Saturday, 5 September 2026

अवधेश अवध में आता है...

 


अवधेश अवध में आता है...


घर में तपसी की तरह देख भरत का वेष ।

ब्राह्मण भूला अपनपौ-पुलकित हुआ विशेष ।।

बोला- “राजर्षि, सुनो जिसका तुम ध्यान रात- दिन करते हो ।

जिसके  दर्शन को  भरतलाल माला  पर  घड़ियाँ  गिनते हो ।।

पुष्पक  पर  वानर-मण्डल  में-जो  अपनी  छटा दिखाता है ।

लक्ष्मण सीता  के  सहित  वही  अवधेश  अवध  में  आता है।।

मधुर वचन यह विप्र के थे मधुरस की धार ।

मरते  विरही  में  हुआ-नव  जीवन-सञ्चार ।।

(राजतिलक, उत्तरकांड, राधेश्याम रामायण)

रामकथा में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वन से लौटने का प्रसंग बड़े महत्त्व का है। हर युग में, प्रत्येक काल में, विभिन्न कालखंडों में रची गई रामकथाओं में, वाल्मीकि रामायण से लगाकर आज के समय की रामकथाओं तक.... यहाँ तक कि गद्यात्मक-औपन्यासिक रामकथाओं तक में श्रीराम का अयोध्या आना न केवल वर्णित है, वरन् दिव्य और भव्य स्वरूप लिए हुए है। गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यंत रुचिकर और मार्मिक वर्णन इस प्रसंग को लेकर किया है। विभिन्न रामकथाओं में यह प्रसंग अपने-अपने तरीके से कवियों-भक्तकवियों द्वारा कहा गया है।

राधेश्याम कथावाचक द्वारा रचित राधेश्याम रामायण में यह प्रसंग अत्यंत रुचिकर हो उठा है। नेपाल के राजपरिवार से कथावाचस्पति की पदवी प्राप्त, कीर्तन कलानिधि, काव्यकलाभूषण, श्रीहरिकथा विशारद, कविरत्न राधेश्याम कथावाचक विरचित रामायण का आधुनिक काल में विशेष महत्त्व है। उनकी रामकथा तुलसी के मानस की लोकप्रियता और लोकव्याप्ति के स्तर पर भले न हो, किंतु आम जन तक अत्यंत सरल और सहज भाषा-शैली में पहुँचती है।

राधेश्याम कथावाचक ने श्रीराम के अयोध्या आगमन की कथा का अत्यंत रुचिकर वर्णन क्षेपक कथा के संयोजन के साथ किया है। तुलसी के मानस में यह प्रसंग नहीं आता है। राधेश्याम रामायण में प्रसंग आता है, कि अयोध्या पहुँचने के पहले श्रीराम का विमान, पुष्पक विमान चित्रकूट पहुँचता है। राधेश्याम रामायण के लङ्का कांड में रावण-वध की कथा आती है। रावण के वध के उपरांत श्रीराम लङ्का का राजपाट विभीषण को सौंपकर अयोध्या चलने को तैयार होते हैं। लेकिन श्रीराम के सहयोगी रहे वानर, भालू, रीछ आदि रामादल राम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। वे सब भी राम के साथ चलने के लिए अनुरोध करते हैं। हनुमान, विभीषण, सुग्रीव आदि राम के प्रेम में इतने विह्वल हो उठे थे, कि राम को एक क्षण के लिए भी छोड़ना नहीं चाहते थे। अंततः राम सभी को लेकर अयोध्या की ओर चल पड़ते हैं। राधेश्याम कथावाचक कहते हैं-

इस प्रकार निज जनों को लेकर अपने साथ ।

सुमिर गजानन गौरि शिव चले अवध रघुनाथ ।।

चित्रकूट के निकट जब पहुँचा पुष्पक-यान ।

तब  बोले  हनुमान  से  कृपासिन्धु  भगवान ।।

रहा एक दिन अवधि में पहुँचो अवध-प्रदेश ।

शीघ्र  परमप्रिय भरत को पहुँचाओ सन्देश ।।

जो  आज्ञा  कहकर  चले पवनतनय सानन्द ।।

वाल्मीकि मुनि से इधर भेंटे रघुकुलचन्द ।।

मुनि बोले जग को अभी मिला नहीं विश्राम ।

अभी हुआ  ही है कहाँ- रावण का वध राम?

माया का सागर चहुँ दिशि है-उसमें शरीर यह लङ्का है ।

बैठा  है  अहङ्कार रावण,  जो  बजा  रहा  निज डङ्का है ।।

घननाद स्वार्थ का है इसमें, आलस है कुम्भकरण भगवन् ।

वध करो कृपा शर से इनको तब हो भू-भारहरण भगवन् ।।

जन का जब इस भाँति हो पूर्ण सफल सब काज ।

तब  मेरे  मन  अवध में  करो  बैठकर राज ।।

यहाँ राधेश्याम कथावाचक लङ्का काण्ड की कथा को विराम देते हैं। मुनि वाल्मीकि रामायण के रचयिता हैं, रामकथा के आद्य प्रस्तोता हैं। राधेश्याम कथावाचक श्रीराम के आद्यकवि वाल्मीकि से मिलन के प्रसंग को सायास वर्णित करते हैं। श्रीअयोध्याजी में विराजमान श्रीराम का लोकरक्षक स्वरूप इस भेंट में उभरता है। यहाँ सरल-सहज भाव से राधेश्याम कथावाचक मन रूपी अयोध्या का वर्णन कर रहे हैं। मन रूपी अवध में विराजमान होने वाले राम माया के सागर के मध्य स्थापित इस शरीर रूपी लंका के अधिपति अहङ्कार रूपी रावण, स्वार्थ रूपी घननाद, आलस्य रूपी कुंभकर्ण का वध करके आने वाले हैं। मन रूपी अयोध्या में राम तभी विराजमान होते हैं, जब इन कायिक-वाचिक-मानसिक विकृतियों का शमन हो जाता है। आद्यकवि वाल्मीकि की मनोकामना भी तभी पूर्ण होती है, रामकथा का आशय भी तभी सिद्ध-सफल होता है।

