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Saturday, 5 September 2026

ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा




 

ब्लैक होल डी इंडिका : व्यंग्य के सहारे सच की गाथा


ब्लैक होल डी इंडिका, गजेंद्र तिवारी जी का सद्यः प्रकाशित उपन्यास है। गजेंद्र जी मूलतः व्यंग्यकार हैं। उनके चिंतन-पक्ष का प्रतिनिधि ग्रंथ- ‘चेतना के विवेकाश्व’ है, जो एक चिंतनपूर्ण आलेख-संग्रह है। इसमें उनकी चिंतन-दृष्टि की बानगी मिलती है। स्फुट कविता-संग्रह भी गजेंद्र जी की लेखनी से आकार पाए हैं। अब यह उपन्यास देकर उन्होंने उपन्यास विधा की ओर प्रयाण किया है। यह परिचय उनके सद्यः प्रकाशित उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपलब्ध है। इस परिचय के सहारे उपन्यासकार के लेखन की तासीर को जानना और फिर उपन्यास में गहरे उतरना आसान लगा, इसलिए इस परिचय से बात को प्रारंभ करने का प्रयास यहाँ किया गया है।

देश की स्वाधीनता के बाद स्थितियाँ बहुत तेजी के साथ बदलीं। विभाजन की विभीषिका को झेलकर उबर रहे देश में ‘अपना राज और अपना शासन’ का भाव समग्र समाज के विकास की दिशा में बढ़ने के स्थान पर ‘आत्म-विकास’ की दिशा में बढ़ने लगा। अव्यवस्था और अराजकता के मध्य समाज का एक बड़ा वर्ग स्वतंत्रता की आवश्यकता, उपादेयता और प्राप्तियों की आलोचना भी करने लगा था। ऐसी स्थितियों से उत्पन्न स्वतंत्रता के प्रति मोहभंग का व्यापक प्रभाव साहित्य की विविध विधाओं में देखने को मिलता है। उपन्यास में भी इसे देखा जा सकता है। कथन की गहराई और तीक्ष्णता के साथ कई ऐसे उपन्यास, जो स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरांत उपजे मोहभंग को खुलकर व्यक्त करते हैं, उनका संदर्भ यहाँ पर दिया जा सकता है। ऐसे उपन्यासों में राजनीति की चाल, उसका चरित्र और चेहरा, समाज की विषमताएँ, विद्रूपताएँ, मानसिक विकृतियों से उपजी अनेक विघटनकारी स्थितियाँ खुलकर प्रकट हुई हैं। समाज का हर वर्ग ही इन उपन्यासों में दिखता है। ऐसे उपन्यासों के वर्ग से इतर ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ को देख सकते हैं, जहाँ यथार्थ का यथातथ्य चित्रण तो है, लेकिन व्यंग्यात्मक होकर ऐसा तीव्र प्रभाव उत्पन्न करता है, कि अनेक यथार्थवादी उपन्यास भी पीछे रह जाते हैं। बिहारी के दोहों के लिए कहा जाता है- ‘सतसइया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर... देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर....।‘ यह उपन्यास देखन में छोटा नहीं है। पाँच सौ पंद्रह पृष्ठों का अच्छा-खासा वजनदार उपन्यास है, और इस दृष्टि से गंभीर नहीं, बहुत गंभीर घाव करने की सामर्थ्य रखता है।

गजेंद्र जी वकालत के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। कोर्ट-कचहरी से उनका व्यावसायिक नाता है, लेकिन ऐसे तो अनेक अधिवक्ता और न्यायाधीश होंगे, जो कोर्ट-कचहरी से जुड़े हुए होंगे। लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इतर समाज को देखने का एक पक्ष गजेंद्र जी के साथ उनके इस व्यवसाय में जुड़ता है, जो बहुत मार्के का है। न्यायालय और कचहरियाँ सामान्यतः अच्छी दृष्टि से नहीं देखी जातीं। इन्हें तो ‘बलाओं’ की श्रेणी में रखा जाता है। जो अदालत और अस्पताल से बचा रह जाए, वही सुखी है। लेकिन समाज का सच्चा चेहरा देखना हो, तो अदालतों से अच्छा विकल्प भी नहीं मिलता है। न्यायालयों में आने वाले दोनों पक्षों में से एक अपराधी-दोषी और दूसरा पीड़ित-असहाय होता है। कितने ही निर्दोष होते हैं, जो सजा पाते हैं, और अनेक अपराधी होकर भी छूट जाते हैं। इन सबके बीच समाज का चाल-चरित्र और चेहरा दिखता है। भय, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंक, अन्याय, अराजकता, अश्लीलता, अभद्रता आदि न जाने क्या-क्या अनेक तरीके से, विभिन्न रूपों में दिखता है। समाज की सच्चाई दिखती है, बदलते समय के चेहरे... उसके चाल-चरित्र आदि का बेबाक साक्षात्कार तो अदालत-कचहरी में ही मिलता है। गजेंद्र जी के पास इस दृष्टि से कच्ची सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी, जिसके सहारे उन्होंने समय और समाज का क्रूर यथार्थ व्यक्त किया है।

यथार्थ को कहना, और ऐसा कहना, कि होंठ हँसते रहें, चिंतन चलता रहे, विचारों की कड़ी जुड़ती रहे और हृदय में बात गहरे तक उतरती रहे...। कहन की यह कला श्रेष्ठ व्यंग्य में होती है। यथार्थ को बेबाक व्यक्त करने वाले उपन्यास यदि व्यंग्य की छौंक लिए हुए हों, तो संप्रेषण की गहनता, तीक्ष्णता और वजन कई गुना बढ़ जाता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ ऐसा ही उपन्यास है। उपन्यासकार के अनुभव, उनकी लेखनी का व्यंग्यात्मक पुट और यथार्थ को बेरोक-बेटोक कहने की सामर्थ्य ने इस उपन्यास को विशिष्ट बनाया है।

उपन्यास में परत-दर-परत ऐसे पक्ष खुलते चले जाते हैं, जिनके साथ जुड़कर न केवल कथा का विस्तार होता है, वरन् ऐसी सच्चाई उजागर होती है, जिससे आँखें मिलाना सहज नहीं रहता। प्रायः आश्चर्य की उस सीमा पर स्वयं को खड़े पाना होता है, जो आज के समय की सच्चाई को देखते हुए पहले अनुभूत नहीं करने या कर पाने की स्थितियों से दो-चार होते हुए सामने आता है। कथा का प्रारंभ नब्बे वर्ष पूर्ण कर चुके पंडित बलीराम अवस्थी के जन्मदिन के उपलक्ष्य पर आयोजित समारोह से होता है। पंडित जी अपने क्षेत्र के वरिष्ठतम अधिवक्ता हैं, कानून के अच्छे ज्ञाता हैं, तर्कशील, दूरदर्शी और सहृदय व्यक्ति हैं। उनकी नब्बे वर्ष की श्रीआयु और उनका व्यवसाय यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि उनके पास अनुभव की कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम में उपस्थित उनके निकटस्थ परिचित लोग उचित अवसर देखकर अवस्थी जी निवेदन करते हैं, कि वे अपने संचित अनुभवों की साझेदारी सबके साथ करें, और इसके लिए सभी लोग प्रतिदिन उनके पास एकत्र हुआ करेंगे।

अवस्थी जी इसके लिए पहले तो तैयार नहीं होते, लेकिन लोगों के लगातार अनुरोध के कारण वे सहमति देते हैं। अवस्थी जी कथा सुनाते हैं, कथा का क्रमशः प्रवाह चलता है, और यह प्रवाह उपन्यास को विस्तार देता है। आर.पी. वाजपेयी, मुंशी संतोष, वकील नाइक, मजिस्ट्रेट बघेल, अदालत के कर्मचारी, फर्राश और अदालत में हाजिर होने वाले पैरोकारों को लेकर उपन्यास में अदालत परिसर का चित्र खींचा जाता है। अदालत परिसर में वकीलों के बैठने की व्यवस्था कतार में अपने-अपने पसरे सजाकर बैठे हुए सब्जी वालों से तुलना करती दिखाई देती है। उपन्यासकार का संकेत लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ की दुर्दशा की ओर होता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस से कहीं अधिक महत्त्व रखता है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का प्रमुख अंग अधिवक्ता होते हैं। बार और बेंच, अर्थात् न्यायालय और अधिवक्ता एक-दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों के बीच का समन्वय, तालमेल और दोनों की समान सक्रियता आमजन के लिए न्याय का मार्ग सुलभ कराती है, विधायिका और कार्यपालिका पर लगाम लगाती है। “अधिवक्ताओं की गणना बुद्धिजीवी वर्ग में की जाती है। उन्हें समाज का क्रीम माना जाता है। न्यायदान की प्रक्रिया में उनका महत्त्वपूर्ण रोल रहता है। वे कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं के ज्ञाता माने जाते हैं। अदालतों में अगर वकील न हों तो हाहाकार मच जाएगा और अदालतों का कामकाज ठप्प हो जाएगा। कल्पना कीजिए, आप या कोई अन्य व्यक्ति कोई अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए प्रयागराज या अन्य किसी तीर्थ स्थान  गए हुए हैं वहाँ अगर पुजारी या पण्डे न मिलें तो कैसी स्थिति निर्मित होगी। वकीलों को अदालत-कचहरी रूपी तीर्थ स्थान का पण्डा या पुरोहित माना जाए तो कोई अनुचित बात नहीं होगी।” (पृ. 12)

लेकिन यह सब कहाँ से संभव हो सकेगा, जब अधिवक्ता दयनीय स्थिति में होंगे, सब्जी वालों की तरह पसरे बिछाकर बैठे होंगे। उपन्यासकार न्यायालयों के इस महत्त्वपूर्ण अंग की दयनीय दशा के साथ ही वकीलों की चालबाजियों को भी खुलकर प्रकट करते हैं। अटवाल वकील साहब के लिए आदर्श स्थिति यही है, कि किसी भी तरह से मुकदमे को जीतो। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। कानून को जानने से काम चले, तब भी भला और साहब को जानने से काम चले, तब भी भला....।

