Friday, 30 July 2021

 

श्रीकृष्ण रास मंडल बरास्ता वक्त पाजेब-सा मेरे पैरों में बँध.....

किड़...र्र..र्र...र्र...किड़-किड़.. धम्म... हे प्रभु गिरिधर.. गोवर्धनधारी... अब राखो पत हमारी...हम आए सरन तिहारी... किड़-धम्म-धम्म... और वक्त पाजेब-सा मेरे पैरों में बँध, धड़कनों के संग सुर मिलाया करे..साज़ बजते ही साथी देखो यहाँ, रौनकें दिल में सबके बढ़ाया करे... के साथ ही हे मात तेरे चरणों में..आकाश झुका देंगे...आँसू न बहा माता, मोती न लुटा माता.. जैसे बोल बाँदा के उन तमाम बाशिंदों के लिए स्मृतियों की मधुर पूँजी बनकर आज भी संचित होंगे, जिन्होंने बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधिकाल में अपनी तरुणाई को देखा होगा। आज के तमाम युवाओं के लिए भी यादों में ये पंक्तियाँ होंगी, किंतु यहाँ सीमा-रेखा खींचकर बताना इसलिए आवश्यक हो गया, क्योंकि इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशक में आई ‘इंटरनेट क्रांति’ ने अचानक ही बहुत बड़ा बदलाव ला दिया था। और इस बड़े बदलाव ने सामूहिक मनोरंजन के केंद्रों को तेजी के साथ सिकोड़ दिया, चाहे बात सिनेमाघरों की हो, या फिर रंगमंचीय परंपराओं की हो..।

नगाड़े की धमक और ढोलक की थापों के बीच गूँजते ऐसे चौबोलों, कड़ों, दोहों, दौड़, लँगड़ी दौड़, लावनी और लँगड़ी लावनी जैसे छंद-विधानों और सुर-लय-तालों के साथ जुड़ी हुई हैं, बाँदा के ठठराही मोहल्ले के श्रीकृष्ण रास मंडल की स्मृतियाँ...। बाँदा नगर की धुर पुरानी आबादी के बीच स्थित वह ठठराही मोहल्ला, जिसके साथ छोटी बाजार की पहचान भी शामिल है..., चौक-बाजार या बड़ी बाजार के अस्तित्व में आने के बाद से ही..। वैसे तो ठठराही को ताँबे, पीतल, काँसे के पुराने बर्तनों का अस्पताल भी कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ साल-भर बर्तनों की ठक-ठक गूँजती ही रहती है, मगर वसंत पंचमी के आने के साथ ही इस मोहल्ले में कुछ ऐसी सांस्कृतिक हलचलें भी बढ़ने लगती हैं, जिनका संबंध श्रीकृष्ण रास मंडल से जुड़ता है। होलिकादहन के बाद आने वाली पंचमी से शुरू होने वाली रासलीला के लिए तैयारियाँ वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती हैं। इसमें एक तरफ कलाकार अपने अभिनय की तैयारी करते हैं, तो दूसरी तरफ रंग-रोगन करके रंगमंच को व्यवस्थित करने का क्रम चल निकलता है। वैसे तो रंगशाला ज्यादा पुरानी नहीं है। पुराने जमाने में मंचन के लिए सड़क में ही तखत बिछाकर और उनके ऊपर चाँदनी लगाकर मंच तैयार कर लिया जाता था। समय और स्थितियों के बदलाव के साथ, और लोगों के आकर्षण व लगाव के कारण ऊँचा और पक्का मंच अस्तित्व में आया, जिसे आज भी देखा जा सकता है। रंगशाला के दोनों तरफ से गुजरने वाले रास्तों के कारण यह अपनी स्वाभाविक भौगौलिक स्थिति के कारण ही थियेटर के बड़े परदे जैसा बन गया है। बाकी की कमी दूर तक चली जानी वाली चौड़ी सड़क के दोनों किनारों पर बने मकानों के चबूतरों ने पूरी कर दी है, जो दर्शकों के बैठने के लिए अच्छा और ऊँचा स्थान उपलब्ध करा देते हैं।

