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Saturday, 22 August 2026

उठहु राम भंजहु भव चापा

 

उठहु राम भंजहु भव चापा


राजा जनक ने यत्नपूर्वक धनुष-यज्ञ का आयोजन किया है। धनुष-यज्ञ में अनेक देशों से राजा पधारे हैं, शूरवीर पधारे हैं। विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण भी धनुष-यज्ञ में गए हैं। राजा जनक के निर्देश पर उनको विधिवत् सुसज्जित आसन पर सम्मान के साथ बैठाया गया है। बात उस समय के बड़े-बड़े वीरों, महारथियों के बीच चल रही है। यह समस्त आयोजन भी उनके लिए ही है, कि कोई ऐसा सुयोग्य वीरश्रेष्ठ सीता के विवाह हेतु मिल सके। महाराजा सीरध्वज की चिंता गहरी है। राम तो संयोगवश पहुँचे हैं, इसी कारण शांत-संयत बैठे केवल देख रहे हैं। शिव के धनुष को उठाने के यत्न करते अनेक शूरवीर जब थककर चूर हो जाते हैं, हारा हुआ मान लेते हैं, तब राजा जनक का क्रोध सिर चढ़कर बोलने लगता है। क्या धरती वीरों से खाली हो गई है? यदि मुझे ऐसा पता होता, तो मैं अपनी बेटी सीता के विवाह के लिए ऐसी प्रतिज्ञा नहीं करता। शिव के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर, कोई वीर इसे हिला तक नहीं सका। यदि मैं प्रण त्यागता हूँ, तो संचित पुण्य नष्ट होता है... और न त्यागने पर पुत्री अविवाहित रह जाएगी। मिथिलापति सीरध्वज की विवशता क्रोध बनकर इस तरह प्रकट होती है, कि वे कह उठते हैं-

तजहु आस निज निज गृहँ जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ।।

लक्ष्मण को जनक की यह बात चुभ जाती है। राम का शांत-सौम्य व्यक्तित्व लक्ष्मण की उग्रता और प्रखर वाणी से उभरता है। लक्ष्मण स्वयं को रोक नहीं पाते। लक्ष्मण के लिए राम नरश्रेष्ठ हैं, वीरश्रेष्ठ हैं; और राम की उपस्थिति में धरती को वीरों से खाली कहा जाना लक्ष्मण के लिए असह्य हो जाता है। वे प्रतिकार में कह उठते हैं-

रघुबंसिन्ह  महुँ  जहँ  कोउ होई । तेहि समाज अस कहइ न कोई ।।

कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान   रघुकुलमनि   जानी ।।

राम और लक्ष्मण का मिथिला में आगमन सीधे सिद्धाश्रम से हुआ है, जहाँ कुछ ही दिन पहले उन्होंने ताड़का, मारीच, सुबाहु जैसे राक्षसों का वध करके वहाँ के साधु-संन्यासियों और सामान्य जन को भयमुक्त किया है। लक्ष्मण स्वयं को रोक नहीं पाते, और ललकार उठते हैं, श्रीराम से कहते हैं, कि यदि आप अनुमति प्रदान करें; तो मैं आपके प्रताप से, आपके बल से इसे छत्रक दंड (कुकुरमुत्ते) की तरह तोड़ डालूँ। अगर अपनी इस शपथ को पूरा न कर सकूँगा, तो पुनः धनुष पर हाथ नहीं रखूँगा। लक्ष्मण की ऐसी बातों से सभा में मानों भूचाल आ गया। राम ने लक्ष्मण को शांत होकर बैठने के लिए इंगित किया। लक्ष्मण को अपने निकट बैठाया। अब तक गुरु विश्वामित्र सबकुछ देख रहे थे। गुरु विश्वामित्र को अपने शिष्यों पर पूरा भरोसा था, और संभवतः जनक की बातें उनको भी अच्छी नहीं लगीं थीं। वे राम को निर्देश देते हैं-

उठहु राम भंजहु भव चापा । मेटहु तात जनक परितापा ।।

धनुष-यज्ञ के पूरे प्रसंग में अब तक गुरु विश्वामित्र भी शांत-संयत बैठे थे। उन्होंने रावण और बाणासुर जैसे राजाओं को बहाना बनाकर जाते हुए और स्वयं को वीर और बलशाली मानने वाले क्षत्रपों-वीरों को अजगव उठाने का असफल प्रयास करते देखा... राजा जनक को क्रोध में भरकर न जाने क्या-क्या कहते सुना, और लक्ष्मण को राजा जनक की बातों के प्रतिकार में अपना विरोध प्रकट करते देखा। गुरु विश्वामित्र के लिए यह उचित समय था, जब वे राम को धनुष उठाने के लिए नहीं, वरन् भंजन करने के लिए कहते....। गुरु विश्वामित्र का यह निर्देश सामान्य नहीं था। सीता के विवाह का प्रयोजन-मात्र इस निर्देश में नहीं था।

भव शिव को भी कहते हैं, और संसार को भी....। भव चाप का भंजन... शिव के धनुष का, पिनाक का भंजन नहीं, वरन् संसार के क्लेशों-दुःखों का भंजन भी है। जनक का परिताप पुत्री सीता के विवाह-मात्र से शांत होने वाला नहीं है। सीरध्वज जनक मिथिला के जनकों की परंपरा में आते हैं। उनके समय में जिस तरह की स्थितियाँ बनी हुईं थीं, उनमें सीरध्वज जनक का परिताप जनकनंदिनी के लिए एक वीर नरश्रेष्ठ वर की खोज के पूरे न हो पाने के कारण उपजा था। वीरों की कोई कमी नहीं थी। बाबा तुलसी लिखते हैं, कि सीता-स्वयंवर के लिए असुर भी रूप धरकर आए थे। कुटिल और क्रूर-आततायी राजागण भी बड़ी अभिलाषा लेकर पहुँचे थे। इनमें से कोई भी शिव के धनुष को हिला तक नहीं सका। जब एकाकी प्रयास विफल हो गए, तो हजार की संख्या में एकत्र होकर राजागण धनुष को उठाने का प्रयत्न करते हैं, और श्रीहत होकर अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। राजा जनक का परिताप बड़ा विकट है। वे कहते हैं-