उपन्यासकार का प्रयास वकीलों की बैठक का विवरण देने के सहारे न्यायालयों की स्थिति की पूर्वपीठिका को प्रस्तुत करने का होता है। न्यायालयों में अलग-अलग पदों पर कार्यरत कर्मचारी होते हैं। ये सभी वकीलों से एक अलग संबंध के तहत जुड़े होते हैं। यह संबंध उस ‘दस्तूरी’ का ईमानदारी के साथ निर्वहन करता है, जिसकी जड़ें बेईमानी और भ्रष्टाचार की जमीन से खाद-पानी पाती हैं। उपन्यास के देवांगन वकील साहब इसे स्नेहन का नाम देते हैं। वे इसके विषेशज्ञ हैं। अदालत में पक्षकारों की पुकार लगाने वाले कर्मचारी से लगाकर पेशकार, रीडर, डिपोजीशन राइटर और फिर साहब तक पूरी कड़ी बनी हुई है, दस्तूरी प्रस्तुत करने की। हर किसी की काम के अनुसार राशि तय है। बीस रुपये से लगाकर पचास, सौ, हजार तक....। दस्तूरी भी दो तरह की है- सद्भावनापूर्वक दी जाने वाली, अर्थात् सही और जायज काम के लिए दी जाने वाली। दुर्भावनापूर्वक दस्तूरी ठीक इसके विपरीत है, अर्थात अवैधानिक कृत्य के लिए दी जाने वाली। अदालतों में सद्भावनापूर्वक दस्तूरी का ही चलन दिखता है, कह सकते हैं, कि दस्तूरी कैसी भी हो, न्याय के मंदिर में सद्भावनापूर्ण ही हो जाती है। वैसे कुछ भी यहाँ छिपा नहीं रहता। “मुद्रा का यह हस्तांतरण इतने खुले रूप में होता है कि उसे न देख पाने की बात सिर्फ वही स्वनामधन्य सज्जन कह सकते हैं जिन्होंने ऐसा करने का हठ धारण किया हुआ है। न्यायालय में डॉयस पर विराजने वाले पीठासीन न्यायिक अधिकारी आदि यह बातें कहें तो एक बार उस पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि उनके और बाबू के बीच के दृष्टि-पथ पर पक्षकार खड़ा होता है, जिसके कारण उनकी नजर में यह मौद्रिक आदान-प्रदान नहीं आ पाता।“ (पृ. 21)

बघेल साहब और सेमुअल टोप्पो साहब आदि के सहारे उपन्यासकार ने उन तमाम न्यायाधीशों की दिनचर्या और कार्य-पद्धति का सटीक विवरण प्रस्तुत किया है, जिनके सहारे देश की न्याय-व्यवस्था संचालित होती है। भागवती, रतिराम  बैशाखूराम आदि ऐसे पक्षकार हैं, जो न्यायालय से अपने पक्ष में न्याय पाने हेतु अनवरत प्रतीक्षारत हैं। बैशाखूराम जैसे अभियुक्त सजा से बचने के लिए और अपने पक्ष में निर्णय प्राप्त करने के लिए साहब और मेमसाहब तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। कुछ भेंट-सौगात देकर अपने अनुकूल स्थिति बनाना चाहते हैं। भट्टी वाले लोग भी ऐसे ही हैं। कई सेठ-महाजन भी जानते हैं, कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को ‘साधने’ से कई काम बन जाते हैं। नए अधिकारी के आते ही सौगातें पहुँचाने का क्रम चालू हो जाता है। न्यायालय के अधिकारियों के लिए साहब के निजी सहायक या पेशकार आदि व्यवस्था कराते हैं, और वह भी पूरी निष्ठा के साथ, जैसे कि यह व्यवस्था भी सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का ही अंग है।

भ्रष्टाचार न्यायपालिका में भले ही कम स्तर पर हो, लेकिन विधायिका और कार्यपालिका को यह पर्याप्त संभावनाएँ प्रदान कर देता है। वस्तुतः यह एक गठजोड़ बनाता है। उपन्यास इस गठजोड़ की ओर संकेत करते हुए कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतों को उजागर करता है। इनके साथ जनप्रतिनिधि और ठेकेदार भी जुड़े हुए हैं। हरदीप गरचा जैसे ठेकेदार और गोयल जैसे सरकारी अधिकारी हर विभाग में पाए जाते हैं। ये मिल-जुलकर सरकारी धन का बंदरबाँट करते हैं। “जनप्रतिनिधि, सरकारी अमला और ठेकेदार इन तीनों की तिकड़ी ने ऐसा तिलिस्म रचा है कि लोकतंत्र अपनी राह भूल गया है। आवें का आवाँ ही बिगड़ गया है। राज्य अपना कार्य करने के लिए राज-कर्मचारियों की नियुक्ति करता है। उन्हें आकर्षक वेतन देता है, तरह-तरह की सुविधाएँ देता है। ओहदा देता है। पद-पदवी और रुतबा देता है। लेकिन यह सामान्यजन नहीं कह रहे हैं, चाणक्य कह रहे हैं कि राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी मुख्यतः धोखेबाज और बेईमान होते हैं और राजा की संपत्ति को हड़पने को तत्पर रहते हैं। राजा को इनसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बचाना चाहिए।” (पृ. 131-132)

केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, सामाजिक विघटन, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का ह्रास और इस सबके कारण दुष्कर होते जीवन की विषम और दयनीय स्थितियों का चित्रण न्यायालय में सुनवाई के लिए आने वाले विभिन्न मुकदमों के माध्यम से होता है। वृद्ध रामेश्वर अग्रवाल एक पीड़ित व्यक्ति-मात्र नहीं हैं, जो न्यायालय में अपने लिए न्याय माँगने आए हैं; वरन् वे उस वृहत्तर समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ आधुनिकता और भौतिकता ने पारिवारिक संबंधों की मिठास को लील लिया है। जहाँ पिता-पुत्र के, माँ-बेटे के, पति-पत्नी के संबंध केवल और केवल स्वार्थ पर टिके हुए हैं। टोप्पो साहब के माध्यम से विवाहेतर संबंधों की विकृति को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है। स्त्री सशक्तिकरण की सच्चाई भी उपन्यासकार से छिपी नहीं है। उपन्यासकार ने बहुत बेबाकी के साथ स्त्री सशक्तिकरण की असलियत उजागर की है। न्यायालय के एक कर्मचारी की पत्नी अपने पति को गालियाँ दे रही है, वह भी कोर्ट के परिसर में सबके सामने। उपन्यासकार ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूरे प्रसंग को प्रस्तुत किया है-

“अभी वकील  लोग बाहर निकल ही रहे थे कि कोर्ट के पिछले दरवाजे की तरफ से एक तेज नारी कंठ की आवाज आई, जिसे सुनकर लोग ठिठक गए। श्री आचार्या भी चौंक गए। आवाज काफी तीखी थी और ऐसा लग रहा था जैसे गुस्से का इजहार किया जा रहा हो।

‘रोगहा, भड़ुवा, तोर मुँह म कीरा परे', नारी कंठ से निःसृत रेल की सीटी के समान तीखी आवाज ने एकबारगी ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

श्री आचार्या ने पूछा, "यह किस सशक्त महिला की आवाज है?" उनकी आवाज में विनोद का पुट था।

"हाँ, यह सशक्त महिला की ही आवाज है। अपने पति पर गालियों की बौछार कर रही है रोज की तरह”, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष ने कहा, "इसका पति न्यायालय का जमादार है। उसी पर बरस रही है।"

श्री आचार्या को यह नई स्थिति बड़ी दिलचस्प प्रतीत हुई। एक पत्नी द्वारा अपने पति को इस तरह खुले आम सार्वजनिक स्थान में डाँटना, बल्कि गालियाँ देना महिला सशक्तीकरण का एक प्रैक्टिकल मामला नजर आया।“ (पृ.38)

हिरदे, रामबगस यादव, निरंजन, उत्तराबाई, रतनलाल और मंजरी जैसे अनेक पात्र उपन्यास में तमाम सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों, भ्रष्ट आचरणों, अन्याय-अपराध-आतंक की दुर्दमनीय स्थितियों को व्याख्यायित करने के माध्यम बनकर सामने आते हैं। परिवार ही नहीं, समाज की स्थिति भी अत्यंत विकट और विषम है। स्वार्थ, लोभ, लालच और अनैतिकता ने समाज को अनेक स्तरों में तोड़ रखा है। सामान्य जन के लिए सहज जीवन दुर्लभ हो गया है। हिरदे जैसे गँवई-गाँव के लोग अपने छोटे-से परिवार में हँसी-खुशी रहना चाहते हैं, लेकिन आपराधिक तत्त्व इन्हें जीने नहीं देते। अनेक ऐसे अपराधी, जिनका अतीत अपराध की दुनिया में विवश होकर उतरने की कहानी बयाँ करता है, समाज में बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।

भू-माफिया, तस्कर, खनन-माफिया, घूसखोर, अपराधी, आतंकी, धोखेबाज, छली-प्रपंची.... उपन्यास में न केवल उपस्थित हैं, वरन् समाज की सच्चाई को खुलकर प्रकट कर रहे हैं। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी ऐसी है, कि इन अपराधियों के लिए बेरोक-टोक अपराध में संलग्न रहने के लिए पर्याप्त अवसर भी उपलब्ध करा देती है, और न्यायालय से मिलने वाली सजा से बचकर निकलने का रास्ता भी उपलब्ध करा देती है। देश की स्वाधीनता के बाद यह मानकर, कि अपने राज में...स्वराज में देश प्रगति की ओर अग्रसर होगा, लेकिन इसके ठीक विपरीत बनती राजनीतिक स्थितियों ने, नेताओं के साथ अपराधियों और माफियाओं के गठजोड़ ने स्थितियों को बुरी तरह से बिगाड़ा है। उपन्यास इन विषम स्थितियों को बहुत गहरे उतरकर न केवल देखता है, वरन् सामाजिक संदर्भों में इसके प्रभाव की व्यापक पड़ताल भी करता है।