अगर अतीत में उतरकर देखें, तो साफ नज़र आता है कि होली की पंचमी के आने के साथ ही श्रीकृष्ण रास मंडल के ऊँचे मंच के निकट के मकानों के चबूतरों पर अस्थाई कब्जा कर लेने की होड़ चल पड़ती थी। घरों के मालिकान अपने-अपने घरों के छज्जों में बैठकर, तो दूर-दराज से आने वाले दर्शकगण मकानों के चबूतरों में बैठकर रासलीला का आनंद लिया करते थे। नजदीक की, और अच्छी वाली जगह की तलाश के लिए शायद पंचमी की सुबह का इंतजार भी नहीं किया जाता होगा, ऐसा भी कहा जा सकता है, क्योंकि अच्छी जगह के लिए बड़ी मारामारी होती थी, यहाँ तक कि कई बार झगड़े भी हो जाया करते थे। होली की पंचमी से दस दिनों तक चलने वाली रासलीला के लिए दर्शकों द्वारा तय की गई जगह, जिसे धुर बुंदेलखंडी में छेकी गई जगह कहा जा सकता है, पूरे के पूरे दस दिनों के लिए आरक्षित हो जाती थी। पूरे दिन चबूतरों पर बिछी रहने वाली फट्टियाँ और बोरे इस बात को बखूबी बता दिया करते थे, कि लोगों में रासलीला और स्वाँग देखने के लिए कितना आकर्षण होता था।

कमोबेश ऐसा ही आकर्षण स्थानीय कलाकारों के लिए भी होता था, जिन्हें रासमंडली में बतौर कलाकार काम करने का मौका मिल जाता था। लोकनाट्य विधाओं के प्रति आकर्षण रखने वालों के लिए श्रीकृष्ण रास मंडल का दस दिवसीय आयोजन किसी बड़े ‘इवेंट’ से कम नहीं होता था, और श्रीकृष्ण रास मंडल गीत-संगीत-अभिनय आदि में रुचि रखने वाले स्थानीय लोगों को एक अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम बन जाता था। इसी कारण जिस कलाकार को रास मंडली में अभिनय का मौका मिलता, वह गर्व से फूला नहीं समाता था। पुराने समय में महिला कलाकारों के लिए ऐसे मंच वर्जित होते थे, इस कारण महिला पात्रों का अभिनय भी पुरुष ही करते थे, और वह भी ऐसा जबरदस्त, कि सचमुच की महिलाएँ भी हार मान बैठें। इन कलाकारों की छाप लोगों के मन में ऐसी बैठती थी, कि मंच के बाहर भी उनकी अपनी एक पहचान बन जाती थी। दिमान हरदौल का अभिनय करने वाले रिछारिया जी, सरदार भगत सिंह और भक्त मोरध्वज का अभिनय करने वाले पन्नालाल स्वर्णकार, शालिग्राम गुप्त, फुल्ले महाराज और ग्याल महाराज जैसे नामचीन कलाकार भले ही आज इस दुनिया में न हों, लेकिन उनके अभिनय-कौशल को आज भी लोग याद करते हैं।

