Friday, 1 June 2018



पुस्तक समीक्षा                               
राम कौन ? : चिंतन के वर्तमान का नया आयाम
इक्ष्वाकु कुलभूषण, सूर्यवंशी, लोकरक्षक, मर्यादापुरुषोत्तम, विष्णु अवतार राम के स्वरूप और उनके गुणों के प्रति जिज्ञासा का भाव ऐसी युगान्तकारी घटना है, जो काल की परिधि में और भौगोलिक विस्तार की सीमाओं में कभी नहीं बँधी है। रामकथा के सर्वप्रथम रचयिता आदिकवि वाल्मीकि की जिज्ञासा, राम के प्रति दास्य भक्ति-भावना से ओतप्रोत गोस्वामी तुलसीदास की जिज्ञासा और इनके अतिरिक्त दुनिया की अनेक भाषाओं में रामकथाएँ रचने वाले कवियों, भक्तकवियों की जिज्ञासा ने राम को कभी अवतार के रूप में देखा और कभी सामान्य मानव के रूप में देखा। रामकथा में आने वाली अनेक अलौकिक, चमत्कारिक घटनाओं के पीछे छिपे सत्य का अन्वेषण, राम के दैवीय और सहज मानवीय व्यक्तित्व के बीच संतुलन का चिंतन विविध युगों की विविध चिंतनधाराओं के सापेक्ष नवीन कलेवर के साथ विकसित होता रहा है।
उत्तर आधुनिकता के विज्ञान और तकनीकी से सम्पृक्त वर्तमान युग में, जब भारतीय चिंतनधारा पाश्चात्य चिंतन के उपनिवेशवादी बंधनों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर विकसित हुई, तब भारतीय चिंतनधारा ने अपनी संस्कृति के प्रतीकों को भी अपना प्रतिपाद्य बनाया। नैतिक मूल्यों के संक्रमण के कारण टूटती-बिखरती सामाजिक इकाइयों और दिशाहीन होकर भटकते मानव-समाज के लिए उन प्रतीकों को चिंतन का विषय बनाना अनिवार्य हो गया, जो संक्रमण के विषम कालखण्ड में समाज को नए तरीके से नई दिशा देने की सामर्थ्य रखते हों। इस क्रम में राम को जानना सर्वाधिक प्रासंगिक और समीचीन बना। इस कारण राम को जानने की जिज्ञासा अनेक साहित्यिकों की लेखनी का माध्यम पाकर पुस्तकों के आकार में सामने आई। गद्य का विन्यास यथार्थ के अधिक निकट का होता है और विज्ञान व तर्कसम्मत होता है, इस कारण राम के चरित्र पर गद्यात्मक पुस्तकें वर्तमान युगीन परिदृश्य के सापेक्ष अधिक समृद्ध-सक्षम हुईं। यद्यपि ऐसी पुस्तकों की संख्या कम है। ऐसा ही एक प्रयास श्रीराम मेहरोत्रा की सद्यः प्रकाशित कृति राम कौन?  है।
श्रीराम मेहरोत्रा हिंदी के विद्यार्थी अवश्य रहे हैं, किंतु बैंकिंग उद्योग में प्रबंधकीय पदों पर उन्होने अपनी सेवाएँ दी हैं। प्रबंधकीय/प्रशासनिक पदों की व्यस्तताओं के बावजूद साहित्य में उनकी गहन अभिरुचि रही है। इसी कारण वाल्मीकि रामायण से लेकर हिंदी और अन्य भाषाओं की रामकथाओं का सम्यक्, सर्वांगपूर्ण अध्ययन करके और इसके साथ ही तथ्यों का तर्कपूर्ण, विज्ञानसम्मत और व्यावहारिक विश्लेषण करके उन्होने राम के कृतित्व और व्यक्तित्व का वर्तमान युग के सापेक्ष मूल्यांकन किया है।
