Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।


Friday, 5 September 2025

हमें एक जलता युग दिखा है, जो देखा वही कागजों पर लिखा है... : डॉ. अजय प्रसून से डॉ. राहुल मिश्र की बातचीत


हमें एक जलता युग दिखा है, जो देखा वही कागजों पर लिखा

 है... : डॉ. अजय प्रसून से डॉ. राहुल मिश्र की बातचीत

हिंदी के जाने-माने कवि डॉ. अजय प्रसून (डॉ. अजय कुमार द्विवेदी) लखनऊ (उत्तरप्रदेश) में रहते हुए विगत पैंतालीस से अधिक वर्षों से साहित्यसेवा में संलग्न हैं। डॉ. प्रसून का जन्म 18 जनवरी, 1954 को लखनऊ में हुआ। आपके माता-पिता श्रीमती कांतीदेवी द्विवेदी व श्री सरोज कुमार द्विवेदी धर्मनिष्ठ व सरल-सहज स्वभाव के थे। डॉ. प्रसून लखनऊ स्थित प्रशिक्षण एवं सेवायोजन निदेशालय में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ देते हुए भी वे कवि-कर्म में संलग्न रहे और संप्रति, सेवानिवृत्ति के उपरांत अनवरत् साहित्य-साधना में संलग्न हैं।

डॉ. अजय प्रसून अनागत कविता आंदोलन के प्रेरक, प्रवर्तक और प्रस्तावक हैं। ‘कठिन वर्तमान को जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कामना’ के ध्येय-वाक्य पर डॉ. फ3सून द्वारा अनागत कविता आंदोलन को उस समय स्वर दिया था, जब कविता में नकारात्मकता और नैराश्य का भाव बढ़ता दिख रहा था। सत्तर के दशक में, जब कविता में संत्रास, त्रासदी, मोहभंग, हताशा, निराशा जैसे भाव दिख रहे थे, उन दिनों में अनागत कविता आंदोलन के माध्यम से डॉ. प्रसून ने कविता को लोकरंजन के साथ ही पथ-प्रदर्शन के सकारात्मक पक्ष से जोड़ने की बात कही। सनातन परंपरा में कर्म की प्रधानता और भविष्य के प्रति सकारात्मकता का सिद्धांत उनके द्वारा प्रवर्तित अनागत कविता आंदोलन के ध्येय-वाक्य में परिलक्षित होता है।

डॉ. अजय प्रसून द्वारा रचित 1. युग के आँसू (खंडकाव्य), 2. गाओ गीत सुनाओ गीत (बाल-काव्य / उ.प्र. शासन द्वारा पुरस्कृत), 3. बच्चों की प्यारी कविताएँ (बाल-काव्य), 4. बच्चे गायें गीत (बाल-काव्य), 5. बच्चों शिष्टाचार न भूलो (बाल-काव्य), 6. महानगर के बीच (हिंदी गजल), 7. बाँसुरी की भीतरी तह में (अनागत काव्य-संग्रह), 8. दर्पण शिलालेख हो जाये (अनागत गीत-संग्रह), 9. आँसुओं का बयान जारी है (अनागत गजल-संग्रह / उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा अनुदान प्राप्त), 10. श्री हनिमान अस्सीसा, 11. श्री शनि अस्सीसा, 12. कालजयी हम प्यास लिये (अनागत गीत-संग्रह), 13. प्रश्न अनशन किये जो बैठे हैं (मुक्तक संग्रह) आदि कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन काव्य-कृतियाँ प्रकाशनाधीन हैं।

संपादक के रूप में डॉ. प्रसून ने शब्द नए गढ़ने हैं, अनागत के कमल हैं हम... सहित हिंदी की प्रमुख काव्य-केंद्रित त्रैमासिकी ‘ताम्रपर्णी’ के संपादन सहित हिंदी की शोध-संदर्भ पत्रिका नूतनवाग्धारा के संयुक्त विशेष-अंक 44-48, वर्ष 14, दिसंबर, 2021 (अनागत कविता आंदोलन : नई सुबह की आहट)  का संपादन (अतिथि संपादक) किया है।

डॉ. प्रसून को समकालीन बाल साहित्यकार के रूप में भी जाना जाता है। वे हिंदी बाल-साहित्य का इतिहास में बाल-साहित्यकार के रूप में स्थापित रचनाकार हैं। डॉ. प्रसून का कवि-जीवन ही बाल साहित्यकार के रूप में प्रारंभ हुआ। प्रकाशित बाल-काव्य संग्रहों के अतिरिक्त हिंदी की प्रतिष्ठित बाल-साहित्य की पत्रिकाओं व समाचारपत्रों के परिशिष्ट, यथा- बाल भारती, नंदन, कच्ची धूप, बाल कविता, बाल दर्शन, मानवी, यू.एस.एम. पत्रिका, बाल गीतांजलि, बाल वाणी, बाल परंपरा, आज, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण, नवजीवन, मेला, योजना, बाल साहित्य समीक्षा, स्वतंत्र भारत सुमन, खिले अधखिले, दिल्ली मासिक, शब्दलता, नया प्रभात, पराग, कुटकुट, बाल मन, यश कमल, बाल गीत, पत्रिका, जनलोक, संगीत, दृष्टिकोण बाल विशेषांक आदि में बाल-कविताएँ प्रकाशित हुईं है। हिंदी की प्रतिष्ठित ताम्रपर्णी पत्रिका के बाल-विशेषांक का संपादन भी डॉ. प्रसून ने किया है।

डॉ. प्रसून को विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से पुरस्कृत किया गया हैं। इसमें कुछ प्रमुख सम्मान व पुरस्कार हैं- कृति ‘गाओ गीत सुनाओ गीत’ के लिए उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा अनुशंसा पुरस्कार- 1981, राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी जी की इच्छा पर लखनऊ की संस्थाओं द्वारा अभिनंदन, 28.02.1980 को, मुगलसराय लायंस क्लब द्वारा सम्मान, 1992, कवितालोक सृजन संस्थान द्वारा गीतिका-गंगोत्री सम्मान- 2015, काव्य-गंगोत्री सम्मान- 2017, महिला उत्थान समिति द्वारा साहित्य सुधाकर सम्मान- 2019, राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान द्वारा साहित्य गौरव सम्मान- 2019, यू.पी. प्रेस क्लब द्वारा साहित्य सृजन सम्मान- 2017, सुंदरम् संस्थान द्वारा सुंदरम् रत्न सम्मान- 2018, जी.डी. फाउंडेशन द्वारा अवधश्री सम्मान- 2019, सालासार (राजस्थान) में साहित्य सुधाकर सम्मान- 2019, स्नेह वेलफेयर फाउंडेशन द्वारा साहित्य सूर्य सम्मान- 2018, कविता लोक बिजनौर द्वारा कवितालोक आदित्य सम्मान- 2019, काव्यक्षेत्र संस्था द्वारा काव्यक्षेत्र काव्य किरीट सम्मान, युवा रचनाकार मंच, लखनऊ द्वारा ‘डॉ. अनंत माधव चिपलूणकर स्मृति सम्मान- 2019, भारतीय अटल सेना (राष्ट्रवादी) द्वारा प्रदत्त ‘भारतीय अटल लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड- 2020, श्री शब्द सरिता द्वारा सम्मान, 2021, युवा रचनाकार मंच द्वारा आजीवन साहित्यिक सेवा सम्मान- 2021, शिवभार गुर्जर लखनवी संस्था द्वारा ‘आचार्य पिंगल साहित्यश्री सम्मान’, पं. दुर्गाप्रसाद मित्र साहित्य सभा द्वारा पं. दुर्गा प्रसाद मित्र साहित्य शिरोमणि सम्मान- 2020, साहित्यिक संस्था काव्य प्रवाह का ‘काव्य गौरव सम्मान’, मार्तण्ड साहित्य संस्था द्वारा सम्मान- 2020, उत्तरप्रदेश राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, लखनऊ द्वारा अनागत मुक्तक-संग्रह- प्रश्न अनशन किये जो बैठे हैं पर एक लाख रुपये का अकबर इलाहाबादी पुरस्कार- 2021, युगधारा फाउंडेशन द्वारा ‘साहित्य प्रभाकर सम्मान- 2022’, कविता लोक द्वारा ‘गीतिका सम्मान- 2022, सुजान साहित्य संस्थान, जरई कलाँ, सुलतानपुर द्वारा ‘साहित्य शिरोमणि सम्मान- 2022’, अभिभावक कल्याण संघ, लखनऊ द्वारा ‘समाजसेवा प्रतिनिधत्व सम्मान’, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान- 2021 आदि।