चैत्र मास की कृष्ण प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक चलने वाले होलिकोत्सव का रंग उतरते-उतरते कृष्ण पंचमी, यानि रंगपंचमी के आगमन के साथ ही बाँदा और इसके आसपास के गाँवों का उत्सवधर्मी समाज श्रीकृष्ण रास मंडल की लीलाओं को देखने के लिए तैयार हो जाता, साल-भर की लंबी प्रतीक्षा के बाद....। मगर बुंदेलखंड में रासलीला?.... श्रीकृष्ण की लीलाओं का मंचन....? यह तो रामलीलाओं की भूमि है.... चित्रकूट में कोल-भीलों के बीच दोना-पत्तलों में कंद-मूल-फल खाने वाले वनवासी श्रीराम की भूमि है... राजा के रूप में विराजमान ओरछा के अधिष्ठाता श्रीराम की भूमि है, गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस की पंक्तियों को रात-दिन गुनगुनाने वाली.. रग-रग में जोश भर देने वाले आल्हा के गवैयों की भूमि है... तब यहाँ कन्हैया जी अपनी लीलाओं के साथ कैसे आ गए? यह बड़ा प्रश्न श्रीकृष्ण रास मंडल का जिक्र होते ही अनेक लोगों के मन में उठ खड़ा होता होगा। प्रश्न भी स्वाभाविक ही है.. और उत्तर बुंदेलखंड की अपनी अनूठी पहचान में निहित है। समन्वय का भाव बुंदेलखंड के कण-कण में बसा है। अगर प्रभु श्रीराम चित्रकूट में, रामराजा ओरछा में विराजते हैं, तो ओरछा में ही दिमान हरदौल भी पूजे जाते हैं, लोकदेवता के रूप में..। गोंडों के आदिपुरुष ग्योंड़ी बाबा के प्रति जनआस्थाएँ भी देखी जाती हैं। चंदेलों-बुंदेलों के आराध्य शिव और शक्ति के प्रतीकों को, परमालों-प्रतिहारों की देवियों को लोग बड़ी आस्था के साथ पूजते हैं। बुंदेलखंड की सतत् संघर्षशील प्रवृत्ति के बीच लोकरक्षकों का वजन लोकरंजक से कुछ ज्यादा रहा, संभवतः इसी कारण प्रलयंकर शिव, शक्तिस्वरूपा चंद्रिका और महेश्वरीमाता, और दुष्टों के संहारक श्रीराम अपेक्षाकृत अधिक स्थान जनआस्थाओं में पा सके, बजाय लीलाधारी नटवरनागर कन्हैया जी के...। बुंदेलखंड की रामलीला बहुत प्रसिद्ध है, और उसमें भी राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद का प्रसंग तो दूर-दूर तक अपनी ख्याति रखता है, किंतु कृष्ण की लीलाएँ इस क्षेत्र की पहचान से नहीं जुड़ी हैं। इस कारण से भी श्रीकृष्ण रास मंडल का वैशिष्ट्य बढ़ जाता है, क्योंकि इस रंगमंच ने बुंदेलखंड की अनूठी समन्वय की प्रवृत्ति को पिछले दो-ढाई सौ वर्षों से जीवंत करके रखा है। इसी विशेषता के आधार पर यह भी कहा जा सकता है, कि समूचे बुंदेलखंड में श्रीकृष्ण की रासलीलाओं के मंचन का यह सबसे पहला, इकलौता और पुराना केंद्र होगा।

अगर मथुरा की रासलीला का बुंदेलखंडी संस्करण श्रीकृष्ण रास मंडल में होने वाली माखनचोरी, चंद्रखिलौना, कंसवध और नाग-नथैया जैसी लीलाओं में देखा जा सकता है, तो अलग-अलग कथानकों पर आधारित स्वाँग की परंपरा का विस्तार भी यहाँ देखने को मिलता है। कलगी और तुर्रा नाम के ख्यालबाजी के अखाड़ों से निकली स्वाँग की परंपरा हाथरस, वृंदावन और मथुरा में विशेष रूप से देखी जा सकती है। इसको विस्तार देने का काम हाथरस वाले पंडित नथाराम शर्मा गौड़ ने किया। वस्तुतः उनके आगमन के साथ ही नौटंकी के स्वाँगों का लिखित रूप तैयार होने लगा था, जिसने रंगमंचों को व्यवस्थित करने का बड़ा काम किया। गुरु-शिष्य के रूप में चलने वाली परंपरा में स्वाँग की पुस्तकों के आगमन के साथ ही संवादों को, संगीत की धुनों को तैयार करना सरल हो गया। हाथरस की स्वाँग की यह परंपरा श्रीकृष्ण रास मंडल में भी दिखाई देने लगी। इसमें बड़ी भूमिका गुरु-शिष्य परंपरा की भी रही है, जो आज भी कायम है। पंडित नथाराम शर्मा गौड़ द्वारा रचित स्वाँगों की तर्ज पर श्रीकृष्ण रास मंडल में भी स्वाँग लिखने और मंचन करने की शुरुआत हुई। इसमें सबसे बड़ा नाम फूलचंद्र गुप्त बताशेवाले का आता है। उन्होंने वभ्रुवाहन नामक स्वाँग लिखा था। फूलचंद्र गुप्त रास मंडली से भी जुड़े हुए थे, इस कारण उन्होंने स्थानीय दर्शकों की रुचि के अनुसार संवादों और भाषा को रखा, शायद इसी कारण वभ्रुवाहन स्वाँग को जनता के द्वारा बहुत पसंद किया जाता था। वभ्रुवाहन स्वाँग के साथ ही वीर अभिमन्यु, भक्त मोरध्वज और राजा हरदौल के स्वाँग भी बहुत प्रसिद्ध रहे हैं, जिनका मंचन हर साल किया जाता रहा है। इन स्वाँगों को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती थी। बुंदेलखंड की अपनी पहचान, बुंदेलखंडी लोकगायकी, जैसे- लमटेरा, फाग, दादरा, रसिया, कजरी, उमाह, कछियाई, राई आदि को दस दिवसीय रासलीला का प्रमुख आकर्षण कहा जा सकता है। बुंदेलखंड के लोकगायकों के लिए यह मंच बड़ा अवसर उपलब्ध कराता था। इस मंच के गायकों को दूसरे स्थानों में भी विशेष मान-प्रतिष्ठा मिलती थी।