वे पुस्तक के प्राक्कथन में लिखते हैं कि, मानव जीवन के विभिन्न संबंधों में राम के द्वारा स्थापित आदर्शों को हर व्यक्ति आज खोज रहा है। आज्ञाकारी पुत्र, उत्सर्गशील भ्राता भरत-लक्ष्मण, राजसुख त्यागकर वन जाने वाली भार्या सीता, एक-पत्नीव्रती राम, कर्तव्य परायण प्रजापालक राजा, शत्रु पर विजय के बाद वैर भाव भुलाकर भाई से रुष्ट विभीषण को रावण की विधिवत अंतिम क्रिया की आज्ञा देने वाले उदार राम को सभी आज अपने बीच खोजने का प्रयास कर रहे हैं। आज जब परिवार-समाज-राज्य चारों ओर से टूट और बिखर रहे हैं तब यह राम अधिक प्रासंगिक और काम्य हो गए हैं। (पृष्ठ- 11)  इसी प्रासंगिकता के कारण मूल्यों की ऊहापोह वाले आज के जीवन में अकेला पड़ा व्यक्ति राम के मानदण्ड में अपना वांछित आत्मिक सुख खोज रहा है। किंतु उसे यह सुख राम के दैवीय स्वरूप की अपेक्षा सहज मानवीय स्वरूप से पाना है। इस कारण पुस्तक राम के साथ जुड़े अन्य पात्रों की प्रासंगिकता का, उनके व्यक्तित्व का और उनके गुणों-दुर्गुणों का विवेचन भी करती है। रामकथा में आई पारलौकिक घटनाओं का सत्यान्वेषण और वैज्ञानिक मूल्यांकन भी पुस्तक में मिलता है। लेखक ने राम के साथ ही सीता, कैकैयी, रावण और हनुमान के व्यक्तित्व की भी पड़ताल की है। वर्तमान में चर्चित सेतुबंध का वैज्ञानिक पक्ष और हमेशा से मानव-जिज्ञासा का केंद्र रहे पुष्पक विमान की वैमानिक तकनीकी को पुस्तक के अलग-अलग खंडों में विभाजित किया गया है।
पुस्तक के पहले खंड राम कौन?  में रामकथा और राम के मिथकीय होने या नहीं होने के प्रश्न का समुचित समाधान दिया गया है। लेखक ने वाल्मीकि रामायण का संदर्भ लेते हुए बताया है कि, वैज्ञानिकों को आज से तीन शती पूर्व तक चार दाँत वाले हाथियों का ज्ञान नहीं था। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार ये चार दाँत वाले हाथी आज से ढाई करोड़ वर्ष पहले से लेकर पचपन लाख वर्ष पूर्व तक अफ्रीका, एशिया के जंगलों में पाए जाते थे। रामायण श्रीराम का समकालीन इतिहास है। महर्षि वाल्मीकि चार दाँत वाले हाथियों से परिचित थे। हनुमान ने लंका में सीता की खोज करते हुए नाना प्रकार के विमान, सुंदर हाथी, घोड़े, श्वेत बादल की घटा के समान दिखाई देने वाले चार दाँतों से युक्त सजे-सजाए मतवाले हाथी तथा पशु, पक्षियों से सुशोभित राजमहल देखा था। (पृष्ठ- 23)  इस स्थापना के माध्यम से राम की एतिहासिकता को प्रमाणित किया गया है।
सीता की अग्नि परीक्षा, शम्बूक वध और सीता के निर्वासन की घटनाओं को लेकर राम के व्यक्तित्व की आलोचना की जाती रही है और वर्तमान में भी की जाती है। प्रस्तुत पुस्तक बताती है कि वाल्मीकि रामायण में ऐसे प्रसंग नहीं हैं। चूँकि रामकथा वाल्मीकि के पहले भी श्रुति के माध्यम से लोककंठों में जीवित रही और कथावाचकों ने अपने अनुरूप इसमें क्षेपकों को भी जोड़ा है, इस कारण ये तीनों प्रसंग भी क्षेपकों की भाँति रामकथा में जुड़ गए। संस्कृत के कवि वाल्मीकि और आमजन की भाषा के कवि तुलसीदास रामकथा के दो ऐसे बिंदु हैं, जिनके अंतराल के बीच राम के विषय में इतना कुछ लिखा गया जिसकी गणना अथवा संकलन अपने आप में बहुत कठिन कार्य है। मूल प्रतिपाद्य राम इस लंबी यात्रा में मानवता के जिस उस उच्च आदर्श के रूप में पुरुषोत्तम हुए उसे जनमानस में उत्तरोत्तर ऊँचा उठाने की होड़ लगी रही। इस होड़ का परिणाम यह हुआ कि स्वयं वाल्मीकि ने मूलतः सरल और पराक्रमी राम का जो स्वरूप ज्ञान से प्राप्त कर प्रस्तुत किया था उसकी