Saturday, 22 August 2026

किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति

 


किन्नर, किन्नर-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक की कृति


समाज की ओर दृष्टि रखकर साहित्य की सर्जना होती है। अतीत से लगाकर वर्तमान तक साहित्य की इस विशिष्टता को देखा जा सकता है। हिंदी के आधुनिक कालखंड में समाज और साहित्य के अंतर्संबंध और अधिक घने हो जाते हैं, क्योंकि इस कालखंड में साहित्य अपेक्षाकृत अधिक दायित्वपूर्ण बनकर समाज के सच्चे चित्र को, समाज की वास्तविकताओं को उकेरने लगता है। सामयिक सत्य और यथार्थ के चित्रण में गद्य की अनिवार्य आवश्यकता जहाँ एक ओर कविता को गद्यात्मक बनाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में अपना स्थान बनाने वाला हिंदी कथा-साहित्य समाज के निकट पहुँचता जाता है।

डॉ. विनय कुमार पाठक की नीरज बुक सेंटर, नई दिल्ली से सद्यः प्रकाशित कृति- ‘किन्नर-विमर्श : दशा और दिशा’, वैसे तो किन्नर-विमर्श पर केंद्रित है, लेकिन विषय की स्थापना के आधार को निर्मित करते हुए डॉ. पाठक द्वारा दी गईं उपरिवर्णित स्थापनाएँ हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में किन्नर-विमर्श के विविध पक्षों को प्रस्तुत करने का सहज वातावरण निर्मित करती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है, कि ‘विमर्श’ का आधार औपनिवेशिक और पाश्चात्य प्रभावों से बना है। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श में मध्यकाल और उसके बाद औपनिवेशिक भारत, और वर्षों की गुलामी के कारण उपजी मानसिक विक्षिप्तता, विकृति और विद्रूपता की छाया दिखाई देती है। साहित्य में इसी कारण इनकी उपस्थिति अनेक तरीके से भले ही समय और समाज की यथार्थ स्थिति को दिखाती हों, एक विशिष्ट वर्ग बनाकर चर्चा या विमर्श का केंद्रीकरण करती हों, लेकिन इसके साथ आलोचनाएँ भी होती रही हैं, आज भी होती हैं। ‘विमर्शों’ का वास्तविक स्वरूप कैसा हो, सकारात्मक और समाज के लिए दिशा-निर्देशक पक्ष इनमें कैसे उद्घाटित हो, यथार्थ के चित्रण में अतिवाद और अतिकल्पनाशीलता के पक्षों को किस तरीके से नियंत्रित किया जाए, जैसे बिंदु साहित्य-चर्चा के विविध खेमों में उठते रहे हैं। इन्हें आज भी देखा जा रहा है।

स्थापित विमर्शों के अगले क्रम में, इक्कीसवीं सदी के साहित्य में नवोदित विमर्शों के लिए ये बिंदु महत्त्वपूर्ण भी हैं, और इन बिंदुओं पर नवागत-नवोदित विमर्शों की दिशा-दशा के निर्धारण की अपेक्षाएँ भी रही हैं। नवागत-नवोदित विमर्शों में अनेक स्थानों पर अल्पसंख्यक-विमर्श, कृषक-विमर्श, प्रवासी-विमर्श जैसे नाम सुने जाते हैं। कहीं-कहीं पर ये विमर्श चर्चा में आने के लिए भी उठाए जाते रहे हैं। दूसरी तरफ, विकलांग-विमर्श और किन्नर-विमर्श भी इक्कीसवीं सदी में चर्चित हुए। विकलांगों और किन्नरों की समाज में स्थिति को देखते हुए इनकी साहित्य में चर्चा अपेक्षित ही नहीं थी, अपितु साहित्य के माध्यम से इन दोनों वर्गों के लिए सोचा जाना, साहित्य के माध्यम से देखा जाना आवश्यक-अनिवार्य-अपेक्षित था। साहित्य ने इस दिशा में अपना दायित्व निभाया। इन दोनों विमर्शों के संदर्भ में बहुत गंभीर बात डॉ. पाठक ने अपनी कृति की भूमिका में लिखी है। वे लिखते हैं, कि- “जाति और लिंग से रहित विशुद्ध मानवतावादी दृष्टि पर आधारित ये दोनों नव्य विमर्श सर्वाधिक वंचित और उपेक्षित या कहें, वर्जित ही रहे हैं।” (भूमिका, पृ. 05)

डॉ. विनय कुमार पाठक का विकलांग-विमर्श के क्षेत्र में व्यापक साहित्यिक अवदान है। इतना ही नहीं, उनके द्वारा विकलांगों के कल्याणार्थ समाज-कार्यों को भी दिशा दी जा रही है। डॉ. पाठक ने इक्कीसवीं सदी के ज्वलंत और सामयिक विमर्श, अर्थात् किन्नर-विमर्श पर अपनी लेखनी चलाई है। इसके पीछे के कारण को भी वे अपनी कृति की भूमिका में स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं, कि- “स्त्री, दलित, आदिवासी और विकलांग समाज में रहते हुए अराजक व्यवस्था पर आक्रोश व अभिमत स्पष्ट करते रहे लेकिन किन्नर के लिये तो यह पीठिका ही नहीं थी, अर्थात् वे हाशिये में डाल दिये गये। जब तक ये बंद समाज में कुंद बने बैठे रहेंगे, तब तक इनके पूर्वाग्रहों, दुराग्रहों, अफवाहों से निजात नहीं मिलेगी और इन्हें पूर्णतः जाने-समझे बिना इन पर विमर्श की दिशा ही उलझकर रह जायेगी। लैंगिक विकलांगता विकृति है, पहचान नहीं, इस तथ्य को समझकर ही किन्नर उत्कर्ष को स्पर्श कर सकता है और विमर्श भी सफल-सार्थक सिद्ध हो सकता है।” (भूमिका, पृ. 06)

अपनी कृति की भूमिका के अंश के रूप में डॉ. पाठक का यह कथन किन्नर-विमर्श की उस अनिवार्यता और प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, जिस ओर ध्यान दिये बिना किन्नरों पर बात नहीं हो सकती। डॉ. पाठक बड़ी सहजता के साथ यहाँ स्पष्ट करते हैं, कि अभी तक जितने भी विमर्श चर्चित हुए हैं, भले ही उनकी चर्चा का घनत्व कम या ज्यादा हो, लेकिन उनमें एक समानता रही है, कि वे ऐसे समूहों, वर्गों, समुदायों से संबंधित हैं, जो समाज में हैं, समाज का हिस्सा हैं। इसमें शारीरिक विकलांग भी आ जाते हैं। लेकिन किन्नर समुदाय ऐसा है, जो समाज से एकदम कटा हुआ है। समाज में उनका आगमन यदि होता भी है, तो एक रहस्यमयी जीवधारी के रूप में...। इसी कारण समाज उनके प्रति सहज नहीं रहता। अकसर उन्हें ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, कि वे विवश हो जाते हैं... अपने लोक में, अपने सीमित दायरे में सिमटने के लिए। इस दृष्टि से देखने पर किन्नर-समुदाय मानवीय दायरे में समाहित हो ही नहीं सका। अन्य विमर्शों के केंद्र में रहने वाले लोग अपने लिए लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, लेकिन किन्नर-समुदाय अपनी आवाज ही नहीं उठा सका, कारण उसका समाज से एकदम कटा हुआ होना है। यह भी एक पक्ष है, जिस कारण साहित्य की विविध विधाओं में भी किन्नर समुदाय रहस्यमय ही बना रहा है। डॉ. पाठक इसी कारण किन्नर-विमर्श को मानवीय धरातल पर चर्चा के लिए लाने की बात कहते हैं। वे आक्रोश, आंदोलन, असहमति, विद्रोह जैसी स्थितियों के लिए किन्नर-समाज को तैयार नहीं देखते। वे तो किन्नर-विमर्श को किन्नरों के जीवन को देखने की एक पीठिका के रूप में स्थापित करते हुए चलते हैं।