वक्त पाजेब-सा मेरे पैरों में बँध, धड़कनों के संग सुर मिलाया करे.. लावनी की ये पंक्तियाँ श्रीकृष्ण रास मंडल के संदर्भ में एकदम खरी उतरती हैं, क्योंकि ठठराही मोहल्ले का यह साधारण-सा आयोजन समय और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाने में पीछे नहीं रहा है। समय के साथ आते बदलावों की हर हरारत को इसने अपने में उतारा है। श्रीकृष्ण की भक्ति-विषयक लीलाओं और दशावतार के मंचन के बाद मनोरंजन के लिए इसमें स्वाँगों के माध्यम से सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों-बुराइयों के प्रति लोगों को सचेत करने का काम बखूबी होता रहा। इतना ही नहीं, देश की आजादी के आंदोलन के दौरान, और उसके बाद भी श्रीकृष्ण रास मंडल अपनी रंगमंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से समय और समाज के साथ निरंतर जुड़ा रहा है। आजादी के आंदोलन में पारसी रंगमंचों की बड़ी भूमिका रही है। अंग्रेजों के कोप से बचने के लिए रंगमंच में इस तरह से प्रस्तुतियाँ दी जाती थीं, कि क्रांतिकारियों का संदेश लोगों तक पहुँच भी जाए, और अंग्रेजों की पकड़ में भी न आए। कमोबेश ऐसा ही दायित्व उस कालखंड में श्रीकृष्ण रास मंडल ने भी निभाया। पौराणिक पात्रों के साथ ही राजा हरदौल और भक्त मोरध्वज जैसे स्वाँगों के मंचन में देश की आजादी के आंदोलन के साथ जुड़ने के संदेश निहित होते थे। देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारियों के जीवन का मंचन करके लोगों के मन में पहले आजादी की अलख जगाने, और आजादी के बाद इन क्रांतिवीरों की स्मृतियों को जीवंत रखने में भी रास मंडल की बड़ी भूमिका रही है। रासलीलाओं के क्रम में आने वाले शहीद भगत सिंह नाटक में सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त आदि क्रांतिकारियों के जीवन को उतारा जाता था। इतना ही नहीं, दुर्गा भाभी जैसी वीरांगनाओं को भी इन नाटकों में दिखाया जाता था। सरदार भगत सिंह का स्वाँग भी बहुत प्रसिद्ध रहा है, और इसे देखने के लिए भी भारी भीड़ इकट्ठी हुआ करती थी। अगर रंगपंचमी से दस दिनों के भीतर 23 मार्च आ जाता था, तो सरदार भगत सिंह का मंचन 23 मार्च, अर्थात् सरदार भगत सिंह के बलिदान दिवस पर ही होता था। यह क्रम आज भी अनवरत जारी है।

बाँदा के इस अनूठे रंगमंच के नामचीन कलाकार कस्सी गुरु की मृत्यु नब्बे वर्ष की आयु में हुई थी, उनकी मृत्यु को लगभग तीस वर्ष हो चुके हैं। कस्सी गुरु बताया करते थे, कि उनके बाबाजी ने रहस के मंचन को देखा था। अपने बाबा से प्रेरित होकर ही कस्सी गुरु रास मंडल से जुड़े थे। कस्सी गुरु के बताने के अनुसार पंचलैट के उजाले में बिना ध्वनि-विस्तारक यंत्रों की मदद के, अस्थायी मंच बनाकर जितने उत्साह के साथ दस दिनों तक रासलीलाओं का आयोजन होता था, वह निश्चित तौर पर आज के समय में कल्पनातीत है। नक्कारे की धमक भी ऐसी होती थी, कि बाँदा के आसपास के लगभग बीस-पचीस किलोमीटर के दायरे में आने वाले गाँवों के लोग इकट्ठे हो जाते थे। कभी-कभी सिर पर आ गए सूर्यदेव की परवाह किए बिना लोग डटे ही रहते थे, मानों पूरे स्वाँग को देखकर ही उठने का प्रण लेकर आए हों....कब रात गुजर गई, कब दिन चढ़ आया, इससे बेखबर...। कस्सी गुरु की बातों का सहारा लेकर अगर श्रीकृष्ण रास मंडल का काल-निर्धारण किया जाए, तो यह परंपरा सीधे तौर पर दौ सौ वर्षों से अधिक पुरानी नजर आती है।

