Saturday, 5 September 2026

ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा




 

ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा


ब्लैक होल डी इंडिका, गजेंद्र तिवारी जी का सद्यः प्रकाशित उपन्यास है। गजेंद्र जी मूलतः व्यंग्यकार हैं। उनके चिंतन-पक्ष का प्रतिनिधि ग्रंथ- ‘चेतना के विवेकाश्व’ है, जो एक चिंतनपूर्ण आलेख-संग्रह है। इसमें उनकी चिंतन-दृष्टि की बानगी मिलती है। स्फुट कविता-संग्रह भी गजेंद्र जी की लेखनी से आकार पाए हैं। अब यह उपन्यास देकर उन्होंने उपन्यास विधा की ओर प्रयाण किया है। यह परिचय उनके सद्यः प्रकाशित उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपलब्ध है। इस परिचय के सहारे उपन्यासकार के लेखन की तासीर को जानना और फिर उपन्यास में गहरे उतरना आसान लगा, इसलिए इस परिचय से बात को प्रारंभ करने का प्रयास यहाँ किया गया है।

देश की स्वाधीनता के बाद स्थितियाँ बहुत तेजी के साथ बदलीं। विभाजन की विभीषिका को झेलकर उबर रहे देश में ‘अपना राज और अपना शासन’ का भाव समग्र समाज के विकास की दिशा में बढ़ने के स्थान पर ‘आत्म-विकास’ की दिशा में बढ़ने लगा। अव्यवस्था और अराजकता के मध्य समाज का एक बड़ा वर्ग स्वतंत्रता की आवश्यकता, उपादेयता और प्राप्तियों की आलोचना भी करने लगा था। ऐसी स्थितियों से उत्पन्न स्वतंत्रता के प्रति मोहभंग का व्यापक प्रभाव साहित्य की विविध विधाओं में देखने को मिलता है। उपन्यास में भी इसे देखा जा सकता है। कथन की गहराई और तीक्ष्णता के साथ कई ऐसे उपन्यास, जो स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरांत उपजे मोहभंग को खुलकर व्यक्त करते हैं, उनका संदर्भ यहाँ पर दिया जा सकता है। ऐसे उपन्यासों में राजनीति की चाल, उसका चरित्र और चेहरा, समाज की विषमताएँ, विद्रूपताएँ, मानसिक विकृतियों से उपजी अनेक विघटनकारी स्थितियाँ खुलकर प्रकट हुई हैं। समाज का हर वर्ग ही इन उपन्यासों में दिखता है। ऐसे उपन्यासों के वर्ग से इतर ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ को देख सकते हैं, जहाँ यथार्थ का यथातथ्य चित्रण तो है, लेकिन व्यंग्यात्मक होकर ऐसा तीव्र प्रभाव उत्पन्न करता है, कि अनेक यथार्थवादी उपन्यास भी पीछे रह जाते हैं। बिहारी के दोहों के लिए कहा जाता है- ‘सतसइया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर... देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर....।‘ यह उपन्यास देखन में छोटा नहीं है। पाँच सौ पंद्रह पृष्ठों का अच्छा-खासा वजनदार उपन्यास है, और इस दृष्टि से गंभीर नहीं, बहुत गंभीर घाव करने की सामर्थ्य रखता है।