डॉ. प्रसून को अपनी युवावस्था में डॉ. रामकुमार वर्मा के साथ भी मंच पर कविता पढ़ने का अवसर मिला है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी, बलवीर सिंह ‘रंग’, शारदा प्रसाद भुशुण्डि, उमादत्त त्रिवेदी आदि प्रख्यात कवियों के साथ मंच पर उपस्थिति रही है। विगत पैंतालीस से अधिक वर्षों से हिंदी के नामचीन कवियों के मध्य ख्याति है। आज भी अनेक मंचों पर आपकी कविताएँ सराही जाती हैं। कविताओं व गीतों के वीडियो यू-ट्यूब आदि सोशल नेटवर्किंग के पटल पर उपलब्ध हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों से नियमित प्रसारण, आकाशवाणी के अनुबंधित रचनाकार। इसके साथ ही सारेगामा प्रा. लि. ने आपके गीतों पर एक अलबम तैयार किया है। इसमें जगजीत सिंह के साथ आपके भी गीत हैं, जिसे देश के जाने-माने गायकों ने स्वर दिए हैं। डॉ. प्रसून एक अनौपचारिक गुरुकल की भाँति युवा पीढ़ी को कविता के गुर सिखाते हैं, और प्रोत्याहित भी करते हैं। इस हेतु उनके द्वारा विभिन्न सम्मानों, जैसे- अनागत कविता मार्तण्ड सम्मान (कवियों हेतु), अनागत कविता चंद्रिका सम्मान (कवयित्रियों हेतु), अनागत कविता भारती सम्मान, अनागत कविता पितृ स्मृति सम्मान आदि प्रदान किए जाते हैं, जो नवोदित कवियों-कवयित्रियों को प्रेरणा व प्रोत्साहन देते हैं।

सरल-सहज व्यक्तित्व के धनी और प्रचार-तंत्र से सर्वदा दूर वाग्देवी की आराधना और सेवा में संलग्न रहने वाले डॉ. अजय प्रसून ऐसे रचनाकार, कवि और साहित्यसेवी हैं, जिन्होंने कविता की विभिन्न पद्धतियों और विधाओं, जैसे- हिंदी गजल, गीतिका, दोहा, मुक्तक, मुक्तछंद, नवगीत, अवधी लोकगीत आदि में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है। विगत दिनों उनसे भेंट के समय डॉ. राहुल मिश्र ने उनसे हिंदी कविता के सामयिक संदर्भों सहित विभिन्न पक्षों पर वार्ता की। प्रस्तुत हैं इस वार्ता के महत्त्वपूर्ण अंश-

डॉ. राहुल मिश्र- हाल ही में आपको उत्तरप्रदेश राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, लखनऊ द्वारा अनागत मुक्तक-संग्रह- प्रश्न अनशन किये जो बैठे हैं पर एक लाख रुपये का अकबर इलाहाबादी पुरस्कार- 2021 तथा उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान- 2021 प्रदान किए गए हैं। इनके लिए शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए।

डॉ. अजय प्रसून- हार्दिक धन्यवाद, आपका।

डॉ. राहुल मिश्र- आप विगत पैंतालीस वर्षों से साहित्य-साधना में संलग्न हैं। आपका लेखन-कार्य मुख्यतः कविता के क्षेत्र में रहा है। अपने विस्तृत रचना-संसार पर आपका क्या कहना है?

डॉ. अजय प्रसून- मेरा लेखन 45 वर्षों से नहीं अपितु 52 वर्षों से चल रहा है। यह सही है, कि इस दौरान अधिकांशतः मैंने काव्य का ही सृजन किया है, लेकिन अनेक कहानियों एवं नाटकों का सृजन भी मेरे द्वारा संपन्न हुआ है। मैंने इस बीच तीन खंडकाव्य भी रचे हैं, साथ ही विभिन्न विषयों पर लेख भी लिखे हैं। ताम्रपर्णी (त्रैमासिक पत्रिका) का प्रकाशन एवं संपादन भी किया है। अब तक मेरी 15 काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, साथ ही मैंने अपने संपादन में कई अनागत काव्य-कृतियाँ सहयोगी रचनाकारों की कविताओं सहित प्रकाशित की हैं। एचएमबी सारेगामा द्वारा मेरे गीतों का एल्बम भी निकाला गया है। अनेकानेक शोध-प्रबंधों में मेरी चर्चा भी शामिल है। बाल-कविताओं का सृजन भी प्रचुर मात्रा में मेरे द्वारा किया गया है।

डॉ. राहुल मिश्र- सत्तर के दशक में जब आपने अनागत कविता आंदोलन की प्रस्तावना रखी, प्रवर्तन किया, उस समय हिंदी कविता की दशा-दिशा क्या थी, और अनागत कविता आंदोलन की प्रासंगिकता उस समय आप किस प्रकार देखते थे?

डॉ. अजय प्रसून- सन 70 से ही मेरा काव्य-सृजन शुरू हुआ। उस समय बड़े-बड़े दिग्गज कवियों का जमावड़ा साहित्य व कविता के क्षेत्र में था। कविता उस समय अपने चरमोत्कर्ष पर थी। कविता मंचों पर काव्य-पुष्पों की वर्षा होती थी, किंतु ऐसी स्थिति में नए कवियों की उपेक्षा भी अपने चरम पर थी। अपना स्थान बना पाना अति दुष्कर कार्य था, किंतु पूरी लगन और मन से किए गए प्रयास व्यर्थ नहीं जाते, अतः मुझे भी अवसर प्राप्त होते गए और मेरी कविता अपने लक्ष्य को प्राप्त करती रही। सन 1981 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा मेरी बाल-कृति ‘गाओ गीत सुनाओ गीत’ को अनुशंसा पुरस्कार भी मिला। ऐसे समय में मैंने अनागत कविता आंदोलन की प्रस्तावना भी सहित्य के सम्मुख प्रस्तुत की। थोड़े विरोध और सहयोग के बीच उसकी चर्चा भी प्रचुर रूप में चल पड़ी। अनागत कविता आंदोलन की प्रस्तावना रखने, प्रवर्तन करने आदि के संबंध में अपनी कुछ पंक्तियाँ कहना चाहूँगा-

हमें एक जलता युग दिखा है, / जो देखा वही कागजों पर लिखा है ।

हमारा सृजन तो सृजन ही नहीं है, / अनागत के इतिहास की भूमिका है।

डॉ. राहुल मिश्र- विगत पैंतालीस से अधिक वर्षों की काव्य-यात्रा में आपने अनेक उतार-चढ़ावों को कविता के क्षेत्र में देखा होगा। अनेक वाद और आंदोलन भी इस अवधि में आए, और चले गए, किंतु अनागत कविता आंदोलन के अनवरत चलते रहने का कारण क्या दिखता है?