लोकमान्यता का लाभ उठाते हुए अनेक आत्मतोषियों ने अपनी ओर से बहुत कुछ ऐसा जोड़ा और विशुद्ध वर्णन में इतना कुछ असंगत प्रविष्ट हो गया कि उपकार के स्थान पर अपकार ही हुआ। वाल्मीकि तो मूल लेखक थे किन्तु संस्कृत में ही नहीं, रामचरित की लोकप्रियता के कारण पुराणों से लेकर भारत की सभी भाषाओं में स्वतंत्र ग्रन्थों के रूप में उनके विषय में इतना कुछ लिखा गया कि यदि इन सब लेखन और जैन-बौद्ध लेखनों को साथ में पढ़ा जाए तो जो अराजक स्थिति बन जाएगी, उसकी कल्पना भी कठिन है। आम आदमी वास्तव में सत्य-असत्य के नाम से पूरी तरह दिग्भ्रमित ही हो जाता है। बौद्ध, हिंदू जैन धर्मों ने अपने-अपने मतों के प्रचार के लिए राम-सीता-हनुमान और रावण के चरित्रों का शताब्दियों से खूब दोहन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि सत्य राख की ढेर में दबकर रह गया। (पृष्ठ- 110)  परवर्ती क्षेपकों का ज्ञान तुलसीदास को भी रहा होगा और उनकी दास्य भक्ति भावना ने उसी अनुरूप इन घटनाओं को देखा होगा, यद्यपि तुलसीदास को इस बात का भी अनुमान रहा होगा कि इन घटनाओं का वर्णन राम के चरित्र को धूमिल करने वाला है, इस कारण उन्होने मानस में ऐसे प्रसंगों का बहुत कम वर्णन किया है। सीता का अग्निप्रवेश मात्र वाचिक परम्परा है, न तो यह प्रकृतिगत सत्य है, न परिस्थितिजन्य और न ही राम के आचरणीय चरित्र के अनुकूल है। यदि राम आज्ञाकारी पुत्र, प्रिय भ्राता, आदर्श पति और न्यायप्रिय राजा थे तो देव नदी गंगा और परम सती अनुसुइया से आशीष पाई विदेहपुत्री भूमिजा सीता कैसी जिन पर राम ने संदेह किया? (पृष्ठ-88)  निष्ठुर संवाद के माध्यम से निर्दोष सत्य का ज्ञान कराने हेतु पुस्तक ऐसे क्षेपकों का तार्किक परीक्षण करती है और निष्कर्ष भी देती है कि सायंकाल स्वर्ण सिंहासन पर बैठने के सुखद समाचार ने राम को जिस तरह उद्वेलित नहीं किया था, वैसे ही प्रातःकाल पैदा हो गई विपरीत स्थितियाँ भी उन्हें विचलित नहीं कर पाईं थीं। स्थिर चित्त, शालीन और उच्चतर जीवन-मूल्यों के लिए समर्पित राम के चरित्र को इन क्षेपकों के कारण आलोचना का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसा किए जाने पर राम को उनके वास्तविक स्वरूप में जान पाना कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव हो जाएगा।
पुस्तक में कैकेयी के व्यक्तित्व की भी पड़ताल की गई है। पुस्तक बताती है कि कैकेयी का राम से कोई वैर नहीं था। राम के वनवास के बाद की घटनाओं ने राक्षसों के संहार की पृष्ठभूमि तैयार की और इसकी परिणति रावण सहित अन्य आततायी राक्षसों के अंत के साथ हुई। राम को वन भेजने में कैकेयी की भूमिका थी। वस्तुतः इतिहास में यह राम और कैकेय-सुता की वह महान विजय थी जिसके कारण ‘राम’ नाम के भास्कर का कभी अस्त नहीं हुआ। यह सब देखने के बाद राम की कीर्ति और भगवत्ता तक की पहुँच के पीछे कैकेयी असंदिग्ध रूप से नेपथ्य में खड़ी महान् सूत्रधार थी जिसे किसी ने देखा नहीं किंतु सम्पूर्ण संचालन उसी के अनुसार हुआ। कैकेयी ने परोक्ष में रहकर ऐसा बलिदान किया जिसे समाज ने आज भी अनदेखा कर रखा है। (पृष्ठ-161)  यह रामकथा के नकारात्मक पात्रों को देखने का आधुनिकताबोधी नजरिया है, जो कैकेयी के रणकौशल को दशरथ की प्राणरक्षा में और उसकी दूरदर्शी दृष्टि को राम के दण्डकवन भेजने की माँग में कैकेयी के व्यक्तित्व की नए सिरे से पड़ताल करता है।
