सन् 1952 का वो सपना, जो 2019 में साकार हुआ....
“या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस
उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।“
(डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जम्मू में अगस्त 1952 को
दिए गए व्याख्यान का अंश)
सन् 1947 में देश के विभाजन की विभीषिका के साथ मिली
काश्मीर समस्या किसी गहरे घाव की असह्य पीड़ा के सदृश हर सजग भारतवासी को वेदना
देती है। भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पहली बार
सन् 1952 में अपनी असह्य वेदना को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। यह प्रतिरोध
और प्रतिकार उस नेतृत्व के प्रति भी था, जिसने इस समस्या की जड़ों को सींचा था।
स्मरण कराना होगा कि भारतदेश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत राज्य काश्मीर को लेकर
तत्कालीन नेतृत्व के पूर्वाग्रहों और अदूरदर्शिता ने ‘धरती के स्वर्ग’ को विवादों
के घेरे में डाल दिया। 1962 में उत्तर पूर्वी सीमा पर ऐसी ही स्थितियों की
पुनरावृत्ति हुई। हमारे नेतृत्व ने हमारी धरती को इस कारण उपयोग का नहीं समझा,
क्योंकि वहाँ पर घास का एक तिनका भी नहीं उगता था। और संभवतः इसी कारण उसे ‘ड्रैगन’
की विस्तारवादी नीयत और पंचशील के दिवास्वप्न की भेंट चढ़ा दिया। पाक अधिकृत
काश्मीर (पीओजेके) और चीन अधिकृत काश्मीर (सीओजेके) के ये दोनों ही क्षेत्र उस
जम्मू-काश्मीर राज्य के अंग हैं, जिसके लिए धारा 370 के द्वारा विशेष व्यवस्था दी
गई थी। इसे विशेष व्यवस्था कहें, या एक राज्य की विशेष तबाही की पटकथा...।
भारत की राजनीति के पुरोधा और दूरदर्शी राजनेता डॉ. श्यामा
प्रसाद मुखर्जी का सपना था, कि देश की स्वतंत्रता के समय हुई इस गलती को सुधारा
जाए, काश्मीर को अपना अभिन्न अंग बनाकर भारतमाता के स्वरूप को पूर्ण किया जाए। डॉ.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस सपने के लिए जीवन जिया, और इस सपने को पूरा करने के
लिए ही अपने प्राणों का उत्सर्ग भी किया था।
डॉ. मुखर्जी भारतीय राजनीति में अपनी मुखर वाणी के लिए जाने
जाते हैं। डॉ. मुखर्जी को यह आभास था, कि भारत की एकता और अक्षुण्णता को स्थापित
करने में यह विधान बाधक बनेगा। उन्होंने काश्मीर को लेकर एक नारा दिया था- नहीं
चलेगा एक देश में दो विधान, दो
प्रधान और दो निशान। संसद में भी उन्होंने धारा 370 को समाप्त करने के पक्ष में
दृढ़ता के साथ अपनी बात रखी थी। बिना परमिट काश्मीर में प्रवेश करने के आरोप में 13
मई, 1953 को रावी पुल पर उन्हें बंदी बना लिया गया था। उस समय शेख अब्दुल्ला की
सरकार थी। डॉ. मुखर्जी के साथ वैद्य गुरुदत्त, श्री टेकचंद, और पंडित प्रेमनाथ
डोगरा को भी बंदी बनाया गया। 40 दिनों की असहनीय यातनाएँ सहते हुए 23 जून, 1953 को
डॉ. मुखर्जी का देहांत हो गया। उनकी असामयिक मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।
डॉ. मुखर्जी की मृत्यु पर डॉ. मुखर्जी की माता योगमाया देवी
ने कहा था, कि- मेरे पुत्र की मृत्यु भारतमाता के पुत्र की मृत्यु है। निःसंदेह डॉ.
