लोक के राम, राम का लोक
छैंयाँ बिलमा1
लेव बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।
लाला लखनलाल
कुम्हलाने, सिय के हुइहैं पाँव पिराने,
तनक बैठ तो जाव बटोही,
बिरछा तरे बिराजो ।।
खाओ अचार2,
गुलेंदे, महुआ, यहै कुआँ का पानी मिठौआ ।
पानी तो पी लेव बटोही,
बिरछा तरे बिराजो ।।
रस्ता तुम्हरी देखी
नइयाँ, बीहड़ तऊ पै है बिलगैयाँ3 ।
मृदुल संग लै लेव
बटोही, बिरछा तरे बिराजो ।।
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1. आराम करना, 2.
चिरौंजी, 3. भटकाने वाली
भजन के ये पद बुंदेलखंड अंचल की अपनी लोक-परंपरा के अभिन्न
अंग हैं। अयोध्या नगरी से वन की ओर जा रहे राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर बरबस ही
मुख से निकल पड़े ये शब्द बुंदेलखंड की प्रभाती गायकी और भजन गायकी की परंपरा में
कब से हैं, यह बता पाना कठिन है, किंतु गीत के इन बोलों में छिपे भाव युगों-युगों
के जीवन की कथा को कह जाते हैं। बाबा तुलसी ने इसी भाव के साहित्यिक रूप का सर्जन
किया है, ‘पुर तें निकसीं रघुवीर वधू, धरि धीर दये मग में डग द्वय...’
कहकर। यहाँ गाँव के सीधे-सरल लोग हैं, जो राजकुमारों के द्वारा वनवासी का वेश धारण
करके वन की ओर जाते देखकर उनका सानिध्य पाना चाहते हैं। इसी कारण वे बड़ी सरलता के
साथ राम से कहते हैं- थोड़ी देर आराम तो कर लो। ओ पथिक! तुम्हारे साथ चल रहे
राजकुमार लक्ष्मण का चेहरा थकान के कारण कुम्हला गया है। सीता जी के पैरों में
दर्द होने लगा होगा, इसलिए थोड़ी देर आराम कर लो। हमारे पास आपको खिलाने के लिए
राजमहलों में बनने वाले व्यंजन तो नहीं है, मगर वन में मिलने वाले भोज्य पदार्थ
आपके लिए सहर्ष प्रस्तुत हैं। चिरौंजी, गुलेंदा, महुआ आदि बुंदेलखंड अंचल में बहुत
उपजता है। हम आदिवासियों के लिए यही व्यंजन हैं- महुआ मेवा, बेर कलेवा, गुलगुच
बड़ी मिठाई....। अयोध्या के वनगामी राजवंशियों, आप इन्हें ग्रहण करें, और इस
मीठे जल वाले कुएँ का पानी पियें। आगे का रास्ता कठिन है, इसलिए यहाँ पर थोड़ा
आराम कर लेना आपके लिए उचित होगा।
यही भाव तुलसी के मानस में देखने को मिलते हैं। वहाँ कोल-किरातों
को राम के आगमन की सूचना मिलती है, तो वे स्वागत के लिए पहुँच जाते हैं। मानस में
तुलसी लिखते हैं-
यह सुधि
कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ।।
कंद मूल
फल भरि भरि दोना । चले रंक जनु लूटन सोना ।।
धन्य भूमि
बन पंथ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम धारा ।।
धन्य बिहग
मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ।।
जब तें आइ
रहे रघुनायक । तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ।।
फूलहिं
फलहिं बिटप बिधि नाना । मंजु बलित बर बेलि बिताना ।।
कोल किरातों के लिए राम, लक्ष्मण और सीता का
चित्रकूट के वनक्षेत्र में पहुँचना, चित्रकूट के परिक्षेत्र में आना इस प्रकार है,
