लक्ष्य पर सदैव केंद्रित रही, सच को सच और झूठ को झूठ कहती रही। किसी कामना, किसी लालसा या किसी को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने कभी नहीं लिखा। यह नितांत सत्य है, कि इसी कारण साहित्यिक गुटबंदी में वे कहीं भी ठहर नहीं पाए, और समीक्षकों, आलोचकों, साहित्येतिहासकारों की दृष्टि में भी नहीं आ सके। हितैषी जी के साहित्यिक अवदान पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पारखी दृष्टि और उनके विश्लेषण का उल्लेख पूर्व में किया गया है। शुक्ल जी के परवर्ती समीक्षकों, आलोचकों व साहित्येतिहासकारों की दृष्टि हितैषी जी के साहित्य में कहाँ तक और कितनी गई है, उसे देखने पर स्थिति स्पष्ट हो जाती है, कि हितैषी-साहित्य का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका।

हितैषी जी अपने कर्म-पथ पर सदैव एकाग्र रहे। हितैषी जी के पितामह पं. बाजीलाल मिश्र अवध के महानायक और प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सेनानी राणा बेनी माधव के अनन्य सहयोगी थे। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए पं. बाजीलाल मिश्र ने वीरगति पाई थी। उनकी वीरता और रणकौशल से अंग्रेज भयभीत रहते थे। हितैषी जी के पिता पं. रामचंद्र मिश्र कर्मकांडी ब्राह्मण थे, किंतु हितैषी जी अपने पितामह की क्रांतिधर्मिता के पथ के पथिक थे। इसी कारण पितामह बाजीलाल मिश्र के जीवन और अंग्रेजों के साथ संघर्ष का व्यापक अध्ययन हितैषी जी ने किया। उनके द्वारा रचित कृति ‘मातृगीता’ में इसका उल्लेख मिलता है। वे लिखते हैं-

बैठे थे नाना धुंधुपंत, अब्दुल्ला और तातिया धीर।

दुःखिता रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे थे अति अधीर।

थे पंडित बाजीलाल मिश्र, बेनीमाघव औ' कुँवर वीर।

अवरुद्ध कंठ कह सकें यही— (आँखों से झर झर झर नीर)

“था नहीं राष्ट्र का एक तंत्र, / था नहीं राष्ट्र का एक मंत्र,

प्राणों की आहुति देकर भी, हम हो न सके इससे स्वतंत्र! "

पिता से आध्यात्मिकता व भक्ति भाव और पितामह से क्रांति की अलख हितैषी जी को मिली थी। इसी कारण उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में क्रांतिकारी कवि के साथ ही आध्यात्मिक व दार्शनिक मनीषी का अद्भुत मेल दिखता है। हितैषी जी क्रांतिकारी कवि तो हैं ही, साथ ही उनकी उत्तरार्ध की रचनाएँ अध्यात्म व दर्शन की गहनता-गंभीरता लिए हुए हैं। हितैषी जी की कृति- ‘दर्शना’ तो नाम से ही इस तथ्य को स्पष्ट कर देती है। यह कृति भी हितैषी जी के प्रति आस्थावान साहित्यसेवियों के प्रयासों से हाल ही में प्रकाशित हुई है।

पंचांग के अनुसार हितैषी जी का जन्म गीता जयंती के दिन हुआ था। हितैषी जी का जन्मदिन गीता जयंती के पर्व पर उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह भी एक सुखद संयोग है। क्रांतिकारी और दार्शनिक कवि हितैषी जी की जन्म-जयंती और गीता जयंती  उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता के साथ प्रासंगिकता का संबंध जोड़ देती है। युद्ध के मैदान में कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाया था। रणांगन में कर्म की महत्ता को स्थापित किया गया था। अन्याय व अत्याचार के प्रतिकार का संदेश दिया गया था। अठारह अध्यायों में दर्शन व चिंतन-मनन के साथ ही जीवन जीने के सिद्धांत बताए गए थे। यदि हितैषी जी की ‘दर्शना’ का अनुशीलन करें, तो सरल पदों में दर्शन की ऐसी ही गूढ़ बातें जानने को मिलती हैं। हितैषी जी की ‘दर्शना’ के लिए स्वतंत्र और विशद अध्ययन-अनुशीलन अपैक्षित है। भारतदेश के स्वाधीनता संग्राम में ऐसे क्रांतिकारी बहुत कम हुए हैं, जो एक ओर क्रांति की अग्नि को प्रज्ज्वलित करते हैं, तो दूसरी ओर भारत की आध्यात्मिक चेतना और दार्शनिक चिंतन को लेखनी से निःसृत करते हैं। हितैषी जी इस दृष्टि से अन्यतम हैं, विशिष्ट हैं।   

व्यक्तित्व की सहजता और सरलता के साथ ही गंभीर चिंतन-मनन हितैषी जी की विशेषता है। इतना ही नहीं, वे अपने रंग में आने पर फक्कड़पन में भी पीछे नहीं रहते। उनके व्यंग्य तीखे व धारदार हैं। हितैषी जी अलबेला उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे। बंबई के साहित्यसेवियों ने उन्हें इसी नाम से सम्मान भी दिया था। गँवार उपनाम से उन्होंने भड़ौवे लिखे। ये उनके फक्कडपन और व्यंग्यात्मक लेखन के प्रतिमान हैं। हितैषी जी ने भड़ौवे के माध्यम से कई नेताओं, साहित्यकारों आदि की खुलकर खिंचाई की है। इसके साथ ही वे तत्कालीन समय और समाज की विद्रूपताओं व विकृतियों की ओर भी ध्यान खींचते हैं।

जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी जी’ का रचना-संसार विविधवर्णी है। एक ओर क्रांति की चेतना, तो दूसरी ओर अध्यात्म-धर्म-दर्शन उनकी रचनाओं में प्रकट होता है। भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं का निर्वहन करते हुए छंदशास्त्र के विधानों को आधुनिक खड़ी बोली हिंदी में उसी सरसता के साथ लाने का कार्य हितैषी जी ने किया है। हिंदी के अनन्य सेवी हितैषी जी ने आत्मसम्मान और स्वाभिमान से समझौता किये बिना अपने रचनात्मक योगदान से हिंदी के साहित्य को समृद्ध, संपन्न और सशक्त किया है। अनन्य देशभक्त, समर्पित क्रांतिकारी और दार्शनिक चिंतक कवि हितैषी जी का विपुल रचना-संसार न केवल हिंदी जगत् को, वरन् समग्र समाज को सार्थक दिशा देने की सामर्थ्य रखता है। हितैषी जी के साहित्य का अवगाहन हर बार नई ऊर्जा और चेतना देता है। क्रांतिकारी कवि, महामनीषी हितैषी जी के विराट व्यक्तित्व से बहुत प्रेरणा मिलती है।


संदर्भ ग्रंथ सूची-

1.    हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं. 2015,

2.    हिंदी के निर्माता, भाग-2, सं. श्यामसुंदर दास, इंडियन प्रेस लि., प्रयाग, सं. 1941,

3.    रक्त का कण-कण समर्पित, चिरंजीव सिन्हा, प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, सं. 2022,

