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Saturday, 5 September 2026

सन् 1952 का वो सपना, जो 2019 में साकार हुआ....

 





सन् 1952 का वो सपना, जो 2019 में साकार हुआ....


“या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।“

(डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जम्मू में अगस्त 1952 को दिए गए व्याख्यान का अंश)

सन् 1947 में देश के विभाजन की विभीषिका के साथ मिली काश्मीर समस्या किसी गहरे घाव की असह्य पीड़ा के सदृश हर सजग भारतवासी को वेदना देती है। भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पहली बार सन् 1952 में अपनी असह्य वेदना को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। यह प्रतिरोध और प्रतिकार उस नेतृत्व के प्रति भी था, जिसने इस समस्या की जड़ों को सींचा था। स्मरण कराना होगा कि भारतदेश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत राज्य काश्मीर को लेकर तत्कालीन नेतृत्व के पूर्वाग्रहों और अदूरदर्शिता ने ‘धरती के स्वर्ग’ को विवादों के घेरे में डाल दिया। 1962 में उत्तर पूर्वी सीमा पर ऐसी ही स्थितियों की पुनरावृत्ति हुई। हमारे नेतृत्व ने हमारी धरती को इस कारण उपयोग का नहीं समझा, क्योंकि वहाँ पर घास का एक तिनका भी नहीं उगता था। और संभवतः इसी कारण उसे ‘ड्रैगन’ की विस्तारवादी नीयत और पंचशील के दिवास्वप्न की भेंट चढ़ा दिया। पाक अधिकृत काश्मीर (पीओजेके) और चीन अधिकृत काश्मीर (सीओजेके) के ये दोनों ही क्षेत्र उस जम्मू-काश्मीर राज्य के अंग हैं, जिसके लिए धारा 370 के द्वारा विशेष व्यवस्था दी गई थी। इसे विशेष व्यवस्था कहें, या एक राज्य की विशेष तबाही की पटकथा...।

भारत की राजनीति के पुरोधा और दूरदर्शी राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना था, कि देश की स्वतंत्रता के समय हुई इस गलती को सुधारा जाए, काश्मीर को अपना अभिन्न अंग बनाकर भारतमाता के स्वरूप को पूर्ण किया जाए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस सपने के लिए जीवन जिया, और इस सपने को पूरा करने के लिए ही अपने प्राणों का उत्सर्ग भी किया था।

डॉ. मुखर्जी भारतीय राजनीति में अपनी मुखर वाणी के लिए जाने जाते हैं। डॉ. मुखर्जी को यह आभास था, कि भारत की एकता और अक्षुण्णता को स्थापित करने में यह विधान बाधक बनेगा। उन्होंने काश्मीर को लेकर एक नारा दिया था- नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान। संसद में भी उन्होंने धारा 370 को समाप्त करने के पक्ष में दृढ़ता के साथ अपनी बात रखी थी। बिना परमिट काश्मीर में प्रवेश करने के आरोप में 13 मई, 1953 को रावी पुल पर उन्हें बंदी बना लिया गया था। उस समय शेख अब्दुल्ला की सरकार थी। डॉ. मुखर्जी के साथ वैद्य गुरुदत्त, श्री टेकचंद, और पंडित प्रेमनाथ डोगरा को भी बंदी बनाया गया। 40 दिनों की असहनीय यातनाएँ सहते हुए 23 जून, 1953 को डॉ. मुखर्जी का देहांत हो गया। उनकी असामयिक मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।

डॉ. मुखर्जी की मृत्यु पर डॉ. मुखर्जी की माता योगमाया देवी ने कहा था, कि- मेरे पुत्र की मृत्यु भारतमाता के पुत्र की मृत्यु है। निःसंदेह डॉ. मुखर्जी भारतमाता के ऐसे सपूत थे, जिन्होंने विवशता में भारतमाता के एक विभाजन को भले ही स्वीकार कर लिया हो, लेकिन भविष्य में विभाजन की तैयार होती स्थितियाँ उन्हें स्वीकार नहीं थीं। एक देश के अंदर दो विधान चल रहे थे, दो निशान और दो प्रधान थे, जो डॉ. मुखर्जी के लिए असहनीय और पीड़ादायक थे। उन दिनों काश्मीर का मुखिया प्रधानमंत्री होता था। बिना परमिट के जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमा में कोई भारतीय प्रवेश नहीं कर सकता था। काश्मीर का झंडा भी अलग हुआ करता था। राज्य की कानून व्यवस्था भी भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता नहीं कहलाती थी।

एक बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है- काश्मीर : समस्या और समाधान। पुस्तक के लेखक हैं- जगमोहन। श्री जगमोहन लंबे समय तक जम्मू-काश्मीर के राज्यपाल रहे। उनके समय में काश्मीर की स्थितियाँ बहुत खराब थीं। अपनी पुस्तक में उन्होंने काश्मीर समस्या का विशद विवेचन किया है। इस पुस्तक के पृष्ठ 166 में वे लिखते हैं- “धारा 370 इस स्वर्ग रूपी राज्य में केवल शोषकों को समृद्ध करने का ही साधन है। यह गरीबों को लूटता है। यह मृगतृष्णा की तरह उन्हें भ्रम में डालता है। यह ‘सत्ताधारी कुलीनों’ की जेबें भरता है। नये ‘सुलतानों’ के अहम् को बढ़ाता है।......विघटन के विषाणुओं का प्रजनन करता है।..... एक भारत के विचार और काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के महान सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण की हत्या करता है।“

श्री जगमोहन ने धारा 370 को लागू किए जाने के कारणों, इसके प्राविधानों और इसके प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया है। काश्मीर समस्या को समझने के लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए। वस्तुतः धारा 370 और इसके विभिन्न पूरक अंग किसी राज्य को दिए गए विशेषाधिकार के बिंदु-मात्र नहीं हैं; ये भारत और भारतीयता की अस्मिता, एकता और अक्षुण्णता से सीधा संबंध रखते हैं।

सन् 1950 के बाद अनेक संशोधनों और आदेशों द्वारा अनेक संवैधानिक बदलाव जम्मू-काश्मीर राज्य पर लागू हुए। प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री में बदल गया और सदर-ए-रियासत राज्यपाल हो गया, लेकिन समवर्ती सूची और अवशिष्ट अधिकारों का बड़ा और महत्त्वपूर्ण भाग राज्य की अपनी व्यवस्था का अंग बना रहा। इसमें ‘रणबीर पैनल एक्ट’, दो ध्वज, दो प्रतीक और दोहरी नागरिकता (एक जम्मू-काश्मीर की, दूसरी भारत की) आदि के विशेषाधिकार आते हैं। भारत का कोई नागरिक जम्मू-काश्मीर में मतदान का अधिकार कभी नहीं पा सकता, कभी जमीन भी नहीं खरीद सकता। न्याय और औचित्य की दृष्टि से अनुचित यह व्यवस्था केंद्र-राज्य संबंधों के लिए ठीक नहीं थी।

दूसरी ओर इस विशेषाधिकार का लाभ राज्य के तीनों क्षेत्रों- जम्मू, काश्मीर और लद्दाख को समान रूप से मिल रहा हो, ऐसा भी नहीं था। लद्दाख और जम्मू के साथ भेदभाव के अनगिनत प्रसंग हैं। काश्मीर केंद्रित नीतियों ने जम्मू व लद्दाख के लोगों के मन में असंतोष भर दिया था। अस्सी के दशक में बड़गाम, पलवामा और कुपवाड़ा जनपदों के निर्माण, लद्दाख क्षेत्र में कारगिल जनपद के निर्माण और श्रीनगर क्षेत्र में बांदीपुर जनपद के निर्माण को लेकर चले बड़े आंदोलनों का संदर्भ यहाँ दिया जा सकता है। सेवानिवृत्त जस्टिस जे. एन. वजीर की अध्यक्षता में नियुक्त कमीशन की संस्तुति के आधार पर जम्मू क्षेत्र में भी तीन जिले- किस्तवाड़, सांबा और रियासी बनाए जाने थे, जिन्हें तब तक अटकाए रखा गया, जब तक जम्मू क्षेत्र से भीषण विरोध नहीं शुरु हो गया। इसी तरह दरबार आंदोलन, जो श्रीनगर को जम्मू-काश्मीर की स्थायी राजधानी बनाए जाने के विरोध में था, को जम्मू के लोगों के साथ हुए भेदभाव के रूप में लोग याद करते हैं। राज्य के बजट का बड़ा भाग काश्मीर में ही खर्च हो जाता था। जम्मू में परियोजनाएँ वर्षों तक अधूरी ही पड़ी रहती थीं।

