बुंदेलखंड
में नाग पंचमी
सावन के शुक्लपक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के
रूप में मनाया जाता है। बुंदेलखंड में नाग पंचमी का उत्सव विशेष स्थान रखता है। विशेष रूप से बुंदेलखंड
के किसानों के लिए यह उत्सव महत्त्वपूर्ण है। नाग पंचमी के त्योहार के साथ ही
विभिन्न पर्वों और त्योहारों का प्रारंभ होता है। बुंदेलखंड क्षेत्र में यह
मान्यता है, कि किसानों के पर्व-त्योहार नाग पंचमी के बाद प्रारंभ होते हैं। इस
तरह नाग पंचमी का त्योहार किसानों और खेती-किसानी से जुड़े विभिन्न
वर्गों-समुदायों का पहला त्योहार माना जाता है। यह मान्यता लोक की है। नाग पंचमी
का पर्व शास्त्र-सम्मत तो है ही, किंतु यह लोक-पर्व के रूप में अपनी विशेष मान्यता
रखता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ जोड़कर विभिन्न पूजा-अनुष्ठानों
के रूप में नाग पंचमी को भले ही स्थान दे दिया जाए, लेकिन इस त्योहार की गहराई से
पड़ताल करें, तो सिद्ध होता है, कि यह धार्मिक पर्व व पूजा-अनुष्ठान से कहीं अधिक
सामाजिक संस्कार का उपक्रम है। शास्त्रीय मान्यताओं में संस्कार भी धार्मिक
विधि-विधान के साथ संपन्न होते हैं। नाग पंचमी का पर्व कृषक जीवन का बड़ा संस्कार
है।
भारत कृषि प्रधान देश
है। यहाँ के पर्व-त्योहार भी कृषि से जुड़े हुए हैं। भारतीय समाज-व्यवस्था और
जीवन-पद्धति का अभिन्न संबंध कृषि कार्य व कृषक जीवन से रहा है। आज भले ही आधुनिक
कृषि तकनीकों और आधुनिक कृषि-पद्धतियों ने खेती-किसानी को व्यावसायिक बना दिया हो, लेकिन पुराने
समय में ऐसा नहीं था। खेती-किसानी में अर्थार्जन से कहीं अधिक लोक-कल्याण, सामाजिक
समरसता, बंधुत्वभाव और प्रमुख रूप से प्रकृति के प्रति... समस्त जीव-जंतुओं के
प्रति आत्मीय भाव की प्रमुखता थी। विभिन्न पर्व-त्योहारों में भी यह भाव परिलक्षित
होता था। गोवर्धन पूजा, गोपाष्टमी, बछ बारस व्रत और पोला त्योहार आदि कृषि से जुड़े
हुए हैं। नाग पंचमी इनमें सर्वप्रमुख है। यदि बुंदेलखंड के किसानों की बात कहें,
विशेष रूप से अपने ग्रामीण और कृषक परिवेश में देखे गए यथार्थ को जोड़ते हुए बात कहें,
तो नाग पंचमी का पर्व मुझे प्रकृति के प्रति समर्पित, मानवेतर जीवों के प्रति समर्पित
संस्कार से कम नहीं लगता। बुंदेलखंड के किसानों की पीढ़ियों में पिता से पुत्र और
पौत्रों आदि तक क्रमानुसार इस पर्व के साथ कृषक जीवन के संस्कार संततियों में
उतरते दिखाई देते हैं। इसी कारण लोक परंपरा में नाग पंचमी का विशेष महत्त्व है।
नाग पंचमी लोक जीवन में धार्मिक पर्व से कहीं अधिक लोक-प्रचलित संस्कार के पर्व के
रूप में प्रतिष्ठित है।
शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस तिथि को
कल्कि अवतार जन्म और तक्षक पूजा के लिए भी जाना जाता है। हिंदू
और जैन धर्मों में नागपूजा का बड़ा महत्त्व है। हिंदुओं के आराध्य शिवजी ने नाग को
अपने गले में धारण किया, श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्त कराकर कालिया
नाग को मोक्ष प्रदान किया, गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं नागों में अनंत
(शेषनाग) हूँ। विष्णु ने भी शेष-शयन करके नागों के प्रति धार्मिक आस्था को स्थापित
किया है। जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ को शेषनाग पर बैठे हुए दर्शाया गया है।
पुराणों में बताया गया है कि हमारी धरती शेषनाग के फन के ऊपर टिकी हुई है। इस तरह