गजेंद्र जी वकालत के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। कोर्ट-कचहरी से उनका व्यावसायिक नाता है, लेकिन ऐसे तो अनेक अधिवक्ता और न्यायाधीश होंगे, जो कोर्ट-कचहरी से जुड़े हुए होंगे। लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इतर समाज को देखने का एक पक्ष गजेंद्र जी के साथ उनके इस व्यवसाय में जुड़ता है, जो बहुत मार्के का है। न्यायालय और कचहरियाँ सामान्यतः अच्छी दृष्टि से नहीं देखी जातीं। इन्हें तो ‘बलाओं’ की श्रेणी में रखा जाता है। जो अदालत और अस्पताल से बचा रह जाए, वही सुखी है। लेकिन समाज का सच्चा चेहरा देखना हो, तो अदालतों से अच्छा विकल्प भी नहीं मिलता है। न्यायालयों में आने वाले दोनों पक्षों में से एक अपराधी-दोषी और दूसरा पीड़ित-असहाय होता है। कितने ही निर्दोष होते हैं, जो सजा पाते हैं, और अनेक अपराधी होकर भी छूट जाते हैं। इन सबके बीच समाज का चाल-चरित्र और चेहरा दिखता है। भय, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंक, अन्याय, अराजकता, अश्लीलता, अभद्रता आदि न जाने क्या-क्या अनेक तरीके से, विभिन्न रूपों में दिखता है। समाज की सच्चाई दिखती है, बदलते समय के चेहरे... उसके चाल-चरित्र आदि का बेबाक साक्षात्कार तो अदालत-कचहरी में ही मिलता है। गजेंद्र जी के पास इस दृष्टि से कच्ची सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी, जिसके सहारे उन्होंने समय और समाज का क्रूर यथार्थ व्यक्त किया है।

यथार्थ को कहना, और ऐसा कहना, कि होंठ हँसते रहें, चिंतन चलता रहे, विचारों की कड़ी जुड़ती रहे और हृदय में बात गहरे तक उतरती रहे...। कहन की यह कला श्रेष्ठ व्यंग्य में होती है। यथार्थ को बेबाक व्यक्त करने वाले उपन्यास यदि व्यंग्य की छौंक लिए हुए हों, तो संप्रेषण की गहनता, तीक्ष्णता और वजन कई गुना बढ़ जाता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ ऐसा ही उपन्यास है। उपन्यासकार के अनुभव, उनकी लेखनी का व्यंग्यात्मक पुट और यथार्थ को बेरोक-बेटोक कहने की सामर्थ्य ने इस उपन्यास को विशिष्ट बनाया है।

उपन्यास में परत-दर-परत ऐसे पक्ष खुलते चले जाते हैं, जिनके साथ जुड़कर न केवल कथा का विस्तार होता है, वरन् ऐसी सच्चाई उजागर होती है, जिससे आँखें मिलाना सहज नहीं रहता। प्रायः आश्चर्य की उस सीमा पर स्वयं को खड़े पाना होता है, जो आज के समय की सच्चाई को देखते हुए पहले अनुभूत नहीं करने या कर पाने की स्थितियों से दो-चार होते हुए सामने आता है। कथा का प्रारंभ नब्बे वर्ष पूर्ण कर चुके पंडित बलीराम अवस्थी के जन्मदिन के उपलक्ष्य पर आयोजित समारोह से होता है। पंडित जी अपने क्षेत्र के वरिष्ठतम अधिवक्ता हैं, कानून के अच्छे ज्ञाता हैं, तर्कशील, दूरदर्शी और सहृदय व्यक्ति हैं। उनकी नब्बे वर्ष की श्रीआयु और उनका व्यवसाय यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि उनके पास अनुभव की कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम में उपस्थित उनके निकटस्थ परिचित लोग उचित अवसर देखकर अवस्थी जी निवेदन करते हैं, कि वे अपने संचित अनुभवों की साझेदारी सबके साथ करें, और इसके लिए सभी लोग प्रतिदिन उनके पास एकत्र हुआ करेंगे।