4.    दर्शना : चिंतन एवं भावधारा, सं. डॉ. हरिनारायण चौरसिया, वान्या पब्लिकेशंस, कानपुर, सं. 2024,

5.    हितैषी काव्य विमर्श, सं. डॉ. हरिनारायण चौरसिया, वान्या पब्लिकेशंस, कानपुर, सं. 2023,

6.    सनेही मंडल के कवि, डॉ. श्याम सुंदर सिंह, आराधना ब्रदर्स, कानपुर, सं. 1990,

7.    हिंदी के निर्माता, कुसुम शर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं.2009,

8.    स्मृतियों की धरोहर, डॉ. सुधेश, आलेख प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2007,

9.    कविता कोश, अंतर्जालिक संदर्भ।

(पुस्तक- रससिद्ध कवि क्रांतिकारी हितैषी जी, संपादक- डॉ. हरिनारायण चौरसिया, प्रकाशक- डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव साहित्यिक संस्थान, लखनऊ, वर्ष- 2025 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र





Thursday, 1 August 2024

अवध राजु सुर राजु सिहाई...

 

अवध राजु सुर राजु सिहाई...

अवध  राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ  धनु सुनि  धनदु लजाई ।

तेंहि पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ।।

श्रीरामचरितमानस में प्रसंग आता है...। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन को जा चुके हैं। भरत नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रह रहे हैं। श्रीराम की चरण पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर अयोध्या के राजपाट को चला रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास इस प्रसंग पर बल देते हैं। वे भरत के राज की विशेष रूप से व्याख्या करते हैं। बाबा तुलसी की भरत के प्रति अगाध निष्ठा है। वे कहते हैं, कि जिस अयोध्या के राज्य को देखकर देवराज इंद्र ललचाते थे, जिन राजा दशरथ की संपत्ति को सुनकर कुबेर लज्जित होते थे, उसी अयोध्या के राज्य और राजा दशरथ की असीमित संपत्ति की आसक्ति से मुक्त रहकर भरत उसी प्रकार निवास कर रहे हैं, जैसे चंपक के वन में भौंरा रहता है। यहाँ त्याग का अप्रतिम उदाहरण देखते ही बनता है। माता कैकेयी ने मंथरा के कहने पर अपने पुत्र-मोह को उस चरम बिंदु तक पहुँचा दिया था, जहाँ से बिखराव प्रारंभ हो जाता है। विघटन का क्रम चल पड़ता है। राजा दशरथ ने अपने पौरुष से जिस अयोध्या को कुबेर की संपदा से भी अधिक संपन्न बनाया था, वह अयोध्या राम के लिए भी त्याज्य हो गई, और भरत के लिए भी....। चाहे राम हों या भरत, अयोध्या का राजपाट और अकूत संपदा का लोभ-लालच या उसे पाने की लालसा दोनों में से किसी को भी नहीं है। दोनों के बीच का प्रेम-स्नेह इतना प्रगाढ़ है कि धन-संपदा उसे जरा-सा भी प्रभावित नहीं कर पाती है।

जब राम को वनवास जाने के लिए कहा जाता है, तब राम के मन में तनिक भी यह भाव नहीं आता, कि मैं अयोध्या का भावी राजा हूँ। वे हर्षित होते हैं। कारण यहाँ भी स्पष्ट है, इंद्र के मन में भी लालच पैदा कर देने वाली अयोध्या राम के लिए पिता की आज्ञा से बड़ी नहीं है। पिता की आज्ञा का पालन उनके लिए महत्त्वपूर्ण है। गोस्वामी जी लिखते हैं-

नव  गयंदु  रघुबीर   मनु   राजु   अलान  समान ।

छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ।।

नये पकडे गए हाथी के समान राम का मन है और राज्य गज को बाँधने वाली बेड़ियों के समान है। राम को जब पता चलता है कि उन्हें वनगमन करना है और वे राज्य-संचालन करने की बेड़ियों से मुक्त हो गए हैं, तब उनके हृदय में आनंद का आधिक्य हो जाता है। बाबा तुलसी ने राम के इस मनोभाव का सुंदर चित्रण करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि राम को राज्य-लिप्सा नहीं है। भरत और राम के मध्य अयोध्या का राजपाट कंदुक-सम खेला जा रहा है।

आधुनिकताबोध यह सिद्ध करता है, कि कैकेयी के मन में भी कोई खोट नहीं था। कैकेयी राज्य-संचालन में अत्यंत निपुण थी। कैकेयी को दो वरदान ही युद्ध के मैदान में मिले थे, राजा दशरथ से....। देवासुर संग्राम में इंद्र की दशा बहुत खराब हो गई थी। इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। रानी कैकेयी भी राजा दशरथ के साथ चल पड़ीं, सारथी बनकर....। दुर्योगवश राजा दशरथ के रथ की कील निकल गई और युद्धक्षेत्र में राजा दशरथ के लिए जीवन का संकट आ गया। रानी कैकेयी ने तुरंत अपनी उंगली कील के स्थान पर लगाई। राजा दशरथ को जीवनदान मिला और उन्होंने प्रसन्न होकर कैकेयी को दो वरदान माँगने को कहा। कैकेयी ने यही वरदान माँगे थे। भरत को राजपाट और राम को वनवास....। राम ने पहले भी वन की यात्रा की थी, गुरु विश्वामित्र के साथ और अनेक राक्षसों को मारकर वन प्रांतरों को, वहाँ साधना में लीन ऋषि-मुनियों को भयमुक्त किया था।

पिछली बार गुरु विश्वामित्र हठ करके राजा दशरथ से माँगकर राम और लक्ष्मण को ले गए थे, राजा दशरथ इसके लिए सहमत नहीं थे, लेकिन विवशता थी....। दूसरी बार कैकेयी के सामने राजा दशरथ विवश हो गए...। राम के लिए दोनों बार आज्ञा-पालन का ध्येय था। राम के मन में कोई क्लेश पैदा नहीं होता। वे इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। इसी कारण राम की नाराजगी कहीं पर भी माता कैकेयी के प्रति प्रकट नहीं होती है। इतना ही नहीं; राम वनवास के प्रसंग में, जब चित्रकूट में राम से भेंट करने के लिए तीनों माताएँ आती हैं, तब राम सबसे पहले माता कैकेयी से भेंट करते हैं। बाबा तुलसी इस प्रसंग का उल्लेख करते हैं, और माता कैकेयी से राम की भेंट को विशेष रूप से उद्धृत करते हैं। कैकेयी के प्रति राम के मन में कोई विद्वेष नहीं है। राम तो भरत को भी डाँट देते हैं, जब वे माता कैकेयी को भला-बुरा करते हैं।