डॉ. अजय प्रसून- यह सत्य है, कि जिस समय मैंने अनागत कविता आंदोलन की शुरुआत की थी, प्रवर्तन किया था, उस समय कई वाद और आंदोलन चल रहे थे। कई विलुप्त भी हो गए थे, और अनेक आंदोलन बाद के वर्षों में अचर्चित हो गए, किंतु अनागत कविता आंदोलन आज भी मुखर है, अनवरत प्रवाहमान है। इसके पीछे दार्शनिक विवेचन और भारतीय जीवन-दर्शन व सिद्धांत हैं। यह शाश्वत भावों और विचारों से सराबोर मानव के लिए हितचिंतक और नवीन पीढ़ी को नई दिशा देने वाला आंदोलन है। अनागत के मूल में कठिन वर्तमान जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कल्पना साकार होती हुई दिखती है। इसमें सकारात्मकता है, फल की कामना के स्थान पर कर्म की प्रधानता है और नकारात्मकता के स्थान पर कल के सुंदर व सुखद होने की कामना है। ये सभी जीवन को गतिशील और ऊर्जावान बनाने वाले पक्ष हैं। इसी कारण अनागत कविता आंदोलन अविरल गतिमान है, लोगों को जीवन जीने की दिशा दे रहा है।

डॉ. राहुल मिश्र- अनागत कविता आंदोलन में सहभागी रहने वाले पुराने और वरिष्ठ कवियों के साथ ही वर्तमान में अनागत कविता की सर्जनात्मक दिशा और दशा के बारे में कुछ बताइए?

डॉ. अजय प्रसून- अनागत कविता आंदोलन को साकार रूप प्रदान करने के लिए पुराने और वरिष्ठ कवियों का सहयोग तो मिला ही, साथ ही उस समय के युवा कवियों का भरपूर सहयोग भी मिला। इसी के परिणामस्वरूप लगभग 4 अनागत कविता-संग्रह मेरे संपादन में प्रकाशित हुए, जिसमें 100 से अधिक रचनाकारों की कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। आज की स्थिति में अगर हम देखें, तो अनागत काव्य-गोष्ठियों के माध्यम से कई सौ रचनाकार इस आंदोलन से जुड़े हैं। कोरोना के कालखंड में, व इसके बाद भी आनलाइन अनागत काव्य-गोष्ठियों का क्रम चलता आ रहा है। प्रतिमास द्वितीय रविवार को अनागत काव्य गोष्ठियाँ आयोजित करने का क्रम भी निरंतर चल रहा। इन गोष्ठियों में नए रचनाकारों को जुड़ने का, सीखने का और साथ ही अपनी रचनाशीलता को साझा करने का अवसर मिलता है। इन काव्य-गोष्ठियों में देश-विदेश के रचनाकार और कवि सम्मिलित होते रहते हैं। विगत 23 जनवरी को अनागत दिवस के अवसर पर श्री राम दुलारे सिंह जी के अनागत कविता-संग्रह ‘वर्तमान तो पल भर का है’ का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। वर्ष 2020 में अनागत कविता आंदोलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी आयोजति हुई थी। इसमें विदेशों से जुड़े विद्वानों ने, विशेषकर मॉरीशस से जुड़े विद्वानों ने अपने शोध-प्रबंध प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित किया, कि विदेशों की धरती पर भी रचे जा रही कविताओं में अनागत कविता की प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। यह संगोष्ठी अनागत कविता आंदोलन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रही। यू-ट्यूब में इस संगोष्ठी के वीडियो बहुत देखे गए हैं।

डॉ. राहुल मिश्र- अनागत कविता के दार्शनिक संदर्भ या समसामयिक स्थितियों के व्यावहारिक संदर्भ कौन-से हैं, जिनके कारण आज की पीढ़ी भी इस विचार के साथ जुड़ी दिखती है?

डॉ. अजय प्रसून- अनागत कविता आंदोलन की अवधारणा पूर्णरूपेण दार्शनिक है। वह इसलिए, कि अनागत केवल आज की नहीं, वरन युगों पुरानी मान्यताओं को भी स्वीकारता है। आज की, यानि समसामयिक स्थितियों को भी स्वर प्रदान करता है। अगर हम श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड का अवलोकन करें, तो पूरा उत्तरकांड अनागत कविता को बल प्रदान करता है, क्योंकि इसमें कलियुग में घटने वाली घटनाओं के पूर्वानुमान भी प्रस्तुत किए गए हैं, जो आज की स्थितियों में हम स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं। अनागत भविष्य की बात भी करता है, और वर्तमान की विषमताओं से दो-चार होने के लिए एक रास्ता भी दिखाता है। गीता का कर्मयोग इसमें परिलक्षित होता है। नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मकता के कारण युवा पीढ़ी इस आंदोलन से जुड़ी है।

डॉ. राहुल मिश्र- कविता-लेखन के अपने प्रारंभिक दिनों का कोई संस्मरण यदि ना सकें, तो अच्छा लगेगा?

डॉ. अजय प्रसून- सन् 1978 में बाराबंकी के जवाहरलाल नेहरू कॉलेज में एक अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन हुआ था, जिसमें देश के स्वनामधन्य साहित्यकार, कवि मंच पर मौजूद थे। डॉ. रामकुमार वर्मा जी भी आए थे। उन्होंने सरस्वती-वंदना से कवि-सम्मेलन की शुरुआत की, तत्पश्चात मुझे काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया। काव्य-पाठ में मैंने अपना शृंगारिक गीत-

इतना मन को छुओ न श्यामल तन की प्यास रेख हो जाए,

ऐसा भी शर्माना क्या है दर्पण शिलालेख हो जाए ।।.....

पढ़ा। पढ़ते ही वातावरण एकदम शांत हो गया। यह देखकर मुझे अनुभव हुआ कि मेरा गीत व्यर्थ हुआ, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुई। अतः गीत पढ़कर मैंने माइक छोड़ दिया और हताश होकर जाने लगा। तभी डॉ. कुँवर चंद्रप्रकाश सिंह जी ने कहा अभी और पढ़िए..... आपने बहुत अच्छा गीत पढ़ा है। पूरे पांडाल में तालियों की गड़गड़ाहट हुई। मंच और पांडाल की करतल ध्वनि सम्मिलित रूप से सुनाई पड़ी, जिसे सुनकर मेरी हताशा दूर हुई और फिर मैंने मन मुताबिक और अन्य गीत पढ़े।

डॉ. राहुल मिश्र- आपका सारा जीवन लखनऊ में बीता है। लखनऊ तो साहित्य की भी राजधानी रही है। अनेक ख्यातिलब्ध साहित्यकार, कवि लखनऊ में हुए हैं, या जुड़े रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में पुराने लखनऊ के साथ ही आज के समय को आप देखते हुए क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. अजय प्रसून- मेरा सारा जीवन लखनऊ में ही बीता। सर्वश्री अमृतलाल नागर, श्री भगवतीचरण वर्मा, श्री दिवाकर अग्निहोत्री, श्री गिरिजा दयाल गिरीश, श्री विष्णु कुमार त्रिपाठी राकेश, श्री महेश प्रसाद, श्री विनोद चंद्र पांडे, श्री शिव सिंह सरोज, श्री ठाकुर प्रसाद सिंह, श्री सिद्धेश्वर क्रांति, श्री देवी शंकर मिलन, श्री महेश प्रसाद श्रमिक आदि श्रेष्ठ रचनाकारों से लखनऊ की पहचान होती थी। व्यक्तिगत रूप से मेरा बहुत जुड़ाव किसी से नहीं रहा, लेकिन अनेक साहित्यिक आयोजनों में इन विभूतियों के साथ रहने का अवसर प्रायः मिलता रहता था। आज भी मैं स्वांतः सुखाय के भाव से सृजन में संलग्न रहता हूँ। आज की स्थिति में साहित्य की एक बड़ी भीड़ है, और सभी अपनी क्षमता-अनुसार अच्छा लिख भी रहे हैं, लेकिन जो कविता का रसानंद पूर्व में साहित्यिक आयोजनों में आता था, अब उसका उस रूप में अनुभव नहीं होता है।

डॉ. राहुल मिश्र- आप मंचीय कविता के भी सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपने देश के विभिन्न स्थानों में कविता-पाठ किया है। मंचीय कविता के पुराने समय और वर्तमान के बारे में आपका क्या कहना है?

