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Saturday, 5 September 2026

बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह

 






बहुरंगी जीवन की डायरी जैसा कविता-संग्रह


डॉ. अतुला भास्कर हिंदी साहित्य-जगत् में एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्य की विविध विधाओं में आपका लेखन है, और एक विशेष स्थान रखता है। आपका सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह इस क्रम की एक कड़ी के रूप में सामने है।

कविताई जब जीवन के गहरे अनुभवों से साक्षात् करते हुए आकार पाती है, तब उसकी गहनता, उसका घनत्व अपना प्रभाव स्थापित करता है। जीवन के अनुभव भी यदि कोरे घटनाक्रम न होकर चिंतन की एक दृष्टि को लेकर कविताई में समा गए हों, तो बात कुछ और ही हो जाती है। इतना ही नहीं, निजता का फैलाव दूर तक होता है, जिसमें व्यष्टि भी समष्टि को लेकर चल पड़ती है। स्वयं की वेदना केवल अपनी नहीं होती, इसमें सारा परिवेश झलकता है। काव्य-संग्रह की अंतिम कविता भले ही अंतिम हो, किंतु यहाँ से बात प्रारंभ करने का आशय अलग ही है। डॉ. अतुला जी लिखती हैं-

दुनिया जिसको पूजती / विवशता समाधि पर झुकती । / प्रपंच-पाखंड षड्यंत्र, जन-जन को छलें । / दायित्वों से दूर कर, वैमनस्यता को गढ़ें । / मोहन तुमको आना होगा, / मानवता का पाठ पढ़ाना होगा ।

समय के बंधन का, जीवन की बँधी-बँधाई लीक का सुंदर चित्रण गुलदान के फूलों, फड़फड़ाते पन्नों और घड़ी की सुइयों से दिया गया है। ये बिंब अनूठे हैं, और जीवन की गति बहुत सहजता के साथ बताते हैं।

गुलदान में मुस्कुराते फूल / हवा से फड़फड़ाते पन्ने / जिंदगी की रफ्तार सुनाते / घड़ी का अनुशासन / सुइयों का खेल / अपनी लय / अपनी चाल / कभी दूर / कभी पास / कभी जुड़ाव / कभी बिखराव / सबक सिखाते / मिलें-बिछुड़ें / पर रुके नहीं ।।

मानव-जीवन भी वस्तुतः एक ऐसे बंधन में बँधा हुआ है, जो प्रत्यक्ष नहीं है। इस बंधन में बँधकर जिस विवशता, बेचैनी, व्याकुलता, संत्रास और तनाव में जीते हैं, उसे अपने परिवेश में, अपने आसपास सहज ही देखा जा सकता है। इस विषमता के मध्य डॉ. अतुला जी बहुत सरल बिंब के सहारे गूढ़ बात कहती हैं। गुलदान के पुष्प गुलदान के बंधन में रहकर भी मुस्कुराते हैं। पन्ने जिल्द में बँधे हैं, फिर भी फड़फड़ाकर अपने अस्तित्व की अनुभूति कराते हैं घड़ी की सुईयाँ एक बँधी गति से चलती हैं, चलती ही जाती हैं। मानव का जीवन भी इन्हीं से सीख लेकर चल सकता है।

अतुला जी के काव्य-संग्रह की यह बड़ी विशेषता है, कि हर एक कविता एक कैनवस पर उतारे गए सरल-से, बहुत संयत और सौम्य-शांत आकार की तरह दिखती है। जटिल-से भड़कीले रंग-विन्यास यहाँ नहीं हैं। उनकी कविताएँ जीवन के सामान्य-से प्रसंगों को लेकर रची गईं हैं। दैनंदिन जीवन की गतिविधियाँ किस तरह से विचारों की वीथियाँ सहेजे होती हैं, अतुला जी की कविताओं में देख सकते हैं। संग्रह की दूसरी कविता से बानगी देखिए-

वो रास्ता / था जिससे / रोज का वास्ता / स्कूल का, / कालेज का, / यूनिवर्सिटी का, / मंजिल पर पहुँचा / क्यों दूर हो गया?