आज के समय में....., आधुनिकता के मानदंड में देखने पर माता कैकेयी का व्यक्तित्व अलग दिखाई देता है। वे अयोध्या के राजपाट के प्रति समर्पित दिखती हैं, क्योंकि राम को वन भेजना भरत को राजपाट दिलाने-मात्र के लिए नहीं था, वरन् राक्षसों के संहार के लिए भी था। राम इसके लिए उपयुक्त थे... गुरु विश्वामित्र के साथ जाकर उन्होंने इस बात को प्रमाणित किया था। गोस्वामी जी माता कैकेयी के लिए राम की श्रद्धा को, उनके निःछल प्रेम को उभारते हैं। राम भरत को सीख देते हैं, कि गुरु, पिता, माता या स्वामी... इनकी सीख आँख बंद करके माननी चाहिए। भले ही ऐसा लगे, कि इनके द्वारा गलत कहा जा रहा है, हम गलत राह पर जा रहे हैं, लेकिन हमारा पग खाले नहीं पड़ता, हमारा काम गलत नहीं होता और भविष्य में परिणाम भी सही आते हैं, अच्छे आते हैं। तात्कालिक रूप से अनुचित लगने पर भी ये निर्देश दीर्घकाल में सही सिद्ध होते हैं। राम कहते हैं, कि ऐसा विचार करते हुए, आज्ञा का पालन करते हुए जाओ और अवधि भर के लिए अयोध्या का पालन करो-

गुरु पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ।।

अस बिचारि  सब सोच  बिहाई ।  पालहु अवध  अवधि भर जाई ।।

एक अन्य वार्तालाप को देखें....। यह भी चित्रकूट में चल रहा है। श्रीराम को अयोध्या वापस ले आने के लिए पूरी अयोध्या नगरी ही गई है। तीनों माताएँ भी हैं। लक्ष्मण की माता सुमित्रा, सीता की माता सुनयना और राम की माता कौशल्या के मध्य वार्तालाप चल रहा है। अत्यंत आर्त स्वर में... रूँधे गले से माता कौशल्या  कह रहीं हैं, कि राम, लक्ष्मण और सीता वन को जाएँ, इसका परिणाम भला है, निकृष्ट नहीं है; किंतु मुझे चिंता भरत के जीवन की है। यहाँ माता कौशल्या के हृदय की वेदना भ्रातृ-प्रेम को बड़ी सहजता से प्रकट कर देती है-

लखनु राम सिय  जाहँ बन भल  परिनाम न  पोचु ।

गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ।।4

माता सुमित्रा ने वन जाते समय लक्ष्मण को सीख दी थी- गुरु, पिता, माता, बंधु, देवता और स्वामी की प्राणों की भाँति सेवा करनी चाहिए। इस कारण सभी के मित्र और स्वार्थहीन व्यक्तित्व वाले श्रीराम के साथ वन को जाकर संसार में जन्म लेने के लाभ को अर्जित करो, अर्थात् अपने कर्मों से जीवन की सार्थकता को सिद्ध करो। भ्राता लक्ष्मण ने माता की सीख को आत्मसात किया, और पूरी निष्ठा के साथ इसका पालन भी किया।

अयोध्या का राजपाट राम के वनगमन के केंद्र में है। सामान्य रूप से तो ऐसा ही प्रतीत होता है, लेकिन गहरे उतरकर विचार करें, तो यह वनगमन प्रसंग परिवार की एकजुटता को भी प्रस्तुत कर देता है। धन-धान्य, समृद्धि, यश, वैभव आदि की लालसा कहीं रह ही नहीं जाती है। लोभ किसी को छू नहीं पाता है। राम को आदेश मिलता है, वन जाने का.... और वे सहर्ष चल देते हैं। भरत को पता चलता है, कि उनके लिए राम को अयोध्या से जाना पड़ा है, तो वे भी अयोध्या को त्याग ही देते हैं... नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहने लगते हैं। परिवार किसी भी दशा में टूटता नहीं है, छूटता नहीं है। भरत जी राम को वापस ले आने के लिए चित्रकूट तक जाते हैं। राम चौदह वर्षो के बाद ही अयोध्या लौटने की बात कहते हैं। लेकिन चित्रकूट में केवल इतना ही नहीं होता... वहाँ रामराज्य की संकल्पना रची जाती है। राजा को कैसा होना चाहिए, शासक के धर्म क्या होते हैं, परिवार से लगाकर समाज और देश-काल में मर्यादाओं की स्थापना, उनका पालन कैसे हो.... इस बात को विस्तार के साथ कहा और सुना जाता है। भरत जी के साथ गई लगभग पूरी ही अयोध्या नगरी पाँच दिनों तक चित्रकूट में अपना डेरा-पड़ाव डाले रहती है। इन पाँच दिनों में अनवरत चलने पाली चर्चाएँ, उपदेश, वार्ताएँ आदि सभी बड़ी महत्त्व की हैं। नीति-नैतिकता के व्यवहार पक्ष हेतु अनेक उपयोगी बातें सामने आती हैं। गोस्वामी जी विस्तार के साथ चित्रकूट प्रसंग को प्रस्तुत करते हैं।

व्यक्ति से ऊपर परिवार है, परिवार से ऊपर समाज है, और समाज से ऊपर राज्य है-राष्ट्र है....। अयोध्या में राम के वनगमन से लगाकर चित्रकूट तक... भरत के राजपाट सँभालने तक, और फिर राम के अयोध्या लौटने तक पूरी कथा के विस्तार में यह तथ्य परिलक्षित होता है, दिखाई पड़ता है। इसके लिए संबंधों की मर्यादाएँ निभाई जाती हैं, संबंधों की गुरुता को-गरिमा को अनुभूत किया जाता है, सम्मान दिया जाता है।

श्रीरामचरितमानस का रचनाकाल भी बहुत महत्त्व रखता है। सामयिक स्थितियों से गोस्वामी जी परिचित थे। वह समय ऐसा था, कि म्लेच्छ आक्रांताओं ने अपनी स्वार्थ लिप्साओं के अनेक उदाहरण प्रस्तुत कर दिए थे। भाई से भाई का वैर, पिता से पुत्र की दुश्मनी के अनेक किस्से सामने आ रहे थे। धन के लिए... सत्ता के लिए परिवार की मर्यादाएँ टूट रहीं थीं। भारतीय समाज के लिए ये स्थितियाँ भयावह थीं। लोग विवश होकर संत समाज की ओर देख रहे थे, कि उनका पथ-प्रदर्शन हो सके, वे सही राह को जान सकें। ऐसी विषमताओं के मध्य गोस्वामी जी ने परिवार की मर्यादाओं से लगाकर समाज व राष्ट्र-राज्य तक की मर्यादाओं की स्थापना की बात कही। विश्व के कल्याण का संदेश दिया। गोस्वामी जी के राम इसका माध्यम बने... अयोध्या का पूरा राज-परिवार ही उदाहरण बन गया। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम मर्यादा के प्रतीक ही बन गए। राम का अर्थ ही मर्यादा हो गया। उसी रूप में श्रीराम को अन्य संतों ने स्वीकारा। कबीर ने भी स्वीकार किया- कबीर हरदी पीयरी चूना उज्जल भाई । राम सनेही यूँ मिले दून्यू बरन गँवाई ।।