डॉ. अजय प्रसून- मंचीय कविता की जाए, तो पहले के मंचों पर बहुत जाँच-परख कर ही कवियों को मंचों पर आमंत्रित किया जाता था। और चुने हुए मंच-सिद्ध कवि की कविता-पाठ कर पाते थे, किंतु आज यह स्थिति नहीं है। आज के कवि मात्र छह माह या एक साल की अवधि में अखिल भारतीय स्तर के कवि बन जाते हैं और अपने आप को बड़े रचनाकारों की पंक्ति में शामिल करवा लेते हैं। इससे नवोदित कवियों का बड़ा नुकासन भी होता है, क्योंकि मंचीय कविता की बारीकियों को सीखने के लिए भी समय देना होता है।

डॉ. राहुल मिश्र- बाल साहित्यकार के रूप में वर्तमान बाल-साहित्य को किस प्रकार देखते हैं? बीस-पचीस वर्ष पहले बाल-साहित्य की क्या स्थिति थी, आपका क्या कहना है?

डॉ. अजय प्रसून- कविता के साथ-साथ बाल साहित्य से मैं लगातार जुड़ा रहा हूँ। पिछले वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान भी दिया गया है। बीस-पचीस वर्ष पहले भी देखा जाए तो बाल-साहित्य का स्वरूप उत्कृष्ट था, और आज की स्थिति में भी हम देखते हैं कि जो भी बाल-साहित्यकार अपना सृजन कर रहे हैं, वह उत्कृष्ट कोटि का है। एक साहित्यकार की पूर्णता तभी मानी जाती है, जब वह बाल-साहित्य के सृजन में स्थापित हो जाता है। कारण, बाल-साहित्य देश के कर्णधारों को तैयार करने वाला होता है, उनके अंदर संस्कार डालने वाला होता है। इस दृष्टि से स्वयं को धन्य मानता हूँ, कि मैंने बाल-साहित्यकार के रूप में जितना भी सृजन किया, उसे समाज ने स्वीकार, हिंदीसेवी संस्थाओं और अन्य सुधी पाठकों से सराहा।

डॉ. राहुल मिश्र- आज की कविता पर आपके क्या विचार हैं? कविता की दिशा मूलतः किस ओर होनी चाहिए, या समाज कैसी कविताई की अपेक्षा रखता है?

डॉ. अजय प्रसून- आज की कविता के प्रति मेरे यही विचार है, कि जो भी लिखा जा रहा है वह समसामयिक परिस्थितियों व समस्याओं को समेटते हुए लिखा जा रहा है। इसमें समाज को दिशा देने, समस्याओं के निराकरण करने का पक्ष भी होना चाहिए। आज की कविता अनेक राजनीतिक व समाजिक-धार्मिक प्रपंचों व कुविचारों से आहत दिखती है। हमारा प्रयास तो यही रहा है और रहेगा कि आज की कविता इन कुचेष्टाओं से दूर रहकर शुद्ध कविता के ही रूप में सामने आए। यही आने वाले समय की कविता के लिए उचित होगा।


डॉ. राहुल मिश्र-
आपकी प्रिय कविता या गजल, की चार पंक्तियाँ बानगी के रूप में सुनकर कृतार्थ होना चाहेंगे।

डॉ. अजय प्रसून- मेरी प्रिय पंक्तियों के रूप में मेरा एक छंद प्रस्तुत है, जो बहुत पसंद किया जाता है, और जिसे आप मेरा ‘टाइटल सांग’ भी कह सकते हैं-

एक राह खोजिए हजार राहें पाइएगा, / लक्ष्य बिखरे पड़े हैं कितने स्वराज के।

जिंदगी को कर्म में ही लीन होने दीजिए तो, / द्वार खुल जाएँगे मुक्ति के जहाज के ।

टूटते हुए पलों की ओर मत देखिएगा, स्वप्न देखिएगा चेतना के स्वर साज के ।

एक बीज धरती की कोख में दबाइए तो, लाख-लाख बीज होंगे सामने समाज के ।।

डॉ. राहुल मिश्र- लंबी वार्ता को विराम देने से पहले आप आज के नवोदित कवियों-कवयित्रियों को क्या संदेश देना चाहेंगे? विशेष रूप से आपके द्वारा प्रारंभ किए गए पुरस्कारों के संदर्भ के साथ...।

डॉ. अजय प्रसून- आज के नवोदित कवि और कवयित्रियों के लिए मुझे यही कहना है, कि हम जो भी लिखें, उसे महज वाहवाही पाने के लिए ना लिखें। ऐसा साहित्य, ऐसा काव्य सृजित करें, जो मानव और मानवता के लिए हो, जो कि पीड़ितों और दुःखी लोगों की वेदना व कष्ट को दूर कर सके। हम समाज को सकारात्मक मार्ग प्रदर्शित करने के लिए सृजन करें। यही अनागत कविता आंदोलन की जिजीविषा है। इसके साथ ही सृजन कठिन वर्तमान को जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कल्पना को साकार रूप प्रदान करने वाला हो। आज की पीढ़ी के लिए इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मेरी संस्था अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान द्वारा कवियों के लिए ‘अनागत मार्तंड’ एवं कवयित्रियों के लिए ‘अनागत चंद्रिका सम्मान’ प्रतिमाह प्रदान किया जाता है। वार्षिक सम्मानों में ‘अनागत कविता भारती सम्मान’ एवं ‘अनागत पितृ-स्मृति सम्मान’ हैं।

डॉ. राहुल मिश्र- आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार। आपने अपनी व्यस्ततता के बीच से यह समय निकाला, साहित्य और कविता पर अनेक रुचिकर व महत्त्वपूर्ण बातें आपसे जानने को मिलीं। पुनः आपके प्रति आभार और कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। सादर प्रणाम।

डॉ. अजय प्रसून- आपका भी धन्यवाद और आभार।


 

अपराजेय योद्धा श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ भट्ट

हिंदवी साम्राज्य के स्वप्न को साकार करने वाले अपराजेय योद्धा श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ भट्ट की पुण्यतिथि पर विगत 28 अप्रैल को रावेरखेड़ी में भव्य आयोजन हुआ। मध्यप्रदेश के खारगौन जनपद में रावेरखेड़ी नर्मदा के तट पर स्थित एक अनजाना-सा गाँव है, लेकिन हिंदवी साम्राज्य के अपराजेय योद्धा की समाधि ने इस गाँव को न केवल वैश्विक मानचित्र पर उकेरा है, वरन् भारतीय शौर्य और सनातन आस्था के समर्पित जनों के लिए तीर्थ की भाँति पूज्यनीय बनाया है।

