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Saturday, 22 August 2026

किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति

 


किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति


समाज की ओर दृष्टि रखकर साहित्य की सर्जना होती है। अतीत से लगाकर वर्तमान तक साहित्य की इस विशिष्टता को देखा जा सकता है। हिंदी के आधुनिक कालखंड में समाज और साहित्य के अंतर्संबंध और अधिक घने हो जाते हैं, क्योंकि इस कालखंड में साहित्य अपेक्षाकृत अधिक दायित्वपूर्ण बनकर समाज के सच्चे चित्र को, समाज की वास्तविकताओं को उकेरने लगता है। सामयिक सत्य और यथार्थ के चित्रण में गद्य की अनिवार्य आवश्यकता जहाँ एक ओर कविता को गद्यात्मक बनाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में अपना स्थान बनाने वाला हिंदी कथा-साहित्य समाज के निकट पहुँचता जाता है।

डॉ. विनय कुमार पाठक की नीरज बुक सेंटर, नई दिल्ली से सद्यः प्रकाशित कृति- ‘किन्नर-विमर्श : दशा और दिशा’, वैसे तो किन्नर-विमर्श पर केंद्रित है, लेकिन विषय की स्थापना के आधार को निर्मित करते हुए डॉ. पाठक द्वारा दी गईं उपरिवर्णित स्थापनाएँ हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में किन्नर-विमर्श के विविध पक्षों को प्रस्तुत करने का सहज वातावरण निर्मित करती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है, कि ‘विमर्श’ का आधार औपनिवेशिक और पाश्चात्य प्रभावों से बना है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श में मध्यकाल और उसके बाद औपनिवेशिक भारत, और वर्षों की गुलामी के कारण उपजी मानसिक विक्षिप्तता, विकृति और विद्रूपता की छाया दिखाई देती है। साहित्य में इसी कारण इनकी उपस्थिति अनेक तरीके से भले ही समय और समाज की यथार्थ स्थिति को दिखाती हों, एक विशिष्ट वर्ग बनाकर चर्चा या विमर्श का केंद्रीकरण करती हों, लेकिन इसके साथ आलोचनाएँ भी होती रही हैं, आज भी होती हैं। ‘विमर्शों’ का वास्तविक स्वरूप कैसा हो, सकारात्मक और समाज के लिए दिशा-निर्देशक पक्ष इनमें कैसे उद्घाटित हो, यथार्थ के चित्रण में अतिवाद और अतिकल्पनाशीलता के पक्षों को किस तरीके से नियंत्रित किया जाए, जैसे बिंदु साहित्य-चर्चा के विविध खेमों में उठते रहे हैं। इन्हें आज भी देखा जा रहा है।

स्थापित विमर्शों के अगले क्रम में, इक्कीसवीं सदी के साहित्य में नवोदित विमर्शों के लिए ये बिंदु महत्त्वपूर्ण भी हैं, और इन बिंदुओं पर नवागत-नवोदित विमर्शों की दिशा-दशा के निर्धारण की अपेक्षाएँ भी रही हैं। नवागत-नवोदित विमर्शों में अनेक स्थानों पर अल्पसंख्यक-विमर्श, कृषक-विमर्श, प्रवासी-विमर्श जैसे नाम सुने जाते हैं। कहीं-कहीं पर ये विमर्श चर्चा में आने के लिए भी उठाए जाते रहे हैं। दूसरी तरफ, विकलांग-विमर्श और किन्नर-विमर्श भी इक्कीसवीं सदी में चर्चित हुए। विकलांगों और किन्नरों की समाज में स्थिति को देखते हुए इनकी साहित्य में चर्चा अपेक्षित ही नहीं थी, अपितु साहित्य के माध्यम से इन दोनों वर्गों के लिए सोचा जाना, साहित्य के माध्यम से देखा जाना आवश्यक-अनिवार्य-अपेक्षित था। साहित्य ने इस दिशा में अपना दायित्व निभाया। इन दोनों विमर्शों के संदर्भ में बहुत गंभीर बात डॉ. पाठक ने अपनी कृति की भूमिका में लिखी है। वे लिखते हैं, कि- “जाति और लिंग से रहित विशुद्ध मानवतावादी दृष्टि पर आधारित ये दोनों नव्य विमर्श सर्वाधिक वंचित और उपेक्षित या कहें, वर्जित ही रहे हैं।” (भूमिका, पृ. 05)

डॉ. विनय कुमार पाठक का विकलांग-विमर्श के क्षेत्र में व्यापक साहित्यिक अवदान है। इतना ही नहीं, उनके द्वारा विकलांगों के कल्याणार्थ समाज-कार्यों को भी दिशा दी जा रही है। डॉ. पाठक ने इक्कीसवीं सदी के ज्वलंत और सामयिक विमर्श, अर्थात् किन्नर-विमर्श पर अपनी लेखनी चलाई है। इसके पीछे के कारण को भी वे अपनी कृति की भूमिका में स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं, कि- “स्त्री, दलित, आदिवासी और विकलांग समाज में रहते हुए अराजक व्यवस्था पर आक्रोश व अभिमत स्पष्ट करते रहे लेकिन किन्नर के लिये तो यह पीठिका ही नहीं थी, अर्थात् वे हाशिये में डाल दिये गये। जब तक ये बंद समाज में कुंद बने बैठे रहेंगे, तब तक इनके पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों, अफवाहों से निजात नहीं मिलेगी और इन्हें पूर्णतः जाने-समझे बिना इन पर विमर्श की दिशा ही उलझकर रह जायेगी। लैंगिक विकलांगता विकृति है, पहचान नहीं, इस तथ्य को समझकर ही किन्नर उत्कर्ष को स्पर्श कर सकता है और विमर्श भी सफल-सार्थक सिद्ध हो सकता है।” (भूमिका, पृ. 06)

अपनी कृति की भूमिका के अंश के रूप में डॉ. पाठक का यह कथन किन्नर-विमर्श की उस अनिवार्यता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, जिस ओर ध्यान दिये बिना किन्नरों पर बात नहीं हो सकती। डॉ. पाठक बड़ी सहजता के साथ यहाँ स्पष्ट करते हैं, कि अभी तक जितने भी विमर्श चर्चित हुए हैं, भले ही उनकी चर्चा का घनत्व कम या ज्यादा हो, लेकिन उनमें एक समानता रही है, कि वे ऐसे समूहों, वर्गों, समुदायों से संबंधित हैं, जो समाज में हैं, समाज का हिस्सा हैं। इसमें शारीरिक विकलांग भी आ जाते हैं। लेकिन किन्नर समुदाय ऐसा है, जो समाज से एकदम कटा हुआ है। समाज में उनका आगमन यदि होता भी है, तो एक रहस्यमयी जीवधारी के रूप में...। इसी कारण समाज उनके प्रति सहज नहीं रहता। अकसर उन्हें ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, कि वे विवश हो जाते हैं... अपने लोक में, अपने सीमित दायरे में सिमटने के लिए। इस दृष्टि से देखने पर किन्नर-समुदाय मानवीय दायरे में समाहित हो ही नहीं सका। अन्य विमर्शों के केंद्र में रहने वाले लोग अपने लिए लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, लेकिन किन्नर-समुदाय अपनी आवाज ही नहीं उठा सका, कारण उसका समाज से एकदम कटा हुआ होना है। यह भी एक पक्ष है, जिस कारण साहित्य की विविध विधाओं में भी किन्नर समुदाय रहस्यमय ही बना रहा है। डॉ. पाठक इसी कारण किन्नर-विमर्श को मानवीय धरातल पर चर्चा के लिए लाने की बात कहते हैं। वे आक्रोश, आंदोलन, असहमति, विद्रोह जैसी स्थितियों के लिए किन्नर-समाज को तैयार नहीं देखते। वे तो किन्नर-विमर्श को किन्नरों के जीवन को देखने की एक पीठिका के रूप में स्थापित करते हुए चलते हैं।