जेल से बाहर निकले झनकूराम की दशा के सहारे उपन्यासकार ने न केवल जेल के अंदर की सच्चाई को व्यंग्यात्मक भाव से व्यक्त किया है, वरन् लोकतंत्र की सच्चाई को, वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा को भी स्पष्ट किया है। जेल में निरुद्ध झनकूराम ने दो दिन में केवल दो ही बिस्किट खाए। बिस्किट भी भूसे के बने हुए थे। परोसे गए खाने में दाल और खिचड़ी का अंतर पता करना... दाल के नाम पर परोसे गए पानी में दाल को खोजना उनके लिए बहुत कठिन था। पाँच रुपये में एक बीड़ी खरीदकर झनकूराम को एक ही कश लेने को मिला, बाकी तो कैदियों ने छीनकर निपटा दी...। जेलों के अंदर दो तरह की व्यवस्थाएँ मिलती हैं। धन खर्च करने पर सुविधाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के मध्य भी हम किस तरह से मध्यकालीन युग में जी रहे हैं, इसे जेलों की व्यवस्था के सहारे उपन्यासकार ने व्यक्त किया है-

“गुलामों का व्यापार जब होता था तब उनके साथ जो बर्बर सलूक किया जाता था, वैसा ही बर्बर व्यवहार आज इक्कीसवीं सदी में जेल में निरुद्ध साधनहीन बंदियों के साथ किया जाता है।

यही सच है हमारे इस जनकल्याणकारी लोकतंत्र का। और यही वेलफेअर स्टेट की हमारी अवधारणा का नग्न सत्य।” (पृ. 432)

उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर उपन्यास को व्याख्यायित करती हुई उक्ति है- “जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाले महाशून्य की गाथा।” अपराध, भ्रष्टाचार, आतंक, अनैतिकता, असहिष्णुता, असामाजिकता, पारिवारिक विघटन, मानवीय मूल्यों का क्षरण, सामाजिकता का ह्रास, संवेदनाओं की शून्यता के अनेक-अनेक रूप उपन्यास में प्रकट होते जाते हैं। यदि जीवन इन सबस मुक्त होता, तो संभवतः सुखद और सुंदर होता, बहुवर्णी होता....इसे इंद्रधनुषी रंगों के साम्य से इंगित किया है। ये इंद्रधनुषी रंग, जीवन का सौंदर्य जिस महाशून्य में विलीन हो रहा है, वह ब्लैक होल की तरह है। शून्य से कई गुना अधिक घातक है। शून्य तो किसी संख्या के साथ गुणा करने पर गुणननफल में ही शून्य करता है, लेकिन समय और समाज में उभर आए महाशून्य से तो जुड़कर भी.... हटकर-घटकर भी... किसी भी दशा में अस्तित्व का मिटना सुनिश्चित है। यही आज के समय की कड़वी सच्चाई है।

आगा हसन अमानत की रचना है- इंदर सभा। कमलेश्वर का उपन्यास है- कितने पाकिस्तान। इसी तरह मिस्र के उपन्यासकार नागिब महफूज का उपन्यास है- बिफोर द थ्रोन। अंग्रेजी की प्रसिद्ध कृति है- टी.एस. इलियट की द वेस्टलैंड। इन कृतियों में समय की अदालत है, जिसके समक्ष पीड़ित और अभियुक्त दोनों ही प्रस्तुत होते हैं। न्यायालय सही-गलत का निर्णय करता है। समय का चक्र घूम-घूमकर सच का अन्वेषण करता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में भी न्यायालय है, लेकिन यह न्यायालय महाशून्य की विभीषिका से बचा हुआ नहीं है। यह अदालत किसी अलग लोक की नहीं है। इसके सभी अंग- न्यायिक अधिकारी, न्यायालय के कर्मचारी, अधिवक्तागण और यहाँ तक कि इन सबसे जुड़े अन्य लोग भी सामान्य मानव हैं, राग-द्वेष, वैर-प्रीत, लोभ-लालच, स्वार्थ और भ्रष्ट-आचरण से अछूते नहीं हैं। इस कारण यह न्यायालय अत्यंत व्यावहारिक होकर समय और समाज की सच्चाई को देख पाता है। पंडित अवस्थी जी  भले ही वरिष्ठ अधिवक्ता हों, लेकिन डिपोजिशन राइटर (साक्ष्य लेखक) की भाँति उपन्यास के अंत में दिखते हैं। नब्बे वर्षों की श्रीआयु में जुटाए अनेक साक्ष्यों, अदालती कामकाज में संलग्न रहते हुए अनेक स्थितियों को वे साझा करते हैं-

“पंडित अवस्थी की भारी आवाज बहुत दूर से किंतु साफ और घंटे की गूँज-सी सुनाई दे रही है, ‘फिर व्यावहारिक रूप में दैनंदिन के कार्य-कलापों में हर वर्ग के व्यक्ति के द्वारा छोटे-छोटे कार्यों में भी गहरे से पैठ गया है- लालच और स्वार्थ, और उत्पन्न कर रहा है- अन्याय हर पल, हर दिन, हर स्थान पर, हर लेन-देन और हर व्यवहार पर। सर्वव्यापी अंधकार की तरह।” (पृ. 515)

पंडित अवस्थी जी की धाराप्रवाह वाणी के सम्मोहन में बँधे लोग उस भयावहता से स्वयं का साक्षात्कार करा रहे थे, जिसके साथ दिन-रात जीवन बिताते हुए अनुभूत नहीं किया होगा, या अनुभूति की गहनता चिंता के स्तर तक नहीं पहुँची होगी। पंडित अवस्थी जी एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नहीं, नब्बे वर्ष के अनुभवों को सँजोए हुए एक सामान्य मानव के रूप में नहीं, वरन् जीवंत-साक्षात् यथार्थ-वक्ता, भविष्य-द्रष्टा के रूप में बोल रहे हैं। समय महामानव बनकर मानों अपनी बात कह रहा है, अपने आज और कल को बता रहा है-

 “इंसान को जानवर से अलग चिह्नांकित करने वाली जो सामूहिक सभ्यता और जिम्मेदारी की समझ होती है, परिपक्वता होती है; उससे, दुर्भाग्यवश, नागरिकगण बहुत दूर हैं। और उनके व्यक्तिगत या इंडीविजुअल कर्मों के तुच्छ सोच-भावना आधारों ने अंतरिक्ष के ‘ब्लैक होल’ अस्तित्व, जो कि प्रकाश किरणों तक को अपने चंगुल से बाहर आने नहीं देता; की भाँति ही एक महाविशाल ‘ब्लैक होल’ का निर्माण कर लिया है। जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को निगलने वाला महाशून्य। निगल रहा सब कुछ। उजाला तो दिख नहीं रहा किसी भी क्षेत्र में।” (पृ. 515)

ब्लैक होल विशालकाय तारों के ढहने से, उनके अवसान होने से बनते हैं। मानवीय मूल्य, सिद्धांत, मान्यताएँ, जीवन-चिंतन आदि का अवसान, इनके पतन की स्थितियाँ भी मानवता के लिए, जीवन के लिए ब्लैक होल का निर्माण कर देती हैं। मूल्यों का ह्रास, जीवनीय सिद्धांतों का क्षरण न केवल परिवार, वरन् समाज और राष्ट्र की सकारात्मकता को नष्ट करता है, स्थितियों को बिगाड़ता है। स्थितियों को अनवरत बिगड़ते हुए देखने-भोगने की परिणति निराशा में होती है। पंडित अवस्थी जी की पीढ़ी ही नहीं, वे सभी पीढ़ियाँ, जो सुन रहीं हैं, अनुभूत कर रहीं हैं, एक तरह से अचंभित भी हैं, और सच से साक्षात्कार करके हताश-निराश भी हैं। इतना ही नहीं, स्थितियों से समझौता करते हुए महाशून्य में समा जाने के लिए स्वयं को समर्पित भी कर बैठी हैं। लेकिन इन पीढ़ियों के बाद की भी एक पीढ़ी है, जो अभी अपने बचपन में है। उसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है, कि वह सहज ही स्वयं को स्थितियों का दास बना दे। उपन्यासकार की दृष्टि इस पीढ़ी तक भी जाती है। अवस्थी जी की अथाई के पास खेल रहे बच्चों में से एक उस उजाले की ओर इंगित करता है, जो ‘ब्लैक होल’ में अभी तक समाया नहीं है। सारे बच्चे उसके साथ मिलकर देखते हैं। आस्था गहन हो जाती है। प्रार्थना का भाव उतर पड़ता है। तुलसी चौरे के नीचे प्रकाशित दीपक आशा का संचार करता है। भले ही ब्रह्मांड में प्रसारित प्रकाश ब्लैक होल में समा जाए... भले ही बड़े-बड़े प्रकाश-पुंज मिट जाएँ, महाशून्य के द्वारा निगल लिए जाएँ, लेकिन तुलसी चौरे का दीया टिमटिमाता रहेगा। अपनी सीमित क्षमता में ही सही, उजाले को जिलाए रखेगा। आस्था बलवती रहेगी....और एक दिन अवश्य ही महाशून्य से निकलकर जीवन के इंद्रधनुषी रंग विस्तार पाएँगे। बच्चों की जैसी हँसी, उनके जैसा खिलंदड़ापन लौट आएगा, जीवन फिर सुखद-सुखमय और उल्लासपूर्ण होगा।