दिल्ली से विजय-पताका फहराते हुए लौट रहे पेशवा बाजीराव का पड़ाव रावेरखेड़ी में पड़ा था। यहीं उनका स्वास्थ खराब हुआ और 28 अप्रैल, 1740 को उन्होंने देवलोकगमन किया। श्रीमंत के स्वामिभक्त ग्वालियर के सिंधिया राजे ने उनकी समाधि बनवाई। समाधि-स्थल भव्य किले के रूप में है, लेकिन यह स्थान और साथ ही रावेरखेड़ी इतिहास के पन्नों में अनजाना-सा रहा है। सच्चाई तो यह है, कि बाजीराव पेशवा को भी कम लोग ही जानते होंगे। वर्ष 2015 में एक फिल्म आई थी- बाजीराव मस्तानी। यह फिल्म नागनाथ इनामदार के मराठी उपन्यास राऊ पर केंद्रित थी। इस फिल्म ने बाजीराव पेशवा का जैसा परिचय समाज को देने का प्रयास किया, वह भारत के गौरवपूर्ण अतीत का अनुशीलन और समाज का सच से निदर्शन नहीं करा सका है। पेशवा बाजीराव की अद्भुत युद्धकला, उनका संगठन-कौशल, उनका शौर्य और पराक्रम, उनकी वीरता के अनेक गौरवपूर्ण अध्यायों पर एक मनगढंत प्रेमकथा का आवरण डाला गया है। मस्तानी बुंदेल-केसरी वीर छत्रसाल की धर्म-पुत्री थी, और पराक्रम में भी किसी से कम नहीं थी। महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को अपना पुत्र मानते हुए बुंदेलखंड के राज्य का एक तिहाई भाग बाजीराव पेशवा को दिया था। कुँवरि मस्तानी ने महाराजा छत्रसाल के गुरु महामति प्राणनाथ द्वारा प्रवर्तित प्रणामी संप्रदाय की विधिवत् दीक्षा ली थी। बाजीराव पेशवा और मस्तानी कुँवरि के संबंध अतीत की सच्चाई हैं, लेकिन इनका केवल कल्पनाजन्य विस्तार ही कथा-उपन्यासों और फिल्मों तक आता है। खेदजनक तो यह है, कि बाजीराव-मस्तानी के संबंधों का सम्यक मूल्यांकन और ऐतिहासिक शोधपरक अध्ययन इतिहासकारों के अध्ययन-क्षेत्र में नहीं आ सका। फलतः सही व सर्वाङ्गपूर्ण जानकारी का अभाव हमारे चरितनायक को, भारतीय शौर्य की गौरवशाली परंपरा के प्रमुख मानबिंदु को, बाजीराव बल्लाळ भट्ट को अपेक्षित मान नहीं दिला सका।

सैन्य-अध्ययन में बहुत प्रचलित युद्ध-तकनीक है- ब्लिट्जक्रेग। हिंदी में इसे विद्युतगति युद्ध कह सकते हैं। इस युद्ध पद्धति के जनक पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति के द्वारा मुगलों को अनेक युद्धों में परास्त किया था। उनकी इस युद्ध-पद्धति को सामयिक आवश्यकता और अनिवार्यता के अनुरूप विस्तारित करते हुए श्रीमंत बाजीराव ने बिजली की गति से शत्रु पर टूट पड़ने की युद्ध पद्धति को अपनाया। शत्रु जब तक युद्ध के हालात को समझ पाए, तब तक शत्रु पर चारों ओर से एकसाथ आक्रमण कर देना। उनकी इसी युद्ध पद्धति के कारण उन्हें हर युद्ध में विजयश्री मिली। ब्रिटिश सेना के फील्ड मार्शल बर्नार्ड लॉ मांटगोमरी द्वितीय विश्वयुद्ध के सबसे सफल और प्रमुख कमांडर थे। जनरल मांटगोमरी की प्रसिद्ध पुस्तक है- हिस्ट्री आफ वारफेयर। इस पुस्तक में उन्होंने बाजीराव पेशवा की अश्वसेना सहित उनकी बिजली-युद्ध पद्धति की बहुत प्रशंसा की है। वे लिखते हैं, कि- “पेशवा बाजीराव प्रथम एक भी युद्ध नहीं हारे। वे सदैव संख्याबल में कम, किंतु कुशल घुड़सवार सैनिकों के साथ बिजली की गति से आक्रमण कर दुश्मन की लाखों की सेना को परास्त कर देते थे।“

28 फरवरी, 1728 को संभाजीनगर (पूर्ववर्ती औरंगाबाद) के निकट पालखेड़ गाँव के समीप हुए पालखेड़ का युद्ध उनके इस रणकौशल का उत्कृष्टतम उदाहरण है। पालखेड़ के युद्ध में उनकी नवोन्मेषी युद्धनीति, रणनीति और राजनीतिक कुशलता का अद्भुत साम्य देखने को मिलता है। इसी कारण पालखेड़ का युद्ध विश्व के चर्चित और प्रसिद्ध युद्धों में अपना स्थान भी रखता है और आज भी ‘केस-स्टडी’ के रूप में पढ़ा-पढ़ाया जाता है। ब्रिटेन और अमरीका में आज भी सैन्य-अध्ययन के अंतर्गत पालखेड़ का युद्ध ‘केस-स्टडी’ के रूप में पढ़ाया जाता है।

पिता बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के उपरांत छत्रपति शाहूजी महाराज के समक्ष पेशवा के पद को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया था। उस समय बाजीराव की आयु 19 वर्ष के आसपास थी। अल्पवय के बाजीराव की वीरता और कर्मठता ने शाहूजी महाराज को बहुत प्रभावित किया, और उन्होंने बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया। इसके उपरांत बीस वर्षों तक बाजीराव पेशवा ने कभी अपनी कमर की तलवार नहीं खोली, कभी अश्व की सवारी नहीं छोड़ी और अटक से कटक तक भगवा ध्वज फहराकर शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज के स्वप्न को साकार किया। विश्व का इतिहास साक्षी है, कि शक्तिशाली सेनापति हो या सामान्य-सा सैनिक, या फिर परिवार का ही व्यक्ति... अवसर पाते ही सत्ता हथियाने के प्रयास प्रारंभ कर देता है। भारत का मध्यकाल तो ऐसे विश्वासघातों से भरा पड़ा है, जहाँ सत्ता पाने के लिए भाई अपने भाइयों को मार डालता है, पिता को बंदी बना लेता है... भतीजा अपने चाचा की धोखे से हत्या कर देता है, आदि...आदि। इसी मध्यकाल में अप्रतिम योद्धा बाजीराव बल्लाळ भट्ट की स्वामिभक्ति, उनका त्याग और समर्पण, आदर्श और नैतिकता की अक्षय कीर्ति सनातन भारतीय परंपरा के, उदात्त भारतीय जीवन-पद्धति और जीवन दर्शन के जीवंत-जागृत साक्ष्य के रूप में हमारे समक्ष है। पेशवा बाजीराव की प्रधान मुद्रा में अंकित एक-एक शब्द उनके विराट व्यक्तित्व को उद्घोषित करता है। उनकी मुद्रा में अंकित है-

“श्रीराजा शाहूजी नरपती हर्षनिधान-बाजीराव बल्लाळ पंतप्रधान”

