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Saturday, 22 August 2026

महामनीषी कवि हितैषी जी

 


महामनीषी कवि हितैषी जी


“आपका माधुर्य और प्रसाद गुण, भाषा की लचक, भावों की उड़ान और उसका विकट अर्थ तथा उसका सामंजस्य (तलाजमा) देखकर मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि (आप) हितैषी नहीं, महामनीषी हैं।”

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पंडित जगदंबा प्रसाद मिश्र, हितैषी जी को एक पत्र लिखा था, जिसकी उपरोक्त पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं। उन्नाव के प्रख्यात साहित्यसेवी बनवारी लाल दीक्षित ने हितैषी जी की पुस्तक दर्शना के प्रथम संस्करण की भूमिका लिखी है। इस भूमिका (पृष्ठ 13) में उपरोक्त कथन व प्रसंग को उद्धृत किया गया है। दर्शना हितैषी जी की बाद की कृति है। इसके पूर्व उनकी कुछ काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। इन काव्य-कृतियों के प्रकाशन से मिली ख्याति से कहीं अधिक प्रसिद्धि हितैषी जी को उनकी स्फुट कविताओं से मिल चुकी थी। विशेष रूप से स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों के जोश व उमंग को बढ़ाने वाली रचनाओं ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई थी। हितैषी जी की रची हुई पंक्तियाँ- शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले... को बिस्मिल जी सदैव गुनगुनाया करते थे।

हितैषी जी के जीवन में एक समय ऐसा था, जब उन्होंने एक तरह से बालहठ करते हुए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के पास अपनी कविता भेजी थी और उसे सरस्वती के मुख पृष्ठ पर छापने के लिए कहा था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्याकाश में ऐसे आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अच्छे-अच्छे कवियों व साहित्यकारों को सुधारा है, ठोंक-बजाकर हिंदी को श्रेष्ठ कवियों-साहित्यकारों की परंपरा दी है। आचार्य द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन-कार्य सँभाला और हिंदी की साहित्य-सर्जना को जागरण-सुधार की ओर उन्मुख किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र का नवजागरण द्विवेदी जी के सतत प्रयासों से सुधार की ओर.... जागरण-सुधार की ओर बढ़ता है। सरस्वती पत्रिका इसका माध्यम बनती है। हिंदी साहित्येतिहास के अध्येताओं को इसका सहज ज्ञान होगा। यहाँ इस तथ्य का उल्लेख करने का उद्देश्य सरस्वती पत्रिका के महत्त्व को रेखांकित करना और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुशासनबद्ध साहित्यिक अनुष्ठान को उद्धृत करना है। सरस्वती पत्रिका उन दिनों कवियों और साहित्यकारों के बीच बहुत बड़ा स्थान रखती थी। इसमें छपना बहुत गर्व की बात होती थी। इस पत्रिका के माध्यम से आचार्य द्विवेदी जी ने परिनिष्ठित व राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता रखने वाली मानक हिंदी को साहित्य में स्थापित करने का कार्य किया। यही खड़ी बोली कहलाई। अवधी, ब्रज, बुंदेली आदि का अद्भुत साम्य करके मानक-परिनिष्ठित खड़ी बोली, जिसे आज की हिंदी के रूप में जानते हैं, उसे आचार्य द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से स्थापित किया।

जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी जी ऐसी प्रतिष्ठित पत्रिका के मुखपृष्ठ पर अपनी कविता छापने का आग्रह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी से करते हैं। आचार्य द्विवेदी जी की सहृदयता का कहना ही क्या.... वे हितैषी जी के पत्र के उत्तर में लिखते हैं, कि- आप में प्रतिभा है, परंतु उसका विकास नहीं हुआ। उन्नाव में सनेही जी रहते हैं। तुम उनसे संशोधन प्राप्त करो। अभी तुम्हारी रचना मुख पृष्ठ तो क्या किसी भी पृष्ठ पर छपने योग्य नहीं। हाँ एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा कि सरस्वती का मुखपृष्ठ तुम्हारी रचना की प्रतीक्षा किया करेगा। (ब्रह्मलीन हितैषी, अजेय, साप्ताहिक हिंदुस्तान, 19 मई, 1957, पृ. 07)