लद्दाख के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लद्दाख के लोगों ने जब अनुभूत किया, तो वहाँ पर भी अनेक आंदोलन प्रारंभ हो गए। अस्सी के दशक में शांतिपूर्ण लद्दाख ने अशांति का ऐसा विकट समय देखा, जिसे इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। लद्दाखी समिति द्वारा अनेक अवसरों पर आरोप लगाए जाते रहे हैं, कि अनुच्छेद 370 के कारण हमारे साथ पक्षपात हो रहा है। सच्चाई तो यह थी, कि कहने के लिए अनेक परियोजनाएँ और वित्तीय सहायताएँ लद्दाख के लिए होती थीं, लेकिन धरातल पर वे उपलब्ध नहीं हो पाती थीं। अनेक परियोजनाएँ तो वर्षों तक चलती ही रहती थीं। वे पूरी हो भी पाएँगी, या नहीं .... ऐसा सोचने के लिए लोग विवश होते थे। जम्मू-काश्मीर मंत्रिमंडल में लद्दाख का प्रतिनिधित्व भी शून्य के बराबर ही होता था।

जम्मू-काश्मीर राज्य के तीनों क्षेत्रों को 370 के अंतर्गत मिलने वाले विशेषाधिकार का लाभ समान रूप से मिल रहा था, ऐसा नहीं कहा जा सकता। क्षेत्र-विशेष और उंगलियों पर गिने जा सकने वाले राजनीतिक-प्रशासनिक-व्यवसायी वर्ग विशेष तक ही राज्य के विशेषाधिकार के लाभ सिमटे हुए थे। दूसरी ओर शेष भारत के लिए इस विशेषाधिकार ने ऐसी सीमा रेखा खींच दी थी, कि कश्यप ऋषि का यह क्षेत्र; मुक्तापीड, ललितादित्य प्रभृति वीर शासकों की कर्मभूमि; संस्कृत के विद्वान आचार्यों- अभिनवगुप्त, क्षेमेंद्र, मम्मट आदि की धरती; महायान परंपरा की उर्वर भूमि; वैष्णवी देवी का तीर्थक्षेत्र अपना होकर भी पराया-सा ही बना रहा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस विशेषाधिकार ने भारत की छवि को धूमिल किया। समय बीतने के साथ यह विशेषाधिकार अराजकता के साथ ही आतंकवाद के पोषण के लिए उर्वर भूमि तैयार करने लगा, परिणामस्वरूप विभीषक स्थितियाँ इस सुंदर-से प्रदेश को असुंदर बनाती रहीं। 26 अक्टूबर, 1947 को भारत में विलय के बाद से लगातार बिगड़ती स्थितियों के बीच भले ही कोई अपने मन को बहलाने के लिए इस विशेषाधिकार को अच्छा मान ले, लेकिन स्थितियाँ विपरीत ही रहीं हैं।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दूरदर्शिता ही थी, कि उन्होंने ऐसी स्थितियों का अनुमान पहले ही लगा लिया था। उनके द्वारा जिस स्वप्न को 1952 में देखा गया था, वह सन् 2019 में पूरा हुआ। 05 अगस्त, 2019 को भारत की संसद द्वारा जम्मू-काश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित राज्यों में बाँटकर वर्षों पुरानी विभेदकारी व्यवस्था का अंत कर दिया गया। केंद्रशासित प्रदेश के लिए लद्दाख के लोग बहुत लंबे समय से माँग करते रहे हैं। जम्मू-काश्मीर में प्रतिनिधित्व का अनुपात सन् 2019 के बाद सुधरा है। नए परिसीमन के साथ लोगों को अपने जनप्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता मिली है। एक विधान, एक निशान की व्यवस्था लागू होने के बाद सच्चे अर्थों में काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतदेश एक सूत्र में बँधा है। लोगों को उनके अधिकार मिले हैं। राज्य सूची के अनेक नियम और उपनियम जम्मू-काश्मीर में लागू हुए हैं। संपत्ति के अधिकारों में सुधार हुआ है। विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए अनेक परिवार विस्थापित जीवन जी रहे थे, जिन्हें अपने नागरिक अधिकार मिले हैं।

धारा 370 की समाप्ति ने आतंकवाद से पीड़ित काश्मीर की दशा को सुधारने का काम किया है। आज काश्मीर अनेक पर्यटकों की पहली पसंद बन रहा है। लोग बेधड़क काश्मीर जा सकते हैं। सरकारी परियोजनाएँ विकास के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। कश्यप ऋषि की भूमि आज आतंकवाद की पहचान से निकलकर विकास की परिभाषा लिख रही है।

भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष, क्रांतद्रष्टा, माँ भारती के अनन्य सेवक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्वप्न साकार हुआ है। जम्मू-काश्मीर के लोगों के लिए, लद्दाख के रहवासियों के लिए भारत का संविधान सुलभ हुआ है।

(मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म, लखनऊ के पौष-माघ संवत् 2081 तदनुसार जनवरी 2025 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र


ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा




 

ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा


ब्लैक होल डी इंडिका, गजेंद्र तिवारी जी का सद्यः प्रकाशित उपन्यास है। गजेंद्र जी मूलतः व्यंग्यकार हैं। उनके चिंतन-पक्ष का प्रतिनिधि ग्रंथ- ‘चेतना के विवेकाश्व’ है, जो एक चिंतनपूर्ण आलेख-संग्रह है। इसमें उनकी चिंतन-दृष्टि की बानगी मिलती है। स्फुट कविता-संग्रह भी गजेंद्र जी की लेखनी से आकार पाए हैं। अब यह उपन्यास देकर उन्होंने उपन्यास विधा की ओर प्रयाण किया है। यह परिचय उनके सद्यः प्रकाशित उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपलब्ध है। इस परिचय के सहारे उपन्यासकार के लेखन की तासीर को जानना और फिर उपन्यास में गहरे उतरना आसान लगा, इसलिए इस परिचय से बात को प्रारंभ करने का प्रयास यहाँ किया गया है।

देश की स्वाधीनता के बाद स्थितियाँ बहुत तेजी के साथ बदलीं। विभाजन की विभीषिका को झेलकर उबर रहे देश में ‘अपना राज और अपना शासन’ का भाव समग्र समाज के विकास की दिशा में बढ़ने के स्थान पर ‘आत्म-विकास’ की दिशा में बढ़ने लगा। अव्यवस्था और अराजकता के मध्य समाज का एक बड़ा वर्ग स्वतंत्रता की आवश्यकता, उपादेयता और प्राप्तियों की आलोचना भी करने लगा था। ऐसी स्थितियों से उत्पन्न स्वतंत्रता के प्रति मोहभंग का व्यापक प्रभाव साहित्य की विविध विधाओं में देखने को मिलता है। उपन्यास में भी इसे देखा जा सकता है। कथन की गहराई और तीक्ष्णता के साथ कई ऐसे उपन्यास, जो स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरांत उपजे मोहभंग को खुलकर व्यक्त करते हैं, उनका संदर्भ यहाँ पर दिया जा सकता है। ऐसे उपन्यासों में राजनीति की चाल, उसका चरित्र और चेहरा, समाज की विषमताएँ, विद्रूपताएँ, मानसिक विकृतियों से उपजी अनेक विघटनकारी स्थितियाँ खुलकर प्रकट हुई हैं। समाज का हर वर्ग ही इन उपन्यासों में दिखता है। ऐसे उपन्यासों के वर्ग से इतर ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ को देख सकते हैं, जहाँ यथार्थ का यथातथ्य चित्रण तो है, लेकिन व्यंग्यात्मक होकर ऐसा तीव्र प्रभाव उत्पन्न करता है, कि अनेक यथार्थवादी उपन्यास भी पीछे रह जाते हैं। बिहारी के दोहों के लिए कहा जाता है- ‘सतसइया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर... देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर....।‘ यह उपन्यास देखन में छोटा नहीं है। पाँच सौ पंद्रह पृष्ठों का अच्छा-खासा वजनदार उपन्यास है, और इस दृष्टि से गंभीर नहीं, बहुत गंभीर घाव करने की सामर्थ्य रखता है।