दूसरी ओर भरत जी हैं। अयोध्या में विरक्त संन्यासी की तरह जीवन बिता रहे हैं। रामभक्त हनुमान उन्हें यह बताने के लिए जाते हैं, कि श्रीराम अवध में आ रहे हैं। भरत यहाँ आत्मा के सदृश उपस्थित हैं। जिस प्रकार आत्मा अपने परमात्मा से मिलन को व्याकुल रहती है, वैसी ही व्याकुलता में वियोगी-सा जीवन बिताते हुए भरतजी की आशा का घट भर आया है। वे कहते हैं-

योगी की भाँति-देह तजकर-आत्मा के तार मिलाने हैं ।

आराध्यदेव  के  चरणों  में-प्राणों  के  फूल  चढ़ाने हैं ।।

पर नहीं,  भूल है, यह पूजा—होगी उनको स्वीकार नहीं ।

तू तो रक्षक है अवधि तलक-तन पर तेरा अधिकार नहीं ।।

अतएव  पवन,  जल,  सूर्य,  चन्द्र, इन सबको साक्षी करता हूँ ।

प्रभु के चरणों की शपथ-सहित अन्तिम प्रण यह ही करता हूँ ।।

चौदह वर्षों की अवधि बिता-यदि नाथ अवध में आयेंगे—

तो  इस  शरीर  को  छोड़ प्राण उनके चरणों में जायेंगे ।।

भरतजी के वियोग की पराकाष्ठा पार हो रही है, क्योंकि श्रीराम की वनवास की अवधि पूरी हो चुकी है। उनके आगमन की प्रतीक्षा है। भरतलाल चित्रकूट में श्रीराम से यह कहकर आए थे, कि मैं अवधि भर के लिए अयोध्या का पालन करूँगा। श्रीराम ने भी- ‘पालहु अवध अवधि भर जाई...’ कहकर भरत को चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजपाट सँभालने के लिए कहा था। चित्रकूट दो भाइयों के प्रेम की पराकाष्ठा का साक्षी बना था। संभवतः इसी कारण लंका से लोट रहे श्रीराम को चित्रकूट आते ही भरतलाल का ध्यान हो आता है। भरतलाल की भावुकता, उनके प्रेम में पगे वचन, उनका त्याग, उनकी सहजता और चित्रकूट के परिवेश में हुई बड़ी पंचायत का स्मरण श्रीराम को हुआ होगा। बाबा तुलसी के मानस में प्रसंग आता है, कि जब श्रीराम लंका से समस्त रामादल के साथ चलते हैं, तो रास्ते में वे विभिन्न स्थानों का परिचय कराते हैं। कहाँ पर कौन-सी घटना घटित हुई, बताते चलते हैं। चित्रकूट में पहुँचते ही वे भावुक हो जाते हैं, और इसी कारण वे अपने प्रिय हनुमान को कहते हैं, कि अयोध्या जाकर संदेश दो। हमारे पहुँचने की सूचना भरतलाल जी को दे दो।

कथा का विस्तार होता है। कथा लोक से रस संचय करके शिष्ट साहित्य में आती है। लोक में कथा का आस्वाद काशी की रामलीला में मिलता है। काशी शिव की ही नगरी नहीं, राम की नगरी भी है। जिस तरह वाल्मीकि रामायण से लगाकर बाबा तुलसी के मानस और आज के समय की राधेश्याम रामायण में रामकथा के साथ शिव और पार्वती चलते हैं, कथा प्रस्तोता और श्रोता के रूप में उपस्थित रहते हैं, वैसे ही काशी में देखने को मिलता है। विश्वनाथ की नगरी में नाटी इमली की रामलीला होती है। यह लीला भरत मिलाप की लीला है। राम के वन से लौटने के बाद भरतलाल से मिलने का प्रसंग यहाँ आता है।

राधेश्याम कथावाचक अत्यंत रुचिकर वितान बुनते हैं। ब्राह्मण वेशधारी हनुमान भरतजी के समक्ष उपस्थित हैं, और बता रहे हैं कि जिसके वियोग में संन्यासी जैसा जीवन बिता रहे थे, वह अब आने ही वाला है। ब्राह्मण वेश में हनुमान की बात सुनकर भरतजी उनसे परिचय बताने को कहते हैं। हनुमान अपना परिचय छिपा नहीं पाते और दोनों अनन्य रामभक्तों का मेल आह्लादित कर देता है। भरतलाल जी से यह सूचना समूची अयोध्याधाम तक जाती है। उमंग-उल्लास समूचे परिवेश में व्याप्त हो जाता है। राधेश्याम कथावाचक लिखते हैं-

पाते  ही  यह   सूचना  आते हैं- ‘श्रीराम’ ।

अवधपुरी बननेलगी एक अलौकिक धाम ।।

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राम-दरस  की  प्रजा  में  ऐसी  उठी उमङ्ग ।