भावी की कल्पना सकारात्मक होकर कर्मफल के सिद्धांत को बल प्रदान करती है। लखनऊ के रहने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अजय प्रसून ने ‘अनागत कविता आंदोलन’ को सत्तर के दशक में प्रस्तुत किया था। ‘कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना’ के ध्येय-वाक्य पर केंद्रित अनागत कविता आंदोलन की अनेक प्रतिनिधि कविताएँ ऐसी सकारात्मकता के साथ पूर्ण होती हैं। कहानी और उपन्यास विधाओं में भी अनागत का दर्शन होता है। ‘ब्लैक होल डी इंडिका’ में अनागत, अर्थात् आने वाले कल के लिए सुखद कामना बहुत बड़ा संकेत देती है। समय की अदालत सही और गलत पर नीर-क्षीर विवेक के न्याय से आश्वस्त करती है, कि कल के अच्छे होने की संभावनाएँ अभी शून्य नहीं हुई हैं। इसी कारण यह उपन्यास इक्कीस बैठता है। पढ़े जाने, और बार-बार पढ़े जाने की संभावना ही नहीं, अनिवार्यता को भी शिद्दत के साथ अनुभूत कराता यह उपन्यास अपनी सरल-सहज भाषा और रुचिकर शैली के बल पर पाठक को न केवल स्वयं के साथ बाँध लेता है, वरन् पाठकीय चेतना को झंकृत करते हुए चिंतन-मनन, और साथ ही आत्ममंथन के लिए विवश कर देता है।

समग्रतः, इस पठनीय और संग्रहणीय कृति से हिंदी के उपन्यास जगत् को समृद्ध करने और व्यंग्यात्मक उपन्यास की विधा को सबल करने हेतु कृतिकार गजेंद्र तिवारी जी के प्रति अनेक साधुवाद।

(गजेन्द्र तिवारी कृत 'ब्लैक होल डी इंडिका' हिंदी व्यंग्य उपन्यास पर विविधतापूर्ण समकालीन समीक्षात्मक अध्ययन, प्रयास प्रकाशन, बिलासपुर, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह

 






बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह


डॉ. अतुला भास्कर हिंदी साहित्य-जगत् में एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्य की विविध विधाओं में आपका लेखन है, और एक विशेष स्थान रखता है। आपका सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह इस क्रम की एक कड़ी के रूप में सामने है।

कविताई जब जीवन के गहरे अनुभवों से साक्षात् करते हुए आकार पाती है, तब उसकी गहनता, उसका घनत्व अपना प्रभाव स्थापित करता है। जीवन के अनुभव भी यदि कोरे घटनाक्रम न होकर चिंतन की एक दृष्टि को लेकर कविताई में समा गए हों, तो बात कुछ और ही हो जाती है। इतना ही नहीं, निजता का फैलाव दूर तक होता है, जिसमें व्यष्टि भी समष्टि को लेकर चल पड़ती है। स्वयं की वेदना केवल अपनी नहीं होती, इसमें सारा परिवेश झलकता है। काव्य-संग्रह की अंतिम कविता भले ही अंतिम हो, किंतु यहाँ से बात प्रारंभ करने का आशय अलग ही है। डॉ. अतुला जी लिखती हैं-

दुनिया जिसको पूजती / विवशता समाधि पर झुकती । / प्रपंच-पाखंड षड्यंत्र, जन-जन को छलें । / दायित्वों से दूर कर, वैमनस्यता को गढ़ें । / मोहन तुमको आना होगा, / मानवता का पाठ पढ़ाना होगा ।

समय के बंधन का, जीवन की बँधी-बँधाई लीक का सुंदर चित्रण गुलदान के फूलों, फड़फड़ाते पन्नों और घड़ी की सुइयों से दिया गया है। ये बिंब अनूठे हैं, और जीवन की गति बहुत सहजता के साथ बताते हैं।

गुलदान में मुस्कुराते फूल / हवा से फड़फड़ाते पन्ने / जिंदगी की रफ्तार सुनाते / घड़ी का अनुशासन / सुइयों का खेल / अपनी लय / अपनी चाल / कभी दूर / कभी पास / कभी जुड़ाव / कभी बिखराव / सबक सिखाते / मिलें-बिछुड़ें / पर रुके नहीं ।।

मानव-जीवन भी वस्तुतः एक ऐसे बंधन में बँधा हुआ है, जो प्रत्यक्ष नहीं है। इस बंधन में बँधकर जिस विवशता, बेचैनी, व्याकुलता, संत्रास और तनाव में जीते हैं, उसे अपने परिवेश में, अपने आसपास सहज ही देखा जा सकता है। इस विषमता के मध्य डॉ. अतुला जी बहुत सरल बिंब के सहारे गूढ़ बात कहती हैं। गुलदान के पुष्प गुलदान के बंधन में रहकर भी मुस्कुराते हैं। पन्ने जिल्द में बँधे हैं, फिर भी फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व की अनुभूति कराते हैं घड़ी की सुईयाँ एक बँधी गति से चलती हैं, चलती ही जाती हैं। मानव का जीवन भी इन्हीं से सीख लेकर चल सकता है।

अतुला जी के काव्य-संग्रह की यह बड़ी विशेषता है, कि हर एक कविता एक कैनवस पर उतारे गए सरल-से, बहुत संयत और सौम्य-शांत आकार की तरह दिखती है। जटिल-से भड़कीले रंग-विन्यास यहाँ नहीं हैं। उनकी कविताएँ जीवन के सामान्य-से प्रसंगों को लेकर रची गईं हैं। दैनंदिन जीवन की गतिविधियाँ किस तरह से विचारों की वीथियाँ सहेजे होती हैं, अतुला जी की कविताओं में देख सकते हैं। संग्रह की दूसरी कविता से बानगी देखिए-

वो रास्ता / था जिससे / रोज का वास्ता / स्कूल का, / कालेज का, / यूनिवर्सिटी का, / मंजिल पर पहुँचा / क्यों दूर हो गया?

रास्ते और मंजिलें एक-दूसरे की पूरक भले ही हों, लेकिन एक बार में केवल एक ही साथ होता है। रास्ते पूरे होते हैं, तो मंजिल मिलती है और मंजिल मिल जाती है, तो रास्ते छूट जाते हैं। ऐसे ही छूट जाते हैं कई लोग, जो रास्ते में मिलते हैं। मंजिल की अपनी शर्तें होती हैं। वहाँ रास्ते के लोग साथ नहीं होते। मंजिल के साथ पाई हुई सफलता राह के अनेक साथियों को छोड़कर हासिल होती है। ‘रास्ता’ कविता इसी भावधारा में बुनी गई है। रास्ते और मंजिल की क्रमशः गति में कोई अवकाश नहीं है, शिकवा-शिकायत का, अपने-पराए का, किसी भावना में बँध रहने का.... गति यही है।

अतुला जी की कविताओं की यह बड़ी विशेषता है, कि वे जीवन के सरल-सहज ‘स्केच्स’ में चिंतन के रंग भरती हैं, जिनमें कहीं अध्यात्म भी होता है, तो कहीं पर दर्शन भी...। ‘आत्मा’ कविता में वे सवाल उठाती हैं, कि आखिर मृतक से भय क्यों है? मृतक का तुरंत ही क्रिया-कर्म कर दिया जाता है। वह चालाकी-बेईमानी-मक्कारी जैसे जीवधारियों के लक्षणों से दूर है। उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है, जो ऐसे दुर्गुणों से दूर है। वह तो शांत है, तटस्थ है। फिर भी यदि समाज ऐसा करता है, तो निःसंदेह समाज इन दुर्गुणों से विचलित नहीं है। जो इन दुर्गुणों से मुक्त है, जो शरीर के बंधन से मुक्त है, वह समाज के लिए विचलन उत्पन्न कर रहा है।कहा जा रहा है, कि समाज में विचलन दुर्गुणों के कारण नहीं, दुर्गुणों से मुक्ति के कारण है... समाज इन दुर्गुणों को स्वीकारता है, इनके साथ जीता है। एकदम अलग दृष्टि इस कविता में देखने को मिलती है। कवयित्री सीधे यह भी स्पष्ट कर देना चाहती है, कि हमारा समाज जीवन-धारियों के लक्षणों में दुर्गुणों को गिनता है।  

सवाल है कि / भय मृतक से क्यों? / चालाकी, बेईमानी / मक्कारी, छल औ कपट / जीवन धारियों के लक्षण / आत्मा की शांति / प्रार्थना और कामना / उसके लिए क्यों? / जो पहले ही से / पूर्णरूपेण शांत, / तटस्थ और निर्लेप।

विदाई समारोह में / उपस्थित अन्य जन / अशांत-व्याकुल-बेचैन, / चिंतातुर और परेशान ।

ऐसी ही एक अन्य कविता है- आदमी। आदमी जिस रूप को पाया है, उसके लिए वह दोषी नहीं है, क्योंकि रंग और रूप का गढ़ा जाना उसके हाथ में नहीं, लेकिन वह आदमी तो बन सकता है, आदमीपन तो उसके वश में है। मानवीयता के लिए किसी रंग किसी रूप की आवश्यकता नहीं होती, उलटे यह गुण रंग-रूप की विरूपता को ढक लेता है, लेकिन आदमीपन की चिंता अकसर रूप-सौंदर्य की चिंता के नीचे दबकर रह जाती है।

आदमी अपने रूप / के लिए नहीं / ‘आदमी’-पन के अभाव / के लिए दोषी । ‘आदमी’-पन का / वह स्वयं निर्माता / पर रूप बनाना / उसकी विवशता ।।

‘फर्क तो पड़ता है’ कविता भी मानव-स्वभाव की पड़ताल करती है। एक भेद, जो अपने और पराए के बीच होता है, वह भावनात्मक रूप से भी एक अंतर तैयार करता है। अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। जब इस अंतर को मिटाकर अपने लोग पराए जैसा व्यवहार करने लगें, तो मन को बहुत पीड़ा होती है। लेकिन आज के समय की यह भी कड़वी सच्चाई है।

संग्रह की कविताएँ स्त्री-मन का पाठ एकदम अलग तासीर में करती हैं। ‘चुप रहना’ कविता में स्त्री की नियति को बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया गया है। उम्र के किसी भी पड़ाव में उसके हिस्से केवल चुप रहना ही आता है। तमाम संघर्षों, समस्याओं और चुनौतियों के बाद भी वह अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होती, लेकिन बदले में उसे सब सहते हुए चुप रहना होता है। हर बेटी को अपने पिता का घर बहुत प्रिय होता है। वहाँ उसके बचपन की स्मृतियाँ सहेजी हुई होती हैं। बाबुल के घर का लगाव कविता के पहले हिस्से में यक्साँ है। माता-पिता के साथ बेटी मुखर होती है, लेकिन उसके जीवन का दूसरा पड़ाव उसके लिए मौन लेकर आता है। कविता का तीसरा भाग पाठकीय चेतना को झकझोर देता है। माँ का सारा त्याग और समर्पण अपने बच्चों के लिए है, लेकिन उम्र का पड़ाव कहें, पीढ़ियों का अंतर कहें, या बदलते समय की विवशता कहें, माँ चुप ही रह जाती है।