इस पीठिका के आधार को तैयार करने का यत्न डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में दिखता है, इस कारण इस कृति की भूमिका की अपनी विशिष्टता है, महत्त्व है। किन्नर के रूप में जन्म लेने वाले नवजात के परिवार से लगाकर समाज तक, और फिर किन्नर समुदाय के जीवन के विविध पक्षों तक डॉ. पाठक बड़ी पैनी दृष्टि दौड़ाते हैं, और बिंदुवार स्पष्ट भी करते हैं। इस कृति की भूमिका में ही सरकार के द्वारा किये गए विभिन्न प्रयासों का उल्लेख मिलता है, विभिन्न आँकड़े मिलते हैं। ये सभी अपना अलग महत्त्व रखते हैं।  भूमिका में ही डॉ. पाठक इक्कीस ऐसे बिंदुओं का उल्लेख करते हैं, जो सामान्य रूप से किन्नर-आधारित साहित्य में किन्नरों को लेकर दिखाई पड़ते हैं। ये इक्कीस बिंदु केवल हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की पड़ताल करके ही नहीं लिखे गए हैं, वरन् मराठी, तमिल और अन्य भाषाओं के साथ ही छत्तीसगढ़ी आदि के साहित्य से भी छनकर आए हैं। इस कारण इन इक्कीस बिंदुओं में किन्नर-आधारित साहित्य का निचोड़ परिलक्षित हो जाता है।

किन्रर-विमर्श की चर्चा करने से पहले डॉ. विनय कुमार पाठक ने उन स्थितियों को परखने का यत्न भी किया है, जो विमर्श का नाम लिए बिना किन्नरों की उपस्थिति को साहित्य में रेखांकित करती हैं। इस दृष्टि से उनके द्वारा प्रसाद के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ का उल्लेख अत्यंत प्रासंगिक बन पड़ा है। इसके साथ ही वे अत्यंत क्रांतिकारी लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, इस्मत चुगताई और यशपाल की उन कृतियों का उल्लेख भी करते हैं, जिनमें किन्नरों के जीवन की झलक मिलती है। ये रचनाएँ आभास देती हैं, समाज के प्रति साहित्य की दायित्ववान दृष्टि का, जो बिना किसी विमर्श का नाम लिए हुए किन्नरों के जीवन की यथार्थ स्थिति को देखती है। इस कारण डॉ. पाठक की कृति की भूमिका में इन रचनाओं का उल्लेख अपनी प्रासंगिकता को सुनिश्चित कर देता है। डॉ. पाठक ने इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ के लगभग दर्जन भर कवियों-कथाकारों का नामोल्लेख भी किया है।

 डॉ. विनय कुमार पाठक अपनी कृति की भूमिका में एक प्रसंग का वर्णन करते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से वे एक ऐसी दिशा-निर्देशक बात कहते हैं, जिसका संबंध किन्नर-विमर्श से भले हो, लेकिन वह अन्य विमर्शों के लिए भी संकेत के रूप में है। इस प्रसंग का उल्लेख भी यहाँ पर उल्लेख किया जाना आवश्यक लगता है। डॉ. पाठक लिखते हैं, कि किन्नर विमर्श विषयक इस ग्रंथ को प्रकाशन के लिए भेजने के समय एक सज्जन ने प्रश्न उठाया, कि ऐसे विमर्शों से किन्नरों का भला होगा? वस्तुतः, ऐसे प्रश्न अनपेक्षित नहीं होते, सहज ही होते हैं। इनके उत्तर भी सहज भाव की अपेक्षा रखते हैं। ऐसा करते हुए डॉ. पाठक जिस उत्तर को लिखते हैं, वह स्वयं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं- “विकलांग-विमर्श में मैंने इसका सकारात्मक परिवर्तन देखा और किन्नर-विमर्श के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ और सूत्र-रूप में संस्थित होकर मैंने कहा कि किन्नर का जीवन यदि स्याह अँधेरे में आच्छन्न है तो विमर्श उसमें सपने जगाने का काम तो कर ही सकता है, संघर्ष के कँटीले-पथरीले पथ में आहत होने पर उसे कराहने के लिए तो प्रेरित कर ही सकता है, भले कोई उपचार के लिए उपस्थित न हो लेकिन समाज और सरकार के प्रति संवेदना का भाव तो संचरित कर ही सकता है।” (भूमिका, पृ. 17-18)

डॉ. पाठक का उपरोक्त कथन किन्नर-विमर्श के संदर्भ में ऐसे भावनात्मक और दिशा-निर्देशक तत्त्वों को समेटे हुए है, जो किन्नर-विमर्श के नाम पर मानवीय, संवेदनापूर्ण और पुण्य-पवित्र ध्येय पर आधृत संघर्ष को उसकी दिशा से भटकने से रोकने और साहित्य के साथ ही समाज के सकारात्मक परिणामों को निकालकर लाने के लिए संकेत करते हैं। इन तमाम कारणों से इस कृति की भूमिका का अपना विशेष महत्त्व है।

आज के समय में किन्नर समुदाय के जीवन और उनकी दशा पर अनेक कार्य हो रहे हैं। इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। धरातल पर ये प्रयास सार्थक रूप में परिलक्षित भी हो रहे हैं। इस प्रयासों के साथ ही साहित्य भी अपनी भूमिका निभा रहा है, फलस्वरूप किन्नर विमर्श आजकर चर्चा में है। यह ऐसा अध्ययन-क्षेत्र है, जिसको व्यवस्थित रूप देना और इसको सार्थक-सर्वाङ्गपूर्ण रूप में अध्येताओं के लिए उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. पाठक ने इस आवश्यकता को न केवल समझा, वरन् अपनी कृति- ‘किन्नर विमर्श : दशा और दिशा’ के माध्यम से पूरा करने का सफल प्रयास भी किया है।

इस कृति में डॉ. पाठक ने आत्मकथा और नाटक जैसी अल्प-चर्चित विधाओं में भी किन्नरों के जीवन के विविध पक्षों-प्रसंगों को; किन्नर-विमर्श से संबद्ध विविध आयामों देखा-परखा है, समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इतना ही नहीं, यह कृति सिनेमा में भी किन्नरों के जीवन को देखती है। उपन्यास, कहानी और कविता ऐसी विधाएँ हैं, जिनमें विमर्शों का सर्वाधिक प्रभाव और प्रस्तुति दिखती है। सामान्यतः विमर्शों की चर्चाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती भी हैं।

हिंदी कथा-साहित्य में किन्नरों के जीवन की उपस्थिति और पड़ताल का व्यापक अध्ययन डॉ. पाठक की इस कृति में दिखता है। विशेष रूप से हिंदी कहानियों के विविध पक्षों को उन्होंने देखा है, प्रस्तुत किया है। हिंदी कहानियों में समय के सत्य और यथार्थ का सर्वांगपूर्ण चित्रण आज की हिंदी कहानी को जहाँ एक ओर हिंदी की विविध विधाओं के बीच उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर समय और समाज से जुड़े विविध विषयों का चित्रण हिंदी कहानी की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता को स्थापित करता है। हिंदी कहानी में विविध विमर्शों सहित किन्नर-विमर्श की उपस्थिति भी इसका ही एक पक्ष है।

हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी कहानी में यदि विविध विमर्शों की चर्चा करें, तो स्पष्ट होता है, कि समय और समाज की सच्चाइयों के निरंतर निकट जाने का यत्न ही विविध विमर्शों की उत्पत्ति और विस्तार-विकास का आधार बना है। समकालीन समाज में महिलाओं की दयनीय दशा को रेखांकित करने-उभारने के लिए यदि स्त्री-विमर्श अस्तित्व में आया, तो दलितों की बात करने हेतु दलित-विमर्श की शुरुआत हुई। बाद में आदिवासियों के जीवन और उनके संघर्षों को लेकर आदिवासी-जनजातीय विमर्श की बात भी होने लगी। विमर्शों के माध्यम से वर्ग-विशेष की समस्याओं, स्थितियों और जीवन की जटिलताओं को एक विशिष्ट दायरे में समेटकर पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है। इन विमर्शों पर जितना कथा-साहित्य रचा गया है, उतनी ही रचे गए साहित्य पर चर्चा और समीक्षा-आलोचना हुई है।

आज की हिंदी कहानियों में ‘किन्नरों’ की दशा और दिशा के साथ ही किन्नर-विमर्श के प्रभाव-प्रसार की समीक्षा करने हेतु डॉ. पाठक ने अलग-अलग कलेवर वाली दो दर्जन से अधिक कहानियों का चयन किया है। ये कहानियाँ कथ्य, चरित्र, परिवेश की विविधता और वैचित्र्य के स्तर पर इस प्रकार की हैं, जिन्हें ‘किन्नर-विमर्श’ की प्रतिनिधि कहानियों के तौर पर रखा-देखा जा सकता है।

कृति में ली गई कहानियों में से कुछ के कथ्य को बानगी के रूप में यहाँ पर देखा जा सकता है। इसमें किरन सिंह की कहानी ‘संध्या’ की नायिका संध्या की लैंगिक विकलांगता का दंश झेलते माता-पिता हैं, तो दूसरी ओर शिवप्रसाद सिंह की कहानी के ‘बिंदा महाराज’ का नायक है। ये सभी अपनी विवशता को उस क्रूर समाज में भोगते हैं, जिसमें संवेदनहीनता है, अवसरवादिता है और क्रूर-तीक्ष्ण व्यंग्य हैं। अंजना वर्मा की कहानी ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ की सुंदरी की लैंगिक विकलांगता ही उसे अपने परिवार से दूर कर देती है। यह दूरी आपसी प्रेम को भले ही समाप्त न कर पाए, लेकिन समाज से छिपकर मिलने की विवशता में जरूर बाँध देती है। ऐसी स्थितियाँ समाज में हमें देखने को मिलती हैं। समाज इन लोगों के लिए सहानुभूति नहीं रखता।

ललित शर्मा की कहानी ‘रतियावन की चेली’, डॉ. लवलेश दत्त की कहानी ‘नेग’ और पद्मा शर्मा की कहानी ‘इज्जत के रहबर’ में किन्नर समाज में झाँकने का प्रयास हुआ है। महेंद्र भीष्म की कहानी ‘त्रासदी’ एकदम अलग तासीर की कहना है। यह दयनीय और दीन-हीन किन्नर समाज का दूसरा पहलू दिखाती है। किन्नर सुंदरी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए रति को बलात्कारियों से बचाती है। डॉ. पाठक इस कहानी पर टिप्पणी लिखते हैं, कि- जिस किन्नर को समाज अधूरा समझकर तिरस्कृत करता है, वही किन्नर आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण मानव की मदद को आ खड़ा होता है। यह बात अलग है, कि किन्नर की नेकनीयती के बदले में उसे किन्नरेतर समाज से उपेक्षा और अपमान ही मिलता है। विजेंद्र प्रताप सिंह की कहानी ‘संकल्प’ का मधुर अपनी लैंगिक-विकलांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनाता, वरन् अपने घर-परिवार की प्रगति के लिए निरंतर संलग्न रहता है। समाज की रक्षा करने वाला पुलिसकर्मी उसके साथ बलात्कार करता है, और यहाँ से मधुर के जीवन की दिशा बदल जाती है। वह अपने लिए एक लाख रुपये इकट्ठे करके अपना लिंग परिवर्तन कराकर माधुरी बन जाती है। मधुर के द्वारा कराया गया लिंग-परिवर्तन केवल उसके लिए ही नहीं, वरन् अनेक लोगों के लिए एक बड़े परिवर्तन की लहर लेकर आता है। कई लैंगिक-विकलांग लोग अपना आपरेशन कराने के लिए आगे आते हैं, तो दूसरी तरफ चिकित्सक भी इस काम में अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर संलग्न होते हैं।

राही मासूम रज़ा की कहानी ‘खलीक अहमद बुआ’ अपने शीर्षक में ही किन्नर का अर्थ द्योतित करती है। इस कहानी में यह बताने की कोशिश की गई है, कि खलीक अहमद बुआ नाम में जिस तरह एक पुरुष और एक स्त्री निहित है, उसी तरह कहानी के नायक में भी संवेदनशीलता, भावुकता और विश्वसनीयता समाहित है। पुरुष और स्त्री, दोनों के आदर्श गुण समाहित हैं। ऐसी ही एक कहानी सलाम बिन रजाक की है- ‘बीच के लोग’। इस कहानी में व्यंग्यात्मक लहजे में यह बताने की कोशिश की गई है, कि स्त्री-और पुरुष के बीच बँटे समाज में उन लोगों की कोई अहमियत नहीं होती, जो बीच के होते हैं, अर्थात् न स्त्री होते हैं, और ना ही पुरुष होते हैं। यह कहानी ‘किन्नर’ शब्द पर भी अपनी असहमति दर्ज कराती है।

कुसुम अंसल की कहानी ‘ई मुर्दन का गाँव’ में किन्नर समाज की दयनीय दशा को दिखाते हुए माता-पिता द्वारा अपने लैंगिक-विकलांग बच्चे को किन्नर समाज से बचाने का यत्न करते हुए दिखाया गया है। करतार सिंह दुग्गल की पंजाबी कहानी ‘हम जिनस’ में माता-पिता अपनी संतान कस्तूरी की लैंगिक-विकलांगता को समाज से छिपाकर अपने पास रखना चाहते हैं और हिजड़ा समुदाय उसे अपने साथ ले जाने पर अड़ा रहता है। विनोद मिश्र सुरमणि की कहानी ‘सुनो तुम मुझसे वादा करो’ भी कुछ इसी प्रकार की भावभूमि में रची गई है। कहानी उन वृहन्नलाओं की चिंता करती है, जिनसे समाज आशीष और सुख-समृद्धि की कामना तो करता है, लेकिन वृहन्नलाओं के जीवन की जटिलताओं की चिंता नहीं करता है।