छोड़ छोड़ गृह कार्य सब-चले भरत के सङ्ग ।।

अयोध्या नगरी में पुष्पक विमान उतरता है। श्रीराम समग्र रामादल के साथ उतरते हैं, अपनी मातृभूमि को प्रणाम करते हैं। अयोध्या नगरी का अपार जनसमुदाय अपने राम की अगवानी करने के लिए खड़ा है। भरतलाल भी उपस्थित हैं। भरतलाल की दशा का बड़ा मार्मिक वर्णन राधेश्याम कथावाचक करते हैं-

शत-शत कण्ठों से उसी समय रघुपति की जय-जयकार हुई ।

फिर  धीरे-धीरे-    ‘मेरे प्रभु’   -यह  मीठी-सी    झङ्कार  हुई ।।

उस अवध-तपस्वी की गति पर-उपमा सकुचाकर आती है ।

मानों  सागर  से  मिलने  को   गङ्गा  की   धारा   जाती  है ।।

जब  चित्रकूट  में  था मिलाप  तब   विजयी  थे  श्रीरघुराई ।

पर  यहाँ चरण  छूकर पहले-जय भरतलालजी ने पाई ।।

दोनों  के  रूप  साँवले थे, दोनों  के तन पर गाती थीं ।

चौदह वर्षों के यतियों की-एड़ी तक जटा सुहाती थीं ।।

जब  मिले  परस्पर  दोनों  ही  दोनों को दर्शक भूल गए ।

श्रीराम कौन? श्रीभरत कौन? यह चतुरानन तक भूल गए ।।

इस भ्रात-मिलन ने रंग बदला, जब अपने आप अयोध्या का ।

शारदा पुकार उठी तब- ‘यह है भरत-मिलाप अयोध्या का’ ।।

भरत-मिलाप के दो प्रसंग हैं। पहला भरत-मिलाप चित्रकूट में होता है, और दूसरा अयोध्या में...। श्रीराम अयोध्या आगमन के बाद सभी से मिलते हैं। माताओं से मिलते हैं, शत्रुघ्न से मिलते हैं, नगरवासियों से मिलते हैं, लेकिन भरत से मिलना अलग ही भाव रखता है। चित्रकूट में हुए भरत-मिलाप की पूर्णता अयोध्या के भरत-मिलाप से होती है। लोक के लिए यह प्रसंग अन्यतम है, विशिष्ट है। वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला में यह प्रसंग खेला जाता है, और वह भी एक विशिष्ट रंग से...ढंग से...।

वाराणसी की नाटी इमली की रामलीला में भरत जिद पर अड़े हुए हैं। भरतजी चित्रकूट में भी जिद पर अड़े थे, किंतु विजय राम की हुई थी। यहाँ भरतजी की जिद पूरी होती है। भरत कहते हैं, कि यदि सूर्य के अस्त होने के पहले श्रीराम मुझसे मिलने नहीं आए, मेरे पास नहीं आए, तो मैं प्राण त्याग दूँगा। श्रीराम को भरतजी की इस जिद का पता है, किंतु सभी से मिलते-मिलते बहुत देर हो जाती है। सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो जाते हैं। मात्र कुछ क्षण ही सूर्यास्त में शेष रहते हैं, तभी श्रीराम को भरतजी की सुध आती है। वे दौड़ पड़ते हैं। भरतलाल श्रीराम को दौड़कर आते देखते हैं, तो वे भी दौड़ पड़ते हैं। जिस स्थान पर अस्त होते सूर्य की अंतिम रश्मियाँ गिर रही होती हैं, उसी स्थान पर भरत और राम आलिंगनबद्ध हो जाते हैं। उपस्थित जनसमुदाय श्रीराम और भरतलाल की जय-जयकार करता है। वाराणसी की नाटी इमली की इस रामलीला को देखने वाराणसी के महाराज पधारते हैं।

यह प्रसंग लोक की धरोहर है, जिसके निहित अर्थ लोक को जीवनीय शक्ति देते हैं। भाइयों के प्रेम की अद्भुत अनूठी गाथा से लोक को यह प्रसंग जोड़ता है। अध्यात्म का पक्ष भी इसमें निहित है। आत्मा भरतलाल के सदृश जब निर्लिप्त होकर, पूर्ण समर्पण भाव से परमात्मा से मिलने के लिए आतुर हो जाती है, तब परमात्मा स्वयं अंगीकार करते हैं। वह क्षण अनेक आशाओं के अस्त हो जाने का होता है, किंतु मन की सकारात्मक शक्ति के साथ जीवंत अंतिम रश्मि निराश नहीं होने देती, हताश नहीं होने देती।

अयोध्या नगरी में श्रीराम का आगमन मात्र भौतिक घटना नहीं रह जाती, एक युग की-एक काल की घटना-मात्र नहीं रह जाती। यह काल की परिधि को पार करती है। यह भौतिक-सांसारिक पक्ष से ऊपर उठकर आध्यात्मिक धरातल पर देखी जाती है, अनुभव की जाती है। इसी कारण विभिन्न रामकथाकारों ने, अनेक भक्त कवियों ने श्रीराम के अयोध्या आगमन का वर्णन किया है। अयोध्या में श्रीराम के आगमन का प्रसंग विभिन्न रामकथाओं में बड़ा स्थान रखता है। यदि इस प्रसंग की गहराई में उतरकर देखें, इस प्रसंग के अंतर्निहित तत्त्वों का विवेचन करें तो यह स्पष्ट होता है कि जब-जब श्री राम अहंकार रूपी रावण को मार करके, शरीर रूपी लंका में लगी हुई व्याधियों का शमन करके, स्वार्थ रूपी मेघनाथ को मारकर विजयश्री प्राप्त करके आते हैं, तब मन-मंदिर रुपी अयोध्या प्रसन्न हो जाती है, उल्लास से भर जाती है।

