Showing posts with label हिंदी साहित्य. Show all posts
Showing posts with label हिंदी साहित्य. Show all posts

Saturday, 5 September 2026

सन् 1952 का वो सपना, जो 2019 में साकार हुआ....

 





सन् 1952 का वो सपना, जो 2019 में साकार हुआ....


“या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।“

(डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जम्मू में अगस्त 1952 को दिए गए व्याख्यान का अंश)

सन् 1947 में देश के विभाजन की विभीषिका के साथ मिली काश्मीर समस्या किसी गहरे घाव की असह्य पीड़ा के सदृश हर सजग भारतवासी को वेदना देती है। भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पहली बार सन् 1952 में अपनी असह्य वेदना को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। यह प्रतिरोध और प्रतिकार उस नेतृत्व के प्रति भी था, जिसने इस समस्या की जड़ों को सींचा था। स्मरण कराना होगा कि भारतदेश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत राज्य काश्मीर को लेकर तत्कालीन नेतृत्व के पूर्वाग्रहों और अदूरदर्शिता ने ‘धरती के स्वर्ग’ को विवादों के घेरे में डाल दिया। 1962 में उत्तर पूर्वी सीमा पर ऐसी ही स्थितियों की पुनरावृत्ति हुई। हमारे नेतृत्व ने हमारी धरती को इस कारण उपयोग का नहीं समझा, क्योंकि वहाँ पर घास का एक तिनका भी नहीं उगता था। और संभवतः इसी कारण उसे ‘ड्रैगन’ की विस्तारवादी नीयत और पंचशील के दिवास्वप्न की भेंट चढ़ा दिया। पाक अधिकृत काश्मीर (पीओजेके) और चीन अधिकृत काश्मीर (सीओजेके) के ये दोनों ही क्षेत्र उस जम्मू-काश्मीर राज्य के अंग हैं, जिसके लिए धारा 370 के द्वारा विशेष व्यवस्था दी गई थी। इसे विशेष व्यवस्था कहें, या एक राज्य की विशेष तबाही की पटकथा...।

भारत की राजनीति के पुरोधा और दूरदर्शी राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना था, कि देश की स्वतंत्रता के समय हुई इस गलती को सुधारा जाए, काश्मीर को अपना अभिन्न अंग बनाकर भारतमाता के स्वरूप को पूर्ण किया जाए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस सपने के लिए जीवन जिया, और इस सपने को पूरा करने के लिए ही अपने प्राणों का उत्सर्ग भी किया था।

डॉ. मुखर्जी भारतीय राजनीति में अपनी मुखर वाणी के लिए जाने जाते हैं। डॉ. मुखर्जी को यह आभास था, कि भारत की एकता और अक्षुण्णता को स्थापित करने में यह विधान बाधक बनेगा। उन्होंने काश्मीर को लेकर एक नारा दिया था- नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान। संसद में भी उन्होंने धारा 370 को समाप्त करने के पक्ष में दृढ़ता के साथ अपनी बात रखी थी। बिना परमिट काश्मीर में प्रवेश करने के आरोप में 13 मई, 1953 को रावी पुल पर उन्हें बंदी बना लिया गया था। उस समय शेख अब्दुल्ला की सरकार थी। डॉ. मुखर्जी के साथ वैद्य गुरुदत्त, श्री टेकचंद, और पंडित प्रेमनाथ डोगरा को भी बंदी बनाया गया। 40 दिनों की असहनीय यातनाएँ सहते हुए 23 जून, 1953 को डॉ. मुखर्जी का देहांत हो गया। उनकी असामयिक मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।

डॉ. मुखर्जी की मृत्यु पर डॉ. मुखर्जी की माता योगमाया देवी ने कहा था, कि- मेरे पुत्र की मृत्यु भारतमाता के पुत्र की मृत्यु है। निःसंदेह डॉ. मुखर्जी भारतमाता के ऐसे सपूत थे, जिन्होंने विवशता में भारतमाता के एक विभाजन को भले ही स्वीकार कर लिया हो, लेकिन भविष्य में विभाजन की तैयार होती स्थितियाँ उन्हें स्वीकार नहीं थीं। एक देश के अंदर दो विधान चल रहे थे, दो निशान और दो प्रधान थे, जो डॉ. मुखर्जी के लिए असहनीय और पीड़ादायक थे। उन दिनों काश्मीर का मुखिया प्रधानमंत्री होता था। बिना परमिट के जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमा में कोई भारतीय प्रवेश नहीं कर सकता था। काश्मीर का झंडा भी अलग हुआ करता था। राज्य की कानून व्यवस्था भी भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता नहीं कहलाती थी।

एक बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है- काश्मीर : समस्या और समाधान। पुस्तक के लेखक हैं- जगमोहन। श्री जगमोहन लंबे समय तक जम्मू-काश्मीर के राज्यपाल रहे। उनके समय में काश्मीर की स्थितियाँ बहुत खराब थीं। अपनी पुस्तक में उन्होंने काश्मीर समस्या का विशद विवेचन किया है। इस पुस्तक के पृष्ठ 166 में वे लिखते हैं- “धारा 370 इस स्वर्ग रूपी राज्य में केवल शोषकों को समृद्ध करने का ही साधन है। यह गरीबों को लूटता है। यह मृगतृष्णा की तरह उन्हें भ्रम में डालता है। यह ‘सत्ताधारी कुलीनों’ की जेबें भरता है। नये ‘सुलतानों’ के अहम् को बढ़ाता है।......विघटन के विषाणुओं का प्रजनन करता है।..... एक भारत के विचार और काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के महान सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण की हत्या करता है।“

श्री जगमोहन ने धारा 370 को लागू किए जाने के कारणों, इसके प्राविधानों और इसके प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया है। काश्मीर समस्या को समझने के लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए। वस्तुतः धारा 370 और इसके विभिन्न पूरक अंग किसी राज्य को दिए गए विशेषाधिकार के बिंदु-मात्र नहीं हैं; ये भारत और भारतीयता की अस्मिता, एकता और अक्षुण्णता से सीधा संबंध रखते हैं।

सन् 1950 के बाद अनेक संशोधनों और आदेशों द्वारा अनेक संवैधानिक बदलाव जम्मू-काश्मीर राज्य पर लागू हुए। प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री में बदल गया और सदर-ए-रियासत राज्यपाल हो गया, लेकिन समवर्ती सूची और अवशिष्ट अधिकारों का बड़ा और महत्त्वपूर्ण भाग राज्य की अपनी व्यवस्था का अंग बना रहा। इसमें ‘रणबीर पैनल एक्ट’, दो ध्वज, दो प्रतीक और दोहरी नागरिकता (एक जम्मू-काश्मीर की, दूसरी भारत की) आदि के विशेषाधिकार आते हैं। भारत का कोई नागरिक जम्मू-काश्मीर में मतदान का अधिकार कभी नहीं पा सकता, कभी जमीन भी नहीं खरीद सकता। न्याय और औचित्य की दृष्टि से अनुचित यह व्यवस्था केंद्र-राज्य संबंधों के लिए ठीक नहीं थी।