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के दो पत्रों के मध्य का अंतराल हितैषी जी के विराट साहित्यिक व्यक्तित्व के गढ़े जाने का कालखंड कहा जा सकता है। इस दृष्टि से अगर देखें, तो हितैषी जी अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व के साथ दिखाई देते हैं। आचार्य द्विवेदी जी की सीख को उन्होंने आत्मसात किया। आचार्य द्विवेदी जी का पत्र पाने के बाद हितैषी जी पंडित गयाप्रसाद सनेही से मिले और सनेही जी के प्रिय शिष्यों में से एक बने। आचार्य सनेही अभिनंदन ग्रंथ में श्रीनारायण चतुर्वेदी ने बहुत सुंदर बात लिखी है। वे लिखते हैं, कि सनेही जी द्विवेदी युग के स्वतंत्र आचार्य थे। इनके शिष्यों की संख्या आँकना बहुत कठिन है। सनेही जी के दो शिष्यों का वे विशेष उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं, कि हितैषी जी और अनूप जी ये दो सनेही जी के प्रिय शिष्य थे और यदि केवल ये दो शिष्य ही सनेही जी ने हिंदी साहित्य-जगत को दिए होते, तब भी हिंदी संसार उनका आभारी रहता। (आचार्य सनेही अभिनंदन ग्रंथ, 21 अगस्त, 1964, पृ. 68)

 हितैषी जी का नाम सनेही जी के शिष्यों में सबसे ऊपर आता है। सनेही जी के शिष्यों को मिलाकर सनेही-मंडल बना है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से साहित्य में मंडल की संकल्पना बनी थी। भारतेंदु-मंडल के कवि संगठित रूप से निश्चित और निर्धारित दिशा में, भावधारा में साहित्य-सेवा करते थे। ऐसा ही सनेही-मंडल में परिलक्षित होता है। सनेही-मंडल के आचार्य गयाप्रसाद शुक्ल सनेही भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं के रक्षण व संवर्धन के पक्षधर थे। रस, छंद व अलंकार की पुरातन परिपाटी को आधुनिक काव्याकाश में पुष्पित-पल्लवित करने के ध्येय के सनेही-मंडल के कवि देश की स्वाधीनता हेतु क्रांति का बिगुल बजाने का कार्य भी कर रहे थे। सनेही-मंडल के द्वारा ही मंचीय कविता प्रारंभ की गई, जो वीर रस की रचनाओं के सस्वर पाठ से सुप्त जनमानस के अंदर स्वाधीनता प्राप्ति की ललक जगाती थी। इन तीनों मुख्य प्रवृत्तियों के अनुशीलन में हितैषी जी खरे उतरे, और इसी कारण वे सनेही जी के प्रिय और अत्यंत निकट के शिष्य बने।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के उस मानक व परिनिष्ठित स्वरूप को स्थापित करने के यत्न में लगे हुए थे, जो राष्ट्रीय स्वरूप ले सके और जिससे हिंदी की बोलियों व उपबोलियों के विभेद दूर हो सकें। अवधी और ब्रज उन दिनों कवियों की प्रिय भाषा थी। द्विवेदी जी का आग्रह खड़ी बोली हिंदी में रचना करने का होता था। इसके लिए वे कवियों को प्रोत्साहित करते थे। हितैषी जी आचार्य द्विवेदी के आचार्यत्व से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में रचनाएँ लिखना प्रारंभ किया, और उनकी यह विशिष्टता उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई। इसी कारण आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी के मध्य घनिष्ठता और आत्मीयता स्थापित हुई। पूर्व में दो प्रसंगों का उल्लेख किया गया है। एक अन्य प्रसंग भी यहाँ उल्लेखनीय है, जो आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी की आत्मीय प्रगाढ़ता को उकेरता है। हितैषी जी ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर संस्मरण लिखा है। उसमें वे इस प्रसंग का उल्लेख करते हैं। एक बार हितैषी जी उमर खैयाम की रुबाइयों को आचार्य द्विवेदी जी को सुना रहे थे। तभी द्विवेदी जी ने एक भारी-भरकम शेर पढ़ा और उसका अर्थ हितैषी जी से पूछा। हितैषी जी लिखते हैं, कि मैंने भी रुष्ट होकर क्लिष्ट संस्कृत श्लोक पढ़ सुनाया और द्विवेदी जी से अर्थ की जिज्ञासा की। द्विवेदी जी ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन भवों में बल पड़ गये। हितैषी जी चुपके से घर चले आए। दूसरे दिन सबेरे ही आचार्य द्विवेदी जी हितैषी जी के घर पहुँच गए और बोले- भाई मैंने तुम्हारी कविता का आनंद न लेकर और उसकी ओर ध्यान न देकर व्यर्थ परीक्षा करनी चाही थी, यह मेरी भूल थी, मैं तुम्हें आज मनाने आया हूँ। हितैषी जी ने चरण छूकर अपनी भूल स्वीकार की और कहा कि मुझे कोई अधिकार ऐसा उत्तर देने का नहीं था, अतः मैं क्षमा किया जाऊँ। अंत में मुझे घर बैठे क्षमा मिल गई।