अवस्थी जी इसके लिए पहले तो तैयार नहीं होते, लेकिन लोगों के लगातार अनुरोध के कारण वे सहमति देते हैं। अवस्थी जी कथा सुनाते हैं, कथा का क्रमशः प्रवाह चलता है, और यह प्रवाह उपन्यास को विस्तार देता है। आर.पी. वाजपेयी, मुंशी संतोष, वकील नाइक, मजिस्ट्रेट बघेल, अदालत के कर्मचारी, फर्राश और अदालत में हाजिर होने वाले पैरोकारों को लेकर उपन्यास में अदालत परिसर का चित्र खींचा जाता है। अदालत परिसर में वकीलों के बैठने की व्यवस्था कतार में अपने-अपने पसरे सजाकर बैठे हुए सब्जी वालों से तुलना करती दिखाई देती है। उपन्यासकार का संकेत लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ की दुर्दशा की ओर होता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस से कहीं अधिक महत्त्व रखता है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का प्रमुख अंग अधिवक्ता होते हैं। बार और बेंच, अर्थात् न्यायालय और अधिवक्ता एक-दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों के बीच का समन्वय, तालमेल और दोनों की समान सक्रियता आमजन के लिए न्याय का मार्ग सुलभ कराती है, विधायिका और कार्यपालिका पर लगाम लगाती है। “अधिवक्ताओं की गणना बुद्धिजीवी वर्ग में की जाती है। उन्हें समाज का क्रीम माना जाता है। न्यायदान की प्रक्रिया में उनका महत्त्वपूर्ण रोल रहता है। वे कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं के ज्ञाता माने जाते हैं। अदालतों में अगर वकील न हों तो हाहाकार मच जाएगा और अदालतों का कामकाज ठप्प हो जाएगा। कल्पना कीजिए, आप या कोई अन्य व्यक्ति कोई अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए प्रयागराज या अन्य किसी तीर्थ स्थान  गए हुए हैं वहाँ अगर पुजारी या पण्डे न मिलें तो कैसी स्थिति निर्मित होगी। वकीलों को अदालत-कचहरी रूपी तीर्थ स्थान का पण्डा या पुरोहित माना जाए तो कोई अनुचित बात नहीं होगी।” (पृ. 12)

लेकिन यह सब कहाँ से संभव हो सकेगा, जब अधिवक्ता दयनीय स्थिति में होंगे, सब्जी वालों की तरह पसरे बिछाकर बैठे होंगे। उपन्यासकार न्यायालयों के इस महत्त्वपूर्ण अंग की दयनीय दशा के साथ ही वकीलों की चालबाजियों को भी खुलकर प्रकट करते हैं। अटवाल वकील साहब के लिए आदर्श स्थिति यही है, कि किसी भी तरह से मुकदमे को जीतो। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। कानून को जानने से काम चले, तब भी भला और साहब को जानने से काम चले, तब भी भला....।

उपन्यासकार का प्रयास वकीलों की बैठक का विवरण देने के सहारे न्यायालयों की स्थिति की पूर्वपीठिका को प्रस्तुत करने का होता है। न्यायालयों में अलग-अलग पदों पर कार्यरत कर्मचारी होते हैं। ये सभी वकीलों से एक अलग संबंध के तहत जुड़े होते हैं। यह संबंध उस ‘दस्तूरी’ का ईमानदारी के साथ निर्वहन करता है, जिसकी जड़ें बेईमानी और भ्रष्टाचार की जमीन से खाद-पानी पाती हैं। उपन्यास के देवांगन वकील साहब इसे स्नेहन का नाम देते हैं। वे इसके विषेशज्ञ हैं। अदालत में पक्षकारों की पुकार लगाने वाले कर्मचारी से लगाकर पेशकार, रीडर, डिपोजीशन राइटर और फिर साहब तक पूरी कड़ी बनी हुई है, दस्तूरी प्रस्तुत करने की। हर किसी की काम के अनुसार राशि तय है। बीस रुपये से लगाकर पचास, सौ, हजार तक....। दस्तूरी भी दो तरह की है- सद्भावनापूर्वक दी जाने वाली, अर्थात् सही और जायज काम के लिए दी जाने वाली। दुर्भावनापूर्वक दस्तूरी ठीक इसके विपरीत है, अर्थात अवैधानिक कृत्य के लिए दी जाने वाली। अदालतों में सद्भावनापूर्वक दस्तूरी का ही चलन दिखता है, कह सकते हैं, कि दस्तूरी कैसी भी हो, न्याय के मंदिर में सद्भावनापूर्ण ही हो जाती है। वैसे कुछ भी यहाँ छिपा नहीं रहता। “मुद्रा का यह हस्तांतरण इतने खुले रूप में होता है कि उसे न देख पाने की बात सिर्फ वही स्वनामधन्य सज्जन कह सकते हैं जिन्होंने ऐसा करने का हठ धारण किया हुआ है। न्यायालय में डॉयस पर विराजने वाले पीठासीन न्यायिक अधिकारी आदि यह बातें कहें तो एक बार उस पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि उनके और बाबू के बीच के दृष्टि-पथ पर पक्षकार खड़ा होता है, जिसके कारण उनकी नजर में यह मौद्रिक आदान-प्रदान नहीं आ पाता।“ (पृ. 21)