मैं माँ / ममतामयी आँचल / शीतल छाया / ढेरों आशीर्वाद / ढेरों मन्नतें / बहुत सारा प्यार / खूब सा दुलार / मुसीबतों की ढाल / माँ तो आखिर माँ / है एक शर्त / है चुप रहना / मन में ही रखना / कुछ नहीं कहना ।।

कविता-संग्रह से चुनकर कुछ कविताओं का अलग से उल्लेख करते हुए समूचे संग्रह पर बात करना आसान होगा। इस दृष्टि से अलग-अलग तासीर की कविताओं का ऊपर उल्लेख किया है। डॉ. अतुला जी की लेखनी विविध विषयों पर चली है। कहीं पर वे अतीत की परतों को खँगालती हैं, तो कहीं भविष्य का ताना-बाना बुनती हैं। उनकी एक कविता है- फतेहाबाद। अपने कर्मक्षेत्र को वे इस कविता के सहारे याद करती हैं। ‘हल्कू’ कविता में अलग-अलग कृतियों के पात्र एकसाथ आए हैं, जो आज के जटिल समय की चुनौतियों से साक्षात् कर रहे हैं।

संग्रह की कुछ कविताएँ, जैसे- खुश्क रोटी, माँ, जिम्मेदारी, औरत, घर....अलग तरीके से अपनी ओर खींचती हैं। कविताएँ तो क्या हैं, क्षणिकाएँ हैं....। एक साँस में पढ़ जाइए। लेकिन इसके बाद आप सरलता से निकलकर नहीं जा सकते। बहुत सामान्य-सी बातें, दैनंदिन जीवन की घटनाएँ इनमें हैं, लेकिन बहुत गहरे उतरकर अपना असर छोड़ती हैं, ‘सतसैया के दोहरे’ की तरह। बिहारी सतसई के दोहे बहुत छोटे थे- ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।’ अतुला जी की इन क्षणिकाओं के लिए यह उपमा मेरे हिसाब से बहुत सटीक बैठती है। पिता किस तरह अपने जीवन को गलाता है, अपने सुखों की कटौती करके कैसे बच्चों के लिए सुख जुटाता है। ‘खुश्क रोटी’ पढ़कर ऐसे अनुभव से आप गुजरेंगे, जिसे अपने साथ या अपने परिवेश के साथ घटता हुआ पाएँगे। इस दृष्टि से भी कविताएँ बड़े मार्के की हैं। जीवन का कड़वा यथार्थ परिवार के संदर्भों में दिखता है। समय और समाज की सच्चाई अनेक स्थानों पर देखी जा सकती है, लेकिन इतनी सहजता के साथ समय और परिवार की कड़वी सच्चाई को लेखनी के सहारे उतार पाना सिद्धहस्त सृजनधर्मी के वश की बात ही होती है, और कहना न होगा कि डॉ. अतुला जी ने अपनी रचनाधर्मिता को, अपने सृजन को इसी ऊँचाई पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है।

संग्रह का पहला हिस्सा समय और परिवार का दिखता है, तो दूसरे हिस्से में ‘मशाल’, ‘टीआरपी’, ‘शुक्रिया’, ‘परिचय’ और ‘सोशल मीडिया’ जैसी कविताएँ आती हैं। समय और समाज की सच्चाई अतुला जी के यहाँ घटनाओं के वर्णन तक सिमटी हुई नहीं हैं। कह सकते हैं, कि घटनाएँ तो केवल संदर्भ के लिए हैं। वस्तुतः विचारों की लंबी वीथिका इन छोटी-छोटी घटनाओं के बीच से गुजरकर जाती है। मानों किसी गलियारे से होकर जीवन के सफर को तय कर रहे हों, और गलियारे के दोनों ओर ऐसी घटनाओं की झलकियाँ दिखती जाएँ। कविताएँ पाठकीय चेतना को झंकृत कर देती हैं, सोचने के लिए विवश कर देती हैं। ‘सोशल मीडिया’ में व्यंग्य का हल्का-सा पुट जो है, वो ठहरकर सोचने के लिए विवश कर देता है, कि सोशल मीडिया के इस दौर में हम कहाँ पर हैं? कहना न होगा, कि कविता की निम्न पंक्तियाँ एक मानदंड ही बन जाती हैं, पाठक के लिए...। खुद का आकलन कर लेने के लिए..।

वाह!!! / आदर्श समाज / की ओर बढ़ते कदम / सभी परमज्ञानी ।

ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध,बेईमानी / सब पर विजय ।

चारों तरफ सब कुछ / अच्छा ही अच्छा ।

सुख में दुःख में / उपस्थिति जरूरी / अजी, बिलकुल नहीं / संदेश भेजें और / कर्त्तव्यपूर्ति सुगम ।

संग्रह के तीसरे हिस्से में ऐसी कविताएँ रखी जा सकती हैं, जिनमें विचारों की गहनता अपेक्षाकृत घनीभूत होती है। अतुला जी इन कविताओं में ऐसे प्रतीकों का प्रयोग करतीं हैं, जो वैचारिकी को सांद्र कर देते हैं। बानगी के तौर पर देखिए-

दोमुहाँ अजब संस्कार / संबंधों की बंजर भूमि / पर रेंगते व्यवहार.....

साधना की धूनी का , धुआँ है अखरता ।....

योग्य वही अभिनय के, जिनके अंग अंग हैं हिलते । / टूटी कमर है जिनकी उन्हें ही सिंहासन हैं मिलते ।

ऐसे समय में सावधानी / हमारी आस्तीनों में चौकस रहती है ।

संग्रह की अधिकांश कविताएँ भविष्य के प्रति आस्था को ध्वनित करती हैं। अनागत कविता आंदोलन के ध्येय-वाक्य की छवि संग्रह में दिखती है। कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना विभिन्न कविताओं में दिखती है। बानगी के तौर पर एक कविता का उल्लेख यहाँ पर करना होगा। ‘सांध्य वेला’ वस्तुतः संध्याकाल का सुंदर चित्र खींचती है, वह भी लयबद्धता के साथ..। यह ‘सांध्यवेला’ अपने साथ जिस सुखद कामना को लेकर आ रही है, वह सांध्यवेला को उजास की वेला बना देती है-

सुनसुन के नीड़ों से चिड़ियों का कलरव, / प्रियतम का पथ जोहे मतवाली हरपल ।।

समग्रतः, संग्रह की सभी कविताएँ ऐसा वितान रचती हैं, जिसमें जीवन के अलग-अलग रंग कहीं चटकीले, तो कहीं सुंदर-सौम्य होकर उभरते हैं। कविता-संग्रह की यह ऐसी विशिष्टता है, जो सहज ही प्रस्फुटित होती है और संग्रह से साक्षात् करते हुए पाठक को अपने आकर्षण में  बाँधती चली जाती है। कृति न केवल पठनीय है, अपितु संग्रहणीय भी है।

(डॉ. अतुला भास्कर की काव्य-कृति शब्द-सेतु, प्रकाशक ज्ञानगीता प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

Saturday, 22 August 2026

किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति

 


किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति


समाज की ओर दृष्टि रखकर साहित्य की सर्जना होती है। अतीत से लगाकर वर्तमान तक साहित्य की इस विशिष्टता को देखा जा सकता है। हिंदी के आधुनिक कालखंड में समाज और साहित्य के अंतर्संबंध और अधिक घने हो जाते हैं, क्योंकि इस कालखंड में साहित्य अपेक्षाकृत अधिक दायित्वपूर्ण बनकर समाज के सच्चे चित्र को, समाज की वास्तविकताओं को उकेरने लगता है। सामयिक सत्य और यथार्थ के चित्रण में गद्य की अनिवार्य आवश्यकता जहाँ एक ओर कविता को गद्यात्मक बनाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में अपना स्थान बनाने वाला हिंदी कथा-साहित्य समाज के निकट पहुँचता जाता है।

डॉ. विनय कुमार पाठक की नीरज बुक सेंटर, नई दिल्ली से सद्यः प्रकाशित कृति- ‘किन्नर-विमर्श : दशा और दिशा’, वैसे तो किन्नर-विमर्श पर केंद्रित है, लेकिन विषय की स्थापना के आधार को निर्मित करते हुए डॉ. पाठक द्वारा दी गईं उपरिवर्णित स्थापनाएँ हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में किन्नर-विमर्श के विविध पक्षों को प्रस्तुत करने का सहज वातावरण निर्मित करती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है, कि ‘विमर्श’ का आधार औपनिवेशिक और पाश्चात्य प्रभावों से बना है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श में मध्यकाल और उसके बाद औपनिवेशिक भारत, और वर्षों की गुलामी के कारण उपजी मानसिक विक्षिप्तता, विकृति और विद्रूपता की छाया दिखाई देती है। साहित्य में इसी कारण इनकी उपस्थिति अनेक तरीके से भले ही समय और समाज की यथार्थ स्थिति को दिखाती हों, एक विशिष्ट वर्ग बनाकर चर्चा या विमर्श का केंद्रीकरण करती हों, लेकिन इसके साथ आलोचनाएँ भी होती रही हैं, आज भी होती हैं। ‘विमर्शों’ का वास्तविक स्वरूप कैसा हो, सकारात्मक और समाज के लिए दिशा-निर्देशक पक्ष इनमें कैसे उद्घाटित हो, यथार्थ के चित्रण में अतिवाद और अतिकल्पनाशीलता के पक्षों को किस तरीके से नियंत्रित किया जाए, जैसे बिंदु साहित्य-चर्चा के विविध खेमों में उठते रहे हैं। इन्हें आज भी देखा जा रहा है।