दीप दीप के भूपति नाना । आए सुनि हम जो पनु ठाना ।।

देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर  आए रनधीरा ।।

कुँअरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय ।।

पावनिहार  बिरंचि  जनु  रचेउ      धनु   दमनीय ।।251।।

हमारे प्रण को, हमारी प्रतिज्ञा को जानकर अनेक द्वीपों (देशों) के अनेक राजा मिथिला में पधारे। देवता और राक्षस भी मनुष्य का शरीर धरकर आए। शिव के धनुष को उठाने पर कुँअरि मनोहर, बड़ी विजय और सबसे प्रमुख बात... अति कमनीय कीर्ति प्राप्त होती, किंतु ऐसा लगता है, कि विधाता ने इन तीनों को प्राप्त करने लायक किसी को इस धरती पर नहीं बनाया है। कुछ ही दिन पहले सिद्धाश्रम में मारीचि, सुबाहु जैसे भीषण राक्षसों को मारने वाले, ताड़कावन में राक्षसी ताड़का का वध करके असीम जन समूह को भयमुक्त करने वाले दशरथनंदन राम भी तो इस धनुष-यज्ञ की सभा में विराजमान हैं। मिथिलापुरी की वाटिका में भ्रमण करते हुए जब सीता की सखियों ने दोनों राजकुमारों को देखा था, तब मन ही मन अनेक संभावनाओं के, कल्पनाओं के महल गढ़ लिए थे।

रामकथा के पुष्पवाटिका प्रसंग का लोक जीवन में अपना महत्त्व है। लोकरक्षक श्रीराम के प्रति जन-आस्थाएँ सिद्धाश्रम में उनकी कीर्ति को देखकर ऐसी दृढ़ हो जाती हैं, कि मानों जनसमूह का मानस ही उनके साथ मिथिलापुरी की ओर चल पड़ता है। जनकनंदिनी सीता अपनी आराध्य देवी पार्वती का पूजन करने गईं हैं। दशरथनंदन राम और लक्ष्मण को पुष्पवाटिका में देख लोक भविष्य की सुंदर संभावनाओं को सँजोता है। उन्हें मिथिलापति सीरध्वज और अयोध्यानरेश दशरथ के मध्य संबंध की एक कड़ी जुड़ती दिखती है, और लोक का जीवन अपने गीतों में गुनगुना उठता है-

 सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

के तुम जनक बुलाए आए, के तुम दसरथ पठाए आए, के तुम कलियाँ तोड़न आए

के तुम आए... अरे हाँ, के तुम आए सिया जू को ब्याहने, बाग मिथिलापुर में....

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

ना हम जनक बोलाए आए, ना हम दसरथ पठाए आए, ना हम कलियाँ तोड़न आए..

ना हम आए.... अरे हाँ..., ना हम आए.. सिया जू खाँ ब्याहने, बाग मिथिलापुर में....

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

बेला फूली फूल हजारी, चंपा फूली घनी पियारी..., देखन आए दौनों भाई...

कैसी सजने लगी है... अरे हाँ.... कैसी सजने लगी है फुलवार... बाग मिथिलापुर में...

सखि आए दो राजकुमार बाग मिथिलापुर में.....

बाबा तुलसी ने बड़ा मनोहारी प्रसंग मिथिलापुरी की वाटिका में देवी पूजन के लिए गई माता सीता और उपवन देखते हुए भ्रमण कर रहे राजकुमार युगल के आमने-सामने आने पर रचा है। सीता की एक दृष्टि नृपकिसोर पर पड़ती है, और मन को बाँध लेने वाले नृपकिशोर के दृष्टि से ओझल होने पर चिंता की लहर ही दौड़ जाती है। मृगशावक के चंचल नेत्रों जैसी चंचलता के साथ सीता चारों तरफ देखती हैं, और हर ओर जैसे कमल की पंक्तियाँ बरस जाती हैं। सखियाँ इस व्याकुलता को समझ जाती हैं, और लताओं की ओट में देखने के लिए इंगित करती हैं। साँवले और गौर वर्ण के किशोरों को देखकर आँखे जैसी अपनी निधि को पहचान गईं हों, चमक उठती हैं-  

चितवत चकित चहूँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनचीता ।।

जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी ।।

लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल  गौर  किसोर  सुहाए ।।

देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे   जनु   निज  निधि पहिचाने ।।

कुँअरि मनोहर सीता के लोचन जिस निज निधि को पहचानकर अपनी आराध्य देवी के समक्ष विनत भाव से प्रार्थना के लिए झुकते हैं, वह निधि केवल रूप-सौंदर्य में ही नहीं, वरन् शौर्य-पराक्रम में भी श्रेष्ठतम् है। यह सिद्ध करने का अवसर धनुष-यज्ञ में प्रत्यक्ष है। सीरध्वज जनक के परिताप को मेटने का सामर्थ्य श्रीराम में है। लक्ष्मण के वचन तीक्ष्ण हैं, लेकिन श्रीराम के पराक्रम और शौर्य के इस अपार जनसमुदाय के मध्य प्रदर्शन की एक पृष्ठभूमि बनाने के संदर्भ में अपना अलग महत्त्व रखते हैं। गुरुश्रेष्ठ विश्वामित्र का निर्देश पाकर श्रीराम अत्यंत सहज भाव से जाते हैं, और शिवधनु को उठाकर जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, धनुष टूट जाता है। राम उसे किनारे रखकर सहज भाव से वरमाला पहनने के लिए आगे बढ़ते हैं।

 मानस में प्रसंग आता है, कि श्रीराम ने जैसे ही धनुष तोड़ा और सीताजी के पाणिग्रहण का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, सभा में उपस्थित राजागण अपने असली रूप में आ गए और प्रलाप करने लगे। पिनाक के टूटते ही एक तरफ हर्ष की लहर दौड़ गई थी। अपार जनसमुदाय अपनी प्रसन्नता को जयकार, नृत्य, न्यौछावर, पुष्प वर्षा आदि के माध्यम से व्यक्त कर रहा था, तो दूसरी ओर आमंत्रित राजागण अपनी पराजय देखकर और किशोरवय श्रीराम के द्वारा धनुषभंग करके सीता के वरण को जानकर नियंत्रण खो बैठते हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं-