गजेंद्र जी वकालत के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। कोर्ट-कचहरी से उनका व्यावसायिक नाता है, लेकिन ऐसे तो अनेक अधिवक्ता और न्यायाधीश होंगे, जो कोर्ट-कचहरी से जुड़े हुए होंगे। लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इतर समाज को देखने का एक पक्ष गजेंद्र जी के साथ उनके इस व्यवसाय में जुड़ता है, जो बहुत मार्के का है। न्यायालय और कचहरियाँ सामान्यतः अच्छी दृष्टि से नहीं देखी जातीं। इन्हें तो ‘बलाओं’ की श्रेणी में रखा जाता है। जो अदालत और अस्पताल से बचा रह जाए, वही सुखी है। लेकिन समाज का सच्चा चेहरा देखना हो, तो अदालतों से अच्छा विकल्प भी नहीं मिलता है। न्यायालयों में आने वाले दोनों पक्षों में से एक अपराधी-दोषी और दूसरा पीड़ित-असहाय होता है। कितने ही निर्दोष होते हैं, जो सजा पाते हैं, और अनेक अपराधी होकर भी छूट जाते हैं। इन सबके बीच समाज का चाल-चरित्र और चेहरा दिखता है। भय, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंक, अन्याय, अराजकता, अश्लीलता, अभद्रता आदि न जाने क्या-क्या अनेक तरीके से, विभिन्न रूपों में दिखता है। समाज की सच्चाई दिखती है, बदलते समय के चेहरे... उसके चाल-चरित्र आदि का बेबाक साक्षात्कार तो अदालत-कचहरी में ही मिलता है। गजेंद्र जी के पास इस दृष्टि से कच्ची सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी, जिसके सहारे उन्होंने समय और समाज का क्रूर यथार्थ व्यक्त किया है।

यथार्थ को कहना, और ऐसा कहना, कि होंठ हँसते रहें, चिंतन चलता रहे, विचारों की कड़ी जुड़ती रहे और हृदय में बात गहरे तक उतरती रहे...। कहन की यह कला श्रेष्ठ व्यंग्य में होती है। यथार्थ को बेबाक व्यक्त करने वाले उपन्यास यदि व्यंग्य की छौंक लिए हुए हों, तो संप्रेषण की गहनता, तीक्ष्णता और वजन कई गुना बढ़ जाता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ ऐसा ही उपन्यास है। उपन्यासकार के अनुभव, उनकी लेखनी का व्यंग्यात्मक पुट और यथार्थ को बेरोक-बेटोक कहने की सामर्थ्य ने इस उपन्यास को विशिष्ट बनाया है।

उपन्यास में परत-दर-परत ऐसे पक्ष खुलते चले जाते हैं, जिनके साथ जुड़कर न केवल कथा का विस्तार होता है, वरन् ऐसी सच्चाई उजागर होती है, जिससे आँखें मिलाना सहज नहीं रहता। प्रायः आश्चर्य की उस सीमा पर स्वयं को खड़े पाना होता है, जो आज के समय की सच्चाई को देखते हुए पहले अनुभूत नहीं करने या कर पाने की स्थितियों से दो-चार होते हुए सामने आता है। कथा का प्रारंभ नब्बे वर्ष पूर्ण कर चुके पंडित बलीराम अवस्थी के जन्मदिन के उपलक्ष्य पर आयोजित समारोह से होता है। पंडित जी अपने क्षेत्र के वरिष्ठतम अधिवक्ता हैं, कानून के अच्छे ज्ञाता हैं, तर्कशील, दूरदर्शी और सहृदय व्यक्ति हैं। उनकी नब्बे वर्ष की श्रीआयु और उनका व्यवसाय यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि उनके पास अनुभव की कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम में उपस्थित उनके निकटस्थ परिचित लोग उचित अवसर देखकर अवस्थी जी निवेदन करते हैं, कि वे अपने संचित अनुभवों की साझेदारी सबके साथ करें, और इसके लिए सभी लोग प्रतिदिन उनके पास एकत्र हुआ करेंगे।

अवस्थी जी इसके लिए पहले तो तैयार नहीं होते, लेकिन लोगों के लगातार अनुरोध के कारण वे सहमति देते हैं। अवस्थी जी कथा सुनाते हैं, कथा का क्रमशः प्रवाह चलता है, और यह प्रवाह उपन्यास को विस्तार देता है। आर.पी. वाजपेयी, मुंशी संतोष, वकील नाइक, मजिस्ट्रेट बघेल, अदालत के कर्मचारी, फर्राश और अदालत में हाजिर होने वाले पैरोकारों को लेकर उपन्यास में अदालत परिसर का चित्र खींचा जाता है। अदालत परिसर में वकीलों के बैठने की व्यवस्था कतार में अपने-अपने पसरे सजाकर बैठे हुए सब्जी वालों से तुलना करती दिखाई देती है। उपन्यासकार का संकेत लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ की दुर्दशा की ओर होता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस से कहीं अधिक महत्त्व रखता है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का प्रमुख अंग अधिवक्ता होते हैं। बार और बेंच, अर्थात् न्यायालय और अधिवक्ता एक-दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों के बीच का समन्वय, तालमेल और दोनों की समान सक्रियता आमजन के लिए न्याय का मार्ग सुलभ कराती है, विधायिका और कार्यपालिका पर लगाम लगाती है। “अधिवक्ताओं की गणना बुद्धिजीवी वर्ग में की जाती है। उन्हें समाज का क्रीम माना जाता है। न्यायदान की प्रक्रिया में उनका महत्त्वपूर्ण रोल रहता है। वे कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं के ज्ञाता माने जाते हैं। अदालतों में अगर वकील न हों तो हाहाकार मच जाएगा और अदालतों का कामकाज ठप्प हो जाएगा। कल्पना कीजिए, आप या कोई अन्य व्यक्ति कोई अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए प्रयागराज या अन्य किसी तीर्थ स्थान  गए हुए हैं वहाँ अगर पुजारी या पण्डे न मिलें तो कैसी स्थिति निर्मित होगी। वकीलों को अदालत-कचहरी रूपी तीर्थ स्थान का पण्डा या पुरोहित माना जाए तो कोई अनुचित बात नहीं होगी।” (पृ. 12)

लेकिन यह सब कहाँ से संभव हो सकेगा, जब अधिवक्ता दयनीय स्थिति में होंगे, सब्जी वालों की तरह पसरे बिछाकर बैठे होंगे। उपन्यासकार न्यायालयों के इस महत्त्वपूर्ण अंग की दयनीय दशा के साथ ही वकीलों की चालबाजियों को भी खुलकर प्रकट करते हैं। अटवाल वकील साहब के लिए आदर्श स्थिति यही है, कि किसी भी तरह से मुकदमे को जीतो। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। कानून को जानने से काम चले, तब भी भला और साहब को जानने से काम चले, तब भी भला....।