वैसे ठठराही के ही प्रेम चच्चा, उर्फ बैरागी डॉक्टर उर्फ प्रेम श्रीवास्तव जी के पास भी इस रंगशाला से जुड़ी ढेरों स्मृतियाँ थीं। आज उनको दिवंगत हुए कई वर्ष गुजर गए हैं, किंतु उनकी मोहक वंशी की धुन को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अपने नाम के अनुरूप ही वे बैरागियों जैसा तंबा और बंडी पहनते थे। होम्योपैथी के अच्छे जानकार थे, साथ ही गीत-संगीत से विशेष लगाव रखते थे। यही एक कारण था, जो उनको श्रीकृष्ण रास मंडल से जोड़े हुए था। उनकी परंपरा को उनके बेटे प्रशांत ने आगे बढ़ाया है। वंशी, ढोलक, हारमोनियम आदि विभिन्न वाद्य-यंत्रों में पारंगत प्रशांत जी की श्रीकृष्ण रास मंडल में सक्रियता सुखद है, सुंदर है। आज पुरानी पीढ़ी के तमाम कलाकार या तो दिवंगत हो चुके हैं, या फिर शारीरिक रूप से अक्षम हो चले हैं। ऐसी स्थिति में उनके वंशजों ने दो सौ साल पुरानी इस परंपरा को जिलाए रखने का यत्न किया है, जो कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है, सराहनीय है।

श्रीकृष्ण रास मंडल के प्रमुख कर्ता-धर्ता श्री बसंतलाल जी सर्राफ एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने लंबे समय तक सभी को जोड़कर रखा है, और इसके लिए वे आज भी सक्रिय हैं, अपनी बढ़ती उम्र की विवशता के बाद भी...। किंतु उनकी वेदना आज के बदलते समय को लेकर है। सूचना और संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया है। लोगों के पास उपलब्ध दूसरे तमाम मनोरंजन के साधनों ने, दौड़ती-भागती जिंदगी ने श्रीकृष्ण रास मंडल की उस पुरानी हनक को ठेस पहुँचाई है, जिसके बूते इस रंगमंच ने समाज का मनोरंजन भी किया, समाज को नसीहतें भी बाँटीं और बुंदेली माटी की पहचान को जिलाए रखा। बसंतलाल जी के सुपुत्र विजय जी की पीढ़ी भी उसी सक्रियता के साथ परंपरा को निभाती जा रही है, किंतु तेजी से बदलते समाज और दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच सामूहिक रूप से बैठकर कुछ मनोरजंन कर लेने, अपनी सांस्कृतिक पहचान को दुहरा लेने और लोकजीवन का सहकार-सानिध्य पा लेने के अवसर घटते जा रहे हैं; या यूँ कहें, कि हम अपनी जिंदगी के जरूरी कामों की सूची से इन्हें हटाते जा रहे हैं। संभवतः इसी कारण बुंदेलखंड का यह अनूठा रंगमंच अपने लगभग दौ सौ वर्षों के गौरवपूर्ण अतीत को समेटकर अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को विवश हो गया है।

राहुल मिश्र

(दमोह की हटा नगरपालिका द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका-  बुंदेली दरसन- 2018 में प्रकाशित)

Thursday, 29 July 2021

कैसे हैं ये ‘पिंजरा तोड़’ वाले लोग....




कैसे हैं ये ‘पिंजरा तोड़’ वाले लोग....

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा मंजूर की गई एक जमानत की अर्जी के बाद से ही दिल्ली दंगों समेत पिंजरा तोड़ समूह फिर से चर्चा में आ गया है। हालाँकि ये चर्चा में रहें, ऐसी विशिष्टता न तो जमानत पर रिहा हुए पिंजरा तोड़ समूह के सदस्यों देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा की है, और न ही पिंजरा तोड़ समूह की...। फिर भी ‘पिंजरा तोड़’ उस मानसिकता को जानने-समझने के लिए बहुत जरूरी है, जिसे वृहत्तर भारतीय समाज की जड़ों पर लगने वाले दीमक की संज्ञा दी जा सकती है।

