Monday, 14 April 2014

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का उपन्यास : बाणभट्ट की आत्मकथा

हिंदी की सेवा के लिए और हिंदी के वर्तमान सुगठित रूप को गढ़ने  के लिए कृत संकल्पित होकर आजीवन लगे रहने वाले गौरवमयी व्यक्तित्व के धनी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम हिंदी साहित्य में सम्मानपूर्वक लिया जाता है।
  हिंदी साहित्यसेवक, इतिहासकार और निबंधकार होने के साथ ही वे महान उपन्यासकार भी थे। भले ही उन्होने तीन उपन्यासों- चारुचंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा और पुनर्नवा का ही सृजन किया हो, किंतु उनके ये तीनों उपन्यास ही हिंदी गद्य के महानतम् प्रतिमान हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा आचार्य द्विवेदी जी की औपन्यासिक रचनात्मक प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
उपन्यास लेखन के उस दौर में, जब फ्रायड और मार्क्स की विचारधारा का, नवीन प्रयोगों का और आधुनिकताबोध का बोलबाला था, आचार्य द्विवेदी जी ने उपन्यास लेखन में सर्वथा नवीन धारा को जन्म दिया। वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर सरीखे ऐतिहासिक उपन्यासकारों से इतर उन्होंने कल्पना-मिश्रित ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की।
बाणभट्ट की आत्मकथा भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर खरा उपन्यास न हो, किंतु आचार्य द्विवेदी जी ने कल्पना के आधार पर बाणभट्ट के समय की स्थितियों को, तत्कालीन युगबोध को, सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश को जितनी सूक्ष्मता के साथ अपने उपन्यास में उकेरा है, वह निस्संदेह अद्भुत और अपूर्व है। मध्यकाल की सामाजिक जड़ता, धार्मिक कट्टरता और विविध धर्मों-पंथों में बँटे समाज की एक-एक रीति-कुरीति और विसंगति पूरे खुलेपन के साथ उपन्यास में प्रकट होती है।
बाणभट्ट के जीवन से चलते-चलते आचार्य जी अपने समय और समाज की सच्चाइयों से उपन्यास को जोड़ देते हैं। अस्थिरता और विघटन के बीच नए मानव-मूल्य को खोजते-परखते उपन्यास में द्विवेदी जी के युग की सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक विद्रूपताएँ ऐसी तीक्ष्णता के साथ उभरकर सामने आने लगती हैं कि पाठक को अनायास ही यह अनुभव होने लगता है कि बाणभट्ट के रूप में उपन्यासकार अपनी कथा कह रहा है।
सामाजिक अंतर्विरोधों के बीच एक प्रेमकथा भी चलती है, बाणभट्ट और उसकी अनाम प्रेमिका बीच, बहुत गंभीरता और अनूठेपन के साथ। अंतर्मन को उद्वेलित कर देने वाली यह कथा आचार्य द्विवेदी जी के व्यक्तित्व का सर्वथा नवीन आयाम खोलती है। आखिर साहित्य और इतिहास का मर्मज्ञ क्लिष्ट, परिपक्व और व्यकरणिक बंधों में गुँथी भाषा से अलग हटकर प्रेम की भाषा का नामचीन व्याख्याता जो सिद्ध हो जाता है। संभवत: इसी आधार पर डॉ. बच्चन सिंह ने बाणभट्ट की आत्मकथा को क्लॉसिकल रोमैण्टिक उपन्यास कहा है।
भाषा, शिल्प और शैली के स्तर पर, रूपबंध और चरित्र चित्रण के स्तर पर उपन्यास बहुत सधा हुआ है। साथ ही उपन्यास की लयबद्धता और गत्यात्मकता उपन्यास को एक ही बैठक में पढ़ डालने के लिए प्रेरित करती है। आचार्य द्विवेदी जी के इस उपन्यास को पढ़े बिना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र अध्ययन कर पाना संभव नहीं है।
डॉ. राहुल मिश्र