डॉ. क्रांति कुमार सिन्हा की कहानी ‘नियति एक किन्नर की’ एकदम अलग तासीर की कहानी है, जो समाज की कड़वी सच्चाई को खुलकर सामने रखती है। कहानी के राजशेखर जी अपनी लैंगिक-विकलांग संतति से बहुत लगाव रखते हैं, लेकिन जब उन्हें समाज में बदनामी की चिंता होने लगती है, तो वे अपने कलेजे के टुकड़े को हिंजड़ा समुदाय को सौंपने में जरा-सी भी देर नहीं करते हैं। जवाहरलाल कौल ‘व्यग्र’ की कहानी ‘ज्योति सूना नयन’ एक उम्मीद जगाती है। इसमें शारीरिक विकलांग और लैंगिक-विकलांग एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। वस्तुतः विकलांगता दोनों ही हैं, लेकिन शारीरिक विकलांग कुछ हद तक अपने जीवन को सम्मानपूर्वक जी लेते हैं, जबकि लैंगिक-विकलांग के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। दोनों का एकसाथ मिलकर जीवन बिताना भविष्य की सुखद उम्मीद जताता है।

डॉ. पाठक ने यमदीप, मैं भी औरत हूँ, तीसरी ताली, किन्नर कथा, गुलाम मंडी, मैं पायल, पोस्ट बाक्स नं. 203 नाला सोपारा, जिंदगी 50-50, अस्तित्व, दरमियाना, आधा आदमी, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मैं क्यों नहीं और वाडामल्लि, आदि उपन्यासों को लेकर हिंदी उपन्यासों में किन्नरों के जीवन और उनके संघर्षों का विश्लेषण किया है। बात के विस्तार में जाने के स्थान पर यहाँ यह कहना अपेक्षित होगा, कि हिंदी कहानियों की तरह से ही उपन्यासों में किन्नरों के जीवन के अलग-अलग रंग दिखते हैं। उनके जीवन-संघर्ष के विविध पक्ष दिखते हैं। इसी तरह अधूरी देह, अस्तित्व और पहचान, शिखंडी, पंखुड़िया : अंतर्द्वंद्व आदि प्रतिनिधि कविताओं के माध्यम से किन्नर-जीवन के विविध पक्षों को देखा-परखा और विश्लेषित किया गया है।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा, और किन्नर-समुदाय से...। निश्चित रूप से यह दुर्लभ और कल्पनातीत संयोग कहा जाएगा। फिर भी किन्नर-विमर्श के संदर्भ में आत्मकथा विधा को डॉ. पाठक ने इस कृति में समेटा है। किन्नर-विमर्श के अंतर्गत- किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी... और मानोबी बंधोपाध्याय की आत्मकथा पुरुष तन में फँसा मेरा नारी-मन; इन दो आत्मकथाओं को लिया गया है। आत्मकथा विधा में इन दो कृतियों के अतिरिक्त संभवतः दूसरी कृतियाँ होंगी भी नहीं..। इसके बाद भी डॉ. पाठक ने इस विधा को इस कृति में समेटा है, कारण आत्मकथा विधा में किन्नरों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके, क्योंकि किन्नरों के द्वारा लिखा गया स्वाभाविक रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, दूसरे लोगों द्वारा लिखी गई बातों की अपेक्षा..। किन्नर समुदाय अपने जीवन-संघर्षों को लिपिबद्ध कर सकें, इसके लिए प्रेरित हों.., डॉ. विनय कुमार पाठक की यह दृष्टि निःसंदेह प्रभावित करती है।

डॉ. पाठक ने किन्नर-केंद्रित नाटकों में आग के सात फेरे और हरारत, इन दो नाटकों को लिया है। इसी तरह किन्नर-केंद्रित और मुख्य कथा के साथ जुड़े किन्नर-पात्रों के जीवन के चित्र खींचते सिनेमा और नाटकों का विश्लेषण इस कृति में किया गया है। यद्यपि इनकी संख्या कम है, लेकिन इन विधाओं में भी किन्नरों के जीवन को देखने का काम स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा के बड़े फलक से निकालकर डॉ. पाठक ने लगभग दर्जन भर उन फिल्मों का उल्लेख इस कृति में किया है, जो किन्नर-विमर्श के लिए, इस दिशा में सार्थक चर्चा के लिए महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं।

इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों के बीच सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक विमर्श के रूप में देखे जाने वाले किन्नर-विमर्श के संदर्भ में डॉ. विनय कुमार पाठक की यह कृति उन सभी विधाओं को समेटकर एक व्यापक विश्लेषण और समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिनकी न केवल साहित्य में, वरन् समाज में अत्यंत मजबूत स्थिति है। यह कृति एक संदेश भी देती है, कि ऐसी विधाएँ, जो साहित्य के साथ ही समाज को संदेश दे सकती हैं, उनमें आज तक भले ही कम काम हुआ हो, लेकिन संभावनाएँ असीमित-अपरिमित हैं। इस दृष्टि से भी डॉ. पाठक की इस कृति को किन्नर-विमर्श पर आधारित पहली समीक्षात्मक-आलोचनात्मक कृति कहा जा सकता है।

इस कृति का पहला अध्याय, जिसकी चर्चा हमने यत्नपूर्वक अंत में की है, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अध्याय को छोड़कर न तो इस कृति पर बात पूरी होती है, और न ही ‘किन्नर-विमर्श’ पर बात पूरी हो सकेगी। यह अध्याय है- ‘किन्नर : आशय और अवधारणा’। इस अध्याय में किन्नरों के स्वरूप-विवेचन के साथ ही ऐतिहासिक पीठिका, मूल निवास, मानवाधिकार और परंपरागत जीवन आदि विविध विषयों-बिंदुओं को समेटने का यत्न डॉ. पाठक ने किया है।

‘किन्नर-विमर्श’ अपने नाम के अनुरूप किन्नरों के जीवन और उनकी सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न विषयों पर केंद्रित है। लेकिन ‘किन्नर’ नाम को लेकर अकसर विवाद उठता रहा है। वस्तुतः ‘किन्नर’ एक ऐसी मानव-प्रजाति है; जो गीत-संगीत में रुचि रखती है, जो हिमालय के तराई क्षेत्रों में पाई जाती है। किन्नर पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बहुत ही कम होने के कारण ये ‘किं-नर?’ से ‘किन्नर’ बन गए। किन्नर-विमर्श में जिन ‘किन्नरों’ की बात की जाती है, उनसे ये अलग होते हैं, लेकिन नाम-साम्य के कारण विवाद की स्थितियाँ बनती हैं।

संभवतः इस स्थिति को जानते-समझते हुए डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी कृति के पहले अध्याय में एक विकल्प दिया है। वे ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए ‘लैंगिक विकलांग विमर्श’ नाम भी देते हैं। यह नाम कई अर्थों में प्रासंगिक लगता है, क्योंकि इस विमर्श में उन लोगों के जीवन को दर्शाया गया है, जो लैंगिक असामान्यता का जीवन जी रहे होते हैं। यद्यपि ‘किन्नर-विमर्श’ आज के समय में रूढ़ हो गया है, इस कारण ‘लैंगिक-विकलांग’ और ‘पार-यौनिक’ (ट्रांसजेंडर) के साथ ही ‘असामान्य यौन-विकृत’ और ‘यौन-मनोविकृत’ के स्थान पर ‘किन्नर-विमर्श’ ही व्यवहृत होता है। डॉ. पाठक ने भले ही दूसरे नाम सुझाए हों, और संदर्भित विषय में चर्चा के विविध पक्षों को निष्पक्षता के साथ स्थान दिया हो, किंतु वे पौराणिक प्रसंगों, भारतीय वाङ्मय के उदाहरणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ ‘किन्नर’ शब्द के व्यवहार को पुष्ट करते हैं, समर्थन देते हैं। ‘किन्नर-विमर्श’ की साहित्यिक स्थापना के लिए विस्तृत-व्यापक आधार तैयार करते हुए प्राचीन भारतीय वाङ्मय और लोकजीवन के साथ ही वे मध्यकालीन समाज में ‘किन्नरों’ की स्थिति का विशद-व्यापक विश्लेषण करते हैं। वे ‘थर्ड जेंडर’, ‘गे’, ‘लेस्बियन’, ‘लैंगिक-विकलांग’ आदि का उल्लेख करते हुए ‘किन्नर-विमर्श’ की वैचारिक भूमि का निर्माण करते हैं।