पंतप्रधान बाजीराव बल्लाळ छत्रपति शाहूजी महाराज की ओर से मुद्रा अंकित करते हैं। दक्षिण से उत्तर तक अपने अश्वों की पदचाप से विधर्मी आक्रांताओं द्वारा पददलित भारतभूमि को स्वातंत्र्य का अमृतपान कराने वाले इस अपराजेय योद्धा ने कभी भी राज्यलिप्सा नहीं पाली, कभी भी यश की लालसा नहीं पाली...। अखंड भारत के लिए, हिंदवी स्वराज के लिए अपने तन-मन को गलाया, समर्पित किया। बाजीराव पेशवा को ‘राऊ’ कहकर पुकारा जाता था। ‘राऊ’ अर्थात् सरदारों में सर्वश्रेष्ठ...। यह उपाधि उन पर खरी बैठती थी। मराठा साम्राज्य का विस्तार और म्लेच्छ आक्रांताओं की कुत्सित चालों व नीतियों का दमन करते हुए दिल्ली तक अपनी कीर्ति-पताका फहराने वाले बाजीराव पेशवा को ‘महाराष्ट्र केसरी’, ‘हिंद केसरी’ के रूप में हम जानते हैं। ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते हुए सिंह की भाँति विधर्मियों पर टूट पड़ने वाले श्रीमंत बाजीराव ने मुगलों को दिल्ली के आसपास तक सीमित कर दिया था। इतना ही नहीं, पेशवा बाजीराव के भय से मुगल शासकों को दिल्ली भी हाथ से जाती दिख रही थी। पेशवा बाजीराव ने ही समूचे भारतदेश की अखंडता और हिंदू राजसत्ता पर आधृत हिंदू पदपादशाही का सिद्धांत दिया था, जिसका विस्तार के साथ उल्लेख स्वातंत्र्यवीर सावरकर की इसी नाम से रचित पुस्तक में मिलता है। पेशवा बाजीराव का ही पराक्रम था, कि उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में शक्तिकेंद्र स्थापित किए। होलकर, पवार, सिंधिया, गायकवाड़, शिंदे आदि वीर राजे-रजवाड़े पेशवा बाजीराव के प्रयासों से ही सशक्त और समर्थ होकर सक्रिय हुए।

 अप्रतिम योद्धा, माँ भारती के अमर सपूत, भारतीय शौर्य परंपरा के संवाहक, शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज को साकार करने वाले पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट को हमारी नई पीढ़ी कितना जानती है? यह प्रश्न हमारे सामने है। निःसंदेह ‘फिल्मी नैरेटिव’ ने बहुत गलत संदेश दिया है, जिसका सुधार करना हमारा दायित्य है। हमारा इतिहास केवल पराजय का इतिहास नहीं है, जैसा कि बताया जाता है, पढ़ाया जाता है। हमारा इतिहास पेशवा बाजीराव जैसे महान योद्धाओं की अपरिमित शौर्यगाथाओं से भरा हुआ है। पेशवा बाजीराव ने अपने लगभग चालीस वर्ष के छोटे-से जीवन में, बीस वर्ष के अंतराल में चालीस लड़ाइयाँ लड़ीं, और सभी में विजय प्राप्त की। विश्व इतिहास में सिकंदर को महान बताया जाता है, अपराजेय बताया जाता है। लेकिन वह भी परास्त हुआ था, भारत को जीतने का उसका सपना कभी सच नहीं हो सका था। यहाँ से उसे वापस लौटकर जाना पड़ा था। ऐसे में जो जीता, वो सिकंदर कैसे हुआ? पेशवा बाजीराव ने शत प्रतिशत युद्ध जीते। इसलिए जो जीता, वह बाजीराव कहा जाना चाहिए।

‘जो जीता, वो बाजीराव’ का उद्घोष करते हुए पेशवा बाजीराव के प्रति आस्थावान देशभक्तों का एकत्रीकरण रावेरखेड़ी में हुआ। सनातन भारतीय परंपरा के रक्षक, रण-धुरंधर, पराक्रमी, अद्वितीय योद्धा, हिंद केसरी, प्रबल प्रतापी पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट का समाधि-स्थल उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम के कारण 28 अप्रैल को चर्चा में आया, यहाँ चहल-पहल हुई, लेकिन शेष समय में यह पवित्र स्थल उपेक्षित ही रहता है। ज्ञात हुआ है, कि कुछ समय पूर्व कुछ जागरूक लोगों के प्रयासों से आवागमन के साधन सुलभ हुए हैं, लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। विशेष रूप से अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे अद्वितीय नायक, अपराजेय योद्धा के बारे में बताया जाना.....।

-राहुल मिश्र

(पाञ्चजन्य, नई दिल्ली में प्रकाशित, ज्येष्ठ कृष्ण 5, वि.सं. 2082, युगाब्द 5127 तदनुसार 18 मई, 2025)

हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों का प्रभाव


हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों का प्रभाव


हिंदी साहित्य के वर्तमान में उपन्यास विधा की उत्पत्ति और विकास सर्वथा नवीन भावबोध और भारतीय नवजागरण के प्रयासों से अनुप्राणित है। इस कारण भारतीय नवजागरण से संबद्ध विचारकों-समाजसेवकों के प्रयासों और उनके विचारों का उपन्यास विधा में प्रतिफलित होना भी सर्वथा प्रासंगिक और युक्तिपूर्ण है। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास प्रायः अंग्रेजी और बांगला से अनूदित थे और उनमें इसी अनुरूप कथ्य का प्रतिपादन भी किया गया था। हिंदी के प्रारंभिक मौलिक उपन्यासों का क्रम प्रायः 1900 ई. से शुरू होता है और 1950 ई. तक के उपन्यासों को हिंदी के प्रारंभिक मौलिक उपन्यास कहा जा सकता है। सन् 1900 से 1915-16 की अवधि में एक ओर तिलिस्मी-ऐयारी-जासूसी कथानक वाले उपन्यासों का प्रभाव देखने को मिलता है, तो दूसरी ओर भारतीय नवजागरण के प्रभावों के फलस्वरूप सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित नीतिवादी-शिक्षाप्रद-उपदेशात्मक उपन्यासों का। इस अवधि के उपन्यासों में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध के स्थान पर उसके कारण उपजी समस्याओं को उच्च मध्यवर्गीय समाज के सीमित दायरे में रखकर चित्रित किया गया है। “इस अवधि का उपन्यास देश के उस विशाल जनसमुदाय से कटा हुआ है, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के शोषणचक्र में पिस रहा था। यह जनसमुदाय किसानों का था, जो मुख्यतः गाँवों में रहता था और विदेशी सरकार, जमींदार, महाजन और पुरोहित, सबका भक्ष्य बना हुआ था। किशोरीलाल गोस्वामी, भुवनेश्वर मिश्र, महता लज्जाराम शर्मा आदि कुछ उपन्यासकारों ने किसानों पर जमींदारों के अत्याचार, ग्रामीणों की निर्धनता, अशिक्षा तथा उनकी दीनहीन स्थिति का यत्रतत्र चित्रण किया है, किंतु यथार्थ के इस ज्वलंत पक्ष पर उनकी सर्जनात्मक दृष्टि नहीं पड़ी।”1 गोपालकृष्ण गोखले द्वारा स्थापित भारत सेवक समाज, जी. के. देवघर द्वारा स्थापित सेवासदन, राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज और केशवचंद्र सेन की प्रेरणा से स्थापित प्रार्थना समाज सहित दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने धार्मिक प्रेरणा और अतीत के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक स्वरूप का समाज-सुधार के क्षेत्र में प्रयोग किया, जो इस अवधि के उपन्यासों में परिलक्षित होता रहा।