विभिन्न भक्तकवियों ने, रामकथा के गायको ने इस प्रसंग को गाया है। आज के संदर्भ में भी यह प्रसंग अपने महत्त्व को रेखांकित करता है, बताता है। आज देश-विदेश में श्रीराम के अयोध्या आगमन की चर्चा है। आज के समय में भी श्री राम के आगमन का जो प्रसंग है, वह इन्हीं अर्थों में जाकर जुड़ जाता है और आज की पीढ़ी को, हम सबको यह संदेश देता है कि एक परिवार के, एक समाज के, एक राष्ट्र के सूत्र जो बिखर गए थे, वे किस तरह से एक साथ जुड़ जाते हैं। राम भरत से मिलते हैं और भरत व राम इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि कोई भी यह नहीं पहचान पाता कि कौन राम हैं, कौन भरत हैं..।

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’

श्रीराम सबसे मिलते हैं, लेकिन राम का मिलना सामने वाले की भावना के अनुरूप है। उस समय जब श्रीराम अयोध्या आए होंगे, तब भी यही सत्य था, और आज भी यही सच है। अयोध्या में श्रीराम का आगमन भले ही कुछ लोगों के लिए आलोचना का विषय हो, लेकिन कल्पना करें... आज भी श्रीराम सबसे वैसे ही मिल रहे हैं जैसी उनकी भावना है। हमारे लिए, वृहत्तर भारतीय समाज के लिए, जो भारतभूमि के प्रति अपनी गहन आस्था रखता है, उसके लिए श्रीराम का अयोध्या आगमन सारे परिवार के एक हो जाने के लिए है। विश्व-बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ और साकार करने के लिए है। श्रीराम का आगमन मन के कलुष-कल्मष को धो रहा है, निर्विकार कर रहा है, निर्लिप्त कर रहा है, प्रेम के निर्झर को अविरल बना रहा है। ऐसी कामना को लेकर, इस भावना को लेकर लोक आज एक बार फिर श्रीराम के अयोध्या आगमन का उत्सव मना रहा है। सुंदर अयोध्या सज रही है। मन-मंदिर प्रफुल्लित है, आह्लादित है।

(हिंदी प्रचार प्रसार सोसायटी, अमृतसर के मुखपत्र बरोह के जुलाई 24-मार्च 25 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र

अब जमाने को खबर कर दो कि ‘नीरज’ गा रहा है...

 


अब जमाने को खबर कर दो कि ‘नीरज’ गा रहा है...

शोषणों की हाट से लाशें हटाओ,
मरघटों को खेत की खुशबू सुँघाओ,
पतझरों में फूल के घुँघरू बजाओ,
हर कलम की नोक पर मैं देखता हूँ,
स्वर्ग का नक्शा उतरता आ रहा है।
अब जमाने को खबर कर दो कि 'नीरज' गा रहा है ।1

ये पंक्तियाँ पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ के बहुत चर्चित गीत की हैं। इन पंक्तियों को सप्रयोजन उद्धृत करते हुए बात को प्रारंभ किया है। पंक्तियाँ लेखनी में उस ऊर्जा के प्रवाह की बात कर रहीं हैं, जो अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार करती है। नीरज जी का यह गीत आह्वान-गीत भी है, जो अनेक गीतकारों का आह्वान करता है- गीत में वह सामर्थ्य उत्पन्न हो, कि वह जन-जन की वाणी बने। गीतकार केवल प्रेम तक सिमट न जाए, वह प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री न माल ले...। गीतकार के गीतों में यथार्थ उतरे, जीवन का संघर्ष और जीवनीय शक्ति उतरे, नीरज ऐसी कामना भी करते हैं।

एक सामान्य पाठक और नीरज के गीतों पर मुग्ध होने वाले सामान्य श्रोता तक संभवतः उपरोक्त वर्णित भाव संप्रेषित होगा। लेकिन एक स्थान पर इस गीत के साथ नीरज जी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन अलग ही किया गया है। उसे उद्धृत करने से विषयगत संदर्भ अधिक स्पष्ट हो सकेगा। रमेश रंजक अपनी पुस्तक- ‘नये गीत का उद्भव और विकास’ में लिखते हैं-

“नीरज की खुद्दारी लोकप्रियता के दंभ में से फूटती है-

खबर कर दो जमाने को नीरज गा रहा है।

यह पंक्ति उनकी लोकप्रियता का ही दंभ है जो ‘मैं ही चुप हो गया अगर तो युग का कीर्तन कौन करेगा’ तक अपनी लोकप्रियता की आड़ में सर्जक की खुद्दारी का भ्रम फैलाती चली जाती है, जबकि त्यागी (रामावतार त्यागी) की खुद्दारी एक सर्जक की खुद्दारी है, इसलिए वह पाठक और श्रोता दोनों को ही प्रिय है।”2