उपन्यासकार का प्रयास वकीलों की बैठक का विवरण देने के सहारे न्यायालयों की स्थिति की पूर्वपीठिका को प्रस्तुत करने का होता है। न्यायालयों में अलग-अलग पदों पर कार्यरत कर्मचारी होते हैं। ये सभी वकीलों से एक अलग संबंध के तहत जुड़े होते हैं। यह संबंध उस ‘दस्तूरी’ का ईमानदारी के साथ निर्वहन करता है, जिसकी जड़ें बेईमानी और भ्रष्टाचार की जमीन से खाद-पानी पाती हैं। उपन्यास के देवांगन वकील साहब इसे स्नेहन का नाम देते हैं। वे इसके विषेशज्ञ हैं। अदालत में पक्षकारों की पुकार लगाने वाले कर्मचारी से लगाकर पेशकार, रीडर, डिपोजीशन राइटर और फिर साहब तक पूरी कड़ी बनी हुई है, दस्तूरी प्रस्तुत करने की। हर किसी की काम के अनुसार राशि तय है। बीस रुपये से लगाकर पचास, सौ, हजार तक....। दस्तूरी भी दो तरह की है- सद्भावनापूर्वक दी जाने वाली, अर्थात् सही और जायज काम के लिए दी जाने वाली। दुर्भावनापूर्वक दस्तूरी ठीक इसके विपरीत है, अर्थात अवैधानिक कृत्य के लिए दी जाने वाली। अदालतों में सद्भावनापूर्वक दस्तूरी का ही चलन दिखता है, कह सकते हैं, कि दस्तूरी कैसी भी हो, न्याय के मंदिर में सद्भावनापूर्ण ही हो जाती है। वैसे कुछ भी यहाँ छिपा नहीं रहता। “मुद्रा का यह हस्तांतरण इतने खुले रूप में होता है कि उसे न देख पाने की बात सिर्फ वही स्वनामधन्य सज्जन कह सकते हैं जिन्होंने ऐसा करने का हठ धारण किया हुआ है। न्यायालय में डॉयस पर विराजने वाले पीठासीन न्यायिक अधिकारी आदि यह बातें कहें तो एक बार उस पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि उनके और बाबू के बीच के दृष्टि-पथ पर पक्षकार खड़ा होता है, जिसके कारण उनकी नजर में यह मौद्रिक आदान-प्रदान नहीं आ पाता।“ (पृ. 21)

बघेल साहब और सेमुअल टोप्पो साहब आदि के सहारे उपन्यासकार ने उन तमाम न्यायाधीशों की दिनचर्या और कार्य-पद्धति का सटीक विवरण प्रस्तुत किया है, जिनके सहारे देश की न्याय-व्यवस्था संचालित होती है। भागवती, रतिराम  बैशाखूराम आदि ऐसे पक्षकार हैं, जो न्यायालय से अपने पक्ष में न्याय पाने हेतु अनवरत प्रतीक्षारत हैं। बैशाखूराम जैसे अभियुक्त सजा से बचने के लिए और अपने पक्ष में निर्णय प्राप्त करने के लिए साहब और मेमसाहब तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। कुछ भेंट-सौगात देकर अपने अनुकूल स्थिति बनाना चाहते हैं। भट्टी वाले लोग भी ऐसे ही हैं। कई सेठ-महाजन भी जानते हैं, कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को ‘साधने’ से कई काम बन जाते हैं। नए अधिकारी के आते ही सौगातें पहुँचाने का क्रम चालू हो जाता है। न्यायालय के अधिकारियों के लिए साहब के निजी सहायक या पेशकार आदि व्यवस्था कराते हैं, और वह भी पूरी निष्ठा के साथ, जैसे कि यह व्यवस्था भी सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का ही अंग है।

भ्रष्टाचार न्यायपालिका में भले ही कम स्तर पर हो, लेकिन विधायिका और कार्यपालिका को यह पर्याप्त संभावनाएँ प्रदान कर देता है। वस्तुतः यह एक गठजोड़ बनाता है। उपन्यास इस गठजोड़ की ओर संकेत करते हुए कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतों को उजागर करता है। इनके साथ जनप्रतिनिधि और ठेकेदार भी जुड़े हुए हैं। हरदीप गरचा जैसे ठेकेदार और गोयल जैसे सरकारी अधिकारी हर विभाग में पाए जाते हैं। ये मिल-जुलकर सरकारी धन का बंदरबाँट करते हैं। “जनप्रतिनिधि, सरकारी अमला और ठेकेदार इन तीनों की तिकड़ी ने ऐसा तिलिस्म रचा है कि लोकतंत्र अपनी राह भूल गया है। आवें का आवाँ ही बिगड़ गया है। राज्य अपना कार्य करने के लिए राज-कर्मचारियों की नियुक्ति करता है। उन्हें आकर्षक वेतन देता है, तरह-तरह की सुविधाएँ देता है। ओहदा देता है। पद-पदवी और रुतबा देता है। लेकिन यह सामान्यजन नहीं कह रहे हैं, चाणक्य कह रहे हैं कि राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी मुख्यतः धोखेबाज और बेईमान होते हैं और राजा की संपत्ति को हड़पने को तत्पर रहते हैं। राजा को इनसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बचाना चाहिए।” (पृ. 131-132)

केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, सामाजिक विघटन, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का ह्रास और इस सबके कारण दुष्कर होते जीवन की विषम और दयनीय स्थितियों का चित्रण न्यायालय में सुनवाई के लिए आने वाले विभिन्न मुकदमों के माध्यम से होता है। वृद्ध रामेश्वर अग्रवाल एक पीड़ित व्यक्ति-मात्र नहीं हैं, जो न्यायालय में अपने लिए न्याय माँगने आए हैं; वरन् वे उस वृहत्तर समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ आधुनिकता और भौतिकता ने पारिवारिक संबंधों की मिठास को लील लिया है। जहाँ पिता-पुत्र के, माँ-बेटे के, पति-पत्नी के संबंध केवल और केवल स्वार्थ पर टिके हुए हैं। टोप्पो साहब के माध्यम से विवाहेतर संबंधों की विकृति को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है। स्त्री सशक्तिकरण की सच्चाई भी उपन्यासकार से छिपी नहीं है। उपन्यासकार ने बहुत बेबाकी के साथ स्त्री सशक्तिकरण की असलियत उजागर की है। न्यायालय के एक कर्मचारी की पत्नी अपने पति को गालियाँ दे रही है, वह भी कोर्ट के परिसर में सबके सामने। उपन्यासकार ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूरे प्रसंग को प्रस्तुत किया है-

“अभी वकील  लोग बाहर निकल ही रहे थे कि कोर्ट के पिछले दरवाजे की तरफ से एक तेज नारी कंठ की आवाज आई, जिसे सुनकर लोग ठिठक गए। श्री आचार्या भी चौंक गए। आवाज काफी तीखी थी और ऐसा लग रहा था जैसे गुस्से का इजहार किया जा रहा हो।

‘रोगहा, भड़ुवा, तोर मुँह म कीरा परे', नारी कंठ से निःसृत रेल की सीटी के समान तीखी आवाज ने एकबारगी ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

श्री आचार्या ने पूछा, "यह किस सशक्त महिला की आवाज है?" उनकी आवाज में विनोद का पुट था।

"हाँ, यह सशक्त महिला की ही आवाज है। अपने पति पर गालियों की बौछार कर रही है रोज की तरह”, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष ने कहा, "इसका पति न्यायालय का जमादार है। उसी पर बरस रही है।"

श्री आचार्या को यह नई स्थिति बड़ी दिलचस्प प्रतीत हुई। एक पत्नी द्वारा अपने पति को इस तरह खुले आम सार्वजनिक स्थान में डाँटना, बल्कि गालियाँ देना महिला सशक्तीकरण का एक प्रैक्टिकल मामला नजर आया।“ (पृ.38)

हिरदे, रामबगस यादव, निरंजन, उत्तराबाई, रतनलाल और मंजरी जैसे अनेक पात्र उपन्यास में तमाम सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों, भ्रष्ट आचरणों, अन्याय-अपराध-आतंक की दुर्दमनीय स्थितियों को व्याख्यायित करने के माध्यम बनकर सामने आते हैं। परिवार ही नहीं, समाज की स्थिति भी अत्यंत विकट और विषम है। स्वार्थ, लोभ, लालच और अनैतिकता ने समाज को अनेक स्तरों में तोड़ रखा है। सामान्य जन के लिए सहज जीवन दुर्लभ हो गया है। हिरदे जैसे गँवई-गाँव के लोग अपने छोटे-से परिवार में हँसी-खुशी रहना चाहते हैं, लेकिन आपराधिक तत्त्व इन्हें जीने नहीं देते। अनेक ऐसे अपराधी, जिनका अतीत अपराध की दुनिया में विवश होकर उतरने की कहानी बयाँ करता है, समाज में बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।

