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Tuesday, 11 December 2018

लोसर : परंपरा और संस्कृति का पर्व



लोसर : परंपरा और संस्कृति का पर्व

लदाख अंचल को उसकी अनूठी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जाना जाता है। लदाख के बारे में ह्वेनसांग, हेरोडोट्स, नोचुर्स, मेगस्थनीज, प्लीनी और टॉलमी जैसे यात्रियों ने बताया है। इससे लदाख के अतीत का पता चलता है। किसी भी क्षेत्र के अतीत का पता इतिहास की किताबों और इतिहासकारों से चलता है। लेकिन किसी क्षेत्र के समाज, संस्कृति और वहाँ के लोगों के जीवन की जानकारी उस क्षेत्र के रीति-रिवाजों और तीज-त्योंहारों से मिलती है। लदाख अंचल की अनूठी संस्कृति, यहाँ के लोगों के विचार और समाज का जीवन लदाख के त्योहारों में दिखाई देता है। लदाख अंचल के प्रमुख त्योहारों में बुद्ध पूर्णिमा और लोसर का नाम आता है। इनमें बुद्ध पूर्णिमा धार्मिक त्योहार होता है। इसमें खास तौर पर पूजा-पाठ होते हैं, जबकि लोसर का त्योहार धार्मिक भी होता है, और सामाजिक भी होता है। इस कारण लोसर के त्योहार में लदाख अंचल के साथ ही सारे हिमालयी परिक्षेत्र के समाज, यहाँ की संस्कृति, प्राचीनता और परंपरा की झलक देखने को मिलती है।
 लदाख अंचल के लिए लोसर का त्योहार बहुत खास होता है, क्योंकि सर्दियाँ शुरू होने के साथ ही यह त्योहार लोगों में नई जिंदगी की रौनक बिखेर देता है। गर्मियों में पर्यटकों से गुलज़ार रहने वाले लदाख में ठंढक के आगमन के साथ ही जीवन बदल-सा जाता है। क्या सर्दियों के आने पर लदाख उदासियाँ ओढ़ लेता है? शायद नहीं। क्योंकि लदाख का नववर्ष सर्दियों की शुरुआत के साथ ही नए जोश को लेकर उपस्थित हो जाता है। लदाख के नववर्ष को ही लोसर कहा जाता है। लोसर भोट भाषा के दो शब्दों- ‘लो’ और ‘त्सर’ से मिलकर बना है। ‘लो’ का अर्थ होता है- वर्ष, और ‘त्सर’ का अर्थ होता है- नया। इस तरह से ज्योतिषीय गणना के अनुसार नए वर्ष का त्योहार ही लोसर कहलाता है।
वैसे तो लोसर का मुख्य पर्व भोट पंचांग के हिसाब से ग्यारहवें महीने की अमावस्या को मनाया जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत दसवें महीने में ही हो जाती है। भोट पंचांग के अनुसार दसवें महीने की पंद्रहवीं तिथि से धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ की शुरुआत हो जाती है, जो ग्यारहवें महीने की पाँचवी तिथि तक चलती रहती है। दसवें महीने की पंद्रहवीं तिथि को होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में खास तौर पर विनय के नियमों या सूत्रों का पाठ होता है। इस दिन को विद्वान भिक्षु और महान सिद्ध ग्यालवा लोजंग टकस्पा के स्मृति-दिवस के रूप में भी जाना जाता है। दसवें माह की पच्चीसवीं तिथि को गलदेन ङाछोद का पर्व होता है। यह भी लोसर का पूर्वानुष्ठान होता है। इस तिथि को महासिद्ध चोंखापा की जन्मजयंती और परिनिर्वाण तिथि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महासिद्ध आचार्य चोंखापा को याद करते हुए गोनपाओं में पैंतीस बुद्धों की पूजा की जाती है। भिक्षुगणों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही लोग अपने-अपने घरों में दीपक जलाकर खुशियाँ मनाते हैं। इस दिन छोरतेन, यानि स्तूपों में भी दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है, कि जिस तरह महासिद्ध चोंखापा ने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता के अँधेरों को दूर किया था, उसी तरह लोगों के जीवन में ज्ञान का उजाला फैले, समाज से अज्ञानता दूर हो, बुरी शक्तियाँ दूर हों और सभी का जीवन खुशहाल हो।
लोसर में सबसे ज्यादा रोचक और मजेदार आयोजन दसवें माह की उन्तीसवीं तिथि  होता है। इस दिन ‘गु-थुग’ बनाया जाता है। ‘गु-थुग’ एक खास किस्म का व्यंजन होता है, जो लोसर के त्योहार में ही में बनता है। यह थुग्पा जैसा ही होता है, लेकिन इसकी खासियत इसमें पड़ने वाली चीजों के कारण होती है। भोट भाषा में ‘गु’ का अर्थ होता है- नौ। लोसर के पर्व पर बनने वाले थुग्पा में नौ चीजें डाली जाती हैं, इसी कारण इस व्यंजन को ‘गु-थुग’ कहा जाता है । इसमें सने हुए आटे की लोइयों के बीच में कोयला, मिर्च, नमक, चीनी, रुई, अँगूठी, कागज और सूर्य तथा चंद्रमा की आकृतियाँ आदि नौ चीजों को अलग-अलग भरकर थुग्पा में डाला जाता है। आग में पक जाने के बाद ‘गु-थुग’ को सभी के बीच में बाँटते हैं। खाने से पहले सभी लोग देखते हैं, कि उनके हिस्से में कौन-सी चीज आई है। अलग-अलग लोगों के हिस्से में आने वाली चीजों के मुताबिक व्यक्ति के स्वभाव और गुण के बारे में बताया जाता है। अगर किसी व्यक्ति के हिस्से में कोयला आता है, तो यह माना जाता है कि उसका मन काला है, उसके विचार गंदे हैं। जिस व्यक्ति के हिस्से में मिर्च आती है, उसे कड़वा बोलने वाला या कटुभाषी माना जाता है। रुई पाने वाला सात्विक और सरल स्वभाव का होता है। कागज पाने वाला धार्मिक, सूर्य की आकृति पाने वाला यशस्वी, चंद्रमा की आकृति पाने वाला सुंदर और अँगूठी पाने वाला कंजूस माना जाता है। जिस व्यक्ति के हिस्से में अच्छी चीज आती है, उसे सम्मान मिलता है। जिसके हिस्से में बुरी वस्तु आती है, उसे अपमानित होना पड़ता है। इस तरह लोसर के त्योहार में वर्षभर के कामों का ब्यौरा निकलकर आ जाता है। वैसे तो यह मनोरंजन के लिए ही होता है, लेकिन इसके पीछे यह संदेश छिपा होता है, कि साल-भर अच्छे काम ही करने चाहिए, नहीं तो सबके सामने अपमानित होना पड़ेगा। इससे अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
इसके अगले दिन, यानि दसवें माह की तीसवीं तिथि या अमावस्या को लोग सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से मृतकों या पितृदेवताओं के लिए भोजन लेकर उनके समाधि-स्थल पर जाते हैं। शाम के समय गोनपाओं, छोरतेनों और घरों में दीप जलाए जाते हैं। अमावस्या की रात को जगमगाते दीपकों के बीच लदाख की धरती जगमगा उठती है। इसी दिन शाम के समय हरएक घर से मशाल या ‘मे-तो’ निकाले जाते हैं, जिन्हें लेकर लोग पूरे गाँव या मोहल्ले में घूमते हैं। इन्हें घुमाते हुए लोग आवाज लगाते जाते हैं, कि सारी बुराइयाँ, सारी बुरी और नकारात्मक शक्तियाँ यहाँ से चली जाएँ। ग्यारहवें मास की प्रतिपदा को, अर्थात् पहली तिथि को लोग नए-नए कपड़े पहनकर अपने-अपने इष्टदेव की पूजा करते हैं। सगे-संबंधी और परिचित-मित्र एक-दूसरे के घर शुभकामनाएँ देने जाते हैं। इस मौके में नवविवाहिताएँ भी अपने घर जाकर बड़ों के चरण छूकर प्रणाम करती हैं। इस दिन साल भर पकवान खिलाने वाले चूल्हे को भी प्रणाम किया जाता है, और पूजा की जाती है। लोसर के पर्व पर बच्चों को नए-नए कपड़े मिलते हैं और सभी लोग अपने परिजनों, मित्रों को उपहार भी देते हैं।
ग्यारहवें मास की द्वितीया को, अर्थात् दूसरी तिथि को पङोन, यानि महाभोज का आयोजन होता है, जिसमें सभी लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते हैं। इस मौके पर स्त्रियों और पुरुषों के बीच छङ-लू नामक प्रतियोगिता होती है। इस मौके पर भक्तिभाव और वीरता के लोकगीत गाए जाते हैं। लोकगीतों द्वारा उन सैनिकों को भी शुभकामनाएँ दी जाती हैं, जो लोसर के त्योहार में अपने घर नहीं पहुँच पाते हैं। लदाख की धरती वीरों की धरती मानी जाती है। आज भी यहाँ के तमाम सैनिक देश की सेवा में लगे हुए हैं। इन वीरों का उत्साह बढ़ाने के लिए ही वीर रस से भरे हुए लोकगीत गाए जाते हैं। इसके पीछे एक ऐतिहासिक घटना भी नज़र आती है।
ऐसा माना जाता है, कि लदाख में लोसर का पर्व तिब्बती पंचांग के अनुसार ही मनाया जाता था, मगर लदाख के प्रतापी शासक राजा जमयङ नमग्याल के साथ जुड़ी एक घटना के कारण लोसर का पर्व तिब्बती लोसर से एक महीने पहले मनाया जाने लगा। मान्यता है, कि सोलहवीं शती. में राजा जमयङ नमग्याल के शासक बनते ही बल्तिस्तान में विद्रोह हो गया। यह घटना लोसर के एक महीने पहले की थी।  ऐसी संभावना थी कि लोसर के पहले युद्ध समाप्त नहीं हो पाएगा। इस कारण राजा जमयङ नमग्याल ने युद्ध में जाने से पहले ही लोसर मनाने की घोषणा कर दी। इस तरह भोट पंचांग के अनुसार दसवें महीने से ही लोसर पर्व के आयोजन की परंपरा चल पड़ी और आज भी इस परंपरा को देखा जा सकता है। उस समय युद्ध में जाने वाले वीर सैनिकों के अंदर जोश भरने के लिए वीरतापूर्ण लोकगीत गाये गए होंगे। आज लोसर में वीर-गीतों को गाने के रिवाज के पीछे भी यही कारण देखा जा सकता है।
ऐसा भी माना जाता है, कि लदाख के ठंढे मौसम और यहाँ की कृषि-व्यवस्था के कारण लोसर पर्व की तिथियों में अंतर है। लदाख में एक फसल ही पैदा होती है और खेती-किसानी का सारा काम अक्टूबर महीने तक पूरा हो जाता है। नवंबर के समाप्त होते-होते नई फसल का अनाज भी घर पहुँच जाता है। नया सत्तू और आटा भी तैयार हो जाता है। इस तरह लोसर में पूजा-पाठ के लिए नई फसल से सामग्री भी तैयार हो जाती है, और काम-काज की व्यस्तता भी नहीं रहती। इस कारण लोसर पर्व का उत्साह दुगुना हो जाता है। कारण चाहे जो भी हों, मगर ठंढक की दस्तक के साथ ही उल्लास और उमंग से भरा यह पर्व पुरातनकाल से ही लदाख अंचल की अपनी विशिष्ट पहचान को, अपनी अनूठी परंपराओं को सँजोए हुए है।
लदाख अंचल भौगोलिक रूप से जितना बड़ा है, उतनी ही विविधताएँ भी यहाँ पर देखी जा सकती हैं। नुबरा, चङथङ, जङ्स्कर और शम आदि क्षेत्रों में लोसर पर्व के साथ जुड़ी लोकपरंपराओं के अलग-अलग रंग देखे जा सकते हैं। इन लोकपरंपराओं में बहुत रोचक है, यहाँ की स्वाँग की परंपरा। प्राचीनकाल में स्वाँग की परंपरा सारे लदाख में अलग-अलग तरीके से मनाई जाती थी, मगर आधुनिक जीवन-शैली के कारण यह परंपरा लदाख अंचल के दूरदराज के गाँवों में ही सिमटकर रह गई है। जिस समय लदाख में मनोरंजन के साधन उपलब्ध नहीं रहे होंगे, उस समय लोगों के मनोरंजन के लिए, और उनकी धार्मिक भावनाओं की पुष्टि के लिए यह लोक-परंपरा बहुत कारगर रही होगी। इसमें लदाख के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग किस्म के स्वाँग करने की परंपरा है। लेह शहर के नजदीक चोगलमसर गाँव में होने वाले अबी-मेमे; ञे, बसगो, अलची गाँवों में होने वाले लामा-जोगी; हेमिशुगपाचन में होने वाले खाछे-कर-नग; स्क्युरबुचन में होने वाले अपो-आपी और वनला में होने वाले दो बाबा नामक स्वाँग बहुत प्रसिद्ध हैं। इन स्वाँगों में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इन स्वाँगों में नसीहतें ही नहीं, इतिहास की झलक भी देखी जा सकती है और लदाख अंचल के साथ जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक संबंधों को भी देखा जा सकता है। लामा-जोगी नामक स्वाँग में उस पुराने लदाख को देखा जा सकता है, जिसमें कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए आने वाले जोगी या साधु-संन्यासी नजर आते हैं। पुराने ज़माने में बौद्ध भिक्षु, यानि लामाओं जैसी जिंदगी जीने वाले साधु-संन्यासियों को देखकर ही शायद लामा-जोगी स्वाँग का विचार आया होगा। इस स्वाँग में नवमी तिथि को लामा-जोगी अभिमंत्रित अनाज, जैसे गेहूँ-जौ आदि लेकर गाँवों में घूमते हैं और इन्हें छिटककर विघ्न-बाधाओं को दूर करते हैं। वे हरएक घर पर जाते हैं। घर का मुखिया लामा-जोगी के माथे पर सत्तू का तिलक लगाता है और ऊनी मुकुट पर ऊन चढ़ाता है। लामा-जोगी के आशीर्वाद से घर-परिवार, और गाँव में बुरी शक्तियाँ नष्ट होती हैं और सुख समृद्धि आती है। लामा-जोगी का यह स्वाँग प्राचीन लदाख को अतीत के भारत से जोड़ने वाला है। इस स्वाँग के माध्यम से प्राचीन भारत की सिद्ध-श्रावक-श्रमण परंपरा के सुनहरे इतिहास को भी याद किया जा सकता है। यह स्वाँग भारतवर्ष में लदाख अंचल के विशिष्ट और अभिन्न सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक सहकार की झलक दिखाता है। इस स्वाँग के माध्यम से लदाख अंचल के स्वर्णिम और गौरवपूर्ण अतीत के पन्ने खुलते चले जाते हैं। भावनात्मक जुड़ाव की झलक पेश करने वाले लामा-जोगी जैसे स्वाँगों का लोसर में विशेष आकर्षण होता है।
लोसर में कुत्ते, बिल्लियों, गाय, बछड़ों आदि को भी खाना खिलाया जाता है। नई फसल का उत्सव भी इसमें होता है। इस तरह लोसर का त्योहार सभी जीवधारियों के प्रति प्रेम के साथ ही सहजीवन और सह-अस्तित्व का भाव भी दिखाता है।
इस तरह लोसर का त्योहार अपनी विविधताओं के साथ, उमंग और उल्लास के साथ सर्दियों की ठिठुरन के बीच नया जोश, नई उमंग भर जाता है। लोसर का त्योहार उल्लास और उमंग के साथ ही लदाख के गौरवपूर्ण अतीत को, विनय की शिक्षाओं को, और नीति-नैतिकता की नसीहतों को साथ लेकर आता है। सीमित संसाधनों के बीच, जीवन की जटिलताओं के बीच लोसर के पर्व पर थिरकते पाँव बताते हैं कि जीना भी एक कला है और अपनी तहजीब के विविध रंगों को समेटकर लोसर के दीपकों की जगमगाहट के बीच बिखेर देना ही कठिन जीवन की कड़ी चुनौतियों के लिए सटीक जवाब है। एक बाल कविता के साथ लोसर की ढेर सारी शुभकामनाएँ-