दूसरी ओर इस विशेषाधिकार का लाभ राज्य के तीनों क्षेत्रों- जम्मू, काश्मीर और लद्दाख को समान रूप से मिल रहा हो, ऐसा भी नहीं था। लद्दाख और जम्मू के साथ भेदभाव के अनगिनत प्रसंग हैं। काश्मीर केंद्रित नीतियों ने जम्मू व लद्दाख के लोगों के मन में असंतोष भर दिया था। अस्सी के दशक में बड़गाम, पलवामा और कुपवाड़ा जनपदों के निर्माण, लद्दाख क्षेत्र में कारगिल जनपद के निर्माण और श्रीनगर क्षेत्र में बांदीपुर जनपद के निर्माण को लेकर चले बड़े आंदोलनों का संदर्भ यहाँ दिया जा सकता है। सेवानिवृत्त जस्टिस जे. एन. वजीर की अध्यक्षता में नियुक्त कमीशन की संस्तुति के आधार पर जम्मू क्षेत्र में भी तीन जिले- किस्तवाड़, सांबा और रियासी बनाए जाने थे, जिन्हें तब तक अटकाए रखा गया, जब तक जम्मू क्षेत्र से भीषण विरोध नहीं शुरु हो गया। इसी तरह दरबार आंदोलन, जो श्रीनगर को जम्मू-काश्मीर की स्थायी राजधानी बनाए जाने के विरोध में था, को जम्मू के लोगों के साथ हुए भेदभाव के रूप में लोग याद करते हैं। राज्य के बजट का बड़ा भाग काश्मीर में ही खर्च हो जाता था। जम्मू में परियोजनाएँ वर्षों तक अधूरी ही पड़ी रहती थीं।

लद्दाख के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लद्दाख के लोगों ने जब अनुभूत किया, तो वहाँ पर भी अनेक आंदोलन प्रारंभ हो गए। अस्सी के दशक में शांतिपूर्ण लद्दाख ने अशांति का ऐसा विकट समय देखा, जिसे इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। लद्दाखी समिति द्वारा अनेक अवसरों पर आरोप लगाए जाते रहे हैं, कि अनुच्छेद 370 के कारण हमारे साथ पक्षपात हो रहा है। सच्चाई तो यह थी, कि कहने के लिए अनेक परियोजनाएँ और वित्तीय सहायताएँ लद्दाख के लिए होती थीं, लेकिन धरातल पर वे उपलब्ध नहीं हो पाती थीं। अनेक परियोजनाएँ तो वर्षों तक चलती ही रहती थीं। वे पूरी हो भी पाएँगी, या नहीं .... ऐसा सोचने के लिए लोग विवश होते थे। जम्मू-काश्मीर मंत्रिमंडल में लद्दाख का प्रतिनिधित्व भी शून्य के बराबर ही होता था।

जम्मू-काश्मीर राज्य के तीनों क्षेत्रों को 370 के अंतर्गत मिलने वाले विशेषाधिकार का लाभ समान रूप से मिल रहा था, ऐसा नहीं कहा जा सकता। क्षेत्र-विशेष और उंगलियों पर गिने जा सकने वाले राजनीतिक-प्रशासनिक-व्यवसायी वर्ग विशेष तक ही राज्य के विशेषाधिकार के लाभ सिमटे हुए थे। दूसरी ओर शेष भारत के लिए इस विशेषाधिकार ने ऐसी सीमा रेखा खींच दी थी, कि कश्यप ऋषि का यह क्षेत्र; मुक्तापीड, ललितादित्य प्रभृति वीर शासकों की कर्मभूमि; संस्कृत के विद्वान आचार्यों- अभिनवगुप्त, क्षेमेंद्र, मम्मट आदि की धरती; महायान परंपरा की उर्वर भूमि; वैष्णवी देवी का तीर्थक्षेत्र अपना होकर भी पराया-सा ही बना रहा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस विशेषाधिकार ने भारत की छवि को धूमिल किया। समय बीतने के साथ यह विशेषाधिकार अराजकता के साथ ही आतंकवाद के पोषण के लिए उर्वर भूमि तैयार करने लगा, परिणामस्वरूप विभीषक स्थितियाँ इस सुंदर-से प्रदेश को असुंदर बनाती रहीं। 26 अक्टूबर, 1947 को भारत में विलय के बाद से लगातार बिगड़ती स्थितियों के बीच भले ही कोई अपने मन को बहलाने के लिए इस विशेषाधिकार को अच्छा मान ले, लेकिन स्थितियाँ विपरीत ही रहीं हैं।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दूरदर्शिता ही थी, कि उन्होंने ऐसी स्थितियों का अनुमान पहले ही लगा लिया था। उनके द्वारा जिस स्वप्न को 1952 में देखा गया था, वह सन् 2019 में पूरा हुआ। 05 अगस्त, 2019 को भारत की संसद द्वारा जम्मू-काश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित राज्यों में बाँटकर वर्षों पुरानी विभेदकारी व्यवस्था का अंत कर दिया गया। केंद्रशासित प्रदेश के लिए लद्दाख के लोग बहुत लंबे समय से माँग करते रहे हैं। जम्मू-काश्मीर में प्रतिनिधित्व का अनुपात सन् 2019 के बाद सुधरा है। नए परिसीमन के साथ लोगों को अपने जनप्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता मिली है। एक विधान, एक निशान की व्यवस्था लागू होने के बाद सच्चे अर्थों में काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतदेश एक सूत्र में बँधा है। लोगों को उनके अधिकार मिले हैं। राज्य सूची के अनेक नियम और उपनियम जम्मू-काश्मीर में लागू हुए हैं। संपत्ति के अधिकारों में सुधार हुआ है। विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए अनेक परिवार विस्थापित जीवन जी रहे थे, जिन्हें अपने नागरिक अधिकार मिले हैं।

धारा 370 की समाप्ति ने आतंकवाद से पीड़ित काश्मीर की दशा को सुधारने का काम किया है। आज काश्मीर अनेक पर्यटकों की पहली पसंद बन रहा है। लोग बेधड़क काश्मीर जा सकते हैं। सरकारी परियोजनाएँ विकास के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। कश्यप ऋषि की भूमि आज आतंकवाद की पहचान से निकलकर विकास की परिभाषा लिख रही है।

भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष, क्रांतद्रष्टा, माँ भारती के अनन्य सेवक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्वप्न साकार हुआ है। जम्मू-काश्मीर के लोगों के लिए, लद्दाख के रहवासियों के लिए भारत का संविधान सुलभ हुआ है।

(मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म, लखनऊ के पौष-माघ संवत् 2081 तदनुसार जनवरी 2025 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र


अवधेश अवध में आता है...

 


अवधेश अवध में आता है...


