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Saturday, 23 May 2026

दीपो यत्नेन वार्यताम्

 


दीपो यत्नेन वार्यताम्


दीप-पर्व, दीपावली, दीपोत्सव.....। अर्थात् अंधकार से भरे जगत् को प्रकाश से भर देने का पर्व। अनेक प्रसंग, विविध कथाएँ इस दीपपर्व के साथ जुड़ी हुई हैं। लंका में रावण के संहार के उपरांत विभीषण को राजपाट सौंपकर श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और समस्त रामादल के लोग अयोध्या नगरी पधारते हैं। चौदह वर्षों से बाट जोह रहा अयोध्या का जन-समुदाय अपने राम के आगमन की प्रसन्नता में उत्सव मनाता है। हर ओर दीप प्रज्ज्वलित करता है। दीपावली का पर्व इसी भाव से लगातार मनाया जाता रहा है, आज भी श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता दीप की लौ में झलकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में नरकासुर नाम का राक्षस था। वह अन्यायी और अत्याचारी था। उसने राजाओं को पराजित किया, संतों को प्रताड़ित किया, और देवलोक का भी अपने आतंक से जीवन दूभर कर दिया। उसने राजाओं और सामान्य जनों की सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। नरकासुर को श्राप था, कि उसकी मृत्यु स्त्री के हाथों ही होगी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता लेनी पड़ी। माता सत्यभामा श्रीकृष्ण की सारथी बनीं और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। अगले दिन, अर्थात् कार्तिक अमावस्या को दीप प्रज्ज्वलित करके आततायी नरकासुर के वध और स्त्रियों की मुक्ति का पर्व मनाया जाता है। नरकासुर के वध के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चौदस भी कहते हैं।

दीपावली का पर्व धन-धान्य व समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी और गणेश जी के पूजन का भी होता है। समुद्र-मंथन की कथा का प्रसंग भी दीपावली से जुड़ा है। मंदार पर्वत को मथानी बनाकर, वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवों और दानवों ने सागर-मंथन किया था। भगवान विष्णु का कूर्मावतार भी इसी काल में हुआ था। कूर्म, अर्थात कच्छप के रूप में भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत को अपनी पीठ में धारण किया। अनवरत मंथन के उपरांत इसमें से धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी सहित विभिन्न रत्न प्रकट हुए, जिन्हें देवताओं और दानवों ने बाँट लिया। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धनवंतरि का जन्म भी सागर-मंथन से हुआ। इस तरह दीपावली के दो दिन पूर्व, अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस और धनवंतरि जयंती मनाते हैं। सागर-मंथन में अमृत और विष भी उत्पन्न हुए थे। अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में झगड़ा हुआ, जबकि विष को कोई भी लेने वाला नहीं था। अंततः विष को लोक के कल्याण के लिए भगवान शिव ने पी लिया। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण किया, और नीलकंठ कहलाए। कालंजर में नीलकंठेश्वर महादेव स्थापित हैं, जिनके कंठ से सदैव जल की बूँदे गिरती रहती हैं। मान्यता है, कि अपने कंठ में विष की जलन को शांत करने के लिए वे कालंजर गए थे।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, अर्थात् दीपावली के अगले दिन अन्नकूट का पर्व होता है। नई फसल का उत्सव प्रारंभ होता है। गोवर्धन की पूजा होती है। गौवंश को बढ़िया नहला-धुलाकर रंगों से सजाया जाता है। धन-धान्य की समृद्धि की कामना की जाती है। खीलें बताशे चढ़ाए जाते हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीय को भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। प्रजापति ब्रह्मा के अंश और यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान भी कार्तिक शुक्ल द्वादशी, अर्थात भाईदूज के पर्व पर होता है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की एकसाथ पूजा की जाती है। सौराष्ट्र के राजा सौदास की कथा इस पूजा के विधान से जुड़ी हुई है।

ऐसी प्रमुख कथाओं-प्रसंगों के अतिरिक्त लोक-परंपरा में अनेक कथाएँ, दंतकथाएँ दीपावली के पर्व को लेकर प्रचलित हैं। दीपावली का मुख्य पर्व तो कार्तिक अमावस्या को होता है, लेकिन इसके दो दिन पहले और दो दिन बाद तक दीपों को प्रज्ज्वलित करने का विधान है। इस तरह दीपावली पंचदिवसीय पर्व है। इसे पाँच विभिन्न पर्वों का संकलित पर्व भी कहा जा सकता है।

दीपपर्व, दीपोत्सव, दीपावली का मुख्य अंग दीपों का प्रज्ज्वलन है। दीप-प्रज्ज्वलन के साथ ही विभिन्न कथाओं, धर्मशास्त्रों में वर्णित अलग-अलग प्रसंगों में जो बात विशेष रूप से निकलकर सामने आती है, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। दीपावली का पर्व अन्याय और अत्याचार के अंत के साथ समाज में व्याप्त होने वाले उल्लास और उमंग का पर्व है। यह लोक-कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देने का पर्व भी है। भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप और भगवान विष्णु के कूर्मावतार सहित वासुकि नाग और मंदार पर्वत के त्याग को स्मरण करने का पर्व भी है।

दीपक भारतीय सनातन परंपरा का प्रमुख अंग है। दीप के प्रज्ज्वलन की क्रिया केवल प्रकाश का यत्न करने-मात्र तक सीमित नहीं है। यह लौकिक-पारलौकिक और भौतिक-अभौतिक जीवन के दर्शन का प्रमुख बिंदु भी है। दीप के संदर्भ में कहा गया है-     

सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा ।

अन्धकारे प्रवेष्टये दीपो यत्नेन वार्यताम् ।।

जिसका आधार सत्य का हो, जिसमें तप का तेल भरा हुआ हो, जिसमें दया रूपी बाती पड़ी हुई हो और प्रदीप्त लौ क्षमा के सदृश्य हो, ऐसे दीपक को यत्नपूर्वक जलाएँ, जब अंधकार बढ़ गया हो। इसी प्रकार शांति-पाठ में कहा जाता है-

ॐ असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय। ओम् शान्ति...।

हम असत्य से सत्य की ओर ले जाने के लिए, अंधाकर से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने के लिए प्रार्थना करते हैं, कामना करते हैं। यहाँ तमस जो है, वह अज्ञानता का प्रतीक भी है, अन्याय का संकेत भी करता है, जीवन के अनेक संकटों और कष्टों की ओर भी संकेत करता है। इन सबसे निकलना है, ज्योति की ओर जाना है, प्रकाश की ओर जाने की कामना है। अन्याय-अत्याचार, अज्ञानता, कष्ट-संकट, कलुष-कल्मष के अंधकार से मुक्ति की कामना है। दीप का प्रज्ज्वलन इसी भाव को दर्शाता है। दीप को प्रज्ज्वलित करते समय मंत्र पढ़ा जाता है-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धन सम्पदा ।

शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोऽस्तु ते ।।

हम दीपक जलाते हुए शुभ की कामना करते हैं, कल्याण की कामना करते हैं, आरोग्य और धन-संपदा की कामना भी करते हैं। इसके साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है- दीप-प्रज्ज्वलन के साथ शत्रु बुद्धि विनाश की कामना....। दीपावली के पर्व को देखें, तो यह कामना भी दिखाई पड़ती है। शत्रु बुद्धि विनाश के सुंदर प्रसंग रावण के संहार के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन के, श्रीकृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध के हैं। दीपावली स्वयं की सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही अन्याय-आतंक-अत्याचार से मुक्ति पाकर निर्भय होने व उमंग-उल्लास से परिपूर्ण होने का भाव भी भरती है।

सनातन भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण जीवन की भावभूमि पर मनाए जाते हैं। बदलते समय के अनुरूप पर्व-त्योहार परंपराओं के निर्वहन-मात्र तक सीमित न रह जाएँ, इस बात पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। विशेष रूप से विश्व के स्तर पर, देश के अंदर भी, और साथ ही अपने आस-पास बदलती स्थितियों को देखते हुए यह नितांत आवश्यक हो गया है, कि हमारे पर्व-त्योहारों के निहितार्थों को जाने-समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताएँ। दीपावली का पर्व वैसे तो अपने-अपने घरों में पूजा करने और बाद में पटाखे फोड़ने तक केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व के निहितार्थ को समझें, तो सामूहिकता की बड़ी भावना दिखाई देती है।

आज के समय में स्व-केंद्रित हमारा समाज सामूहिकता से दूर दिखता है। अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है, ऐसा भी प्रतीत होता है। लेकिन हमारे अन्य पर्व-त्योहारों की भाँति दीपावली का पर्व भी समूहबद्ध होने की ओर संकेत करता है। राम-रावण संग्राम में श्रीराम की विजय का कारण रामादल था। यह रामादल अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों का संगठित रूप था। नर, वानर, भालू, रीछ आदि अनेक वर्गों का समूह था, जो अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार के लिए समूहबद्ध हुए थे। रामादल ने विजय प्राप्त की, विजयादशमी का पर्व मनाया गया। यह रामादल जब अयोध्या पहुँचता है, तो स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, दीपोत्सव मनाया जाता है। समाज को संगठित करने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति भी हमारा दीपपर्व समर्पित हो, आज के समय में इस पक्ष को मन में बिठाने की आवश्यकता है।

आज के समय में जहाँ एक ओर अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ है, जीवन के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं, ऐसे जटिल समय में आतंकी, क्रूरकर्मा, अन्यायी, परपीड़क रावण को पहचानना आवश्यक है। रावण की मंडली को जानना आवश्यक है। राक्षस आज बदले रूप में प्रत्यक्ष हैं, हमारे सामने हैं। इनसे संघर्ष करने के लिए रामादल की भाँति संगठित होना आवश्यक है। यह समय की अनिवार्यता भी है, और आवश्यकता भी है। विजयादशमी का पर्व मनाना भी तभी सार्थक होगा, जब हम भेद को भुलाकर अपने समानधर्मा हर व्यक्ति को गले लगाएँ। रामादल भी तभी सशक्त-सबल होगा। दीपावली का पर्व मनाना भी आज के समय में तभी सार्थक होगा, जब अन्याय-अत्याचार-आतंक के विरुद्ध संगठित समूह-समाज के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, संगठित होंगे।

कालिमा के विरुद्ध संघर्ष, यत्नपूर्वक दीप प्रज्ज्वलित कर अंधकार को दूर करने के प्रयास आज के समय में बहुत आवश्यक हैं। अपने घरों में दीपकों को कतारबद्ध रखकर हम ऐसा ही प्रयास करते हैं। एक अकेला दीपक भले ही अपने प्रयास कर रहा हो, सार्थक प्रयास कर रहा हो, लेकिन समूह में आकर उसके प्रयास कई गुना अधिक लाभकारी और फलदायक हो जाते हैं। हम दीपपर्व पर दीपों की कड़ी बनाकर दीपमालिका नाम देते हैं। यह दीपमालिका केवल दीपों की माला बनकर न रह जाए, वरन् हम सबको प्रेरणा देने का माध्यम भी बन जाए, ऐसी कामना दीपपर्व पर हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। हिंदी के प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की बहुत प्रसिद्ध और चर्चित कविता है- यह दीप अकेला...। कविता की पंक्तियाँ हैं-