आया आया लोसर1 आया,
ढेरों  खुशियाँ  संग   लाया,
ठंडक से सहमे  लोगों  को,
मस्ती  का   मौसम   भाया,
आया आया लोसर  आया।
झूम-झूमकर   गाना   गाते,
गाने  के  संग  नाच है सुंदर,
बज उठते हैं दमन2 के बोल,
सुरनाने  उत्साह  बढ़ाया,
आया  आया लोसर  आया।
आचो4    आते     आचे5   आती,
मिलजुल कर सब साथ में होते,
सबके संग कुछ समय  बिताया,
आया   आया   लोसर   आया।
मिट जाते झगड़े झंझट सब
कौन  हैं  मेरे  कौन  तुम्हारे,
बीती  बातें  सभी भुलाकर,
सबको  गले  लगाने  आया,
आया  आया  लोसर आया।
बनती खूब  सिवइयाँ मीठी,
सज जाते  हर घर हर द्वारे,
जगमग जगमग धरती होती,
हर मन को  चमकाने आया,
आया आया लोसर  आया।
नौ तरह  की चीज़  मिलाकर
नौवें    दिन     होता    तैयार
कहते लोग गुथुक6 है जिसको
आमाँ7  ने  सबको  पिलवाया,
आया  आया  लोसर   आया।
किसने  अच्छे  कर्म   किये  हैं,
किसने   बुरे   किये    हैं   काम,
किस्मत अच्छी बुरी है किसकी,
जादू की पुड़िया  को  खोलकर,
अच्छा   बुरा    बताने    आया,
आया   आया   लोसर   आया।
1.तिब्बती पंचांग के अनुसार सर्दियों में मनाया जाने वाला पर्व 2. नगाड़ा जैसा वाद्य यंत्र 3. बीन जैसा वाद्य यंत्र 4. बड़ा भाई (तिब्बती) 5. बड़ी बहन (तिब्बती) 7. लोसर में बनने वाला एक प्रकार का पेय पदार्थ जिसमें मेवे के साथ कोयला आदि नौ चीजें मिलाई जातीं हैं 8. माँ (तिब्बती)
(आकाशवाणी, लेह से दिनांक 11 दिसंबर, 2018 को प्रातः 09 बजकर 10 मिनट पर प्रसारित)
राहुल मिश्र