उल्लेखनीय है, कि हमारे संस्कारों और लोकजीवन के विभिन्न पक्षों के साथ किन्नरों का संबंध रहा है। भारतीय वाङ्मय और पौराणिक ग्रंथों में किन्नरों की सम्मानजनक स्थिति को दर्शाया गया है। लोग इनके प्रति आस्थावान रहते हैं। किन्नर अखाड़ों का अस्तित्व और विभिन्न रीति-रिवाजों में इनको दिया जाने वाला सम्मान हमारी परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है। लोकजीवन में ये स्थितियाँ आज भी दिखती हैं। मध्यकाल में यह समुदाय हरम के पहरेदार की भूमिका में सिमटकर रह गया। बाद के वर्षों में यह समुदाय अपने जीवन के लिए जटिल होती स्थितियों के साथ जीने को विवश होता गया। डॉ. पाठक ने अनेक उद्धरणों और लोकगीतों-लोकपरंपराओं आदि का उल्लेख करते हुए तमाम अनजानी बातों को समेटकर किन्नर-समुदाय के कालक्रमानुसार इतिहास को अनौपचारिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस कारण यह अध्याय महत्त्वपूर्ण है, और किन्नर-विमर्श के अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इस विश्लेषण के साथ वे संकेत भी देते हैं, कि मनोविकृतियों के कारण असामान्य लैंगिक व्यवहार करने वाले, छद्म किन्नर बनने वाले लोगों और ‘किन्नरों’ में बड़ी विभाजक रेखा खिंची हुई है। किन्नर-विमर्श के संदर्भ में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

समग्रतः, किन्नर विमर्श के वैचारिक आधार की तैयारी के लिए डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा चयनित समस्त सामग्री, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, सिनेमा आदि विमर्श के फलक को विस्तार ही नहीं देते, वरन् अनेक अनछुई सच्चाइयों को प्रकट भी करते हैं। डॉ. पाठक ने अपनी कृति में जिस प्रकार खाका खींचा है, वह निःसंदेह ‘किन्नर-विमर्श’ के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। इस कृति को ‘किन्नर-विमर्श’ का दिशा-निर्देशक ग्रंथ कह सकते हैं। और एक बार फिर डॉ. विनय कुमार पाठक को ऐसे सिद्धहस्त समीक्षक-आलोचक कह सकते हैं, जिन्होंने बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के नवोदित विविध विमर्शों को स्थापित करने और साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा के लिए उपलब्ध कराने का काम किया है।

(पुस्तक- किन्नर आलोचना के शिखर : डॉ. विनय कुमार पाठक, संपादक- डॉ. अनिता सिंह, प्रकाशक- माया प्रकाशन, वर्ष- 2024 में प्रकाशित)

                                                                                    -राहुल मिश्र

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग

 


गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग


बरन-धरम गयो, आस्रम निवास तज्यो,

त्रासन चकित सो परावनो परो सो है।

करम उपासना कुबासना बिनास्यो, ज्ञान

बचन, बिराग बेष जगत हरो सो है॥

गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग,

निगम नियोग ते सो केलि ही छरो सो है।

काय मन बचन सुभाय ‘तुलसी’ है जाहि,

रामनाम को भरोसो ताहि को भरोसो है॥84।।

(कवितावली, उत्तरकांड, गोस्वामी तुलसीदास)

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली 16वीं शताब्दी का ग्रंथ है। ब्रजभाषा में रचित इस ग्रंथ में श्रीरामचरितमानस की तरह सात कांड हैं। ग्रंथ में जगह-जगह पर सामयिक विषय परिलक्षित होते हैं। यह छंद भी सामयिक विषय से संबद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास अपने आसपास की स्थितियों का वर्णन इस छंद में कर रहे हैं। वे लिखते हैं, कि- “चारों वर्णों के धर्म नष्ट हो गए हैं। लोगों ने चारों आश्रमों में रहना छोड़ दिया है। अधर्म के डर से लोगों में भगदड़ मच गई है। बुरी इच्छाओं ने कर्म, उपासना, ज्ञान, वचन और वैराग्य वेष को नष्ट कर दिया है, सारा संसार छला हुआ दिखलाई देता है। गोरख ने योग जगाया है। लोगों ने भक्ति को भगा दिया है। निगम के नियोग, अर्थात् वेद आदि ग्रंथों के निर्देशों को खेल बनाकर छल रहे हैं। तुलसीदास कहते हैं, कि जिसको मन-वाणी-कर्म-स्वभाव से राम नाम का विश्वास है, उसी का विश्वास ठीक है।“ 1 छंद ध्वनित करता है, कि जिन धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों से लोग अपने जीवन के लिए मार्ग तय करते थे, उन्हें ही लोग विस्मृत कर बैठे हैं, या उन्हें ऐसा करने के लिए स्थितियों ने विवश कर दिया है। सामयिक स्थितियाँ प्रतिकूल हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित इन पंक्तियों का उल्लेख यहाँ करने का आशय नाथ पंथ के संदर्भ में उनके विचार और अभिमत का विश्लेषण करना है। इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए प्रायः नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ के द्वारा योग के जगाए जाने से भक्ति के प्रचलित स्वरूपों को लोगों के द्वारा त्याग दिए जाने, वेद-आधारित व्यवस्था को छोड़ देने तथा वर्णाश्रम, उपासना आदि को त्याग दिए जाने की बात कही जाती है। इन पंक्तियों का उल्लेख प्रायः इसी संदर्भ में किया भी जाता है। वस्तुतः गोरखनाथ के नाथ पंथ के उदय और विस्तार के साथ इन पंक्तियों के संदर्भ को देखने पर अलग ही पक्ष प्रकट होता है।