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

कविता लंबी है, लेकिन विषयगत संदर्भ हेतु संकेत कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही मिल जाता है। इसमें अज्ञेय सामूहिकता की बात करते हैं। व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का समाजहित में उपयोग किए जाने की ओर भी वे संकेत करते हैं। दीप को पंक्ति में देना, मिला लेना प्रतीक है- व्यक्ति को समूह में जोड़ने का...। दीप व्यक्ति के सदृश है। भारतीय वाङ्मय में मानव-जीवन को भी दीपक के रूप में दर्शाया गया है। अज्ञेय भारतीय चिंतन-दृष्टि के अच्छे जानकार हैं। अज्ञेय संभवतः इस कारण भी एकाकी मानव को अकेले दीपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समाज के लिए, मानवता के लिए वे दीप के गर्व को, मद को भुलाकर भी समूह में जोड़ लेने की बात कहते हैं।

दीपावली का पर्व पंक्ति में रखे दीपों की भाँति पंक्तिबद्ध हो जाने की प्रेरणा देता है। यह आज के समय की अनिवार्यता और आवश्यकता है। एक नीति-वचन कहा जाता है- संघे शक्ति कलियुगे। इस कलि-काल में, जहाँ मानवता के संहार के लिए बड़ी जमात तैयार खड़ी हो, अनवरत प्रयासरत हो...., तब संगठित होने की आवश्यकता बलवती होती है। भेदभाव भुलाकर संगठित होने की अनिवार्यता प्रकट होती है। दीपावली का पर्व सामूहिकता का पर्व बने, संगठित होकर कालिमा को दूर करने का पर्व बने, मानवता के हित के लिए, सनातन परंपरा व जीवन-पद्धति की रक्षा के निमित्त भेद-भाव भुलाकर दीपमालिका के सदृश एक सूत्र में बँध जाने का पर्व बने, तो दीपपर्व की अंतर्निहित मूल भावना का पोषण और पुष्पन-पल्लवन हो सकेगा।