इस पीठिका के आधार को तैयार करने का यत्न डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में दिखता है, इस कारण इस कृति की भूमिका की अपनी विशिष्टता है, महत्त्व है। किन्नर के रूप में जन्म लेने वाले नवजात के परिवार से लगाकर समाज तक, और फिर किन्नर समुदाय के जीवन के विविध पक्षों तक डॉ. पाठक बड़ी पैनी दृष्टि दौड़ाते हैं, और बिंदुवार स्पष्ट भी करते हैं। इस कृति की भूमिका में ही सरकार के द्वारा किये गए विभिन्न प्रयासों का उल्लेख मिलता है, विभिन्न आँकड़े मिलते हैं। ये सभी अपना अलग महत्त्व रखते हैं।  भूमिका में ही डॉ. पाठक इक्कीस ऐसे बिंदुओं का उल्लेख करते हैं, जो सामान्य रूप से किन्नर-आधारित साहित्य में किन्नरों को लेकर दिखाई पड़ते हैं। ये इक्कीस बिंदु केवल हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की पड़ताल करके ही नहीं लिखे गए हैं, वरन् मराठी, तमिल और अन्य भाषाओं के साथ ही छत्तीसगढ़ी आदि के साहित्य से भी छनकर आए हैं। इस कारण इन इक्कीस बिंदुओं में किन्नर-आधारित साहित्य का निचोड़ परिलक्षित हो जाता है।

किन्रर-विमर्श की चर्चा करने से पहले डॉ. विनय कुमार पाठक ने उन स्थितियों को परखने का यत्न भी किया है, जो विमर्श का नाम लिए बिना किन्नरों की उपस्थिति को साहित्य में रेखांकित करती हैं। इस दृष्टि से उनके द्वारा प्रसाद के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ का उल्लेख अत्यंत प्रासंगिक बन पड़ा है। इसके साथ ही वे अत्यंत क्रांतिकारी लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, इस्मत चुगताई और यशपाल की उन कृतियों का उल्लेख भी करते हैं, जिनमें किन्नरों के जीवन की झलक मिलती है। ये रचनाएँ आभास देती हैं, समाज के प्रति साहित्य की दायित्ववान दृष्टि का, जो बिना किसी विमर्श का नाम लिए हुए किन्नरों के जीवन की यथार्थ स्थिति को देखती है। इस कारण डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में इन रचनाओं का उल्लेख अपनी प्रासंगिकता को सुनिश्चित कर देता है। डॉ. पाठक ने इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ के लगभग दर्जन भर कवियों-कथाकारों का नामोल्लेख भी किया है।

 डॉ. विनय कुमार पाठक अपनी कृति की भूमिका में एक प्रसंग का वर्णन करते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से वे एक ऐसी दिशा-निर्देशक बात कहते हैं, जिसका संबंध किन्नर-विमर्श से भले हो, लेकिन वह अन्य विमर्शों के लिए भी संकेत के रूप में है। इस प्रसंग का उल्लेख भी यहाँ पर उल्लेख किया जाना आवश्यक लगता है। डॉ. पाठक लिखते हैं, कि किन्नर विमर्श विषयक इस ग्रंथ को प्रकाशन के लिए भेजने के समय एक सज्जन ने प्रश्न उठाया, कि ऐसे विमर्शों से किन्नरों का भला होगा? वस्तुतः, ऐसे प्रश्न अनपेक्षित नहीं होते, सहज ही होते हैं। इनके उत्तर भी सहज भाव की अपेक्षा रखते हैं। ऐसा करते हुए डॉ. पाठक जिस उत्तर को लिखते हैं, वह स्वयं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं- “विकलांग-विमर्श में मैंने इसका सकारात्मक परिवर्तन देखा और किन्नर-विमर्श के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ और सूत्र-रूप में संस्थित होकर मैंने कहा कि किन्नर का जीवन यदि स्याह अँधेरे में आच्छन्न है तो विमर्श उसमें सपने जगाने का काम तो कर ही सकता है, संघर्ष के कँटीले-पथरीले पथ में आहत होने पर उसे कराहने के लिए तो प्रेरित कर ही सकता है, भले कोई उपचार के लिए उपस्थित न हो लेकिन समाज और सरकार के प्रति संवेदना का भाव तो संचरित कर ही सकता है।” (भूमिका, पृ. 17-18)

डॉ. पाठक का उपरोक्त कथन किन्नर-विमर्श के संदर्भ में ऐसे भावनात्मक और दिशा-निर्देशक तत्त्वों को समेटे हुए है, जो किन्नर-विमर्श के नाम पर मानवीय, संवेदनापूर्ण और पुण्य-पवित्र ध्येय पर आधृत संघर्ष को उसकी दिशा से भटकने से रोकने और साहित्य के साथ ही समाज के सकारात्मक परिणामों को निकालकर लाने के लिए संकेत करते हैं। इन तमाम कारणों से इस कृति की भूमिका का अपना विशेष महत्त्व है।

आज के समय में किन्नर समुदाय के जीवन और उनकी दशा पर अनेक कार्य हो रहे हैं। इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। धरातल पर ये प्रयास सार्थक रूप में परिलक्षित भी हो रहे हैं। इस प्रयासों के साथ ही साहित्य भी अपनी भूमिका निभा रहा है, फलस्वरूप किन्नर विमर्श आजकर चर्चा में है। यह ऐसा अध्ययन-क्षेत्र है, जिसको व्यवस्थित रूप देना और इसको सार्थक-सर्वाङ्गपूर्ण रूप में अध्येताओं के लिए उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. पाठक ने इस आवश्यकता को न केवल समझा, वरन् अपनी कृति- ‘किन्नर विमर्श : दशा और दिशा’ के माध्यम से पूरा करने का सफल प्रयास भी किया है।

इस कृति में डॉ. पाठक ने आत्मकथा और नाटक जैसी अल्प-चर्चित विधाओं में भी किन्नरों के जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को; किन्नर-विमर्श से संबद्ध विविध आयामों देखा-परखा है, समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इतना ही नहीं, यह कृति सिनेमा में भी किन्नरों के जीवन को देखती है। उपन्यास, कहानी और कविता ऐसी विधाएँ हैं, जिनमें विमर्शों का सर्वाधिक प्रभाव और प्रस्तुति दिखती है। सामान्यतः विमर्शों की चर्चाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती भी हैं।

हिंदी कथा-साहित्य में किन्नरों के जीवन की उपस्थिति और पड़ताल का व्यापक अध्ययन डॉ. पाठक की इस कृति में दिखता है। विशेष रूप से हिंदी कहानियों के विविध पक्षों को उन्होंने देखा है, प्रस्तुत किया है। हिंदी कहानियों में समय के सत्य और यथार्थ का सर्वांगपूर्ण चित्रण आज की हिंदी कहानी को जहाँ एक ओर हिंदी की विविध विधाओं के बीच उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर समय और समाज से जुड़े विविध विषयों का चित्रण हिंदी कहानी की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता को स्थापित करता है। हिंदी कहानी में विविध विमर्शों सहित किन्नर-विमर्श की उपस्थिति भी इसका ही एक पक्ष है।

हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी कहानी में यदि विविध विमर्शों की चर्चा करें, तो स्पष्ट होता है, कि समय और समाज की सच्चाइयों के निरंतर निकट जाने का यत्न ही विविध विमर्शों की उत्पत्ति और विस्तार-विकास का आधार बना है। समकालीन समाज में महिलाओं की दयनीय दशा को रेखांकित करने-उभारने के लिए यदि स्त्री-विमर्श अस्तित्व में आया, तो दलितों की बात करने हेतु दलित-विमर्श की शुरुआत हुई। बाद में आदिवासियों के जीवन और उनके संघर्षों को लेकर आदिवासी-जनजातीय विमर्श की बात भी होने लगी। विमर्शों के माध्यम से वर्ग-विशेष की समस्याओं, स्थितियों और जीवन की जटिलताओं को एक विशिष्ट दायरे में समेटकर पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है। इन विमर्शों पर जितना कथा-साहित्य रचा गया है, उतनी ही रचे गए साहित्य पर चर्चा और समीक्षा-आलोचना हुई है।