घर में तपसी की तरह देख भरत का वेष ।

ब्राह्मण भूला अपनपौ-पुलकित हुआ विशेष ।।

बोला- “राजर्षि, सुनो जिसका तुम ध्यान रात- दिन करते हो ।

जिसके  दर्शन को  भरतलाल माला  पर  घड़ियाँ  गिनते हो ।।

पुष्पक  पर  वानर-मण्डल  में-जो  अपनी  छटा दिखाता है ।

लक्ष्मण सीता  के  सहित  वही  अवधेश  अवध  में  आता है।।

मधुर वचन यह विप्र के थे मधुरस की धार ।

मरते  विरही  में  हुआ-नव  जीवन-सञ्चार ।।

(राजतिलक, उत्तरकांड, राधेश्याम रामायण)

रामकथा में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वन से लौटने का प्रसंग बड़े महत्त्व का है। हर युग में, प्रत्येक काल में, विभिन्न कालखंडों में रची गई रामकथाओं में, वाल्मीकि रामायण से लगाकर आज के समय की रामकथाओं तक.... यहाँ तक कि गद्यात्मक-औपन्यासिक रामकथाओं तक में श्रीराम का अयोध्या आना न केवल वर्णित है, वरन् दिव्य और भव्य स्वरूप लिए हुए है। गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यंत रुचिकर और मार्मिक वर्णन इस प्रसंग को लेकर किया है। विभिन्न रामकथाओं में यह प्रसंग अपने-अपने तरीके से कवियों-भक्तकवियों द्वारा कहा गया है।

राधेश्याम कथावाचक द्वारा रचित राधेश्याम रामायण में यह प्रसंग अत्यंत रुचिकर हो उठा है। नेपाल के राजपरिवार से कथावाचस्पति की पदवी प्राप्त, कीर्तन कलानिधि, काव्यकलाभूषण, श्रीहरिकथा विशारद, कविरत्न राधेश्याम कथावाचक विरचित रामायण का आधुनिक काल में विशेष महत्त्व है। उनकी रामकथा तुलसी के मानस की लोकप्रियता और लोकव्याप्ति के स्तर पर भले न हो, किंतु आम जन तक अत्यंत सरल और सहज भाषा-शैली में पहुँचती है।

राधेश्याम कथावाचक ने श्रीराम के अयोध्या आगमन की कथा का अत्यंत रुचिकर वर्णन क्षेपक कथा के संयोजन के साथ किया है। तुलसी के मानस में यह प्रसंग नहीं आता है। राधेश्याम रामायण में प्रसंग आता है, कि अयोध्या पहुँचने के पहले श्रीराम का विमान, पुष्पक विमान चित्रकूट पहुँचता है। राधेश्याम रामायण के लङ्का कांड में रावण-वध की कथा आती है। रावण के वध के उपरांत श्रीराम लङ्का का राजपाट विभीषण को सौंपकर अयोध्या चलने को तैयार होते हैं। लेकिन श्रीराम के सहयोगी रहे वानर, भालू, रीछ आदि रामादल राम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। वे सब भी राम के साथ चलने के लिए अनुरोध करते हैं। हनुमान, विभीषण, सुग्रीव आदि राम के प्रेम में इतने विह्वल हो उठे थे, कि राम को एक क्षण के लिए भी छोड़ना नहीं चाहते थे। अंततः राम सभी को लेकर अयोध्या की ओर चल पड़ते हैं। राधेश्याम कथावाचक कहते हैं-

इस प्रकार निज जनों को लेकर अपने साथ ।

सुमिर गजानन गौरि शिव चले अवध रघुनाथ ।।

चित्रकूट के निकट जब पहुँचा पुष्पक-यान ।

तब  बोले  हनुमान  से  कृपासिन्धु  भगवान ।।

रहा एक दिन अवधि में पहुँचो अवध-प्रदेश ।

शीघ्र  परमप्रिय भरत को पहुँचाओ सन्देश ।।

जो  आज्ञा  कहकर  चले पवनतनय सानन्द ।।

वाल्मीकि मुनि से इधर भेंटे रघुकुलचन्द ।।

मुनि बोले जग को अभी मिला नहीं विश्राम ।

अभी हुआ  ही है कहाँ- रावण का वध राम?

माया का सागर चहुँ दिशि है-उसमें शरीर यह लङ्का है ।

बैठा  है  अहङ्कार रावण,  जो  बजा  रहा  निज डङ्का है ।।

घननाद स्वार्थ का है इसमें, आलस है कुम्भकरण भगवन् ।

वध करो कृपा शर से इनको तब हो भू-भारहरण भगवन् ।।

जन का जब इस भाँति हो पूर्ण सफल सब काज ।

तब  मेरे  मन  अवध में  करो  बैठकर राज ।।

यहाँ राधेश्याम कथावाचक लङ्का काण्ड की कथा को विराम देते हैं। मुनि वाल्मीकि रामायण के रचयिता हैं, रामकथा के आद्य प्रस्तोता हैं। राधेश्याम कथावाचक श्रीराम के आद्यकवि वाल्मीकि से मिलन के प्रसंग को सायास वर्णित करते हैं। श्रीअयोध्याजी में विराजमान श्रीराम का लोकरक्षक स्वरूप इस भेंट में उभरता है। यहाँ सरल-सहज भाव से राधेश्याम कथावाचक मन रूपी अयोध्या का वर्णन कर रहे हैं। मन रूपी अवध में विराजमान होने वाले राम माया के सागर के मध्य स्थापित इस शरीर रूपी लंका के अधिपति अहङ्कार रूपी रावण, स्वार्थ रूपी घननाद, आलस्य रूपी कुंभकर्ण का वध करके आने वाले हैं। मन रूपी अयोध्या में राम तभी विराजमान होते हैं, जब इन कायिक-वाचिक-मानसिक विकृतियों का शमन हो जाता है। आद्यकवि वाल्मीकि की मनोकामना भी तभी पूर्ण होती है, रामकथा का आशय भी तभी सिद्ध-सफल होता है।

दूसरी ओर भरत जी हैं। अयोध्या में विरक्त संन्यासी की तरह जीवन बिता रहे हैं। रामभक्त हनुमान उन्हें यह बताने के लिए जाते हैं, कि श्रीराम अवध में आ रहे हैं। भरत यहाँ आत्मा के सदृश उपस्थित हैं। जिस प्रकार आत्मा अपने परमात्मा से मिलन को व्याकुल रहती है, वैसी ही व्याकुलता में वियोगी-सा जीवन बिताते हुए भरतजी की आशा का घट भर आया है। वे कहते हैं-