तब सिय देखि भूप अभिलाषे । कूर   कपूत   मूढ़   मन  माषे ।।

उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ।।

लेहु छड़ाइ सीय कह  कोऊ । धरि  बाँधहु  नृप बालक  दोऊ ।।

तोरें धनुषु  चाड़  नहिं  सरई । जीवत  हमहिं  कुअँरि को बरई ।।

जौं बिदेहु  कछु  करै सहाई ।  जीतहु  समर  सहित दोउ भाई ।।

साधु  भूप  बोले  सुनि बानी । राज   समाजहिं   लाज   लजानी ।।

सभा में उपस्थित राजाओं की नीयत और मानसिकता का बहुत स्पष्ट और सटीक चित्रण बाबा तुलसी ने किया है। राजागण सीताजी को पाने के लिए युद्ध करने को तैयार हैं। वे राम और लक्ष्मण को भी जीत करके बंदी बनाने को उद्यत होते हैं। सीता का अपहरण तक करने के लिए वे तैयार हो जाते हैं। मिथिलापति जनक सीरध्वज अत्यंत सज्जन स्वभाव के हैं, विदेह हैं। वे इतना ही कह पाते हैं, कि राजाओं के इस व्यवहार को देखकर तो लज्जा को भी लज्जा आ जाएगी। इसी समय भृगुसुत परशुराम का आगमन हो जाता है। उनके विकराल वेश को देखकर, उनके पराक्रम का स्मरण करके आतंक मचाने वाले राजागण स्तब्ध रह जाते हैं, और भय से व्याकुल होकर अपने पिता के नाम के साथ अपना परिचय देते हुए प्रणाम करते हैं। स्थितियाँ एकदम बदल जाती हैं, और परशुराम के साथ राम-लक्ष्मण का संवाद चलने लगता है।

वाल्मीकि रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं आता। वहाँ मिथिलापुरी में यज्ञ का आयोजन है। वाल्मीकीय रामायण की मिथिलापुरी वेदाध्ययन, धर्मपालन, शास्त्रार्थ, धार्मिक कर्मकांड आदि के लिए जगत्प्रसिद्ध है। इस कारण मिथिला में अध्ययनार्थ दूर-दूर से विद्यार्थी आते हैं। जनक सीरध्वज के संरक्षण में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप होते रहते हैं। इसी क्रम में एक विशाल यज्ञ का आयोजन हो रहा है, जिसमें गुरु विश्वामित्र के आश्रम के साधु-संन्यासियों के साथ राम और लक्ष्मण भी जाते हैं। गुरु विश्वामित्र के नेतृत्व में सिद्धाश्रम के साधु-संन्यासियों के मिथिलापुरी पहुँचने पर राजा जनक स्वागत-सत्कार करते हैं। दशरथनंदन राम और लक्ष्मण के प्रति जनक आस्थावान होते हैं, क्योंकि इनके पराक्रम से ही कुछ दिन पहले सिद्धाश्रम राक्षसों से मुक्त हुआ था।

विश्वामित्र के कहने पर राजा जनक शिव के धनुष को दर्शनार्थ मँगवाते हैं। उनके सेवकगण बहुत कठिनाई से उस विशाल मञ्जूषा को खींचकर लाते हैं, जिसके अंदर शिव का धनुष रखा था। सीरध्वज जनक बताते हैं, कि अनेक राजा इस धनुष को उठाने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन कोई भी उठा नहीं सका और शिव-धनुष को उठाने वाले के साथ पुत्री सीता के विवाह  की मेरी प्रतिज्ञा अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। राम शिव-धनुष को देखते हैं, और अनुमति पाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास जैसे ही करते हैं, धनुष टूट जाता है। सारी धरती में एकदम हलचल मच जाती है। इस अप्रत्याशित घटना के बाद जनक सँभलते हैं और कहते हैं-

भगवन्दृष्टवीर्यो मे रामो दशरात्मजः ।

अत्यद्भुतमचिन्त्यं च न तर्किमिदं मया ।। 

जनकानां कुले कीर्त्तिमाहरिष्यति मे सुता ।

सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरात्मजम् ।।

मम सत्वा प्रतिज्ञा च वीर्यशुल्केति कौशिक ।

सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता ।।

सीरध्वज जनक के लिए राम की वीरता आश्चर्य में डाल देने वाली है। जनक के लिए राम का कल्पनातीत पराक्रम आत्मसंतुष्टि देता है। सीता का राम के साथ विवाह जनकों के कुल में यश लाएगा। सीता का विवाह वीर, पराक्रमी और शौर्यवान वर से करने की राजा जनक की प्रतिज्ञा सफल होती है। वे अपनी प्राणों से प्रिय पुत्री सीता का विवाह राम से करने के लिए तैयार होते हैं। राजा दशरथ के पास संदेश भेजा जाता है। राम और सीता का विवाह संपन्न होता है।

मानस और रामायण के इस कथा-भेद को सामयिक संदर्भों के साथ यदि देखें, तो बाबा तुलसी का समय अपेक्षाकृत बड़ा विकट दिखाई देता है। म्लेच्छ आक्रांताओं के कारण समाज में जिस प्रकार की अराजकता फैल रही थी, उसका एक अंश धनुष-यज्ञ में राजाओं के व्यवहार से प्रदर्शित होता है। समाज की दिशाहीनता और राजधर्म की अनुपस्थिति ने विषमताओं के अनेक भवन उठा रखे थे, जहाँ अधर्म और कुकर्म का व्यापार होने लगा था। जनसमुदाय थक-हारकर, निराश होकर संतों-भक्तों की ओर देख रहा था, और ऐसे में बाबा तुलसी अपने आराध्य श्रीराम की भक्ति के साथ समाज को जीवनीय शक्ति देने हेतु भी कृत-संकल्पित थे। तुलसीदास जी की रामभक्ति निःसंदेह अनन्य है, किंतु वे सामयिक संदर्भों को छोड़ते नहीं हैं। धनुष-यज्ञ की कथा का वितान इन दोनों बिंदुओं को जोड़ते हुए बना है।

धनुष-यज्ञ के लिए राजा जनक के प्रण को जानकर ‘दीप दीप के भूपति नाना’ पधारे थे। इन सबके मध्य श्रीराम ने उस कार्य को कर दिखाया, जो किसी भी भूपति के लिए, या भू-पतियों के समूहों के लिए असंभव हो गया था। श्रीराम ने पिनाक का भंजन करके उस सभा में सीता का वरण-मात्र नहीं किया था, अपितु अनेक शोषित-संत्रस्त-दलित-पीड़ित जनों के संकटों-कष्टों का भंजन भी किया था। उस सभा से सारे विश्व में श्रीराम के पौरुष, पराक्रम, बल और शौर्य का जो यशःगान हुआ, वह अकल्पनीय और अतुलनीय था।