नाग हमारी धार्मिक आस्था से जुड़े हैं और इसी कारण नाग पंचमी का भी अपना विशिष्ट धार्मिक महत्त्व है।
इतिहास
के दृष्टिकोण से देखने पर ज्ञात होता है, कि नागवंश का अतीत महाभारत काल से भी
पुराना है। महाभारत काल में पूरे भारत, विशेष रूप से हिमालय पर्वत की उपत्यकाओं और
कैलास पर्वत से लगे भूक्षेत्रों में नाग वंश का प्रभुत्त्व था। पौराणिक मान्यता के
अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री और कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू ने काश्मीर में आठ
पुत्रों- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक को
जन्म दिया था। इन्होंने समूचे काश्मीर में अपना राज्य स्थापित किया। पौराणिक
ग्रंथों में उल्लेख आता है, कि भृगुवंशी परशुराम ने धरती को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन
करके अपराधियों-आततायियों-आतंकियों से मुक्त कराया था। जब भगवान परशुराम आश्वस्त
हो गए, तो उन्होंने समूची विजित धरती कश्यप ऋषि को दान में दे दी। इस कारण धरती का
एक नाम काश्यपी भी है। कश्यप ऋषि ने दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियों से विवाह किया था। इनमें से अदिति से आदित्य
का जन्म हुआ, दिति से दैत्यों का तथा कद्रू से नागों का....। समग्र धरती पर नागों
का शासन कश्यप ऋषि के पुत्र होने के कारण भी माना जाता है। महाभारत के आस्तिक पर्व
में उल्लेख आता है, कि स्वयं ब्रह्मा जी ने कश्यप ऋषि को सर्पविद्या का उपदेश दिया
था, ताकि सर्पों को धरती से विलुप्त होने से बचाया जा सके। भारत की प्राचीन
विद्याओं में से एक सर्पविद्या भी है।
उत्तर
से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक संपूर्ण आर्यावर्त में नागों के अस्तित्व के
चिह्न मिलते हैं। नाग वंशावली के अध्ययन से इस समृद्ध वंश का पता चलता है। नाग वंशावली
में शेषनाग को नागों का पहला राजा माना जाता है। शेषनाग को अनंत नाम से भी जाना
जाता है। वर्तमान काश्मीर का अनंतनाग इनकी राजधानी हुआ करता था। वैसे ही तक्षशिला नगरी
तक्षक नाग की राजधानी हुआ करती थी। मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला
(तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल
चलाया था। वासुकि का राज्य कैलास पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। नाग वंशावली में
यह क्रम कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनंत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर,
धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना आदि शासकों से होते
हुए चलता रहा। ये सभी नाग को पूजने वाले नागकुल थे, इसीलिए इन्होंने नागों की प्रजातियों
पर अपने कुल का नाम रखा।
भारत
के अलग-अलग क्षेत्रों में इनका राज्य था। छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में नल
और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नागवंशियों का उल्लेख मिलता है। मध्यप्रदेश के
विदिशा में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि (यशनंदि) आदि
नागवंशीय राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। नाग जनजाति का शासन नर्मदा नदी घाटी
में भी था। हैहयों ने नागवंश को पराजित कर दिया था, बाद में कुषाण साम्राज्य के
पतन के बाद नागों ने अपना राज्य फिर से स्थापित किया और ये नवनाग कहलाए। इन
नवनागों ने अपने राज्य का विस्तार मथुरा, विदिशा, कांतिपुरी (कुंतवार) व पद्मावती