योगी की भाँति-देह तजकर-आत्मा के तार मिलाने हैं ।

आराध्यदेव  के  चरणों  में-प्राणों  के  फूल  चढ़ाने हैं ।।

पर नहीं,  भूल है, यह पूजा—होगी उनको स्वीकार नहीं ।

तू तो रक्षक है अवधि तलक-तन पर तेरा अधिकार नहीं ।।

अतएव  पवन,  जल,  सूर्य,  चन्द्र, इन सबको साक्षी करता हूँ ।

प्रभु के चरणों की शपथ-सहित अन्तिम प्रण यह ही करता हूँ ।।

चौदह वर्षों की अवधि बिता-यदि नाथ अवध में आयेंगे—

तो  इस  शरीर  को  छोड़ प्राण उनके चरणों में जायेंगे ।।

भरतजी के वियोग की पराकाष्ठा पार हो रही है, क्योंकि श्रीराम की वनवास की अवधि पूरी हो चुकी है। उनके आगमन की प्रतीक्षा है। भरतलाल चित्रकूट में श्रीराम से यह कहकर आए थे, कि मैं अवधि भर के लिए अयोध्या का पालन करूँगा। श्रीराम ने भी- ‘पालहु अवध अवधि भर जाई...’ कहकर भरत को चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजपाट सँभालने के लिए कहा था। चित्रकूट दो भाइयों के प्रेम की पराकाष्ठा का साक्षी बना था। संभवतः इसी कारण लंका से लोट रहे श्रीराम को चित्रकूट आते ही भरतलाल का ध्यान हो आता है। भरतलाल की भावुकता, उनके प्रेम में पगे वचन, उनका त्याग, उनकी सहजता और चित्रकूट के परिवेश में हुई बड़ी पंचायत का स्मरण श्रीराम को हुआ होगा। बाबा तुलसी के मानस में प्रसंग आता है, कि जब श्रीराम लंका से समस्त रामादल के साथ चलते हैं, तो रास्ते में वे विभिन्न स्थानों का परिचय कराते हैं। कहाँ पर कौन-सी घटना घटित हुई, बताते चलते हैं। चित्रकूट में पहुँचते ही वे भावुक हो जाते हैं, और इसी कारण वे अपने प्रिय हनुमान को कहते हैं, कि अयोध्या जाकर संदेश दो। हमारे पहुँचने की सूचना भरतलाल जी को दे दो।

कथा का विस्तार होता है। कथा लोक से रस संचय करके शिष्ट साहित्य में आती है। लोक में कथा का आस्वाद काशी की रामलीला में मिलता है। काशी शिव की ही नगरी नहीं, राम की नगरी भी है। जिस तरह वाल्मीकि रामायण से लगाकर बाबा तुलसी के मानस और आज के समय की राधेश्याम रामायण में रामकथा के साथ शिव और पार्वती चलते हैं, कथा प्रस्तोता और श्रोता के रूप में उपस्थित रहते हैं, वैसे ही काशी में देखने को मिलता है। विश्वनाथ की नगरी में नाटी इमली की रामलीला होती है। यह लीला भरत मिलाप की लीला है। राम के वन से लौटने के बाद भरतलाल से मिलने का प्रसंग यहाँ आता है।

राधेश्याम कथावाचक अत्यंत रुचिकर वितान बुनते हैं। ब्राह्मण वेशधारी हनुमान भरतजी के समक्ष उपस्थित हैं, और बता रहे हैं कि जिसके वियोग में संन्यासी जैसा जीवन बिता रहे थे, वह अब आने ही वाला है। ब्राह्मण वेश में हनुमान की बात सुनकर भरतजी उनसे परिचय बताने को कहते हैं। हनुमान अपना परिचय छिपा नहीं पाते और दोनों अनन्य रामभक्तों का मेल आह्लादित कर देता है। भरतलाल जी से यह सूचना समूची अयोध्याधाम तक जाती है। उमंग-उल्लास समूचे परिवेश में व्याप्त हो जाता है। राधेश्याम कथावाचक लिखते हैं-

पाते  ही  यह   सूचना  आते हैं- ‘श्रीराम’ ।

अवधपुरी बननेलगी एक अलौकिक धाम ।।

+     +     +     +

राम-दरस  की  प्रजा  में  ऐसी  उठी उमङ्ग ।

छोड़ छोड़ गृह कार्य सब-चले भरत के सङ्ग ।।

अयोध्या नगरी में पुष्पक विमान उतरता है। श्रीराम समग्र रामादल के साथ उतरते हैं, अपनी मातृभूमि को प्रणाम करते हैं। अयोध्या नगरी का अपार जनसमुदाय अपने राम की अगवानी करने के लिए खड़ा है। भरतलाल भी उपस्थित हैं। भरतलाल की दशा का बड़ा मार्मिक वर्णन राधेश्याम कथावाचक करते हैं-

शत-शत कण्ठों से उसी समय रघुपति की जय-जयकार हुई ।

फिर  धीरे-धीरे-    ‘मेरे प्रभु’   -यह  मीठी-सी    झङ्कार  हुई ।।

उस अवध-तपस्वी की गति पर-उपमा सकुचाकर आती है ।

मानों  सागर  से  मिलने  को   गङ्गा  की   धारा   जाती  है ।।

जब  चित्रकूट  में  था मिलाप  तब   विजयी  थे  श्रीरघुराई ।

पर  यहाँ चरण  छूकर पहले-जय भरतलालजी ने पाई ।।

दोनों  के  रूप  साँवले थे, दोनों  के तन पर गाती थीं ।

चौदह वर्षों के यतियों की-एड़ी तक जटा सुहाती थीं ।।

जब  मिले  परस्पर  दोनों  ही  दोनों को दर्शक भूल गए ।

श्रीराम कौन? श्रीभरत कौन? यह चतुरानन तक भूल गए ।।

इस भ्रात-मिलन ने रंग बदला, जब अपने आप अयोध्या का ।

शारदा पुकार उठी तब- ‘यह है भरत-मिलाप अयोध्या का’ ।।

भरत-मिलाप के दो प्रसंग हैं। पहला भरत-मिलाप चित्रकूट में होता है, और दूसरा अयोध्या में...। श्रीराम अयोध्या आगमन के बाद सभी से मिलते हैं। माताओं से मिलते हैं, शत्रुघ्न से मिलते हैं, नगरवासियों से मिलते हैं, लेकिन भरत से मिलना अलग ही भाव रखता है। चित्रकूट में हुए भरत-मिलाप की पूर्णता अयोध्या के भरत-मिलाप से होती है। लोक के लिए यह प्रसंग अन्यतम है, विशिष्ट है। वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला में यह प्रसंग खेला जाता है, और वह भी एक विशिष्ट रंग से...ढंग से...।

वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला में भरत जिद पर अड़े हुए हैं। भरतजी चित्रकूट में भी जिद पर अड़े थे, किंतु विजय राम की हुई थी। यहाँ भरतजी की जिद पूरी होती है। भरत कहते हैं, कि यदि सूर्य के अस्त होने के पहले श्रीराम मुझसे मिलने नहीं आए, मेरे पास नहीं आए, तो मैं प्राण त्याग दूँगा। श्रीराम को भरतजी की इस जिद का पता है, किंतु सभी से मिलते-मिलते बहुत देर हो जाती है। सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो जाते हैं। मात्र कुछ क्षण ही सूर्यास्त में शेष रहते हैं, तभी श्रीराम को भरतजी की सुध आती है। वे दौड़ पड़ते हैं। भरतलाल श्रीराम को दौड़कर आते देखते हैं, तो वे भी दौड़ पड़ते हैं। जिस स्थान पर अस्त होते सूर्य की अंतिम रश्मियाँ गिर रही होती हैं, उसी स्थान पर भरत और राम आलिंगनबद्ध हो जाते हैं। उपस्थित जनसमुदाय श्रीराम और भरतलाल की जय-जयकार करता है। वाराणसी की नाटी इमली की इस रामलीला को देखने वाराणसी के महाराज पधारते हैं।