शिव-धनुष के भंग होते ही उपस्थित राजाओं के द्वारा उत्पन्न की गई अराजकता के मध्य परशुराम का आगमन भी बहुत महत्त्व रखता है। भृगुनंदन परशुराम के आराध्य शिव का धनुष तोड़ने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होगा। परशुराम ने समाज में शांति, सौहार्द और धर्माधारित व्यवस्था को स्थापित करने हेतु सहस्रबाहु का वध किया। अनैतिक कार्यों में लिप्त, निरंकुश और जनता के हितों के प्रति उदासीन रहने वाले शासकों-राजाओं से धरती को विहीन करके समाज को भयमुक्त किया। वृद्धावस्था के समय उनके लिए पुनः उस अतीत को दोहराना कितना कठिन होगा? शिव का धनुष किसी आततायी ने तो नहीं तोड़ा, जो पुनः अतीत की पुनरावृत्ति होने लगे? ऐसी चिंताओं को साथ लिए परशुराम का आगमन जब मिथिलापुरी में होता है, तब उनके क्रोध की कोई सीमा नहीं रहती। परशुराम का विकराल रूप देखकर अनर्गल प्रलाप कर रहे राजागण भयभीत हो जाते हैं और परशुराम को प्रणाम करने लगते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कवितावली में लिखते हैं-

काल   कराल   नृपालन  के,   धनुभंग   सुने  फरसा  लिए  धाए ।

लक्खन- राम बिलोकि सप्रेम, महारिसि तें फिरि आँखि दिखाए ।।

धीर-सिरोमनि,   बीर  बड़े,   बिनयी,   विजयी,   रघुनाथ  सुहाए ।

लायक  हे  भृगुनायक  सो धनुसायक सौंपि सुभाय सिधाए ।।22।।

परशुराम जब राम की वीरता, उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता, राम के शौर्य और पराक्रम से परिचित हो जाते हैं, तब वे वर-वधू को आशीष देते हैं। परशुराम आश्वस्त हो जाते हैं, कि शिव-धनुष तोड़ने वाला विनम्र, धीर-शिरोमणि और लायक है, उचित पात्र है। वे जाते समय अपना धनुष-बाण श्रीराम को सौंप देते हैं। यह राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद भी अपना विशेष महत्त्व और स्थान रखता है।

धनुष-भंग का यह समग्र प्रसंग लोकजीवन से जुड़ता है। रामलीलाओं के मंचन में धनुष-भंग की लीला का अपना विशेष महत्त्व है। धनुष-भंग के प्रथम अंश में सीता-स्वयंवर और द्वितीय अंश में परशुराम-संवाद या परशुरामी आती है। रामलीलाओं के मंचन की परंपरा भी बहुत पुरानी है। कानपुर की परशुरामी बहुत प्रसिद्ध रही है। आज भी लोगों में एक आकर्षण है। धनुष-भंग की लीला में सूत्रधार मंच पर आकर कहता है-   

यह धनुष-यज्ञ का आज दिन, और लीला हो इस ठौर..।

राजत राज समाज में, रामचंद्र सिरमौर....।

येऽऽ संवाद होयँ राजाओं केऽ...., रावण बाणासुर येऽ..

जनक लखैं... गरजैं, तरजैं, धनुष तोड़ देंऽऽ...।

येऽऽ अंत में लक्ष्मण जी का हो अंत में संवाद...।

बस करनी है लीला यही.. सुनो बंधुवर आज...।

सूत्रधार की यह पुकार आज भी जब गूँजती है, तो गाँव हों या कस्बे...., या फिर नगर ही क्यों न हों.... अच्छी-खासी भीड़ जुट जाती है। सूचना-संचार के अनेक साधनों के बीच भी रामलीला के विभिन्न प्रसंगों को रात-रातभर रुचि के साथ देखने वालों की कमी नहीं है। पर्व-त्योहारों में, मांगलिक कार्यों में, शुभ अवसरों पर राम और सीता के विवाह का प्रसंग लोकगीतों में रचा-बसा मिलता है। बुंदेलखंड के गाँवों में आज भी महिलाएँ बड़ी रुचि के साथ गाती हैं-

बने दूल्हा छवि देखो भगवान की, दुल्हन बनी सिया जानकी।

जैसे दूल्हा अवधबिहारी, तैसी दुल्हन जनक दुलारी, जाऊँ तन मन से बलिहारी।

मनसा पूरन भई सबके अरमान की। दुल्हन बनी...

ठाड़े राजा जनक के द्वार, संग में चारउ राजकुमार, दर्शन करते सब नर-नार

धूम छायी है डंका निशान की। दुल्हन बनी...

गुरु विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम में जाने वाले अयोध्या के राजकुमारों की वीरता लोक के अनुराग का आश्रय है। श्रीराम का पराक्रम जन-आस्थाओं में पूजा जाता है। मिथिलापुरी में भरे समाज के मध्य अपने वीरोचित गुण से, अपने बल और अपनी सामर्थ्य से सभी को हतप्रभ कर देने वाले राजकुमार राम के प्रति लोक की आस्था ऐसी प्रगाढ़ है, कि वह हर वर में, हर दूल्हे में राम को देखती है, और हर वधू में सीता को...।

(त्रैमासिक जनमैत्री ई पत्रिका, मुंबई के वर्ष-4, अंक-3, कुलांक-12, दिनांक-15 अगस्त, 2025 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग

 


गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग


बरन-धरम गयो, आस्रम निवास तज्यो,

त्रासन चकित सो परावनो परो सो है।

करम उपासना कुबासना बिनास्यो, ज्ञान

बचन, बिराग बेष जगत हरो सो है॥

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग,

निगम नियोग ते सो केलि ही छरो सो है।

काय मन बचन सुभाय ‘तुलसी’ है जाहि,

रामनाम को भरोसो ताहि को भरोसो है॥84।।

(कवितावली, उत्तरकांड, गोस्वामी तुलसीदास)