(पवैया) तक कर लिया था। नागा आदिवासियों का संबंध भी नागों से ही माना जाता है।
कुछ लोग नागदा नामक ग्राम को नागदाह की घटना, यानि जनमेजय के नागयज्ञ से जोड़ते
हैं। इनके साथ ही आज भी कई परिवारों में सर्प को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता
है। मालवा क्षेत्र में कई गाँवों में उनके चबूतरे बने हुए हैं। जनभाषा में उन्हें
भीलट बाबा भी कहते हैं।
कांगड़ा,
कुल्लू व काश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नागवंशीय जातियाँ आज भी हैं। भारत
के पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासियों के उपनामों, जैसे- धूमल, कालिया, अनंत और
फाहल आदि पर गौर करें, तो भारत में समृद्ध नागवंशीय परंपरा के अस्तित्व को आज भी
देखा जा सकता है। नागों ने अपने शासनकाल के दौरान वृषभ, त्रिशूल और सर्प के
चित्रांकित सिक्के भी चलाए थे, जो पुरातात्विक उत्खनन के समय यत्र-तत्र मिलते रहते
हैं। नागकालीन सिक्के काकिणी के नाम से जाने जाते थे, जो अलग-अलग भार के होते थे।
इस तरह एक विस्तृत कालखंड का उल्लेख किया जा सकता है, जब समूचे अखंड भारत में और
भारत के बाहर भी कई स्थानों पर नागवंशीय शासकों ने अपनी विजय पताका फहराई।
नागवंश
की एक शाखा भारशिव भी है। सिर पर शिवलिंग धारण किए प्रतिमाएँ इनका प्रतीक है।
नागवंश की इस शाखा के सबसे प्रतापी शासक धाराधीश मंजु थे। इनका राज्य उस समय धारा
नगरी (वर्तमान धार) तक विस्तृत था, इसी कारण इन्हें धाराधीश की उपाधि मिली। मंजु
के राज्यकाल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व रहा। गणपति नाग इस वंश के
अंतिम शासक थे। विंध्य पर्वत श्रेणी की तलहटी में गुप्त शासकों का परोक्ष शासन था,
उस समय नागवंशी शासक उनके मांडलिक हुआ करते थे। दोनों राजवंशों के बीच रोटी-बेटी
के संबंध कायम थे। चूँकि नागवंशी शासक आदिवासी जीवन बिताते थे और विदेशी
आक्रांताओं से अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान व अपनी स्वतंत्रता को बचाने के लिए
प्राय: युद्ध में व्यस्त रहते थे, इस कारण उनके शासन
के प्रतीक नहीं के बराबर ही मिलते हैं। चित्रकूट (उत्तरप्रदेश) के चर ग्राम का
सोमनाथ मंदिर इसी कारण अद्वितीय स्थान रखता है, क्योंकि यह मंदिर भारत के समृद्ध
नागवंश का दुर्लभ प्रतीक है। दुर्गम बीहड़ में स्थापित होने के कारण यह मंदिर आक्रमणकारियों-लुटेरों
से बचा रहा। बीहड़ों ने इस मंदिर को अज्ञात व गुप्त-गोपन बनाए रखने का काम किया,
किंतु अब इस मंदिर की स्थिति ऐसी है कि यदि इसे तत्काल सुरक्षित नहीं किया जाता,
तो यह प्रतीक नष्ट हो जाएगा।
बुंदेलखंड
अंचल के अंतर्गत चित्रकूट के श्रीसोमनाथ मंदिर के अतिरिक्त नागवंशी शासकों के अनेक
अवशेष मिलते हैं। बुंदेलखंड अंचल में अनेक स्थान-नाम नागवंश से जुड़े हैं, जैसे-
नचकांचन (नचना कुठार) पन्ना, भारगढ़ (बरगढ़), नगनेधी, भारकोट (बरकोठ) और भारगढ़
(बारीगढ़) आदि। ऐसे अनेक स्थान-नाम इस क्षेत्र में नागवंश के शासन-सूत्र की कड़ी
को प्रमाणित करते हैं। इस तथ्य को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता कि इस क्षेत्र में
ऐतिहासिक अन्वेषण करके पुरातन भारत की समृद्धि को जानने-समझने की जितनी बड़ी आवश्यकता
थी, उतना ही कम कार्य इस क्षेत्र में किया गया है।
यह
बात तो इतिहास की है, मगर इससे जुड़ा हुआ सांस्कृतिक-धार्मिक और पारिस्थितिकी
तंत्रीय-पर्यावरणीय पक्ष भी है। नागवंशीय राजा सर्पपूजक थे। नागवंशियों के काल में