एक गीतकार की दूसरे गीतकार से तुलना करती हुई इस टिप्पणी से गीतकार नीरज जी के कृतित्व पर आलोचक की पूर्वाग्रही दृष्टि का आभास होता है। काव्य-गोष्ठियों, गीतों के समारोहों आदि में मधुर और सधे हुए कंठ से गीतों-कविताओं को प्रस्तुत करने वाले कवि और गीतकार श्रोताओं को अपने आकर्षण में बाँधने की सामर्थ्य रखते हैं। गीतकार नीरज के कंठ में वह मधुरता थी, जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक तेजी से पहुँचाया। मंचीय कविता का कवि साहित्य के स्थापित कवियों से अधिक ख्याति अर्जित कर रहा था। यह भी एक बड़ा कारक उपरोक्त टिप्पणी के पीछे दिखता है। संदर्भगत विषय पर उल्लेख करना उचित होगा, कि प्रसिद्धि के शीर्ष तक पहुँचने वाले कवि नीरज के लिए यह प्रसिद्धि भी अनेक आलोचनाओं, विरोधों, कटूक्तियों और चुनौतियों से भरी रही है। जाने-माने कवि व आलोचक शेरजंग गर्ग द्वारा संपादित पुस्तक है- हमारे लोकप्रिय गीतकार : गोपालदास नीरज। इस कृति की भूमिका में संपादक ने विस्तार के साथ नीरज जी के सृजन को विश्लेषित किया है। वे लिखते हैं-

“उनके फिल्मी गीत भी इस कदर सराहे गए कि ईर्ष्यालुओं की भीड़ लग गई। हुआ यों कि हिंदी गीतकारों में प्रदीप, नेपाली, नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, इंदीवर के साथ-साथ ‘नीरज’ भी एक स्टार गीतकार बन चुके थे।

परंतु यह भी एक सच्चाई है कि साहित्य की दुनिया में समीक्षकों, आलोचकों ने ‘नीरज’ को अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया। उन्हें मात्र कवि सम्मेलनी और नई काव्य चेतना से बेखबर बताया। उस समय के अधिकांश गीत कवियों को ‘गीतकार’ की संज्ञा देकर उपेक्षा भाव से खारिज कर दिया गया। ‘गीतकार’ शब्द के प्रयोग में निहित उपेक्षा की गंध छिपी नहीं रह सकी। इससे ‘नीरज’ के अहं को ठेस लगी और उन्होंने मात्र प्रयोगशील छंद विहीन, व्यक्तिवादी कविता को ही काव्य मानने वाले समीक्षकों के प्रति निम्नांकित आक्रोश व्यक्त किया है-

दोस्त ! तुम ठीक ही कहते हो / सचमुच मैं कवि नहीं हूँ ! / होते हैं कवि, वे नहीं गाते हैं / दुखी दलित जनता के पास नहीं जाते हैं, / जाते भी हैं, तो शरमाते हैं ।”3

नीरज जी गीतों के बड़े पक्षकार थे। उन्होंने गीतों को शृंगारिकता की पहचान से अलग करते हुए व्यापक सामाजिक व मानवीय सरोकारों के साथ जोड़ा। समीक्षकों व आलोचकों द्वारा गीतों की उपेक्षा पर नीरज जी की प्रतिक्रिया इस तथ्य को स्पष्ट करती है। कविता के प्रति उनकी दृष्टि स्पष्ट है। विशेष रूप से गद्य-कविता, जो आधुनिक प्रगतिशील साहित्य की परिचायक थी; साथ ही हिंदी काव्य-जगत में यत्नपूर्वक स्थापित किए जाने वाले पाश्चात्य प्रभावों का मुखर विरोध उनकी लेखनी में दिखता है।

“कविता के संबंध में ‘नीरज’ ने ‘दर्द दिया है’ की भूमिका में कहा है- जब लिखने के लिए लिखा जाता है तब जो कुछ लिखा जाता है उसका नाम है गद्य। पर जब लिखे बिना न रहा जाए और जो खुद लिख-लिख जाए उसका नाम है कविता। मेरे जीवन में कविता लिखी नहीं गई खुद ‘लिख-लिख’ गई है, ऐसे ही जैसे पहाड़ों पर निर्झर और फूलों पर ओस की कहानी। जिस प्रकार ‘जल-जलकर बुझ जाना’ दीपक की विवशता है। उसी प्रकार ‘गा-गाकर चुप हो जाना’ मेरे जीवन की मजबूरी है। गा-गाकर चुप हो जाने की इस मजबूरी के कारण ही नीरज ने जो भी लिखा है गाकर लिखा है, गाते हुए लिखा है।”4

गीतकार नीरज के कृतित्व के अनेक पक्ष हैं। उनकी पहचान एक गीतकार के रूप में है, और यह भी नितांत सत्य है, कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बनी है। उनकी दूसरी पहचान मंच के कवि की है। मंचीय कविता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में वे जाने जाते हैं। फिल्मी गीत और मंचीय कविताएँ-गीत आदि साहित्य द्वारा मान्य की गई कविता के दूसरे छोर में दिखती या रखी जाती रहीं हैं। आलोचकों व समीक्षकों के लिए फिल्मी गीतों और मंचीय कविताओं आदि को स्वीकार करना कठिन रहा है। इस कारण नीरज जी का कवि-रूप अधिक उभरकर सामने नहीं आ सका। लेकिन उनकी स्पष्ट दृष्टि हिंदी काव्य-जगत को समृद्ध करने वाली है। एक भावुक और सहृदय कवि ही कविता की इतनी स्पष्ट और सरल व्याख्या कर सकता है। कविता सहज ही ‘लिख-लिख’ जाती है, यह कथन आद्यकवि वाल्मीकि के ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगः ....’ का स्मरण करा देती है। क्रोंच के वध से आहत होकर वाल्मीकि के मुख से अनायास फूट पड़ने वाले ये शब्द ही तो पहली कविता बने थे।