इस प्रकार 1900 से 1915-16 की अवधि में नवजागरण की दिशा और दशा सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक सक्रियता के दो अलग-अलग वर्गों में बँटी थी। इसके परिणामस्वरूप एक ओर बालगंगाधर तिलक और उनके समर्थकों ने राजनीतिक सक्रियता को प्रश्रय दिया, तो दूसरी ओर गोपालकृष्ण गोखले जैसे राजनीतिज्ञों ने समाज-कार्य को। एक लक्ष्य की ओर चलती दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ समाज को सही दिशा देने के स्थान पर दिग्भ्रम जैसी स्थितियों का सर्जन कर रही थीं। ऐसे समय में आगमन होता है, महात्मा गांधी का। दक्षिण अफ्रीका से संत बनकर लौटे गांधी जी ने परस्पर विरोधी तत्त्वों को समीप लाने और उन्हें अपनी ताकत बनाने का प्रयोग किया। “गांधी जी ने सामाजिक समस्याओं तथा राजनीतिक प्रश्नों को एक समन्वित रूप दे दिया था। इसीलिए गांधी जी खादी, हिंदू-मुसलिम एकता तथा अछूतोद्धार, स्वराज्य के तीन स्तंभ मानते थे।”2 तत्कालीन भारतीय राजनीति और भारतीय समाजनीति पर गांधी जी की स्वराज्य की अवधारणा न केवल स्थापित हुई, वरन् तीव्रता के साथ जनस्वीकार्य भी हुई। साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा। गांधी जी के विचारों एवं जीवन-दृष्टि के आधार पर औपन्यासिक चरित्रों का प्रतिरूप बनाया गया, गांधी जी के जीवन की घटनाओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत किया गया, गांधी जी द्वारा प्रवर्तित राष्ट्रीय आंदोलनों का चित्ररूप दर्शन कराया गया, गांधी जी के कुछ सिद्धांतों की मीमांसा करने के लिए कथाओं की संरचना की गई। उदाहरणस्वरूप- हृदय-परिवर्तन, अहिंसक प्रतिरोध, सत्य का स्वरूप-विवेचन, ट्रस्टीशिप की परिकल्पना, औद्योगिक विकास के दौरान बढ़ने वाली अनैतिकता, दलित-पीड़ित-पतित-शोषित समाज के प्रति सहानुभूति आदि।”3 हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों के द्वितीय सोपान में गांधी-दर्शन और गांधीवाद के आगमन को साहित्य और समाज में बड़े क्रांतिकारी बदलाव से कम नहीं कहा जा सकता है।

‘परीक्षागुरु’ से ‘सेवासदन’ तक, अर्थात् 1882 से 1916 तक हिंदी उपन्यास साहित्य को प्रयोगकाल कहा जा सकता है। इस काल के उपन्यासों की सृष्टि किसी साहित्यिक उद्देश्य को सम्मुख रखकर नहीं की गई थी, वरन् नीति, शिक्षा, प्रेम, रोमांस, तिलिस्म और जासूसी प्रवृत्तियों का चित्रण करके जनता का मनोरंजन करना अथवा कौतूहल की सृष्टि करना मात्र था।4 ‘सेवासदन’ के साथ प्रेमचंद द्वारा हिंदी उपन्यास-लेखन का प्रारंभ किया जाना और राजनीतिक-समाजसेवक के रूप में महात्मा गांधी का भारत में आगमन, दो ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य और भारतीय समाज, दोनों के लिए युगांतकारी कहा जा सकता है।

प्रेमचंद का उपन्यास ‘सेवासदन’ सन् 1918 में हिंदी में प्रकाशित हुआ और समाज में उपेक्षित ‘आधी दुनिया’ के जटिल यथार्थ को पहली बार देखने का प्रयास हुआ। गांधी जी महिलाओं की दयनीय दशा को लेकर चिंतित थे, और वे महिलाओं को पुरुषों के समान सामाजिक मान-प्रतिष्ठा और अधिकार दिलाने के प्रबल पक्षधर थे। इसी कारण उन्होंने स्त्री-अशिक्षा और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया। “1930 ई. में गांधी जी ने स्त्रियों को विदेशी वस्तुओं की दुकानों, शराबघरों और सरकारी संस्थानों पर धरना देने का संदेश दिया। इस आह्वान पर हजारों स्त्रियों ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया और जेल गयीं। खुद प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी भी जेल गयीं। इसका असर प्रेमचंद के उपन्यासों के नारी पात्रों पर भी दिखाई देता है।”5 इसी कारण दहेज प्रथा और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्याओं को केंद्र में रखकर लिखा गया ‘सेवासदन’ गांधी जी के विचारों के समीप का प्रकट होता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में ‘सेवासदन’ की शांता; ‘गोदान’ की मालती; ‘कर्मभूमि’ की सुखदा, मुन्नी, नैना, रेणुका देवी, पठानिन और सकीना तथा ‘प्रेमाश्रम’ की श्रद्धा और विद्या आदि ऐसी नारी-पात्र हैं, जिनके माध्यम से प्रेमचंद ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से गांधी जी के नारी-विषयक विचारों को प्रकट करने का प्रयास किया है।

प्रेमचंद अपने उपन्यासों के नारी पात्रों के साथ ही अन्य पात्रों के माध्यम से भी गांधीवादी चिंतन और तत्कालीन आंदोलनों के प्रभावों को प्रकट करते हैं। “गांधी विदेशी शिक्षा-प्रणाली, विदेशी औद्योगीकरण, शहरीकरण के प्रबल विरोधी थे, प्रेमचंद ने ज़मींदार-किसान, अमीर-गरीब का भेद तो दिखाया है, लेकिन उसे वर्ग-भेद का रूप नहीं दिया है और न ही वर्ग-संघर्ष और क्रांति के जरिये उसका समाधान प्रस्तुत किया। अहिंसात्मक सत्याग्रह और हृदय परिवर्तन ही उनके समाज-परिवर्तन के साधन रहे थे। जहाँ ऐसा होने की संभावना नहीं है, वहाँ उन्होंने यथार्थ का दामन नहीं छोड़ा है, लेकिन हिंसा को प्रश्रय नहीं दिया है। प्रेमचंद गांधी के ‘वर्ग-समन्वय’ के सिद्धांत पर, ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत पर भी यकीन करते थे।”6 प्रेमचंद के लगभग सभी उपन्यासों में गांधीवाद के दर्शन होते हैं। यहाँ ‘प्रेमाश्रम’ के प्रेमशंकर, ‘कर्मभूमि’ के अमरकांत, ‘रंगभूमि’ के सूरदास और ‘कायाकल्प’ के चक्रधर का उल्लेख किया जा सकता है, जिनके माध्यम से प्रेमचंद गांधी जी के विचारों को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

प्रेमचंद ने जिस राजनीतिक-सामाजिक चेतना को व्यक्त करने की परंपरा की शुरुआत की, उसे आगे बढ़ाने का कार्य उनके समकालीन और परवर्ती उपन्यासकारों ने किया। हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचंद पहले ऐसे उपन्यासकार भी थे, जिन्होंने गांधीवाद को उपन्यास विधा में स्थापित करने का सफल प्रयास किया। प्रेमचंद के साथ ही उनके समकालीन श्री नाथ सिंह ने गांधीवादी दृष्टिकोण से अनेक उपन्यासों की रचना की। उनके ‘उलझन’, ‘जागरण’, ‘प्रभावती’, ‘प्रजामण्डल’ आदि उपन्यासों में ग्राम-सुधार, नारी उद्धार, अछूतोद्धार जैसे विषय हैं।7 गांधीवादी विचारधारा को कविताओं के साथ ही उपन्यासों में उतारने वाले सियारामशरण गुप्त के दो उपन्यासों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। ‘गोद’ उपन्यास में उन्होंने नारी की दयनीय सामाजिक स्थिति का चित्रण करते हुए नारी स्वातंत्र्य के विषय को गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप प्रकट किया है। उनके दूसरे उपन्यास ‘अंतिम आकांक्षा’ में सामाजिक विषमता के प्रश्न को उठाया गया है। इस उपन्यास में रामलाल निर्धन, निम्नवर्गीय पात्र है, जिसके प्रति समाज के अभिजात्य वर्ग की मानवीय सहानुभूति का उपजना गुप्त जी के गांधीवादी दृष्टिकोण को संकेतित करता है।8 