इसी तरह रावण का चरित्र भी अनेक विशिष्टताओं के साथ पुस्तक में प्रकट होता है। रावण के पुत्र मेघनाद को ‘मेटामैटेरियलिस्म’ के माध्यम से प्रत्यावर्तित होने वाली प्रकाश तरंगों को नियंत्रित करके और अंधकार को अपने वश में करके परावर्तन द्वारा अदृश्य होने के विज्ञान का पता था। रावण को भी विज्ञान का ऐसा ज्ञान था कि वह रणक्षेत्र में अपने दस सिर और बीस भुजाओं का छद्म रूप दिखाकर विपक्षी को भ्रमित कर देता था। रावण को वेदों का प्रखर ज्ञान था। उसने वेदों में निहित वैज्ञानिक रहस्यों को जान लिया था और दस सिर, बीस भुजा के छद्म निर्माण का कायिक विज्ञान प्रयोग करके उसने मृत्यु को अपने वश में कर रखा था। यह भी कह सकते हैं कि वह रणकौशल में इतना पारंगत था कि दशों दिशाओं में एकसाथ युद्ध कर सकता था। रावण उस रक्ष संस्कृति का संवाहक था, जो दैत्य, असुर, नाग आदि विभिन्न जातियों को विजित करके उनकी रक्षा का भार अपने ऊपर लिए हुए थी और सम्पूर्ण विश्व को जीतकर अपनी संस्कृति का अंग बनाना चाहती थी। इक्ष्वाकु कुल के साथ इसी वैचारिक मतभेद के परिणामस्वरूप राम-रावण युद्ध हुआ। अकेले राम-रावण का महासंग्राम चैत्र शुक्ल द्वादशी से लेकर कृष्ण चतुर्दशी तक 18 दिनों तक चला जिसमें अन्ततः रावण मारा गया। (पृष्ठ- 86)
भारतीय आस्था में नारी को ‘शक्ति’ और पत्नी को जिस ‘अर्धांगिनी’ अलंकरण से विभूषित किया गया है वह शब्द और अर्थ, दोनों ही कसौटियों पर यदि कहीं सार्थकता प्राप्त करता है तो वह सीता में ही है।(पृष्ठ- 89) कुम्भजा सीता का जन्म ऐसे कुम्भ से हुआ था, जिसमें रावण ने अनेक ऋषियों का रक्त भरा था और उसे जमीन में गाड़ दिया था। सीता के अपहरण ने इस पाप के दण्ड को सुनिश्चित कर दिया था। दूसरी ओर सीता का अनुकरणीय व्यक्तित्व है, जो आज के समय में अधिक प्रासंगिक बन गया है।
 दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में ‘मूल्य’ के व्याख्याता अर्बन ने प्रत्येक मानवीय मूल्य को साधक और तात्विक मूल्य के स्तर पर, स्थाई और अस्थाई मूल्य के तौर पर तथा उत्पादक और अनुत्पादक मूल्य के तौर पर व्याख्यायित किया है। इसके अतिरिक्त लोक परंपरा सदैव उन मूल्यों को साथ लेकर चलती है, जिन मूल्यों से लोक के कल्याण की भावना के आग्रह को तृप्त किया जाना संभव होता है। तर्कबुद्धिवादी दार्शनिक नीत्शे ने मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन की बात कही है। उसने समस्त मूल्यों के मूल्यांकन पर बल दिया है। उनमें यदि प्राचीन मूल्य शक्ति उपार्जन की कसौटी पर खरे उतरें तो उन्हें वर्तमान समय के लिए भी मूल्यवान माना जा सकता है। यह मानव मूल्यों का परीक्षण है। रामकथा के साथ और रामकथा के महानायक राम के साथ ही उनके साथ जुड़े अन्य पात्रों का मूल्य आधारित मूल्यांकन और उनका युगीन परिवेश के अनुरूप परीक्षण वर्तमान की आवश्यकता है। प्रस्तुत पुस्तक इस कार्य में भी अपनी सार्थकता सिद्ध करती है।