पद्मश्री गोपालदास नीरज का जीवन अनेक संघर्षों की गाथा है। बचपन से ही उन्होंने अनेक कष्ट भोगे, उपेक्षाएँ-प्रताड़नाएँ सहन कीं, आर्थिक अभावों से दो-चार हुए और ऐसी जटिलताओं के बीच अपने जीवन-संघर्ष में कभी हार नहीं मानी। उनका जीवन-संघर्ष उनकी कविताओं में झलकता है। समय की त्रासद स्थितियों के साथ एकाकार उनके जीवन का संघर्ष उनका निजी नहीं रह जाता, प्रत्युत् उसमें वृहत्तर समाज का संघर्ष परिलक्षित होता है। नीरज की कविताएँ और उनके गीत इन्हीं संघर्षों से निकले हैं। इसी कारण वे डटकर कहते हैं-

“अँधियारा जिससे शरमाये / उजियारा जिसको ललचाये, / ऐसा दो दो दर्द मुझे तुम / मेरा गीत दिया बन जाये ! ।

उनकी लाठी बने लेखनी / जो डगमगा रहे राहों पर, / हृदय बने उनका सिंहासन / देश उठाये जो बाँहों पर ।

श्रम के चरण चूम आयी / वह धूल करे मस्तक पर टीका, / काव्य बने वह कर्म, कल्पना- / से जो पूर्व क्रिया बन जाये ! ।“5

कवि नीरज की कविताओं और गीतों में अभिव्यक्त पीड़ा और कष्टों के साथ ही विद्रोह का भाव व्यक्त होता है। वे अपने सृजन में समय के सत्य से स्वयं को एकाकार करते हुए दिखते हैं। उनके जीवन की भोगी हुई सच्चाई उनकी लेखनी को अधिक सामर्थ्यवान बनाती है। वे संपूर्ण मानवता के दुःख-दर्द के साथ ही सामयिक संदर्भों के प्रति भी जागरूक रहते हैं। कवि नीरज के कृतित्व के साथ ‘नीरज की पाती’ का अनूठा संयोग है। इसी नाम से प्रकाशित उनकी कृति भी है। इसमें नीरज की पंद्रह पातियाँ संकलित हैं। अलग-अलग संदर्भों में लिखी ये पातियाँ कवि नीरज के कृतित्व को समझने के साथ ही सजग, सक्रिय कवि के रूप में नीरज के सृजन से साक्षात्कार कराती हैं। देश-दुनिया में हो रही घटनाओं के साथ ही भारतीय समाज-जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को वे अपनी पातियों का विषय बनाते हैं। नीरज की पाती में एक पाती है- काश्मीर के नाम। वे काश्मीर की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हैं। राजनीतिक कारणों से काश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता पर लग गए ग्रहण पर वे कटाक्ष भी करते हैं, और साथ ही काश्मीर का आह्वान भी करते हैं, कि वह विभाजनकारी प्रवृत्तियों का प्रतिकार करने हेतु तत्पर हो। वे लिखते हैं-

“भँवरो की गुनगुन वाले ।

फूलों की रुनझुन वाले ।

पाटल रूप रतन वाले ।

ओ शरमीले काश्मीर उठ । दुश्मन को ललकार दे ।

झूम उठे खैबर-हिन्दूकुश, ऐसी नयी बहार दे !

सरहद पर बारूद लिये है आँधी खड़ी तलाश में,

घुला हुआ है जहर हवा में, धुँआ घिरा आकाश में,

लंदन से वाशिंगटन और कराची से लाहौर तक

तुझे मिटाने की हर कोशिश है मजहबी लिबास में

चढ़ती हुई उमर वाले ।
उठती हुई लहर वाले ।
उगती हुई सहर वाले ।“6

कवि नीरज जटिल और गूढ़ बातों को अत्यंत सहजता के साथ कह देने में सक्षम हैं। उपरोक्त पंक्तियों में काश्मीर-समस्या पर उनका संकेत अनेक लंबे-चौड़े वक्तव्यों से कहीं अधिक गहनता लिए हुए है। वे अत्यंत सहजता के साथ काश्मीर की समस्या को रेखांकित कर देते हैं। इसी क्रम में उनकी अगली पाती है- पाकिस्तान के नाम। इस पाती में वे पाकिस्तान को उसकी करतूतों के लिए चेताते हैं। वे धर्म के नाम पर उत्पन्न हुए विभेद को मानवता के लिए कलंक बताते हुए पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देते हैं। वे कहते हैं-

“है घृणा अंधी, न सहती रोशनी उसकी नजर है,

वह न यह भी जानती मस्जिद किधर-मन्दिर किधर है?