हिंदी साहित्येतिहास में नाथ साहित्य के पहले सिद्ध साहित्य का स्थान आता है। व्यवहार की दृष्टि से, साथ ही कालक्रमानुसार सिद्धों का समय पहले है, बाद में नाथपंथियों का समय आता है। साहित्य में इसी अनुरूप अध्ययन होता है।“सिद्ध साहित्य के रचयिता सहजयानी या वज्रयानी संप्रदाय के सिद्ध थे, जिन्होंने अपने संप्रदाय के विचारों एवं अपनी धार्मिक अनुभूतियों को प्रकाशित करने के लिए काव्य रचना की। सहजयान संप्रदाय का संबंध बौद्धधर्म की महायान शाखा की उस परंपरा से है जो तंत्र, मंत्र व अन्य गुह्य साधना-पद्धतियों को अपनाती हुई ईसा की 8वीं शताब्दी के लगभग अत्यंत विकृत होकर एक नये संप्रदाय के रूप में परिवर्तित हो गई थी। इसी संप्रदाय को 'सहजयान' या 'वज्रयान' कहा गया है तथा इसके अनुयायी साधक ही 'सिद्ध' कहलाते हैं।“ 2 सिद्धों की परंपरा का साहित्यिक रूप सिद्ध साहित्य के अंतर्गत आता है। इसमें पुरानी हिंदी में लिखे दोहे और चर्यापद हैं; जिनमें कमल, कुलिश, मुद्रा, रहस्य, पंच बिडाल, गुह्यतंत्र, महासुख आदि का वर्णन करते हुए साधना की सहज पद्धति को अपनाने की सीख दी जाती है। गणपतिचंद्र गुप्त ने सिद्ध साहित्य का विश्लेषण करते हुए सिद्ध सरहपा के मतानुसार स्पष्ट किया है, कि- “वस्तुतः सहजयान में जीवन की सहज वासनाओं की पूर्ति को ही साधना के सर्वोत्कृष्ट रूप से स्वीकार किया गया। सहज वासना या कामवासना की पूर्ति के लिये विभिन्न जाति की मुद्राओं या साधिकाओं के सहयोग से कमल-कुलिश साधना की जाती थी। यद्यपि आधुनिक युग के अनेक व्याख्याता इनकी साधना-पद्धति को आध्यात्मिक सिद्ध करने के लिए कमल, कुलिश, मुद्रा आदि शब्दों की नयी व्याख्या करने का प्रयास भी करते हैं किंतु वस्तुतः ये क्रमश: जननेंद्रिय, पुरुषेंद्रिय एवं नारी के ही पर्यायवाची हैं। सरहपाद ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि सुख से खाते-पीते एवं रमण करते हुए नित्य से चक्र को पूर्ण करते हुए इस धर्म में परलोक की साधना की जाती है। इसी प्रकार अन्य स्थान पर कमल-कुलिश साधना का भी रहस्य उद्घाटित करते हुए उन्होंने लिखा है- 'कमल और कुलिश को मध्य में स्थित करके सुरत विलास का जो आनंद लिया जाता है, त्रिभुवन में कौन उससे वंचित रह सकता है तथा किसकी आशा को वह पूरी नहीं करता!' अस्तु विभिन्न प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिद्ध की साधना-पद्धति वाममार्गी एवं भोग-विलास-प्रधान थी, यह दूसरी बात है कि हम खींच-तान कर उनके शब्दों की आध्यात्मिक व्याख्या भी कर डालें।“ 3

नाथ पंथ की उत्पत्ति के कारकों को भी इस तथ्य में देखा जा सकता है। नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ स्वयं भी सिद्ध परंपरा में आते हैं। उनके गुरु मछेंद्रनाथ भी सिद्धों में गिने जाते हैं। गोरखनाथ और उनके गुरु मछेंद्रनाथ को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कथाएँ भी प्रचलित हैं, जो विशेष रूप से नाथपंथियों में सुनी-सुनाई जाती हैं। ख्यातिलब्ध उपन्यासकार विश्वंभरनाथ उपाध्याय का बहुत चर्चित उपन्यास है- जाग मछंदर गोरख आया। यह उपन्यास सन् 1983 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास की कथावस्तु गोरखनाथ के द्वारा प्रवर्तित नाथ पंथ के संदर्भ में प्रकाश डालती है, साथ ही गोरखनाथ के समकाल का विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। “डॉ. विशंभरनाथ उपाध्याय के उपन्यास जाग मछंदर गोरख आया में नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु मछंदरनाथ और गोरखनाथ की कथा है, इसके साथ ही धर्म की आड़ में किए जाते कुकृत्यों पर तीखा प्रहार भी किया गया है। उपन्यास में एक ओर मत्स्येंद्रनाथ के साथ नर्मदा के विवाह के बाद कामरूप की रानी ललिता देवी और राजकुमारी प्रियंवदा के मायाजाल में उलझने और उससे मुक्त होने की कथा है, तो दूसरी ओर विदेशियों के संभावित आक्रमण की आशंका के कारण उत्तर भारत के राजाओं को संगठित करने में जुटे गोरखनाथ की कथा है। इस्लाम के नाम पर दूसरे देशों में लूटपाट करने, कब्जा जमाने वाले लोगों की खबर उपन्यास में कई जगह ली जाती है।“ 4

गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित-प्रचलित नाथ पंथ की उत्पत्ति का आधार उपरोक्त वर्णित दो स्थितियों में स्पष्ट होता है। नाथ परंपरा के अध्येताओं ने नाथ पंथ को गोरखनाथ से भी पहले का माना है।“विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नाथमत गोरखनाथ के पूर्व भी था, तथापि उसको एक व्यवस्थित और संगठित रूप देने का कार्य गोरखनाथ ने ही सर्वप्रथम किया और बाद का विकास प्रायः उन्हीं की खींची हुई रेखाओं पर होता रहा।“ 5  गोरखनाथ के परवर्ती कालखंड को देखें, तो नाथ-पंथ की रचनाओं की परंपरा लगभग 17वीं शती. तक विस्तृत रही है, तथापि गोरखनाथ की साधना-पद्धति, विचारधारा तथा गोरखनाथ का व्यक्तित्व ही उनमें मुखरित होता रहा है। नाथ पंथ का प्रारंभिक काल और साथ ही गोरक्षनाथ के साथ जुड़ी अनेक किंवदंतियाँ, कथाएँ और प्रसंग नाथ पंथ की पुरातनता को बताते हैं। “क्रुक्स ने एक परंपरा का उल्लेख किया है, जिसे ग्रियर्सन ने भी उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि गोरखनाथ सत्ययुग में पंजाब के पेशावर में, त्रेता में गोरखपुर में, द्वापर में द्वारिका के भी आगे हुरमुज में और कलिकाल में काठियावाड़ की गोरखमढ़ी में प्रादुर्भूत हुए थे।“ 6 इसी प्रकार गोरक्षनाथ की अनेक यात्राओं और वार्ताओं के प्रसंग भी मिलते हैं। अनेक प्रसंग ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व भी रखते हैं। नाथ पंथ की पुरातनता के लिए इन प्रसंगों का उल्लेख विशिष्ट स्थान रखता है। जालंधर (पंजाब) के साथ भी नाथ पंथ का संबंध मिलता है। चौरासी सिद्धों में गिने जाने वाले जालंधरपा को सिद्ध पंथ से अलग पंथ के प्रवर्तक के रूप में भी जाना जाता है।

नागेंद्रनाथ उपाध्याय ने अपने शोध में बारह नाथपंथियों के नामोल्लेख किए हैं। इनमें मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के साथ ही जालंधर, चर्पटि, भर्तृहरि, रेवण, चौरंगी, गोपीचंद, कान्हिप, गहिनी, निवृत्तिनाथ और ज्ञाननाथ का नाम आता है। इनमें से ज्ञाननाथ या ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र के वारकरी संत हैं और नाथ पंथ में भी आते हैं।7 सिद्ध, नाथ और परवर्ती वारकरी, मालकरी और निर्गुण आदि परंपराएँ एक-दूसरे से संबद्ध दिखाई देती हैं। वस्तुतः इन परंपराओं में वैचारिक भिन्नता और समय के अनुरूप पनपने वाली विकृतियाँ नए मतों और पंथों का मार्ग प्रशस्त करती प्रतीत होती हैं, जो कालांतर में अपना व्यापक रूप और अलग धारा प्रकट करती हैं। सिद्धों में जालंधरपा ने जिस वैचारिक भिन्नता को आधार बनाकर नाथ पंथ की भूमि तैयार की, कालांतर में वह गोरक्षनाथ के माध्यम से उर्वर बनी और पुष्पित-पल्लवित हुई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने विवेचन में स्पष्ट किया है, कि- “गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) भी गिन लिये गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया। योगियों की इस हिंदू शाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और बीभत्स विधानों से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव-शक्ति की भावना के कारण कुछ शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी-किसी ग्रंथ (जैसे, शक्ति संगम के तंत्र) में मिलती है। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में- राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत में 'बालनाथ का टीला' आया है।“ 8 नाथ संप्रदाय के ग्रंथों में जलंधरनाथ को ही बालनाथ के नाम से बताया गया है। मछिंदरनाथ बालनाथ के शिष्य थे, और गोरखनाथ मछिंदरनाथ के शिष्य थे। इस तरह जलंधरनाथ से सिद्धों में विचार-व्यवहार आधारित भेद पनपता है, जो गोरखनाथ के समय में स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है।