आज की हिंदी कहानियों में ‘किन्नरों’ की दशा और दिशा के साथ ही किन्नर-विमर्श के प्रभाव-प्रसार की समीक्षा करने हेतु डॉ. पाठक ने अलग-अलग कलेवर वाली दो दर्जन से अधिक कहानियों का चयन किया है। ये कहानियाँ कथ्य, चरित्र, परिवेश की विविधता और वैचित्र्य के स्तर पर इस प्रकार की हैं, जिन्हें ‘किन्नर-विमर्श’ की प्रतिनिधि कहानियों के तौर पर रखा-देखा जा सकता है।

कृति में ली गई कहानियों में से कुछ के कथ्य को बानगी के रूप में यहाँ पर देखा जा सकता है। इसमें किरन सिंह की कहानी ‘संध्या’ की नायिका संध्या की लैंगिक विकलांगता का दंश झेलते माता-पिता हैं, तो दूसरी ओर शिवप्रसाद सिंह की कहानी के ‘बिंदा महाराज’ का नायक है। ये सभी अपनी विवशता को उस क्रूर समाज में भोगते हैं, जिसमें संवेदनहीनता है, अवसरवादिता है और क्रूर-तीक्ष्ण व्यंग्य हैं। अंजना वर्मा की कहानी ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ की सुंदरी की लैंगिक विकलांगता ही उसे अपने परिवार से दूर कर देती है। यह दूरी आपसी प्रेम को भले ही समाप्त न कर पाए, लेकिन समाज से छिपकर मिलने की विवशता में जरूर बाँध देती है। ऐसी स्थितियाँ समाज में हमें देखने को मिलती हैं। समाज इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं रखता।

ललित शर्मा की कहानी ‘रतियावन की चेली’, डॉ. लवलेश दत्त की कहानी ‘नेग’ और पद्मा शर्मा की कहानी ‘इज्जत के रहबर’ में किन्नर समाज में झाँकने का प्रयास हुआ है। महेंद्र भीष्म की कहानी ‘त्रासदी’ एकदम अलग तासीर की कहना है। यह दयनीय और दीन-हीन किन्नर समाज का दूसरा पहलू दिखाती है। किन्नर सुंदरी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए रति को बलात्कारियों से बचाती है। डॉ. पाठक इस कहानी पर टिप्पणी लिखते हैं, कि- जिस किन्नर को समाज अधूरा समझकर तिरस्कृत करता है, वही किन्नर आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण मानव की मदद को आ खड़ा होता है। यह बात अलग है, कि किन्नर की नेकनीयती के बदले में उसे किन्नरेतर समाज से उपेक्षा और अपमान ही मिलता है। विजेंद्र प्रताप सिंह की कहानी ‘संकल्प’ का मधुर अपनी लैंगिक-विकलांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनाता, वरन् अपने घर-परिवार की प्रगति के लिए निरंतर संलग्न रहता है। समाज की रक्षा करने वाला पुलिसकर्मी उसके साथ बलात्कार करता है, और यहाँ से मधुर के जीवन की दिशा बदल जाती है। वह अपने लिए एक लाख रुपये इकट्ठे करके अपना लिंग परिवर्तन कराकर माधुरी बन जाती है। मधुर के द्वारा कराया गया लिंग-परिवर्तन केवल उसके लिए ही नहीं, वरन् अनेक लोगों के लिए एक बड़े परिवर्तन की लहर लेकर आता है। कई लैंगिक-विकलांग लोग अपना आपरेशन कराने के लिए आगे आते हैं, तो दूसरी तरफ चिकित्सक भी इस काम में अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर संलग्न होते हैं।

राही मासूम रज़ा की कहानी ‘खलीक अहमद बुआ’ अपने शीर्षक में ही किन्नर का अर्थ द्योतित करती है। इस कहानी में यह बताने की कोशिश की गई है, कि खलीक अहमद बुआ नाम में जिस तरह एक पुरुष और एक स्त्री निहित है, उसी तरह कहानी के नायक में भी संवेदनशीलता, भावुकता और विश्वसनीयता समाहित है। पुरुष और स्त्री, दोनों के आदर्श गुण समाहित हैं। ऐसी ही एक कहानी सलाम बिन रजाक की है- ‘बीच के लोग’। इस कहानी में व्यंग्यात्मक लहजे में यह बताने की कोशिश की गई है, कि स्त्री-और पुरुष के बीच बँटे समाज में उन लोगों की कोई अहमियत नहीं होती, जो बीच के होते हैं, अर्थात् न स्त्री होते हैं, और ना ही पुरुष होते हैं। यह कहानी ‘किन्नर’ शब्द पर भी अपनी असहमति दर्ज कराती है।

कुसुम अंसल की कहानी ‘ई मुर्दन का गाँव’ में किन्नर समाज की दयनीय दशा को दिखाते हुए माता-पिता द्वारा अपने लैंगिक-विकलांग बच्चे को किन्नर समाज से बचाने का यत्न करते हुए दिखाया गया है। करतार सिंह दुग्गल की पंजाबी कहानी ‘हम जिनस’ में माता-पिता अपनी संतान कस्तूरी की लैंगिक-विकलांगता को समाज से छिपाकर अपने पास रखना चाहते हैं और हिजड़ा समुदाय उसे अपने साथ ले जाने पर अड़ा रहता है। विनोद मिश्र सुरमणि की कहानी ‘सुनो तुम मुझसे वादा करो’ भी कुछ इसी प्रकार की भावभूमि में रची गई है। कहानी उन वृहन्नलाओं की चिंता करती है, जिनसे समाज आशीष और सुख-समृद्धि की कामना तो करता है, लेकिन वृहन्नलाओं के जीवन की जटिलताओं की चिंता नहीं करता है।

डॉ. क्रांति कुमार सिन्हा की कहानी ‘नियति एक किन्नर की’ एकदम अलग तासीर की कहानी है, जो समाज की कड़वी सच्चाई को खुलकर सामने रखती है। कहानी के राजशेखर जी अपनी लैंगिक-विकलांग संतति से बहुत लगाव रखते हैं, लेकिन जब उन्हें समाज में बदनामी की चिंता होने लगती है, तो वे अपने कलेजे के टुकड़े को हिंजड़ा समुदाय को सौंपने में जरा-सी भी देर नहीं करते हैं। जवाहरलाल कौल ‘व्यग्र’ की कहानी ‘ज्योति सूना नयन’ एक उम्मीद जगाती है। इसमें शारीरिक विकलांग और लैंगिक-विकलांग एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। वस्तुतः विकलांगता दोनों ही हैं, लेकिन शारीरिक विकलांग कुछ हद तक अपने जीवन को सम्मानपूर्वक जी लेते हैं, जबकि लैंगिक-विकलांग के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। दोनों का एकसाथ मिलकर जीवन बिताना भविष्य की सुखद उम्मीद जताता है।