जैसे कोई नई निधि, नई संपत्ति घर में आ गई हो। वे इस संपत्ति के आ जाने पर इतने
हर्षित हैं, कि उन्हें स्वागत करने की विधि भी समझ नहीं आ रही। वे पत्तों से दोना
बनाकर उनमें कंद-मूल-फल भरकर लिए जा रहे हैं। बाबा तुलसी सुंदर चित्र खींचते हैं। वनवासी
जन इस तरह से उमंग में भरकर जा रहे हैं, जैसे रंक को खजाना ही मिल गया हो। उनके
उल्लास का कोई ठिकाना नहीं है। जन समुदाय तो उमंग और उल्लास में भरा हुआ है ही,
साथ ही चित्रकूट की पुण्यश्लोका धरा भी मुदित हो गई है। समूचा वनप्रांतर प्रसन्न
हो उठा है। बाबा तुलसी कहते हैं, कि जहाँ-जहाँ श्रीराम अपने चरण रख रहे हैं, वहाँ
के मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, धरती-नदी-ताल-सरिता आदि सभी स्वयं को बड़भागी मान
रहे हैं। चित्रकूट के वन प्रांतर में श्रीराम को निहारकर पशु-पक्षियों के साथ ही समस्त
वनवासी अपने जन्म को सार्थक मान रहे हैं, जन्म को सफल मान रहे हैं। श्रीराम ने जब
से चित्रकूट में अपना निवास बनाया है, तब से वन मंगलदायक हो गया है। मनुष्य ही
नहीं, वनस्पतियाँ भी उल्लास और उमंग से भर गईं हैं।
बाबा तुलसी ने श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के चित्रकूट
निवास की बहुत सुंदर और रुचिकर कथा कही है। एक उत्सव का वातावरण चित्रकूट में बना
हुआ प्रतीत होता है। यद्यपि चित्रकूट की महिमा और माहात्म्य श्रीराम के आगमन के
पूर्व ही स्थापित था। इसी कारण प्रयाग के तट पर भरद्वाज ऋषि ने श्रीराम के द्वारा
निवास हेतु उचित स्थल के संबंध में पूछे जाने पर चित्रकूट में निवास करने के लिए
कहा था-
चित्रकूट
गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।।
सैलु
सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहरि बिहारू ।।
बाबा तुलसी के मानस में लोक-परंपरा से रस-संचित
अनेक प्रसंग देखने को मिलते हैं। ऐसे अनेक प्रसंगों के बीच वनवासी राम, लक्ष्मण और
सीता का प्रसंग सर्वाधिक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत होता है। मानस में एक अन्य
प्रसंग आता है- केवट और राम के बीच संवाद का। अयोध्या के राजकुमार राम भले ही
वनवासी के वेश में हों, किंतु वे अयोध्या राजपरिवार के सम्मानित सदस्य और अयोध्या
के भावी राजा हैं। इसके बावजूद जब वे केवट से नाव लाने के लिए कहते हैं, तब केवट
उन्हें ऐसी सादगी से उत्तर देता है, कि राजा और प्रजा के बीच का भेद दूर-दूर तक
कहीं दिखाई नहीं पड़ता है-
पात भरी
सहरी, सकल सुत बारे-बारे, केवट की जाति, कछु वेद न पढ़ाइहौं ।।
परिवारे
मेरो याहि लागि राजा जू, हौं दीन वित्तविहीन, कैसे दूसरी गढ़ाइहौं ।।
गौतम की
धरनी ज्यों तरनि तरेंगी मेरी, प्रभु से विवादु ह्वै के वाद ना बढ़ाइहौं ।।
तुलसी के
ईस राम रावरे से साँची कहौं, बिना पग धोए नाथ नाव न चढ़ाइहौं।।
यहाँ केवट के कहने का अभिप्राय यह भी है, कि आप
भले ही अयोध्या के होने वाले राजा हों, किंतु इस समय आप वनवासी हैं, और मेरी