यह प्रसंग लोक की धरोहर है, जिसके निहित अर्थ लोक को जीवनीय शक्ति देते हैं। भाइयों के प्रेम की अद्भुत अनूठी गाथा से लोक को यह प्रसंग जोड़ता है। अध्यात्म का पक्ष भी इसमें निहित है। आत्मा भरतलाल के सदृश जब निर्लिप्त होकर, पूर्ण समर्पण भाव से परमात्मा से मिलने के लिए आतुर हो जाती है, तब परमात्मा स्वयं अंगीकार करते हैं। वह क्षण अनेक आशाओं के अस्त हो जाने का होता है, किंतु मन की सकारात्मक शक्ति के साथ जीवंत अंतिम रश्मि निराश नहीं होने देती, हताश नहीं होने देती।

अयोध्या नगरी में श्रीराम का आगमन मात्र भौतिक घटना नहीं रह जाती, एक युग की-एक काल की घटना-मात्र नहीं रह जाती। यह काल की परिधि को पार करती है। यह भौतिक-सांसारिक पक्ष से ऊपर उठकर आध्यात्मिक धरातल पर देखी जाती है, अनुभव की जाती है। इसी कारण विभिन्न रामकथाकारों ने, अनेक भक्त कवियों ने श्रीराम के अयोध्या आगमन का वर्णन किया है। अयोध्या में श्रीराम के आगमन का प्रसंग विभिन्न रामकथाओं में बड़ा स्थान रखता है। यदि इस प्रसंग की गहराई में उतरकर देखें, इस प्रसंग के अंतर्निहित तत्त्वों का विवेचन करें तो यह स्पष्ट होता है कि जब-जब श्री राम अहंकार रूपी रावण को मार करके, शरीर रूपी लंका में लगी हुई व्याधियों का शमन करके, स्वार्थ रूपी मेघनाथ को मारकर विजयश्री प्राप्त करके आते हैं, तब मन-मंदिर रुपी अयोध्या प्रसन्न हो जाती है, उल्लास से भर जाती है।

विभिन्न भक्तकवियों ने, रामकथा के गायको ने इस प्रसंग को गाया है। आज के संदर्भ में भी यह प्रसंग अपने महत्त्व को रेखांकित करता है, बताता है। आज देश-विदेश में श्रीराम के अयोध्या आगमन की चर्चा है। आज के समय में भी श्री राम के आगमन का जो प्रसंग है, वह इन्हीं अर्थों में जाकर जुड़ जाता है और आज की पीढ़ी को, हम सबको यह संदेश देता है कि एक परिवार के, एक समाज के, एक राष्ट्र के सूत्र जो बिखर गए थे, वे किस तरह से एक साथ जुड़ जाते हैं। राम भरत से मिलते हैं और भरत व राम इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि कोई भी यह नहीं पहचान पाता कि कौन राम हैं, कौन भरत हैं..।

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’

श्रीराम सबसे मिलते हैं, लेकिन राम का मिलना सामने वाले की भावना के अनुरूप है। उस समय जब श्रीराम अयोध्या आए होंगे, तब भी यही सत्य था, और आज भी यही सच है। अयोध्या में श्रीराम का आगमन भले ही कुछ लोगों के लिए आलोचना का विषय हो, लेकिन कल्पना करें... आज भी श्रीराम सबसे वैसे ही मिल रहे हैं जैसी उनकी भावना है। हमारे लिए, वृहत्तर भारतीय समाज के लिए, जो भारतभूमि के प्रति अपनी गहन आस्था रखता है, उसके लिए श्रीराम का अयोध्या आगमन सारे परिवार के एक हो जाने के लिए है। विश्व-बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ और साकार करने के लिए है। श्रीराम का आगमन मन के कलुष-कल्मष को धो रहा है, निर्विकार कर रहा है, निर्लिप्त कर रहा है, प्रेम के निर्झर को अविरल बना रहा है। ऐसी कामना को लेकर, इस भावना को लेकर लोक आज एक बार फिर श्रीराम के अयोध्या आगमन का उत्सव मना रहा है। सुंदर अयोध्या सज रही है। मन-मंदिर प्रफुल्लित है, आह्लादित है।

(हिंदी प्रचार प्रसार सोसायटी, अमृतसर के मुखपत्र बरोह के जुलाई 24-मार्च 25 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

Saturday, 22 August 2026

उठहु राम भंजहु भव चापा

 

उठहु राम भंजहु भव चापा


राजा जनक ने यत्नपूर्वक धनुष-यज्ञ का आयोजन किया है। धनुष-यज्ञ में अनेक देशों से राजा पधारे हैं, शूरवीर पधारे हैं। विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण भी धनुष-यज्ञ में गए हैं। राजा जनक के निर्देश पर उनको विधिवत् सुसज्जित आसन पर सम्मान के साथ बैठाया गया है। बात उस समय के बड़े-बड़े वीरों, महारथियों के बीच चल रही है। यह समस्त आयोजन भी उनके लिए ही है, कि कोई ऐसा सुयोग्य वीरश्रेष्ठ सीता के विवाह हेतु मिल सके। महाराजा सीरध्वज की चिंता गहरी है। राम तो संयोगवश पहुँचे हैं, इसी कारण शांत-संयत बैठे केवल देख रहे हैं। शिव के धनुष को उठाने के यत्न करते अनेक शूरवीर जब थककर चूर हो जाते हैं, हारा हुआ मान लेते हैं, तब राजा जनक का क्रोध सिर चढ़कर बोलने लगता है। क्या धरती वीरों से खाली हो गई है? यदि मुझे ऐसा पता होता, तो मैं अपनी बेटी सीता के विवाह के लिए ऐसी प्रतिज्ञा नहीं करता। शिव के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर, कोई वीर इसे हिला तक नहीं सका। यदि मैं प्रण त्यागता हूँ, तो संचित पुण्य नष्ट होता है... और न त्यागने पर पुत्री अविवाहित रह जाएगी। मिथिलापति सीरध्वज की विवशता क्रोध बनकर इस तरह प्रकट होती है, कि वे कह उठते हैं-

तजहु आस निज निज गृहँ जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ।।

लक्ष्मण को जनक की यह बात चुभ जाती है। राम का शांत-सौम्य व्यक्तित्व लक्ष्मण की उग्रता और प्रखर वाणी से उभरता है। लक्ष्मण स्वयं को रोक नहीं पाते। लक्ष्मण के लिए राम नरश्रेष्ठ हैं, वीरश्रेष्ठ हैं; और राम की उपस्थिति में धरती को वीरों से खाली कहा जाना लक्ष्मण के लिए असह्य हो जाता है। वे प्रतिकार में कह उठते हैं-