डॉ. पाठक ने यमदीप, मैं भी औरत हूँ, तीसरी ताली, किन्नर कथा, गुलाम मंडी, मैं पायल, पोस्ट बाक्स नं. 203 नाला सोपारा, जिंदगी 50-50, अस्तित्व, दरमियाना, आधा आदमी, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मैं क्यों नहीं और वाडामल्लि, आदि उपन्यासों को लेकर हिंदी उपन्यासों में किन्नरों के जीवन और उनके संघर्षों का विश्लेषण किया है। बात के विस्तार में जाने के स्थान पर यहाँ यह कहना अपेक्षित होगा, कि हिंदी कहानियों की तरह से ही उपन्यासों में किन्नरों के जीवन के अलग-अलग रंग दिखते हैं। उनके जीवन-संघर्ष के विविध पक्ष दिखते हैं। इसी तरह अधूरी देह, अस्तित्व और पहचान, शिखंडी, पंखुड़िया : अंतर्द्वंद्व आदि प्रतिनिधि कविताओं के माध्यम से किन्नर-जीवन के विविध पक्षों को देखा-परखा और विश्लेषित किया गया है।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा, और किन्नर-समुदाय से...। निश्चित रूप से यह दुर्लभ और कल्पनातीत संयोग कहा जाएगा। फिर भी किन्नर-विमर्श के संदर्भ में आत्मकथा विधा को डॉ. पाठक ने इस कृति में समेटा है। किन्नर-विमर्श के अंतर्गत- किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी... और मानोबी बंधोपाध्याय की आत्मकथा पुरुष तन में फँसा मेरा नारी-मन; इन दो आत्मकथाओं को लिया गया है। आत्मकथा विधा में इन दो कृतियों के अतिरिक्त संभवतः दूसरी कृतियाँ होंगी भी नहीं..। इसके बाद भी डॉ. पाठक ने इस विधा को इस कृति में समेटा है, कारण आत्मकथा विधा में किन्नरों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके, क्योंकि किन्नरों के द्वारा लिखा गया स्वाभाविक रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, दूसरे लोगों द्वारा लिखी गई बातों की अपेक्षा..। किन्नर समुदाय अपने जीवन-संघर्षों को लिपिबद्ध कर सकें, इसके लिए प्रेरित हों.., डॉ. विनय कुमार पाठक की यह दृष्टि निःसंदेह प्रभावित करती है।

डॉ. पाठक ने किन्नर-केंद्रित नाटकों में आग के सात फेरे और हरारत, इन दो नाटकों को लिया है। इसी तरह किन्नर-केंद्रित और मुख्य कथा के साथ जुड़े किन्नर-पात्रों के जीवन के चित्र खींचते सिनेमा और नाटकों का विश्लेषण इस कृति में किया गया है। यद्यपि इनकी संख्या कम है, लेकिन इन विधाओं में भी किन्नरों के जीवन को देखने का काम स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा के बड़े फलक से निकालकर डॉ. पाठक ने लगभग दर्जन भर उन फिल्मों का उल्लेख इस कृति में किया है, जो किन्नर-विमर्श के लिए, इस दिशा में सार्थक चर्चा के लिए महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं।

इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों के बीच सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक विमर्श के रूप में देखे जाने वाले किन्नर-विमर्श के संदर्भ में डॉ. विनय कुमार पाठक की यह कृति उन सभी विधाओं को समेटकर एक व्यापक विश्लेषण और समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिनकी न केवल साहित्य में, वरन् समाज में अत्यंत मजबूत स्थिति है। यह कृति एक संदेश भी देती है, कि ऐसी विधाएँ, जो साहित्य के साथ ही समाज को संदेश दे सकती हैं, उनमें आज तक भले ही कम काम हुआ हो, लेकिन संभावनाएँ असीमित-अपरिमित हैं। इस दृष्टि से भी डॉ. पाठक की इस कृति को किन्नर-विमर्श पर आधारित पहली समीक्षात्मक-आलोचनात्मक कृति कहा जा सकता है।

इस कृति का पहला अध्याय, जिसकी चर्चा हमने यत्नपूर्वक अंत में की है, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अध्याय को छोड़कर न तो इस कृति पर बात पूरी होती है, और न ही ‘किन्नर-विमर्श’ पर बात पूरी हो सकेगी। यह अध्याय है- ‘किन्नर : आशय और अवधारणा’। इस अध्याय में किन्नरों के स्वरूप-विवेचन के साथ ही ऐतिहासिक पीठिका, मूल निवास, मानवाधिकार और परंपरागत जीवन आदि विविध विषयों-बिंदुओं को समेटने का यत्न डॉ. पाठक ने किया है।

‘किन्नर-विमर्श’ अपने नाम के अनुरूप किन्नरों के जीवन और उनकी सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न विषयों पर केंद्रित है। लेकिन ‘किन्नर’ नाम को लेकर अकसर विवाद उठता रहा है। वस्तुतः ‘किन्नर’ एक ऐसी मानव-प्रजाति है; जो गीत-संगीत में रुचि रखती है, जो हिमालय के तराई क्षेत्रों में पाई जाती है। किन्नर पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बहुत ही कम होने के कारण ये ‘किं-नर?’ से ‘किन्नर’ बन गए। किन्नर-विमर्श में जिन ‘किन्नरों’ की बात की जाती है, उनसे ये अलग होते हैं, लेकिन नाम-साम्य के कारण विवाद की स्थितियाँ बनती हैं।

संभवतः इस स्थिति को जानते-समझते हुए डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी कृति के पहले अध्याय में एक विकल्प दिया है। वे ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए ‘लैंगिक विकलांग विमर्श’ नाम भी देते हैं। यह नाम कई अर्थों में प्रासंगिक लगता है, क्योंकि इस विमर्श में उन लोगों के जीवन को दर्शाया गया है, जो लैंगिक असामान्यता का जीवन जी रहे होते हैं। यद्यपि ‘किन्नर-विमर्श’ आज के समय में रूढ़ हो गया है, इस कारण ‘लैंगिक-विकलांग’ और ‘पार-यौनिक’ (ट्रांसजेंडर) के साथ ही ‘असामान्य यौन-विकृत’ और ‘यौन-मनोविकृत’ के स्थान पर ‘किन्नर-विमर्श’ ही व्यवहृत होता है। डॉ. पाठक ने भले ही दूसरे नाम सुझाए हों, और संदर्भित विषय में चर्चा के विविध पक्षों को निष्पक्षता के साथ स्थान दिया हो, किंतु वे पौराणिक प्रसंगों, भारतीय वाङ्मय के उदाहरणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ ‘किन्नर’ शब्द के व्यवहार को पुष्ट करते हैं, समर्थन देते हैं। ‘किन्नर-विमर्श’ की साहित्यिक स्थापना के लिए विस्तृत-व्यापक आधार तैयार करते हुए प्राचीन भारतीय वाङ्मय और लोकजीवन के साथ ही वे मध्यकालीन समाज में ‘किन्नरों’ की स्थिति का विशद-व्यापक विश्लेषण करते हैं। वे ‘थर्ड जेंडर’, ‘गे’, ‘लेस्बियन’, ‘लैंगिक-विकलांग’ आदि का उल्लेख करते हुए ‘किन्नर-विमर्श’ की वैचारिक भूमि का निर्माण करते हैं।

उल्लेखनीय है, कि हमारे संस्कारों और लोकजीवन के विभिन्न पक्षों के साथ किन्नरों का संबंध रहा है। भारतीय वाङ्मय और पौराणिक ग्रंथों में किन्नरों की सम्मानजनक स्थिति को दर्शाया गया है। लोग इनके प्रति आस्थावान रहते हैं। किन्नर अखाड़ों का अस्तित्व और विभिन्न रीति-रिवाजों में इनको दिया जाने वाला सम्मान हमारी परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है। लोकजीवन में ये स्थितियाँ आज भी दिखती हैं। मध्यकाल में यह समुदाय हरम के पहरेदार की भूमिका में सिमटकर रह गया। बाद के वर्षों में यह समुदाय अपने जीवन के लिए जटिल होती स्थितियों के साथ जीने को विवश होता गया। डॉ. पाठक ने अनेक उद्धरणों और लोकगीतों-लोकपरंपराओं आदि का उल्लेख करते हुए तमाम अनजानी बातों को समेटकर किन्नर-समुदाय के कालक्रमानुसार इतिहास को अनौपचारिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस कारण यह अध्याय महत्त्वपूर्ण है, और किन्नर-विमर्श के अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इस विश्लेषण के साथ वे संकेत भी देते हैं, कि मनोविकृतियों के कारण असामान्य लैंगिक व्यवहार करने वाले, छद्म किन्नर बनने वाले लोगों और ‘किन्नरों’ में बड़ी विभाजक रेखा खिंची हुई है। किन्नर-विमर्श के संदर्भ में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