बघेल साहब और सेमुअल टोप्पो साहब आदि के सहारे उपन्यासकार ने उन तमाम न्यायाधीशों की दिनचर्या और कार्य-पद्धति का सटीक विवरण प्रस्तुत किया है, जिनके सहारे देश की न्याय-व्यवस्था संचालित होती है। भागवती, रतिराम  बैशाखूराम आदि ऐसे पक्षकार हैं, जो न्यायालय से अपने पक्ष में न्याय पाने हेतु अनवरत प्रतीक्षारत हैं। बैशाखूराम जैसे अभियुक्त सजा से बचने के लिए और अपने पक्ष में निर्णय प्राप्त करने के लिए साहब और मेमसाहब तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। कुछ भेंट-सौगात देकर अपने अनुकूल स्थिति बनाना चाहते हैं। भट्टी वाले लोग भी ऐसे ही हैं। कई सेठ-महाजन भी जानते हैं, कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को ‘साधने’ से कई काम बन जाते हैं। नए अधिकारी के आते ही सौगातें पहुँचाने का क्रम चालू हो जाता है। न्यायालय के अधिकारियों के लिए साहब के निजी सहायक या पेशकार आदि व्यवस्था कराते हैं, और वह भी पूरी निष्ठा के साथ, जैसे कि यह व्यवस्था भी सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का ही अंग है।

भ्रष्टाचार न्यायपालिका में भले ही कम स्तर पर हो, लेकिन विधायिका और कार्यपालिका को यह पर्याप्त संभावनाएँ प्रदान कर देता है। वस्तुतः यह एक गठजोड़ बनाता है। उपन्यास इस गठजोड़ की ओर संकेत करते हुए कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतों को उजागर करता है। इनके साथ जनप्रतिनिधि और ठेकेदार भी जुड़े हुए हैं। हरदीप गरचा जैसे ठेकेदार और गोयल जैसे सरकारी अधिकारी हर विभाग में पाए जाते हैं। ये मिल-जुलकर सरकारी धन का बंदरबाँट करते हैं। “जनप्रतिनिधि, सरकारी अमला और ठेकेदार इन तीनों की तिकड़ी ने ऐसा तिलिस्म रचा है कि लोकतंत्र अपनी राह भूल गया है। आवें का आवाँ ही बिगड़ गया है। राज्य अपना कार्य करने के लिए राज-कर्मचारियों की नियुक्ति करता है। उन्हें आकर्षक वेतन देता है, तरह-तरह की सुविधाएँ देता है। ओहदा देता है। पद-पदवी और रुतबा देता है। लेकिन यह सामान्यजन नहीं कह रहे हैं, चाणक्य कह रहे हैं कि राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी मुख्यतः धोखेबाज और बेईमान होते हैं और राजा की संपत्ति को हड़पने को तत्पर रहते हैं। राजा को इनसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बचाना चाहिए।” (पृ. 131-132)

केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, सामाजिक विघटन, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का ह्रास और इस सबके कारण दुष्कर होते जीवन की विषम और दयनीय स्थितियों का चित्रण न्यायालय में सुनवाई के लिए आने वाले विभिन्न मुकदमों के माध्यम से होता है। वृद्ध रामेश्वर अग्रवाल एक पीड़ित व्यक्ति-मात्र नहीं हैं, जो न्यायालय में अपने लिए न्याय माँगने आए हैं; वरन् वे उस वृहत्तर समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ आधुनिकता और भौतिकता ने पारिवारिक संबंधों की मिठास को लील लिया है। जहाँ पिता-पुत्र के, माँ-बेटे के, पति-पत्नी के संबंध केवल और केवल स्वार्थ पर टिके हुए हैं। टोप्पो साहब के माध्यम से विवाहेतर संबंधों की विकृति को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है। स्त्री सशक्तिकरण की सच्चाई भी उपन्यासकार से छिपी नहीं है। उपन्यासकार ने बहुत बेबाकी के साथ स्त्री सशक्तिकरण की असलियत उजागर की है। न्यायालय के एक कर्मचारी की पत्नी अपने पति को गालियाँ दे रही है, वह भी कोर्ट के परिसर में सबके सामने। उपन्यासकार ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूरे प्रसंग को प्रस्तुत किया है-

“अभी वकील  लोग बाहर निकल ही रहे थे कि कोर्ट के पिछले दरवाजे की तरफ से एक तेज नारी कंठ की आवाज आई, जिसे सुनकर लोग ठिठक गए। श्री आचार्या भी चौंक गए। आवाज काफी तीखी थी और ऐसा लग रहा था जैसे गुस्से का इजहार किया जा रहा हो।

‘रोगहा, भड़ुवा, तोर मुँह म कीरा परे', नारी कंठ से निःसृत रेल की सीटी के समान तीखी आवाज ने एकबारगी ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

श्री आचार्या ने पूछा, "यह किस सशक्त महिला की आवाज है?" उनकी आवाज में विनोद का पुट था।

"हाँ, यह सशक्त महिला की ही आवाज है। अपने पति पर गालियों की बौछार कर रही है रोज की तरह”, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष ने कहा, "इसका पति न्यायालय का जमादार है। उसी पर बरस रही है।"

श्री आचार्या को यह नई स्थिति बड़ी दिलचस्प प्रतीत हुई। एक पत्नी द्वारा अपने पति को इस तरह खुले आम सार्वजनिक स्थान में डाँटना, बल्कि गालियाँ देना महिला सशक्तीकरण का एक प्रैक्टिकल मामला नजर आया।“ (पृ.38)

हिरदे, रामबगस यादव, निरंजन, उत्तराबाई, रतनलाल और मंजरी जैसे अनेक पात्र उपन्यास में तमाम सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों, भ्रष्ट आचरणों, अन्याय-अपराध-आतंक की दुर्दमनीय स्थितियों को व्याख्यायित करने के माध्यम बनकर सामने आते हैं। परिवार ही नहीं, समाज की स्थिति भी अत्यंत विकट और विषम है। स्वार्थ, लोभ, लालच और अनैतिकता ने समाज को अनेक स्तरों में तोड़ रखा है। सामान्य जन के लिए सहज जीवन दुर्लभ हो गया है। हिरदे जैसे गँवई-गाँव के लोग अपने छोटे-से परिवार में हँसी-खुशी रहना चाहते हैं, लेकिन आपराधिक तत्त्व इन्हें जीने नहीं देते। अनेक ऐसे अपराधी, जिनका अतीत अपराध की दुनिया में विवश होकर उतरने की कहानी बयाँ करता है, समाज में बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।

भू-माफिया, तस्कर, खनन-माफिया, घूसखोर, अपराधी, आतंकी, धोखेबाज, छली-प्रपंची.... उपन्यास में न केवल उपस्थित हैं, वरन् समाज की सच्चाई को खुलकर प्रकट कर रहे हैं। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी ऐसी है, कि इन अपराधियों के लिए बेरोक-टोक अपराध में संलग्न रहने के लिए पर्याप्त अवसर भी उपलब्ध करा देती है, और न्यायालय से मिलने वाली सजा से बचकर निकलने का रास्ता भी उपलब्ध करा देती है। देश की स्वाधीनता के बाद यह मानकर, कि अपने राज में...स्वराज में देश प्रगति की ओर अग्रसर होगा, लेकिन इसके ठीक विपरीत बनती राजनीतिक स्थितियों ने, नेताओं के साथ अपराधियों और माफियाओं के गठजोड़ ने स्थितियों को बुरी तरह से बिगाड़ा है। उपन्यास इन विषम स्थितियों को बहुत गहरे उतरकर न केवल देखता है, वरन् सामाजिक संदर्भों में इसके प्रभाव की व्यापक पड़ताल भी करता है।