सिद्धों के द्वारा सहजयान के रूप में वामाचार और तंत्र-साधना का प्रयोग किया जा रहा था, और इस प्रयोग के कारण धार्मिक शुचिता व पवित्रता के स्थान पर रहस्यमयी बातें; नाद, बिंदु, घट, सुरति, निरति आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए गुह्य-गूढ़ चिंतन व दर्शन की बातें सिद्ध साहित्य में दिखाई देने लगीं। इनके कारण उपजने वाली असहजता के मध्य सिद्धों को लेकर भ्रांतियाँ व विकृतियाँ पनपने लगीं। समाज को सही रास्ता दिखाने के स्थान पर चमत्कार और चमत्कारिक घटनाओं को महत्त्व मिलने लगा। सहजयान के नाम पर रचलित हो चली भोगवादी प्रवृत्ति के स्थान पर योग को और साधना-पद्धतियों में प्रचलित हो चली उच्छृंखलता के स्थान पर कड़े अनुशासन को महत्त्व देते हुए गोरखनाथ ने नाथ पंथ को प्रचलित किया। साधना में अनुशासन और योग-परंपरा भारतीय साधना-पद्धति में प्रचलित रही है। शिव को योग का अधिष्ठाता माना जाता है। भारतीय योग-साधना के प्रवर्तक पतंजलि माने जाते हैं। नाथ पंथियों ने अनुशासन के लिए पतंजलि की योग-साधना को आत्मसात् किया, यद्यपि अनेक विद्वान पतंजलि के योगशास्त्र और नाथपंथियों के योग के मध्य कुछ भिन्नताओं को देखते हुए दोनों को अलग मानते हैं, तथापि इस विभेद को देश-काल-स्थिति के कारकों के साथ देखते हुए मूल-आधार को ग्रहण करना चाहिए। नाथपंथ का लक्ष्य महासुख या सहजसुख नहीं, वरन् अमरत्व और शिवत्व को पाना था। गोरक्षनाथ शिव के अवतार माने जाते हैं। मन की शुद्धता, चित्त के विकारों का शमन मन को शुद्ध करने के लिए अनिवार्य माना जाता है। गोरखनाथ का कथन है-

“नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा ।

ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा ।।“ 9

नाथ पंथ के सहित्य का परिचय गोरखबानी के इस उद्धरण के साथ दिया जाता है। गोरखनाथ के द्वारा इन दो पंक्तियों में न केवल नाथ पंथ की वैचारिक पृष्ठभूमि को, वरन् सामयिक संदर्भ को भी बताया गया है। सामने विभिन्न प्रकार की भोग-विलास की वस्तुएँ हैं। पीछे छूट गया सहज अखाड़ा (सहजयानी) है। इन दोनों स्थितियों के मध्य मन को स्थिर करना है। मन को शुद्ध करना है। चित्त के विकारों का शमन करना है। ऐसा करने पर ही मन में, चित्त में शिव और शिवत्व का भंडार भरेगा। नाथ पंथ भौतिकता के सुख-साधनों के मध्य चित्त को स्थिर करने और विकारों से मुक्त करने की साधना पर बल देता है।

‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’, अर्थात् जैसा ब्रह्मांड में है, वैसा ही शरीर में विद्यमान है। नाथ पंथ में इस भावधारा की प्रबलता दिखाई देती है। ब्रह्मांड में खोजने की अपेक्षा पिंड, अर्थात् शरीर में खोजने की बात नाथ पंथ में कही जाती है। यह अद्वय का सिद्धांत है। यह एकरसता का, एकरूपता का सिद्धांत है। यद्यपि यह सिद्धांत भारतीय दर्शन और चिंतन धारा में पुरातनकाल से रहा है, तथापि अनेक मतों-पंथों के वैचारिक संक्रमण के मध्य इस सिद्धांत का पुनर्पाठ हमें नाथ पंथ में ही देखने को मिलता है। कबीर आदि संतों ने अनेक स्थानों पर शरीर को गढ़, कोट आदि रूपकों से अभिव्यंजित किया है। नाथ पंथियों ने शरीर में ब्रह्माण्ड के तत्त्वों का व्यापक चित्रण किया है। संतों के लिए कायसाधना की अपेक्षा मन के विचलन को नियंत्रित करते हुए भक्ति के भाव के साथ जोड़ना अपेक्षित था। इस कारण संतों ने आवश्यकतानुसार ही इस सिद्धांत का वर्णन किया है।

नाथ पंथ का साहित्य उपरोक्त विशिष्टताओं को साथ लेकर विकसित और समृद्ध हुआ है। मुक्तक गीति शैली में नाथ संतों ने अपनी रचनाएँ की हैं। महाराष्ट्र में नाथ पंथ के साधक के रूप में ज्ञानदेव को हम जानते हैं। ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर की रची हुई ज्ञानेश्वरी गीता में नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। उत्तर भारत की ओर चलने वाली संत परंपरा के प्रमुख कवि के रूप में ज्ञानेश्वर और उनके साथ ही संत एकनाथ, संत तुकाराम प्रभृति संत कवियों ने उत्तर भारत में भक्तियुग का आह्वान किया। संत कबीर और उनके परवर्ती संत कवियों की बानियों में नाथ परंपरा के अंश परिलक्षित होते हैं। भक्ति काल के संत कवियों की बानियों में, रचनाओं में भाव पक्ष का भवन नाथ पंथ की भावभूमि से बना है। नाथ पंथ की भाषा और छंद विधान ने संत साहित्य को दिशा दिखाई है।

गोस्वामी तुलसीदास की वैष्णव भक्ति-भावना और सगुणोपासना नाथ पंथ से किंचित् अलग दिखती है, तथापि वे नाथ पंथ की निर्गुणोपासना और योग के प्रति आस्थावान हैं। गोस्वामी तुलसीदास की निर्गुणोपासना के स्थान पर सगुणोपासना और योग के स्थान पर नवधा भक्ति के प्रति अनुराग और अभिव्यक्ति को यत्र-तत्र विरोध के रूप में देख लिया जाता है। यदि तथ्यात्मक चिंतन के साथ पक्षपात और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखें, तो नाथ पंथ की प्रवृत्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास के साथ ही सगुणोपासक अन्य भक्त कवियों में भी देखी जा सकती हैं। उदाहरणार्थ नाथ पंथ का ‘यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे, यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे।’ का सिद्धांत गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस में मिलता है। यह सिद्धांत बाबा तुलसी के द्वारा अपने आराध्य की विराटता को प्रकट करने का माध्यम बनता है। वे लिखते हैं-

