एक देश के ‘पिघलते’ अस्तित्व की दास्तान
हिंदी कथा-साहित्य-जगत् में कामतानाथ का नाम किसी परिचय का
मोहताज नहीं है। वे जितने बढ़िया कथाकार हैं, उतने ही उम्दा उपन्यासकार भी हैं।
समग्रता और बड़ी सरलता के साथ वर्तमान के जटिल यथार्थ को जितनी बेबाकी के साथ वे
अपनी कहानियों में प्रस्तुत कर देते हैं; वही खुलापन, संपूर्णता, सहजता और यथार्थ
का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण उनके उपन्यासों में दिखाई देता है। चाहे ‘एक और
हिंदुस्तान’ हो या फिर धार्मिक पाखंड पर केंद्रित ‘समुद्र तट पर खुलने वाली
खिड़की’, दोनों उपन्यासों में वे समय की ज्वलंत समस्याओं से टकराते नजर आते हैं।
स्वाधीनता संग्राम को केंद्र में रखकर लिखे गए उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘काल-कथा’
के माध्यम से वे यथार्थवादी और जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराते उपन्यासकार के रूप
में स्थापित होते हैं। कामतानाथ का ताजा उपन्यास ‘पिघलेगी बर्फ’ उनके इसी लेखकीय
कौशल का विस्तार है। इस उपन्यास में एक देश के स्वर्णिम अतीत से लेकर दयनीय
वर्तमान तक का समूचा आख्यान है।
कथानायक घर छोड़कर भागता है और ब्रिटिश फौज में भरती हो
जाता है। फौज के साथ लंबी समुद्री यात्राओं, देश में चलती स्वाधीनता संग्राम की
लहर, आजाद हिंद फौज के गठन की सूचनाओं के साथ ही लड़ाइयों और फौजी कार्यवाहियों से
थक-हारकर कथानायक का पलायन होता है। बर्मा, आसाम और मलाया के बीहड़ों-जंगलों में
भटकते हुए और फिर बर्फीले, दुर्गम पहाड़ी-मैदानी रास्तों से होते हुए तिब्बत तक के
लंबे मार्ग में जिंदगी और मौत से जूझते कथानायक का भगोड़ापन और पलायन की
प्रवृत्ति, परिस्थितियों से डरकर भागते रहने की स्थितियाँ बेशक अलग ‘थीम’ है,
किंतु यात्राओं के विशद वर्णन के बीच इसकी प्रभावोत्पादकता कम हो जाती है।
कथानायक के तिब्बत पहुँचने के साथ ही उपन्यास एक नया मोड़
ले लेता है। उपन्यास में तिब्बत का वृहद विवरण यहीं से परत-दर-परत खुलता चला जाता
है। तिब्बती जनजीवन की ढेरों बातें, तिब्बतियों का रहन-सहन, वेशभूषा, सामाजिक
संरचना और दैनंदिन क्रियाकलाप जीवंत हो उठते हैं। यात्रा-प्रसंगों के साथ ही
तिब्बत की भौगोलिक संरचना और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के विविध पक्ष रोचक
जानकारियों के जादूई पिटारे की तरह खुलते चले जाते हैं। तिब्बत के धार्मिक परिवेश,
रीति-रिवाज और मान्यताओं का वर्णन भी व्यापक रूप से उपन्यास में होता है।
तिब्बतियों के आय के स्रोत, यातायात के साधन और तिब्बतियों की विविध आर्थिक
समस्याओं की समूची जानकारी भी उपन्यास में उपलब्ध हो जाती है।
उपन्यास में खास तौर पर उन राजनीतिक पक्षों को उजागर करने
का प्रयास किया गया है, जिनके कारण लगभग चालीस-पैंतालीस वर्षों के अंदर ही तिब्बत
देश अपने पड़ोसी और शक्तिशाली देश की सत्तालोलुपता का शिकार हो गया। चीन की
विस्तारवादी नीति ने समूचे तिब्बत को, एक जीवित राष्ट्र को निगल लिया। एक जीवंत
संस्कृति का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया। तिब्बत राष्ट्र के मुखिया दलाई लामा को