यह प्रसंग उस समय के साहित्यकारों की सहजता को स्पष्ट करता है। आचार्य द्विवेदी जी अपनी सहजता और सरलता में हिमालय से कम न थे। दूसरी ओर हितैषी जी भी अपनी मर्यादा को समझते थे। आज के समय में ऐसे प्रसंग कल्पनातीत लगते हैं। दूसरी बड़ी बता यहाँ यह भी स्पष्ट होती है, कि आचार्य द्विवेदी जी और हितैषी जी के मध्य अत्यंत घनिष्ठ और आत्मीय संबंध थे। ऐसी ही आत्मीय प्रगाढ़ता सनेही जी के साथ हितैषी जी की थी। गयाप्रसाद शुक्ल सनेही तो भारतीय काव्यशास्त्र के आधुनिक आचार्य ही थे। कवित्त, सवैया, घनाक्षरी आदि में अर्थपूर्ण व वैचारिक गांभीर्य के साथ एक से बढ़कर एक पदों के सृजन के साथ ही देशभक्तिपूर्ण रचनाएँ सनेही मंडल की अन्यतम् विशिष्टता थी। डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ ने अपने शोध-प्रबंध में सनेही जी द्वारा प्रवर्तित विशिष्ट सवैया को रेखांकित किया है। इस सवैया में 25 वर्ण थे। निशंक जी ने इसे सनेही जी की मौलिक देन बताया है और इस विशिष्ट सवैया को ‘सनेही सवैया’ नाम दिया है। सनेही-मंडल के कवियों और विशेष रूप से आचार्य सनेही जी के प्रभाव के कारण कानपुर छंदशास्त्र के आधुनिक संस्करण का प्रमुख केंद्र ही बन गया था। हितैषी जी स्वयं मात्रिक छंद के महारथी थे। वैकाली काव्य-संग्रह से उनकी एक बानगी यहाँ प्रस्तुत करते हुए बात को विस्तार देते हैं-

वैकाली !

वैकाली !

कितने कितने दीप सँजोए ?

कितने प्रहसित, कितने रोए ?

कितने पाए, कितने खोए ?

कितने जागे, कितने सोए ?

दृष्टि पसारे,

कार्य तुम्हारे,

तम तंत्रालय से अपलक हम

देख रहे हैं अगणित तारे ।।

छंदशास्त्र और भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं के आधुनिक संस्करण के प्रणेता सनेही जी व उनके सनेही-मंडल की विशिष्टताओं को अपने सृजन में उतारते हुए हितैषी जी सनेही मंडल के नामचीन कवि बनते हैं, साथ ही सनेही जी के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं। हितैषी जी को घनाक्षरी और सवैया में सिद्धि प्राप्त थी। काव्य-सौष्ठव, प्रांजल भाषा और भावाभिव्यक्ति... इन तीनों का अद्भुत समन्वय हितैषी जी के काव्य में परिलक्षित होता है।

जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ जी के व्यक्तित्व व कृतित्व का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर विस्तार आचार्य द्विवेदी जी और आचार्य सनेही जी के मध्य और द्विवेदी युग से छायावाद और छायावादोत्तर काल में होता है। हितैषी जी आचार्य द्विवेदी और आचार्य सनेही के दो ध्रुवों के मध्य में दिखते हैं। पूर्व के प्रसंगों में उल्लेख किया गया है, कि हिंदी साहित्य का पुराना और प्रारंभिक समय साहित्यकारों की सहजता और सरलता का था। मतभेद और विवाद नहीं होते थे। आचार्य द्विवेदी जी मानक और खड़ी बोली हिंदी के प्रबल पक्षधर थे और कवियों-साहित्यकारों को खड़ी बोली हिंदी में ही लिखने के लिए प्रेरित करते थे। दूसरी ओर सनेही जी का आचार्यत्व छंदशास्त्रीय विधानों पर केंद्रित था। आचार्य द्विवेदी जी के प्रिय, आत्मीय और आचार्य सनेही जी के परम शिष्य हितैषी जी इन दोनों आचार्यों के समन्वय का साक्षात् स्वरूप प्रतीत होते हैं, दो ध्रुवों के मध्य-बिंदु प्रतीत होते हैं।

हितैषी जी ने एक से बढ़कर एक छंद लिखे हैं, मात्रिक छंदों में नए-नए प्रयोग भी किए हैं..... और सबसे बड़ी बात, कि आचार्य द्विवेदी जी के आवाहन को आत्मसात करते हुए खड़ी बोली हिंदी में लिखा है। हितैषी जी की इस विशिष्टता को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ- ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में रेखांकित किया है। वे लिखते हैं कि- “खड़ी बोली के कवित्तों और सवैयों में ‘हितैषी जी’ वही सरलता, वही लचक, वही भाव भंगी लाये हैं, जो बृज भाषा के कवित्तों और सवैयों में पायी जाती है। इस बात में इनका स्थान निराला है। यदि खड़ी बोली की कविता आरंभ में ऐसी ही सजीवता के साथ चली होती, जैसी इनकी रचनाओं में पायी जाती है तो उसे रूखी और नीरस कोई न कहता। रचनाओं का रंग-रूप अनूठा और आकर्षक होने पर भी अजनबी नहीं है। शैली वही पुराने उस्तादों के कवित्त सवैयों की है, जिसमें वाग्धारा अंतिम चरण पर जाकर चमक उठती है।“

शुक्ल जी का सूक्ष्म अवलोकन और उनकी पारखी दृष्टि हितैषी जी की काव्य-प्रतिभा को लेकर ऐसा संकेत करती है, जो खड़ी बोली हिंदी को साहित्य की भाषा के रूप में स्थापित किए जाने के विविध यत्नों और प्रसंगों-विषयों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। अवधी और बृज आदि में रचनाएँ करने का लोभ कवियों में इसी कारण था, कि इनमें सरसता और कोमलता आ जाती थी। खड़ी बोली को साहित्य में स्थापित करने की दिशा में बड़ा अवरोध भी इस बोली का खरापन था। हितैषी जी जैसे हिंदीसेवी कुछ पहले यदि खड़ी बोली हिंदी को मिल गए होते, खड़ी बोली हिंदी के लिए साहित्य की राह आसान हो गई होती। आचार्य द्विवेदी जी ने भी जब इस तथ्य को समझा होगा, तब सहजता से ही उन्होंने हितैषी जी को महामनीषी कह दिया होगा।