रघुबंसिन्ह  महुँ  जहँ  कोउ होई । तेहि समाज अस कहइ न कोई ।।

कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान   रघुकुलमनि   जानी ।।

राम और लक्ष्मण का मिथिला में आगमन सीधे सिद्धाश्रम से हुआ है, जहाँ कुछ ही दिन पहले उन्होंने ताड़का, मारीच, सुबाहु जैसे राक्षसों का वध करके वहाँ के साधु-संन्यासियों और सामान्य जन को भयमुक्त किया है। लक्ष्मण स्वयं को रोक नहीं पाते, और ललकार उठते हैं, श्रीराम से कहते हैं, कि यदि आप अनुमति प्रदान करें; तो मैं आपके प्रताप से, आपके बल से इसे छत्रक दंड (कुकुरमुत्ते) की तरह तोड़ डालूँ। अगर अपनी इस शपथ को पूरा न कर सकूँगा, तो पुनः धनुष पर हाथ नहीं रखूँगा। लक्ष्मण की ऐसी बातों से सभा में मानों भूचाल आ गया। राम ने लक्ष्मण को शांत होकर बैठने के लिए इंगित किया। लक्ष्मण को अपने निकट बैठाया। अब तक गुरु विश्वामित्र सबकुछ देख रहे थे। गुरु विश्वामित्र को अपने शिष्यों पर पूरा भरोसा था, और संभवतः जनक की बातें उनको भी अच्छी नहीं लगीं थीं। वे राम को निर्देश देते हैं-

उठहु राम भंजहु भव चापा । मेटहु तात जनक परितापा ।।

धनुष-यज्ञ के पूरे प्रसंग में अब तक गुरु विश्वामित्र भी शांत-संयत बैठे थे। उन्होंने रावण और बाणासुर जैसे राजाओं को बहाना बनाकर जाते हुए और स्वयं को वीर और बलशाली मानने वाले क्षत्रपों-वीरों को अजगव उठाने का असफल प्रयास करते देखा... राजा जनक को क्रोध में भरकर न जाने क्या-क्या कहते सुना, और लक्ष्मण को राजा जनक की बातों के प्रतिकार में अपना विरोध प्रकट करते देखा। गुरु विश्वामित्र के लिए यह उचित समय था, जब वे राम को धनुष उठाने के लिए नहीं, वरन् भंजन करने के लिए कहते....। गुरु विश्वामित्र का यह निर्देश सामान्य नहीं था। सीता के विवाह का प्रयोजन-मात्र इस निर्देश में नहीं था।

भव शिव को भी कहते हैं, और संसार को भी....। भव चाप का भंजन... शिव के धनुष का, पिनाक का भंजन नहीं, वरन् संसार के क्लेशों-दुःखों का भंजन भी है। जनक का परिताप पुत्री सीता के विवाह-मात्र से शांत होने वाला नहीं है। सीरध्वज जनक मिथिला के जनकों की परंपरा में आते हैं। उनके समय में जिस तरह की स्थितियाँ बनी हुईं थीं, उनमें सीरध्वज जनक का परिताप जनकनंदिनी के लिए एक वीर नरश्रेष्ठ वर की खोज के पूरे न हो पाने के कारण उपजा था। वीरों की कोई कमी नहीं थी। बाबा तुलसी लिखते हैं, कि सीता-स्वयंवर के लिए असुर भी रूप धरकर आए थे। कुटिल और क्रूर-आततायी राजागण भी बड़ी अभिलाषा लेकर पहुँचे थे। इनमें से कोई भी शिव के धनुष को हिला तक नहीं सका। जब एकाकी प्रयास विफल हो गए, तो हजार की संख्या में एकत्र होकर राजागण धनुष को उठाने का प्रयत्न करते हैं, और श्रीहत होकर अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। राजा जनक का परिताप बड़ा विकट है। वे कहते हैं-

दीप दीप के भूपति नाना । आए सुनि हम जो पनु ठाना ।।

देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर  आए रनधीरा ।।

कुँअरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय ।।

पावनिहार  बिरंचि  जनु  रचेउ   न   धनु   दमनीय ।।251।।

हमारे प्रण को, हमारी प्रतिज्ञा को जानकर अनेक द्वीपों (देशों) के अनेक राजा मिथिला में पधारे। देवता और राक्षस भी मनुष्य का शरीर धरकर आए। शिव के धनुष को उठाने पर कुँअरि मनोहर, बड़ी विजय और सबसे प्रमुख बात... अति कमनीय कीर्ति प्राप्त होती, किंतु ऐसा लगता है, कि विधाता ने इन तीनों को प्राप्त करने लायक किसी को इस धरती पर नहीं बनाया है। कुछ ही दिन पहले सिद्धाश्रम में मारीचि, सुबाहु जैसे भीषण राक्षसों को मारने वाले, ताड़कावन में राक्षसी ताड़का का वध करके असीम जन समूह को भयमुक्त करने वाले दशरथनंदन राम भी तो इस धनुष-यज्ञ की सभा में विराजमान हैं। मिथिलापुरी की वाटिका में भ्रमण करते हुए जब सीता की सखियों ने दोनों राजकुमारों को देखा था, तब मन ही मन अनेक संभावनाओं के, कल्पनाओं के महल गढ़ लिए थे।

रामकथा के पुष्पवाटिका प्रसंग का लोक जीवन में अपना महत्त्व है। लोकरक्षक श्रीराम के प्रति जन-आस्थाएँ सिद्धाश्रम में उनकी कीर्ति को देखकर ऐसी दृढ़ हो जाती हैं, कि मानों जनसमूह का मानस ही उनके साथ मिथिलापुरी की ओर चल पड़ता है। जनकनंदिनी सीता अपनी आराध्य देवी पार्वती का पूजन करने गईं हैं। दशरथनंदन राम और लक्ष्मण को पुष्पवाटिका में देख लोक भविष्य की सुंदर संभावनाओं को सँजोता है। उन्हें मिथिलापति सीरध्वज और अयोध्यानरेश दशरथ के मध्य संबंध की एक कड़ी जुड़ती दिखती है, और लोक का जीवन अपने गीतों में गुनगुना उठता है-

 सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

के तुम जनक बुलाए आए, के तुम दसरथ पठाए आए, के तुम कलियाँ तोड़न आए

के तुम आए... अरे हाँ, के तुम आए सिया जू को ब्याहने, बाग मिथिलापुर में....

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

ना हम जनक बोलाए आए, ना हम दसरथ पठाए आए, ना हम कलियाँ तोड़न आए..

ना हम आए.... अरे हाँ..., ना हम आए.. सिया जू खाँ ब्याहने, बाग मिथिलापुर में....

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

बेला फूली फूल हजारी, चंपा फूली घनी पियारी..., देखन आए दौनों भाई...

कैसी सजने लगी है... अरे हाँ.... कैसी सजने लगी है फुलवार... बाग मिथिलापुर में...