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली 16वीं शताब्दी का ग्रंथ है। ब्रजभाषा में रचित इस ग्रंथ में श्रीरामचरितमानस की तरह सात कांड हैं। ग्रंथ में जगह-जगह पर सामयिक विषय परिलक्षित होते हैं। यह छंद भी सामयिक विषय से संबद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास अपने आसपास की स्थितियों का वर्णन इस छंद में कर रहे हैं। वे लिखते हैं, कि- “चारों वर्णों के धर्म नष्ट हो गए हैं। लोगों ने चारों आश्रमों में रहना छोड़ दिया है। अधर्म के डर से लोगों में भगदड़ मच गई है। बुरी इच्छाओं ने कर्म, उपासना, ज्ञान, वचन और वैराग्य वेष को नष्ट कर दिया है, सारा संसार छला हुआ दिखलाई देता है। गोरख ने योग जगाया है। लोगों ने भक्ति को भगा दिया है। निगम के नियोग, अर्थात् वेद आदि ग्रंथों के निर्देशों को खेल बनाकर छल रहे हैं। तुलसीदास कहते हैं, कि जिसको मन-वाणी-कर्म-स्वभाव से राम नाम का विश्वास है, उसी का विश्वास ठीक है।“ 1 छंद ध्वनित करता है, कि जिन धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों से लोग अपने जीवन के लिए मार्ग तय करते थे, उन्हें ही लोग विस्मृत कर बैठे हैं, या उन्हें ऐसा करने के लिए स्थितियों ने विवश कर दिया है। सामयिक स्थितियाँ प्रतिकूल हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित इन पंक्तियों का उल्लेख यहाँ करने का आशय नाथ पंथ के संदर्भ में उनके विचार और अभिमत का विश्लेषण करना है। इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए प्रायः नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ के द्वारा योग के जगाए जाने से भक्ति के प्रचलित स्वरूपों को लोगों के द्वारा त्याग दिए जाने, वेद-आधारित व्यवस्था को छोड़ देने तथा वर्णाश्रम, उपासना आदि को त्याग दिए जाने की बात कही जाती है। इन पंक्तियों का उल्लेख प्रायः इसी संदर्भ में किया भी जाता है। वस्तुतः गोरखनाथ के नाथ पंथ के उदय और विस्तार के साथ इन पंक्तियों के संदर्भ को देखने पर अलग ही पक्ष प्रकट होता है।

हिंदी साहित्येतिहास में नाथ साहित्य के पहले सिद्ध साहित्य का स्थान आता है। व्यवहार की दृष्टि से, साथ ही कालक्रमानुसार सिद्धों का समय पहले है, बाद में नाथपंथियों का समय आता है। साहित्य में इसी अनुरूप अध्ययन होता है।“सिद्ध साहित्य के रचयिता सहजयानी या वज्रयानी संप्रदाय के सिद्ध थे, जिन्होंने अपने संप्रदाय के विचारों एवं अपनी धार्मिक अनुभूतियों को प्रकाशित करने के लिए काव्य रचना की। सहजयान संप्रदाय का संबंध बौद्धधर्म की महायान शाखा की उस परंपरा से है जो तंत्र, मंत्र व अन्य गुह्य साधना-पद्धतियों को अपनाती हुई ईसा की 8वीं शताब्दी के लगभग अत्यंत विकृत होकर एक नये संप्रदाय के रूप में परिवर्तित हो गई थी। इसी संप्रदाय को 'सहजयान' या 'वज्रयान' कहा गया है तथा इसके अनुयायी साधक ही 'सिद्ध' कहलाते हैं।“ 2 सिद्धों की परंपरा का साहित्यिक रूप सिद्ध साहित्य के अंतर्गत आता है। इसमें पुरानी हिंदी में लिखे दोहे और चर्यापद हैं; जिनमें कमल, कुलिश, मुद्रा, रहस्य, पंच बिडाल, गुह्यतंत्र, महासुख आदि का वर्णन करते हुए साधना की सहज पद्धति को अपनाने की सीख दी जाती है। गणपतिचंद्र गुप्त ने सिद्ध साहित्य का विश्लेषण करते हुए सिद्ध सरहपा के मतानुसार स्पष्ट किया है, कि- “वस्तुतः सहजयान में जीवन की सहज वासनाओं की पूर्ति को ही साधना के सर्वोत्कृष्ट रूप से स्वीकार किया गया। सहज वासना या कामवासना की पूर्ति के लिये विभिन्न जाति की मुद्राओं या साधिकाओं के सहयोग से कमल-कुलिश साधना की जाती थी। यद्यपि आधुनिक युग के अनेक व्याख्याता इनकी साधना-पद्धति को आध्यात्मिक सिद्ध करने के लिए कमल, कुलिश, मुद्रा आदि शब्दों की नयी व्याख्या करने का प्रयास भी करते हैं किंतु वस्तुतः ये क्रमश: जननेंद्रिय, पुरुषेंद्रिय एवं नारी के ही पर्यायवाची हैं। सरहपाद ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि सुख से खाते-पीते एवं रमण करते हुए नित्य से चक्र को पूर्ण करते हुए इस धर्म में परलोक की साधना की जाती है। इसी प्रकार अन्य स्थान पर कमल-कुलिश साधना का भी रहस्य उद्घाटित करते हुए उन्होंने लिखा है- 'कमल और कुलिश को मध्य में स्थित करके सुरत विलास का जो आनंद लिया जाता है, त्रिभुवन में कौन उससे वंचित रह सकता है तथा किसकी आशा को वह पूरी नहीं करता!' अस्तु विभिन्न प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिद्ध की साधना-पद्धति वाममार्गी एवं भोग-विलास-प्रधान थी, यह दूसरी बात है कि हम खींच-तान कर उनके शब्दों की आध्यात्मिक व्याख्या भी कर डालें।“ 3