हिंदी सिनेमा के साथ ही हिंदी की गीत परंपरा के बहुत ही प्रसिद्ध गीतकार हुए हैं- रामचंद्र नारायण द्विवेदी, जिन्हें कवि प्रदीप के नाम से जाना जाता है। कवि प्रदीप का एक बहुत चर्चित गीत है- पिंजरे के पंछी रे..., तेरा दरद ना जाने कोय...। यह गाना नागमणि फिल्म का है। हालाँकि यह फिल्म देश की आजादी के दस वर्षों बाद, सन् 1957 में रिलीज हुई थी, लेकिन फिल्म का यह गाना देश की पराधीनता की स्थितियों को याद दिलाने के लिए बहुत उपयुक्त लगता है, गुलामी के बंधनों को खुलकर बताता है। इसका दूसरा पक्ष अध्यात्म का है, आध्यात्मिकता से जुड़ा है। भारतीय चिंतन-दर्शन परंपरा में भौतिक शरीर को पिंजरा माना जाता है। इसी से पिंजर या अस्थि-पंजर भी बना है। इसमें बसने वाली आत्मा पिंजरे का पंछी कही जाती है, जिसका ध्येय परमात्मा से मिलना होता है। इस तरह कवि प्रदीप का यह गाना दो अलग अर्थों और संदर्भों को रखता है। यहाँ कवि प्रदीप के ‘पिंजरे के पंछी रे...’ को बताने का उद्देश्य यही था, कि पिंजरा भारतीय समाज-जीवन में अलग और विशेष महत्त्व रखने वाला है।

इधर कुछ वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली की हवाओं में पिंजरे को तोड़ने की बातें तैरने लगी हैं। दिल्ली की ये हवाएँ देश के दूसरे बड़े शहरों में भी अपना असर दिखाने में पीछे नहीं रहीं हैं। समाज के कुछ वर्गों में यह ‘पिंजरा तोड़’ बहुत चर्चित रहा, और इसे समग्र भारतीय समाज की आवाज के तौर पर दिखाने की कोशिशें भी लगातार होती रहीं। जबकि सामान्यजन के लिए ‘पिंजरा तोड़’ एक अबूझ पहेली की तरह ही रहा; आखिर कौन-सा पिंजरा, और क्यों इस पिंजरे को तोड़ा जाना है....। वास्तविकता यह है, कि यह पिंजरा न तो देश की पराधीनता को व्याख्यायित करने वाला है, और न ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह पिंजरा ऐसा है, जो विशुद्ध उच्छृंखल और समाज को तोड़ने वाले विचारों से जुड़ा हुआ है।

वर्ष 2015 के अगस्त महीने में ‘पिंजरा तोड़ समूह’ दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में चर्चित हुआ था। उच्चशिक्षा केंद्रों में महिलाओं-छात्राओं को उत्पीड़न से बचाने और आपराधिक कृत्य करने वालों को शीघ्र दंडित किए जाने की माँग को लेकर जो आंदोलन खड़ा हुआ था, उसे कुछ राजनीति-प्रेरित तत्त्वों ने अपने कब्जे में ले लिया और इस आंदोलन का स्वरूप बदल गया। शिक्षण-संस्थानों की विसंगतियों को दूर करने के स्थान पर यह आंदोलन तथाकथित पितृसत्तात्मक व्यवस्था की खामियों को गिनाने लगा। इसे नाम भी इसी के अनुरूप दिया गया- पिंजरा तोड़..।

भारतीय सामाजिक संरचना कभी भी ऐसी नहीं रही, जहाँ महिलाएँ या समाज के अन्य वर्गों के लोग उपेक्षित रहे हों। सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है। भारतीय संविधान में भी यह व्यवस्था विद्यमान है। इन सबके बावजूद एक वर्ग ऐसा भी है, जो सदैव असंतुष्टि में जीता है। उसके लिए समाज की संरचना और सामाजिक व्यवस्था के अंग असहनीय होते हैं। ऐसे लोग समाज के सूत्रों-तंतुओं को तोड़कर अस्थिरता, अव्यवस्था और अराजकता का वातावरण बनाने के लिए अवसर तलाशते रहते हैं। ‘पिंजरा तोड़ समूह’ का गठन भी इसी को केंद्र में रखकर हुआ। ‘पिंजरा तोड़ समूह’ की गतिविधियाँ और विरोध के तरीके इस तरह के रहे हैं, कि उनको यहाँ पर लिखा जाना भी संभव नहीं। यह समूह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध का नाम ले-लेकर जिस तरह से महिलाओं-बालिकाओं के मन में जहर भरने का काम करता रहा है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। महिलाओं की स्वतंत्रता, उन्हें पुरुषों के समान अधिकार और ऐसे ही तमाम विषयों पर आंदोलन करते-करते अराजकता की सीमा के पार निकल जाने का अतीत भी इस समूह के साथ है। यहाँ यह भी कहना आवश्यक होगा, कि हमारे आसपास अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले लोगों में कुछ ऐसे भी हैं, जहाँ स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उन्हें अपने मन के कपड़े पहनकर बाहर निकलने की आजादी नहीं है, उनके लिए तो खुली हवा में साँस लेना भी प्रतिबंधित है...शिक्षा और रोजगार के लिए स्वतंत्र होना तो अलग और दूर की बात है। ऐसी बालिकाओं-स्त्रियों के लिए पिंजरा तोड़ने की बात यह समूह नहीं करता। इस समूह के लिए स्त्री-अधिकारों की बातें भी धर्म-जाति के अनुसार ही निर्धारित होती हैं।