स्थापित विमर्शों के अगले क्रम में, इक्कीसवीं सदी के साहित्य में नवोदित विमर्शों के लिए ये बिंदु महत्त्वपूर्ण भी हैं, और इन बिंदुओं पर नवागत-नवोदित विमर्शों की दिशा-दशा के निर्धारण की अपेक्षाएँ भी रही हैं। नवागत-नवोदित विमर्शों में अनेक स्थानों पर अल्पसंख्यक-विमर्श, कृषक-विमर्श, प्रवासी-विमर्श जैसे नाम सुने जाते हैं। कहीं-कहीं पर ये विमर्श चर्चा में आने के लिए भी उठाए जाते रहे हैं। दूसरी तरफ, विकलांग-विमर्श और किन्नर-विमर्श भी इक्कीसवीं सदी में चर्चित हुए। विकलांगों और किन्नरों की समाज में स्थिति को देखते हुए इनकी साहित्य में चर्चा अपेक्षित ही नहीं थी, अपितु साहित्य के माध्यम से इन दोनों वर्गों के लिए सोचा जाना, साहित्य के माध्यम से देखा जाना आवश्यक-अनिवार्य-अपेक्षित था। साहित्य ने इस दिशा में अपना दायित्व निभाया। इन दोनों विमर्शों के संदर्भ में बहुत गंभीर बात डॉ. पाठक ने अपनी कृति की भूमिका में लिखी है। वे लिखते हैं, कि- “जाति और लिंग से रहित विशुद्ध मानवतावादी दृष्टि पर आधारित ये दोनों नव्य विमर्श सर्वाधिक वंचित और उपेक्षित या कहें, वर्जित ही रहे हैं।” (भूमिका, पृ. 05)

डॉ. विनय कुमार पाठक का विकलांग-विमर्श के क्षेत्र में व्यापक साहित्यिक अवदान है। इतना ही नहीं, उनके द्वारा विकलांगों के कल्याणार्थ समाज-कार्यों को भी दिशा दी जा रही है। डॉ. पाठक ने इक्कीसवीं सदी के ज्वलंत और सामयिक विमर्श, अर्थात् किन्नर-विमर्श पर अपनी लेखनी चलाई है। इसके पीछे के कारण को भी वे अपनी कृति की भूमिका में स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं, कि- “स्त्री, दलित, आदिवासी और विकलांग समाज में रहते हुए अराजक व्यवस्था पर आक्रोश व अभिमत स्पष्ट करते रहे लेकिन किन्नर के लिये तो यह पीठिका ही नहीं थी, अर्थात् वे हाशिये में डाल दिये गये। जब तक ये बंद समाज में कुंद बने बैठे रहेंगे, तब तक इनके पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों, अफवाहों से निजात नहीं मिलेगी और इन्हें पूर्णतः जाने-समझे बिना इन पर विमर्श की दिशा ही उलझकर रह जायेगी। लैंगिक विकलांगता विकृति है, पहचान नहीं, इस तथ्य को समझकर ही किन्नर उत्कर्ष को स्पर्श कर सकता है और विमर्श भी सफल-सार्थक सिद्ध हो सकता है।” (भूमिका, पृ. 06)

अपनी कृति की भूमिका के अंश के रूप में डॉ. पाठक का यह कथन किन्नर-विमर्श की उस अनिवार्यता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, जिस ओर ध्यान दिये बिना किन्नरों पर बात नहीं हो सकती। डॉ. पाठक बड़ी सहजता के साथ यहाँ स्पष्ट करते हैं, कि अभी तक जितने भी विमर्श चर्चित हुए हैं, भले ही उनकी चर्चा का घनत्व कम या ज्यादा हो, लेकिन उनमें एक समानता रही है, कि वे ऐसे समूहों, वर्गों, समुदायों से संबंधित हैं, जो समाज में हैं, समाज का हिस्सा हैं। इसमें शारीरिक विकलांग भी आ जाते हैं। लेकिन किन्नर समुदाय ऐसा है, जो समाज से एकदम कटा हुआ है। समाज में उनका आगमन यदि होता भी है, तो एक रहस्यमयी जीवधारी के रूप में...। इसी कारण समाज उनके प्रति सहज नहीं रहता। अकसर उन्हें ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, कि वे विवश हो जाते हैं... अपने लोक में, अपने सीमित दायरे में सिमटने के लिए। इस दृष्टि से देखने पर किन्नर-समुदाय मानवीय दायरे में समाहित हो ही नहीं सका। अन्य विमर्शों के केंद्र में रहने वाले लोग अपने लिए लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, लेकिन किन्नर-समुदाय अपनी आवाज ही नहीं उठा सका, कारण उसका समाज से एकदम कटा हुआ होना है। यह भी एक पक्ष है, जिस कारण साहित्य की विविध विधाओं में भी किन्नर समुदाय रहस्यमय ही बना रहा है। डॉ. पाठक इसी कारण किन्नर-विमर्श को मानवीय धरातल पर चर्चा के लिए लाने की बात कहते हैं। वे आक्रोश, आंदोलन, असहमति, विद्रोह जैसी स्थितियों के लिए किन्नर-समाज को तैयार नहीं देखते। वे तो किन्नर-विमर्श को किन्नरों के जीवन को देखने की एक पीठिका के रूप में स्थापित करते हुए चलते हैं।

इस पीठिका के आधार को तैयार करने का यत्न डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में दिखता है, इस कारण इस कृति की भूमिका की अपनी विशिष्टता है, महत्त्व है। किन्नर के रूप में जन्म लेने वाले नवजात के परिवार से लगाकर समाज तक, और फिर किन्नर समुदाय के जीवन के विविध पक्षों तक डॉ. पाठक बड़ी पैनी दृष्टि दौड़ाते हैं, और बिंदुवार स्पष्ट भी करते हैं। इस कृति की भूमिका में ही सरकार के द्वारा किये गए विभिन्न प्रयासों का उल्लेख मिलता है, विभिन्न आँकड़े मिलते हैं। ये सभी अपना अलग महत्त्व रखते हैं।  भूमिका में ही डॉ. पाठक इक्कीस ऐसे बिंदुओं का उल्लेख करते हैं, जो सामान्य रूप से किन्नर-आधारित साहित्य में किन्नरों को लेकर दिखाई पड़ते हैं। ये इक्कीस बिंदु केवल हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की पड़ताल करके ही नहीं लिखे गए हैं, वरन् मराठी, तमिल और अन्य भाषाओं के साथ ही छत्तीसगढ़ी आदि के साहित्य से भी छनकर आए हैं। इस कारण इन इक्कीस बिंदुओं में किन्नर-आधारित साहित्य का निचोड़ परिलक्षित हो जाता है।

किन्रर-विमर्श की चर्चा करने से पहले डॉ. विनय कुमार पाठक ने उन स्थितियों को परखने का यत्न भी किया है, जो विमर्श का नाम लिए बिना किन्नरों की उपस्थिति को साहित्य में रेखांकित करती हैं। इस दृष्टि से उनके द्वारा प्रसाद के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ का उल्लेख अत्यंत प्रासंगिक बन पड़ा है। इसके साथ ही वे अत्यंत क्रांतिकारी लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, इस्मत चुगताई और यशपाल की उन कृतियों का उल्लेख भी करते हैं, जिनमें किन्नरों के जीवन की झलक मिलती है। ये रचनाएँ आभास देती हैं, समाज के प्रति साहित्य की दायित्ववान दृष्टि का, जो बिना किसी विमर्श का नाम लिए हुए किन्नरों के जीवन की यथार्थ स्थिति को देखती है। इस कारण डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में इन रचनाओं का उल्लेख अपनी प्रासंगिकता को सुनिश्चित कर देता है। डॉ. पाठक ने इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ के लगभग दर्जन भर कवियों-कथाकारों का नामोल्लेख भी किया है।

 डॉ. विनय कुमार पाठक अपनी कृति की भूमिका में एक प्रसंग का वर्णन करते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से वे एक ऐसी दिशा-निर्देशक बात कहते हैं, जिसका संबंध किन्नर-विमर्श से भले हो, लेकिन वह अन्य विमर्शों के लिए भी संकेत के रूप में है। इस प्रसंग का उल्लेख भी यहाँ पर उल्लेख किया जाना आवश्यक लगता है। डॉ. पाठक लिखते हैं, कि किन्नर विमर्श विषयक इस ग्रंथ को प्रकाशन के लिए भेजने के समय एक सज्जन ने प्रश्न उठाया, कि ऐसे विमर्शों से किन्नरों का भला होगा? वस्तुतः, ऐसे प्रश्न अनपेक्षित नहीं होते, सहज ही होते हैं। इनके उत्तर भी सहज भाव की अपेक्षा रखते हैं। ऐसा करते हुए डॉ. पाठक जिस उत्तर को लिखते हैं, वह स्वयं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं- “विकलांग-विमर्श में मैंने इसका सकारात्मक परिवर्तन देखा और किन्नर-विमर्श के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ और सूत्र-रूप में संस्थित होकर मैंने कहा कि किन्नर का जीवन यदि स्याह अँधेरे में आच्छन्न है तो विमर्श उसमें सपने जगाने का काम तो कर ही सकता है, संघर्ष के कँटीले-पथरीले पथ में आहत होने पर उसे कराहने के लिए तो प्रेरित कर ही सकता है, भले कोई उपचार के लिए उपस्थित न हो लेकिन समाज और सरकार के प्रति संवेदना का भाव तो संचरित कर ही सकता है।” (भूमिका, पृ. 17-18)

डॉ. पाठक का उपरोक्त कथन किन्नर-विमर्श के संदर्भ में ऐसे भावनात्मक और दिशा-निर्देशक तत्त्वों को समेटे हुए है, जो किन्नर-विमर्श के नाम पर मानवीय, संवेदनापूर्ण और पुण्य-पवित्र ध्येय पर आधृत संघर्ष को उसकी दिशा से भटकने से रोकने और साहित्य के साथ ही समाज के सकारात्मक परिणामों को निकालकर लाने के लिए संकेत करते हैं। इन तमाम कारणों से इस कृति की भूमिका का अपना विशेष महत्त्व है।