सामाजिक मूल्यों का प्रशिक्षण परिवार में ही सबसे पहले मिलता है। स्नेह-प्रेम, सेवा, सद्भाव, सहिष्णुता और समरसता आदि की सीख सबसे पहले परिवार में मिलती है। यदि परिवार ही बिखर जाए, तो समाज, राष्ट्र और समग्र विश्व तक मानवीय मूल्यों, नीति-नौतिकताओं, मर्यादा-आदर्शों आदि के विस्तार को सबल करने वाली, पोष्ण करने वाली व्यवस्था ही सिमट जाएगी.... जड़ ही सूख जाएगी। इस कारण परिवार का महत्त्व है। दैवीय पक्ष को हटाकर यदि विचार करें, तो श्रीरामचरितमानस में परिवार की संरचना केंद्र में दिखाई देती है। यह परिवार क्रमशः विस्तार पाता है। अयोध्या से राम का वनगमन एक घटना-मात्र नहीं रह जाती, वरन् समूची अयोध्या को एक सूत्र में बाँध देने का कारण बन जाती है। भरत जी के नेतृत्व में अयोध्या का विशाल जनसमूह आत्मप्रेरित होकर चल पड़ता है। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को पुनः अयोध्या लाने के लिए। यह यात्रा प्रकारांतर से मर्यादा की सामाजिक स्थापना के हेतु प्रती होती है। श्रीराम भले ही अयोध्या न लौटे हों, लेकिन जिन सीख-सिखावनों को, उपदेशों के सार को लेकर अयोध्या का जनसमुदाय लौटा था, उनके सहारे ही रामराज्य की संकल्पना धरातल पर उतरी थी।

व्यक्ति और समाज के मध्य संबंधों को समरसता और सह-अस्तित्व की भूमि पर स्थापित करने का प्रयोग भी मानस में दिखता है। श्रीराम चित्रकूट में रहते हुए उस विशाल समाज को अपने साथ मिला लेते हैं, जो उपेक्षित और तिरस्कृत रहा। व्यक्ति से परिवार और समाज तक विस्तार का यह क्रम राम के चित्रकूट निवास के साथ विस्तार पाता है, दक्षिण की ओर बढ़ते हुए भी इस विस्तार को हम देखते हैं। वनवासी, गिरिजन, बालक, महिलाएँ, वृद्ध और यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी रामादल के साथ हो जाते हैं। एक सूत्र में बँध जाते हैं। जटायु की कथा और गिलहरी के प्रयास रामकथा के महत्त्वपूर्ण अंग हैं, अंश हैं।

यह विस्तार लोक के कल्याण से जुड़ता है। जिस परिवार में भाई का सम्मान न हो, पत्नी की बात न सुनी जाए... अनैतिकता से भरा आचरण हो, उस परिवार की दशा का अनुमान लंकाधिपति की दारुण दशा देखकर लगा सकते हैं। मंदोदरी रावण की मृत्यु पर विलाप करते हुए कहती हैं-

जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि न जाई ।।

राम विमुख अस हाल तुम्हारा ।  रहा न  कोउ कुल रोवनिहारा ।।

रावण की प्रभुता सारे संसार को भली-भाँति पता है। संसार रावण के बल को जानता है। पुत्रों और परिजनों के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता, लेकिन राम से विमुख होने के कारण रावण के कुल में कोई रोने वाला तक नहीं बचता है। जब मर्यादा टूटती है, तब सर्वनाश ही होता है। रावण के साथ भी यही हुआ। भाई की सीख भी रावण को अच्छी नहीं लगी, अपमानित करके राज्य से निकाल दिया।

अपने लौकिक, सामाजिक, मानवीय और व्यावहारिक संदर्भों में बाबा तुलसी के मानस की यही विशिष्टता है कि वहाँ एक आदर्श परिवार की बात विविध कथा-प्रसंगों के माध्यम से कही जाती है। रामराज्य की परिकल्पना एक आदर्श परिवार से ही निकलती है। लोकमंगल की साधना भी यहीं से अपनी जड़ों को रोपती है। मानस के ऐसे कथा-प्रसंगों से गुजरते हुए कई बार ऐसा अनुभूत होता है कि भविष्यदृष्टा के रूप में बाबा तुलसी ने आज की विषम-जटिल परिस्थितियों को जान लिया था। इसी कारण उत्तरकांड में बाबा तुलसी कागभुशुंडि के पूर्वजन्म की कथा का प्रसंग उठाते हुए कलियुग का वर्णन करते हैं। आज के जीवन की तमाम स्थितियाँ प्रतीक के रूप में, लक्षणों के रूप में कलियुग के वर्णन द्वारा इस प्रकार प्रकट होती हैं, जिन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा तुलसी ने उस समय ही आज के जीवन को देख लिया था, जान लिया था। वे कलियुग प्रसंग में लिखते हैं-

सब  नर  काम  लोभ  रत  क्रोधी । देव  बिप्र  श्रुति  संत  बिरोधी ।।

गुन  मंदिर  सुंदर  पति   त्यागी । भजहिं  नारि  पर  पुरुष  अभागी ।।

सौभागिनी    बिभूषन    हीना । विधवन्ह    के    सिंगार   नवीना ।।

गुरु सिष  बधिर  अंध का लेखा । एक   सुनइ  एक  नहिं  देखा ।।

हरहिं  सिष्य   धन  सोक  न हरइ । सो  गुरु  घोर  नरक  महुँ  परइ ।।

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं । उदर भरै सोइ धरम सिखावहिं ।।14

आज का समय उन्हीं लक्षणों से भरा हुआ है, जिनका वर्णन बाबा तुलसी ने उपरोक्त पंक्तियों में किया है। वैश्वीकरण के प्रभाव के रूप में इन्हें देखा जा सकता है। व्यक्ति से लेकर परिवार और फिर समाज तक मर्यादा के पतन की गंभीर स्थितियाँ किसी से छिपी हुई नहीं हैं। शिक्षा-व्यवस्था भी मर्यादा से च्युत होकर दिग्भ्रमित हो गई है। इसी के प्रभाव से आज माता-पिता अपने बच्चों को सदाचारी बनने की सीख देने से ज्यादा प्राथमिकता उस सीख को देते हैं, जिससे वे अपना उदर भर सकें, धन कमा सकें। ऐसी अनेक स्थितियों का वर्णन तुलसीदास ने किया है। यहाँ भी तुलसीदास परिवार को ही केंद्र में रखते हैं।