Sunday, 18 November 2018

सप्तकल्पक्षये क्षीणे न मृता तेन नर्मदा




सप्तकल्पक्षये क्षीणे न मृता तेन नर्मदा

सप्तकल्पक्षये    क्षीणे      मृता   तेन  नर्मदा ।
नर्मदैकैव      राजेन्द्र       परं     तिष्ठेत्सरिद्वरा ।। 55 ।।
तोयपूर्णा      महाभाग      मुनिसङ्घैरभिष्टुता ।
गंगाद्याः सरितश्चान्याः कल्पे-कल्पे क्षयं गताः ।। 56 ।।
भारतीय संस्कृति और समाज-जीवन में अपना विशेष महत्त्व रखने वाली नर्मदा नदी का सुंदर-रोचक और धर्म-अध्यात्म से परिपूर्ण वर्णन श्रीस्कंद पुराण के रेवाखंड में मिलता है। नर्मदा का एक नाम रेवा भी है। श्रीस्कंद पुराण के रेवाखंड में नर्मदा नदी का समग्र वैशिष्ट्य प्रदर्शित-परिलक्षित होता है। रेवाखंड में उल्लिखित है कि सात कल्पों का क्षय हो जाने के बाद भी मृत होना, अर्थात् नष्ट होना तो दूर, जो क्षीण भी नहीं होती है, ऐसी श्रेष्ठ नदी ही नर्मदा कहलाती है। श्रीस्कंद पुराण के रेवाखंड में मार्कण्डेय ऋषि और धर्मराज युधिष्ठिर के मध्य संवाद चल रहा है। मार्कण्डेय ऋषि धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि- हे राजेंद्र! नर्मदा ही ऐसी श्रेष्ठ नदी है, जो सदा स्थित रहा कहती है, कभी नष्ट नहीं होती है। इस प्रसंग के पूर्व युधिष्ठिर के प्रश्न पर मार्कण्डेय ऋषि बताते हैं- गंगा सब नदियों में श्रेष्ठ है; उसी प्रकार सरस्वती, कावेरी, देविका, सिंधु, सालकुठी, सरयू, शतरुद्रा, यमुना, गोदावरी आदि अनेक नदियाँ समस्त पापों का हरण करने वाली हैं। ये सभी नदियाँ और समुद्र किस कारण से कल्प, कल्प में नष्ट हो जाते हैं, उनके बारे में मैं बताऊँगा। किंतु इन सबसे अलग नर्मदा नदी ऐसी है, जिसका सात कल्पों में भी क्षय नहीं होता, जो अनेक कल्पों तक अनवरत् प्रवाहमान रहती है, जो कालजयी और शाश्वत है। मार्कण्डेय ऋषि युधिष्ठिर को बताते हैं, कि-  हे महाभाग! नर्मदा नदी सदैव जल से परिपूर्ण रहती है। मुनि-संघ, अर्थात् साधु-संन्यासियों और ऋषि-मुनियों के लिए यह नदी सदैव अभीष्टित रही है। इसके तट पर मुनि-संघ तपश्चर्या करने हेतु सदैव प्रेरित होता रहा है। इसका कारण संभवतः नर्मदा नदी का शाश्वत जीवन है, क्योंकि गंगा और उसके सदृश अनेक नदियों का कल्प-कल्प में क्षय हो जाया करता है।
मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम नर्मदा नदी के उद्गम-स्थल के निकट स्थित है, जिसे वर्तमान में मारकुंडी के नाम से जाना जाता है। विंध्य पर्वतश्रेणियों और सतपुड़ा की पहाड़ियों के मध्य नर्मदा नदी का उद्गम अमरकंटक नामक स्थान पर होता है। विंध्य पर्वतश्रेणी का दक्षिणी छोर चित्रकूट परिक्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है। अतीत से ही चित्रकूट परिक्षेत्र धर्म-साधना का केंद्र रहा है। इस कारण यहाँ पर अनेक प्रसिद्ध ऋषियों के आश्रम रहे हैं और अनेक साधकों ने इस क्षेत्र का अपनी साधना के लिए चयन भी किया है। नर्मदा नदी के उद्गम के साथ शिवजी की साधना का प्रसंग जुड़ा हुआ है। श्रीस्कंद पुराण में मार्कण्डेय ऋषि नर्मदा के शाश्वत जीवन को बताते हुए कहते हैं कि-
पुरा  शिवः  शान्ततनुश्चचारविपुल तपः ।
हितार्थ  सर्वलोकानामुमया  सह शंकरः ।।14।।
ऋक्षशैलं  समारूह्य  तपस्तेपे सुदारुणम् ।
अदृश्यः सर्वभूतानां सर्वंभूतात्मको वशी ।।15।।
तपस्तस्य  देवस्य स्वेदः समभवत्विकल ।
तंगिरिंप्लावयामास     सस्वेदोरुद्रसंभवः ।।16।।
प्राचीनकाल में परम शांत शरीर वाले शिवजी ने उमाजी के साथ अत्यंत कठिन साधना की थी। लोक-कल्याण के लिए उन्होंने यह तप ऋक्षशैल में किया था। यह ऋक्षशैल विंध्य और सतपुड़ा की पर्वश्रेणियों की संगम-स्थली माना जाता है। कठिन तपश्चर्या के कारण शिवजी के शरीर से निकलने वाली पसीने की बूँदें इस ऋक्षशैल पर गिरीं, जिसने शैल को पिघला दिया और इस प्रकार नर्मदा का जन्म हुआ। ऋक्षशैल को रैवतक पर्वत भी कहा जाता है। रैवतक से उत्पन्न होने के कारण नर्मदा को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। शिव को सृष्टि के संहारकर्ता के रूप में जाना जाता है। नर्मदा के तट पर शिवजी की कठिना साधना-तपश्चर्या शिव के लोकरक्षक स्वरूप को प्रकट करती है। इसके साथ ही शिवजी के स्वेद से उत्पन्न नर्मदा नदी श्रम की महत्ता और साधना की श्रेष्ठता को स्थापित करती है। श्रीस्कंद पुराण में वर्णित आस्था के पक्ष के साथ नर्मदा के तटीय क्षेत्रों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक-सामाजिक अतीत अपने समग्र गौरव के साथ उपस्थित हो जाता है, जिसे अध्ययन की गहराइयों में उतरकर देखा जा सकता है, जाँचा-परखा जा सकता है।
नर्मदा नदी के किनारे गोंड जनजातीय समूह का विस्तार मिलता है। इसी कारण इस क्षेत्र को आज गोंडवाना के नाम से जाना जाता है। इतिहास में गोंड राजवंश का कालखंड पंद्रहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। गोंड राजवंश की प्रसिद्धि प्रमुख रूप से रानी दुर्गावती के नाम से अंकित है, जिन्होंने अपने पति राजा दलपतशाह के असामयिक निधन के बाद गोंडवाना का शासन पूरी कुशलता के साथ सँभाला, मुगलों की सेनाओं को कई बार पराजित किया और बाद में वीरगति को प्राप्त किया। किंतु इससे पूर्व गोंड जनजातीय समूह को प्राचीनतम जनजातीय समूह और मानव आबादी के स्रोत के रूप में भी जाना जाता है। गोंडी धर्म की कथाओं में शिव को शंभूशेक या महादेव के रूप में जाना जाता है। गोंडों की धार्मिक कथाओं में महादेव की अठासी पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। इन अठासी पीढ़ियों में शिव के साथ शक्ति का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है। लोकदेवता के रूप में शिव-शक्ति का युगल लोक का कल्याण करता रहा है, ऐसा गोंडवाना की लोककथाओं और लोकगीतों में वर्णित होता है। महादेव की अठासी पीढ़ियों की शुरुआत शंभु-मूला से होती है और अंतिम पीढ़ी में शंभु-पार्वती का उल्लेख मिलता है। इन अठासी पीढ़ियों का अतीत पाँच हजार से लगाकर दस हजार ईसापूर्व तक माना जाता है। गोंडों का अपना धर्म, जिसे गोंडी भाषा में ‘कोया-पुनेम’ कह जाता है, उसका अतीत भी लगभग इतना ही पुराना है।
कोया-पुनेम का शाब्दिक अर्थ होता है- मानव-धर्म। नर्मदा के तट पर बसी गोंडों की अति-प्राचीन बस्तियाँ अपनी आस्थाओं और जीवनीय मान्यताओं के साथ हजारों वर्ष पहले से मानव-धर्म का निर्वहन करती चली आ रही हैं। ‘कोया-पुनेम’ या मानव-धर्म यहाँ के मूल निवासियों की अपनी आस्थाओं, मान्यताओं और धार्मिक क्रिया-कलापों में प्रकट होता रहा है। श्रीस्कंद पुराण में वर्णित शिव-पार्वती की कठिन तपश्चर्या इसी की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। लोक-कल्याण के लिए, मानव-धर्म को निभाने के लिए गोंडों के आदिपुरुष और गोंडों की आदिशक्ति ने संयुक्त रूप से जिस कठिन तप और साधना से नर्मदा का सृजन किया, उसका धार्मिक स्वरूप श्रम के प्रति आस्थावान होने, साधना के प्रति नतमस्तक होने की सीख देता प्रतीत होता है। इस कारण रैवतक पर्वत की नीलिमा से युक्त रेवा का प्रवाह सदियों से कर्म-सौंदर्य और लोक-कल्याण का गुणगान करता रहा है; श्रम-साधना के प्रति आस्थावान मानव-समुदाय को इन विलक्षण गुणों से जोड़ने हेतु प्रेरित करता रहा है। नर्मदा नदी इसी कारण साधना की प्रतीक है।
रैवतक पर्वत में की गई शिव-पार्वती की तपश्चर्या के संबंध में ऐसी मान्यता है कि यह तपस्या उन्होंने विष्णु के लिए की थी। विष्णु के विभिन्न अवतारों द्वारा अलग-अलग कालखंडों में रक्ष-संहार किया गया। साधना-तपस्या और लोक के कल्याण हेतु संलग्न रहने वाले साधु-संन्यासियों को आतंकित करने वाले क्रूरकर्मा राक्षसों के संहार के लिए विष्णु ने अलग-अलग अवतार धारण किए और धरती पर धर्म की स्थापना की। अलग-अलग कालखंडों में विष्णु द्वारा किए गए संहारों के प्रायश्चित्त के रूप में शिव ने अपनी तपस्या रैवतक पर्वत में की, ऐसा माना जाता है। इस तरह शैव और वैष्णव का अद्भुत समन्वय, अनूठा सामंजस्य नर्मदा के तट पर परिलक्षित होता है। यह नर्मदा का अपना वैशिष्ट्य है, कि शैव-साधना का विशिष्ट केंद्र होकर भी यहाँ वैष्णव भक्ति-भावना के सूत्र जुड़ते हैं।