समग्रतः, किन्नर विमर्श के वैचारिक आधार की तैयारी के लिए डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा चयनित समस्त सामग्री, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, सिनेमा आदि विमर्श के फलक को विस्तार ही नहीं देते, वरन् अनेक अनछुई सच्चाइयों को प्रकट भी करते हैं। डॉ. पाठक ने अपनी कृति में जिस प्रकार खाका खींचा है, वह निःसंदेह ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। इस कृति को ‘किन्नर-विमर्श’ का दिशा-निर्देशक ग्रंथ कह सकते हैं। और एक बार फिर डॉ. विनय कुमार पाठक को ऐसे सिद्धहस्त समीक्षक-आलोचक कह सकते हैं, जिन्होंने बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों को स्थापित करने और साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा के लिए उपलब्ध कराने का काम किया है।

(पुस्तक- किन्नर आलोचना के शिखर : डॉ. विनय कुमार पाठक, संपादक- डॉ. अनिता सिंह, प्रकाशक- माया प्रकाशन, वर्ष- 2024 में प्रकाशित)

                                                                                    -राहुल मिश्र

Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।


Wednesday, 14 May 2025





बदलते नामों और छाँह की दीवार का एक गाँव


चलिए, अब दोबारा कभी मिलना होगा....।

फिर कभी ऐसा संयोग बनेगा, तो मिलेंगे...। यादें साथ रह जाती हैं।

हमारा इतना कहना हुआ, कि तुरंत ही करनल साहब ने बड़े दार्शनिक अंदाज में उत्तर दिया- “साहब! जिंदगी में ऐसे ही मोड़ आते हैं, लोग मिलते हैं, बिछड़ जाते हैं.....। यह तो एक पड़ाव है, ठिकाना है। जिंदगी भी ऐसी ही है, साहब।”

करनल साहब की बात सुनकर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। पिछले तीन दिनों में हमने करनल सिंह को इतने दार्शनिकाना अंदाज में नहीं देखा था। परिचय भी तीन दिन ही पुराना था। निःसंदेह किसी आदमी को एक बार में नहीं जाना जा सकता.... और यहाँ कुल जमा तीन दिन यानि पैंसठ-सत्तर घंटे...। लोग तो बरसों-बरस साथ रहकर भी एक-दूसरे को नहीं जान पाते हैं। खैर, करनल साहब को समझने के लिए हमें इतने लंबे समय की आवश्यकता नहीं थी। खुला हुआ और सीधा-सपाट स्वभाव करनल सिंह का था। जटिलता नहीं थी, जिस कारण बातें सरल और सहज थीं। तब आखिर यह दार्शनिकाना अंदाज कहाँ से आ गया? प्रश्न मन में उठा, उत्तर भी कौंध गया।

वस्तुतः, यह स्थान का प्रभाव बोल रहा था। करनल सिंह जम्मू-काश्मीर पुलिस के संभवतः हवलदार रैंक के कर्मी थे। किसी सरकारी काम ने हमारे साथ करनल सिंह को तैनात कर दिया था, जिस कारण करनल सिंह तीन दिनों तक हमारे साथ थे। हम जिस स्थान पर थे, वह हमारे अनुमान से अतीत के एक रोचक अध्याय से कम न था। उसी स्थान का प्रभाव करनल सिंह के सिर चढ़कर बोल रहा था, ऐसा हमको अनुभूत हुआ, उनके इस कथन को सुनकर।

क्यागर, तिगर, टाईगर, टिगर जैसे नाम...। ये अलग-अलग नाम एक ही गाँव के हैं, जहाँ हम लोग पिछले तीन दिनों से डेरा डाले हुए थे, और आज की सुबह चल पड़ने के लिए तैयार खड़े थे। गाड़ी वाला गाड़ी की हवा आदि दुरुस्त कराने गया था, क्योंकि हमें लंबा रास्ता तय करना था, और ऊपर से खरदुंग ला को भी पार करना था। खरदुंग हमारे लिए खर तुंग है, जिसकी बड़ी तीव्र चढ़ाई-उतराई है..., तुंग है। विश्व की सबसे ऊँची ‘मोटरेबल रोड’ भी यही है। गाड़ी वाले के आने तक चारों ओर एक बार फिर से नजर दौड़ाकर पूरे क्यागर गाँव की सुंदरता को, इसके आकर्षण को अपनी स्मृतियों के लिए सँजो लेना चाहते थे।

क्यागर गाँव आज भले ही बड़ा शांत और ठहरा हुआ-सा दिख रहा हो, लेकिन अतीत की कल्पनाओं में मन उतरा, तो बहुत गहरे उतरता चला गया। रेशम मार्ग से लगा हुआ क्यागर गाँव एक समय में रेशम मार्ग के यात्रियों के लिए बड़ा ठिकाना हुआ करता था। समरकंद बुखारा से लगाकर ईरान-ईराक-अफगानिस्तान तक चला जाने वाला यह रेशम मार्ग अपने साथ न जाने कितने लोगों को जोड़ता रहा, अनुमान लगाना कठिन है। अनुमान तो इसका भी नहीं लगाया जा सकता, कि कितनी संस्कृतियाँ, कितने विचार, कितने व्यवहार और कितनी प्रजातियाँ इस रेशम मार्ग से होकर आईं-गई-फैलीं-पसरीं और विचरीं...। इन अनेक यात्राओं के साक्षी रेशम मार्ग के किनारे बसे कितने गाँव और नगर होंगे, यह भी सहज ही नहीं जाना जा सकता।

क्यागर गाँव में न जाने कितने लोग आए होंगे, ठहरे होंगे, कुछ समय के लिए डेरा डाला होगा, और फिर अपनी यात्रा पर चल पड़े होंगे... ठीक वैसे ही, जैसे हम चल पड़ने को तैयार खड़े थे। हर बार जब किसी बटोही ने चल पड़ने के लिए अपना सामान बाँधा होगा, अपने साथियों से भावुक होकर फिर मिलने के वायदे किए होंगे, तब हर बार किसी साथी ने करनल सिंह की तरह दार्शिकाना अंदाज में उत्तर दिया होगा।

पिछले तीन दिनों से जिस आकर्षण में क्यागर ने बाँध रखा था, वह अब तक की हमारी यात्राओं से एकदम अलग था। इसकी गहनता बहुत थी, जो हर बार उस अतीत की कल्पनाओं में उतार रही थी, जिसे आज के समय में मात्र अनुभूत किया जा सकता है। रेशम मार्ग प्राचीन और मध्यकालीन व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा है। लगभग सारी दुनिया ही इस मार्ग की व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ी थी। अनेक छोटे-बड़े व्यापारिक मार्ग भी इससे जुड़कर रेशम मार्ग के नाम से जाने जाते थे। यह चीन से मध्य एशिया और फिर योरोप तक जाता था। समरकंद, बुखारा से यारकंद तक जाने वाले रेशम मार्ग को भारत के साथ जोड़ने वाला उपमार्ग क्यागर से होकर जाता था। क्यागर से हुंदर, पनामिक, दिस्किद, खालसर और फिर लेह तक जाने वाला रास्ता भले ही रेशम मार्ग का संपर्क मार्ग हो, लेकिन भारत की व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े होने के कारण यह मार्ग बहुत महत्त्व का था। क्यागर रेशम मार्ग के यात्रियों-व्यापारियों के लिए बड़ा ठिकाना हुआ करता था, और एक प्रकार से यह रेशम मार्ग के सबसे निकट का गाँव था। स्वाभाविक ही है, कि इस अतीत को जानकर और अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न हो जाए। हमारे जैसे लोगों के लिए तो यह बहुत रोमांचकारी था। एक-एक कण हमें मानों अनेक-अनेक इतिहास की परतों को सँजोए हुए दिख रहा था। पूरे रास्ते भर यही मन में चलता रहा, कि अगर समय से पहुँच जाएँगे, तो आज से ही जिज्ञासा-शमन के प्रयास चालू कर देंगे, दो-चार लोगों से तो मिल ही लेंगे। लेकिन क्यागर तक पहुँचते-पहुँचते धुँधलका हो चुका था। लद्दाख में धुँधलका होना आधी रात हो जाने जैसा ही होता है, क्योंकि सूरज के ढलते ही लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते हैं। हमें तो प्रायः यही लगा, कि भीषण सर्दियों की आदतें गर्मियों के मौसम में भी बनी ही रह जाती हैं।