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

बाबा तुलसी ने बड़ा मनोहारी प्रसंग मिथिलापुरी की वाटिका में देवी पूजन के लिए गई माता सीता और उपवन देखते हुए भ्रमण कर रहे राजकुमार युगल के आमने-सामने आने पर रचा है। सीता की एक दृष्टि नृपकिसोर पर पड़ती है, और मन को बाँध लेने वाले नृपकिशोर के दृष्टि से ओझल होने पर चिंता की लहर ही दौड़ जाती है। मृगशावक के चंचल नेत्रों जैसी चंचलता के साथ सीता चारों तरफ देखती हैं, और हर ओर जैसे कमल की पंक्तियाँ बरस जाती हैं। सखियाँ इस व्याकुलता को समझ जाती हैं, और लताओं की ओट में देखने के लिए इंगित करती हैं। साँवले और गौर वर्ण के किशोरों को देखकर आँखे जैसी अपनी निधि को पहचान गईं हों, चमक उठती हैं-  

चितवत चकित चहूँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनचीता ।।

जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी ।।

लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल  गौर  किसोर  सुहाए ।।

देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे   जनु   निज  निधि पहिचाने ।।

कुँअरि मनोहर सीता के लोचन जिस निज निधि को पहचानकर अपनी आराध्य देवी के समक्ष विनत भाव से प्रार्थना के लिए झुकते हैं, वह निधि केवल रूप-सौंदर्य में ही नहीं, वरन् शौर्य-पराक्रम में भी श्रेष्ठतम् है। यह सिद्ध करने का अवसर धनुष-यज्ञ में प्रत्यक्ष है। सीरध्वज जनक के परिताप को मेटने का सामर्थ्य श्रीराम में है। लक्ष्मण के वचन तीक्ष्ण हैं, लेकिन श्रीराम के पराक्रम और शौर्य के इस अपार जनसमुदाय के मध्य प्रदर्शन की एक पृष्ठभूमि बनाने के संदर्भ में अपना अलग महत्त्व रखते हैं। गुरुश्रेष्ठ विश्वामित्र का निर्देश पाकर श्रीराम अत्यंत सहज भाव से जाते हैं, और शिवधनु को उठाकर जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, धनुष टूट जाता है। राम उसे किनारे रखकर सहज भाव से वरमाला पहनने के लिए आगे बढ़ते हैं।

 मानस में प्रसंग आता है, कि श्रीराम ने जैसे ही धनुष तोड़ा और सीताजी के पाणिग्रहण का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, सभा में उपस्थित राजागण अपने असली रूप में आ गए और प्रलाप करने लगे। पिनाक के टूटते ही एक तरफ हर्ष की लहर दौड़ गई थी। अपार जनसमुदाय अपनी प्रसन्नता को जयकार, नृत्य, न्यौछावर, पुष्प वर्षा आदि के माध्यम से व्यक्त कर रहा था, तो दूसरी ओर आमंत्रित राजागण अपनी पराजय देखकर और किशोरवय श्रीराम के द्वारा धनुषभंग करके सीता के वरण को जानकर नियंत्रण खो बैठते हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं-

तब सिय देखि भूप अभिलाषे । कूर   कपूत   मूढ़   मन  माषे ।।

उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ।।

लेहु छड़ाइ सीय कह  कोऊ । धरि  बाँधहु  नृप बालक  दोऊ ।।

तोरें धनुषु  चाड़  नहिं  सरई । जीवत  हमहिं  कुअँरि को बरई ।।

जौं बिदेहु  कछु  करै सहाई ।  जीतहु  समर  सहित दोउ भाई ।।

साधु  भूप  बोले  सुनि बानी । राज   समाजहिं   लाज   लजानी ।।

सभा में उपस्थित राजाओं की नीयत और मानसिकता का बहुत स्पष्ट और सटीक चित्रण बाबा तुलसी ने किया है। राजागण सीताजी को पाने के लिए युद्ध करने को तैयार हैं। वे राम और लक्ष्मण को भी जीत करके बंदी बनाने को उद्यत होते हैं। सीता का अपहरण तक करने के लिए वे तैयार हो जाते हैं। मिथिलापति जनक सीरध्वज अत्यंत सज्जन स्वभाव के हैं, विदेह हैं। वे इतना ही कह पाते हैं, कि राजाओं के इस व्यवहार को देखकर तो लज्जा को भी लज्जा आ जाएगी। इसी समय भृगुसुत परशुराम का आगमन हो जाता है। उनके विकराल वेश को देखकर, उनके पराक्रम का स्मरण करके आतंक मचाने वाले राजागण स्तब्ध रह जाते हैं, और भय से व्याकुल होकर अपने पिता के नाम के साथ अपना परिचय देते हुए प्रणाम करते हैं। स्थितियाँ एकदम बदल जाती हैं, और परशुराम के साथ राम-लक्ष्मण का संवाद चलने लगता है।

वाल्मीकि रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं आता। वहाँ मिथिलापुरी में यज्ञ का आयोजन है। वाल्मीकीय रामायण की मिथिलापुरी वेदाध्ययन, धर्मपालन, शास्त्रार्थ, धार्मिक कर्मकांड आदि के लिए जगत्प्रसिद्ध है। इस कारण मिथिला में अध्ययनार्थ दूर-दूर से विद्यार्थी आते हैं। जनक सीरध्वज के संरक्षण में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप होते रहते हैं। इसी क्रम में एक विशाल यज्ञ का आयोजन हो रहा है, जिसमें गुरु विश्वामित्र के आश्रम के साधु-संन्यासियों के साथ राम और लक्ष्मण भी जाते हैं। गुरु विश्वामित्र के नेतृत्व में सिद्धाश्रम के साधु-संन्यासियों के मिथिलापुरी पहुँचने पर राजा जनक स्वागत-सत्कार करते हैं। दशरथनंदन राम और लक्ष्मण के प्रति जनक आस्थावान होते हैं, क्योंकि इनके पराक्रम से ही कुछ दिन पहले सिद्धाश्रम राक्षसों से मुक्त हुआ था।

विश्वामित्र के कहने पर राजा जनक शिव के धनुष को दर्शनार्थ मँगवाते हैं। उनके सेवकगण बहुत कठिनाई से उस विशाल मञ्जूषा को खींचकर लाते हैं, जिसके अंदर शिव का धनुष रखा था। सीरध्वज जनक बताते हैं, कि अनेक राजा इस धनुष को उठाने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन कोई भी उठा नहीं सका और शिव-धनुष को उठाने वाले के साथ पुत्री सीता के विवाह  की मेरी प्रतिज्ञा अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। राम शिव-धनुष को देखते हैं, और अनुमति पाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास जैसे ही करते हैं, धनुष टूट जाता है। सारी धरती में एकदम हलचल मच जाती है। इस अप्रत्याशित घटना के बाद जनक सँभलते हैं और कहते हैं-

भगवन्दृष्टवीर्यो मे रामो दशरात्मजः ।

अत्यद्भुतमचिन्त्यं च न तर्किमिदं मया ।। 

जनकानां कुले कीर्त्तिमाहरिष्यति मे सुता ।

सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरात्मजम् ।।

मम सत्वा प्रतिज्ञा च वीर्यशुल्केति कौशिक ।

सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता ।।

सीरध्वज जनक के लिए राम की वीरता आश्चर्य में डाल देने वाली है। जनक के लिए राम का कल्पनातीत पराक्रम आत्मसंतुष्टि देता है। सीता का राम के साथ विवाह जनकों के कुल में यश लाएगा। सीता का विवाह वीर, पराक्रमी और शौर्यवान वर से करने की राजा जनक की प्रतिज्ञा सफल होती है। वे अपनी प्राणों से प्रिय पुत्री सीता का विवाह राम से करने के लिए तैयार होते हैं। राजा दशरथ के पास संदेश भेजा जाता है। राम और सीता का विवाह संपन्न होता है।