श्रीस्कंद पुराण में नर्मदा के माहात्म्य को उद्घाटित करने वाले मार्कण्डेय ऋषि जब नर्मदा नदी को सात कल्पों के क्षय हो जाने पर भी क्षीण नहीं होने वाली दुर्लभ नदी कहते हैं, तब बहुधा पुराणकार और कथावाचक के प्रति अतिकाल्पनिक हो जाने का संशय उत्पन्न होने लगता है। पुरातनकाल में आस्थावान लोगों के लिए संशय की स्थितियाँ आज के सदृश नहीं होती थीं। आज की वैज्ञानिक दृष्टि अपनी आस्था को बल देने के लिए तथ्यों को महत्त्व देती है। इस दृष्टि से विचार करने हेतु पुनः गोंड जनजातीय समूहों के अतीत को देखना होगा। आज की भूवैज्ञानिक खोजों ने सिद्ध कर दिया है कि पचास करोड़ वर्ष पूर्व धरती में केवल दो महाद्वीप थे। इनमें से एक को ‘लॉरेशिया लैंड’ और दूसरे को ‘गोंडवाना लैंड’ नाम दिया गया है। इन दोनों महाद्वीपों के टूटने पर वर्तमान के पाँच महाद्वीपों का निर्माण हुआ है।
दक्षिणी गोलार्ध में स्थित ‘गोंडवाना लैंड’ का सीधा संबंध नर्मदा नदी के तटीय क्षेत्रों से था। इस कारण आदिमकालीन गोंड जनजातीय समूहों को आदिमानव की बस्तियाँ माना जाता है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन का सर्वप्रथम विकास नर्मदा नदी के तट पर हुआ है। नर्मदा नदी घाटी में हुए उत्खनन में डायनासोरों के अंडे और जीवाश्म भी मिले हैं। पेंजिया भूखंड के निर्माण के समय, अर्थात् लगभग तेरह करोड़ वर्ष पूर्व आदिमानव की उत्पत्ति भी नर्मदा नदी घाटी में हुई। नर्मदा घाटी में मिलने वाले खारे पानी के स्रोत और आदिमानव द्वारा बनाए गए शैलचित्र नर्मदा नदी घाटी की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं। गोंडी भाषा में प्रचलित लोकगीतों और लोककथाओं में आदिकालीन मानव के अनेक विविधतापूर्ण चित्र मिलते हैं, जिनके आधार पर भी नर्मदा नदी की प्राचीनता को सिद्ध किया जा सकता है।
सप्तकल्प, अर्थात् लगभग आठ करोड़ चालीस लाख वर्ष गुजर जाने के बाद भी नर्मदा नदी का क्षय नहीं होता, नर्मदा नदी का अस्तित्व समाप्त नहीं होता, ऐसा जब श्रीस्कंद पुराण में कहा जाता है, तब वर्तमान की भूवैज्ञानिक खोजों के आलोक में इस कथन को परखने पर हमारा सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है। जिस समय आज के जैसे आधुनिक उपकरण और परीक्षण की विधियाँ नहीं थीं, उस समय किया गया काल-निर्धारण न केवल आश्चर्य में डाल देने वाला है, वरन् अपने पुरातन ज्ञान-विज्ञान के प्रति असीमित-अपरिमित आस्था की उत्पत्ति करा देने वाला भी है।
विंध्य को उत्तर और दक्षिण का विभाजक माना जाता है। विंध्य और सतपुड़ा के संधि-स्थल से निकलने वाली नर्मदा नदी भी विंध्य की भाँति उत्तर और दक्षिण के मध्य विभाजक रेखा खींचती है। उत्तर और दक्षिण का विभाजन वस्तुतः आर्य और द्रविड़ जातीय समूहों का  विभेद है। इस विभेद को तोड़ने के अनेक प्रयास अतीत से ही होते रहे हैं। विष्णु के हिस्से की तपस्या को रैवतक पर्वत में शिव-पार्वती द्वारा किया जाना, रामेश्वरम् में श्रीराम के द्वारा शिवलिंग की स्थापना करना आदि इसके प्रतीक हैं। ये शैव और वैष्णव के मध्य समन्वय-सौहार्द को स्थापित करने के साथ ही उत्तर और दक्षिण के विभेद को मिटाने के प्रयास भी हैं। भारतीय ऋषि-मुनियों ने, विशेषकर महर्षि अगस्त्य और उनकी पत्नी लोपामुद्रा ने इस कार्य को सक्रियता के साथ किया है। महर्षि अगस्त्य के साथ एक प्रसंग आता है, कि विंध्य को निरंतर ऊँचा होते देखकर उन्होंने विंध्य पर्वत से आग्रह किया, कि उन्हें दक्षिण की ओर जाना है और जब तक वे दक्षिण की यात्रा से लौटकर न आ जाएँ, तब तक वह अपनी ऊँचाई को न बढ़ाए। इस पौराणिक प्रसंग में महर्षि अगस्त्य उत्तर और दक्षिण के मध्य बढ़ती दूरियों को कम करने हेतु प्रयासरत प्रतीत होते हैं। बाद में राम का वनगमन होता है। दक्षिणापथ में अग्रसर होने हेतु राम का पथ-प्रदर्शन अगस्त्य ऋषि द्वारा किया जाता है।
अतीत की यह परंपरा, उत्तर और दक्षिण के मध्य विभेद को कम करने के प्रयासों की अगली कड़ी नर्मदा परिक्रमा में दिखाई पड़ती है। नर्मदा के किनारे-किनारे चलने वाली पदयात्रा इसी कारण अपना धार्मिक महत्त्व-मात्र नहीं रखती, अपितु सामाजिक-सांस्कृतिक सहकार और सामंजस्य के गुरुतर दायित्व का निर्वहन भी करती है। नर्मदा परिक्रमा का प्रारंभ कब से हुआ, यह बताना कठिन है। यद्यपि कुछ आस्थावान भक्तों द्वारा नर्मदा परिक्रमा के रोचक वृत्तांत को लिपिबद्ध किया गया है। नर्मदा परिक्रमा तीन वर्ष तीन मास और तेरह दिनों में पूर्ण होती है। भगवान दत्तात्रेय के उपासक नर्मदा परिक्रमा को विशेष महत्त्व देते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा और तेलंगाना आदि प्रांतों के साथ ही नेपाल से आने वाले दत्त संप्रदाय के उपासक बड़ी आस्था के साथ नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। इस तरह नर्मदा परिक्रमा में उत्तर से दक्षिण तक, अखंड भारतवर्ष सिमट आता है, ऐसा कहा जा सकता है। आपसी मेल-जोल को बढ़ाने, विविध संस्कृतियों और जीवन-दृष्टियों को अवगाहने के लिए नर्मदा परिक्रमा को किसी लोक-उत्सव से कम नहीं कहा जा सकता है।
लोकजीवन के लिए नर्मदा केवल एक नदी नहीं है, वरन् ‘माई’ है, माता है। इसीलिए नर्मदा स्नान को जाते, नर्मदा की परिक्रमा लगाते आस्थावान नर्मदा-पुत्रों की वाणी में- ‘नरबदा मइया ऐसी तो मिली रे.., जैसे मिले हैं मताई ओर बाप रे....’ जैसे लंबी टेर वाले लमटेरा गीत सुनाई पड़ते रहते हैं। राजा मेकल की सुता, मेकलसुता और सोन नद की कथाओं के साथ ही बाजबहादुर और रानी रूपमती की कथाओं को नरबदा माई अपने में बसाए हुए हैं। गोंडवाना की रानी दुर्गावती और महिष्मती (महेश्वर) की रानी अहिल्याबाई होलकर की वीरता को रेवा ने अपने प्रवाह में सँजोया है।
आज भृगु ऋषि की साधना-स्थली भेड़ाघाट प्रसिद्ध पर्यटन-स्थल के रूप में विकसित हुआ है। आस्था और लोक-परंपरा को साथ लेकर चलने वाली नर्मदा परिक्रमा अब तीन वर्ष तीन माह और तेरह दिन से सिमटकर हवाई मार्ग से मात्र तीन-चार घंटे में ही पूरी हो जाने वाली बन गई है। सप्तकल्पों में भी क्षय नहीं होने वाली नर्मदा नदी के किनारे जन्मे आदिमानव के वंशजों के लिए अतीत का गौरवपूर्ण अध्याय आज के भौतिकता से पूर्ण जीवन में पढ़ा जाना दुष्कर प्रतीत होने लगा है। इसके बावजूद नरबदा माई अपने आँचल में असीमित स्नेह भरे हुए अपने सपूतों को जीवन जीने की दिशा दिखा रही हैं, साधना का पथ बता रही हैं, और कर्म के सौंदर्य को प्रतिष्ठापित कर रही हैं।
संदर्भ-स्रोत-
1.  श्रीस्कंद पुराण, द्वितीय खंड, रेवाखंड, सं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्कृति संस्थान, बरेली, सं. 1986,
2.  लारेंशिया-गोंडवाना कनेक्शन बिफोर पेंजिया, सं. विक्टर ए. रामोस एवं डंकन कैपी, द जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका, कॉलॉरेडो, सं. 1999,
3.  भारतीय संस्कृति में ऋषियों का योगदान, डॉ. जगतनारायण दुबे, दुर्गा पब्लिकेशंस, दिल्ली, सं. 1989,
4.  संस्कृति-स्रोतस्विनी नर्मदा, अयोध्याप्रसाद द्विवेदी, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, सं. 1987,
5.  जंगल रहे-ताकि नर्मदा बहे, पंकज श्रीवास्तव, नर्मदा संरक्षण पहल, इंदौर, सं. 2007,
6.  हिस्ट्री, ऑर्कियोलॉजी एंड कल्चर ऑफ दि नर्मदा वैली, आर.के. शर्मा, शारदा पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, सं. 2007,
7.  एथनिक ग्रुप्स ऑफ साउथ एशिया एंड दि पैसिफिक : एन इनसाइक्लोपीडिया, जेम्स बी. मिन्हन,  एबीसी-सीएलआईओ, एलएलसी, कैलिफोर्निया, सं. 2012,
8.  विकीपीडिया।
-राहुल मिश्र
(अखिल भारतीय साहित्य परिषद् न्यास द्वारा श्रीमहेश्वर, मध्यप्रदेश में आयोजित ‘नर्मदा परिक्रमा’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी, दिनांक- 13-14 सितंबर, 2018 की स्मारिका में प्रकाशित, सं. डॉ. मंदाकिनी शर्मा एवं डॉ. आशा वर्मा, प्रका. अखिल भारतीय साहित्य परिषद् न्यास, नई दिल्ली)