मई-जून का महीना लद्दाख में बहुत ठंडा नहीं होता। रात सात-आठ बजे तक घर के बाहर आसानी से रहा जा सकता है, लेकिन क्यागर में  ऐसा नहीं दिखा। रास्ते में आते समय लोगों को अपनी गायें, बकरियाँ आदि घर की तरफ ले जाते देखा था। हमारे क्यागर पहुँचने तक क्या जानवर और क्या आदमी... सभी अपने दड़बों में पहुँच चुके थे। हमारे पास केवल


विश्राम करने का विकल्प शेष था। भला हो श्रीमान टाशी जी का, वे अचानक ही प्रकट हो उठे थे। उनसे कुछ जानकारी मिल सकती है, ऐसा हमें भरोसा भी हो चुका था। टाशी आंगचुक सेना से रिटायर होकर अपने गाँव में रह रहे थे। प्राथमिक परिचय के बाद उनसे यही सवाल किया, कि आप लेह में क्यों नहीं बस गए? उत्तर मिला, गाँव का प्रेम खींच लाया है। नौकरी भर तो बाहर ही रहे हैं। अब गाँव में रहना अच्छा लगता है।

तो आपको अपने गाँव का अतीत भी पता होगा, कुछ गाँव के बारे में बताइए, तो....।

टाशी जी बोले, इतिहास तो बहुत पता नहीं है, लेकिन छाँह की दीवार के बारे में अपने बड़े-बूढ़ों से सुना है। गाँव सिल्क रूट से जुड़ा था, और बहुत संपन्न था, बस इतना ही पता है। लेकिन आपको कल अपने गाँव के मुखिया और राजपरिवार से संबंध रखने वाले एक महाशय से मिलाने के लिए जरूर ले जा सकते हैं। उनसे आपको बहुत कुछ जानने को मिलेगा। परंपरागत रसोईघर भी आप देख सकेंगे।

श्रीमान टाशी का यह प्रस्ताव मनोनुकूल था। तुरंत ही हामी भर दी। साथ में करनल सिंह भी इन बातों को सुन रहे थे, लेकिन उनकी इसमें कोई रुचि नहीं थी। करनल सिंह खाने की जुगत लगा रहे थे, और फिर उनका विश्राम करने का मन हो रहा था। ऐसा वो दो बार हमें बता चुके थे। टाशी जी भी घर जाना चाह रहे थे। लिहाजा तय हुआ, कि कल सुबह टाशी जी आएँगे और उनके साथ श्रीमान सोनम टुंडुप जी से मिलने के लिए जाएँगे। भोजन के उपरांत विश्राम के क्षणों में भी विचारों का मंथन चलता रहा। रह रहकर छाँह की दीवार, पुरानी रसोई, काराकोरम की गहन कृष्णता के मध्य बिंदु-सदृश आभासित महल के ध्वंसावशेष अपने साथ विगत की यात्रा पर मानों ले जाना चाह रहे थे। रास्ते की थकान कभी इन पर भारी पड़ती, तो कभी ये थकान पर....। कुल मिलाकर रात ऐसे ही कटी और भोर के उजास ने नई ऊर्जा का संचार किया। कल-कल निनाद करती नुबरा नदी का मद्धिम स्वर नीलांबर की वीतरागी शांति को भंग करता-सा लग रहा था। दूर-दूर तक काराकोरम की शृंखलाएँ अलग-अलग रंगों में पसरी हुई-सी ऐसी लग रहीं थीं, मानों तंद्रा में हैं और सुबह के आलस से निकल नहीं पाईं हैं। इन्हीं विचारों में खोए हुए थे, कि टाशी जी ने आकर बताया, कि हमें श्रीमान टुंडुप जी से मिलने चलना है। वे कहीं जाने वाले हैं, इसलिए अभी ही जाना होगा। हम भी तुरंत तैयार होकर चल पड़े।

गाँव के भीतर की गलियाँ अपेक्षाकृत चौड़ी और साफ-सुथरी थीं। घरों को बहुत करीने से सजाया-सँवारा गया था। सोनम टुंडुप जी का घर किसी गढ़ी के जैसा था। बहुत विशाल...। एक ओर जानवरों को बाँधने के लिए क्रम से कोठरियाँ बनी हुई थीं। मुख्य द्वार पर रिग्-सुम (तीन स्तूप) बने हुए थे। उनके नीचे से निकलकर घर में प्रवेश करना था। बड़े-से दरवाजे के दोनों ओर विशालकाय भंडारगृहों में जलाऊ लकड़ी को बड़े व्यवस्थित और कलात्मक क्रम से रखा गया था। पहले माले पर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं, जिनसे होकर हम ऊपर पहुँचे। बड़े-से विश्राम कक्ष में अनेक सजावटी वस्तुएँ, जिन्हें दुर्लभ की श्रेणी में रखा जा सकता है, सहेजी गईं थीं। टुंडुप जी ने बहुत उत्साह के साथ स्वागत किया।

टाशी आंगचुक पहले ही हमारे बारे में बता चुके थे, इस कारण हमको बहुत बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी। महाशय टुंडुप जी ने बात क्यागर के बारे में बताते हुए ही प्रारंभ की-- “आज का क्यागर पहले यहाँ नहीं था। यहाँ से पहले तीन जगहों में इसकी बसावट थी। पहले लुंगदो में यह हुआ करता था। लुंगदो से फिर जङ्लम में आकर बसा और इसके बाद जिम्सखङ गोङ्मा बसा।“

टुंडुप जी के बताने पर हम उस ध्वसांवशेष की पहचान कर सके, जिसे काराकोरम की विशाल शृंखलाओं के मध्य एक सफेद बिंदु की भाँति चमकते हुए देखा था। टुंडुप जी बता रहे थे.... 2015 के पहले तक वह महल देखने में ठीक-ठाक था। पहले आसपास तमाम घर भी थे। ये बसावट महल के साथ ही थी। महल को जिम्सखङ कहते थे। यह वास्तव में वंशावली का नाम है, जिससे हमारा खानदान पहचाना जाता है। 2015 की तबाही के बाद इधर सड़क के साथ लोग बस गए।

टुंडुप जी की बातों का क्रम रेशम मार्ग की ओर चल पड़ा था। हमारे साथ बैठे आंगचुक जी भी रेशम मार्ग से जुड़ी बातों को सुनने के लिए जरा सावधान होकर बैठ गए थे। वैसे तो टुंडुप जी ने रेशम मार्ग की गतिविधियों को नहीं देखा, लेकिन उनके पास बड़े-बूढ़ों से सुनी हुई बातों के सहारे अच्छा खासा स्मृतियों का भंडार था, जिसका आस्वाद आज हमको भी मिलने वाला था।

“पहले यहाँ यारकंद से आने वाले व्यापारी ठहरा करते थे। यहाँ पर घास के बड़े मैदान होते थे, जिनमें अलफा-अलफा घास बहुत पैदा होती थी। इसे हमारी भाषा में ओल बोला जाता है। व्यापारी अपने घोड़ों, ऊँटों आदि जानवरों को चराने के लिए यहाँ रुकते थे। व्यापारी सासोमा से तकशा और पनामिक होते हुए इस तरफ को आते थे, दो-तीन दिन रुकते थे और डिगर दर्रा पार करके लेह की तरफ चल पड़ते थे। वापसी भी ऐसे ही होती थी।“ टुंडुप जी इतना बताते हुए थोड़ा रुके, और फिर बड़ी गंभीर भंगिमा में बोल पड़े.... अब तो ओल दिखती ही नहीं हैं... पहले बड़े बुजुर्ग बताते थे कि ऊपर पहाड़ों तक में ओल हुआ करती थी....। अब समय बदल गया है।