हितैषी जी ने संस्कृत काव्यशास्त्रीय परंपरा के आधुनिक नवोन्मेषी स्वरूप से साक्षात्कार कराया। इसके साथ ही छंदशास्त्र के विधान को खड़ी बोली हिंदी में उतारने हेतु यत्न किए, और अपनी रचनाओं से इसे समृद्ध भी किया। इसी क्रम में यह भी जानना रुचिकर और प्रसंगानुकूल होगा, कि हितैषी जी शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। ऐसा नहीं है, कि उनकी यह प्रतिबद्धता अन्य भाषाओं के प्रति उनके लगाव को कम करती हो। हितैषी जी को फारसी का भी अच्छा ज्ञान था, और उन्होंने इसमें रचनाएँ भी की हैं। हितैषी जी ने उर्दू में भी खूब रचनाएँ की हैं। उमर खैयाम की रुबाइयों का हिंदी अनुवाद, जो उस समय उपलब्ध था, वह अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित था। हितैषी जी ने सीधे फारसी से हिंदी में रुबाइयों का अनुवाद किया था। उनका यह अनुवाद ‘मधु मंदिर’ नाम से था, जो बहुत लंबे अंतराल के बाद सन् 2022 में डॉ. हरिनारायण चौरसिया के प्रयासों से प्रकाशित हुआ। इसी तरह अंग्रेजी पर भी हितैषी जी की अच्छी पकड़ थी। अंग्रेजी कविता के विन्यास से भी वे परिचित थे। उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के प्रति उनका सम्मान अपने स्थान पर था, लेकिन हिंदी के लिए उनके मन में असीम श्रद्धा थी, जैसी कि एक माँ के प्रति पुत्र की होती है। इसके लिए वे किसी से भी समझौता नहीं करते थे। गांधी जी ने हिंदुस्तानी भाषा को हिंदी के विकल्प के रूप में रखा था। इसकी लिपि तो देवनागरी थी, लेकिन उर्दू और अरबी-फारसी के शब्दों व वाक्य-विन्यासों को सायास रखा गया था। इस तरह हिंदी का संस्कृतनिष्ठ-तत्सम स्वरूप लेखन व बोलचाल से बाहर होने लगा था। हितैषी जी ने इसका प्रबल विरोध किया। उन्होंने हिंदी का पक्ष लेते हुए यह भी स्थापित किया, कि भाषा स्वाभाविक रूप से ही अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर लेती है, लेकिन तुष्टीकरण या राजनीति से प्रेरित होकर भाषा के स्वरूप को बिगाड़ना उचित नहीं है। हिंदी के स्थान पर  हिंदुस्तानी को थोपना उचित नहीं है। हितैषी जी स्वयं हिंदी में लेखन के समर्थन में डटे रहे, दृढ़ रहे, और अपने साथ के सभी साहित्यसेवियों, कवियों, रचनाकारों को विशुद्ध हिंदी में रचनाएँ करने के लिए आजीवन प्रेरित भी करते रहे।

हितैषी जी छायावाद की कल्पनाशीलता के पक्षधर कभी नहीं रहे। हितैषी जी छायावाद के कालखंड में भी लेखन में सक्रिय थे, लेकिन उनकी रचनाओं की भाव-भंगिमा छायावाद की प्रचलित प्रवृत्ति से मेल नहीं खाती थी। देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित क्रांतिकारी का भाव सदैव उन्हें यथार्थ के धरातल पर, देश की सेवा के व्रत पर और समाज के हित की दिशा पर केंद्रित किए रहा। हरिवंशराय बच्चन की ‘मधुशाला’ और ‘मधुबाला’ की कविताएँ उन दिनों अपना अलग ही रंग जमाए हुए थीं। इनका रंग भले ही लोगों को आकर्षित कर ले, लेकिन अनेक लोगों को सोचने पर विवश भी कर देता था कि ‘मधुशाला’ और ‘मधुबाला’ से राष्ट्र और समाज को आखिर मिल क्या रहा है.... समाज को कौन-सी दिशा दी जा रही है? समूचे राष्ट्र की भाषा, क्रांति की भाषा हिंदी में शराब की महिमा गाई जा रही है...। हितैषी जी को भी यह नहीं भाया और अपने स्वभावानुसार उन्होंने मुखर प्रतिकार किया। हितैषी जी की ‘ताड़ीबाला’ और ‘ताड़ीशाला’ इसी प्रतिकार की अभिव्यक्ति हैं। इसी में वे लिखते हैं-