आज के समय में किन्नर समुदाय के जीवन और उनकी दशा पर अनेक कार्य हो रहे हैं। इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। धरातल पर ये प्रयास सार्थक रूप में परिलक्षित भी हो रहे हैं। इस प्रयासों के साथ ही साहित्य भी अपनी भूमिका निभा रहा है, फलस्वरूप किन्नर विमर्श आजकर चर्चा में है। यह ऐसा अध्ययन-क्षेत्र है, जिसको व्यवस्थित रूप देना और इसको सार्थक-सर्वाङ्गपूर्ण रूप में अध्येताओं के लिए उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. पाठक ने इस आवश्यकता को न केवल समझा, वरन् अपनी कृति- ‘किन्नर विमर्श : दशा और दिशा’ के माध्यम से पूरा करने का सफल प्रयास भी किया है।

इस कृति में डॉ. पाठक ने आत्मकथा और नाटक जैसी अल्प-चर्चित विधाओं में भी किन्नरों के जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को; किन्नर-विमर्श से संबद्ध विविध आयामों देखा-परखा है, समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इतना ही नहीं, यह कृति सिनेमा में भी किन्नरों के जीवन को देखती है। उपन्यास, कहानी और कविता ऐसी विधाएँ हैं, जिनमें विमर्शों का सर्वाधिक प्रभाव और प्रस्तुति दिखती है। सामान्यतः विमर्शों की चर्चाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती भी हैं।

हिंदी कथा-साहित्य में किन्नरों के जीवन की उपस्थिति और पड़ताल का व्यापक अध्ययन डॉ. पाठक की इस कृति में दिखता है। विशेष रूप से हिंदी कहानियों के विविध पक्षों को उन्होंने देखा है, प्रस्तुत किया है। हिंदी कहानियों में समय के सत्य और यथार्थ का सर्वांगपूर्ण चित्रण आज की हिंदी कहानी को जहाँ एक ओर हिंदी की विविध विधाओं के बीच उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर समय और समाज से जुड़े विविध विषयों का चित्रण हिंदी कहानी की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता को स्थापित करता है। हिंदी कहानी में विविध विमर्शों सहित किन्नर-विमर्श की उपस्थिति भी इसका ही एक पक्ष है।

हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी कहानी में यदि विविध विमर्शों की चर्चा करें, तो स्पष्ट होता है, कि समय और समाज की सच्चाइयों के निरंतर निकट जाने का यत्न ही विविध विमर्शों की उत्पत्ति और विस्तार-विकास का आधार बना है। समकालीन समाज में महिलाओं की दयनीय दशा को रेखांकित करने-उभारने के लिए यदि स्त्री-विमर्श अस्तित्व में आया, तो दलितों की बात करने हेतु दलित-विमर्श की शुरुआत हुई। बाद में आदिवासियों के जीवन और उनके संघर्षों को लेकर आदिवासी-जनजातीय विमर्श की बात भी होने लगी। विमर्शों के माध्यम से वर्ग-विशेष की समस्याओं, स्थितियों और जीवन की जटिलताओं को एक विशिष्ट दायरे में समेटकर पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है। इन विमर्शों पर जितना कथा-साहित्य रचा गया है, उतनी ही रचे गए साहित्य पर चर्चा और समीक्षा-आलोचना हुई है।

आज की हिंदी कहानियों में ‘किन्नरों’ की दशा और दिशा के साथ ही किन्नर-विमर्श के प्रभाव-प्रसार की समीक्षा करने हेतु डॉ. पाठक ने अलग-अलग कलेवर वाली दो दर्जन से अधिक कहानियों का चयन किया है। ये कहानियाँ कथ्य, चरित्र, परिवेश की विविधता और वैचित्र्य के स्तर पर इस प्रकार की हैं, जिन्हें ‘किन्नर-विमर्श’ की प्रतिनिधि कहानियों के तौर पर रखा-देखा जा सकता है।

कृति में ली गई कहानियों में से कुछ के कथ्य को बानगी के रूप में यहाँ पर देखा जा सकता है। इसमें किरन सिंह की कहानी ‘संध्या’ की नायिका संध्या की लैंगिक विकलांगता का दंश झेलते माता-पिता हैं, तो दूसरी ओर शिवप्रसाद सिंह की कहानी के ‘बिंदा महाराज’ का नायक है। ये सभी अपनी विवशता को उस क्रूर समाज में भोगते हैं, जिसमें संवेदनहीनता है, अवसरवादिता है और क्रूर-तीक्ष्ण व्यंग्य हैं। अंजना वर्मा की कहानी ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ की सुंदरी की लैंगिक विकलांगता ही उसे अपने परिवार से दूर कर देती है। यह दूरी आपसी प्रेम को भले ही समाप्त न कर पाए, लेकिन समाज से छिपकर मिलने की विवशता में जरूर बाँध देती है। ऐसी स्थितियाँ समाज में हमें देखने को मिलती हैं। समाज इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं रखता।

ललित शर्मा की कहानी ‘रतियावन की चेली’, डॉ. लवलेश दत्त की कहानी ‘नेग’ और पद्मा शर्मा की कहानी ‘इज्जत के रहबर’ में किन्नर समाज में झाँकने का प्रयास हुआ है। महेंद्र भीष्म की कहानी ‘त्रासदी’ एकदम अलग तासीर की कहना है। यह दयनीय और दीन-हीन किन्नर समाज का दूसरा पहलू दिखाती है। किन्नर सुंदरी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए रति को बलात्कारियों से बचाती है। डॉ. पाठक इस कहानी पर टिप्पणी लिखते हैं, कि- जिस किन्नर को समाज अधूरा समझकर तिरस्कृत करता है, वही किन्नर आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण मानव की मदद को आ खड़ा होता है। यह बात अलग है, कि किन्नर की नेकनीयती के बदले में उसे किन्नरेतर समाज से उपेक्षा और अपमान ही मिलता है। विजेंद्र प्रताप सिंह की कहानी ‘संकल्प’ का मधुर अपनी लैंगिक-विकलांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनाता, वरन् अपने घर-परिवार की प्रगति के लिए निरंतर संलग्न रहता है। समाज की रक्षा करने वाला पुलिसकर्मी उसके साथ बलात्कार करता है, और यहाँ से मधुर के जीवन की दिशा बदल जाती है। वह अपने लिए एक लाख रुपये इकट्ठे करके अपना लिंग परिवर्तन कराकर माधुरी बन जाती है। मधुर के द्वारा कराया गया लिंग-परिवर्तन केवल उसके लिए ही नहीं, वरन् अनेक लोगों के लिए एक बड़े परिवर्तन की लहर लेकर आता है। कई लैंगिक-विकलांग लोग अपना आपरेशन कराने के लिए आगे आते हैं, तो दूसरी तरफ चिकित्सक भी इस काम में अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर संलग्न होते हैं।

राही मासूम रज़ा की कहानी ‘खलीक अहमद बुआ’ अपने शीर्षक में ही किन्नर का अर्थ द्योतित करती है। इस कहानी में यह बताने की कोशिश की गई है, कि खलीक अहमद बुआ नाम में जिस तरह एक पुरुष और एक स्त्री निहित है, उसी तरह कहानी के नायक में भी संवेदनशीलता, भावुकता और विश्वसनीयता समाहित है। पुरुष और स्त्री, दोनों के आदर्श गुण समाहित हैं। ऐसी ही एक कहानी सलाम बिन रजाक की है- ‘बीच के लोग’। इस कहानी में व्यंग्यात्मक लहजे में यह बताने की कोशिश की गई है, कि स्त्री-और पुरुष के बीच बँटे समाज में उन लोगों की कोई अहमियत नहीं होती, जो बीच के होते हैं, अर्थात् न स्त्री होते हैं, और ना ही पुरुष होते हैं। यह कहानी ‘किन्नर’ शब्द पर भी अपनी असहमति दर्ज कराती है।

कुसुम अंसल की कहानी ‘ई मुर्दन का गाँव’ में किन्नर समाज की दयनीय दशा को दिखाते हुए माता-पिता द्वारा अपने लैंगिक-विकलांग बच्चे को किन्नर समाज से बचाने का यत्न करते हुए दिखाया गया है। करतार सिंह दुग्गल की पंजाबी कहानी ‘हम जिनस’ में माता-पिता अपनी संतान कस्तूरी की लैंगिक-विकलांगता को समाज से छिपाकर अपने पास रखना चाहते हैं और हिजड़ा समुदाय उसे अपने साथ ले जाने पर अड़ा रहता है। विनोद मिश्र सुरमणि की कहानी ‘सुनो तुम मुझसे वादा करो’ भी कुछ इसी प्रकार की भावभूमि में रची गई है। कहानी उन वृहन्नलाओं की चिंता करती है, जिनसे समाज आशीष और सुख-समृद्धि की कामना तो करता है, लेकिन वृहन्नलाओं के जीवन की जटिलताओं की चिंता नहीं करता है।

डॉ. क्रांति कुमार सिन्हा की कहानी ‘नियति एक किन्नर की’ एकदम अलग तासीर की कहानी है, जो समाज की कड़वी सच्चाई को खुलकर सामने रखती है। कहानी के राजशेखर जी अपनी लैंगिक-विकलांग संतति से बहुत लगाव रखते हैं, लेकिन जब उन्हें समाज में बदनामी की चिंता होने लगती है, तो वे अपने कलेजे के टुकड़े को हिंजड़ा समुदाय को सौंपने में जरा-सी भी देर नहीं करते हैं। जवाहरलाल कौल ‘व्यग्र’ की कहानी ‘ज्योति सूना नयन’ एक उम्मीद जगाती है। इसमें शारीरिक विकलांग और लैंगिक-विकलांग एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। वस्तुतः विकलांगता दोनों ही हैं, लेकिन शारीरिक विकलांग कुछ हद तक अपने जीवन को सम्मानपूर्वक जी लेते हैं, जबकि लैंगिक-विकलांग के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। दोनों का एकसाथ मिलकर जीवन बिताना भविष्य की सुखद उम्मीद जताता है।