श्रीरामचरितमानस में औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण और आर्थिक उदरीकरण के कारण उपजने वाले दुष्प्रभावों का शमन करने की सामर्थ्य है, किंतु यह व्यवहार से, दैनंदिन जीवन से दूर होते जाने के कारण अपनी प्रासंगिकता और अनिवार्यता का बोध कराने में विफल हो गई है। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत घर की सीमाओं से बाहर ही होती है। उदारीकरण अर्थ के क्षेत्र में जितना हुआ; उसने मानवीय मूल्यों, मर्यादाओं और नैतिकताओं के संदर्भ में अन-उदारीकृत होना स्वीकार किया। यह स्वीकृति सहज नहीं है, वरन् आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप अनिवार्य है। अन-उदारता का यह क्रम व्यवसाय और व्यावसायिक हितों को पूरा करते-करते एक समय घर की देहरी पर आ गया, दरवाजे पर ही आ गया.... और आज परिवार तक पैठ चुका है। इसी कारण एक छत के नीचे रहते हुए परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने हितों को साधते और स्वार्थ से पूर्ण प्रतीत होते हैं। परिवारों के विघटन का सबसे बड़ा कारण यही है। यद्यपि विभिन्न संस्कृतियों के आगमन, आधुनिकता के प्रभाव और निरंतर गतिमान विकास के चक्र के फलस्वरूप स्थितियाँ पहले ही अच्छी नहीं थीं, किंतु वैश्वीकरण ने बहुत कुछ बदला है, बहुत तेजी से बदला है। इस अवधि में वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ी है। विवाह-व्यवस्था की शुचिता प्रभावित हुई है और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जैसी व्यवस्थाओं ने परिवाररूपी संस्था को तोड़कर रख दिया है। संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ है और इतना ही नहीं, अब परिवार के स्थान पर व्यक्ति ही सबसे छोटी इकाई बनने लगा है। ये सारे बदलाव नीति-नैतिकताओं, मर्यादाओं और आदर्शों के तिरोहित हो जाने के कारण हुए हैं। आज वैश्वीकरण के कारण व्यक्ति जितना वैश्वीकृत हुआ है, उतना ही जटिल और संकुचित वृत्त में अपने परिवेश का होकर रह गया है। इसके कारण मनोविकृतियाँ भी बढ़ी हैं और अपराध-अन्याय भी बढ़े हैं।

विकास का यह क्रम अनवरत चलता रहेगा, किंतु जिन पारिवारिक मूल्यों, मर्यादाओं, आदर्शों, नैतिकताओं और उदात्त गुणों की कीमत पर विकास का क्रम संचालित हो रहा है, उनके सिमटने के बाद विकास के नाम पर क्या शेष बचेगा, यह आज का यक्ष प्रश्न है। इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास के मानस को ही रखा जा सकता है-

रघुबंसभूषन  चरित  यह  नर  कहहिं  सुनहिं जे गावहीं ।

कलिमल मनोमल धोइ बिनु स्रम रामधाम सिधावहीं ।।

-राहुल मिश्र

 

(राष्ट्रधर्म, लखनऊ के आषाढ़-श्रावण, सं. 2081 तदनुसार जुलाई, 2024 अंक में प्रकाशित)

Wednesday, 15 May 2024

धन्य भरत जय राम गोसाईं

 

धन्य भरत जय राम गोसाईं

अयोध्या से चित्रकूट की ओर पूरी अयोध्या नगरी ही चल पड़ी है। अयोध्या की देखभाल करने के लिए कुछ वृद्ध और अशक्तजन ही बचे हैं, जो लंबी यात्रा नहीं कर सकते। अनेक लोग अपनी अक्षमता के बाद भी यात्रा पर चल पड़े हैं। एक कसक, एक टीस जो रह-रहकर उभरती रही थी, उसके समाधान का मार्ग अब इस यात्रा में ही सूझ रहा है। सभी के पैरों की गति मानों यही बता रही है। यह यात्रा कोई सहज-साधारण यात्रा नहीं है। राजपरिवार के सभी जन, नर-नारी, बालक-युवा सभी एकसाथ चले जा रहे हैं। इस यात्रा का अनुष्ठान भरत ने किया है। भरत अयोध्या के भावी राजा हैं, क्योंकि राजा दशरथ परलोक सिधार चुके हैं, और उनक दिए गए वचन के अनुसार राम को वनवास मिला है, भरत को अयोध्या का राजपाट मिला है। दृष्टि भरत पर जाकर टिक जाती है। भरत पैदल जा रहे हैं, और देखने वाले एक भावी राजा के तन और मन, दोनों की गतियों को देख रहे हैं-

मानव ही नहीं देवता तक वह दृश्य निहार लजाते हैं,

हैं साथ पालकी अश्व बहुत, पर भरत ‘पयादे’ जाते हैं ।

हे जग के धनवानों, देखो धन रहते धनपति निर्धन हैं,

यह राजयति की छवि है, यह शाही फकीर के दर्शन हैं ।

रामलीला में यह प्रसंग इतना मार्मिक और भावुक कर देने वाला होता है, कि दर्शकों की आँखें गीली हो जाती हैं। रामलीला के विभिन्न प्रसंगों की लीलाओं में भरत-मिलाप की लीला का अपना ही महत्त्व है। रामकथा के ऐसे प्रसंग, जो अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं, और लोक के महत्त्व के लिए जिनका मंचन अनिवार्य समझा जाता है, उनमें सर्वप्रमुख लीला भरत-मिलाप की होती है। भरत-मिलाप के पूर्व अयोध्या की दशा का अत्यंत मार्मिक वर्णन विभिन्न रामकथाओं में है। महाकवि कंबन, जो रामकथा रचकर महर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हुए, उनकी कंब रामायण में अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन मिलता है। लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व रचित तमिल के महाकाव्य- कंब रामायण में विरह से व्याकुल अयोध्या नगरी का वर्णन मिलता है। अयोध्या महाराजा दशरथ के परलोकगमन की वेदना से कहीं अधिक व्याकुल राम के वियोग से है। इस पर भी भरत ने अयोध्या के राजपाट को स्वीकारा नहीं है। लेकिन भरत ने यह घोषणा कर दी है, कि वे वनवासी राम को मनाने के लिए जाएँगे, और मनाकर ले आएँगे। इस घोषणा के कारण सारी अयोध्या चैतन्य हो उठी है। वियोग के अनेक उपमानों-प्रतीकों-बिंबों के मध्य उमंग-उल्लास का परस्पर विरोधाभासी वर्णन कितने सुंदर तरीके से कंब रामायण में हुआ है, देखते ही बनता है। राम को ले आने के लिए अयोध्या के समग्र जन-समुदाय का चल पड़ना, गजों-अश्वों का प्रस्थान, मार्ग के विविध प्रसंग आदि कंब रामायण में विस्तार से मिलते हैं।

कथा-वाचस्पति, श्रीहरिकथा विशारद, कविरत्न राधेश्याम कथावाचक ने अपनी राधेश्याम रामायण में भरत-मिलाप का सुंदर वर्णन किया है। चित्रकूट में राम और लक्ष्मण के सामने भरत का पहुँचना कोई साधारण घटना नहीं थी। पूरे सैन्य-बल के साथ वनवासी राम के सम्मुख भरत का आगमन लक्ष्मण के मन में संदेह पैदा कर देता है। कुछ रामायण-पाठों में राम और सीता भी संदेह से भरे हुए दिखते हैं। लेकिन राधेश्याम रामायण में अत्यंत भावुकतापूर्ण वर्णन है, जो अन्यत्र इस भाँति तो नहीं ही मिलता है। लक्ष्मण के मन का संदेह आज कुछ कर गुजरने को है। कोल-भीलों द्वारा दी गई सूचना और सूचना की सत्यता प्रकट करते लक्षण अवश्य ही संदेह पैदा करते हैं, लेकिन राम विचलित नहीं होते हैं। उनका धैर्य और मन का विश्वास अडिग है। उन्हें भरत पर भरोसा है, कि वे किसी दुर्भावना के साथ यहाँ नहीं आए होंगे। वे लक्ष्मण को रोकते हैं, सचेत करते हैं, लेकिन लक्ष्मण मानते नहीं हैं। अचानक एक बावला सामने आकर खड़ा हो जाता है, और पूरा परिवेश ही एकदम बदल जाता है। राधेश्याम कथावाचक कहते हैं-