Tuesday, 27 September 2016


लदाख का धार्मिक नृत्य- छम


हिमालय के उच्चतम शिखरों में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा अपनी अनूठी धार्मिक विशिष्टताओं और इन विशेषताओं के साथ मिलकर विकसित हुई अनूठी संस्कृति के कारण युगों-युगों से धर्मभीरुओं को, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। हिमालय में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का जीवित-जीवंत केंद्र लदाख है, जहाँ पर आज भी इस अनूठी संस्कृति की, इसकी धार्मिक व्यवस्था की झलक देखी जा सकती है। यह परंपरा जहाँ एक ओर भारत के गौरवपूर्ण अतीत को अपने में समेटे हुए है, वहीं दूसरी ओर तिब्बत से आने वाली सांस्कृतिक-धार्मिक व्यवस्था यहाँ पर जीवंत हो उठी है। लदाख अपने अतीत से ही देश-दुनिया के लिए जिज्ञासाओं के भंडार की तरह रहा है। देश-दुनिया में होते आधुनिकीकरण से बेखबर लदाख अंचल अपनी अनूठी धार्मिक व्यवस्था को, धार्मिक व्यवस्था में निहित विशेषताओं को बचाए रहा है। लदाख की सामाजिक व्यवस्था आज भी धार्मिक परंपराओं में बँधी हुई है और लदाख का समाज आज भी धर्मभीरु है। धर्म के प्रति आस्था और इस आस्था की दृढ़ता अपनी निरंतर गतिशीलता के साथ आज भी देश-दुनिया के पर्यटकों को, श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। लदाख में विभिन्न तिथियों में होने वाले धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों और पर्वों-त्योहारों की लंबी सूची है। महायान बौद्ध परंपरा के सिद्धांतों का भौतिक पक्ष इन अनुष्ठानों, पर्वों और त्योहारों में देखा जा सकता है। लदाख के गृहस्थ बौद्ध धर्मानुयायियों के दैनिक पूजा-कर्म के साथ ही बौद्ध मठों-मंदिरों, अर्थात् गोनपाओं में आयोजित होने वाले पूजा-अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व है। लदाख की गोनपाएँ यहाँ की धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतीक हैं। वैसे तो इन गोनपाओं में वर्ष-पर्यंत पूजा-अनुष्ठान होते रहते हैं, मगर वार्षिक अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व होता है। लदाख की कुछ प्राचीन और विशिष्ट गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के दौरान होने वाला धार्मिक नृत्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। इस नृत्य को छम कहा जाता है। यह धार्मिक नृत्य गोनपाओं के भिक्षुओं द्वारा किया जाता है और इसमें प्रशिक्षित भिक्षुगण विभिन्न प्रकार के मुखौटे लगाकर नृत्य करते हैं। इस कारण इस धार्मिक नृत्य को मुखौटा नृत्य भी कहा जाता है।
छम नृत्य मूल रूप से तांत्रिक अनुष्ठान के अंतर्गत होने वाला नृत्य होता है। यह तांत्रिक नृत्यानुष्ठान महायान बौद्ध परंपरा का विशिष्ट अंग है। महयान परंपरा में वर्णित धर्मरक्षकों, धर्मपालों, देव-देवियों, डाकिनियों और अन्य दैवीय स्वरूपों के प्रतीक के रूप में बने हुए मुखौटे और वस्त्र धारण करके इस विशिष्ट तांत्रिक नृत्यानुष्ठान को संपन्न किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि छम नृत्य की उत्पत्ति भगवान बुद्ध के समय उनके द्वारा ही हुई थी। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कर्नाटक में स्थित श्रीधान्यकटक नामक तीर्थक्षेत्र में भगवान बुद्ध ने महायान परंपरा के विनेयजनों को उपदेश दिया। अपने उपदेश में उन्होंने अनुत्तरयोग तंत्र भूमि-पूजा, जिसे त्सई-छो-ग कहा जाता है, के बारे में बताते हुए नृत्य करने की विधि बताई। यह नृत्य सामान्य नृत्य नहीं, वरन् शत्रु-नाश के लिए देव, डाकिनी, धर्मरक्षकों आदि के मुखौटे एवं वस्त्र धारण करके किया जाने वाला तांत्रिक नृत्यानुष्ठान था। भगवान बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेश के अनुरूप राजा इंद्रबोधि ने इस नृत्यानुष्ठान की विधि का प्रचार-प्रसार किया। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान आर्य नागार्जुन के कर्मक्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध कर्नाटक के नागार्जुनकोंडा नामक स्थान में हुए उत्खनन में नृत्य के लिए बने प्रांगण के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि तांत्रिक नृत्यानुष्ठान की, छम की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसी कालखंड में जैन परंपरा में भी धार्मिक नृत्यानुष्ठान की परंपरा प्रचलित हुई थी। जैन संन्यासी मंदिरों में रात-रातभर नृत्यानुष्ठान किया करते थे। जैन परंपरा में प्रचलित रासग्रंथों में वर्णित कथाओं का नृत्याभिनय जैन परंपरा में साधना-पद्धति के रूप में प्रचलित था। कमोबेश इसी प्रकार की परंपरा छम में देखी जा सकती है। अंतर केवल इतना ही है कि जैन मंदिरों में होने वाला रास तांत्रिकनृत्य नहीं होता, जबकि बौद्ध धर्म की महायान परंपरा में होने वाला छम तांत्रिक नृत्य होता है।