गुरुदत्त ने अपने उपन्यास ‘स्वराज्य दान’ में अहिंसा के महत्त्व को स्थापित करने का प्रयास किया है, साथ ही उनके ‘स्वाधीनता के पथ पर’, ‘पथिक’ और ‘भावुकता का मूल्य’ आदि उपन्यासों में विभिन्न सामाजिक समस्याओं का चित्रण है। जगदीश झा विमल के उपन्यास ‘खरा सोना’, ‘आशा पर पानी’, ‘लीलावती’ और ‘गरीब’, जहाँ एक ओर प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर गांधी जी के विचारों को भी प्रकट करते हैं। प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने ‘विजय’, ‘विकास’ और ‘बयालीस’ आदि उपन्यासों में राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं का हल गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप प्रस्तुत करके हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में गांधी जी के विचारों की उपस्थिति को दृढ़ता प्रदान की है। ऋषभचरण जैन का उपन्यास ‘सत्याग्रह’ दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन के जरिए गांधीवादी विचारों को प्रकट करता है। उनके अन्य उपन्यासों में ‘मयखाना’ और ‘तीन इक्के’ भी उल्लेखनीय हैं, जिनमें शराबखोरी और जुआखोरी के दुर्गुणों का चित्रण हुआ है।

उस दौर के अन्य प्रसिद्ध उपन्यासकार, ‘उग्र’ पर नग्नता का आरोप लगता रहा है, किंतु उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ गांधीवादी विचारों का चित्रण अपने उपन्यासों में किया है। “पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ राजनीतिक धरातल पर गांधी जी के विचारों से प्रभावित थे। वह दो उपन्यासों, ‘चन्द हसीनों के खतूत’ तथा ‘सरकार तुम्हारी आँखों में’, हिंदू-मुसलिम एकता के उद्देश्य से लिखते हैं। ‘शराबी’ उपन्यास मद्यनिषेध विषय पर लिखा गया है, जो राष्ट्रीय कांग्रेस का मुख्य रचनात्मक कार्यक्रम था। ‘मनुष्यानंद’ उपन्यास में अछूतोद्धार आंदोलन चलता है।”9 उषादेवी मित्रा के उपन्यासों, ‘वचन का मोल’, ‘जीवन की मुसकान’ और ‘पथचारी’ में नारी-जीवन की ऐसी विषमताएँ उभरती हैं, जिनका सीधा संबंध गांधी जी के नारी-विषयक विचारों से जुड़ा है। “परिवार से सामाजिक आंदोलनों की ओर आती भारतीय स्त्री की संक्रमणकालीन मनोदशाओं का अंकन उषादेवी मित्रा ने पर्याप्त विश्वसनीय रूप में किया है।”10

इसी प्रकार निराला कृत ‘अलका’, जयशंकर प्रसाद कृत ‘तितली’ और ‘कंकाल’, वृंदावनलाल वर्मा  कृत ‘प्रत्यागत’ और ‘कुण्डली-चक्र’, भगवतीप्रसाद वाजपेयी कृत ‘पतिता की साधना’, जैनेन्द्र कृत ‘सुनीता’, चतुरसेन शास्त्री कृत ‘आत्मदाह’, भवानीदयाल कृत ‘नेटाली हिंदू’ और मन्नन द्विवेदी कृत ‘कल्याणी’ में गांधी जी के विचार कहीं सीधे तौर पर, तो कहीं प्रतीकात्मक रूप में स्थापित होते हैं। कृष्णलाल वर्मा कृत ‘पुनरुत्थान’, धनीराम प्रेम कृत ‘मेरा देश’, मोहिनी मोहन कृत ‘देशोद्धार’ और छविनाथ पांडेय कृत ‘प्रोत्साहन’ आदि उपन्यासों में स्वाधीनता आंदोलन तथा गांधीवादी विचारों का खुला प्रतिपादन किया गया है।11 यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि प्रयोगवाद की अवधारणा के जनक अज्ञेय का उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’, गांधी जी के अछूतोद्धार के विचार को नए प्रयोग के साथ प्रकट करता है। इस उपन्यास का नायक शेखर है। “विद्रोही शेखर ब्राह्मण छात्रों का छात्रावास छोड़कर अछूत छात्रों के छात्रावास में रहने लगता है। वह सदाशिव, राघवन आदि अछूत छात्रों की सहायता से अछूतोद्धार-समिति का निर्माण करता है, तथा अछूत बालकों के लिए स्कूल खोलकर स्वयं पढ़ाता है। सवर्ण एवं रूढ़िवादी वर्ग से संघर्ष संगठित रूप में ही किया जा सकता है, लेकिन शेखर वैयक्तिक धरातल पर समाज को चुनौती देता है।”12

गांधी जी और गांधीवादी विचारधारा के संबंध में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहते हैं कि- “दुनिया में मैं महात्मा गांधी को सबसे बड़ा मानता हूँ। उनका ध्येय भी यही है कि मजदूर और किसान सुखी हों। वह इन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए आंदोलन चला रहे हैं, मैं लिखकर उनकी हिमायत कर रहा हूँ।”13 संभवतः इसी कारण हिंदी उपन्यासों के क्षेत्र में प्रेमचंद ऐसे पहले उपन्यासकार बने, जिन्होंने गांधी जी के विचारों को हिंदी उपन्यासों में प्रतिष्ठापित करने का कार्य किया। प्रेमचंद के समकालीन और उनके परवर्ती उपन्यासकारों ने इस परंपरा को विकसित करने में योगदान दिया। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में, सन् 1916 से 1950 ई. तक हिंदी उपन्यासों में जितनी शिद्दत के साथ गांधी जी के सिद्धांत और उनकी विचारधारा प्रकट होती है, उसका दर्शन परवर्ती कालखंडों में दुर्लभ होता गया, यही इस कालखंड की विशेषता है, विशिष्टता है।

संदर्भ-

1.    गोपाल राय, रोमांस, पाठक और उपन्यास, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 123-124,

2.    डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 109,

3.    वेब रेफ़रेंस- http://www.hindi.mkgandhi.org/gmarg/chap20.htm

4.    डॉ. सरोजनी त्रिपाठी, प्रेमचंद के हिंदी उपन्यासों में वस्तु-विन्यास का विकास, आधुनिक हिंदी उपन्यास में वस्तु-विन्यास, ग्रन्थम, कानपुर, प्रथम सं. 1973, पृ. 108,

5.    गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 136,

6.    राजम नटराजम पिल्लै, प्रेमचंद और गांधीवादी दर्शन, प्रेमचंद के आयाम, संपादक- ए. अरविंदाक्षन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2006, पृ. 264,

7.    डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, हिंदी उपन्यास का विकास, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, बारहवाँ सं. 2010, पृ. 426,

8.    गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 157,

9.    डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 262,

10.         मधुरेश प्रेमचंद युगीन अन्य उपन्यासकार, हिंदी उपन्यास का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 2009, पृ. 65,

11.         गोपाल राय, यथार्थ के नये स्वर, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2002, पृ. 166,

12.         डॉ. चण्डीप्रसाद जोशी, हिंदी उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन, अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 1962, पृ. 368,

13.         क़मर रईस, प्रेमचंद : विचार-यात्रा, प्रेमचंद : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, संपादक- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह एवं रेखा अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम सं. 2006, पृ. 452 ।


-राहुल मिश्र


(हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई द्वारा प्रकाशित होने वाली पत्रिका हिंदुस्तानी ज़बान के मार्च, 2025 अंक में प्रकाशित)