भू-माफिया, तस्कर, खनन-माफिया, घूसखोर, अपराधी, आतंकी, धोखेबाज, छली-प्रपंची.... उपन्यास में न केवल उपस्थित हैं, वरन् समाज की सच्चाई को खुलकर प्रकट कर रहे हैं। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी ऐसी है, कि इन अपराधियों के लिए बेरोक-टोक अपराध में संलग्न रहने के लिए पर्याप्त अवसर भी उपलब्ध करा देती है, और न्यायालय से मिलने वाली सजा से बचकर निकलने का रास्ता भी उपलब्ध करा देती है। देश की स्वाधीनता के बाद यह मानकर, कि अपने राज में...स्वराज में देश प्रगति की ओर अग्रसर होगा, लेकिन इसके ठीक विपरीत बनती राजनीतिक स्थितियों ने, नेताओं के साथ अपराधियों और माफियाओं के गठजोड़ ने स्थितियों को बुरी तरह से बिगाड़ा है। उपन्यास इन विषम स्थितियों को बहुत गहरे उतरकर न केवल देखता है, वरन् सामाजिक संदर्भों में इसके प्रभाव की व्यापक पड़ताल भी करता है।

जेल से बाहर निकले झनकूराम की दशा के सहारे उपन्यासकार ने न केवल जेल के अंदर की सच्चाई को व्यंग्यात्मक भाव से व्यक्त किया है, वरन् लोकतंत्र की सच्चाई को, वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा को भी स्पष्ट किया है। जेल में निरुद्ध झनकूराम ने दो दिन में केवल दो ही बिस्किट खाए। बिस्किट भी भूसे के बने हुए थे। परोसे गए खाने में दाल और खिचड़ी का अंतर पता करना... दाल के नाम पर परोसे गए पानी में दाल को खोजना उनके लिए बहुत कठिन था। पाँच रुपये में एक बीड़ी खरीदकर झनकूराम को एक ही कश लेने को मिला, बाकी तो कैदियों ने छीनकर निपटा दी...। जेलों के अंदर दो तरह की व्यवस्थाएँ मिलती हैं। धन खर्च करने पर सुविधाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के मध्य भी हम किस तरह से मध्यकालीन युग में जी रहे हैं, इसे जेलों की व्यवस्था के सहारे उपन्यासकार ने व्यक्त किया है-

“गुलामों का व्यापार जब होता था तब उनके साथ जो बर्बर सलूक किया जाता था, वैसा ही बर्बर व्यवहार आज इक्कीसवीं सदी में जेल में निरुद्ध साधनहीन बंदियों के साथ किया जाता है।

यही सच है हमारे इस जनकल्याणकारी लोकतंत्र का। और यही वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा का नग्न सत्य।” (पृ. 432)

उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपन्यास को व्याख्यायित करती हुई उक्ति है- “जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाले महाशून्य की गाथा।” अपराध, भ्रष्टाचार, आतंक, अनैतिकता, असहिष्णुता, असामाजिकता, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का क्षरण, सामाजिकता का ह्रास, संवेदनाओं की शून्यता के अनेक-अनेक रूप उपन्यास में प्रकट होते जाते हैं। यदि जीवन इन सबस मुक्त होता, तो संभवतः सुखद और सुंदर होता, बहुवर्णी होता....इसे इंद्रधनुषी रंगों के साम्य से इंगित किया है। ये इंद्रधनुषी रंग, जीवन का सौंदर्य जिस महाशून्य में विलीन हो रहा है, वह ब्लैक होल की तरह है। शून्य से कई गुना अधिक घातक है। शून्य तो किसी संख्या के साथ गुणा करने पर गुणननफल में ही शून्य करता है, लेकिन समय और समाज में उभर आए महाशून्य से तो जुड़कर भी.... हटकर-घटकर भी... किसी भी दशा में अस्तित्व का मिटना सुनिश्चित है। यही आज के समय की कड़वी सच्चाई है।

आगा हसन अमानत की रचना है- इंदर सभा। कमलेश्वर का उपन्यास है- कितने पाकिस्तान। इसी तरह मिस्र के उपन्यासकार नागिब महफूज का उपन्यास है- बिफोर द थ्रोन। अंग्रेजी की प्रसिद्ध कृति है- टी.एस. इलियट की द वेस्टलैंड। इन कृतियों में समय की अदालत है, जिसके समक्ष पीड़ित और अभियुक्त दोनों ही प्रस्तुत होते हैं। न्यायालय सही-गलत का निर्णय करता है। समय का चक्र घूम-घूमकर सच का अन्वेषण करता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में भी न्यायालय है, लेकिन यह न्यायालय महाशून्य की विभीषिका से बचा हुआ नहीं है। यह अदालत किसी अलग लोक की नहीं है। इसके सभी अंग- न्यायिक अधिकारी, न्यायालय के कर्मचारी, अधिवक्तागण और यहाँ तक कि इन सबसे जुड़े अन्य लोग भी सामान्य मानव हैं, राग-द्वेष, वैर-प्रीत, लोभ-लालच, स्वार्थ और भ्रष्ट-आचरण से अछूते नहीं हैं। इस कारण यह न्यायालय अत्यंत व्यावहारिक होकर समय और समाज की सच्चाई को देख पाता है। पंडित अवस्थी जी  भले ही वरिष्ठ अधिवक्ता हों, लेकिन डिपोजिशन राइटर (साक्ष्य लेखक) की भाँति उपन्यास के अंत में दिखते हैं। नब्बे वर्षों की श्रीआयु में जुटाए अनेक साक्ष्यों, अदालती कामकाज में संलग्न रहते हुए अनेक स्थितियों को वे साझा करते हैं-

“पंडित अवस्थी की भारी आवाज बहुत दूर से किंतु साफ और घंटे की गूँज-सी सुनाई दे रही है, ‘फिर व्यावहारिक रूप में दैनंदिन के कार्य-कलापों में हर वर्ग के व्यक्ति के द्वारा छोटे-छोटे कार्यों में भी गहरे से पैठ गया है- लालच और स्वार्थ, और उत्पन्न कर रहा है- अन्याय हर पल, हर दिन, हर स्थान पर, हर लेन-देन और हर व्यवहार पर। सर्वव्यापी अंधकार की तरह।” (पृ. 515)

पंडित अवस्थी जी की धाराप्रवाह वाणी के सम्मोहन में बँधे लोग उस भयावहता से स्वयं का साक्षात्कार करा रहे थे, जिसके साथ दिन-रात जीवन बिताते हुए अनुभूत नहीं किया होगा, या अनुभूति की गहनता चिंता के स्तर तक नहीं पहुँची होगी। पंडित अवस्थी जी एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नहीं, नब्बे वर्ष के अनुभवों को सँजोए हुए एक सामान्य मानव के रूप में नहीं, वरन् जीवंत-साक्षात् यथार्थ-वक्ता, भविष्य-द्रष्टा के रूप में बोल रहे हैं। समय महामानव बनकर मानों अपनी बात कह रहा है, अपने आज और कल को बता रहा है-

 “इंसान को जानवर से अलग चिह्नांकित करने वाली जो सामूहिक सभ्यता और जिम्मेदारी की समझ होती है, परिपक्वता होती है; उससे, दुर्भाग्यवश, नागरिकगण बहुत दूर हैं। और उनके व्यक्तिगत या इंडीविजुअल कर्मों के तुच्छ सोच-भावना आधारों ने अंतरिक्ष के ‘ब्लैक होल’ अस्तित्व, जो कि प्रकाश किरणों तक को अपने चंगुल से बाहर आने नहीं देता; की भाँति ही एक महाविशाल ‘ब्लैक होल’ का निर्माण कर लिया है। जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाला महाशून्य। निगल रहा सब कुछ। उजाला तो दिख नहीं रहा किसी भी क्षेत्र में।” (पृ. 515)