कर्नाटक के श्रीधान्यकटक और नागार्जुनकोंडा से चलकर छम नृत्य की परंपरा तिब्बत में विकसित हुई। नौवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में तिब्बत के शासक ठ्रिसङ्-दे-च़न के आमंत्रण पर आचार्य शांतिरक्षित भारत से तिब्बत गए और वहाँ पर महयान बौद्ध परंपरा का विस्तार करने हेतु एक बौद्ध विहार के निर्माण की शुरुआत की, मगर विहार के निर्माण में अनेक प्रकार की बाधाएँ पैदा होने लगीं। तब उन्होंने गुरु पद्मसंभव को आमंत्रित करने हेतु धर्मराज ठ्रिसङ्-दे-च़न से अनुरोध किया। गुरु पद्मसंभव तंत्रविद्या के प्रकांड विद्वान थे। गुरु पद्मसंभव ने आमंत्रण स्वीकार किया और तिब्बत में पहुँचकर दोर्जे-गुर-छम नामक तांत्रिक नृत्यानुष्ठान करके विहार के निर्माण में बाधक तत्त्वों को समाप्त किया। इस प्रकार तिब्बत में समये नामक बौद्ध विहार की स्थापना हुई, जो तिब्बत में छम नृत्य के विकास का पहला केंद्र बना। कालांतर में संस्कृत ग्रंथों के तिब्बती भाषा में हुए अनुवाद के माध्यम से तिब्बत में छम नृत्यानुष्ठान की विधियों का, इसकी बारीकियों और इसके प्रयोजन का अध्ययन सुलभ हुआ।
लदाख में तिब्बत से आने वाली महायान बौद्ध परंपरा के साथ ही छम या मुखौटा नृत्य की परंपरा प्रचलित हुई। ऐसी मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव का लदाख में आगमन हुआ था और उन्होंने वर्तमान करगिल जनपद के जङ्स्कर क्षेत्र में स्थित कनिका स्तूप के निकट तांत्रिक साधना की थी। संभव है कि उन्होंने इस स्थान की नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक नृत्यानुष्ठान भी किया हो। इस प्रकार लदाख की विभिन्न प्राचीन गोनपाओं में छम की परंपरा प्रचलित हुई। लदाख की सभी प्रमुख गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के समय भिक्षुओं द्वारा धर्मरक्षकों, धर्मपालों, रक्षकों, देव, डाकिनियों आदि के मुखौटे लगाकर, उनके हस्त-प्रतीकों को धारण करके छम नृत्यानुष्ठान करने की प्राचीन परंपरा देखने को मिलती है। छम नृत्य की विभिन्न मुद्राएँ धार्मिक कार्यों में बाधा पहुँचाने वाले शत्रुओं को, नकारात्मक शक्तियों का शमन करने की प्रक्रिया प्रदर्शित करती हैं। इनमें नकारात्मक शक्तियों को बाँधना, कुचलना, काटना आदि शामिल होता है। बौद्ध धर्म की महायान साधना परंपरा में चार प्रकार के संप्रदाय हैं। इन्हें सा-क्या, कर्ग्युद, ञिङमा और गेलुग के नाम से जाना जाता है। इन चारों संप्रदायों में सामान्य भिन्नताएँ होती हैं। लदाख में इन चारों संप्रदायों के विशिष्ट जनों द्वारा, रिनपोछे द्वारा छम का प्रारंभ किया गया। लदाख में प्रत्येक संप्रदाय से संबद्ध प्रमुख गोनपाओं में होने वाले छम नृत्यों में भी सामान्य विभेद होता है। यह भिन्नता मुखौटों, नृत्य के दौरान पद संचालन, नर्तकों के आगे-पीछे मुड़ने की विधि, पदचाल की संख्या और वाद्य यंत्रों के प्रयोग की विधियों में होता है। ये विभिन्नताएँ सामान्य दर्शकों को समझ में नहीं आ सकतीं।
लदाख की गोनपाओं में छम नृत्यानुष्ठान प्रायः कृष्णपक्ष की अठारहवीं से उनीसवीं तिथियों में या अठाईसवीं से उनतीसवीं तिथियों में आयोजित किए जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि जिस तरह कृष्णपक्ष में चंद्रमा की रोशनी क्रमशः घटती जाती है, उसी तरह छम के प्रभाव से नकारात्मक शक्तियों की, धर्मशासन को हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं की शक्ति भी क्रमशः घटती जाती है। लदाख में स्थित विभिन्न प्रमुख गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम की तिथियाँ अलग-अलग होती हैं, साथ ही छम में प्रदर्शित होने वाले दैवीय स्वरूपों में भी अंतर होता है। भोटी पंचांग के अनुसार पाँचवें माह की नवमी एवं दशमी तिथियों को हेमिस छेसचू के अवसर पर हेमिस गोनपा में छम का आयोजन होता है। हेमिस गोनपा में गुरु छ़नग्यद (अष्टगुरु पद्मसंभव) के साथ ही देव, डाकिनी और धर्मरक्षकों का नृत्यानुष्ठान होता है। भोटी पंचाङ के छठे मास की नवमी एवं दशमी तिथियों में डगथोग गोनपा में छेसचू या दशमी उत्सव के अवसर पर वज्रपाणि तथा गुरु छनग्यद का छम होता है। चेमड़े गोनपा में भोटी पंचाङ के नौवें माह की अट्ठाइसवीं एवं उनतीसवीं तिथि पर वङछोग अनुष्ठान के अवसर पर महाकाल एवं अन्य धर्मरक्षकों का छम होता है। इन्हीं तिथियों में डगथोग गोनपा में होने वाले वङ्छोग अनुष्ठान में वज्रकुमार, युमखोर लोग्यद दनमा, दस रौद्र और ल्हमो आदि का छम होता है। इस तरह लदाख की विभिन्न गोनपाओं में धर्मराज महाकाल के माता-पिता का छम, षड्भुज महाकाल, श्वेत महाकाल, वैश्रवण, हिरण और चमरी आदि का छम होता है। छम नृत्यानुष्ठान में पाई जाने वाली ये विविधताएँ अलग-अलग कथा-सूत्रों के माध्यम से श्रद्धालुओं की धर्मपिपासा को शांत करती हैं।