एकमात्र नाव के पत्थर बन जाने पर आपसे भी कोई मदद मुझे नहीं मिल सकेगी। इस कारण
मैं आपके चरण धोने के बाद ही आपको नाव में चढ़ने दूँगा। जब कभी राजशाही और
मध्ययुगीन बर्बरता की बात आती है, तब राम और केवट संवाद अत्यंत प्रासंगिक हो उठता
है। निश्चित रूप से राम और केवट का संवाद भी लोक-परंपरा से शिष्ट साहित्य में,
तुलसी के मानस में पहुँचा होगा, क्योंकि लोक-परंपरा में विकसित प्रकीर्ण साहित्य
की यह बड़ी विशेषता होती है, कि वहाँ ऊँच-नीच का, राजा-रंक का भेद नहीं होता है।
वहाँ समानता-समरसता के दर्शन होते हैं।
केवट और राम के बीच संवाद का लोक-पक्ष अत्यंत रुचिकर है। एक ओर केवट को अपनी नाव की चिंता होती है; वह राम के पाँव पखारकर ही उन्हें नाव में चढ़ाने की बात कहता है, निवेदन करता है। दूसरी ओर नाव में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के विराजमान हो जाने के बाद जब नाव चलती है, तो बिना किसी बाधा के उन्हें पार उतारने के लिए केवट चिंतित होता है। लोक की दृष्टि इस ओर जाती है।
लोकगीत गाया जाता है-
मोरी नइया
में लक्षिमन राम, ओ गंगा मइया धीरे बहो...।
केवट की
नैया, भागीरथ की गंगा......, राजा दशरथ के लक्षिमन राम...
गंगा मइया
धीरे बहो..., मोरी नइया में लक्षिमन राम..।
रामकथा में दो प्रसंग और आते हैं। पहला अहल्या
के उद्धार का है, और दूसरा शबरी की प्रतीक्षा का है। अहल्या का प्रसंग राम वनगमन
के पूर्व आता है, जब राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम में जाते
हैं। मार्ग में गुरु विश्वामित्र अहल्या से परिचय कराते हैं। पद्मश्री नरेंद्र
कोहली द्वारा अपनी गद्यात्मक रामकथा- ‘अभ्युदय’ में अहल्या उद्धार का तर्कपूर्ण और
अत्यंत व्यावहारिक वर्णन किया गया है। गौतम ऋषि के सूने पड़े आश्रम में अहल्या
श्रापित जीवन बिता रही है। उसका जीवन प्रायः प्रस्तर-सदृश हो गया है। उसको समाज से
बहिष्कृत कर दिया गया है। इंद्र के अपराध का दंड अहल्या को भोगना पड़ रहा है। गौतम
ऋषि भी उस दंड को भोग रहे हैं, उनके पुत्र शतानंद भी इस दंड को भोग रहे हैं। गुरु विश्वामित्र
अहल्या के साथ हुए अन्याय को जानते थे, और यह भी उन्हें ज्ञात था, कि अयोध्या के
राजकुमार और मिथिला के होने वाले जमाई के माध्यम से यदि अहल्या को समाज में पुनः
प्रतिष्ठा दिलाई जाएगी, तो सभी को स्वीकार्य होगी। बाद में श्रीराम और लक्ष्मण ने
सिद्धाश्रम में राक्षसों का वध करके अपने शौर्य का परिचय दिया था, समाज में
आदरपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। केवट प्रसंग प्रकारांतर से राम के शौर्यभाव और
वीरतापूर्ण कार्य का स्मरण ही था।
इसी प्रकार शबरी के जूठे बेर खाने का प्रसंग भी
आता है। शबरी के पास तक राम की ख्याति पहुँची थी। लोकरक्षक, जन-जन के प्रिय
श्रीराम उस वृद्धा शबरी की कुटिया में अवश्य पधारेंगे, यह भरोसा लिए शबरी अपना