कुछ समय पहले ‘पिंजरा तोड़ समूह’ की गतिविधियों को उस समय खाद-पानी मिला, जब दिल्ली में आजादी माँगने वाले लोग भी सक्रिय हो गए। अगर देखा जाए, तो दोनों का ध्येय एक ही है। एक तरफ पिंजरा तोड़कर आजाद होने की बात है, तो दूसरी तरफ सीधे आजादी माँगी जा रही है। अब यक्ष-प्रश्न तो यही है, कि आखिर आजादी किससे माँगी जा रही है, गुलाम किसने बनाया है और आजादी माँगने का प्रयोजन क्या है? अगर इन तीनों प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करेंगे, तो पूरे देश में तिलमिलाए हुए अलगाववादियों की खीझ आपको दिखाई देगी। वर्ष 2019 में जम्मू-काश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रांत बनाने के बाद तो यह खीझ अपने चरम पर पहुँच गई थी। इसके पहले कई ऐसे कानून, जो महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करते थे, जो आतंकी-देशविरोधी गतिविधियों को रोकने में बाधक बनते थे, उन सबको संशोधित करने के केंद्र सरकार के निर्णय ने कई आंदोलनजीवी तैयार कर दिए थे। जिन कानूनों से महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा मिले, उनकी वैवाहिक स्थिति अस्थिर होने के स्थान पर सबल हो और इसके माध्यम से समाज में अनाचार रुके, ऐसे कानूनों का संसद से पारित कराया जाना और उन्हें लागू कराया जाना भी कुछ लोगों को सहन नहीं हुआ। हमने ‘अवार्ड वापसी’ करने वाले तमाम लोगों के चरित्र को भी देखा, जिन्हें समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बड़ा सम्मान मिलता था। ऐसे लोग अपनी असलियत पर उतरकर समाज के हित के स्थान पर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करते दिखे।

इन तमाम गतिविधियों की पराकाष्ठा वर्ष 2019 में दिल्ली के शाहीन बाग में शुरू हुए ‘सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन’ में दिखी, जब नागरिकता संशोधन अधिनियम- 2019 और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन (एनआरसी) को लेकर इकट्ठी हुई भीड़ ने सारी दिल्ली की यातायात व्यवस्था को लचर और पंगु बना दिया। इतना ही नहीं, दिल्ली से चलकर यह अराजक आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैलने लगा। देश की अखंड़ता, एकता, सुरक्षा और पड़ोसी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यक होने के कारण दमनचक्र झेल रहे लोगों को भारत में नागरिकता दिये जाने के विरोध में विभिन्न संगठनों के साथ ही ‘पिंजरा तोड़ समूह’ भी शामिल रहा। हालाँकि इस समूह का कार्यक्षेत्र और गतिविधियाँ किसी भी दशा में शाहीन बाग के आंदोलन से संबंध नही रखती थीं।

दरअसल, देश के ऐसे राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन, जो आयातित-विदेशी विचारधाराओं पर भरोसा रखते हैं, उनको देश के शीर्षस्थ राजनीतिक पदों पर बैठे राष्ट्रवादी और देश के प्रति आस्थावान नेतृत्व की उपस्थिति ही सहन नहीं हो रही थी। देश की जनता की जागरूकता और राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की धारणा ने जिस नेतृत्व को देश का दायित्व सौंपा है, वह पूरी कार्यकुशलता के साथ, सक्रियता के साथ देश के हित के लिए, सीमाओं की सुरक्षा के लिए, आंतरिक सुरक्षा-व्यवस्था और निष्पक्ष नीतिगत निर्णय लेने के लिए कृतसंकल्पित होकर कार्य कर रही है। यही बात ‘आजादी बचाओ’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘पिंजरा तोड़’ आदि को सहन नहीं हो पा रही है। इसी कारण दिल्ली के नामचीन विश्वविद्यालय पिछले दो-तीन वर्षों से इस तरह की गतिविधियों के बड़े और शुरुआती अड्डों के रूप में पहचान बना चुके हैं।

    नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में फरवरी, 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के मामले में दिल्ली पुलिस ने आतंकरोधी कानून (यूएपीए) के तहत पिंजरा तोड़ समूह की सदस्य देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और एक युवक आसिफ इकबाल तन्हा को गिरफ्तार किया था। इन दंगों में अलग-अलग जगहों पर लगभग 53 लोगों की जान गई थी। पुलिस ने इस मामले में भड़काऊ और देश-विरोधी भाषण देने, दंगों के लिए लोगों को उकसाने सहित अन्य मामलों में इन तीनों आरोपियों के खिलाफ न केवल सुबूत इकट्ठे करने के बाद कार्यवाही की, वरन् लगभग 750 लोगों के बयान भी दर्ज किए। सीधी सी बात है, कि पुलिस के द्वारा जुटाए गए तमाम साक्ष्य अदालत तक पहुँचे और तीनों आरोपियों को अलग-अलग जमानत भी दे दी। हिल्ली हाईकोर्ट ने किन तथ्यों को आधार बनाकर जमानत की याचिका को स्वीकार किया, उसके अध्ययन के तुरंत बाद ही दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करके अपना पक्ष रखा।

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के लिए अपनाए गए दृष्टिकोण पर अपना पक्ष रखा, कि चार्जशीट में लिखे गए विस्तृत साक्ष्यों के स्थान पर सोशल मीडिया कथा को आधार बनाया गया है। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा, कि दिल्ली हाईकोर्ट ने जो निष्कर्ष दिए हैं, वे रिकार्ड और मामले की सुनवाई के दौरान की गई दलीलों के विपरीत हैं। दिल्ली पुलिस का यह भी कहना है, कि पूर्व कल्पित तरीके से मामले को निपटाते हुए आरोपियों को जमानत दी गई है। आरोपियों द्वारा किए गए कृत्य को हाईकोर्ट ने बहुत ही सरल और सामान्य-सा मामला मानकर निर्णय दिया है, जबकि तीनों आरोपी 53 लोगों की हत्या सहित देश की संवैधानिक व्यवस्था को बाधित करने के जघन्य अपराध में निरुद्ध किए गए हैं।

दिल्ली पुलिस की इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट के जमानत देने के निर्णय की पड़ताल की है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रथम स्तंभ के रूप में न्यायपालिकाओं पर भारत की जनता को हमेशा भरोसा रहा है। कई अवसरों पर न्यायालयों द्वारा देश के लोकतंत्र की, साथ ही देश की संवैधानिक मर्यादा की रक्षा की गई है। इस प्रकरण पर भी दिल्ली उच्चन्यायालय ने अपने दायित्व को निभाया, लेकिन दिल्ली पुलिस के तर्कों को भी झुठलाया नहीं जा सकता। कार्यपालिका के महत्त्वपूर्ण अंग और कानून-व्यवस्था के अनुपालन के लिए पुलिसबल की कार्यप्रणाली और उसकी विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में रखा जाना उचित नहीं।

कुल मिलाकर दिल्ली पुलिस की सक्रियता और तत्परता की वजह से ही आज अलगाववाद फैलाने वाले, भड़काऊ भाषण देकर अव्यवस्था उत्पन्न करने वाले कृत्यों पर रोक लग सकी है। दूसरी ओर ‘पिंजरा तोड़’ समूह की मानसिकता है। इसे कुछ लोगों के समूह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे संविधान द्वारा दी गई स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के अंग के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ‘पिंजरा तोड़’ समूह-मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐसी विषाक्त वैचारिकता है, जो परिवार से लगाकर समाज तक, देश से लगाकर संवैधानिक व्यवस्था तक हर किसी को कई-कई खंडों-हिस्सों में बाँटने के लिए काम करती है।

राहुल मिश्र

(सीमा जागरण मंच के मुखपत्र- सीमा संघोष के जुलाई, 2021 अंक में प्रकाशित)