मुखर्जी भारतमाता के ऐसे सपूत थे, जिन्होंने विवशता में भारतमाता के एक विभाजन को
भले ही स्वीकार कर लिया हो, लेकिन भविष्य में विभाजन की तैयार होती स्थितियाँ
उन्हें स्वीकार नहीं थीं। एक देश के अंदर दो विधान चल रहे थे, दो निशान और दो
प्रधान थे, जो डॉ. मुखर्जी के लिए असहनीय और पीड़ादायक थे। उन दिनों काश्मीर का
मुखिया प्रधानमंत्री होता था। बिना परमिट के जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमा में कोई
भारतीय प्रवेश नहीं कर सकता था। काश्मीर का झंडा भी अलग हुआ करता था। राज्य की
कानून व्यवस्था भी भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता नहीं कहलाती थी।
एक बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है- काश्मीर : समस्या और
समाधान। पुस्तक के लेखक हैं- जगमोहन। श्री जगमोहन लंबे समय तक जम्मू-काश्मीर के
राज्यपाल रहे। उनके समय में काश्मीर की स्थितियाँ बहुत खराब थीं। अपनी पुस्तक में
उन्होंने काश्मीर समस्या का विशद विवेचन किया है। इस पुस्तक के पृष्ठ 166 में वे
लिखते हैं- “धारा 370 इस स्वर्ग रूपी राज्य में केवल शोषकों को समृद्ध करने का ही
साधन है। यह गरीबों को लूटता है। यह मृगतृष्णा की तरह उन्हें भ्रम में डालता है।
यह ‘सत्ताधारी कुलीनों’ की जेबें भरता है। नये ‘सुलतानों’ के अहम् को बढ़ाता है।......विघटन
के विषाणुओं का प्रजनन करता है।..... एक भारत के विचार और काश्मीर से लेकर
कन्याकुमारी तक के महान सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण की हत्या करता है।“
श्री जगमोहन ने धारा 370 को लागू किए जाने के कारणों, इसके
प्राविधानों और इसके प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया है। काश्मीर समस्या को
समझने के लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए। वस्तुतः धारा 370 और इसके विभिन्न
पूरक अंग किसी राज्य को दिए गए विशेषाधिकार के बिंदु-मात्र नहीं हैं; ये भारत और
भारतीयता की अस्मिता, एकता और अक्षुण्णता से सीधा संबंध रखते हैं।
सन् 1950 के बाद अनेक संशोधनों और आदेशों द्वारा अनेक
संवैधानिक बदलाव जम्मू-काश्मीर राज्य पर लागू हुए। प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री
में बदल गया और सदर-ए-रियासत राज्यपाल हो गया, लेकिन समवर्ती सूची और अवशिष्ट
अधिकारों का बड़ा और महत्त्वपूर्ण भाग राज्य की अपनी व्यवस्था का अंग बना रहा। इसमें
‘रणबीर पैनल एक्ट’, दो ध्वज, दो प्रतीक और दोहरी नागरिकता (एक जम्मू-काश्मीर की,
दूसरी भारत की) आदि के विशेषाधिकार आते हैं। भारत का कोई नागरिक जम्मू-काश्मीर में
मतदान का अधिकार कभी नहीं पा सकता, कभी जमीन भी नहीं खरीद सकता। न्याय और औचित्य
की दृष्टि से अनुचित यह व्यवस्था केंद्र-राज्य संबंधों के लिए ठीक नहीं थी।
दूसरी ओर इस विशेषाधिकार का लाभ
राज्य के तीनों क्षेत्रों- जम्मू, काश्मीर और लद्दाख को समान रूप से मिल रहा हो,
ऐसा भी नहीं था। लद्दाख और जम्मू के
साथ भेदभाव के अनगिनत प्रसंग हैं। काश्मीर केंद्रित नीतियों ने जम्मू व लद्दाख के
लोगों के मन में असंतोष भर दिया था। अस्सी के दशक में बड़गाम, पलवामा और कुपवाड़ा
जनपदों के निर्माण, लद्दाख क्षेत्र में कारगिल जनपद के निर्माण और श्रीनगर क्षेत्र
में बांदीपुर जनपद के निर्माण को लेकर चले बड़े आंदोलनों का संदर्भ यहाँ दिया जा
सकता है। सेवानिवृत्त जस्टिस जे. एन. वजीर की अध्यक्षता में नियुक्त कमीशन की
संस्तुति के आधार पर जम्मू क्षेत्र में भी तीन जिले- किस्तवाड़, सांबा और रियासी
बनाए जाने थे, जिन्हें तब तक अटकाए रखा गया, जब तक जम्मू क्षेत्र से भीषण विरोध
नहीं शुरु हो गया। इसी तरह दरबार आंदोलन, जो श्रीनगर को जम्मू-काश्मीर की स्थायी
राजधानी बनाए जाने के विरोध में था, को जम्मू के लोगों के साथ हुए भेदभाव के रूप
में लोग याद करते हैं। राज्य के बजट का बड़ा भाग काश्मीर में ही खर्च हो जाता था।
जम्मू में परियोजनाएँ वर्षों तक अधूरी ही पड़ी रहती थीं।
लद्दाख के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लद्दाख के लोगों ने