जेल से बाहर निकले झनकूराम की दशा के सहारे उपन्यासकार ने न केवल जेल के अंदर की सच्चाई को व्यंग्यात्मक भाव से व्यक्त किया है, वरन् लोकतंत्र की सच्चाई को, वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा को भी स्पष्ट किया है। जेल में निरुद्ध झनकूराम ने दो दिन में केवल दो ही बिस्किट खाए। बिस्किट भी भूसे के बने हुए थे। परोसे गए खाने में दाल और खिचड़ी का अंतर पता करना... दाल के नाम पर परोसे गए पानी में दाल को खोजना उनके लिए बहुत कठिन था। पाँच रुपये में एक बीड़ी खरीदकर झनकूराम को एक ही कश लेने को मिला, बाकी तो कैदियों ने छीनकर निपटा दी...। जेलों के अंदर दो तरह की व्यवस्थाएँ मिलती हैं। धन खर्च करने पर सुविधाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के मध्य भी हम किस तरह से मध्यकालीन युग में जी रहे हैं, इसे जेलों की व्यवस्था के सहारे उपन्यासकार ने व्यक्त किया है-

“गुलामों का व्यापार जब होता था तब उनके साथ जो बर्बर सलूक किया जाता था, वैसा ही बर्बर व्यवहार आज इक्कीसवीं सदी में जेल में निरुद्ध साधनहीन बंदियों के साथ किया जाता है।

यही सच है हमारे इस जनकल्याणकारी लोकतंत्र का। और यही वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा का नग्न सत्य।” (पृ. 432)

उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपन्यास को व्याख्यायित करती हुई उक्ति है- “जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाले महाशून्य की गाथा।” अपराध, भ्रष्टाचार, आतंक, अनैतिकता, असहिष्णुता, असामाजिकता, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का क्षरण, सामाजिकता का ह्रास, संवेदनाओं की शून्यता के अनेक-अनेक रूप उपन्यास में प्रकट होते जाते हैं। यदि जीवन इन सबस मुक्त होता, तो संभवतः सुखद और सुंदर होता, बहुवर्णी होता....इसे इंद्रधनुषी रंगों के साम्य से इंगित किया है। ये इंद्रधनुषी रंग, जीवन का सौंदर्य जिस महाशून्य में विलीन हो रहा है, वह ब्लैक होल की तरह है। शून्य से कई गुना अधिक घातक है। शून्य तो किसी संख्या के साथ गुणा करने पर गुणननफल में ही शून्य करता है, लेकिन समय और समाज में उभर आए महाशून्य से तो जुड़कर भी.... हटकर-घटकर भी... किसी भी दशा में अस्तित्व का मिटना सुनिश्चित है। यही आज के समय की कड़वी सच्चाई है।