छम नृत्यानुष्ठान में मुखौटों का विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि मुखौटों के माध्यम से ही स्वरूपों का पता चलता है। छम में प्रयुक्त होने वाले मुखौटे लकड़ी या मिट्टी के बने होते हैं। मुखौटों के रंग और उनके आकार धर्मरक्षक, देव, डाकिनी और अन्य दैवीय स्वरूपों के अनुसार होते हैं। मुखौटे प्रायः नीले, पीले, सफेद और लाल रंग के होते हैं। धर्मरक्षकों के लिए कंकाल के आकार वाले मुखौटे और वस्त्र होते हैं। छम नृत्य करने वाले भिक्षुओं के लिए वस्त्र भी विशेष प्रकार के होते हैं। रेशमी छम-वस्त्रों को पङखेब कहा जाता है। छम नृत्य के दौरान तलवार, कपाल, त्रिशूल, कील और धनुष-बाण आदि भी धारण किए जाते हैं। छम के दौरान काली टोपी धारण करने वाले साधक के प्रतीक होते हैं, जो शत्रु-नाशक कपाल के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का विनाश करते हुए दिखते हैं। छम नृत्यानुष्ठाने के लिए संगीत-ध्वनियाँ भी विशिष्ट होती हैं और साथ ही वाद्य-यंत्र भी अलग होते हैं। छम नृत्य के लिए प्रयोग होने वाला रगदोङ ताँबे से बना लंबा-सा तुरहीनुमा वाद्ययंत्र होता है, जिसे दो या तीन हिस्सों में अलग किया जा सकता है। रगदोङ को बजाने के लिए विधिवत् शिक्षा लेनी पड़ती है और परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी पड़ती है। रगदोङ की छम नृत्य में मुख्य भूमिका होती है, क्योंकि इसकी धुन पर ही छम नृत्य का संचालन होता है। बुगजल बड़े आकार के मंजीरे या खतल के समान होता है। स्ङा बड़े आकार की गोलाकार लकड़ी का बना हुआ वाद्ययंत्र होता है और इसे एक लंबी धनुषाकार लकड़ी द्वारा बजाया जाता है।
छम नृत्यानुष्ठान गोनपा के विशाल प्रांगण में खुले आसमान के नीचे किया जाता है। यह प्रांगण प्रायः मुख्य मंदिर के सम्मुख होता है। छम नृत्य के दौरान प्रायः उन देवी-देवताओं या धर्मरक्षकों के थङ्का चित्र भी प्रदर्शित किए जाते हैं, जिनका छम होता है। खुले आसमान के नीचे होने वाले इस तांत्रिक अनुष्ठान में प्राकृतिक आपदाएँ, जैसे- बरसात, आँधी आदि न आएँ, इसके लिए भी पूजा की जाती है, तत्पश्चात छम का प्रारंभ होता है। गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम नृत्यानुष्ठान को देखने के लिए तमाम श्रद्धालुगण एकत्रित होते हैं। यह नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं, वरन् तांत्रिक अनुष्ठान के लिए होता है, इस कारण इसके दर्शन-मात्र से ही व्यक्ति की सारी विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं। छम नृत्य को देखना शुभ माना जाता है। इस कारण आस्थावान श्रद्धालु छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ के लिए उमड़ पड़ते हैं और खुले आसमान के नीचे श्रद्धाभाव से करबद्ध होकर अपने कल्याण की कामना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवों और धर्मरक्षकों के मुखौटों के दर्शन से ही जीवन में विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं और चित्त को असीमित शांति मिलती है।
लदाख अंचल की गोनपाओं में अलग-अलग तिथियों में आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान लदाख की धर्मभीरु जनता के लिए जीवन के संघर्षों को, जीवन की जटिलताओं और मुसीबतों को झेलने की ताकत देते हैं। छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ से उनकी आस्था की पुष्टि ही नहीं होती, वरन् उन्हें जीवन जीने की नई दिशा भी मिलती है। विश्व के कल्याण का भाव, सभी जीवों के कल्याण का बोध; सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और करुणा जैसे उदात्त गुणों का विकास भी होता है। संभवतः इसी कारण छम नृत्य के प्रति पर्यटकों की जिज्ञासा भी देखने को मिलती है और प्रतिवर्ष अनेक देशी-विदेशी पर्यटक छम नृत्यानुष्ठान का दर्शन करने के लिए लदाख की यात्रा करते हैं। भारत की पुरातन धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा के संरक्षित स्वरूप के साथ ही हिमालय अंचल की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के रूप में लदाख में प्रचलित छम नृत्य का अपना अतुलनीय स्थान है।  
कार्यकारी संपादक- नूतनवाग्धारा