नंगे   थे   पाँव   बावले  के—कीचड-मिट्टी   में   लिसे  हुए ।

कुछ कुछ  बह रहा रक्त भी था, काँटे भी थे कुछ चुभे हुए ।।

थे  काले  बाल  धूलि-धूसर,   पीले   मुखड़े   पर   पड़े  हुए ।

जिस  भाँति   भयानक  आँधी  में  श्रीसूर्य देव हों छिपे हुए ।।

उस पर उसकी  उस हालत पर, दर्दीली चितवन जमा तुरत ।

आगे  को  सीतानाथ    बढ़े—आजानु   भुजाएँ   बढ़ा  तुरत ।।

वह व्याकुलता थी  बढ़ने की, धनु कहीं कहीं पर तीर गिरा ।।

महि पर-तर्कश के  साथ-साथ  वह मुनियोंवाला चीर गिरा ।।

बावला   चाहता   है  पहले  रघुवर  को  शीश  झुका  लूँ मैं ।

रघुवीर—चाहते   हैं   पहले    छाती  से  उसे  लगा  लूँ  मैं ।।

आखिर  रघुवर की विजय हुई, हाथों पर उठा लिया उसको ।

वह  चरण  छुए  उससे  पहले छाती से लगा लिया उसको ।।

जब हृदय हृदय का मिलन हुआ-तो दूर विरह का ताप हुआ ।

अब  सबने  देखा— ‘चित्रकूट’ में  ऐसे-'भरत-मिलाप’ हुआ ।।

चित्रकूट का पावन-पुनीत स्थल दो भाइयों के अगाध-असीम स्नेह का भी साक्षी बनता है। शंकाएँ दूर हो जाती हैं। मन के विषाद मिट जाते हैं। चित्रकूट तो वैसे भी अवलोकन-मात्र से विषादों को हर लेने वाला है। यहाँ अयोध्या की प्रजा अपने प्रिय राम को देखकर आह्लादित है। माता कैकेयी, सुमित्रा, कौशल्या आदि माताओं के साथ ही गुरुजन उपस्थित हैं। विदेहराज जनक भी भरत की इस यात्रा का समाचार पाकर सीधे चित्रकूट आ जाते हैं। विंध्य की छाँह तले चित्रकूट गिरि, चित्रकूट परिक्षेत्र अब अनजाना-सा नहीं रह जाता। मिथिला के राजा जनक, निषादराज गुह, अयोध्या का पूरा राजपरिवार और समूची सेना चित्रकूट में जुट जाती है। चित्रकूट की भूमिका एक नए रूप में प्रकट होती है।

भक्तकवि सूरदास के लिए भरत और राम का मिलन बहुत भावुक कर देने वाला है। सूरदास ने इस मेल के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। रामकथा पर लिखे उनके पदों का संकलन सूर-राम चरितावली में है। भक्तकवि सूरदास कहते हैं-

   भ्रात मुख निरखि राम बिलखाने।

मुंडित केस सीस, बिहबल दोउ, उमँगि कंठ लपटाने ।।

तात-मरन  सुनि  स्रवन कृपानिधि  धरनि  परे मुरझाइ ।

मोह-मगन, लोचन जल-धारा,  विपति न हृदय समाइ ।।

लोटति धरनि परी  सुनि सीता,  समुझति नहिं समुझाई ।

दारुन दुख दवारि ज्यों तृन-बन, नाहिंन बुझति बुझाई ।।

दुरभ   भयौ   दरस   दसरथ कौ,  सो  अपराध   हमारे ।

‘सूरदास’  स्वामी  करुनामय,   नैन     जात   उघारे ।।

राजा दशरथ का परलोकगमन श्रीराम को विचलित कर देता है। अयोध्या का दुर्योग ऐसा था, कि राजा दशरथ के प्राणांत के समय उनका कोई भी पुत्र वहाँ उपस्थित नहीं था। पुत्र-वियोग से कहीं अधिक भाई-भाई के मध्य विवाद का दंश राजा दशरथ को भीतर ही भीतर तोड़ रहा होगा, ऐसा प्रतीत होता है। अयोध्या इस विषम काल की प्रत्यक्षदर्शी बनती है, लेकिन चित्रकूट...। यहाँ आज सत्ता के सारे केंद्र सिमटकर इकट्ठे हो गए हैं। राजा दशरथ के परलोकगमन के बाद अयोध्या किसकी होगी, यह तय करने का काम आज चित्रकूट के हिस्से आ गया है।

चित्रकूट में भरत-मिलाप कोई सामान्य घटना नहीं रह जाती, वरन् भविष्य की कार्य-योजना तय करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी इस प्रसंग की गंभीरता को प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए भरत पूज्य हैं, वंदनीय हैं। भरत और राम के प्रेम का वर्णन वे विस्तार के साथ करते हैं। चित्रकूट में राम और भरत का मिलन दैवलोक तक हर्ष और उल्लास का प्रसार करता है-

धन्य  भरत  जय  राम  गोसाईं ।  कहत  देव  हरषत  बरिआईं ।।

मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू । भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ।।

भरत  राम  गुन  ग्राम   सनेहू ।  पुलकि   प्रसंसत   राउ  बिदेहू ।।

अयोध्याकांड में प्रसंग आता है, कि अयोध्या के सभी नर-नारी चित्रकूट पहुँचते हैं, और पाँच दिनों तक रुकते हैं। छठवें दिन सभी प्रस्थान करते हैं। भरतजी एक विश्वास अपने मन में लेकर आए थे, कि वे अपनी माता के अपराध का प्रायश्चित्त भी करेंगे और श्रीराम को अयोध्या ले आएँगे। यदि इतने से बात नहीं बनी, तो वे स्वयं वन में रुक जाएँगे, और श्रीराम को अयोध्या जाने के लिए कहेंगे। पाँच दिनों तक इस विषय को लेकर मंथन चलता है। इसी अवधि में विंध्य गिरि के तले एक प्राचीन पवित्र सिद्ध-स्थल में कूप तैयार कर, उसमें सभी तीर्थों का जल डालकर स्थान को नया नाम भरतकूप का दिया जाता है। भरतजी इस अवधि में चित्रकूट के सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करते हैं, और चित्रकूट में रम रहे श्रीराम के गुणों का श्रवण कर आनंदित होते हैं। पाँच दिनों के मंथन का नवनीत छठवें दिन निकलता है। इसी दिन सबको अयोध्या के लिए प्रस्थान भी करना है। मानस में भरत-मिलाप के प्रसंग का छठवाँ दिन बड़े महत्त्व का है। बाबा तुलसी लिखते हैं-

भोर  न्हाइ  सबु  जुरा समाजू ।  भरत  भूमिसुर  तेरहुति  राजू ।।

भल दिन आजु जानि मन माहीं । राम कृपाल कहत सकुचाहीं ।।

करि  दंडवत  कहत कर जोरी ।  राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ।।