सर्प की प्रतिमाएँ अनेक स्थानों पर स्थापित की गई थीं और आज भी कई जगह स्थापित
हैं। ऐसा लगता है कि नदी, पर्वत, वृक्ष और तमाम जीव-जंतुओं के साथ ही नाग (सर्प)
को धार्मिक आस्था के साथ जोड़कर तत्कालीन शासकों ने धरती के प्रति और अपनी आने
वाली पीढ़ी के प्रति जिस दायित्वबोध का परिचय दिया था, वह आज भी हमारे लिए पथ-प्रदर्शक
है, मार्गदर्शक है। संभवतः नागवंशी शासकों को आज के जीवविज्ञानियों से अधिक अनुभव
था, जिस कारण खेती-किसानी में और धरती के पारिस्थितिकी तंत्र में सर्पों (नागों)
के योगदान की महत्ता को समझते हुए उन्होंने नागों के नाम पर अपने वंश चलाए और सामान्य
जन को नागों के प्रति आस्थावान बनाने के लिए नागपंचमी के रूप में पूजा का विधान भी
प्रचलित-प्रसारित किया।
अनेक
शताब्दियों से यह परंपरा अबाध रूप से चलती आ रही है। देश में विदेशी आक्रांता,
विधर्मी आततायी आए भी, बस भी गए और चले भी गए.... किंतु हम धरती के प्रति अपने दायित्व
को कभी नहीं भूले। जब अंग्रेजों ने भारत में भू-बंदोबस्त लागू किया, तब भी यह
परंपरा चलती रही। देश के अन्य स्थानों के लिए बता पाना तो कठिन है, मगर बुंदेलखंड
क्षेत्र में इस परंपरा को देखा जा सकता है। अपने बचपन में, जब घटनाओं-प्रसंगों को
उनकी सार्थकता के दृष्टिकोण से देखना नहीं आता था, तब वे चीजें बड़े अलग तरीके से
रोमांचित करती थीं। और आज बचपन की उन स्मृतियों को सोचता हूँ तो लगता है कि हमारी
पीढ़ी ने अपने अतीत से मिली सीखों को, उनके द्वारा हमारे प्रति निभाए गए दायित्वों
को इस तरह ताक पर रख दिया है, मानों अपनी आने वाली पीढ़ी को पुरानी अच्छी चीजें
सौंपने का दायित्व हमारे ऊपर आकर समाप्त ही हो गया हो, और अब हम अपनी आने वाली
संततियों को पुरानी अच्छी शिक्षाएँ सिखाने-बताने वाले नहीं हैं।
हमारे
बचपन में, जब नागपंचमी का पर्व आता था, तब बड़ा उल्लास-उत्साह होता था। यह केवल
बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी होता था। उनमें खासतौर से, जो खेती-किसानी से
जुड़े होते थे। जो बड़े काश्तकार होते थे, उनके घर पर गाँव के लेखपाल-पटवारी जाते
थे। उनके पास छापाखाने का छपा हुआ नागदेवता का चित्र होता था, जिसे वे दरवाजे के
ऊपर गोबर से चिपकाते थे। फिर नागदेवता के चित्र की बड़े विधि-विधान से पूजा होती
थी। सभी लोग कामना करते थे कि नई फसल, जो हमारे खेतों में तैयार होने जा रही है,
उसे चूहों से बचाने के लिए नागदेवता कृपा करेंगे। बाद में सभी लोग पकवानों का मजा
लेते थे। यह क्रम अपने घर पर कई बार देखा, अब तो स्मृतियों में ही देखने को मिलता
है।
हिंदी
के हमारे पुरखे.... महाकवि जगनिक की अमर कृति परमाल रासो, जिसे लोक-संस्कृति वर्ग
में.... लोक के जीवन में आल्हा खंड के रूप में जाना है, उसकी रचना-भूमि बुंदेलखंड
का महोबा नगर है। वर्तमान में यह इसी नाम से जनपद मुख्यालय भी है। राजा
परमार्दिदेव की राजधानी महोबा अल्हैती (आल्हा की गायकी) के साथ देशावरी पान के लिए
प्रसिद्ध है। महोबा का पान दूर-दूर तक जाता है। यहाँ पान की खेती होती है।
बड़ी-बड़ी पान बरेजों से महोबा को पहचाना जाता है। पान की खेती करने वाले किसानों
की नागदेवता में बड़ी आस्था है। पान की बेल को नागबेल संभवतः इसी कारण कहा जाता
होगा। महोबा में नागौरिया मंदिर नागदेवता को समर्पित है। इस मंदिर की ध्वजा में
पान का पत्ता और नागदेवता अंकित हैं। पान की खेती करने वाला चौरसिया समाज अपने
कुलदेवता के मंदिर रूप में इस तीर्थ-स्थान के प्रति आस्था रखते हैं। प्रतिवर्ष