वह बढ़ी यदि तो दुबारा कारवाँ वीरान होगा

हम भले हों, किन्तु धरती पर नहीं इन्सान होगा ।“7

दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी नीति के नाम और पुर्तगाल के नाम पातियों में कवि नीरज ने तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय विषयों को उठाया है। इन पातियों में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ज्वलंत विषयों का संकलन नीरज जी की समसामयिक विषयों पर जागरूकता और एक समर्पित भारतीय की भावना का दर्शन होता है।

नीरज की पाती में कवि नीरज का दार्शनिक-आध्यात्मिक पक्ष भी स्पष्ट होता है। यह उनके व्यक्तित्व की अनूठी विशेषता है, जो प्रायः अचर्चित रही है। कवि नीरज का स्वभाव गहन चिंतन में डूबे अध्येता की भाँति रहा है। उनके चिंतन की दृष्टि आध्यात्मिक पुट लिए हुए है। इसके साथ ही उनकी अन्यतम विशिष्टता है- चिंतन-दृष्टि के साथ यथार्थ का तालमेल। वे जीवन की कठिनाइयों के मध्य स्वयं को रखकर विचार करते हैं, और चिंतन की अपनी दृष्टि से जीवन का सहज मार्ग तलाशने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि से उनकी पाती- ‘कल्पना के नाम’ विशेष उल्लेखनीय है। इसमें वे कल्पना और यथार्थ के दोनों विपरीत ध्रुवों की पड़ताल करते हुए कल्पना में जीने वाले लोगों को यथार्थ के धरातल पर उतरने का संकेत करते हैं। वे लिखते हैं-

“भूख ने चाटकर ठठरी कर दी कंचन काया,

भर दिया प्यास ने लावा सूखे प्राणों में ।

पर वो होगी साकार एक दिन इसलिए,

मैं खड़ा रहा इन जलते रेगिस्तानों में ।“8

इसी क्रम में वे आगे यथार्थ की बात करते हैं-

“मेरे यथार्थ आ ! तू कुरूप ही सही मगर,

तुझमें से ही जीवन की तो आहट आती है ।

तेरे तन पर रेशम न सही, टाट ही सही,

पर थकी साँस छाँह तो वहाँ पाती है ।”9

कवि का स्पष्ट संकेत उन लोगों के लिए है, जो यथार्थ से विमुख होकर कल्पना-जगत में गोते लगाते रहते हैं और अंत में अपने जीवन में हताश व निराश होकर कठिनाई में पड़ जाते हैं। नीरज जी की यह दृष्टि निःसंदेह उनके जीवन-संघर्षों और कठिन चुनौतियों से जुटाए गए अनुभवों के फलस्वरूप विकसित हुई है।

नीरज की एक पाती समकालीन गीतकारों के नाम भी है। यह पाती अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रसंगवश उल्लेख करना होगा, कि कवि नीरज की रचनाओं में अन्याय के साथ ही कुटिलतापूर्ण-पक्षपातपूर्ण-द्वेषजनित व्यवहार के विरुद्ध तीव्र प्रतिकार का स्वर मुखर होता है; लेकिन यह प्रतिकार, यह विद्रोह कहीं पर भी अपनी सीमा नहीं लाँघता है..... शालीन और संयत रहता है। यह कवि नीरज के व्यक्तित्व की भी अन्यतम विशिष्टता है। ‘समकालीन गीतकार के नाम’ में इसे देखा जा सकता है। वे लिखते हैं-

“है गीत सृष्टि का दर्पण, अर्पण आत्मा का

वह नहीं मरा है, नहीं कभी मर सकता है ।

यह गद्य-बुद्धि का वैभव दुर्ग गढ़े कितने

बिन राग न कोई रीता घट भर सकता है ।

हर श्वाँस एक बाँसुरी, देह हर वृन्दावन

हर प्राण कृष्ण, हर आयु एक ग्वालिनिया है

पर जिसकी लय पर थिरक रही है हर मटकी

वह और न कुछ, बस गीत बताती दुनिया है ।“10

समकालीन गीतकार के नाम इस लंबी पाती में नीरज जी ने गीतकारों को संबोधित करते हुए अपनी बात कहते-कहते अपने समय के उन साहित्यकारों, समीक्षकों, आलोचकों की भी अच्छी खबर ली है, जो आत्ममुग्धता में स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, अन्य के प्रति उनके मन में अच्छे भाव व विचार नहीं रहते। गीतकारों के प्रति समीक्षकों-आलोचकों के विचार का उल्लेख इसी आलेख में पहले भी किया है, जो संदर्भगत विषय में भी ध्यातव्य है। इसी तरह गद्य-कविता का उल्लेख भी नीरज जी ने किया है। वे स्पष्ट करते हैं, कि गीतकार भले ही उपेक्षित हो जाएँ, लेकिन यह सत्य है, कि गीत का महत्त्व सदा-सर्वदा रहेगा। ‘गद्य-बुद्धि का वैभव’ भले ही अपने दुर्ग गढ़ ले, लेकिन रीता घट तो राग ही भर सकता है। गीत ही है, जिसकी लय पर हर कोई थिरकता है। इस तरह नीरज गीतों का महत्त्व स्थापित करते हैं, और गीतकारों को प्रेरणा देते हैं, कि वे आलोचनाओं से हताशा व निराशा हुए बिना गीतों का सृजन करते रहें, जीवन के उल्लास व उमंग को.... सकारात्मक बातों को गीतों में उतारते रहें।

नीरज जी के गीतों का विपुल संसार है। सामयिक-सामाजिक संदर्भों के साथ ही नीति-नैतिकता-मानवता से जुड़े उनके अनेक फिल्मी गीत लोकप्रिय हुए हैं। इन गीतों पर फिल्मी गीत होने का ठप्पा लगा होने के कारण ये साहित्यिक दृष्टि से विश्लेषित-विवेचित नहीं हुए। इनमें से एक गीत का प्रसंग प्रायः चर्चा में आता है। इसका उल्लेख राजीव कुमार श्रीवास्तव अपने संस्मरण में करते हैं। वे लिखते हैं- “मनोज कुमार अभिनीत फिल्म ‘पहचान’ (1970) में शंकर-जयकिशन के संगीत में जिस एक गीत ने संगीत प्रेमियों के अधर पर अपना डेरा लगाया था वो मुकेश के स्वर में एक कालजयी रचना बनकर आज भी मानवता का पाठ पढ़ा रही है- ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ’... इस पंक्ति के लिए नीरज स्वयं अंतिम समय तक कहा करते थे कि यह मेरे जीवन का सूत्र वाक्य है।”11