ब्लैक होल विशालकाय तारों के ढहने से, उनके अवसान होने से बनते हैं। मानवीय मूल्य, सिद्धांत, मान्यताएँ, जीवन-चिंतन आदि का अवसान, इनके पतन की स्थितियाँ भी मानवता के लिए, जीवन के लिए ब्लैक होल का निर्माण कर देती हैं। मूल्यों का ह्रास, जीवनीय सिद्धांतों का क्षरण न केवल परिवार, वरन् समाज और राष्ट्र की सकारात्मकता को नष्ट करता है, स्थितियों को बिगाड़ता है। स्थितियों को अनवरत बिगड़ते हुए देखने-भोगने की परिणति निराशा में होती है। पंडित अवस्थी जी की पीढ़ी ही नहीं, वे सभी पीढ़ियाँ, जो सुन रहीं हैं, अनुभूत कर रहीं हैं, एक तरह से अचंभित भी हैं, और सच से साक्षात्कार करके हताश-निराश भी हैं। इतना ही नहीं, स्थितियों से समझौता करते हुए महाशून्य में समा जाने के लिए स्वयं को समर्पित भी कर बैठी हैं। लेकिन इन पीढ़ियों के बाद की भी एक पीढ़ी है, जो अभी अपने बचपन में है। उसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है, कि वह सहज ही स्वयं को स्थितियों का दास बना दे। उपन्यासकार की दृष्टि इस पीढ़ी तक भी जाती है। अवस्थी जी की अथाई के पास खेल रहे बच्चों में से एक उस उजाले की ओर इंगित करता है, जो ‘ब्लैक होल’ में अभी तक समाया नहीं है। सारे बच्चे उसके साथ मिलकर देखते हैं। आस्था गहन हो जाती है। प्रार्थना का भाव उतर पड़ता है। तुलसी चौरे के नीचे प्रकाशित दीपक आशा का संचार करता है। भले ही ब्रह्मांड में प्रसारित प्रकाश ब्लैक होल में समा जाए... भले ही बड़े-बड़े प्रकाश-पुंज मिट जाएँ, महाशून्य के द्वारा निगल लिए जाएँ, लेकिन तुलसी चौरे का दीया टिमटिमाता रहेगा। अपनी सीमित क्षमता में ही सही, उजाले को जिलाए रखेगा। आस्था बलवती रहेगी....और एक दिन अवश्य ही महाशून्य से निकलकर जीवन के इंद्रधनुषी रंग विस्तार पाएँगे। बच्चों की जैसी हँसी, उनके जैसा खिलंदड़ापन लौट आएगा, जीवन फिर सुखद-सुखमय और उल्लासपूर्ण होगा।

भावी की कल्पना सकारात्मक होकर कर्मफल के सिद्धांत को बल प्रदान करती है। लखनऊ के रहने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अजय प्रसून ने ‘अनागत कविता आंदोलन’ को सत्तर के दशक में प्रस्तुत किया था। ‘कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना’ के ध्येय-वाक्य पर केंद्रित अनागत कविता आंदोलन की अनेक प्रतिनिधि कविताएँ ऐसी सकारात्मकता के साथ पूर्ण होती हैं। कहानी और उपन्यास विधाओं में भी अनागत का दर्शन होता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में अनागत, अर्थात् आने वाले कल के लिए सुखद कामना बहुत बड़ा संकेत देती है। समय की अदालत सही और गलत पर नीर-क्षीर विवेक के न्याय से आश्वस्त करती है, कि कल के अच्छे होने की संभावनाएँ अभी शून्य नहीं हुई हैं। इसी कारण यह उपन्यास इक्कीस बैठता है। पढ़े जाने, और बार-बार पढ़े जाने की संभावना ही नहीं, अनिवार्यता को भी शिद्दत के साथ अनुभूत कराता यह उपन्यास अपनी सरल-सहज भाषा और रुचिकर शैली के बल पर पाठक को न केवल स्वयं के साथ बाँध लेता है, वरन् पाठकीय चेतना को झंकृत करते हुए चिंतन-मनन, और साथ ही आत्ममंथन के लिए विवश कर देता है।

समग्रतः, इस पठनीय और संग्रहणीय कृति से हिंदी के उपन्यास जगत् को समृद्ध करने और व्यंग्यात्मक उपन्यास की विधा को सबल करने हेतु कृतिकार गजेंद्र तिवारी जी के प्रति अनेक साधुवाद।

(गजेन्द्र तिवारी कृत 'ब्लैक होल डी इंडिका' हिंदी व्यंग्य उपन्यास पर विविधतापूर्ण समकालीन समीक्षात्मक अध्ययन, प्रयास प्रकाशन, बिलासपुर, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

बुंदेलखंड में नाग पंचमी


बुंदेलखंड में नाग पंचमी


सावन के शुक्लपक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। बुंदेलखंड में नाग पंचमी का उत्सव विशेष स्थान रखता है। विशेष रूप से बुंदेलखंड के किसानों के लिए यह उत्सव महत्त्वपूर्ण है। नाग पंचमी के त्योहार के साथ ही विभिन्न पर्वों और त्योहारों का प्रारंभ होता है। बुंदेलखंड क्षेत्र में यह मान्यता है, कि किसानों के पर्व-त्योहार नाग पंचमी के बाद प्रारंभ होते हैं। इस तरह नाग पंचमी का त्योहार किसानों और खेती-किसानी से जुड़े विभिन्न वर्गों-समुदायों का पहला त्योहार माना जाता है। यह मान्यता लोक की है। नाग पंचमी का पर्व शास्त्र-सम्मत तो है ही, किंतु यह लोक-पर्व के रूप में अपनी विशेष मान्यता रखता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ जोड़कर विभिन्न पूजा-अनुष्ठानों के रूप में नाग पंचमी को भले ही स्थान दे दिया जाए, लेकिन इस त्योहार की गहराई से पड़ताल करें, तो सिद्ध होता है, कि यह धार्मिक पर्व व पूजा-अनुष्ठान से कहीं अधिक सामाजिक संस्कार का उपक्रम है। शास्त्रीय मान्यताओं में संस्कार भी धार्मिक विधि-विधान के साथ संपन्न होते हैं। नाग पंचमी का पर्व कृषक जीवन का बड़ा संस्कार है।

भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ के पर्व-त्योहार भी कृषि से जुड़े हुए हैं। भारतीय समाज-व्यवस्था और जीवन-पद्धति का अभिन्न संबंध कृषि कार्य व कृषक जीवन से रहा है। आज भले ही आधुनिक कृषि तकनीकों और आधुनिक कृषि-पद्धतियों ने खती-किसानी को व्यावसायिक बना दिया हो, लेकिन पुराने समय में ऐसा नहीं था। खेती-किसानी में अर्थार्जन से कहीं अधिक लोक-कल्याण, सामाजिक समरसता, बंधुत्वभाव और प्रमुख रूप से प्रकृति के प्रति... समस्त जीव-जंतुओं के प्रति आत्मीय भाव की प्रमुखता थी। विभिन्न पर्व-त्योहारों में भी यह भाव परिलक्षित होता था। गोवर्धन पूजा, गोपाष्टमी, बछ बारस व्रत और पोला त्योहार आदि कृषि से जुड़े हुए हैं। नाग पंचमी इनमें सर्वप्रमुख है। यदि बुंदेलखंड के किसानों की बात कहें, विशेष रूप से अपने ग्रामीण और कृषक परिवेश में देखे गए यथार्थ को जोड़ते हुए बात कहें, तो नाग पंचमी का पर्व मुझे प्रकृति के प्रति समर्पित, मानवेतर जीवों के प्रति समर्पित संस्कार से कम नहीं लगता। बुंदेलखंड के किसानों की पीढ़ियों में पिता से पुत्र और पौत्रों आदि तक क्रमानुसार इस पर्व के साथ कृषक जीवन के संस्कार संततियों में उतरते दिखाई देते हैं। इसी कारण लोक परंपरा में नाग पंचमी का विशेष महत्त्व है। नाग पंचमी लोक जीवन में धार्मिक पर्व से कहीं अधिक लोक-प्रचलित संस्कार के पर्व के रूप में प्रतिष्ठित है।

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस तिथि को कल्कि अवतार जन्म और तक्षक पूजा के लिए भी जाना जाता है। हिंदू और जैन धर्मों में नागपूजा का बड़ा महत्त्व है। हिंदुओं के आराध्य शिवजी ने नाग को अपने गले में धारण किया, श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्त कराकर कालिया नाग को मोक्ष प्रदान किया, गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं नागों में अनंत (शेषनाग) हूँ। विष्णु ने भी शेष-शयन करके नागों के प्रति धार्मिक आस्था को स्थापित किया है। जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ को शेषनाग पर बैठे हुए दर्शाया गया है। पुराणों में बताया गया है कि हमारी धरती शेषनाग के फन के ऊपर टिकी हुई है। इस तरह नाग हमारी धार्मिक आस्था से जुड़े हैं और इसी कारण नाग पंचमी का भी अपना विशिष्ट धार्मिक महत्त्व है।