“ब्रह्मांड  निकाया   निर्मित  माया  रोम  रोम  प्रति  बेद कहै ।

मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ।।“ 10

“देखरावा मातहिं निज अद्भूत रूप अखंड ।

रोम रोम  प्रति  लागे   कोटि कोटि  ब्रह्मंड ।।“ 11

गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी के प्रारंभ में संतों के व्यक्तित्व और उनके जीवन का अत्यंत सरस वर्णन मिलता है। इस कृति के प्रारंभ में ही वे लिखते हैं-

“अज अद्वैत अनाम, अलखरूप गुन रहित जो।

मायापति सोइ राम, दास हेतु नर तनु धरेउ ।।“ 12

तुलसी की समन्वय की भावना यहाँ कोई भेद नहीं करती है। वे अलखरूप (गुरु गोरखनाथ द्वारा ईश-स्मरण के लिए ‘अलख निरंजन’ का उद्घोष प्रचलित-प्रसारित किया गया था।) में भी अपने आराध्य को देखते हैं, निर्गुण रूप में भी अपने आराध्य को पाते हैं। इन उद्धरणों के साथ आलेख के प्रारंभ में उल्लिखित पद में अभिव्यंजित भाव को समझ सकते हैं। वहाँ पर वैष्णव भक्त तुलसी की भक्ति भावना प्रबल रूप में परिलक्षित होती है, व उनकी चिंता भी प्रकट होती है, लेकिन उस चिंता के मध्य गोरख के योग का प्रसार सकारात्मक रूप में दिखता है। बाबा तुलसी की समन्वयकारी भावना उस समय के प्रचलित सभी भक्ति-योग रूपों को लेकर चलती है।

भक्ति की सगुण धारा के प्रमुख कवि के रूप में गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व में नाथ पंथ की वैचारिक उपस्थिति के उपरोक्त विश्लेषण के साथ ही संत काव्य या भक्ति की निर्गुण काव्यधारा की निर्मिति में नाथ पंथ का योग स्वतः प्रमाणित है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवि कबीर स्वयं को नाथ पंथ का अंग-अंश मानते हैं। वे स्वीकारते हैं-

“गोरष भरथरि गोपीचंदा । ता मन सो मिलि करै अनंदा ।।

अकल निरंजन सकल सरीरा । ता मन सो मिलि रहा कबीरा ।।“ 13

कबीर के सभी काव्य-रूप, यथा- साखी, पद, रमैनी, बावनी, चौंतीसा, तिथि, बसंत, चाँचर, हिंडोला आदि प्रायः गोरखबानी से ही आए हैं। समस्त संत-साहित्य में हठयोग की शब्दावली विस्तृत है। गुरु नानक के सबद-कीर्तन में भी नाथ पंथ का प्रभाव परिलक्षित होता है। हिंदी के भक्तिकाल में नाथ पंथ की साधना-पद्धति, योग, चिंतन और ध्यान-मनन समग्र विविधता एवं व्यापकता के साथ परिलक्षित होते हैं।

वस्तुतः, गोरखनाथ के द्वारा नाथ पंथ को समृद्ध-सशक्त बनाए जाने का प्रमुख कारण सिद्धों-वज्रयानियों-सहजयानियों द्वारा फैलाई जा रही विकृतियों का प्रतिकार करना था। वामाचार में सन्नद्ध अपने गुरु को भी वे विकृति से निकालने का कार्य करते हैं। ‘जाग मछंदर गोरख आया...’ में यही तथ्य दिखता है। नाथ पंथ का ध्येय लोकजीवन का परिमार्जन है। यह अलग बात है, कि विभिन्न आलोचकों-अध्येताओं की दृष्टि में उनका हठयोग और उनकी साधना-पद्धति जीवन की स्वाभाविक स्थिति, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के सामान्य एवं सुव्यवस्थित रूप के साथ संबधित नहीं है। कुछ आलोचक, साहित्येतिहासकार नाथ पंथ के साहित्यिक अवदान को भक्ति-विषयक कहकर एकांगी और साहित्येतर की श्रेणी में रखते हैं। इन दोनों ही स्थितियों के विपरीत नाथ पंथ के साहित्य को भक्ति साहित्य और हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के लिए अवदान के संदर्भों के साथ विश्लेषित करने पर एक विस्तृत एवं समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। नाथ पंथ निष्पक्ष एवं लोकानुरागी, लोकहितकारी आध्यात्मिक क्रांति के रूप में उस विषम काल में दिखाई देता है, जब विधर्मी विदेशी आक्रांताओं के साथ ही देश के अंदर पंथाधारित (वज्रयान, सहजयान आदि में पनपी) धार्मिक विकृतियाँ लोक चेतना और लोकजीवन को दिशाविहीन कर रहीं थीं। हिंदी का भक्तिकाल नाथ पंथ की आध्यात्मिक चेतना से रस-संचय कर लोक के पथ का मार्गदर्शन करता है, तो इसमें नाथ-साहित्य के बृहत्-विशद-व्यापक योगदान को देखा जाना अपेक्षित व अनिवार्य हो जाता है। इसके साथ ही नाथ-साहित्य के व्यापक विश्लेषण एवं शोध की अपरिमित संभावनाएँ दिखाई देती हैं, जिनको कार्यरूप में परिणत कर नाथ-साहित्य के समाज-सापेक्ष, लोक-सापेक्ष यथार्थपूर्ण एवं तर्कपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन-प्रकटीकरण किया जा सकता है।


संदर्भ-

1. गोस्वामी तुलसीदासकृत कवितावली सटीक, उत्तरकांड, टीकाकार पं. गणेश पांडेय, ठा. सूर्यनाथ सिंह ‘विशारद’, छात्रहितकारी पुस्तकमाला, प्रयाग, सं. 1936, पृ. 173,

2. गणपतिचंद्र गुप्त, पूर्ववर्ती भारतीय साहित्य एवं उसका प्रभाव, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, प्रथम खंड, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, सं. 2010, पृ. 44,

3. वही, पृ. 45,

4. राहुल मिश्र, आठवें दशक के बाद के उपन्यासों के कथ्यात्मक चिंतन के संदर्भ, हिंदी कथा-साहित्य : आठवें दशक के बाद, ग्रंथकेतन, नई दिल्ली, सं. 2009, पृ. 174,

5. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथों और संतों के जातीय और सामाजिक संबंध, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 57,

6. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गोरक्षनाथ (गोरखनाथ), नाथ-संप्रदाय, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, सं. 1950, पृ. 97,

7. नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, नाथ और संत साहित्य, नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, सं. 1965, पृ. 33,

8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं. 2015, पृ. 29-30,

9. डॉ. नगेन्द्र (संपादक), आदिकाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली सं. 2004, पृ. 67,

10. गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस, बालकांड, दोहा 192, लोकभारती टीका, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, पृ. 210,  

11. वही, दोहा 201, पृ. 218,

12. गोस्वामी तुलसीदासकृत वैराग्य संदीपनी, सो. 04, तुलसी ग्रंथावली, प्रथम भाग, सं. पं. महावीर प्रसाद मालवीय ‘वैद्य’, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग, सं. संवत् 1981 वि., पृ. 05,

13. श्यामसुंदर दासकृत कबीर ग्रंथावली, प्रस्तावना, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 1985, पृ. 38 ।

(हिंदी विभाग, कालिकट विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका 'शोध प्रयाण' के प्रवेशांक, मार्च- 2024 में प्रकाशित)

-राहुल मिश्र