       (दूरदर्शन केंद्र, लेह द्वारा वृत्तचित्र निर्माण एवं दिनांक 01 अप्रैल, 2016 को 1730 से 1800 बजे तक प्रसारित।) 

Tuesday, 15 September 2015

वर्तमान दौर में शिक्षा का महत्व

    
    वर्तमान दौर में शिक्षा का महत्त्व
पढ़ना लिखना सीखो,  ओ मेहनत करने वालो ।
पढ़ना लिखना सीखो, ओ भूख से मरने वालो ।।
क ख ग घ को  पहचानो
अलिफ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई  को  हथियार
बनाकर   लड़ना    सीखो
पढ़ो,  लिखा  है  दीवारों पर मेहनतकश का नारा ।
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा ।
पढ़ो,  अगर  अंधे विश्वासों  से  पाना है छुटकारा ।
पढ़ो,   किताबें  कहती  हैं- सारा  संसार  तुम्हारा ।।
जाने-माने रंगकर्मी सफ़दर हाशमी द्वारा रची गई इन पंक्तियों में शिक्षा के महत्त्व को बड़ी बेबाकी के साथ प्रकट किया गया है। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे मनुष्य की आंतरिक शक्ति प्रकट होती है। अगर व्यक्ति शिक्षित न हो, तो मनुष्य व पशु में अंतर नहीं रह जाता है। शिक्षा ही वह माध्यम है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। शिक्षा उस धूप-पानी-मिट्टी की तरह होती है, जो किसी बीज को उपयुक्त वातावरण देकर पेड़ के रूप में विकसित कर देती है। शिक्षा व्यक्ति के विकास का प्रमुख साधन होती है। शिक्षित व्यक्ति ही अपने देश, काल व समाज के विकास को वास्तविक गति प्रदान कर सकता है। इसीलिए किसी देश या समाज की प्रगति या सांस्कृतिक संपन्नता को देखना हो, तो उस देश या समाज के साक्षरता प्रतिशत को देखा जाता है। इसी कारण दुनिया के हरएक देश में शिक्षा को महत्त्व दिया जाता है। जिन देशों ने शिक्षा की जरूरत को महत्त्वपूर्ण मानकर शैक्षिक विकास के लिए काम किया है, वे देश आज विकसित देशों की श्रेणी में गिने जाते हैं। साक्षरता और शिक्षा की सीढ़ियाँ चढ़कर ही दुनिया के विकसित देशों ने विकास की चरम सीमा को प्राप्त किया है।
‘शिक्षा’ संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका सीधा और सरल अर्थ होता है- विद्या या ज्ञान ग्रहण करना। भारतवर्ष की प्राचीनतम शिक्षा पद्धतियाँ इसी अर्थ में संचालित होती रहीं हैं। पुराने समय में, जब आज के जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं थे, तब सामान्य लोग अपने अनुभवों के द्वारा या फिर वंशानुक्रम में, पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान अर्जित किया करते थे। आचार-विचार और व्यवहार का, रीति-रिवाजों का, खेती-किसानी-व्यापार आदि का और नीति-मर्यादा का ज्ञान इसी तरह लोगों को मिला करता था। उस समय अधिकांश लोगों को इसी प्रकार ज्ञान प्राप्त होता था। धर्म और अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अलग व्यवस्था होती थी। धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में आत्मज्ञान को पाने के लिए, शाश्वत शांति के लिए, मुक्ति के लिए और तत्त्व साक्षात्कार के लिए शिक्षा को माध्यम बताया गया है। बौद्ध धर्म में त्रिशिक्षाओं का वर्णन है। इसमें पहली अधिचित्त शिक्षा, अर्थात् संस्कृत बुद्धि में उच्चतर शिक्षा है। दूसरी अधिशील शिक्षा, अर्थात् आचार-विचार की शिक्षा है। तीसरी अधिप्रज्ञा शिक्षा, अर्थात् तप एवं स्वाध्याय द्वारा विद्या या ज्ञान के उच्चतम स्तर को पाने की शिक्षा है। अर्जित ज्ञान का उपयोग समय, स्थान और व्यक्ति के अनुसार स्वविवेक से करना ही सच्ची शिक्षा होती है। इस प्रकार जीवन की सभी परिस्थितियों में खरी उतरने वाली, लौकिक और पारलौकिक जगत को सफल-सार्थक बनाने वाली शिक्षा को ही उत्तम माना गया है।
पुरातन भारतीय परंपरा में जिस शिक्षा की बात की जाती थी, उसमें लौकिक और पारलौकिक जगत्, दोनों के कल्याण का अंश होता था। आज की शिक्षा का अर्थ केवल लौकिक जगत् तक ही सिमट गया है। आज की शिक्षा भौतिक सुखों और संसाधनों को उपलब्ध कराने से भी जुड़ी है। आधुनिककाल में शिक्षा के जिस अर्थ को व्यवहार में लाया जाता है, उसमें विद्यालयी शिक्षा ही होती है। भारत में आज की जैसी विद्यालयी शिक्षा की शुरुआत गुलामी के दौर में हुई थी। अंग्रेजों ने भारत की परंपरागत शिक्षा-व्यवस्था के खिलाफ आधुनिक शिक्षा-प्रणाली की शुरुआत की थी, जिसे मैकाले की शिक्षा-नीति के रूप में जाना जाता है। दूसरी ओर देश की आजादी के लिए लड़ रहे स्वाधीनता सेनानियों ने महसूस किया कि शिक्षा ही एकमात्र माध्यम है, जो देश की बहुसंख्य जनता को अंग्रेजों के खिलाफ तैयार कर सकती है। शिक्षित जनसमुदाय तक अपनी बात पहुँचाना आसान होगा। भारत को गुलामी से मुक्त कराने के लिए आजादी के आंदोलन की यह बड़ी जरूरत थी कि देश की अधिकांश जनता शिक्षित हो, ताकि अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी हो सके और अपने अधिकारों के लिए लड़ सके। इसके लिए सबसे पहली आवाज उठाने वाले स्वाधीनता सेनानी गोपालकृष्ण गोखले थे। गोपालकृष्ण गोखले ने सन् 1910 में सभी के लिए शिक्षा की माँग की थी। उनका विरोध भी हुआ था। बाद में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा गांधी और जाकिर हुसैन ने शिक्षा के विस्तार को अपने आंदोलन का हिस्सा बना लिया। राजा राममोहन राय ने महिलाओं की दशा सुधारने के लिए उन्हें शिक्षित करने का विधिवत् आंदोलन भी चला रखा था, जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए।
देश को आजादी मिली और आजाद भारत के समक्ष अन्य चुनौतियों के साथ ही सबसे बड़ी चुनौती विशाल जनसमुदाय को शिक्षित करने की भी थी। एक लोकतांत्रिक देश की सफलता उसके शिक्षित नागरिकों पर ही निर्भर करती है, क्योंकि अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों को जाने बिना लोकतांत्रिक देश के नागरिकों का जीवन गुलामों से बदतर हो जाता है। आज की जीवन शैली और बदलते वैश्विक परिदृश्य में तकनीकी, विज्ञान, सूचना-संचार, स्वास्थ्य शिक्षा और ऐसे ही ज्ञान के अनेक क्षेत्रों को जाने बिना जीवन गुजारना बहुत कठिन है। आज ग्लोबल विलेज की परिकल्पना से शहर ही नहीं, दूरदराज के गाँव और कस्बे भी प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए अनेक जानकारियों को प्राप्त करने और अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहने के लिए आधुनिक शिक्षा एक अनिवार्य जरूरत बन गई है। इसके साथ ही आज पर्यावरण संकट, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी समस्याएँ किसी एक व्यक्ति को नहीं, सभी को प्रभावित करने वाली वैश्विक समस्याएँ हैं। लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने, शिशु एवं मातृ मृत्युदर में कमी लाने हेतु जानकारी देने और जनसंख्या विस्फोट जैसी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए जनता को साक्षर करना, उन्हें शिक्षा के माध्यम से जागरूक करना आज के समय की बड़ी जरूरत है। इन