जीवन बिता रही थी। कहीं अपने आराध्य राम को वह खट्टे बेर न खिला दे, इस भाव से वह
चखकर उन बेरों को ही राम को दे रही है, जो मीठे हैं, सुस्वादु हैं। यह आत्मीयता,
यह लगाव सहज नहीं है, वरन् अनेक अर्थों को स्वयं में समाहित किए हुए है। एक और
श्रीराम का शौर्यभाव है, उनका लोकरक्षक स्वरूप है, तो दूसरी ओर श्रीराम के
व्यक्तित्व की सहजता है, सरलता है। इसी कारण शबरी के जूठे बेर उन्हें स्वीकार्य
होते हैं। इसी कारण केवट की व्यंग्यपूर्ण बातें उन्हें चुभती नहीं हैं। यही कारण
है, कि चित्रकूट के वनवासी बेर, गुलेंदा, कचरियाँ, महुआ, कंद, मूल, फल आदि दोनों
में भर-भरकर लाते हैं, और राम का स्वागत करते हैं।
तुलसी के मानस में वनवासी राम का सौंदर्य,
विशेषकर समरसता-सौहार्द-समन्वय में घुल-मिलकर विकसित हुआ कर्म का सौंदर्य अपने
आकर्षण में बरबस ही बाँध लेता है। वनवासी राम की सफलता का श्रेय भी इसी वैशिष्ट्य
को जाता है। तुलसी के मानस सहित अन्य रामकथाओं में वनगमन प्रसंग इसी कारण अपना
विशेष महत्त्व रखता है। श्रीराम के प्रति लोक का अनुराग, लोक का आत्मीय भाव किसी
एक कालखंड या किसी एक युग में सिमटा हुआ नहीं है। इसका विस्तार काल और भूगोल की
परिधि से बाहर है, व्यापक है। राम और कृष्ण के प्रति लोक की आस्था तब प्रबल होती
है, जब वे लोक से जुड़ते हैं। वनवासी राम के साथ चित्रकूट के वन प्रांतर से लगाकर
दंडक वन तक, किष्किंधा तक अपार जनसमुदाय जुड़ता है। राम के पास सेना की ताकत नहीं
थी। राम लोक की शक्ति से समृद्ध हुए और रावण जैसे क्रूर, आततायी शासक को परास्त किया।
विभिन्न वन्य जातियाँ, वनवासी समूह राम के साथ इस तरह से जुड़े, कि लंका विजय के
उपरांत सभी अयोध्या तक पहुँचे और राम के साथ ही जीवन-पर्यंत रहने की कामना करने
लगे। राम ने ही उन्हें अपने-अपने घर जाकर कर्म में संलग्न होने के लिए कहा। राम के
राज्यभिषेक के बाद सभी बहुत भारी मन से विदा हुए। यह आत्मीय लगाव राम के लोक को
गढ़ता है, और लोक के राम इसी आत्मीय भाव से बनते हैं। लोकरक्षक, मर्यादापुरुषोत्तम
राम इसी कारण लोक के हैं, लोकजीवन में वे अपनी उपस्थिति से, अपने नाम से श्रेष्ठतम
मानवीय आदर्शों और संस्कारों को स्थापित करते हैं। ‘राम-राम’ और ‘जय रामजी की’
जैसे अभिवादन परस्पर संबंधों में शुचिता और मर्यादा की कामना लिए होते हैं।
लोकगीतों में, लोककथाओं में, और साथ ही लोकजीवन में राम की उपस्थिति लोक को जीवनीय
शक्ति देती है, जीवन का पथ प्रदर्शित करती है। अवधी के आल्हा में पंक्तियाँ आती
हैं-
राम का
नाम बड़ो जग में, सोई राम के नाम रटै नर नारी ।।
राम के
नाम तरी सबरी, बहु तार्यो अजामिल के खल भारी ।।
राम का
नाम लियो हनुमान ने, सोने के लंका राख कै डारी ।।
औ टेम
व नेम से नाम जपौ, राम का नाम बड़ा हितकारी ।।
-डॉ. राहुल मिश्र
(राष्ट्रधर्म, लखनऊ, मासिक पत्रिका के पौष, वि.सं. 2080 तदनुसार जनवरी, 2024 अंक में प्रकाशित)