मोहिं  लगि सबहिं  सहेउ संतापू ।  बहुत भाँति दुखु पावा आपू ।।

अब  गोसाईं  मोहि  देउ रजाई ।  सेवौं  अवध  अवधि भर जाई ।।

जेहिं  उपाय  पुनि  पाय   जनु   देखै  दीनदयाल ।

सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ।।

आरति  मोर  नाथ कर   छोहू ।  दुहुँ मिलि कीन्ह दीठु हठि मोहू ।।

यह बड़ दोषु दूर करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ।।

भरत  बिनय सुनि सबहिं  प्रसंसी । खीर नीर  बिबरन  गति हंसी ।।

अनुकूल समय जानकर भरत जी अपनी बात कहते हैं। राम और भरत का स्नेहभाव ही यहाँ बचा है। बीच का कलुष-कल्मष धुल चुका है। दोनों भाइयों के बीच स्नेह की अविरल मंदाकिनी, मंदाकिनी के तीर पर बह रही है। राम को अयोध्या का राजपाट नहीं चाहिए। भरत को भी ‘अवधि भर’ के लिए ही अवध को पालना है, फिर राम को वापस लौटा देना है। संपत्ति का मोह दोनों में से किसी को नहीं है। भरत स्वयं ही श्रीराम से कहते हैं, कि मेरे आर्त भाव ने, और आपके आत्मीय प्रेम ने मुझे हठी बना दिया है, इसी कारण मैं हठ कर रहा हूँ। मेरे दोष को दूर करके, और अपने संकोच को मिटा करके आप अपने इस अनुगामी को सीख दें, कि मैं किस तरह से ‘अवधि भर’ के लिए अवध का पालन करूँ?

मोर   तुम्हार  परम  पुरषारथु । स्वारथु   सुजसु  धरम   परमारथु ।।

पितु   आयसु  पालिहिं  दुहु  भाई ।  लोक  बेद  भल  भूप  भलाई ।।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ।।

अस  बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु  अवध  अवधि  भर  जाई ।।

श्रीराम कहते हैं, कि मेरा और तुम्हारा परम पुरुषार्थ, परमार्थ, स्वार्थ, धर्म और सुयश सभी कुछ इसी में है, कि हम दोनों ही भाई पिता की आज्ञा का पालन करें, ताकि लोक और शास्त्र दोनों में राजा का हित हो, अर्थात् राजा की मान-प्रतिष्ठा को कहीं पर भी कोई ठेस न पहुँचे। गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा का पालन करने पर कुमार्ग में चलने पर भी पैर नीचे नहीं पड़ता, कर्म में पतन नहीं होता है। ऐसा विचार मन में रखते हुए चिंता को त्याग करके जाओ और ‘अवधि भर’ के लिए अवध का पालन करो।

दोनों भाइयों की स्थिति एकदम स्पष्ट है। दोनों को केवल अपने-अपने भाग्य के कर्म करने हैं। अयोध्या का साम्राज्य दोनों में से किसी के मन में लेशमात्र भी लालच उत्पन्न नहीं कर पाता है। चित्रकूट की पुण्यश्लोका धरा साक्षी बनती है, कि अयोध्या का समृद्धशाली साम्राज्य किस तरह कंदुक-सम दोनों भाइयों के बीच एक पाले से दूसरे पाले में जा रहा है। दोनों में से कोई भी अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा। यह हमारी सनातन परंपरा का ऐसा जाज्वल्यमान उदाहरण है, जो अन्यत्र दुर्लभ है। और इस प्रसंग को बाबा तुलसी ने इतना विस्तार से लिखा, तो आखिर क्यों? बाबा तुलसी का रचनाकाल भारत की पराधीनता का समय था। विदेशी आक्रांताओं के साम्राज्य कैसे बनते-बिगड़ते थे, यह बाबा तुलसी ने देखा था। पिता अपने पुत्र को बंदी बना रहा था, तो पुत्र अपने पिता और भाइयों की हत्या करके बादशाह बन रहा था। इस विषमता के कालखंड में बाबा तुलसी की लेखनी भरत और राम के प्रेम को विस्तार से बखानती है, पथभ्रष्टों को रास्ता दिखाती है।

श्रीराम से भरत पूछ रहे हैं, और राम बता रहे हैं-

मुखिया  मुख  सो  चाहिए  खान पान कहुँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ।।

राजधरम  सरबसु एतनोई ।  जिमि मन माँह मनोरथ गोई ।।

बंधु प्रबोध कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ।।

मुखिया को मुख की भाँति होना चाहिए। उसे भेदभाव नहीं करना चाहिए। मुख खान-पान में एक होता है, लेकिन जो भी ग्रहण करता है, उससे सारे शरीर का पालन विवेकपूर्ण ढंग से करता है। जिस तरह मन में मनोरथ छिपे होते हैं, और अन्य कार्य-व्यवहार उससे निकलकर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार राजधर्म होता है। राजधर्म का सार भी इतना ही है। भरत जी के लिए ये सीख दिशा-निर्देशक बन जाती है, किंतु उन्हें भौतिक आधार के बिना संतोष नहीं होता। राम अपनी चरण पादुकाएँ उतारकर दे देते हैं। भरत उन्हें अपने सिर पर रख लेते हैं। वाल्मीकि रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में हेमभूषित पादुकाएँ बताई गईं हैं, तो गौड़ीय पाठ में शरभंग ऋषि द्वारा भेजी गईं कुश-पादुकाओं को राम द्वारा दिए जाने की बात कही गई है। जातक कथाओं में पादुकाओं द्वारा न्याय किए जाने की बात आती है।

भरत के लिए राम की चरण पादुकाएँ संबल बनती हैं। वे विधिवत् उन्हें सिंहासन में स्थापित करते हैं। स्वयं नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहते हैं।

राम  मातु  गुर  पद सिरु नाई ।  प्रभु  पद पीठ  रजायसु पाई ।।

नंदिगाँव  करि परन कुटीरा ।  कीन्ह निवासु  धरम  धुर धीरा ।।

जटाजूट  सिर  मुनिपट धारी ।  महि खनि कुस साँथरी सँवारी ।।

असन बसन बासन ब्रत नेमा ।  करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ।।