कवि नीरज ने हिंदी सिनेमा के गीतों को नई दिशा देने का काम किया है। हिंदी सिनेमा के गीतकारों की कड़ी में नीरज अलग ही पहचान बनाते हैं। गीतों के विशाल भंडार में कुछ ऐसे गीत भी हैं, जिनके साथ हिंदी सिनेमा के गौरवपूर्ण अतीत का अध्याय जुड़ा है। राजकपूर की बहुचर्चित फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गाना- ‘ए भाई ! जरा देख के चलो.. आगे ही नहीं पीछे भी.. ऊपर ही नहीं नीचे भी....’ नीरज ने लिखा था, और यह अपनी तरह का अनूठा गाना है, जिसमें गीत के मुखड़े, लय, ताल आदि एकदम अलग हैं। गाने को संगीत भी नीरज जी ने ही दिया था। गाने की विशेषता यह है, कि यह जोकर के चरित्र पर सटीक बैठता है, और इस संसार की रीति-नीति को देखते हुए सँभलकर चलने की सीख अनूठे तरीके से देता है।

ऐसा ही दूसरा प्रसंग देवानंद की फिल्म ‘गैम्बलर’ के गीत- ‘चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है, देखो देखो टूटे ना...’ को लेकर है। इसी गीत में आगे नीरज जी ने लिखा है- ‘मेरा प्यार है चूड़ी जैसा जिसका ओर न छोर, यहाँ नहीं वहाँ नहीं देखो कभी टूटे नहीं... जीवन की ये डोर...’। नीरज ने निःछल-निःस्वार्थ प्रेम की चिरंतनता को अत्यंत सहज भाव से कह दिया है। प्रेम की एकदम अनूठी और अलग परिभाषा ही यहाँ देखी जा सकती है।

ऐसे अनेक प्रसंग कवि नीरज के साथ जुड़े हुए हैं। उनकी कविताएँ, उनके गीत भावों और विचारों की गहराई लिए हुए हैं। हिंदी सिनेमा के लिए उन्होंने ऐसे गीत रचे हैं, जिनसे हिंदी सिनेमा समृद्ध हुआ है। इसके साथ ही हिंदी के काव्य-मंचों को उन्होंने अपने गीतों से एक नया आयाम दिया है। कवि नीरज को सुनने के लिए लोग घंटों प्रतीक्षा करने और लंबी यात्राएँ करने के लिए तत्पर रहते थे। इसके साथ ही हिंदी के काव्य-संसार को अपनी ‘गीतिकाओं’ के माध्यम से नई विधा देने वाले कवि नीरज का साहित्यिक अवदान भी कम नहीं है। भारत और भारतीयता की पहचान को अपने गीतों के माध्यम से, हिंदी की सेवा के माध्यम से विश्वमंच पर स्थापित करने वाले कवि नीरज जीवन-पर्यंत सिद्धांतों पर अडिग रहे, मानवता की सेवा के लिए समर्पित रहे, और आवश्यकता पड़ने पर हर समय मोर्चे पर अड़े भी रहे। कवि नीरज की निम्न पंक्तियाँ उनको ही समर्पित हैं-

इस सभा की साजिशों से तंग आकर, चोट खाकर

गीत गाए ही बिना जो हैं गए वापिस मुसाफिर

और वे जो हाथ में मिजराब पहले मुशकिलों की

 दे रहे हैं जिंदगी के साज को सबसे नया स्वर

मौर तुम लाओ न लाओ

नेग तुम पाओ न पाओ

हम उन्हें इस दौर का दूल्हा बनाकर ही उठेंगे

विश्व चाहे या ना चाहे, लोग समझें या ना समझें

आ गये हैं हम यहाँ तो गीत गाकर ही उठेंगे ।


संदर्भ-

1.     वेब रेफरेंस, कविता कोश, नीरज गा रहा है, गोपालदास नीरज,

2.     रंजक, रमेश, नवगीत में छायावादी अवशेष, नये गीत का उद्भव और विकास, पुस्तकायन, नयी दिल्ली, सं. 2002, पृ. 59-60,

3.     हमारे लोकप्रिय गीतकार : गोपालदास नीरज, गोपालदास ‘नीरज’ : प्रेमगीतों का मसीहा, संपादक शेरजंग गर्ग, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, सं. 2004, पृ. 02-03,

4.     वही, पृ. 03,

5.     नीरज, गोपालदास, मेरा गीत दिया बन जाये, नीरज रचनावली खंड- 2,आत्माराम एंड संस, दिल्ली, सं. 2010, पृ. 16,

6.     नीरज, गोपालदास, काश्मीर के नाम, नीरज की पाती, आत्माराम एंड संस, दिल्ली, सं. 1990, पृ. 36,

7.     वही, पाकिस्तान के नाम, पृ. 44,

8.     वही, कल्पना के नाम, पृ. 51,

9.     वही, पृ. 54,

10.  वही, समकालीन गीतकार के नाम, पृ. 62,

11.  श्रीवास्तव, राजीव, ...कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे, आजकल, वर्ष- 80, अंक- 9, जनवरी 2025, पृ. 15 ।

 

(त्रैमासिक पत्रिका समीचीन, मुंबई के अक्टूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

- राहुल मिश्र