इतिहास के दृष्टिकोण से देखने पर ज्ञात होता है, कि नागवंश का अतीत महाभारत काल से भी पुराना है। महाभारत काल में पूरे भारत, विशेष रूप से हिमालय पर्वत की उपत्यकाओं और कैलास पर्वत से लगे भूक्षेत्रों में नाग वंश का प्रभुत्त्व था। पौराणिक मान्यता के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री और कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू ने काश्मीर में आठ पुत्रों- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक को जन्म दिया था। इन्होंने समूचे काश्मीर में अपना राज्य स्थापित किया। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख आता है, कि भृगुवंशी परशुराम ने धरती को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करके अपराधियों-आततायियों-आतंकियों से मुक्त कराया था। जब भगवान परशुराम आश्वस्त हो गए, तो उन्होंने समूची विजित धरती कश्यप ऋषि को दान में दे दी। इस कारण धरती का एक नाम काश्यपी भी है। कश्यप ऋषि ने दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियों से विवाह किया था। इनमें से अदिति से आदित्य का जन्म हुआ, दिति से दैत्यों का तथा कद्रू से नागों का....। समग्र धरती पर नागों का शासन कश्यप ऋषि के पुत्र होने के कारण भी माना जाता है। महाभारत के आस्तिक पर्व में उल्लेख आता है, कि स्वयं ब्रह्मा जी ने कश्यप ऋषि को सर्पविद्या का उपदेश दिया था, ताकि सर्पों को धरती से विलुप्त होने से बचाया जा सके। भारत की प्राचीन विद्याओं में से एक सर्पविद्या भी है।

उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक संपूर्ण आर्यावर्त में नागों के अस्तित्व के चिह्न मिलते हैं। नाग वंशावली के अध्ययन से इस समृद्ध वंश का पता चलता है। नाग वंशावली में शेषनाग को नागों का पहला राजा माना जाता है। शेषनाग को अनंत नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान काश्मीर का अनंतनाग इनकी राजधानी हुआ करता था। वैसे ही तक्षशिला नगरी तक्षक नाग की राजधानी हुआ करती थी। मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। वासुकि का राज्य कैलास पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। नाग वंशावली में यह क्रम कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनंत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना आदि शासकों से होते हुए चलता रहा। ये सभी नाग को पूजने वाले नागकुल थे, इसीलिए इन्होंने नागों की प्रजातियों पर अपने कुल का नाम रखा।

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इनका राज्य था। छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नागवंशियों का उल्लेख मिलता है। मध्यप्रदेश के विदिशा में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि (यशनंदि) आदि नागवंशीय राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। नाग जनजाति का शासन नर्मदा नदी घाटी में भी था। हैहयों ने नागवंश को पराजित कर दिया था, बाद में कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद नागों ने अपना राज्य फिर से स्थापित किया और ये नवनाग कहलाए। इन नवनागों ने अपने राज्य का विस्तार मथुरा, विदिशा, कांतिपुरी (कुंतवार) व पद्मावती (पवैया) तक कर लिया था। नागा आदिवासियों का संबंध भी नागों से ही माना जाता है। कुछ लोग नागदा नामक ग्राम को नागदाह की घटना, यानि जनमेजय के नागयज्ञ से जोड़ते हैं। इनके साथ ही आज भी कई परिवारों में सर्प को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। मालवा क्षेत्र में कई गाँवों में उनके चबूतरे बने हुए हैं। जनभाषा में उन्हें भीलट बाबा भी कहते हैं।

कांगड़ा, कुल्लू व काश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नागवंशीय जातियाँ आज भी हैं। भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासियों के उपनामों, जैसे- धूमल, कालिया, अनंत और फाहल आदि पर गौर करें, तो भारत में समृद्ध नागवंशीय परंपरा के अस्तित्व को आज भी देखा जा सकता है। नागों ने अपने शासनकाल के दौरान वृषभ, त्रिशूल और सर्प के चित्रांकित सिक्के भी चलाए थे, जो पुरातात्विक उत्खनन के समय यत्र-तत्र मिलते रहते हैं। नागकालीन सिक्के काकिणी के नाम से जाने जाते थे, जो अलग-अलग भार के होते थे। इस तरह एक विस्तृत कालखंड का उल्लेख किया जा सकता है, जब समूचे अखंड भारत में और भारत के बाहर भी कई स्थानों पर नागवंशीय शासकों ने अपनी विजय पताका फहराई।

नागवंश की एक शाखा भारशिव भी है। सिर पर शिवलिंग धारण किए प्रतिमाएँ इनका प्रतीक है। नागवंश की इस शाखा के सबसे प्रतापी शासक धाराधीश मंजु थे। इनका राज्य उस समय धारा नगरी (वर्तमान धार) तक विस्तृत था, इसी कारण इन्हें धाराधीश की उपाधि मिली। मंजु के राज्यकाल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व रहा। गणपति नाग इस वंश के अंतिम शासक थे। विंध्य पर्वत श्रेणी की तलहटी में गुप्त शासकों का परोक्ष शासन था, उस समय नागवंशी शासक उनके मांडलिक हुआ करते थे। दोनों राजवंशों के बीच रोटी-बेटी के संबंध कायम थे। चूँकि नागवंशी शासक आदिवासी जीवन बिताते थे और विदेशी आक्रांताओं से अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान व अपनी स्वतंत्रता को बचाने के लिए प्राय: युद्ध में व्यस्त रहते थे, इस कारण उनके शासन के प्रतीक नहीं के बराबर ही मिलते हैं। चित्रकूट (उत्तरप्रदेश) के चर ग्राम का सोमनाथ मंदिर इसी कारण अद्वितीय स्थान रखता है, क्योंकि यह मंदिर भारत के समृद्ध नागवंश का दुर्लभ प्रतीक है। दुर्गम बीहड़ में स्थापित होने के कारण यह मंदिर आक्रमणकारियों-लुटेरों से बचा रहा। बीहड़ों ने इस मंदिर को अज्ञात व गुप्त-गोपन बनाए रखने का काम किया, किंतु अब इस मंदिर की स्थिति ऐसी है कि यदि इसे तत्काल सुरक्षित नहीं किया जाता, तो यह प्रतीक नष्ट हो जाएगा।

बुंदेलखंड अंचल के अंतर्गत चित्रकूट के श्रीसोमनाथ मंदिर के अतिरिक्त नागवंशी शासकों के अनेक अवशेष मिलते हैं। बुंदेलखंड अंचल में अनेक स्थान-नाम नागवंश से जुड़े हैं, जैसे- नचकांचन (नचना कुठार) पन्ना, भारगढ़ (बरगढ़), नगनेधी, भारकोट (बरकोठ) और भारगढ़ (बारीगढ़) आदि। ऐसे अनेक स्थान-नाम इस क्षेत्र में नागवंश के शासन-सूत्र की कड़ी को प्रमाणित करते हैं। इस तथ्य को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता कि इस क्षेत्र में ऐतिहासिक अन्वेषण करके पुरातन भारत की समृद्धि को जानने-समझने की जितनी बड़ी आवश्यकता थी, उतना ही कम कार्य इस क्षेत्र में किया गया है।

यह बात तो इतिहास की है, मगर इससे जुड़ा हुआ सांस्कृतिक-धार्मिक और पारिस्थितिकी तंत्रीय-पर्यावरणीय पक्ष भी है। नागवंशीय राजा सर्पपूजक थे। नागवंशियों के काल में सर्प की प्रतिमाएँ अनेक स्थानों पर स्थापित की गई थीं और आज भी कई जगह स्थापित हैं। ऐसा लगता है कि नदी, पर्वत, वृक्ष और तमाम जीव-जंतुओं के साथ ही नाग (सर्प) को धार्मिक आस्था के साथ जोड़कर तत्कालीन शासकों ने धरती के प्रति और अपनी आने वाली पीढ़ी के प्रति जिस दायित्वबोध का परिचय दिया था, वह आज भी हमारे लिए पथ-प्रदर्शक है, मार्गदर्शक है। संभवतः नागवंशी शासकों को आज के जीवविज्ञानियों से अधिक अनुभव था, जिस कारण खेती-किसानी में और धरती के पारिस्थितिकी तंत्र में सर्पों (नागों) के योगदान की महत्ता को समझते हुए उन्होंने नागों के नाम पर अपने वंश चलाए और सामान्य जन को नागों के प्रति आस्थावान बनाने के लिए नागपंचमी के रूप में पूजा का विधान भी प्रचलित-प्रसारित किया।

