Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।


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