नागपंचमी के अवसर पर यहाँ भव्य मेला लगता है। पूरे नगर में शोभायात्रा निकाली जाती
है। नागपंचमी के दिन पान बरेजों से पान नहीं तोड़े जाते और न ही पान बेचे जाते
हैं। यह पूरा दिन नागदेवता की पूजा का होता है। पान के किसानों का मानना है, कि
नागदेवता की कृपा होगी, तो पान की खेती में हानि कम होगी और पैदावार अच्छी होगी।
बुंदेलखंड
में पान के किसानों की भाँति सामान्य कृषक वर्ग भी पूरी आस्था के साथ नागपंचमी का
पर्व मनाता है। पानी में फुलोए और उबाले हुए चनों को तलकर भोग-प्रसाद बनाया जाता
है। भोग लगाया जाता है। बुंदेलखंड के परंपरागत पकवान, विशेष रूप से बेड़ही और लपसी
बनाई जाती है। संध्याकाल में पत्ते के बने दोनों में कच्चा दूध भरकर घरों में
अलग-अलग स्थानों में रखा जाता है। कहीं-कहीं खेतों में दीपक जलाए जाते हैं और दूध
रखा जाता है। नाग पंचमी के पर्व को पूरी आस्था के साथ मनाते हुए किसान प्रार्थना
करते हैं कि उनकी फसल अच्छी हो, खेत में फसल को कोई नुकसान न पहुँचे। अपने बचपन की
स्मृतियों में नाग पंचमी का पर्वोत्सव आज भी रोमांचित करता है। बहुत सारे बदलावों
के बीच यह पर्व भी बदला है। होली, विजयादशमी, दीपावली जैसे बड़े त्योहारों में जिस
तरह की चहल-पहल होती है, वैसी नाग पंचमी जैसे पर्वों पर नहीं होती। इसके विपरीत
नाग पंचमी का पावन पर्व कुछ लोगों के मध्य हास-उपहास का विषय भी बन जाता है। हिंदी
के मुहावरे- आस्तीन का साँप और साँप को दूध पिलाना आदि को इस पुनीत पर्व के साथ
जोड़कर व्यंग्य किए जाते हैं। मशीनीकरण-आधुनिकीकरण ने जिस तरह कृषि को बदला है,
वैसे ही कृषि व कृषक से जुड़े पर्व-त्योहार-उत्सव-आयोजन भी प्रभावित हुए हैं। नाग
पंचमी के उत्सव पर अब किसानों-काश्तकारों के घर लेखपालों और पटवारियों के जाने की
परंपरा नहीं दिखती है। बहुराष्ट्रीयकरण ने खेती-किसानी के तौर-तरीकों को बदल दिया
है, किसानों को बदल दिया है। व्यवस्था में लगे घुन ने पटवारी-लेखपालों को बदल दिया
है।
बदलाव
की इस बयार में जीव विज्ञानियों और कृषि विज्ञानियों के साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र
के अध्येताओं को अपने अध्ययनों और शोध-अनुसंधानों के माध्यम से समाज को यह बताना
होगा, कि हमारे पूर्वज नाग पंचमी के पर्व को आस्था के साथ जोड़कर सहज भाव से
पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति, कृषि-व्यवस्था और ग्रामीण जीवन के प्रति अपने
दायित्वों को निभा रहे थे। यह परंपरा उसी आस्था के साथ, श्रद्धा और विश्वास के साथ
चलती रहनी चाहिए, ताकि यह निसर्ग बचा रह सके, पारिस्थितिकी तंत्र की कड़ियाँ टूटने
न पाएँ। नागवंश के सूत्र भी हैं, उनके वंशज भी हैं और जरूरत भी है कि नागपंचमी के
पीछे छिपे पवित्र उद्देश्य को पहचाना जाए और पूरी आस्था के साथ, पूरी श्रद्धा के
साथ नागपंचमी मनाई जाए, सर्पों की प्रजातियों को बचाया जाए। इसके साथ ही लोक-जीवन
के इस अद्वितीय-अनूठे लोक-संस्कार के संरक्षण के लिए भी जागरूक होने की आवश्यकता
है, ताकि हमारी आने वाली संततियाँ कृषि-प्रधान देश की पहचान के साथ ही कृषक जीवन
के विशिष्ट पक्षों को, माटी की महक को, माटी से जुड़े संस्कारों को, नाग पंचमी
जैसे पर्वों को जान सकें, अपनी अगली पीढ़ी को यह परंपरा अग्रेषित कर सकें।
(अमृतसर से प्रकाशित प्रतिष्ठित अर्धवार्षिकी 'कश्फ़' के जून-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)
- राहुल मिश्र