पहले है मीठा फिर कड़ुआ, केवल मधु ही मधु नाम रहा ।

मधुपायी के जीवन को कटु, करना ही इसका काम रहा ।

हितैषी जी को सम्मान व पुरस्कार की लालसा तो कभी रही ही नहीं, उन्होंने अपने रचनाकर्म के समर्थन की, समीक्षकों व आलोचकों द्वारा महत्त्व दिए जाने या नहीं दिए जाने की भी कभी कोई चिंता नहीं की। हितैषी जी की क्रांतिकारी लेखनी अपने लक्ष्य पर सदैव केंद्रित रही, सच को सच और झूठ को झूठ कहती रही। किसी कामना, किसी लालसा या किसी को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने कभी नहीं लिखा। यह नितांत सत्य है, कि इसी कारण साहित्यिक गुटबंदी में वे कहीं भी ठहर नहीं पाए, और समीक्षकों, आलोचकों, साहित्येतिहासकारों की दृष्टि में भी नहीं आ सके। हितैषी जी के साहित्यिक अवदान पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पारखी दृष्टि और उनके विश्लेषण का उल्लेख पूर्व में किया गया है। शुक्ल जी के परवर्ती समीक्षकों, आलोचकों व साहित्येतिहासकारों की दृष्टि हितैषी जी के साहित्य में कहाँ तक और कितनी गई है, उसे देखने पर स्थिति स्पष्ट हो जाती है, कि हितैषी-साहित्य का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका।

हितैषी जी अपने कर्म-पथ पर सदैव एकाग्र रहे। हितैषी जी के पितामह पं. बाजीलाल मिश्र अवध के महानायक और प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सेनानी राणा बेनी माधव के अनन्य सहयोगी थे। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए पं. बाजीलाल मिश्र ने वीरगति पाई थी। उनकी वीरता और रणकौशल से अंग्रेज भयभीत रहते थे। हितैषी जी के पिता पं. रामचंद्र मिश्र कर्मकांडी ब्राह्मण थे, किंतु हितैषी जी अपने पितामह की क्रांतिधर्मिता के पथ के पथिक थे। इसी कारण पितामह बाजीलाल मिश्र के जीवन और अंग्रेजों के साथ संघर्ष का व्यापक अध्ययन हितैषी जी ने किया। उनके द्वारा रचित कृति ‘मातृगीता’ में इसका उल्लेख मिलता है। वे लिखते हैं-

बैठे थे नाना धुंधुपंत, अब्दुल्ला और तातिया धीर।

दुःखिता रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे थे अति अधीर।

थे पंडित बाजीलाल मिश्र, बेनीमाघव औ' कुँवर वीर।

अवरुद्ध कंठ कह सकें यही— (आँखों से झर झर झर नीर)

“था नहीं राष्ट्र का एक तंत्र, / था नहीं राष्ट्र का एक मंत्र,

प्राणों की आहुति देकर भी, हम हो न सके इससे स्वतंत्र! "

पिता से आध्यात्मिकता व भक्ति भाव और पितामह से क्रांति की अलख हितैषी जी को मिली थी। इसी कारण उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में क्रांतिकारी कवि के साथ ही आध्यात्मिक व दार्शनिक मनीषी का अद्भुत मेल दिखता है। हितैषी जी क्रांतिकारी कवि तो हैं ही, साथ ही उनकी उत्तरार्ध की रचनाएँ अध्यात्म व दर्शन की गहनता-गंभीरता लिए हुए हैं। हितैषी जी की कृति- ‘दर्शना’ तो नाम से ही इस तथ्य को स्पष्ट कर देती है। यह कृति भी हितैषी जी के प्रति आस्थावान साहित्यसेवियों के प्रयासों से हाल ही में प्रकाशित हुई है।

पंचांग के अनुसार हितैषी जी का जन्म गीता जयंती के दिन हुआ था। हितैषी जी का जन्मदिन गीता जयंती के पर्व पर उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह भी एक सुखद संयोग है। क्रांतिकारी और दार्शनिक कवि हितैषी जी की जन्म-जयंती और गीता जयंती  उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता के साथ प्रासंगिकता का संबंध जोड़ देती है। युद्ध के मैदान में कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाया था। रणांगन में कर्म की महत्ता को स्थापित किया गया था। अन्याय व अत्याचार के प्रतिकार का संदेश दिया गया था। अठारह अध्यायों में दर्शन व चिंतन-मनन के साथ ही जीवन जीने के सिद्धांत बताए गए थे। यदि हितैषी जी की ‘दर्शना’ का अनुशीलन करें, तो सरल पदों में दर्शन की ऐसी ही गूढ़ बातें जानने को मिलती हैं। हितैषी जी की ‘दर्शना’ के लिए स्वतंत्र और विशद अध्ययन-अनुशीलन अपैक्षित है। भारतदेश के स्वाधीनता संग्राम में ऐसे क्रांतिकारी बहुत कम हुए हैं, जो एक ओर क्रांति की अग्नि को प्रज्ज्वलित करते हैं, तो दूसरी ओर भारत की आध्यात्मिक चेतना और दार्शनिक चिंतन को लेखनी से निःसृत करते हैं। हितैषी जी इस दृष्टि से अन्यतम हैं, विशिष्ट हैं।   