Monday, 30 April 2018

राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार






राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं  धर्म्यं सुसुखं कर्तुमाव्ययम् ।।1
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम दोषदृष्टि रहित हो, भक्त हो, इसलिए मैं इस परम गोपनीय ज्ञान को, जो विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण है, उसे बताऊँगा। तुम इस ज्ञान को जानकर इस दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जाओगे। यह विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है। यह समस्त गोपनीय ज्ञानों का राजा है। यह पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्म से युक्त है। यह सुगम और अविनाशी है। गीता का नवम अध्याय उस ज्ञान की बात से शुरू होता है, जिसे विज्ञानसम्मत अर्थात तथ्यों पर खरा उतरने वाला बताया गया है। यह अत्यंत गोपनीय भी है, अर्थात यह सर्वसुलभ नहीं है, किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग जानकर और उस मार्ग पर चलकर यदि इस विज्ञानसम्मत ज्ञान को ग्रहण कर लिया जाए, इसे जीवन में उतार लिया जाए, तो यह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा, इसके प्रत्यक्ष फल प्राप्त होंगे। धर्म से युक्त ऐसे विशिष्ट ज्ञान की विवेचना करने के कारण गीता में इस अध्याय का अपना विशिष्ट स्थान है।
धर्म, आस्था और भक्ति के रूढ़ अर्थों से अलग गीता व्यवहार की दृष्टि से, दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यापार की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न भाष्यकारों, विद्वानों और तर्कशास्त्रियों ने इस कारण गीता का समग्र विवेचन विभिन्न तरीकों-पद्धतियों से किया है। विनोबा भावे द्वारा दिये गए गीता-प्रवचन इस संदर्भ एकदम अलग स्थान रखते हैं। गीता के समस्त अध्यायों पर दिये गए उनके प्रवचन पुस्तकाकार उपलब्ध हैं। अपने प्रवचनों को उन्होंने आम जनता के उपयोगार्थ केंद्रित किया है। वे ‘गीता प्रवचन’ की प्रस्तावना में लिखते हैं- इनमें तात्विक विचारों का आधार छोड़े बगैर, लेकिन किसी वाद में न पड़ते हुए, रोज के कामों की बातों का ही जिक्र किया गया है।.... यहाँ श्लोकों के अक्षरार्थ की चिंता नहीं, एक-एक अध्याय के सार का चितंन है। शास्त्र-दृष्टि कायम रखते हुए भी शास्त्रीय परिभाषा का उपयोग कम-से-कम किया है। मुझे विश्वास है कि हमारे गाँव वाले मजदूर भाई-बहन भी इसमें अपना श्रम-परिहार पाएँगे।2 इस प्रकार विनोबा के गीता-प्रवचन की समाज से निकटता और उनके प्रवचनों की लौकिक दृष्टि स्वतः प्रमाणित हो जाती है। पूज्य साने गुरुजी ने विनोबा के प्रवचनों को शब्दबद्ध किया। मराठी और हिंदी में विनोबा का ‘गीता प्रवचन’ एक अलग किस्म के भाष्य के रूप में, गीता को आत्मसात करने की नई दृष्टि के रूप में इस प्रकार सामने आ सका।
बाबा विनोबा के लिए श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का दर्शन-मात्र नहीं है, वरन् जीवन को जीने की कला है, एक पद्धति है। वे इसी कारण गीता के विविध अध्यायों का विवेचन शास्त्र के स्थान पर लोक के आधार पर करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का नवाँ अध्याय इस कारण उनके लिए विशिष्ट हो जाता है, क्योंकि वे इस अध्याय के माध्यम से जीवन जीने की उस पद्धति को व्याख्यायित करते हैं, जो उनके समय की अनिवार्यता और आवश्यकता थी। वे गीता के नवम अध्याय पर प्रवचन की शुरुआत में ही कहते हैं-
यह अध्याय गीता के मध्य भाग में खड़ा है। सारी महाभारत के मध्य गीता और गीता के मध्य यह नवाँ अध्याय। अनेक कारणों से इस अध्याय को पावनता प्राप्त हो गई है। कहते हैं कि ज्ञानदेव ने जब अंतिम समाधि ली, तो उन्होंने इस अध्याय का जप करते हुये प्राण छोड़ा था। इस अध्याय के स्मरण मात्र से मेरी आँखें छलछलाने लगती हैं और दिल भर आता है। व्यासदेव का यह कितना बड़ा उपकार है, केवल भारतवर्ष पर ही नहीं, सारी मनुष्य-जाति पर उनका यह उपकार है। जो अपूर्व बात भगवान ने अर्जुन को बताई, वह शब्दों द्वारा प्रकट करने योग्य न थी। परंतु दयाभाव से प्रेरित होकर व्यासजी ने इसे संस्कृत भाषा द्वारा प्रकट कर दिया। गुप्त वस्तु को वाणी का रूप दिया। इस अध्याय के आरंभ में भगवान कहते हैं-
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् ।
यह जो राजविद्या है, यह जो अपूर्व वस्तु है, वह प्रत्यक्ष अनुभव करने की है। भगवान उसे ‘प्रत्यक्षावगम’ कहते हैं। शब्दों में न समाने वाली, परंतु प्रत्यक्ष अनुभव की कसौटी पर कसी हुई यह बात इस अध्याय में बतायी गई है। इससे यह बहुत मधुर हो गया है। तुलसीदासजी ने कहा है-
को  जाने को  जैहे  जम-पुर,   को  सुर-पुर  पर-धाम  को ।
तुलसिहि बहुत भलो लागत, जग-जीवन रामगुलाम को ।।
मरने के बाद मिलने वाले स्वर्ग और उसकी कथाओं से यहाँ क्या काम चलेगा? कौन कह सकता है कि स्वर्ग कौन जाता है और यमपुर कौन जाता है? यदि संसार में चार दिन रहना है, तो राम का गुलाम बनकर रहने में ही मुझे आनंद है, ऐसा तुलसीदासजी कहते हैं। राम का गुलाम होकर रहने की मिठास इस अध्याय में है। प्रत्यक्ष इसी देह में, इन्हीं आँखों से अनुभूत होने वाला फल, जीते जी अनुभव की जाने वाली बातें इस अध्याय में बतायी गयी हैं।3
नवम अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए कथनों का ऐसा विश्लेषण अद्भुत है। तुलसी के राम जहाँ मर्यादा और आदर्श के प्रतीक हैं, वहीं विनोबा के राम मानव-मात्र हैं, जीव-मात्र हैं। यह जगत इसी कारण राममय है। मानव साक्षात् परमात्मा की ही मूर्ति है, इसलिए उसकी सेवा, उसकी भक्ति ही सबसे बड़ी है। संसार में जो प्रत्यक्ष है, उसकी सेवा पर हमें एकाग्र होना चाहिए। स्वर्ग, नर्क की कल्पनाओं में उलझकर अपने सांसारिक कर्मों को जटिल, आत्मकेंद्रित और कृत्रिम नहीं बनाना चाहिए। इसके लिए विनोबा बड़ी सहजता के साथ कृष्ण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि- मोक्ष पर केवल मनुष्य का ही अधिकार नहीं, बल्कि पशु-पक्षी का भी है- यह बात श्रीकृष्ण ने साफ कर दी है।4 इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान श्रीकृष्ण ने इसीलिए बताया था। गोवर्धन पर्वत, जो सबके सामने है, प्रत्यक्ष है। जिस पर हमारा जीवन आश्रित है, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। वह वास्तव में परमात्मा का रूप है। इसी तरह गाय-बैल-अश्व और अन्य जीवधारी भी हैं। उनके प्रति समर्पण का भाव, उनके प्रति भक्ति का भाव रखना सीधे परमात्मा की भक्ति है, क्योंकि वे परमात्मा के ही प्रतिरूप हैं।
कौन्तेय ! जो  खाते  हो करते तथा आहुति जो करो ।
दान तप  जो  करो  वह   सब  मुझे  ही  अर्पण करो ।।
शुभ अशुभ जो फल कर्म बंधन यह किये से मुक्त हों ।
कर्म  सब  अर्पण  करो,  मुझसे  मिलो  अरु मुक्त हो ।।5
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में कर्मयोग और भक्तियोग का सुंदर मेल है। कर्मयोग कर्म करने और फल की इच्छा न करने की बात कहता है। भक्तियोग ईश्वर के साथ भावपूर्ण जुड़ाव की बात कहता है। दोनों ही अलग-अलग दिशाओं पर केंद्रित हैं। नवम अध्याय में इन दोनों को इस प्रकार समीप लाया गया है, जोड़ दिया गया है, कि यह राजयोग बन गया है। यह योग गुह्य भी इसी कारण है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रदर्शित कर्मयोग और भक्तियोग का प्रत्यक्ष नहीं रह जाता, गोपनीय हो जाता है। यह जटिल साधना के साथ अंतरात्मा में केंद्रित हो जाता है। यह भक्ति और कर्म के सौंदर्य को आत्म-तत्त्व के सौंदर्य से जोड़कर श्रेष्ठतम बना देता है। बाबा विनोबा ने दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यवहार में इस श्रेष्ठता को प्रतिष्ठापित करने हेतु राजयोग की अत्यंत सामयिक और सुंदर व्याख्या की है। वे लिखते हैं- फल का विनियोग चित्त-शुद्धि के लिए करना चाहिये। जो काम जैसा हो जाय, वैसा ही उसे भगवान को अर्पण कर दो। प्रत्यक्ष क्रिया जैसे-जैसे होती जाय, वैसे-ही-वैसे उसे भगवान को अर्पण करके मनरतुष्टि प्राप्त करते रहना चाहिए। फल को छोड़ना नहीं है, उसे भगवान को अर्पण कर देना है। यह तो क्या, मन में उत्पन्न होने वाली वासनाएँ और काम-क्रोधादि विकार भी परमेश्वर को अर्पण करके छुट्टी पाना है।6 इस प्रकार के भाव के साथ कर्म किया जाए, तो आज के समय की अनेक विकृतियों का शमन किया जा सकता है। भगवान को अर्पित करने के लिए भक्त जिस प्रकार शुद्ध पुष्प, जल, प्रसाद आदि का यत्न करते हैं, उसी प्रकार शुद्ध और सात्विक कर्मों के अर्पण हेतु वे प्रेरित होंगे। कर्म में शुचिता और पवित्रता स्वतः आ जाएगी। शरीर की प्रत्येक इंद्रिय द्वारा किया गया कार्य ईश्वर को अर्पण किया जाना है, यह मन में रखकर कार्य करना ही ‘राजयोग’ है। बाबा विनोबा द्वारा की गई ऐसी व्याख्या अद्भुत और अनुपम है। वे कहते हैं कि अर्पण करने हेतु विशिष्ट क्रिया का आग्रह नहीं है। कर्ममात्र ईश्वर को अर्पित कर देना है।
विनोबा ने सारे जीवन को हरिमय बनाने, अर्थात पावन-पुनीत बनाने का माध्यम राजयोग को ही बताया है। जीवन के हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को, इसकी प्रासंगिकता को वे सरल शब्दों में स्पष्ट करते हैं। वे घर-परिवार से लगाकर समाज तक हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को व्याख्यायित करते हैं। अध्ययन-अध्यापन में राजयोग की महत्ता को विशेष रूप से वे रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि- शिक्षण-शास्त्र में तो इस कल्पना की बड़ी ही आवश्यकता है, लड़के क्या हैं, प्रभु की मूर्तियाँ हैं। गुरु की यह भावना होनी चाहिये कि मैं इन देवताओं की ही सेवा कर रहा हूँ। तब वह लड़कों को ऐसे नहीं झिड़केगा- “चला जा अपने घर। खड़ा रह घंटे भर। हाथ लवाकर। कैसे मैले कपड़े हैं? नाक से कितनी रेंट बह रही है।” बल्कि हलके हाथ से नाक साफ कर देगा, मैले कपड़े धो देगा और फटे कपड़े सीं देगा। यदि शिक्षक ऐसा करे, तो इसका कितना अच्छा परिणाम होगा। मार-पीटकर कहीं अच्छा नतीजा निकाला जा सकता है? लड़कों को भी चाहिये कि वे इसी दिव्य भावना से गुरु को देखें। गुरु शिष्य को हरि मूर्ति और शिष्य गुरु को हरि मूर्ति मानें। परस्पर ऐसी भावना रखकर यदि दोनों व्यवहार करें, तो विद्या तेजस्वी होगी।7
विनोबा का मत है कि ऐसी भावना के साथ जब जीवन में कर्म किये जाएँगे, तब कर्म स्वयं पवित्र हो जाएगा और पाप का भय नहीं रह जाएगा। सब जगह प्रभु विराजमान हैं, ऐसी भावना चित्त में बैठ जाय, तो फिर एक-दूसरे के साथ हम कैसा व्यवहार करें, यह नीतिशास्त्र हमारे अंतःकरण में अपने आप स्फुरने लगेगा।8 ऐसी भावना को कर्म में उतारने के बाद नीतिशास्त्र और व्यवहार-विज्ञान के विशिष्ट अध्ययन की अनिवार्यता नहीं रह जाती है। जब कर्म पवित्र हो जाएगा, तब पाप और पुण्य का अंतर करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी। कर्म स्वतः पुण्यमय और पवित्र हो जाएगा।
इसी आधार पर वे जीवन की सार्थकता को प्रमाणित करते हैं। वे लिखते हैं- गीता में कुल सात सौ ही श्लोक हैं। पर ऐसे भी ग्रंथ हैं, जिनमें दस-दस हजार श्लोक  हैं। किंतु वस्तु का आकार बड़ा होने से उसका उपयोग भी अधिक होगा, ऐसा नहीं कह सकते। देखने की बात यह है कि वस्तु में तेज कितना है, सामर्थ्य कितनी है? जीवन में क्रिया कितनी है, इसका महत्त्व नहीं। ईश्वरार्पण-बुद्धि से यदि एक भी क्रिया की हो, तो वही हमें पूरा अनुभव करा देगी।9 इस प्रकार जीवन में विशिष्ट की प्राप्ति के लिए, मोक्ष के लिए अलग से यत्न करने की, प्रयास करने की बात बाबा विनोबा नहीं करते। वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में, कर्म के किसी भी स्तर पर, किसी भी क्षण पवित्र भावना से कर्म करने और उसे ईश्वर को अर्पित कर देने की क्रिया को ही श्रेष्ठ बताते हैं। वे कहते हैं कि- बोने और फेंक देने में फर्क है। बोया हुआ थोड़ा भी अनंतगुना होकर मिलता है। फेंका हुआ यों ही नष्ट हो जाता है। जो कर्म ईश्वर को अर्पण किया गया है, उसे बोया हुआ समझो। उससे जीवन में अनंत आनंद भर जायगा, अपार पवित्रता छा जायगी।10
भक्तियोग और कर्मयोग के संयोजन से निःसृत राजयोग की सुंदर, सहज और व्यावहारिक व्याख्या करके बाबा विनोबा ने श्रीमद्भगवद्गीता के उस लोकोपयोगी पक्ष को प्रकाश में लाने का कार्य किया है, जिसे जीवन जीते हुए, सरल और सहज साधना के साथ आत्मसात् किया जा सकता है। आज के जीवन में इसकी प्रासंगिकता समाज के निर्माण के लिए, जीवन की शुचिता के लिए, व्यवहार की पवित्रता के लिए, समर्पण और त्याग के साथ संबंधों के निर्वहन के लिए, और सच्चे अर्थों में मोक्ष की प्राप्ति के लिए है।
संदर्भ-
1. श्रीमद्भगवद्गीता, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ. 117,
2. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, प्रस्तावना,
3. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 122-123,
4. वही, पृ. 126,
5. श्रीमद्भगवद्गीता का पद्यानुवाद, गणेश मिश्र ‘बनरा’, साहित्य मंदिर प्रेस, लखनऊ, प्रथम सं. 1937, पृ. 33-34,
6. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 130,
7. वही, पृ. 138
8. वही, पृ. 139,
9. वही, पृ. 141,
10.  वही, पृ. 141 ।
डॉ. राहुल मिश्र
(अखिल भारतीय साहित्य परिषद् व गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के संयुक्त तत्त्वावधान में नई दिल्ली में दिनांक 25-26 मार्च, 2018 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र)