अनेक शताब्दियों से यह परंपरा अबाध रूप से चलती आ रही है। देश में विदेशी आक्रांता, विधर्मी आततायी आए भी, बस भी गए और चले भी गए.... किंतु हम धरती के प्रति अपने दायित्व को कभी नहीं भूले। जब अंग्रेजों ने भारत में भू-बंदोबस्त लागू किया, तब भी यह परंपरा चलती रही। देश के अन्य स्थानों के लिए बता पाना तो कठिन है, मगर बुंदेलखंड क्षेत्र में इस परंपरा को देखा जा सकता है। अपने बचपन में, जब घटनाओं-प्रसंगों को उनकी सार्थकता के दृष्टिकोण से देखना नहीं आता था, तब वे चीजें बड़े अलग तरीके से रोमांचित करती थीं। और आज बचपन की उन स्मृतियों को सोचता हूँ तो लगता है कि हमारी पीढ़ी ने अपने अतीत से मिली सीखों को, उनके द्वारा हमारे प्रति निभाए गए दायित्वों को इस तरह ताक पर रख दिया है, मानों अपनी आने वाली पीढ़ी को पुरानी अच्छी चीजें सौंपने का दायित्व हमारे ऊपर आकर समाप्त ही हो गया हो, और अब हम अपनी आने वाली संततियों को पुरानी अच्छी शिक्षाएँ सिखाने-बताने वाले नहीं हैं।

हमारे बचपन में, जब नागपंचमी का पर्व आता था, तब बड़ा उल्लास-उत्साह होता था। यह केवल बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी होता था। उनमें खासतौर से, जो खेती-किसानी से जुड़े होते थे। जो बड़े काश्तकार होते थे, उनके घर पर गाँव के लेखपाल-पटवारी जाते थे। उनके पास छापाखाने का छपा हुआ नागदेवता का चित्र होता था, जिसे वे दरवाजे के ऊपर गोबर से चिपकाते थे। फिर नागदेवता के चित्र की बड़े विधि-विधान से पूजा होती थी। सभी लोग कामना करते थे कि नई फसल, जो हमारे खेतों में तैयार होने जा रही है, उसे चूहों से बचाने के लिए नागदेवता कृपा करेंगे। बाद में सभी लोग पकवानों का मजा लेते थे। यह क्रम अपने घर पर कई बार देखा, अब तो स्मृतियों में ही देखने को मिलता है।

हिंदी के हमारे पुरखे.... महाकवि जगनिक की अमर कृति परमाल रासो, जिसे लोक-संस्कृति वर्ग में.... लोक के जीवन में आल्हा खंड के रूप में जाना है, उसकी रचना-भूमि बुंदेलखंड का महोबा नगर है। वर्तमान में यह इसी नाम से जनपद मुख्यालय भी है। राजा परमार्दिदेव की राजधानी महोबा अल्हैती (आल्हा की गायकी) के साथ देशावरी पान के लिए प्रसिद्ध है। महोबा का पान दूर-दूर तक जाता है। यहाँ पान की खेती होती है। बड़ी-बड़ी पान बरेजों से महोबा को पहचाना जाता है। पान की खेती करने वाले किसानों की नागदेवता में बड़ी आस्था है। पान की बेल को नागबेल संभवतः इसी कारण कहा जाता होगा। महोबा में नागौरिया मंदिर नागदेवता को समर्पित है। इस मंदिर की ध्वजा में पान का पत्ता और नागदेवता अंकित हैं। पान की खेती करने वाला चौरसिया समाज अपने कुलदेवता के मंदिर रूप में इस तीर्थ-स्थान के प्रति आस्था रखते हैं। प्रतिवर्ष नागपंचमी के अवसर पर यहाँ भव्य मेला लगता है। पूरे नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। नागपंचमी के दिन पान बरेजों से पान नहीं तोड़े जाते और न ही पान बेचे जाते हैं। यह पूरा दिन नागदेवता की पूजा का होता है। पान के किसानों का मानना है, कि नागदेवता की कृपा होगी, तो पान की खेती में हानि कम होगी और पैदावार अच्छी होगी।

बुंदेलखंड में पान के किसानों की भाँति सामान्य कृषक वर्ग भी पूरी आस्था के साथ नागपंचमी का पर्व मनाता है। पानी में फुलोए और उबाले हुए चनों को तलकर भोग-प्रसाद बनाया जाता है। भोग लगाया जाता है। बुंदेलखंड के परंपरागत पकवान, विशेष रूप से बेड़ही और लपसी बनाई जाती है। संध्याकाल में पत्ते के बने दोनों में कच्चा दूध भरकर घरों में अलग-अलग स्थानों में रखा जाता है। कहीं-कहीं खेतों में दीपक जलाए जाते हैं और दूध रखा जाता है। नाग पंचमी के पर्व को पूरी आस्था के साथ मनाते हुए किसान प्रार्थना करते हैं कि उनकी फसल अच्छी हो, खेत में फसल को कोई नुकसान न पहुँचे। अपने बचपन की स्मृतियों में नाग पंचमी का पर्वोत्सव आज भी रोमांचित करता है। बहुत सारे बदलावों के बीच यह पर्व भी बदला है। होली, विजयादशमी, दीपावली जैसे बड़े त्योहारों में जिस तरह की चहल-पहल होती है, वैसी नाग पंचमी जैसे पर्वों पर नहीं होती। इसके विपरीत नाग पंचमी का पावन पर्व कुछ लोगों के मध्य हास-उपहास का विषय भी बन जाता है। हिंदी के मुहावरे- आस्तीन का साँप और साँप को दूध पिलाना आदि को इस पुनीत पर्व के साथ जोड़कर व्यंग्य किए जाते हैं। मशीनीकरण-आधुनिकीकरण ने जिस तरह कृषि को बदला है, वैसे ही कृषि व कृषक से जुड़े पर्व-त्योहार-उत्सव-आयोजन भी प्रभावित हुए हैं। नाग पंचमी के उत्सव पर अब किसानों-काश्तकारों के घर लेखपालों और पटवारियों के जाने की परंपरा नहीं दिखती है। बहुराष्ट्रीयकरण ने खेती-किसानी के तौर-तरीकों को बदल दिया है, किसानों को बदल दिया है। व्यवस्था में लगे घुन ने पटवारी-लेखपालों को बदल दिया है।

बदलाव की इस बयार में जीव विज्ञानियों और कृषि विज्ञानियों के साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र के अध्येताओं को अपने अध्ययनों और शोध-अनुसंधानों के माध्यम से समाज को यह बताना होगा, कि हमारे पूर्वज नाग पंचमी के पर्व को आस्था के साथ जोड़कर सहज भाव से पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति, कृषि-व्यवस्था और ग्रामीण जीवन के प्रति अपने दायित्वों को निभा रहे थे। यह परंपरा उसी आस्था के साथ, श्रद्धा और विश्वास के साथ चलती रहनी चाहिए, ताकि यह निसर्ग बचा रह सके, पारिस्थितिकी तंत्र की कड़ियाँ टूटने न पाएँ। नागवंश के सूत्र भी हैं, उनके वंशज भी हैं और जरूरत भी है कि नागपंचमी के पीछे छिपे पवित्र उद्देश्य को पहचाना जाए और पूरी आस्था के साथ, पूरी श्रद्धा के साथ नागपंचमी मनाई जाए, सर्पों की प्रजातियों को बचाया जाए। इसके साथ ही लोक-जीवन के इस अद्वितीय-अनूठे लोक-संस्कार के संरक्षण के लिए भी जागरूक होने की आवश्यकता है, ताकि हमारी आने वाली संततियाँ कृषि-प्रधान देश की पहचान के साथ ही कृषक जीवन के विशिष्ट पक्षों को, माटी की महक को, माटी से जुड़े संस्कारों को, नाग पंचमी जैसे पर्वों को जान सकें, अपनी अगली पीढ़ी को यह परंपरा अग्रेषित कर सकें।

(अमृतसर से प्रकाशित प्रतिष्ठित अर्धवार्षिकी 'कश्फ़' के जून-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र