व्यक्तित्व की सहजता और सरलता के साथ ही गंभीर चिंतन-मनन हितैषी जी की विशेषता है। इतना ही नहीं, वे अपने रंग में आने पर फक्कड़पन में भी पीछे नहीं रहते। उनके व्यंग्य तीखे व धारदार हैं। हितैषी जी अलबेला उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे। बंबई के साहित्यसेवियों ने उन्हें इसी नाम से सम्मान भी दिया था। गँवार उपनाम से उन्होंने भड़ौवे लिखे। ये उनके फक्कडपन और व्यंग्यात्मक लेखन के प्रतिमान हैं। हितैषी जी ने भड़ौवे के माध्यम से कई नेताओं, साहित्यकारों आदि की खुलकर खिंचाई की है। इसके साथ ही वे तत्कालीन समय और समाज की विद्रूपताओं व विकृतियों की ओर भी ध्यान खींचते हैं।

जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी जी’ का रचना-संसार विविधवर्णी है। एक ओर क्रांति की चेतना, तो दूसरी ओर अध्यात्म-धर्म-दर्शन उनकी रचनाओं में प्रकट होता है। भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपराओं का निर्वहन करते हुए छंदशास्त्र के विधानों को आधुनिक खड़ी बोली हिंदी में उसी सरसता के साथ लाने का कार्य हितैषी जी ने किया है। हिंदी के अनन्य सेवी हितैषी जी ने आत्मसम्मान और स्वाभिमान से समझौता किये बिना अपने रचनात्मक योगदान से हिंदी के साहित्य को समृद्ध, संपन्न और सशक्त किया है। अनन्य देशभक्त, समर्पित क्रांतिकारी और दार्शनिक चिंतक कवि हितैषी जी का विपुल रचना-संसार न केवल हिंदी जगत् को, वरन् समग्र समाज को सार्थक दिशा देने की सामर्थ्य रखता है। हितैषी जी के साहित्य का अवगाहन हर बार नई ऊर्जा और चेतना देता है। क्रांतिकारी कवि, महामनीषी हितैषी जी के विराट व्यक्तित्व से बहुत प्रेरणा मिलती है।


संदर्भ ग्रंथ सूची-

1.    हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं. 2015,

2.    हिंदी के निर्माता, भाग-2, सं. श्यामसुंदर दास, इंडियन प्रेस लि., प्रयाग, सं. 1941,

3.    रक्त का कण-कण समर्पित, चिरंजीव सिन्हा, प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, सं. 2022,

4.    दर्शना : चिंतन एवं भावधारा, सं. डॉ. हरिनारायण चौरसिया, वान्या पब्लिकेशंस, कानपुर, सं. 2024,

5.    हितैषी काव्य विमर्श, सं. डॉ. हरिनारायण चौरसिया, वान्या पब्लिकेशंस, कानपुर, सं. 2023,

6.    सनेही मंडल के कवि, डॉ. श्याम सुंदर सिंह, आराधना ब्रदर्स, कानपुर, सं. 1990,

7.    हिंदी के निर्माता, कुसुम शर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, सं.2009,

8.    स्मृतियों की धरोहर, डॉ. सुधेश, आलेख प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2007,

9.    कविता कोश, अंतर्जालिक संदर्भ।

(पुस्तक- रससिद्ध कवि क्रांतिकारी हितैषी जी, संपादक- डॉ. हरिनारायण चौरसिया, प्रकाशक- डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव साहित्यिक संस्थान, लखनऊ, वर्ष- 2025 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र