Thursday, 26 October 2017

वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य


वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य

भारतवर्ष की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था धर्मप्रधान रही है और प्रमुख तत्त्व के रूप में भक्ति की व्याप्ति को भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में देखा जा सकता है। भारतीय विद्वानों के साथ ही अनेक विदेशी विद्वानों ने इस तथ्य पर अपनी सहमति दी है। भक्ति के विविध स्वरूपों का, विभिन्न मतों-संप्रदायों का विकास और विस्तार इस धारणा को निरंतर पुष्ट करता रहा है। इसके साथ युगानुरूप चेतना और उपासकों-भक्तों के वैचारिक संघर्षों के साथ मतों-संप्रदायों का उत्थान-पतन भी होता रहा है। ब्रह्मपुराण में एक श्लोक आता है-
ब्रह्मा कृत युगे पूज्यः स्त्रेतायां यज्ञउच्चते।
द्वापरे पूज्यते विष्णुरहं पूज्यश्चतुर्ष्वापि।। (33.20)
इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा का संप्रदाय कृतयुग (सतयुग) में प्रचलित था। त्रेतायुग में वैदिक संप्रदाय अपनी यज्ञप्रधान व्यवस्था के साथ प्रचलित हुआ। द्वापर युग में वैष्णव भक्ति प्रचलित हुई और शिव की पूजा-उपासना प्रत्येक युग में प्रचलित रही है। यह श्लोक भारतीय उपासना-पद्धतियों और मतों-संप्रदायों के विकास-क्रम को भी स्पष्ट करता है। इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा की उपासना सबसे पुरानी थी। आज सगुण एवं निर्गुण उपासना जगत् में ब्रह्मा के नाम कोई संप्रदाय नहीं चलता। शताब्दियों के पहले ही अन्य संप्रदायों ने उसे दबा दिया और ब्रह्मा को अपने संप्रदायों के प्रतिष्ठाताओं की अपेक्षा गौण स्थान प्रदान किया। यह प्राचीन जातियों पर नवागत जातियों के विजय का परिचायक है। ब्रह्मा संप्रदाय भारत का प्राचीनतम संप्रदाय था। वेदपूर्व युग के अवैदिक ब्राह्मण जाति के बीच में यह लोकप्रिय रहता था। अनेक देवताओं तथा संप्रदायों का जन्म इसी से हुआ। अतएव ब्रह्मा के संप्रदाय को संप्रदायों का पिता मानना गलत नहीं होगा। वैदिक धर्म से संघर्ष करके वह परिक्षीण हो गया। शिव के शापवश ब्राह्म के संप्रदाय के लुप्त होने की कथा शैव धर्मावलंबियों के नाशकारी आक्रमण की परिचायक है। जैन, बौद्ध, शैव एवं वैष्णव धर्मों ने उसको आत्मसात् करने में पर्याप्त विजय पाई।1  वैदिक संप्रदाय कर्मकांडों पर आधारित था और वैदिक साहित्य भी ज्ञान-तत्त्व को प्रधानता देता था। इस कारण वैदिक साहित्य यज्ञ और नियम के विधानों में इस तरह उलज्ञा कि उसमें पौरोहित्य की प्रधानता हो गई, जिसने कालांतर में ऐसे विरोध को जन्म दिया, जिसकी परिणति वैष्णव भक्ति के रूप में प्रकट हुई। वैदिक धर्म में वर्णित देव-मंडल में विष्णु को प्रधान स्थान प्राप्त नहीं था, किंतु कालांतर में उपासना-शास्त्र के प्रधान देवता के रूप में विष्णु को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। विष्णु को उपास्य मानकर प्रचलित होने वाले वैष्णव धर्म की व्यापकता के पीछे उसकी धार्मिक, दार्शनिक स्थापनाओं की विशेषता थी और साथ ही समन्वय की अपूर्व भावना भी थी-
किरात  हूणांध्र-पुलिंद  पुल्कसा  आभीर-लङ्का  यवनाश्वशादयः ।
यो न्यै च या या यदुपाश्रया श्रयाः शुद्धन्ति तस्यै प्रभविष्णवे नमः ।।
भारतवर्ष की अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता के नितांत विलक्षण स्वरूप को प्रकाशित करता श्रीमद्भागवत् का यह श्लोक एक ओर भारतवर्ष के गौरवपूर्ण इतिहास का साक्ष्य प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर इसमें विष्णु का आश्रय लेकर ब्राह्मण पौरोहित्यवाद के खिलाफ जन-संघर्ष मुखर होता है। भारत में बाहर से आने वाली अनेक जातियों और धर्मों के आक्रांता स्परूप को परिवर्तित और परिशुद्ध करके आत्मसात् कर लेने की यह प्रवृत्ति ऐतिहासिक और भौगोलिक सीमाओं में अद्भुत है। हूण, यवन, ग्रीक, आंध्र और पुलिंद आदि बाह्य आक्रमणकारी जातियों ने विष्णु की उपासना का आश्रय लिया और विष्णु के नाम से प्रवर्तित वैष्णव धर्म को समृद्ध किया। वैष्णव धर्म के प्रमुख ग्रंथ भागवत में इसी कारण उनका उल्लेख आदरपूर्वक किया गया है। ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी में वैष्णव भक्ति-धारा के आंदोलन के रूप में विकसित होने का प्रमुख कारण जैन और बौद्ध धर्मों का विकास भी माना जा सकता है। इस संदर्भ में भगवतशरण उपाध्याय लिखते हैं- भागवतधर्म को पुष्टि अधिकतर निम्नश्रेणी के लोगों से मिली। इसके पश्चातकाल में तो इसके गुरुओं तक में अधिकतर निम्नवर्गीय अछूत तक हुए। और एक समय तो बौद्ध-धर्म और भागवत-धर्म की सीमायें एक हो गईं, जब बुद्ध, वैष्णवों के अवतार मान लिये गये और उनकी मूर्ति पुरी के विष्णु मंदिर में जगन्नाथ के रूप में स्थापित की गई। आज भी इस मंदिर के प्राचीरों के भीतर वर्णविधान नहीं है और आर्य जाति, निम्नवर्ण, सवर्ण और अछूत तक एक साथ प्रसाद पाते हैं। इन बौद्ध-धर्म और भागवत-धर्म के सम्मिलित प्रहार ने कम से कम परिणाम रूप में ब्राह्मण वर्णव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया। भागवत धर्म में काफी संख्या में विदेशीय विजातीय भी सम्मिलित हुए थे उन्होंने उस धर्म को अपने कंधे दिये। द्वितीय सदी ईस्वी पूर्व के अंत में तक्षशिला के यवन (ग्रीक) राजा अन्तलिखिद ने शुंग वंशीय काशिपुत्र भागभद्र के पास विदिशा के दरबार में हेलियोपोर नाम का अपना ग्रीक राजदूत भेजा था। वह हेलियोपोर वैष्णव हो गया और बेस नगर में विष्णु के नाम पर उसने एक स्तम्भ खड़ा करवाया।2 विष्णु का वामन अवतार भी वैष्णव धर्म के विकास की तीव्र प्रक्रिया और इसके असीमित भौगोलिक विस्तार की विशिष्टता को व्याख्यायित करता है, जिसमें वामन के रूप में तीन पगों में ही सारी धरती को नाप लेने का प्रसंग आता है। ऋग्वेद में वर्णित है-
इदं विष्णुविर्चक्रमे त्रेधानिदधे पदम्। समूलमस्य पांसुरे।। (122-7)
भागवतधर्म के आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत में विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन है। श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध में राम के और दशम स्कंध में कृष्ण के अवतार का वर्णन है। ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व जिस तरह राम को विष्णु का अवतार मान लिया गया था, उसी तरह कृष्ण को भी विष्णु का अवतार मान लिया गया था। इस तरह राम और कृष्ण, दोनों ही भागवत धर्म के प्रमुख आराध्य के रूप में प्रचलित हुए। इतना अवश्य है कि भागवत धर्म में कृष्ण की महत्ता अपेक्षाकृत अधिक प्रतीत होती है। राम का स्वरूप लोकरक्षक के रूप में विकसित हुआ और इस कारण रामकथा ने, रामभक्ति ने वैचारिक गंभीरता और सामाजिक मर्यादा को केंद्र में रखकर विकास किया। वैष्णव धर्म का अंग होने के बावजूद रामभक्ति की धारा अलग तरीके से विकसित हुई और भागवत धर्म या वैष्णव धर्म का प्रसंग उठने पर प्रायः कृष्ण की लीलाओं का वर्णन ही रूढ़ होने लगा।
कृष्ण का लोकरंजक स्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों के लिए अपेक्षाकृत सुगम और सुग्राह्य हुआ। डॉ. भण्डारकर के अनुसार प्राचीनकाल में वैष्णव धर्म, मुख्यतः तीन तत्त्वों के योग से उत्पन्न हुआ था। पहला तत्त्व तो यह विष्णु नाम ही है, जिसका वेद में उल्लेख सूर्य के अर्थ में मिलता है। दूसरा तत्त्व नारायण धर्म का है, जिसका विवरण महाभारत के शान्तिपर्व के नारायणीय उपाख्यान में है। और तीसरा तत्त्व वासुदेव मत का है। यह वासुदेव मत वसुदेव नामक एक ऐतिहासिक पुरुष (समय 600 ई.) के इर्द-गिर्द विकसित हुआ था। इन्हीं तीनों तत्त्वों ने एक होकर वैष्णव धर्म को उत्पन्न किया। लेकिन, उसमें कृष्ण के ग्वाल रूप की कल्पना और राधा के साथ उनके प्रेम की कथा बाद में आयी और ये कथाएँ, शायद, आर्येतर जातियों में प्रचलित थीं।3 इस तरह वैष्णव धर्म वैदिक और अवैदिक विचारधाराओं के संघर्ष के फलस्वरूप विकसित हुआ और इसमें कृष्ण के ग्वाल रूप, कृष्ण का श्याम वर्ण, उनके नृत्य-गायन और उनकी रासलीलाएँ उत्तर और दक्षिण के समन्वय के रूप में देखी जा सकतीं हैं। दक्षिण के तिरुमाल या मायोन या कन्नन, उनकी प्रिया नाम्पिन्ने को राधा और कृष्ण के रूप में देखा जा सकता है। दक्षिण भारत में दूसरी-तीसरी शताब्दी से प्रचलित भक्ति-विषयक कविताएँ पाण्डित्य के स्तर पर प्रभावशाली न होते हुए भी आम जनता में भक्ति की धारणा को पुष्ट करने में समर्थ थीं। इन कविताओं का संपादन सर्वप्रथम आलवार कवि नाथमुनि ने किया और यह संग्रह प्रबंधम् के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विष्णु के लोकप्रचलित अवतारों के प्रति आस्था, कर्म के प्रति निष्ठा, सादगी, सहजता, सरलता, समन्वय, समर्पण और निष्काम भक्ति के सुगम संस्करण को पूर्णता के साथ पाने हेतु प्रबंधम् अपेक्षाकृत सफल सिद्ध हुआ होगा, जिसके कारण भक्ति की अविरल धारा का प्रवाह दक्षिण में बहा, जिसमें आलवार संतों-भक्तों का योगदान अविस्मरणीय है। प्रत्येक आलवार का समय निश्चित करने में मतभेद अवश्य है। परन्तु, इस बात पर प्रायः सभी लोग सहमत हैं कि ये बारह विशिष्ट आलवार ईसा की तीसरी सदी से लेकर नवीं सदी तक के बीच हुए हैं। अतएव, यह बात पूर्ण रूप से निश्चित है कि प्रपत्ति, शरणागति, आत्म-समर्पण और एकान्तनिष्ठा से विभूषित भक्ति का सम्यक् विकास और प्रचार आलवारों के साहित्य द्वारा नवीं सदी के पूर्व ही संपन्न हो चुका था तथा उस समय तक दक्षिण की जनता भक्ति से, पूर्णतः, विभोर भी होने लगी थी।4 उत्तर में फैले हुए वेद-विरोधी आंदोलनों के कारण हिंदुत्व का शुद्ध रूप खिसककर दक्षिण चला गया था। यही कारण है कि जिन दिनों उत्तर भारत के बौद्ध-सिद्ध धर्म के बाह्योपचारों की खिल्ली उड़ा रहे थे, उन्हीं दिनों दक्षिण के आलवार और नायनार संत शिव और विष्णु के प्रेम में पागल हो रहे थे।5