आगा हसन अमानत की रचना है- इंदर सभा। कमलेश्वर का उपन्यास है- कितने पाकिस्तान। इसी तरह मिस्र के उपन्यासकार नागिब महफूज का उपन्यास है- बिफोर द थ्रोन। अंग्रेजी की प्रसिद्ध कृति है- टी.एस. इलियट की द वेस्टलैंड। इन कृतियों में समय की अदालत है, जिसके समक्ष पीड़ित और अभियुक्त दोनों ही प्रस्तुत होते हैं। न्यायालय सही-गलत का निर्णय करता है। समय का चक्र घूम-घूमकर सच का अन्वेषण करता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में भी न्यायालय है, लेकिन यह न्यायालय महाशून्य की विभीषिका से बचा हुआ नहीं है। यह अदालत किसी अलग लोक की नहीं है। इसके सभी अंग- न्यायिक अधिकारी, न्यायालय के कर्मचारी, अधिवक्तागण और यहाँ तक कि इन सबसे जुड़े अन्य लोग भी सामान्य मानव हैं, राग-द्वेष, वैर-प्रीत, लोभ-लालच, स्वार्थ और भ्रष्ट-आचरण से अछूते नहीं हैं। इस कारण यह न्यायालय अत्यंत व्यावहारिक होकर समय और समाज की सच्चाई को देख पाता है। पंडित अवस्थी जी  भले ही वरिष्ठ अधिवक्ता हों, लेकिन डिपोजिशन राइटर (साक्ष्य लेखक) की भाँति उपन्यास के अंत में दिखते हैं। नब्बे वर्षों की श्रीआयु में जुटाए अनेक साक्ष्यों, अदालती कामकाज में संलग्न रहते हुए अनेक स्थितियों को वे साझा करते हैं-

“पंडित अवस्थी की भारी आवाज बहुत दूर से किंतु साफ और घंटे की गूँज-सी सुनाई दे रही है, ‘फिर व्यावहारिक रूप में दैनंदिन के कार्य-कलापों में हर वर्ग के व्यक्ति के द्वारा छोटे-छोटे कार्यों में भी गहरे से पैठ गया है- लालच और स्वार्थ, और उत्पन्न कर रहा है- अन्याय हर पल, हर दिन, हर स्थान पर, हर लेन-देन और हर व्यवहार पर। सर्वव्यापी अंधकार की तरह।” (पृ. 515)

पंडित अवस्थी जी की धाराप्रवाह वाणी के सम्मोहन में बँधे लोग उस भयावहता से स्वयं का साक्षात्कार करा रहे थे, जिसके साथ दिन-रात जीवन बिताते हुए अनुभूत नहीं किया होगा, या अनुभूति की गहनता चिंता के स्तर तक नहीं पहुँची होगी। पंडित अवस्थी जी एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नहीं, नब्बे वर्ष के अनुभवों को सँजोए हुए एक सामान्य मानव के रूप में नहीं, वरन् जीवंत-साक्षात् यथार्थ-वक्ता, भविष्य-द्रष्टा के रूप में बोल रहे हैं। समय महामानव बनकर मानों अपनी बात कह रहा है, अपने आज और कल को बता रहा है-

 “इंसान को जानवर से अलग चिह्नांकित करने वाली जो सामूहिक सभ्यता और जिम्मेदारी की समझ होती है, परिपक्वता होती है; उससे, दुर्भाग्यवश, नागरिकगण बहुत दूर हैं। और उनके व्यक्तिगत या इंडीविजुअल कर्मों के तुच्छ सोच-भावना आधारों ने अंतरिक्ष के ‘ब्लैक होल’ अस्तित्व, जो कि प्रकाश किरणों तक को अपने चंगुल से बाहर आने नहीं देता; की भाँति ही एक महाविशाल ‘ब्लैक होल’ का निर्माण कर लिया है। जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाला महाशून्य। निगल रहा सब कुछ। उजाला तो दिख नहीं रहा किसी भी क्षेत्र में।” (पृ. 515)