डॉ. पाठक ने यमदीप, मैं भी औरत हूँ, तीसरी ताली, किन्नर कथा, गुलाम मंडी, मैं पायल, पोस्ट बाक्स नं. 203 नाला सोपारा, जिंदगी 50-50, अस्तित्व, दरमियाना, आधा आदमी, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मैं क्यों नहीं और वाडामल्लि, आदि उपन्यासों को लेकर हिंदी उपन्यासों में किन्नरों के जीवन और उनके संघर्षों का विश्लेषण किया है। बात के विस्तार में जाने के स्थान पर यहाँ यह कहना अपेक्षित होगा, कि हिंदी कहानियों की तरह से ही उपन्यासों में किन्नरों के जीवन के अलग-अलग रंग दिखते हैं। उनके जीवन-संघर्ष के विविध पक्ष दिखते हैं। इसी तरह अधूरी देह, अस्तित्व और पहचान, शिखंडी, पंखुड़िया : अंतर्द्वंद्व आदि प्रतिनिधि कविताओं के माध्यम से किन्नर-जीवन के विविध पक्षों को देखा-परखा और विश्लेषित किया गया है।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा, और किन्नर-समुदाय से...। निश्चित रूप से यह दुर्लभ और कल्पनातीत संयोग कहा जाएगा। फिर भी किन्नर-विमर्श के संदर्भ में आत्मकथा विधा को डॉ. पाठक ने इस कृति में समेटा है। किन्नर-विमर्श के अंतर्गत- किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी... और मानोबी बंधोपाध्याय की आत्मकथा पुरुष तन में फँसा मेरा नारी-मन; इन दो आत्मकथाओं को लिया गया है। आत्मकथा विधा में इन दो कृतियों के अतिरिक्त संभवतः दूसरी कृतियाँ होंगी भी नहीं..। इसके बाद भी डॉ. पाठक ने इस विधा को इस कृति में समेटा है, कारण आत्मकथा विधा में किन्नरों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके, क्योंकि किन्नरों के द्वारा लिखा गया स्वाभाविक रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, दूसरे लोगों द्वारा लिखी गई बातों की अपेक्षा..। किन्नर समुदाय अपने जीवन-संघर्षों को लिपिबद्ध कर सकें, इसके लिए प्रेरित हों.., डॉ. विनय कुमार पाठक की यह दृष्टि निःसंदेह प्रभावित करती है।

डॉ. पाठक ने किन्नर-केंद्रित नाटकों में आग के सात फेरे और हरारत, इन दो नाटकों को लिया है। इसी तरह किन्नर-केंद्रित और मुख्य कथा के साथ जुड़े किन्नर-पात्रों के जीवन के चित्र खींचते सिनेमा और नाटकों का विश्लेषण इस कृति में किया गया है। यद्यपि इनकी संख्या कम है, लेकिन इन विधाओं में भी किन्नरों के जीवन को देखने का काम स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा के बड़े फलक से निकालकर डॉ. पाठक ने लगभग दर्जन भर उन फिल्मों का उल्लेख इस कृति में किया है, जो किन्नर-विमर्श के लिए, इस दिशा में सार्थक चर्चा के लिए महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं।

इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों के बीच सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक विमर्श के रूप में देखे जाने वाले किन्नर-विमर्श के संदर्भ में डॉ. विनय कुमार पाठक की यह कृति उन सभी विधाओं को समेटकर एक व्यापक विश्लेषण और समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिनकी न केवल साहित्य में, वरन् समाज में अत्यंत मजबूत स्थिति है। यह कृति एक संदेश भी देती है, कि ऐसी विधाएँ, जो साहित्य के साथ ही समाज को संदेश दे सकती हैं, उनमें आज तक भले ही कम काम हुआ हो, लेकिन संभावनाएँ असीमित-अपरिमित हैं। इस दृष्टि से भी डॉ. पाठक की इस कृति को किन्नर-विमर्श पर आधारित पहली समीक्षात्मक-आलोचनात्मक कृति कहा जा सकता है।

इस कृति का पहला अध्याय, जिसकी चर्चा हमने यत्नपूर्वक अंत में की है, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अध्याय को छोड़कर न तो इस कृति पर बात पूरी होती है, और न ही ‘किन्नर-विमर्श’ पर बात पूरी हो सकेगी। यह अध्याय है- ‘किन्नर : आशय और अवधारणा’। इस अध्याय में किन्नरों के स्वरूप-विवेचन के साथ ही ऐतिहासिक पीठिका, मूल निवास, मानवाधिकार और परंपरागत जीवन आदि विविध विषयों-बिंदुओं को समेटने का यत्न डॉ. पाठक ने किया है।

‘किन्नर-विमर्श’ अपने नाम के अनुरूप किन्नरों के जीवन और उनकी सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न विषयों पर केंद्रित है। लेकिन ‘किन्नर’ नाम को लेकर अकसर विवाद उठता रहा है। वस्तुतः ‘किन्नर’ एक ऐसी मानव-प्रजाति है; जो गीत-संगीत में रुचि रखती है, जो हिमालय के तराई क्षेत्रों में पाई जाती है। किन्नर पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बहुत ही कम होने के कारण ये ‘किं-नर?’ से ‘किन्नर’ बन गए। किन्नर-विमर्श में जिन ‘किन्नरों’ की बात की जाती है, उनसे ये अलग होते हैं, लेकिन नाम-साम्य के कारण विवाद की स्थितियाँ बनती हैं।

संभवतः इस स्थिति को जानते-समझते हुए डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी कृति के पहले अध्याय में एक विकल्प दिया है। वे ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए ‘लैंगिक विकलांग विमर्श’ नाम भी देते हैं। यह नाम कई अर्थों में प्रासंगिक लगता है, क्योंकि इस विमर्श में उन लोगों के जीवन को दर्शाया गया है, जो लैंगिक असामान्यता का जीवन जी रहे होते हैं। यद्यपि ‘किन्नर-विमर्श’ आज के समय में रूढ़ हो गया है, इस कारण ‘लैंगिक-विकलांग’ और ‘पार-यौनिक’ (ट्रांसजेंडर) के साथ ही ‘असामान्य यौन-विकृत’ और ‘यौन-मनोविकृत’ के स्थान पर ‘किन्नर-विमर्श’ ही व्यवहृत होता है। डॉ. पाठक ने भले ही दूसरे नाम सुझाए हों, और संदर्भित विषय में चर्चा के विविध पक्षों को निष्पक्षता के साथ स्थान दिया हो, किंतु वे पौराणिक प्रसंगों, भारतीय वाङ्मय के उदाहरणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ ‘किन्नर’ शब्द के व्यवहार को पुष्ट करते हैं, समर्थन देते हैं। ‘किन्नर-विमर्श’ की साहित्यिक स्थापना के लिए विस्तृत-व्यापक आधार तैयार करते हुए प्राचीन भारतीय वाङ्मय और लोकजीवन के साथ ही वे मध्यकालीन समाज में ‘किन्नरों’ की स्थिति का विशद-व्यापक विश्लेषण करते हैं। वे ‘थर्ड जेंडर’, ‘गे’, ‘लेस्बियन’, ‘लैंगिक-विकलांग’ आदि का उल्लेख करते हुए ‘किन्नर-विमर्श’ की वैचारिक भूमि का निर्माण करते हैं।

उल्लेखनीय है, कि हमारे संस्कारों और लोकजीवन के विभिन्न पक्षों के साथ किन्नरों का संबंध रहा है। भारतीय वाङ्मय और पौराणिक ग्रंथों में किन्नरों की सम्मानजनक स्थिति को दर्शाया गया है। लोग इनके प्रति आस्थावान रहते हैं। किन्नर अखाड़ों का अस्तित्व और विभिन्न रीति-रिवाजों में इनको दिया जाने वाला सम्मान हमारी परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है। लोकजीवन में ये स्थितियाँ आज भी दिखती हैं। मध्यकाल में यह समुदाय हरम के पहरेदार की भूमिका में सिमटकर रह गया। बाद के वर्षों में यह समुदाय अपने जीवन के लिए जटिल होती स्थितियों के साथ जीने को विवश होता गया। डॉ. पाठक ने अनेक उद्धरणों और लोकगीतों-लोकपरंपराओं आदि का उल्लेख करते हुए तमाम अनजानी बातों को समेटकर किन्नर-समुदाय के कालक्रमानुसार इतिहास को अनौपचारिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस कारण यह अध्याय महत्त्वपूर्ण है, और किन्नर-विमर्श के अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इस विश्लेषण के साथ वे संकेत भी देते हैं, कि मनोविकृतियों के कारण असामान्य लैंगिक व्यवहार करने वाले, छद्म किन्नर बनने वाले लोगों और ‘किन्नरों’ में बड़ी विभाजक रेखा खिंची हुई है। किन्नर-विमर्श के संदर्भ में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

समग्रतः, किन्नर विमर्श के वैचारिक आधार की तैयारी के लिए डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा चयनित समस्त सामग्री, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, सिनेमा आदि विमर्श के फलक को विस्तार ही नहीं देते, वरन् अनेक अनछुई सच्चाइयों को प्रकट भी करते हैं। डॉ. पाठक ने अपनी कृति में जिस प्रकार खाका खींचा है, वह निःसंदेह ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। इस कृति को ‘किन्नर-विमर्श’ का दिशा-निर्देशक ग्रंथ कह सकते हैं। और एक बार फिर डॉ. विनय कुमार पाठक को ऐसे सिद्धहस्त समीक्षक-आलोचक कह सकते हैं, जिन्होंने बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों को स्थापित करने और साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा के लिए उपलब्ध कराने का काम किया है।

(पुस्तक- किन्नर आलोचना के शिखर : डॉ. विनय कुमार पाठक, संपादक- डॉ. अनिता सिंह, प्रकाशक- माया प्रकाशन, वर्ष- 2024 में प्रकाशित)

                                                                                    -राहुल मिश्र