बौद्ध-सिद्ध-नाथ परंपराओं के साथ संघर्ष की प्रवृत्ति कालांतर में स्थानांतरित होकर विदेशों से आगत धर्म के साथ स्थापित हुई, फलस्वरूप एक नए आंदोलन का सूत्रपात हुआ। भारत की पुरातन भक्ति-परंपरा के संघर्ष के कालखंड से लेकर नवागत इस्लाम के साथ संघर्ष के कालखंड में दक्षिण भारत का अपना योगदान रहा। आठवीं शती से लेकर सोलहवीं शती तक भारतीय धर्म और दर्शन के क्षेत्र में जिन महानुभावों ने कार्य किया, उनमें बहुसंख्यक का आविर्भाव दक्षिण में ही हुआ था; यथा- शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्क, माध्व, सायण, बल्लभ आदि। इन मनीषियों ने परंपरागत धर्म एवं दर्शन की नयी-नयी व्याख्याएँ प्रस्तुत करके समस्त भारत की हिंदू जनता को धार्मिक नेतृत्व प्रदान किया।6 समस्त भारतवर्ष में भक्ति-आंदोलन के प्रणेता के रूप में दक्षिण के आलवार और नायन्मार कवियों-संतों के पूर्ववर्ती और परवर्ती अनेक भक्त आचार्यों, संतों, कवियों ने अनेक मतों- पंथों-संप्रदायों को वैचारिक आधार देकर स्थापित किया। दक्षिण भारत में प्रायः 600 ई. के आसपास विकसित हुए आंदोलन के उत्तर भारतीय संस्करण और उसके पूर्वापर संबंधों में विभिन्न मतों-पंथों-संप्रदायों को देखा जा सकता है। इनमें से प्रत्येक नवीन विचारधारा या संप्रदाय की उत्पत्ति पूर्ववर्ती या समकालीन संप्रदाय के विरोध और संप्रदाय-विशेष के अनुयायियों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर आधारित होती थी। सुधारवादी संतों के देहावसान के बाद उनके शिष्य अपने गुरू की पूजा शुरू करते थे और उनके नाम से नया पंथ चला देते थे।7 इस प्रकार अनेक विद्वान आचार्यों और संप्रदायों की विस्तृत परंपरा को देखा जा सकता है। उनकी उत्पत्ति और विकास के क्रम का प्रवाह तमिल-तेलगू-कन्नड़-मलयालम और फिर मराठी भाषाओं के क्षेत्रों से होता हुआ हिंदीभाषी क्षेत्रों तक पहुँचा। इनके विकास-क्रम में आने वाला वारकरी संप्रदाय अपनी विशिष्टता के कारण न केवल महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, वरन् इस संप्रदाय में भक्ति आंदोलन के दोनों सोपानों के वैशिष्ट्य-विकास के व्यवस्थित क्रम को भी देखा जा सकता है।
वारकरी संप्रदाय के आराध्य देव विट्ठल या विठोबा और रुक्मिणी या रखुमाई की आराधना महाराष्ट्र में अत्यंत प्राचीन है। दक्षिण में जब आर्यों का प्रवेश हुआ, तब यहाँ के मूल आदिवासियों के प्रमुख उपास्य का भी आर्यीकरण अवश्य हुआ होगा। इसी समन्वयीकरण के ही कार्यस्वरूप पंढरपुर के विठोबा-विट्टल-विष्णु के बालरूप माने गये और अवतार भी समझे गये।8 पंढरपुर के विट्ठल के साथ भक्त पुंडलीक की कथा भी प्रचलित है। भक्त पुंडलीक को ऐतिहासिक माना जाए, या काल्पनिक माना जाए, इसे लेकर विद्वानों के बीच मतभेद भले ही हो, मगर लोक-धारा में भक्त पुंडलीक की मातृ-पितृभक्ति प्रसिद्ध है। वे विठोबा का वरदान पाने से ज्यादा जरूरी अपने माता-पिता की सेवा मानते हैं।9 पुंडलीक की कर्मठता और माता-पिता के प्रति उनकी भक्ति-भावना को देखकर वरदान देने आए विठोबा को पुंडलीक ने रुकने के लिए कहा, तो विठोबा ने पूछा कि मैं कहाँ पर आसन ग्रहण करूँ? इस पर पुंडलीक ने एक ईंट उनकी ओर फेंककर उसपर बैठने को कहा। जब पुंडलीक विठोबा के पास आए, तब पुंडलीक ने वरदान माँगा कि इसी रूप में वे अपने भक्तों को दर्शन देते रहें, तब से पुंडलीक की फेंकी ईंट पर विठोबा अपने दोनों हाथ कमर में रखे हुए खड़े हैं। देवशयनी एकादशी में विठोबा (विट्ठल) अपने शयन के लिए नहीं जाते और अपने भक्तों के लिए अनेकानेक वर्षों से इसी प्रकार खड़े हुए हैं। विठोबा का यह स्वरूप लोकदेवता का है, जिसने भाषा-भूषा-जाति-पंथ के भेद को मिटा दिया। विठोबा को पंडरगे, पंढरीनाथ, पांडुरंग और विठाई माउली आदि नामों से भी जाना जाता है।10 इसी विट्ठल देवता को अपनी भक्ति में रँगकर प्रस्तुत करते हुए अनेक भक्त कवियों ने अपनी-अपनी मानसिकता के अनुसार अलग-अलग रूप दिया। अनेक कहानियों, प्रसंगों, घटनाओं का काव्यात्मक सृजन किया। महिलाओं ने विट्ठल को अपनी भावना में रँगकर अपने निकट देखा, मानवीय रूप दिया। विट्ठल और रखुमाई के प्रेम-प्रसंगों को लेकर अपने मन की अनेक मधुर कल्पनाओं को चित्रमय अभिव्यक्ति दी। कुछ ऐसी रचना भी मिलती हैं, जहाँ विट्ठल-रखुमाई के साथ जनाबाई को जोड़कर प्रेम-त्रिकोण की परिकल्पनाएँ की गयी हैं। सारांश विट्ठल सामान्य जनता का भावनात्मक आलंबन दैवत था। इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है, भारत में जनता विशिष्ट देवता का एकांतिक समर्थन या विरोध नहीं करती। अपनी रुचियों, प्रवृत्तियों, स्वप्नों, विचारों, उद्देश्यों के अनुसार देवता की मूर्ति और जीवन को ढालती है, अपने मिथकों की सर्जना करती है। ‘विट्ठल’ यही वह मूर्ति है। परिणामतः सभी प्रकार की समभावना को यहाँ स्थान है। दुर्गा भागवत जी ने तो विट्ठल को महाराष्ट्र, आंध्र, कर्नाटक की एकात्म संस्कृति का प्रतीक माना है।11 इस परंपरा की प्राचीनता को खोजना असंभव की हद तक कठिन कार्य है। भक्त पुंडलीक के सदृश्य भक्ति को धारण करते हुए अपने आराध्य के प्रति अपने समर्पण को प्रकट करने के लिए गले में तुलसी की माला धारण करने वाले भक्त-समाज को मालकरी संप्रदाय का नाम कब मिला और कालांतर में विट्ठल के दर्शन के लिए भक्त समूहों की वारी (यात्रा) की परंपरा को वारकरी संप्रदाय कब कहा जाने लगा, इसके विषय में विद्वानों ने अपने अनुमान के आधार पर भले ही काल-निर्धारण करने की कोशिश की हो, मगर वारकरी संप्रदाय के नाम से प्रसिद्धि पाने वाली यह भक्ति-धारा, जिसका संबंध पंढरपुर के विठोबा से जुड़ता है, उसने भक्ति आंदोलन में अपने अनूठे स्वरूप का सर्जन किया है।
डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर अपने शोध-ग्रंथ में उद्धृत करते हैं कि- वारकरी संप्रदाय अपने उत्पादकों के नाम से नहीं चला है। वैदिक धर्म के विरुद्ध आवाज इस संप्रदाय ने नहीं उठाई, वरन् उसके तत्त्वों से ही मानवी समता भूमि पर समन्वय करते हुए इस संप्रदाय ने अपना विकास किया है।12 ये तथ्य प्रमाणित करते हैं कि वारकरी संप्रदाय वैदिक धर्म के विरोध के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले भक्ति आंदोलन के प्रभाव से उत्पन्न नहीं हुआ, वरन् अपने प्राचीनतम स्वरूप को समयानुकूल परिवर्तित करते हुए विकसित हुआ है। यह तथ्य ब्रह्म संप्रदाय के साथ इस संप्रदाय के केंद्र पंढरपुर की समकालीनता को भी सिद्ध करता है।
संत ज्ञानेश्वर या ज्ञानदेव ने वारकरी संप्रदाय के तात्विक और दार्शनिक आधार को तैयार करने का काम किया। उन्होंने लोक-प्रचलित भाषा में ज्ञानेश्वरी गीता और अमृतानुभव आदि ग्रंथों का सृजन किया। नामदेव ने अपने अभंग पदो के माध्यम से वारकरी संप्रदाय की लोकप्रियता का विस्तार पंजाब तक किया। नामदेव के साथ ही सांवता माली, जनाबाई, रोहीदास चर्मकार, चोखा महार और नरहरि सोनार आदि भी इस संप्रदाय के विकास में सहायक हुए। ज्ञानदेव के भाई निवृत्तिनाथ, सोपाननाथ और बहन मुक्ताबाई ने वारकरी संप्रदाय के विकास में योगदान दिया। संत भानुदास ने विजयनगर से विट्ठल की मूर्ति वापस लाकर पंढरपुर में मंदिर का भव्य निर्माण करवाया। एकनाथ ने वाराणसी में एकनाथी भागवत का सृजन करके ज्ञान के साथ ही कीर्तन-भजन के माध्यम से भक्ति के सहज स्वरूप को विकसित किया। संत तुकाराम ने अभंग पदों की रचना और उनके संकीर्तन के प्रसार के साथ वारकरी संप्रदाय को समृद्ध किया। इसी तरह निळोबा ने भी विठोबा की भक्ति का प्रसार किया। इनके साथ ही वारकरी संप्रदाय की समन्वय भावना से प्रभावित होकर कीर्तन करनेवाले मुस्लिम कीर्तनिए भी इस संप्रदाय के साथ में आए और यह परंपरा आज भी देखी जा सकती है।13 इस वारकरी पंथ में निम्न जातियों के संतों को भी उनकी साधना के आधार पर सम्मान का स्थान मिला है। इसीलिए नामदेव को खेचर को गुरु मानने में संकोच नहीं हुआ। ज्ञानेश्वर के सखा, सहचर, मित्र, बंधु नामदेव के आत्मीय जनों का परिदृश्य देखने पर पता चलता है कि मध्ययुग में एक महान ‘संत जाति’ निर्मित हो रही थी, जो शूद्र जातिभेदों से ऊपर उठकर श्रद्धेय गं.भा. सरदार के शब्दों से ‘अध्यात्मनिष्ठ मानवतावाद’ का प्रभावपूर्ण आलोक वितरित कर रही थी।14  