रास्ते और मंजिलें एक-दूसरे की पूरक भले ही हों, लेकिन एक बार में केवल एक ही साथ होता है। रास्ते पूरे होते हैं, तो मंजिल मिलती है और मंजिल मिल जाती है, तो रास्ते छूट जाते हैं। ऐसे ही छूट जाते हैं कई लोग, जो रास्ते में मिलते हैं। मंजिल की अपनी शर्तें होती हैं। वहाँ रास्ते के लोग साथ नहीं होते। मंजिल के साथ पाई हुई सफलता राह के अनेक साथियों को छोड़कर हासिल होती है। ‘रास्ता’ कविता इसी भावधारा में बुनी गई है। रास्ते और मंजिल की क्रमशः गति में कोई अवकाश नहीं है, शिकवा-शिकायत का, अपने-पराए का, किसी भावना में बँध रहने का.... गति यही है।

अतुला जी की कविताओं की यह बड़ी विशेषता है, कि वे जीवन के सरल-सहज ‘स्केच्स’ में चिंतन के रंग भरती हैं, जिनमें कहीं अध्यात्म भी होता है, तो कहीं पर दर्शन भी...। ‘आत्मा’ कविता में वे सवाल उठाती हैं, कि आखिर मृतक से भय क्यों है? मृतक का तुरंत ही क्रिया-कर्म कर दिया जाता है। वह चालाकी-बेईमानी-मक्कारी जैसे जीवधारियों के लक्षणों से दूर है। उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है, जो ऐसे दुर्गुणों से दूर है। वह तो शांत है, तटस्थ है। फिर भी यदि समाज ऐसा करता है, तो निःसंदेह समाज इन दुर्गुणों से विचलित नहीं है। जो इन दुर्गुणों से मुक्त है, जो शरीर के बंधन से मुक्त है, वह समाज के लिए विचलन उत्पन्न कर रहा है।कहा जा रहा है, कि समाज में विचलन दुर्गुणों के कारण नहीं, दुर्गुणों से मुक्ति के कारण है... समाज इन दुर्गुणों को स्वीकारता है, इनके साथ जीता है। एकदम अलग दृष्टि इस कविता में देखने को मिलती है। कवयित्री सीधे यह भी स्पष्ट कर देना चाहती है, कि हमारा समाज जीवन-धारियों के लक्षणों में दुर्गुणों को गिनता है।  

सवाल है कि / भय मृतक से क्यों? / चालाकी, बेईमानी / मक्कारी, छल औ कपट / जीवन धारियों के लक्षण / आत्मा की शांति / प्रार्थना और कामना / उसके लिए क्यों? / जो पहले ही से / पूर्णरूपेण शांत, / तटस्थ और निर्लेप।

विदाई समारोह में / उपस्थित अन्य जन / अशांत-व्याकुल-बेचैन, / चिंतातुर और परेशान ।

ऐसी ही एक अन्य कविता है- आदमी। आदमी जिस रूप को पाया है, उसके लिए वह दोषी नहीं है, क्योंकि रंग और रूप का गढ़ा जाना उसके हाथ में नहीं, लेकिन वह आदमी तो बन सकता है, आदमीपन तो उसके वश में है। मानवीयता के लिए किसी रंग किसी रूप की आवश्यकता नहीं होती, उलटे यह गुण रंग-रूप की विरूपता को ढक लेता है, लेकिन आदमीपन की चिंता अकसर रूप-सौंदर्य की चिंता के नीचे दबकर रह जाती है।

आदमी अपने रूप / के लिए नहीं / ‘आदमी’-पन के अभाव / के लिए दोषी । ‘आदमी’-पन का / वह स्वयं निर्माता / पर रूप बनाना / उसकी विवशता ।।

‘फर्क तो पड़ता है’ कविता भी मानव-स्वभाव की पड़ताल करती है। एक भेद, जो अपने और पराए के बीच होता है, वह भावनात्मक रूप से भी एक अंतर तैयार करता है। अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। जब इस अंतर को मिटाकर अपने लोग पराए जैसा व्यवहार करने लगें, तो मन को बहुत पीड़ा होती है। लेकिन आज के समय की यह भी कड़वी सच्चाई है।