भूषन  बसन  भोग सुख  भूरी ।  मन तन  बचन  तजे तिन तूरी ।।

अवध  राजु  सुर राजु सिहाई ।  दसरथ  धनु सुनि धनदु लजाई ।।

तेंहि  पुर बसत भरत बिनु रागा ।  चंचरीक  जिमि  चंपक बागा ।।

भरत के लिए अयोध्या का राजपाट सुखभोग के लिए नहीं है। वे कठिन साधना करते हैं, ऋषिधर्म का निर्वाह करते हैं। जिस अयोध्या नगरी की समृद्धि को देखकर देवता भी ललचाते हैं, जिस अयोध्या नगरी की संपन्नता को सुनकर धनपति कुबेर भी लजाते हैं, उस अयोध्या नगरी का मोल भरत के लिए तृण के समान है। जैसे चंपक के वन में भौंरा रहता है, वैसे ही संसक्ति से विहीन होकर भरत रह रहे हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भरत द्वारा अयोध्या के राजपाट के संचालन का विशद-व्यापक वर्णन किया है। वे समकालीन परिस्थितियों के मध्य एक दीपस्तंभ की तरह भरत को प्रस्तुत करते हैं। सत्ता के मद में, शक्ति के अहंकार में, धन के घमंड में चूर समाज के समक्ष वे भरत को प्रस्तुत करते हैं। मानस में भरत का विराट व्यक्तित्व प्रकट होता है। रामराज्य की बात बार-बार कही जाती है। यह रामराज्य स्थापित कैसे हुआ, इस प्रश्न का उत्तर तुलसी के मानस में मिलता है। जब भरत जैसा शासक संसक्तिविहीन होकर राजपाट को चलाता है, तब राजमद नहीं होता। जब शासक आसक्ति से मुक्त होकर संन्यस्त-भाव से राजपाट को चलाता है, तब राजमोह नहीं होता। वह अपने दायित्व को ‘अवधि भर’ निभाने से आगे नहीं जाता, अपना अधिकार नहीं जताता। वह निर्विकार-निर्लिप्त भाव से सत्ता सौंप देने के लिए तत्पर रहता है, तैयार रहता है। रामराज्य तभी बनता है। रामराज्य के प्रवर्तक-संस्थापक भरत बनते हैं। भरत ही रामराज्य स्थापित कर पाते हैं। इसी कारण राम के सबसे प्रिय भरत हैं। लक्ष्मण से भी अधिक....। इसी कारण लक्ष्मण के मन में उठने वाली शंका पर राम मौन रहते हैं, लक्ष्मण को समझाते हैं। राम भरत को लेकर आश्वस्त हैं, इसी कारण वे लक्ष्मण के मन में उठी शंकाओं का शमन करते हैं, उन्हें समझाते हैं।

भरत और राम का मिलन इसी कारण रामकथा में, रामलीलाओं में अपना विशेष महत्त्व रखता है। भरत और राम का मिलन रामकथा में दो बार आता है। भरत-मिलाप के दो प्रसंग हैं। एक चित्रकूट में, दूसरा अयोध्या में...। एक वनवास गए राम के साथ, दूसरा वन से लंका-विजय करके लौटे राम के साथ...। वाराणसी में दूसरे भरत-मिलाप का प्रसंग खेला जाता है। वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला बहुत प्रसिद्ध है। वैसे तो शिव की नगरी में जब राम उतरते हैं, तो सारी नगरी ही एक रंगमंच बन जाती है। कहीं लंका, तो कहीं अयोध्या...। पूरे वाराणसी में रामलीला के अलग-अलग प्रसंग अलग-अलग स्थानों में खेले जाते हैं। एकदम अनूठा ही रंग दिखता है। नाटी इमली की रामलीला भरत-मिलाप के प्रसंग से जुड़ी है।

राम ने लंका को जीत लिया है। विभीषण को लंका का राजपाट सौंप दिया है, और स्वयं अयोध्या की ओर चल पड़े हैं। भरत, जो नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रह रहे हैं, उनके पास समाचार आता है, कि राम अयोध्या पहुँच रहे हैं। भरत की हठ है, कि राम यदि सूर्य ढलने के पहले उनसे आकर नहीं मिलेंगे, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। यह हठ राम के स्नेह के कारण है, दोनों भाइयों के आपसी प्रेम की प्रगाढ़ता के कारण है। अनेक लोगों से मिलते-मिलते राम को देर हो जाती है, और राम अचानक चिंतित हो उठते हैं, भरते के लिए। उधर सूरज ढलने को है। राम दौड़कर जाते हैं, और भरत को गले लगा लेते हैं। यह प्रसंग नाटी इमली की रामलीला में इसी भाव के साथ खेला जाता है। मैदान में एक विशेष स्थान पर जब ढलते सूरज की किरणें पड़ रहीं होती हैं, तब राम और भरत का मिलाप होता है। उपस्थित जन-समुदाय भावावेश में विह्वल हो उठता है। इस रामलीला को देखने स्वयं काशी नरेश आते हैं।

भरत और राम के प्रेम को रामकथाओं के साथ ही लोकजीवन ने अपनाया है। इसी कारण भरत-मिलाप की लीला लोक को सुहाती है। लोककथाओं में भरत और राम का प्रेम दिखता है। गोस्वामी तुलसीदास के लिए भरत आदर्श हैं, प्रेरणा के स्रोत हैं। वे बार-बार अपने आराध्य श्रीराम से भरत के गुण कहलाते हैं-

लखन  तुम्हार  सपथ पितु आना ।  सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ।।

भरतु  हंस  रबिबंस  तड़ागा ।   जनमि  कीन्ह  गुन  दोष बिभागा ।।

कहत   भरत  गुन  सील सुभाऊ ।   पेम  पयोधि  मगन  रघुराऊ ।।

जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ।।

कबि कुल  अगम  भरत गुन गाथा ।  को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ।।

यदि भरत न होते, तो संसार में समस्त धर्मों की धुरी कौन धारण करता। भरत तो धर्म की धुरी हैं। श्रीराम भरत के गुणों के गायक हैं, वाचक हैं, प्रस्तोता हैं। भरत के गुणों की कथा अगम्य है, और श्रीराम के बिना उन गुणों को कोई नहीं जान सकता।

वाराणसी में नाटी इमली की भरत-मिलाप की लीला के साथ लोकमान्यता जुड़ी है, कि श्रीराम स्वयं इस लीला में उपस्थित होते हैं। बाबा तुलसी द्वारा स्थापित रामलीलाओं के मंचन की परंपरा को मेधा भगत ने आगे बढ़ाया था। मेधा भगत को श्रीराम ने नाटी इमली की रामलीला स्थली में दर्शन दिए थे। श्रीराम का भरत के प्रति अगाध प्रेम लोक को भाता है, क्योंकि लोक इस भाव से रस-संचय कर अपने लिए सीख लेता है, अपने को सीख देता है। गोपीगंज की भरत-मिलाप की लीला भी बहुत प्रसिद्ध है। भाइयों के बीच निष्काम प्रेम-भाव, परिवार के मेल-जोल और निर्विकार-निर्लिप्त राजशासन की भावना भरत-मिलाप की लीला को हर स्थान पर प्रिय बनाती है। चित्रकूट के साथ जितना गहरा संबंध राम का है, उतना ही गहरा संबंध भरत का भी है।

चित्रकूट ने भरतजी के त्याग को, उनके समर्पण को, उनके निर्विकार भाव को, उनके सहज आत्मीय स्वभाव को देखा है। इसी कारण आज भी चित्रकूट में भरतजी की जय-जयकार होती है। रामघाट की संध्या आरती में, विभिन्न मंदिरों की आरती में आज भी भरत जी के नाम का जयकारा लगाया जाता है। लोक सदा से ही राम को धन्य कहता आया है, और भरत की जय-जयकार करता आया है। लोक की आकांक्षा भरत-मिलाप की लीला में पूर्ण होती है।

-राहुल मिश्र

(वार्षिक कर्तव्य मार्ग, जम्मू के वर्ष-2, अंक-2, 2024 में प्रकाशित)