मानस और रामायण के इस कथा-भेद को सामयिक संदर्भों के साथ यदि देखें, तो बाबा तुलसी का समय अपेक्षाकृत बड़ा विकट दिखाई देता है। म्लेच्छ आक्रांताओं के कारण समाज में जिस प्रकार की अराजकता फैल रही थी, उसका एक अंश धनुष-यज्ञ में राजाओं के व्यवहार से प्रदर्शित होता है। समाज की दिशाहीनता और राजधर्म की अनुपस्थिति ने विषमताओं के अनेक भवन उठा रखे थे, जहाँ अधर्म और कुकर्म का व्यापार होने लगा था। जनसमुदाय थक-हारकर, निराश होकर संतों-भक्तों की ओर देख रहा था, और ऐसे में बाबा तुलसी अपने आराध्य श्रीराम की भक्ति के साथ समाज को जीवनीय शक्ति देने हेतु भी कृत-संकल्पित थे। तुलसीदास जी की रामभक्ति निःसंदेह अनन्य है, किंतु वे सामयिक संदर्भों को छोड़ते नहीं हैं। धनुष-यज्ञ की कथा का वितान इन दोनों बिंदुओं को जोड़ते हुए बना है।

धनुष-यज्ञ के लिए राजा जनक के प्रण को जानकर ‘दीप दीप के भूपति नाना’ पधारे थे। इन सबके मध्य श्रीराम ने उस कार्य को कर दिखाया, जो किसी भी भूपति के लिए, या भू-पतियों के समूहों के लिए असंभव हो गया था। श्रीराम ने पिनाक का भंजन करके उस सभा में सीता का वरण-मात्र नहीं किया था, अपितु अनेक शोषित-संत्रस्त-दलित-पीड़ित जनों के संकटों-कष्टों का भंजन भी किया था। उस सभा से सारे विश्व में श्रीराम के पौरुष, पराक्रम, बल और शौर्य का जो यशःगान हुआ, वह अकल्पनीय और अतुलनीय था।

शिव-धनुष के भंग होते ही उपस्थित राजाओं के द्वारा उत्पन्न की गई अराजकता के मध्य परशुराम का आगमन भी बहुत महत्त्व रखता है। भृगुनंदन परशुराम के आराध्य शिव का धनुष तोड़ने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होगा। परशुराम ने समाज में शांति, सौहार्द और धर्माधारित व्यवस्था को स्थापित करने हेतु सहस्रबाहु का वध किया। अनैतिक कार्यों में लिप्त, निरंकुश और जनता के हितों के प्रति उदासीन रहने वाले शासकों-राजाओं से धरती को विहीन करके समाज को भयमुक्त किया। वृद्धावस्था के समय उनके लिए पुनः उस अतीत को दोहराना कितना कठिन होगा? शिव का धनुष किसी आततायी ने तो नहीं तोड़ा, जो पुनः अतीत की पुनरावृत्ति होने लगे? ऐसी चिंताओं को साथ लिए परशुराम का आगमन जब मिथिलापुरी में होता है, तब उनके क्रोध की कोई सीमा नहीं रहती। परशुराम का विकराल रूप देखकर अनर्गल प्रलाप कर रहे राजागण भयभीत हो जाते हैं और परशुराम को प्रणाम करने लगते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कवितावली में लिखते हैं-

काल   कराल   नृपालन  के,   धनुभंग   सुने  फरसा  लिए  धाए ।

लक्खन- राम बिलोकि सप्रेम, महारिसि तें फिरि आँखि दिखाए ।।

धीर-सिरोमनि,   बीर  बड़े,   बिनयी,   विजयी,   रघुनाथ  सुहाए ।

लायक  हे  भृगुनायक  सो धनुसायक सौंपि सुभाय सिधाए ।।22।।

परशुराम जब राम की वीरता, उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता, राम के शौर्य और पराक्रम से परिचित हो जाते हैं, तब वे वर-वधू को आशीष देते हैं। परशुराम आश्वस्त हो जाते हैं, कि शिव-धनुष तोड़ने वाला विनम्र, धीर-शिरोमणि और लायक है, उचित पात्र है। वे जाते समय अपना धनुष-बाण श्रीराम को सौंप देते हैं। यह राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद भी अपना विशेष महत्त्व और स्थान रखता है।

धनुष-भंग का यह समग्र प्रसंग लोकजीवन से जुड़ता है। रामलीलाओं के मंचन में धनुष-भंग की लीला का अपना विशेष महत्त्व है। धनुष-भंग के प्रथम अंश में सीता-स्वयंवर और द्वितीय अंश में परशुराम-संवाद या परशुरामी आती है। रामलीलाओं के मंचन की परंपरा भी बहुत पुरानी है। कानपुर की परशुरामी बहुत प्रसिद्ध रही है। आज भी लोगों में एक आकर्षण है। धनुष-भंग की लीला में सूत्रधार मंच पर आकर कहता है-   

यह धनुष-यज्ञ का आज दिन, और लीला हो इस ठौर..।

राजत राज समाज में, रामचंद्र सिरमौर....।

येऽऽ संवाद होयँ राजाओं केऽ...., रावण बाणासुर येऽ..

जनक लखैं... गरजैं, तरजैं, धनुष तोड़ देंऽऽ...।

येऽऽ अंत में लक्ष्मण जी का हो अंत में संवाद...।

बस करनी है लीला यही.. सुनो बंधुवर आज...।

सूत्रधार की यह पुकार आज भी जब गूँजती है, तो गाँव हों या कस्बे...., या फिर नगर ही क्यों न हों.... अच्छी-खासी भीड़ जुट जाती है। सूचना-संचार के अनेक साधनों के बीच भी रामलीला के विभिन्न प्रसंगों को रात-रातभर रुचि के साथ देखने वालों की कमी नहीं है। पर्व-त्योहारों में, मांगलिक कार्यों में, शुभ अवसरों पर राम और सीता के विवाह का प्रसंग लोकगीतों में रचा-बसा मिलता है। बुंदेलखंड के गाँवों में आज भी महिलाएँ बड़ी रुचि के साथ गाती हैं-

बने दूल्हा छवि देखो भगवान की, दुल्हन बनी सिया जानकी।

जैसे दूल्हा अवधबिहारी, तैसी दुल्हन जनक दुलारी, जाऊँ तन मन से बलिहारी।

मनसा पूरन भई सबके अरमान की। दुल्हन बनी...

ठाँड़े राजा जनक के द्वार, संग में चारउ राजकुमार, दर्शन करते सब नर-नार

धूम छायी है डंका निशान की। दुल्हन बनी...

गुरु विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम में जाने वाले अयोध्या के राजकुमारों की वीरता लोक के अनुराग का आश्रय है। श्रीराम का पराक्रम जन-आस्थाओं में पूजा जाता है। मिथिलापुरी में भरे समाज के मध्य अपने वीरोचित गुण से, अपने बल और अपनी सामर्थ्य से सभी को हतप्रभ कर देने वाले राजकुमार राम के प्रति लोक की आस्था ऐसी प्रगाढ़ है, कि वह हर वर में, हर दूल्हे में राम को देखती है, और हर वधू में सीता को...।

(त्रैमासिक जनमैत्री ई पत्रिका, मुंबई के वर्ष-4, अंक-3, कुलांक-12, दिनांक-15 अगस्त, 2025 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र