“सिल्क रोड के साथ ही अलफा-अलफा भी खतम हो गया...।“ टुंडुप जी का यह कथन बड़ी वेदना में डूबा हुआ था।

रेशम मार्ग कभी देशों की सीमाओं में नहीं बँधा। इसी कारण अनेक संस्कृतियाँ, साहित्य, विचार, चिंतन, दर्शन, विज्ञान, विचार और व्यवहार आदि न जाने कितनी विधाएँ लंबी यात्राएँ करके आती रहीं, जाती रहीं और विस्तार पाती रहीं हैं। रेशम मार्ग केवल व्यापार का ही मार्ग नहीं था। बहुत कुछ इसके साथ जुड़ा है, जिसे समेकित रूप में मानव सभ्यता के विकास-विस्तार के क्रम में जोड़ा जा सकता है। केवल अलफा-अलफा घास ही नहीं, ओल ही नहीं... बहुत कुछ उजड़ा है, रेशम मार्ग के रुक जाने के बाद....। हमारी सीमाएँ बन गईं हैं....।

हमारे मन में एक ओर ये विचार चल रहे थे, और दूसरी ओर टुंडुप जी धाराप्रवाह बोलते जा रहे थे।

“आप चाय लेंगे, या दूध....” इस विकल्प के साथ आई एक आवाज ने हम दोनों को ही रोक दिया था। हमारे विचारों की गति भी रुक गई और टुंडुप जी भी रुक गए। कुल मिलाकर तय हुआ, कि बढ़िया दूध एक-एक गिलास पिया जाए। गाँव में गौवंश की कोई कमी नहीं थी। शुद्ध दूध-घी-मक्खन तो वैसे भी गाँवों में ही मिल पाते हैं। खैर....। बातों का क्रम फिर आगे बढ़ा...।

अब टुंडुप जी हमें अपनी वंशावली के बारे में बता रहे थे- “हमारा घर का नाम जिम्सखङ है। यह हमारी पहचान कराता है। जिम्सखङ की शाखा ही दिस्किद, हुंदर और खलसर में है। वहाँ पर हमारे वंश का कोई नहीं बचा है। केवल क्यागर में ही है। लेह में कलोन (प्रधानमंत्री) होता है, जो राजा के नीचे होता है। इसके बाद लोनपो (क्षत्रप) होते हैं। इन्हें जिम्सखङ भी कहते हैं।“

टुंडुप जी के इतना बताने के बाद हमारे सामने स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। लेह राजवंश का शासन यहाँ तक था, बगल में स्करदो और गिलगित-बल्टिस्थान आदि थे। हुंदर, दिस्किद, खालसर और क्यागर आदि क्षत्रपों के अधीन पूरी व्यवस्था यहाँ पर चलती थी। कुछ स्थानों पर सुरक्षा चौकियाँ जैसी भी होती थीं, जहाँ से व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी हुआ करती थी। आज वे सब नहीं हैं। लेकिन खंडहरों में दबे अतीत को आज भी अनुभूत कर सकते हैं।

रास्ते में आते समय मील के पत्थरों पर टाइगर नाम लिखा हुआ देखा था। जिज्ञासावश इस प्रश्न को टुंडुप जी के सामने रखा, कि यह कोई दूसरी जगह है, या क्यागर विकृत होकर टाइगर बन गया है.....। हमारे इस प्रश्न ने टुंडुप जी की वेदना को ही मानों उखाड़ दिया था......।

“ये ग्रीफ वाले भी ना....। जाने बिना ही किलोमीटर में लिख देते हैं। यह नाम तो गलत है, लेकिन इस नाम से भी जगह को जानते हैं।“

आखिर यह नाम कब बदल गया? मेरे इस प्रश्न पर तुरंत ही टुंडुप जी बोले... बस ऐसे ही यह गाँव बदलते नामों वाला हो गया है....। कोई टाइगर कहता है, तो कोई टिगर कहता है, तो कोई तिगर कहता है.....। किसको क्या कहें......।

तो फिर सही क्या है? हमने पूछा।

सही तो क्यागर ही है....। हमारी भाषा में सफेद को करपो बोलते हैं। वो जो जिम्सखङ महल है ना.... वो दूर से सफेद नजर आता था, इस कारण करपो से क्यागर बन गया, यानि सफेद महल....।      

क्या कोई गाँव ऐसा भी होता है जो अपने नाम बदला करे और अगर ऐसे किसी गाँव का पता चले जो बदलते नामों वाला गाँव है, तो सुनकर आश्चर्य तो अवश्य ही होगा....। हमको भी जब यह पता चला था, तो अलग ही रोमांच हुआ था।  टुंडुप जी के कहे अनुसार समझ में आ रहा था, कि गाँव में सड़क पहुँची, तो बहुत कुछ बदल गया....। यहाँ तक कि गाँव का नाम भी....। वैसे यह विषय बहुत भावुक कर देने वाला था। समय और स्थितियाँ कैसे बदला करती हैं, आज साक्षात् देख रहे थे। एक जमाने में अपनी हनक से पूरे क्षेत्र को प्रभावित करने वाला जिम्सखङ आज ध्वंसावशेष है...। टुंडुप जी बता रहे थे, कि जिम्सखङ की वंशावली में लोनपो सोनम जोलदन को लोग आज भी याद करते हैं। उनके कामों को आज भी याद किया जाता है। मने खङ, गोनपा आदि के निर्माण के साथ ही लोगों के लिए भी उन्होंने बहुत काम किया है। सोनम जोलदन के बाद सोनम तरग्यास, सोनम दोरजे, सोनम रिगजिन, रिगजिन आंगमो...। महाशय टुंडुप जी रिगजिन आंगमो के दामाद हैं।

लद्दाख में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी है। धर्मराज सेङ्गे नामग्याल की माँ ग्यल खातून, सेङ्गे नामग्याल की पत्नी कलसङ डोलमा और राजा देस्क्योङ नमग्याल की रानी ञिलस़ा वङमो सहित अनेक ऐसी महिलाओं का नाम गिनाया जा सकता है, जिन्होंने राजपरिवार की सीमा से निकलकर सीधे प्रजा से अपने को जोड़ा है। यह जानकर अच्छा लगा, कि क्यागर के लोनपो परिवार की उत्तराधिकारी रिगजिन अंगमो हुईं, और यह क्रम उनकी बेटी ने आगे बढ़ाया है।

टुंडुप जी बता रहे थे, कि एक समय में यहाँ चूना भट्टी भी हुआ करती थी, जिसमें पकी ईंटे बनाई जाती थीं। पूरे लद्दाख में कम से कम हमने तो ऐसी चूना भट्टी नहीं ही देखी थी। लेह से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर एकदम सीमा पर ऐसी व्यवस्था का पाया जाना सिद्ध कर रहा था, कि अपने समय में यह क्षेत्र बहुत समृद्ध रहा होगा। रेशम मार्ग के व्यापार की बंदी ने, फिर प्राकृतिक आपदाओं ने, और फिर सीमांत क्षेत्र के हिस्से आई उपेक्षाओं ने क्यागर सहित अनेक गाँवों को अपने हाल पर छोड़ दिया....।

टुंडुप जी अब छाँह की दीवार के बारे में बता रहे थे- “क्या पता चूना भट्टी से पकाई गई ईंटों से छाँह की दीवार बनाई गई हो.....।“

अब वह दीवार तो नहीं दिखती, लेकिन स्मृतियाँ जीवंत हैं। दूर-दूर तक फैले मैदान में छाँह ढूँढ़ना संभव नहीं...। नुबरा घाटी तो वैसे भी बर्फ का रेगिस्तान कही जाती है। हुंदर के आसपास रेगिस्तान जैसी आकृतियाँ मिलती हैं। संभवतः किसी शासक ने नया प्रयोग किया हो, और धूप से बचने के लिए छाँह की दीवार बनवा दी हो, जिसमें यात्री और जानवर दोनों ही ठहर सकें। धर्मशालाएँ और प्याऊ जैसे धर्मार्थ कार्य तो बहुत सुने होंगे, लेकिन यह काम अनूठा लगा...। टुंडुप जी छाँह की दीवार के बारे में बहुत तो नहीं बता सके, लेकिन इतना अवश्य संकेत दिया, कि जाते समय चूना भट्टी के खंडहरों को देखते हुए जाएँ। उस जगह को संरक्षित स्मारक के रूप में रखा गया है। सरकारी बोर्ड भी लगा है।