अपना वतन छोड़ना पड़ा। चीन ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा, पोटाला राजमहल और बौद्ध
विहारों सहित समूचे तिब्बत की काया ही पलट दी। भारत ने भी तिब्बत पर चीन के कब्जे
को मान्यता दे दी। कुल मिलाकर तिब्बत की वर्तमान दयनीय राजनीतिक स्थिति और वर्तमान
के इस ज्वलंत वैश्विक मुद्दे को सटीक और प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करने में
उपन्यासकार ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसा क्लिष्ट राजनीतिक विमर्श भले
ही उपन्यास को बोझिल और उबाऊ बनाता हो, किंतु भाषा की सहजता और प्रवाहपूर्ण शैली
बड़ी आसानी से तिब्बत देश की ज्वलंत राजनीतिक समस्या और उसके अस्तित्व पर मँडराते
संकट से पाठकों को अवगत करा देती है।
इन सबके बीच कथानायक और एक तिब्बती युवती के बीच
प्रेम-प्रसंग भी चलता रहता है। तमाम बंधन, भटकाव और मानसिक ऊहापोह की स्थितियों से
गुजरते हुए अंततः दोनों का विवाह भी हो जाता है। कथानायक की सपत्नीक वापसी, रास्ते
में बच्चे की मौत और फिर दुर्गम रास्ते पर चलते-चलते हैजे के कारण पत्नी की मौत के
प्रसंग उपन्यास का विस्तार भले ही करते हों, किंतु कथात्मकता का प्रभाव डालने में
कामयाब नहीं हो पाते। तिब्बत का सांगोपांग चित्रण और यात्रा-वृत्तांतों की भरमार
के कारण कथा-प्रसंगों की संवेदना, पात्रों के सरोकार और चारित्रिक अंतर्विरोध
उपन्यास में कहीं दबे-से रह जाते हैं।
उपन्यास के अंत तक पहुँचते-पहुँचते भारत के विभाजन का दर्द
भी साफ हो जाता है। एक ओर तिब्बत की दयनीय, अस्तित्वहीन स्थिति और दूसरी ओर अखंड
भारत के विभाजन के फलस्वरूप उपजी प्रश्नाकुलताएँ और इन सबके बीच कथानायक के सपनों
के संसार के उजड़ जाने व सुखद भविष्य की कामनाओं के बिखर जाने की स्थितियाँ
भगोड़ेपन और पलायनवादी मानसिकता के साथ मिलकर अजीब विकृति पैदा कर देती है। अंततः
उपन्यास गहरे अवसाद और उदासी में डूब जाता है। उपन्यास के अंत में रोमांचक
कथा-यात्राओं के स्थान पर गहरा विषाद, मोहभंग और विरक्ति आ जाती है। दुनियावी
छल-प्रपंचों और षड्यंत्रकारी घातक स्थितियों का ‘फ्लैश बैक’ देकर उपन्यास पूर्ण हो
जाता है। उपन्यास के प्रारंभ से लेकर अंत तक निरंतर चलते रहने वाले
यात्रा-प्रसंगों के बीच कथा का प्रभाव भले ही कम हो, किंतु जिस सहजता और प्रवाह के
साथ, प्रामाणिक तथ्यों और जानकारियों के साथ तिब्बत देश के क्रमिक विनाश को
रेखांकित किया गया है, वह निःसंदेह बेजोड़ है। उपन्यासकार ने इतिहास, वर्तमान और
वर्तमान की ज्वलंत समस्या (तिब्बत-समस्या) को समेटकर सक्षम और सफल कृति दी है।
उपन्यास की मुहावरेदार, सरल और सुग्राह्य भाषा-शैली और शिल्प के वैशिष्टय ने
समीक्ष्य कृति को पठनीय और रोचक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
समीक्ष्य कृति- पिघलेगी बर्फ, कामतानाथ, भारतीय ज्ञानपीठ,
नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006, मूल्य- 155 रुपये
डॉ. राहुल मिश्र
(वाग्धारा, बाँदा के जनवरी-जून 2008 के अंक में प्रकाशित)