ब्लैक होल विशालकाय तारों के ढहने से, उनके अवसान होने से बनते हैं। मानवीय मूल्य, सिद्धांत, मान्यताएँ, जीवन-चिंतन आदि का अवसान, इनके पतन की स्थितियाँ भी मानवता के लिए, जीवन के लिए ब्लैक होल का निर्माण कर देती हैं। मूल्यों का ह्रास, जीवनीय सिद्धांतों का क्षरण न केवल परिवार, वरन् समाज और राष्ट्र की सकारात्मकता को नष्ट करता है, स्थितियों को बिगाड़ता है। स्थितियों को अनवरत बिगड़ते हुए देखने-भोगने की परिणति निराशा में होती है। पंडित अवस्थी जी की पीढ़ी ही नहीं, वे सभी पीढ़ियाँ, जो सुन रहीं हैं, अनुभूत कर रहीं हैं, एक तरह से अचंभित भी हैं, और सच से साक्षात्कार करके हताश-निराश भी हैं। इतना ही नहीं, स्थितियों से समझौता करते हुए महाशून्य में समा जाने के लिए स्वयं को समर्पित भी कर बैठी हैं। लेकिन इन पीढ़ियों के बाद की भी एक पीढ़ी है, जो अभी अपने बचपन में है। उसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है, कि वह सहज ही स्वयं को स्थितियों का दास बना दे। उपन्यासकार की दृष्टि इस पीढ़ी तक भी जाती है। अवस्थी जी की अथाई के पास खेल रहे बच्चों में से एक उस उजाले की ओर इंगित करता है, जो ‘ब्लैक होल’ में अभी तक समाया नहीं है। सारे बच्चे उसके साथ मिलकर देखते हैं। आस्था गहन हो जाती है। प्रार्थना का भाव उतर पड़ता है। तुलसी चौरे के नीचे प्रकाशित दीपक आशा का संचार करता है। भले ही ब्रह्मांड में प्रसारित प्रकाश ब्लैक होल में समा जाए... भले ही बड़े-बड़े प्रकाश-पुंज मिट जाएँ, महाशून्य के द्वारा निगल लिए जाएँ, लेकिन तुलसी चौरे का दीया टिमटिमाता रहेगा। अपनी सीमित क्षमता में ही सही, उजाले को जिलाए रखेगा। आस्था बलवती रहेगी....और एक दिन अवश्य ही महाशून्य से निकलकर जीवन के इंद्रधनुषी रंग विस्तार पाएँगे। बच्चों की जैसी हँसी, उनके जैसा खिलंदड़ापन लौट आएगा, जीवन फिर सुखद-सुखमय और उल्लासपूर्ण होगा।

भावी की कल्पना सकारात्मक होकर कर्मफल के सिद्धांत को बल प्रदान करती है। लखनऊ के रहने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अजय प्रसून ने ‘अनागत कविता आंदोलन’ को सत्तर के दशक में प्रस्तुत किया था। ‘कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना’ के ध्येय-वाक्य पर केंद्रित अनागत कविता आंदोलन की अनेक प्रतिनिधि कविताएँ ऐसी सकारात्मकता के साथ पूर्ण होती हैं। कहानी और उपन्यास विधाओं में भी अनागत का दर्शन होता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में अनागत, अर्थात् आने वाले कल के लिए सुखद कामना बहुत बड़ा संकेत देती है। समय की अदालत सही और गलत पर नीर-क्षीर विवेक के न्याय से आश्वस्त करती है, कि कल के अच्छे होने की संभावनाएँ अभी शून्य नहीं हुई हैं। इसी कारण यह उपन्यास इक्कीस बैठता है। पढ़े जाने, और बार-बार पढ़े जाने की संभावना ही नहीं, अनिवार्यता को भी शिद्दत के साथ अनुभूत कराता यह उपन्यास अपनी सरल-सहज भाषा और रुचिकर शैली के बल पर पाठक को न केवल स्वयं के साथ बाँध लेता है, वरन् पाठकीय चेतना को झंकृत करते हुए चिंतन-मनन, और साथ ही आत्ममंथन के लिए विवश कर देता है।

समग्रतः, इस पठनीय और संग्रहणीय कृति से हिंदी के उपन्यास जगत् को समृद्ध करने और व्यंग्यात्मक उपन्यास की विधा को सबल करने हेतु कृतिकार गजेंद्र तिवारी जी के प्रति अनेक साधुवाद।

(गजेन्द्र तिवारी कृत 'ब्लैक होल डी इंडिका' हिंदी व्यंग्य उपन्यास पर विविधतापूर्ण समकालीन समीक्षात्मक अध्ययन, प्रयास प्रकाशन, बिलासपुर, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

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