राम कौन?  में राम का ही नहीं, बल्कि रामकथा के अन्य पात्रों का परीक्षण इतनी बारीकी के साथ किया गया है कि कोई भी तथ्य, कोई भी घटना अछूती नहीं रह गई है। राम के वनगमन का पथ, राम-रावण युद्ध की कालावधि, राम की सहयोगी बनीं अनेक जातियों, समूहों व चरित्रों का इतिहास; रामकथा काल के पर्वतीय परिवेश के निवासी वानर जाति और हिंद महासागर के हजारों द्वीपों में फैले दैत्य-दानव-असुर जातीय समूहों का नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन पुस्तक की प्रासंगिकता को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। रामकथा में निहित मूल्यों की स्थापना और नीति तत्त्वों का विवेचन अनेक पुस्तकों का प्रतिपाद्य रहा है, किंतु प्रस्तुत पुस्तक की विशिष्टता मूल्यों और नीति तत्त्वों को समग्रता, तार्किकता, वैज्ञानिकता और सार्थकता के साथ स्पष्ट करने के कारण है।
राम के नैतिक मूल्यों के विवेचन के साथ ही पुस्तक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष रामायण काल के उन्नत ज्ञान-विज्ञान को जानने और उसे प्रकाश में लाने से जुड़ा है। रावण और मेघनाद के वैज्ञानिक ज्ञान के अतिरिक्त सेतुसमुद्रम् की वास्तविकता और पुष्पक विमान की तकनीक की पड़ताल पुस्तक की रोचकता को बढ़ा देती है। पुस्तक बताती है कि पत्थर जल में डूबने के अपने प्रकृत तत्त्व को नहीं छोड़ सकता है। यह तो वास्तुशिल्पी नल और नील का ज्ञान था; जिससे उन्होने समुद्र की तलहटी में लम्बे वृक्षों के तनों को गाड़कर, उनमें पत्थरों की शिलाओं को रोककर, गारा-मिट्टी और घास की रस्सी के प्रयोग से सेतु का निर्माण किया। अमरीकी वैज्ञानिक संस्था नासा ने सेतुसमुद्रम को मानव निर्मित माना है और इसे लगभग 1750 लाख वर्ष पुराना माना है। इसी तरह ‘पुष्पक’ विमान  और ‘गरुड़’ विमान की तकनीकी का विशद विवेचन पुस्तक में होता है। राम के समय में  विज्ञान की समृद्धि के उपरोक्त दो प्रतीकों के अतिरिक्त अंतरिक्ष विज्ञान, भूविज्ञान, शिल्प विज्ञान, जीव विज्ञान और नक्षत्र विज्ञान आदि की अनेक बातें बड़े ही रोचक ढंग से पुस्तक में प्रस्तुत की गईं हैं।
प्रस्तुत कृति आज की युवा पीढ़ी को उसके सांस्कृतिक इतिहास और उसके नायकों की सही पहचान कराने; अपर्याप्त, पूर्वाग्रहयुक्त और भ्रमित जानकारी को प्रक्षालित करके सही व सकारात्मक ज्ञान उपलब्ध कराने तथा संक्रमित मानव-मूल्यों, नैतिक आदर्शों को पुनर्स्थापित कराने का प्रयास करती है। शोध कार्य में संलग्न छात्रों, युवाओं, अध्येताओं, वैज्ञानिकों और सामान्य पाठकों के बीच कृति एक नहीं, बल्कि अनेक ऐसे प्रश्न उठाती है, चिंतन के ऐसे नवीन आयामों का सृजन करती है, जो वर्तमान वैज्ञानिक युग के सापेक्ष महत्त्वपूर्ण भी हैं, विचारणीय भी हैं और नवीन शोधों-आविष्कारों की पृष्ठभूमि भी हैं। इस कारण समीक्ष्य कृति साहित्य के साथ ही ज्ञान की अन्यान्य शाखाओं में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यह पठनीय भी है और संग्रहणीय भी है।
समीक्ष्य कृति- राम कौन?