समस्याओं को हल करने के लिए भी विज्ञान और तकनीक का ज्ञान होना जरूरी है, जिसे शिक्षा के बिना नहीं पाया जा सकता है। इस तरह आज के जीवन में भी शिक्षा ही मनुष्य की सबसे बड़ी सहयोगी है। शिक्षा के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने अधिकारों को जान सकता है। वह अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं से स्वयं को और अपने समाज को बचा सकता है, मुसीबत में पड़े लोगों को रास्ता दिखा सकता है। आधुनिक संदर्भ में साक्षरता को शिक्षा की पहली सीढ़ी माना जाता है, इसलिए शिक्षित होने से पहले साक्षर होना जरूरी है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वैश्विक स्तर पर यह जरूरत महसूस की गई कि व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक रूप से साक्षरता के महत्त्व का प्रचार-प्रसार किया जाए। इस कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 17 नवंबर, 1965 के दिन यह फैसला लिया कि हर वर्ष 08 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाए। सन् 1966 में दुनिया में पहला साक्षरता दिवस 08 सितंबर को मनाया गया और अब हर साल इस पर्व को मनाया जाता है। भारत के लिए इस पर्व का अपना विशेष महत्त्व है, क्योंकि भारत में आज भी साक्षरता दर संतोषजनक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के सूचकांक (2015) के अनुसार भारत में साक्षरता प्रतिशत अब भी 75 प्रतिशत के वैश्विक स्तर से नीचे है।
भारतीय संविधान के भाग-4, अनुच्छेद-45 में राज्यों को यह सुझाव दिया गया है कि वे 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करें। सन् 1966 में कोठारी आयोग ने भी इस सिफारिश पर जोर दिया, मगर इसमें बड़ा बदलाव सन् 1993 में उच्चतम न्यायालय के जस्टिस उन्नीकृष्णन द्वारा दिए गए फैसले के बाद आया। फैसले के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद-45 में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। सर्वशिक्षा अभियान और मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत इसी फैसले के अनुपालन में हुई। इस फैसले के कारण ही संविधान के 86वें संशोधन- 2002 में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में जीवन के अधिकार के साथ अनुच्छेद 21क के रूप में जोड़ा गया। शिक्षा का अधिकार कानून-2010 भी इसी फैसले का परिणाम है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने अपनी सिफारिशों में साक्षरता कार्यक्रमों और कंप्यूटर आधारित शिक्षा अभियानों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग की सिफारिशें की हैं। इन प्रयासों के कारण भारत में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है। 15वीं राष्ट्रीय जनगणना- 2011 के अनुसार देश की साक्षरता दर 64.83 से बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गई। इसमें महिलाओं की साक्षरता दर 65.86 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों की साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत है।
साक्षरता और शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण पक्ष महिलाओं का भी है। महात्मा गांधी का कहना था कि एक महिला को शिक्षित करने से एक परिवार शिक्षित हो जाता है। एक बच्चे की पहली पाठशाला उसकी माँ ही होती है और यदि माँ शिक्षित नहीं होगी, तो वह अपने बच्चे को आधुनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए किस प्रकार तैयार कर सकेगी? वह अपने बच्चे को आज की जरूरतों के मुताबिक गुणवत्तापरक शिक्षा के लिए किस प्रकार तैयार कर सकेगी? इन प्रश्नों के उत्तर महिला साक्षरता में ही मिल सकते हैं। इसके साथ ही महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के लिए, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने हेतु, महिला सशक्तिकरण हेतु महिलाओं का साक्षर होना अनिवार्य है।
साक्षरता और शिक्षा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष कौशल विकास का है। आज व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से युवाओं को हुनरमंद बनाने की जरूरत है, क्योंकि देश में शिक्षा के विकास का एक स्याह पहलू यह भी है कि ग्रेजुएशन और पोस्टग्रेजुएशन की उपाधियाँ लेकर भी कई युवक बेरोजगार हैं, जबकि देश और साथ ही दुनिया में कुशल प्रशिक्षित और हुनरमंद युवाओं की बड़ी माँग है। नेशनल सैंपल सर्वे के आँकड़ों के मुताबिक देश में सिर्फ 3.5 फीसदी युवा ही हुनरमंद हैं, जबकि चीन में 45 फीसदी, जापान में 80 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी युवा हुनरमंद हैं। सर्वे में बताया गया है कि सन् 2019 तक देश को 12 करोड़ हुनरमंद युवाओं की जरूरत होगी। दूसरी ओर दुनिया में भारत के तकनीकी प्रशिक्षित युवाओं की भी बड़ी माँग है। इसी को ध्यान में रखकर हाल ही में सरकार द्वारा ‘वर्ल्ड यूथ स्किल डे’ के अवसर पर ‘स्किल इंडिया मिशन’ की शुरुआत की गई है। इस अभियान के माध्यम से शिक्षा के साथ ही युवाओं को रोजगारपरक कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
अपने आधुनिक स्वरूप में शिक्षा का महत्त्व प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में है। शिक्षा मानव के विकास की पहली सीढ़ी है। अपने अधिकारों के लिए, अपने परिवेश के प्रति, अपने समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य है। पुरातन-परंपरागत शिक्षा का महत्त्व अपने स्थान पर अवश्य है, मगर आधुनिक जीवन शैली में, आज के समय की शिक्षा के माध्यम से स्वयं को तैयार करना समय की जरूरत है। इतना अवश्य है कि आज की शिक्षा-व्यवस्था में उन मानवीय मूल्यों, नैतिकताओं की आवश्यकता महसूस की जाती है, जिनके अभाव में शिक्षित समाज कई तरीके के विभेदों में, अनैतिक कार्यों में, अमर्यादित व्यवहारों में लिप्त हो जाता है। शिक्षा के साथ जुड़े इस प्रश्न का समाधान पुरातन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था और आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था के मध्य संतुलन बनाकर खोजा जा सकता है। वर्तमान में शिक्षा के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता, मगर शिक्षा के साथ नैतिकता और संस्कारों को जोड़कर उसके उच्च गुणवत्तापरक स्वरूप को सहज भाव से ग्रहण किया जा सकता है और यही आज के दौर की माँग है। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने शिक्षा के महत्त्व पर लिखा है कि-  
शिक्षा है सब काल कल्प-लतिका-सम न्यारी;
कामद, सरस, महान, सुधा-सिंचित अति प्यारी ।
शिक्षा है वह धारा, बहा जिस पर रस-सोता;
शिक्षा है वह कला, कलित जिससे जग होता ।।

                                                                डॉ. राहुल मिश्र



(आकाशवाणी, लेह से दिनांक 07 सितंबर, 2015 को प्रातः 0830 बजे प्रसारित)