नाथ पंथ की उत्पत्ति के कारकों को भी इस तथ्य में देखा जा सकता है। नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ स्वयं भी सिद्ध परंपरा में आते हैं। उनके गुरु मछेंद्रनाथ भी सिद्धों में गिने जाते हैं। गोरखनाथ और उनके गुरु मछेंद्रनाथ को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कथाएँ भी प्रचलित हैं, जो विशेष रूप से नाथपंथियों में सुनी-सुनाई जाती हैं। ख्यातिलब्ध उपन्यासकार विश्वंभरनाथ उपाध्याय का बहुत चर्चित उपन्यास है- जाग मछंदर गोरख आया। यह उपन्यास सन् 1983 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास की कथावस्तु गोरखनाथ के द्वारा प्रवर्तित नाथ पंथ के संदर्भ में प्रकाश डालती है, साथ ही गोरखनाथ के समकाल का विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। “डॉ. विशंभरनाथ उपाध्याय के उपन्यास जाग मछंदर गोरख आया में नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु मछंदरनाथ और गोरखनाथ की कथा है, इसके साथ ही धर्म की आड़ में किए जाते कुकृत्यों पर तीखा प्रहार भी किया गया है। उपन्यास में एक ओर मत्स्येंद्रनाथ के साथ नर्मदा के विवाह के बाद कामरूप की रानी ललिता देवी और राजकुमारी प्रियंवदा के मायाजाल में उलझने और उससे मुक्त होने की कथा है, तो दूसरी ओर विदेशियों के संभावित आक्रमण की आशंका के कारण उत्तर भारत के राजाओं को संगठित करने में जुटे गोरखनाथ की कथा है। इस्लाम के नाम पर दूसरे देशों में लूटपाट करने, कब्जा जमाने वाले लोगों की खबर उपन्यास में कई जगह ली जाती है।“ 4

गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित-प्रचलित नाथ पंथ की उत्पत्ति का आधार उपरोक्त वर्णित दो स्थितियों में स्पष्ट होता है। नाथ परंपरा के अध्येताओं ने नाथ पंथ को गोरखनाथ से भी पहले का माना है।“विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नाथमत गोरखनाथ के पूर्व भी था, तथापि उसको एक व्यवस्थित और संगठित रूप देने का कार्य गोरखनाथ ने ही सर्वप्रथम किया और बाद का विकास प्रायः उन्हीं की खींची हुई रेखाओं पर होता रहा।“ 5  गोरखनाथ के परवर्ती कालखंड को देखें, तो नाथ-पंथ की रचनाओं की परंपरा लगभग 17वीं शती. तक विस्तृत रही है, तथापि गोरखनाथ की साधना-पद्धति, विचारधारा तथा गोरखनाथ का व्यक्तित्व ही उनमें मुखरित होता रहा है। नाथ पंथ का प्रारंभिक काल और साथ ही गोरक्षनाथ के साथ जुड़ी अनेक किंवदंतियाँ, कथाएँ और प्रसंग नाथ पंथ की पुरातनता को बताते हैं। “क्रुक्स ने एक परंपरा का उल्लेख किया है, जिसे ग्रियर्सन ने भी उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि गोरखनाथ सत्ययुग में पंजाब के पेशावर में, त्रेता में गोरखपुर में, द्वापर में द्वारिका के भी आगे हुरमुज में और कलिकाल में काठियावाड़ की गोरखमढ़ी में प्रादुर्भूत हुए थे।“ 6 इसी प्रकार गोरक्षनाथ की अनेक यात्राओं और वार्ताओं के प्रसंग भी मिलते हैं। अनेक प्रसंग ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व भी रखते हैं। नाथ पंथ की पुरातनता के लिए इन प्रसंगों का उल्लेख विशिष्ट स्थान रखता है। जालंधर (पंजाब) के साथ भी नाथ पंथ का संबंध मिलता है। चौरासी सिद्धों में गिने जाने वाले जालंधरपा को सिद्ध पंथ से अलग पंथ के प्रवर्तक के रूप में भी जाना जाता है।

नागेंद्रनाथ उपाध्याय ने अपने शोध में बारह नाथपंथियों के नामोल्लेख किए हैं। इनमें मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के साथ ही जालंधर, चर्पटि, भर्तृहरि, रेवण, चौरंगी, गोपीचंद, कान्हिप, गहिनी, निवृत्तिनाथ और ज्ञाननाथ का नाम आता है। इनमें से ज्ञाननाथ या ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र के वारकरी संत हैं और नाथ पंथ में भी आते हैं।7 सिद्ध, नाथ और परवर्ती वारकरी, मालकरी और निर्गुण आदि परंपराएँ एक-दूसरे से संबद्ध दिखाई देती हैं। वस्तुतः इन परंपराओं में वैचारिक भिन्नता और समय के अनुरूप पनपने वाली विकृतियाँ नए मतों और पंथों का मार्ग प्रशस्त करती प्रतीत होती हैं, जो कालांतर में अपना व्यापक रूप और अलग धारा प्रकट करती हैं। सिद्धों में जालंधरपा ने जिस वैचारिक भिन्नता को आधार बनाकर नाथ पंथ की भूमि तैयार की, कालांतर में वह गोरक्षनाथ के माध्यम से उर्वर बनी और पुष्पित-पल्लवित हुई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने विवेचन में स्पष्ट किया है, कि- “गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) भी गिन लिये गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया। योगियों की इस हिंदू शाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और बीभत्स विधानों से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव-शक्ति की भावना के कारण कुछ शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी-किसी ग्रंथ (जैसे, शक्ति संगम के तंत्र) में मिलती है। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में- राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत में 'बालनाथ का टीला' आया है।“ 8 नाथ संप्रदाय के ग्रंथों में जलंधरनाथ को ही बालनाथ के नाम से बताया गया है। मछिंदरनाथ बालनाथ के शिष्य थे, और गोरखनाथ मछिंदरनाथ के शिष्य थे। इस तरह जलंधरनाथ से सिद्धों में विचार-व्यवहार आधारित भेद पनपता है, जो गोरखनाथ के समय में स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है।

सिद्धों के द्वारा सहजयान के रूप में वामाचार और तंत्र-साधना का प्रयोग किया जा रहा था, और इस प्रयोग के कारण धार्मिक शुचिता व पवित्रता के स्थान पर रहस्यमयी बातें; नाद, बिंदु, घट, सुरति, निरति आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए गुह्य-गूढ़ चिंतन व दर्शन की बातें सिद्ध साहित्य में दिखाई देने लगीं। इनके कारण उपजने वाली असहजता के मध्य सिद्धों को लेकर भ्रांतियाँ व विकृतियाँ पनपने लगीं। समाज को सही रास्ता दिखाने के स्थान पर चमत्कार और चमत्कारिक घटनाओं को महत्त्व मिलने लगा। सहजयान के नाम पर रचलित हो चली भोगवादी प्रवृत्ति के स्थान पर योग को और साधना-पद्धतियों में प्रचलित हो चली उच्छृंखलता के स्थान पर कड़े अनुशासन को महत्त्व देते हुए गोरखनाथ ने नाथ पंथ को प्रचलित किया। साधना में अनुशासन और योग-परंपरा भारतीय साधना-पद्धति में प्रचलित रही है। शिव को योग का अधिष्ठाता माना जाता है। भारतीय योग-साधना के प्रवर्तक पतंजलि माने जाते हैं। नाथ पंथियों ने अनुशासन के लिए पतंजलि की योग-साधना को आत्मसात् किया, यद्यपि अनेक विद्वान पतंजलि के योगशास्त्र और नाथपंथियों के योग के मध्य कुछ भिन्नताओं को देखते हुए दोनों को अलग मानते हैं, तथापि इस विभेद को देश-काल-स्थिति के कारकों के साथ देखते हुए मूल-आधार को ग्रहण करना चाहिए। नाथपंथ का लक्ष्य महासुख या सहजसुख नहीं, वरन् अमरत्व और शिवत्व को पाना था। गोरक्षनाथ शिव के अवतार माने जाते हैं। मन की शुद्धता, चित्त के विकारों का शमन मन को शुद्ध करने के लिए अनिवार्य माना जाता है। गोरखनाथ का कथन है-

“नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा ।

ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा ।।“ 9

नाथ पंथ के सहित्य का परिचय गोरखबानी के इस उद्धरण के साथ दिया जाता है। गोरखनाथ के द्वारा इन दो पंक्तियों में न केवल नाथ पंथ की वैचारिक पृष्ठभूमि को, वरन् सामयिक संदर्भ को भी बताया गया है। सामने विभिन्न प्रकार की भोग-विलास की वस्तुएँ हैं। पीछे छूट गया सहज अखाड़ा (सहजयानी) है। इन दोनों स्थितियों के मध्य मन को स्थिर करना है। मन को शुद्ध करना है। चित्त के विकारों का शमन करना है। ऐसा करने पर ही मन में, चित्त में शिव और शिवत्व का भंडार भरेगा। नाथ पंथ भौतिकता के सुख-साधनों के मध्य चित्त को स्थिर करने और विकारों से मुक्त करने की साधना पर बल देता है।

‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’, अर्थात् जैसा ब्रह्मांड में है, वैसा ही शरीर में विद्यमान है। नाथ पंथ में इस भावधारा की प्रबलता दिखाई देती है। ब्रह्मांड में खोजने की अपेक्षा पिंड, अर्थात् शरीर में खोजने की बात नाथ पंथ में कही जाती है। यह अद्वय का सिद्धांत है। यह एकरसता का, एकरूपता का सिद्धांत है। यद्यपि यह सिद्धांत भारतीय दर्शन और चिंतन धारा में पुरातनकाल से रहा है, तथापि अनेक मतों-पंथों के वैचारिक संक्रमण के मध्य इस सिद्धांत का पुनर्पाठ हमें नाथ पंथ में ही देखने को मिलता है। कबीर आदि संतों ने अनेक स्थानों पर शरीर को गढ़, कोट आदि रूपकों से अभिव्यंजित किया है। नाथ पंथियों ने शरीर में ब्रह्माण्ड के तत्त्वों का व्यापक चित्रण किया है। संतों के लिए कायसाधना की अपेक्षा मन के विचलन को नियंत्रित करते हुए भक्ति के भाव के साथ जोड़ना अपेक्षित था। इस कारण संतों ने आवश्यकतानुसार ही इस सिद्धांत का वर्णन किया है।

नाथ पंथ का साहित्य उपरोक्त विशिष्टताओं को साथ लेकर विकसित और समृद्ध हुआ है। मुक्तक गीति शैली में नाथ संतों ने अपनी रचनाएँ की हैं। महाराष्ट्र में नाथ पंथ के साधक के रूप में ज्ञानदेव को हम जानते हैं। ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर की रची हुई ज्ञानेश्वरी गीता में नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। उत्तर भारत की ओर चलने वाली संत परंपरा के प्रमुख कवि के रूप में ज्ञानेश्वर और उनके साथ ही संत एकनाथ, संत तुकाराम प्रभृति संत कवियों ने उत्तर भारत में भक्तियुग का आह्वान किया। संत कबीर और उनके परवर्ती संत कवियों की बानियों में नाथ परंपरा के अंश परिलक्षित होते हैं। भक्ति काल के संत कवियों की बानियों में, रचनाओं में भाव पक्ष का भवन नाथ पंथ की भावभूमि से बना है। नाथ पंथ की भाषा और छंद विधान ने संत साहित्य को दिशा दिखाई है।

गोस्वामी तुलसीदास की वैष्णव भक्ति-भावना और सगुणोपासना नाथ पंथ से किंचित् अलग दिखती है, तथापि वे नाथ पंथ की निर्गुणोपासना और योग के प्रति आस्थावान हैं। गोस्वामी तुलसीदास की निर्गुणोपासना के स्थान पर सगुणोपासना और योग के स्थान पर नवधा भक्ति के प्रति अनुराग और अभिव्यक्ति को यत्र-तत्र विरोध के रूप में देख लिया जाता है। यदि तथ्यात्मक चिंतन के साथ पक्षपात और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखें, तो नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास के साथ ही सगुणोपासक अन्य भक्त कवियों में भी देखी जा सकती हैं। उदाहरणार्थ नाथ पंथ का ‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’ का सिद्धांत गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस में मिलता है। यह सिद्धांत बाबा तुलसी के द्वारा अपने आराध्य की विराटता को प्रकट करने का माध्यम बनता है। वे लिखते हैं-

“ब्रह्मांड  निकाया   निर्मित  माया  रोम  रोम  प्रति  बेद कहै ।

मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ।।“ 10

“देखरावा मातहिं निज अद्भूत रूप अखंड ।

रोम रोम  प्रति  लागे   कोटि कोटि  ब्रह्मंड ।।“ 11

गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी के प्रारंभ में संतों के व्यक्तित्व और उनके जीवन का अत्यंत सरस वर्णन मिलता है। इस कृति के प्रारंभ में ही वे लिखते हैं-