उत्तर भारत में भक्ति-आंदोलन का स्वरूप प्रायः दार्शनिक विवेचनों और सांप्रदायिक कट्टरता पर आधारित रहा, साथ ही संतों की अलग-अलग गद्दियों, आचार्यों की विविध मान्यताओं के निर्माण ने ऐसी व्यापकता का सृजन किया, जिसे सरलता के साथ वर्गीकृत कर देना हिंदी साहित्येतिहास के आचार्यों के लिए सुलभ हुआ। जिस समय उत्तर भारत में महिलाओं को साधना में बाधक समझा जा रहा था, मीरां को विष दिया जा रहा था, उस समय मुक्ताबाई और जनाबाई आदि की प्रेरणा से महिलाएँ भी वारकरी की वारी में खुलकर भागीदारी कर रही थीं। जिस समय उत्तर भारत में सगुण-निर्गुण और रामभक्ति-कृष्णभक्ति के दायरे बँध रहे थे, उस समय भी वारकरी संप्रदाय के संत इन सबके समन्वय के लिए समग्र निष्ठा के साथ लगे हुए थे। सगुण और निर्गुण की कट्टरता उत्तर भारत में इतनी ज्यादा थी कि गोस्वामी तुलसीदास को ‘सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा’ कहकर स्थिति को संभालने का प्रयास करना पड़ा। वारकरी पंथ समन्वय का अद्भुत रूप है। विविध हिंदू जातियों, लोक समुदायों के आराध्य दैवतों का समन्वित रूप वारकरी पंथ का आराध्य दैवत है- विट्ठल। गोप, मछुवारे, धनगर इत्यादि निम्न जात के लोगों ने भी विट्ठल में अपने दैवत को देखा और शिवभक्तों ने शिव का रूप भी। नामसंकीर्तन की महत्ता को व्यक्त करते समय ज्ञानेश्वर ने लिखा है- ‘कृष्ण-विष्णु-हरि-गोविंद । एयां नामांचे निखिल प्रबंध.’ अर्थात् कृष्ण, विष्णु, हरि या गोविंद किसी भी नाम से देवता का संकीर्तन किया जा सकता है।15 पंढरपुर को दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है, जिससे यहाँ पर शैव संप्रदाय के साथ संबंधों को समझा जा सकता है।
उपासनाभेद का आश्रय लेकर उत्तर भारत में विकसित हुई भक्ति-धारा में ‘संत’ की उपाधि निर्गुण धारा के लिए रूढ़ हो गई, जबकि महाराष्ट्र में ‘संत’ की उपाधि सज्जन और निष्काम-समर्पित भक्ति की धारा में डूब जाने वालों के लिए थी। इसी आधार पर ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ आदि को जनसामान्य ने ‘संत’ की उपाधि से विभूषित किया। ‘संत’ की उपाधि के कारण उत्तर भारतीय भक्ति परंपरा में इनका वर्गीकरण भी कर दिया गया, जिसे वारकरी संप्रदाय की परंपरा और उसकी जीवंत-जागृत चेतना के आधार पर तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है। वैष्णव धारा के प्रमुख ग्रंथ के रूप में मान्य गीता को वैदिक आडंबरों और पौरोहित्य के विरुद्ध संघर्ष का, विरोध का काव्य भी माना जाता है।15 गीता की टीका के रूप में ज्ञानेश्वर द्वारा लिखी गई ज्ञानेश्वरी गीता में किसी का विरोध नहीं, बल्कि लोकभाषा में रचित यह काव्य-ग्रंथ समाज को एकजुट करने और नीति का मार्ग दिखाने में अप्रतिम सिद्ध हुआ है। इस ग्रंथ के प्रणयन के माध्यम से संत ज्ञानेश्वर ने जीवन की ओर देखने, जीवन को सफल-सार्थक बनाने की सीख दी है। संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी, संत एकनाथ की एकनाथी भागवत और संत तुकाराम की गाथा को वारकरी संप्रदाय की प्रस्थानत्रयी के रूप में देखा जा सकता है, जिनमें किसी के विरोध के स्थान पर सकारात्मक भाव की प्रधानता है, इसी कारण वारकरी संप्रदाय में किसी भी मत-संप्रदाय-विचारधारा और यहाँ तक कि धर्मों के समन्वय को देखा जा सकता है। सभी धर्मों-मतों-पंथों की मूल भावना के समग्र रूप को, विराट के साथ एकाकार होने के भाव को इसी कारण वारकरी संप्रदाय में देखा जा सकता है। वारकरी संप्रदाय की यह विशिष्टता अद्भुत है। इसके साथ ही वारकरी संप्रदाय की एक अन्य विशिष्टता को रेखांकित करना अनिवार्य हो जाता है। मालकरी भक्त गले में तुलसी की माला धारण करते थे और अपने-अपने स्तर पर पूजा-उपासना करते थे। परवर्ती वारकरी भक्तों ने भक्ति के सामाजिक संस्करण को तैयार किया और इस तरह दूर-दराज से चलने वाली कीर्तन मंडलियों के माध्यम से आत्मानंद के सागर में डूबते-तिरते भक्तों ने सामाजिक जीवन, सहकार, संगठन और सामाजिक एकीकरण की ऐसी भावना का विकास किया, जिसे अन्यत्र खोजना संभव नहीं है।
समग्रतः, महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय को विशिष्टताओं के उस पुंज के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें पुरातन भक्ति और उपासना के समस्त संप्रदायों, पद्धतियों, विशेषताओं की ज्योति प्रज्ज्वलित होती है। वारकरी संप्रदाय को परंपरा के क्रम में सीधे उस विधान से जोड़ा जा सकता है, जिसमें मानव-सभ्यता के विकास के साथ आराध्य और आराधक के, उपास्य और उपासक के संबंधों की उत्पत्ति हुई, विकास हुआ। सगुण और निर्गुण के समन्वय के साथ ही जैन-बौद्ध मतों का समन्वय भी पंढरपुर में देखा जा सकता है, कुछ विद्वानों ने अपने शोधों में ऐसा सिद्ध किया है। वारकरी संप्रदाय की इस विशेषता के पीछे भी लोकदेवता विट्ठल की भूमिका को देखा जा सकता है। मतों और संप्रदायों के आपसी विभेदों और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयासों में भक्ति के वास्तविक स्वरूप को भुला देने वाली मान्यताओं के लिए, विद्वान आचार्यों के लिए वारकरी संप्रदाय ने एक दिशा देने का काम किया, संभवतः इसी कारण विठोबा और उनके भक्तों के बीच का संबंध युगों-युगों की यात्रा करके आज भी समन्वय, सौहार्द और अद्धितीय भक्ति-भावना को जीवंत किए हुए है। समूचा पंढरपुर आज भी विट्ठल-विट्ठल के गजर से भरा है। आज भी पताकाओं को लिए हुए भक्तों की टोलियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। हरिकीर्तनों की धूम वहाँ पर मची रहती है और वहाँ चोखा (महार होकर भी) गले लग जाता है।                                    
विट्ठल विट्ठल गजरी । अवधी दुमदुमली पंढरी
होतो नामाचा गजर । दिंहयापताकांचे भार
निवृत्ति ज्ञानदेव सोपान । अपार वैष्णव ते जन
हरिकीर्तनाथो दाटी । तेथे चोखा घानली मिठो ।
संदर्भ-
1. उपासना प्रणालियों तथा भक्ति संप्रदायों का विकास, भक्ति-आंदोलन और साहित्य, डॉ. एम जॉर्ज, प्रगति प्रकाशन, आगरा, प्रथम सं. 1978, पृ. 139,
2. भारतीय चिन्तन की द्वन्द्वात्मक प्रगति, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, जनवाणी प्रेस एण्ड पब्लिकेशनस् लि., बनारस, प्रथम सं. 1950, पृ. 54-55,
3. आर्य और आर्येतर संस्कृतियों का मिलन, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 98,
4. भक्ति आन्दोलन और इस्लाम, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 377,
5. इस्लाम का हिंदुत्व पर प्रभाव, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 366,
6. पौराणिक भक्ति आंदोलन : सामान्य पृष्ठभूमि, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास- प्रथम खंड, डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 179,
7. उपासना प्रणालियों तथा भक्ति संप्रदायों का विकास, भक्ति-आंदोलन और साहित्य, डॉ. एम जॉर्ज, प्रगति प्रकाशन, आगरा, प्रथम सं. 1978, पृ. 137-138,
8. वैष्णव धर्म और दर्शन का क्रमिक विकास, हिंदी एवं मराठी के वैष्णव संत साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा,1968, पृ. 67,
11. मराठी कविता में सर्वधर्म समभाव, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 27,
12. वैष्णव मतों की विभिन्न शाखाएँ संप्रदाय और उनका हिंदी मराठी क्षेत्र में क्रमिक विकास, हिंदी एवं मराठी के वैष्णव संत साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा,1968, पृ. 133,
13. मध्यकालीन हिंदी मराठी के संत कवि, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 12,
14. वही, पृ. 12,
15. मराठी कविता में सर्वधर्म समभाव, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 27,
16. गीता-दर्शन अथवा संघर्ष, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, जनवाणी प्रेस एण्ड पब्लिकेशंस लि., बनारस, प्रथम सं. 1950, पृ. 27-40 ।

{लालबहादुर शास्त्री कॉलेज आफ आर्ट्स, सायंस एंड कॉमर्स, सतारा (महाराष्ट्र) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र एवं तन्वी प्रकाशन, 857,ब, शनिवार पेठ, सातारा (महाराष्ट्र) द्वारा प्रकाशित (ISBN 978-81-934308-5-9), संपादक- डॉ. भरत सगरे, सहसंपादक- डॉ. विट्ठल नाईक}