संग्रह की कविताएँ स्त्री-मन का पाठ एकदम अलग तासीर में करती हैं। ‘चुप रहना’ कविता में स्त्री की नियति को बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया गया है। उम्र के किसी भी पड़ाव में उसके हिस्से केवल चुप रहना ही आता है। तमाम संघर्षों, समस्याओं और चुनौतियों के बाद भी वह अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होती, लेकिन बदले में उसे सब सहते हुए चुप रहना होता है। हर बेटी को अपने पिता का घर बहुत प्रिय होता है। वहाँ उसके बचपन की स्मृतियाँ सहेजी हुई होती हैं। बाबुल के घर का लगाव कविता के पहले हिस्से में यक्साँ है। माता-पिता के साथ बेटी मुखर होती है, लेकिन उसके जीवन का दूसरा पड़ाव उसके लिए मौन लेकर आता है। कविता का तीसरा भाग पाठकीय चेतना को झकझोर देता है। माँ का सारा त्याग और समर्पण अपने बच्चों के लिए है, लेकिन उम्र का पड़ाव कहें, पीढ़ियों का अंतर कहें, या बदलते समय की विवशता कहें, माँ चुप ही रह जाती है।

मैं माँ / ममतामयी आँचल / शीतल छाया / ढेरों आशीर्वाद / ढेरों मन्नतें / बहुत सारा प्यार / खूब सा दुलार / मुसीबतों की ढाल / माँ तो आखिर माँ / है एक शर्त / है चुप रहना / मन में ही रखना / कुछ नहीं कहना ।।

कविता-संग्रह से चुनकर कुछ कविताओं का अलग से उल्लेख करते हुए समूचे संग्रह पर बात करना आसान होगा। इस दृष्टि से अलग-अलग तासीर की कविताओं का ऊपर उल्लेख किया है। डॉ. अतुला जी की लेखनी विविध विषयों पर चली है। कहीं पर वे अतीत की परतों को खँगालती हैं, तो कहीं भविष्य का ताना-बाना बुनती हैं। उनकी एक कविता है- फतेहाबाद। अपने कर्मक्षेत्र को वे इस कविता के सहारे याद करती हैं। ‘हल्कू’ कविता में अलग-अलग कृतियों के पात्र एकसाथ आए हैं, जो आज के जटिल समय की चुनौतियों से साक्षात् कर रहे हैं।

संग्रह की कुछ कविताएँ, जैसे- खुश्क रोटी, माँ, जिम्मेदारी, औरत, घर....अलग तरीके से अपनी ओर खींचती हैं। कविताएँ तो क्या हैं, क्षणिकाएँ हैं....। एक साँस में पढ़ जाइए। लेकिन इसके बाद आप सरलता से निकलकर नहीं जा सकते। बहुत सामान्य-सी बातें, दैनंदिन जीवन की घटनाएँ इनमें हैं, लेकिन बहुत गहरे उतरकर अपना असर छोड़ती हैं, ‘सतसैया के दोहरे’ की तरह। बिहारी सतसई के दोहे बहुत छोटे थे- ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।’ अतुला जी की इन क्षणिकाओं के लिए यह उपमा मेरे हिसाब से बहुत सटीक बैठती है। पिता किस तरह अपने जीवन को गलाता है, अपने सुखों की कटौती करके कैसे बच्चों के लिए सुख जुटाता है। ‘खुश्क रोटी’ पढ़कर ऐसे अनुभव से आप गुजरेंगे, जिसे अपने साथ या अपने परिवेश के साथ घटता हुआ पाएँगे। इस दृष्टि से भी कविताएँ बड़े मार्के की हैं। जीवन का कड़वा यथार्थ परिवार के संदर्भों में दिखता है। समय और समाज की सच्चाई अनेक स्थानों पर देखी जा सकती है, लेकिन इतनी सहजता के साथ समय और परिवार की कड़वी सच्चाई को लेखनी के सहारे उतार पाना सिद्धहस्त सृजनधर्मी के वश की बात ही होती है, और कहना न होगा कि डॉ. अतुला जी ने अपनी रचनाधर्मिता को, अपने सृजन को इसी ऊँचाई पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है।