“अज अद्वैत अनाम, अलखरूप गुन रहित जो।

मायापति सोइ राम, दास हेतु नर तनु धरेउ ।।“ 12

तुलसी की समन्वय की भावना यहाँ कोई भेद नहीं करती है। वे अलखरूप (गुरु गोरखनाथ द्वारा ईश-स्मरण के लिए ‘अलख निरंजन’ का उद्घोष प्रचलित-प्रसारित किया गया था।) में भी अपने आराध्य को देखते हैं, निर्गुण रूप में भी अपने आराध्य को पाते हैं। इन उद्धरणों के साथ आलेख के प्रारंभ में उल्लिखित पद में अभिव्यंजित भाव को समझ सकते हैं। वहाँ पर वैष्णव भक्त तुलसी की भक्ति भावना प्रबल रूप में परिलक्षित होती है, व उनकी चिंता भी प्रकट होती है, लेकिन उस चिंता के मध्य गोरख के योग का प्रसार सकारात्मक रूप में दिखता है। बाबा तुलसी की समन्वयकारी भावना उस समय के प्रचलित सभी भक्ति-योग रूपों को लेकर चलती है।

भक्ति की सगुण धारा के प्रमुख कवि के रूप में गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व में नाथ पंथ की वैचारिक उपस्थिति के उपरोक्त विश्लेषण के साथ ही संत काव्य या भक्ति की निर्गुण काव्यधारा की निर्मिति में नाथ पंथ का योग स्वतः प्रमाणित है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवि कबीर स्वयं को नाथ पंथ का अंग-अंश मानते हैं। वे स्वीकारते हैं-

“गोरष भरथरि गोपीचंदा । ता मन सो मिलि करै अनंदा ।।

अकल निरंजन सकल सरीरा । ता मन सो मिलि रहा कबीरा ।।“ 13

कबीर के सभी काव्य-रूप, यथा- साखी, पद, रमैनी, बावनी, चौंतीसा, तिथि, बसंत, चाँचर, हिंडोला आदि प्रायः गोरखबानी से ही आए हैं। समस्त संत-साहित्य में हठयोग की शब्दावली विस्तृत है। गुरु नानक के सबद-कीर्तन में भी नाथ पंथ का प्रभाव परिलक्षित होता है। हिंदी के भक्तिकाल में नाथ पंथ की साधना-पद्धति, योग, चिंतन और ध्यान-मनन समग्र विविधता एवं व्यापकता के साथ परिलक्षित होते हैं।

वस्तुतः, गोरखनाथ के द्वारा नाथ पंथ को समृद्ध-सशक्त बनाए जाने का प्रमुख कारण सिद्धों-वज्रयानियों-सहजयानियों द्वारा फैलाई जा रही विकृतियों का प्रतिकार करना था। वामाचार में सन्नद्ध अपने गुरु को भी वे विकृति से निकालने का कार्य करते हैं। ‘जाग मछंदर गोरख आया...’ में यही तथ्य दिखता है। नाथ पंथ का ध्येय लोकजीवन का परिमार्जन है। यह अलग बात है, कि विभिन्न आलोचकों-अध्येताओं की दृष्टि में उनका हठयोग और उनकी साधना-पद्धति जीवन की स्वाभाविक स्थिति, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के सामान्य एवं सुव्यवस्थित रूप के साथ संबधित नहीं है। कुछ आलोचक, साहित्येतिहासकार नाथ पंथ के साहित्यिक अवदान को भक्ति-विषयक कहकर एकांगी और साहित्येतर की श्रेणी में रखते हैं। इन दोनों ही स्थितियों के विपरीत नाथ पंथ के साहित्य को भक्ति साहित्य और हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के लिए अवदान के संदर्भों के साथ विश्लेषित करने पर एक विस्तृत एवं समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। नाथ पंथ निष्पक्ष एवं लोकानुरागी, लोकहितकारी आध्यात्मिक क्रांति के रूप में उस विषम काल में दिखाई देता है, जब विधर्मी विदेशी आक्रांताओं के साथ ही देश के अंदर पंथाधारित (वज्रयान, सहजयान आदि में पनपी) धार्मिक विकृतियाँ लोक चेतना और लोकजीवन को दिशाविहीन कर रहीं थीं। हिंदी का भक्तिकाल नाथ पंथ की आध्यात्मिक चेतना से रस-संचय कर लोक के पथ का मार्गदर्शन करता है, तो इसमें नाथ-साहित्य के बृहत्-विशद-व्यापक योगदान को देखा जाना अपेक्षित व अनिवार्य हो जाता है। इसके साथ ही नाथ-साहित्य के व्यापक विश्लेषण एवं शोध की अपरिमित संभावनाएँ दिखाई देती हैं, जिनको कार्यरूप में परिणत कर नाथ-साहित्य के समाज-सापेक्ष, लोक-सापेक्ष यथार्थपूर्ण एवं तर्कपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन-प्रकटीकरण किया जा सकता है।


संदर्भ-

1. गोस्वामी तुलसीदासकृत कवितावली सटीक, उत्तरकांड, टीकाकार पं. गणेश पांडेय, ठा. सूर्यनाथ सिंह ‘विशारद’, छात्रहितकारी पुस्तकमाला, प्रयाग, सं. 1936, पृ. 173,

2. गणपतिचंद्र गुप्त, पूर्ववर्ती भारतीय साहित्य एवं उसका प्रभाव, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, प्रथम खंड, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, सं. 2010, पृ. 44,

3. वही, पृ. 45,

4. राहुल मिश्र, आठवें दशक के बाद के उपन्यासों के कथ्यात्मक चिंतन के संदर्भ, हिंदी कथा-साहित्य : आठवें दशक के बाद, ग्रंथकेतन, नई दिल्ली, सं. 2009, पृ. 174,

5. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथों और संतों के जातीय और सामाजिक संबंध, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 57,

6. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गोरक्षनाथ (गोरखनाथ), नाथ-संप्रदाय, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, सं. 1950, पृ. 97,

7. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथ और संत साहित्य, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 33,

8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं. 2015, पृ. 29-30,

9. डॉ. नगेन्द्र (संपादक), आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली सं. 2004, पृ. 67,

10. गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस, बालकांड, दोहा 192, लोकभारती टीका, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, पृ. 210,  

11. वही, दोहा 201, पृ. 218,

12. गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी, सो. 04, तुलसी ग्रंथावली, प्रथम भाग, सं. पं. महावीर प्रसाद मालवीय ‘वैद्य’, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग, सं. संवत् 1981 वि., पृ. 05,

13. श्यामसुंदर दासकृत कबीर ग्रंथावली, प्रस्तावना, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 1985, पृ. 38 ।

(हिंदी विभाग, कालिकट विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका 'शोध प्रयाण' के प्रवेशांक, मार्च- 2024 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र