क्यागर गाँव की परिधि में बड़ा चरागाह हुआ करता था। समरकंद, बुखारा, यारकंद, लेह आदि से आने वाले व्यापारी यहाँ के लोगों से किराए पर चरागाह लेकर अपने जानवरों को चारा खिलाते थे। एक-दो दिन इसी बहाने रुकते थे, और फिर अपनी यात्रा पर चल पड़ते थे।

महाशय टुंडुप जी से लंबी वार्ता हो चुकी थी। परंपरागत रसोई भी देखी जा चुकी थी, जिसमें कलात्मक आकृतियों वाले ताँबे और पीतल के बर्तन सहेजे हुए थे। पुराने अंदाज का चूल्हा भी था, जिसके आसपास बैठकर भोजन के आस्वाद के साथ ही बतकही का आनंद लिया जा सकता था। शीत की विकरालता के समय रसोई लद्दाख के लोगों के लिए बड़ा सहारा हुआ करती थी। क्यागर गाँव में आज भी ऐसा ही है, यह जानकर मन को बड़ी तसल्ली मिली, कि परंपराएँ अभी भी जीवंत हैं।

महाशय टुंडुप जी से विदा लेकर हम और आंगचुक जी वापस लौट रहे थे। रास्ते भर हमलोग बतियाते चले आए। हमारे लिए अनुभूत करना सहज हुआ, कि कैसे यहाँ व्यापारी रुकते रहे होंगे, किस तरह अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन होता रहा होगा....। न जाने कितने चित्र मन में चलते चले गए...। चित्रपट की तरह...। आंगचुक जी थोड़ी देर बाद आने को कहकर चले गए।

लौटने पर देखा, तो करनल जी प्रतीक्षा में बैठे हुए थे। साहब.... बहुत समय लगा दिया...। भोजन का समय हो गया है....। क्या करेंगे?

करनल जी के लिए यह रुचि का विषय नहीं है, इसलिए साथ ले जाना उचित नहीं समझा था। देर तो हो ही चुकी थी, साथ ही अपने काम में भी लगना था, जिसके लिए यहाँ आए थे....। अतः करनल जी से कहा, कि भोजन कर लेते हैं।

“रसोइया नहीं आया था, वह किसी जरूरी काम से अचानक ही चला गया है। किसी दूसरे को भेजने के लिए कह रहा था, तो मैंने ही मना कर दिया....।“ करनल सिंह ने बताया।

.....आज साहब को अपने हाथ का बना चावल खिलाना है।

हमने कहा, ठीक है....।

साहब! लेकिन आपको पसंद न आया, तो क्या करेंगे?

हमने कहा, चलो देखते हैं...।

करनल जी ने गरमागरम चावल निकाले, जो केवल प्याज से छौंक कर एकदम अलग तरीके से बनाए गए थे। सुंगध बरबस खींच रही। हमने पूछा, कि यह कौन-सा व्यंजन है?

करनल साहब ने बताया.... पुलाव है....।

हमने कहा, पुलाव तो ऐसा नहीं होता...। स्वाद भी अलग-सा है।

करनल जी ने कहा, कि हो सकता है.....।

हमने कहा, तो इस पुलाव को अलग नाम दे देते हैं....।

पनीर के कई सारे व्यंजन होते हैं, जैसे पनीर पसंदा, पनीर पक्का, पनीर टिक्का आदि....। वैसे ही पुलाव के भी कई नाम हो सकते हैं....।

करनल जी इस पर कुछ नहीं बोले, और उनके मौन को सहमति मानते हुए हमने इस विशेष विधि से बनाए गए पुलाव को करनल पुलाव नाम दे दिया...।

करनल पुलाव.....। हा! हा!...... साहब आप भी बड़े मजाकिया हैं....। करनल जी बोले...।

हमने कहा, इसी बहाने आपको, इस सुस्वादु भोजन को, इस स्थान को, आज के दिन को याद रखेंगे.....।

ठीक है, साहब...। कहकर करनल सिंह ने अपनी थाली में ध्यान केंद्रित कर लिया।

हमने भी तुरंत भोजन समाप्त किया और अपने काम में लग गए।

अगला दिन व्यस्तताओं भरा रहा, लेकिन क्यागर के अतीत में जब भी उतरने का अवसर मिलता, क्षण भर का ही सही... अवसर पाते ही मन उतर पड़ता। गाँव के कई लोगों से मिलना हुआ, तरह-तरह की बातें जानने को मिलीं...। गाँव के युवा शहरों को जा चुके थे, अधेड़ और वृद्धों की संख्या ही अधिक दिखती थी। सैलानियों की गाड़ियों से चहल-पहल बनी रहती थी। फिर भी एक रिक्तता, एक अजीब-सा वीरानापन, सूनापन अनुभूत होता था। शब्दों में जिसे बाँध पाना कठिन लगता है। मेहमानों के चले जाने पर घर जिस तरह सूना हो जाता है, कुछ वैसा ही...।

अगली सुबह यहाँ से हमें भी निकलना है। यह भी तब ध्यान में आया, जब करनल सिंह ने बताया, कि अब रात भर बितानी है....।

दरअसल करनल सिंह को तीन दिन बड़ी कठिनाई के लगे थे। नगरों-महानगरों की जैसी चहल-पहल यहाँ नहीं थी। बहुत धीमे-धीमे सब चल रहा था, रात भी धीरे-धीरे बीती...सुबह भी हो गई, और करनल साहब कील-काँटा, वर्दी-बूट दुरुस्त करके सुबह से ही तैनात हो गए थे। हमको ही कुछ देर हुई थी...।

भला हो, गाड़ी वाले का, कि निकलने से पहले गाड़ी की हवा आदि दुरुस्त कराने के लिए निकल गया था, सो हमें भी कुछ समय मिल गया....। खैर.... तैयार होकर गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे और पिछले तीन दिनों का घटनाक्रम चित्रपट की भाँति चल रहा था। कब गाड़ी वाला गाड़ी लेकर आ गया और सामान रखकर चलने को तैयार हो गया, पता ही नहीं चला....।

“चलें, साहब...। गाड़ी आ गई है, सामान भी रख गया ....।“ करनल सिंह ने कहा...।

हम भी उठे, और चल पड़े...।

केवल विदा करने वाले का मन भारी नहीं होता, विदा लेने वाले का मन भी भारी हो जाता है...। रास्ते में टाशी आंगचुक मिल गए थे...। उनसे विदाई ली...। फिर मिलेंगे, यह वायदा किया। गाड़ी चल पड़ी...। तेजी के साथ क्यागर गाँव का वह धवलाभ ध्वंसावशेष पीछे छूटता जा रहा था। काराकोरम की ऊँचाइयों पर कहीं रेशम मार्ग की छाप दिखाई दे रही थी। ऐसे ही सैकड़ों वर्षों से ये डेरा-पड़ाव लगते उखड़ते रहे होंगे...। लोग मिलते बिछुड़ते रहे होंगे...। अनगिनत कहानियाँ बनती रहीं होंगी...। बदलते नाम और छाँह की दीवार के इस गाँव ने अपने साथ कितने ही किस्से सहेज रखे होंगे...। और हमने करनल सिंह के साथ करनल पुलाव को भी जोड़ लिया, ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आवे...।

-राहुल मिश्र

(राजस्थान साहित्य अकादमी की मुखपत्रिका मधुमती, वर्ष- 65, अंक- 03, मार्च 2025 में प्रकाशित)