संग्रह का पहला हिस्सा समय और परिवार का दिखता है, तो दूसरे हिस्से में ‘मशाल’, ‘टीआरपी’, ‘शुक्रिया’, ‘परिचय’ और ‘सोशल मीडिया’ जैसी कविताएँ आती हैं। समय और समाज की सच्चाई अतुला जी के यहाँ घटनाओं के वर्णन तक सिमटी हुई नहीं हैं। कह सकते हैं, कि घटनाएँ तो केवल संदर्भ के लिए हैं। वस्तुतः विचारों की लंबी वीथिका इन छोटी-छोटी घटनाओं के बीच से गुजरकर जाती है। मानों किसी गलियारे से होकर जीवन के सफर को तय कर रहे हों, और गलियारे के दोनों ओर ऐसी घटनाओं की झलकियाँ दिखती जाएँ। कविताएँ पाठकीय चेतना को झंकृत कर देती हैं, सोचने के लिए विवश कर देती हैं। ‘सोशल मीडिया’ में व्यंग्य का हल्का-सा पुट जो है, वो ठहरकर सोचने के लिए विवश कर देता है, कि सोशल मीडिया के इस दौर में हम कहाँ पर हैं? कहना न होगा, कि कविता की निम्न पंक्तियाँ एक मानदंड ही बन जाती हैं, पाठक के लिए...। खुद का आकलन कर लेने के लिए..।

वाह!!! / आदर्श समाज / की ओर बढ़ते कदम / सभी परमज्ञानी ।

ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध,बेईमानी / सब पर विजय ।

चारों तरफ सब कुछ / अच्छा ही अच्छा ।

सुख में दुःख में / उपस्थिति जरूरी / अजी, बिलकुल नहीं / संदेश भेजें और / कर्त्तव्यपूर्ति सुगम ।

संग्रह के तीसरे हिस्से में ऐसी कविताएँ रखी जा सकती हैं, जिनमें विचारों की गहनता अपेक्षाकृत घनीभूत होती है। अतुला जी इन कविताओं में ऐसे प्रतीकों का प्रयोग करतीं हैं, जो वैचारिकी को सांद्र कर देते हैं। बानगी के तौर पर देखिए-

दोमुहाँ अजब संस्कार / संबंधों की बंजर भूमि / पर रेंगते व्यवहार.....

साधना की धूनी का , धुआँ है अखरता ।....

योग्य वही अभिनय के, जिनके अंग अंग हैं हिलते । / टूटी कमर है जिनकी उन्हें ही सिंहासन हैं मिलते ।

ऐसे समय में सावधानी / हमारी आस्तीनों में चौकस रहती है ।

संग्रह की अधिकांश कविताएँ भविष्य के प्रति आस्था को ध्वनित करती हैं। अनागत कविता आंदोलन के ध्येय-वाक्य की छवि संग्रह में दिखती है। कठिन वर्तमान को जीते हुए सुखद भविष्य की कामना विभिन्न कविताओं में दिखती है। बानगी के तौर पर एक कविता का उल्लेख यहाँ पर करना होगा। ‘सांध्य वेला’ वस्तुतः संध्याकाल का सुंदर चित्र खींचती है, वह भी लयबद्धता के साथ..। यह ‘सांध्यवेला’ अपने साथ जिस सुखद कामना को लेकर आ रही है, वह सांध्यवेला को उजास की वेला बना देती है-

सुनसुन के नीड़ों से चिड़ियों का कलरव, / प्रियतम का पथ जोहे मतवाली हरपल ।।

समग्रतः, संग्रह की सभी कविताएँ ऐसा वितान रचती हैं, जिसमें जीवन के अलग-अलग रंग कहीं चटकीले, तो कहीं सुंदर-सौम्य होकर उभरते हैं। कविता-संग्रह की यह ऐसी विशिष्टता है, जो सहज ही प्रस्फुटित होती है और संग्रह से साक्षात् करते हुए पाठक को अपने आकर्षण में  बाँधती चली जाती है। कृति न केवल पठनीय है, अपितु संग्रहणीय भी है।

(डॉ. अतुला भास्कर की काव्य-कृति शब्द-सेतु, प्रकाशक ज्ञानगीता प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2025 में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र