जब अनुभूत किया, तो वहाँ पर भी अनेक आंदोलन प्रारंभ हो गए। अस्सी के दशक में
शांतिपूर्ण लद्दाख ने अशांति का ऐसा विकट समय देखा, जिसे इतिहास में कभी भुलाया
नहीं जा सकेगा। लद्दाखी समिति द्वारा अनेक अवसरों पर आरोप लगाए जाते रहे हैं, कि
अनुच्छेद 370 के कारण हमारे साथ पक्षपात हो रहा है। सच्चाई तो यह थी, कि कहने के
लिए अनेक परियोजनाएँ और वित्तीय सहायताएँ लद्दाख के लिए होती थीं, लेकिन धरातल पर
वे उपलब्ध नहीं हो पाती थीं। अनेक परियोजनाएँ तो वर्षों तक चलती ही रहती थीं। वे
पूरी हो भी पाएँगी, या नहीं .... ऐसा सोचने के लिए लोग विवश होते थे।
जम्मू-काश्मीर मंत्रिमंडल में लद्दाख का प्रतिनिधित्व भी शून्य के बराबर ही होता
था।
जम्मू-काश्मीर राज्य के तीनों क्षेत्रों को 370 के अंतर्गत
मिलने वाले विशेषाधिकार का लाभ समान रूप से मिल रहा था, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
क्षेत्र-विशेष और उंगलियों पर गिने जा सकने वाले राजनीतिक-प्रशासनिक-व्यवसायी वर्ग
विशेष तक ही राज्य के विशेषाधिकार के लाभ सिमटे हुए थे। दूसरी ओर शेष भारत के लिए
इस विशेषाधिकार ने ऐसी सीमा रेखा खींच दी थी, कि कश्यप ऋषि का यह क्षेत्र; मुक्तापीड,
ललितादित्य प्रभृति वीर शासकों की कर्मभूमि; संस्कृत के विद्वान आचार्यों-
अभिनवगुप्त, क्षेमेंद्र, मम्मट आदि की धरती; महायान परंपरा की उर्वर भूमि; वैष्णवी
देवी का तीर्थक्षेत्र अपना होकर भी पराया-सा ही बना रहा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस विशेषाधिकार ने भारत की छवि को
धूमिल किया। समय बीतने के साथ यह विशेषाधिकार अराजकता के साथ ही आतंकवाद के पोषण
के लिए उर्वर भूमि तैयार करने लगा, परिणामस्वरूप विभीषक स्थितियाँ इस सुंदर-से
प्रदेश को असुंदर बनाती रहीं। 26 अक्टूबर, 1947 को भारत में विलय के बाद से लगातार
बिगड़ती स्थितियों के बीच भले ही कोई अपने मन को बहलाने के लिए इस विशेषाधिकार को
अच्छा मान ले, लेकिन स्थितियाँ विपरीत ही रहीं हैं।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दूरदर्शिता ही थी, कि
उन्होंने ऐसी स्थितियों का अनुमान पहले ही लगा लिया था। उनके द्वारा जिस स्वप्न को
1952 में देखा गया था, वह सन् 2019 में पूरा हुआ। 05 अगस्त, 2019 को भारत की संसद
द्वारा जम्मू-काश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित राज्यों में बाँटकर वर्षों पुरानी
विभेदकारी व्यवस्था का अंत कर दिया गया। केंद्रशासित प्रदेश के लिए लद्दाख के लोग
बहुत लंबे समय से माँग करते रहे हैं। जम्मू-काश्मीर में प्रतिनिधित्व का अनुपात
सन् 2019 के बाद सुधरा है। नए परिसीमन के साथ लोगों को अपने जनप्रतिनिधि चुनने की
स्वतंत्रता मिली है। एक विधान, एक निशान की व्यवस्था लागू होने के बाद सच्चे
अर्थों में काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतदेश एक सूत्र में बँधा है। लोगों को
उनके अधिकार मिले हैं। राज्य सूची के अनेक नियम और उपनियम जम्मू-काश्मीर में लागू
हुए हैं। संपत्ति के अधिकारों में सुधार हुआ है। विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए
अनेक परिवार विस्थापित जीवन जी रहे थे, जिन्हें अपने नागरिक अधिकार मिले हैं।
धारा 370 की समाप्ति ने आतंकवाद से पीड़ित काश्मीर की दशा
को सुधारने का काम किया है। आज काश्मीर अनेक पर्यटकों की पहली पसंद बन रहा है। लोग
बेधड़क काश्मीर जा सकते हैं। सरकारी परियोजनाएँ विकास के मार्ग प्रशस्त कर रहीं
हैं। कश्यप ऋषि की भूमि आज आतंकवाद की पहचान से निकलकर विकास की परिभाषा लिख रही
है।
भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष, क्रांतद्रष्टा, माँ भारती
के अनन्य सेवक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्वप्न साकार हुआ है। जम्मू-काश्मीर
के लोगों के लिए, लद्दाख के रहवासियों के लिए भारत का संविधान सुलभ हुआ है।
(मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म, लखनऊ के पौष-माघ संवत् 2081 तदनुसार जनवरी 2025 अंक में प्रकाशित)
- राहुल मिश्र

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