लेखक- श्रीराम मेहरोत्रा
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-02
प्रकाशन वर्ष- 2011
मूल्य- 195/-
डॉ. राहुल मिश्र
(नूतनवाग्धारा, बाँदा, संयुक्तांक- 12 से 15, सितंबर, 2013,
संपादक- डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल (ISSN 097-092X)।)

Monday, 30 April 2018

राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार






राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं  धर्म्यं सुसुखं कर्तुमाव्ययम् ।।1
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम दोषदृष्टि रहित हो, भक्त हो, इसलिए मैं इस परम गोपनीय ज्ञान को, जो विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण है, उसे बताऊँगा। तुम इस ज्ञान को जानकर इस दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जाओगे। यह विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है। यह समस्त गोपनीय ज्ञानों का राजा है। यह पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्म से युक्त है। यह सुगम और अविनाशी है। गीता का नवम अध्याय उस ज्ञान की बात से शुरू होता है, जिसे विज्ञानसम्मत अर्थात तथ्यों पर खरा उतरने वाला बताया गया है। यह अत्यंत गोपनीय भी है, अर्थात यह सर्वसुलभ नहीं है, किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग जानकर और उस मार्ग पर चलकर यदि इस विज्ञानसम्मत ज्ञान को ग्रहण कर लिया जाए, इसे जीवन में उतार लिया जाए, तो यह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा, इसके प्रत्यक्ष फल प्राप्त होंगे। धर्म से युक्त ऐसे विशिष्ट ज्ञान की विवेचना करने के कारण गीता में इस अध्याय का अपना विशिष्ट स्थान है।
धर्म, आस्था और भक्ति के रूढ़ अर्थों से अलग गीता व्यवहार की दृष्टि से, दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यापार की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न भाष्यकारों, विद्वानों और तर्कशास्त्रियों ने इस कारण गीता का समग्र विवेचन विभिन्न तरीकों-पद्धतियों से किया है। विनोबा भावे द्वारा दिये गए गीता-प्रवचन इस संदर्भ एकदम अलग स्थान रखते हैं। गीता के समस्त अध्यायों पर दिये गए उनके प्रवचन पुस्तकाकार उपलब्ध हैं। अपने प्रवचनों को उन्होंने आम जनता के उपयोगार्थ केंद्रित किया है। वे ‘गीता प्रवचन’ की प्रस्तावना में लिखते हैं- इनमें तात्विक विचारों का आधार छोड़े बगैर, लेकिन किसी वाद में न पड़ते हुए, रोज के कामों की बातों का ही जिक्र किया गया है।.... यहाँ श्लोकों के अक्षरार्थ की चिंता नहीं, एक-एक अध्याय के सार का चितंन है। शास्त्र-दृष्टि कायम रखते हुए भी शास्त्रीय परिभाषा का उपयोग कम-से-कम किया है। मुझे विश्वास है कि हमारे गाँव वाले मजदूर भाई-बहन भी इसमें अपना श्रम-परिहार पाएँगे।2 इस प्रकार विनोबा के गीता-प्रवचन की समाज से निकटता और उनके प्रवचनों की लौकिक दृष्टि स्वतः प्रमाणित हो जाती है। पूज्य साने गुरुजी ने विनोबा के प्रवचनों को शब्दबद्ध किया। मराठी और हिंदी में विनोबा का ‘गीता प्रवचन’ एक अलग किस्म के भाष्य के रूप में, गीता को आत्मसात करने की नई दृष्टि के रूप में इस प्रकार सामने आ सका।
बाबा विनोबा के लिए श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का दर्शन-मात्र नहीं है, वरन् जीवन को जीने की कला है, एक पद्धति है। वे इसी कारण गीता के विविध अध्यायों का विवेचन शास्त्र के स्थान पर लोक के आधार पर करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का नवाँ अध्याय इस कारण उनके लिए विशिष्ट हो जाता है, क्योंकि वे इस अध्याय के माध्यम से जीवन जीने की उस पद्धति को व्याख्यायित करते हैं, जो उनके समय की अनिवार्यता और आवश्यकता थी। वे गीता के नवम अध्याय पर प्रवचन की शुरुआत में ही कहते हैं-
यह अध्याय गीता के मध्य भाग में खड़ा है। सारी महाभारत के मध्य गीता और गीता के मध्य यह नवाँ अध्याय। अनेक कारणों से इस अध्याय को पावनता प्राप्त हो गई है। कहते हैं कि ज्ञानदेव ने जब अंतिम समाधि ली, तो उन्होंने इस अध्याय का जप करते हुये प्राण छोड़ा था। इस अध्याय के स्मरण मात्र से मेरी आँखें छलछलाने लगती हैं और दिल भर आता है। व्यासदेव का यह कितना बड़ा उपकार है, केवल भारतवर्ष पर ही नहीं, सारी मनुष्य-जाति पर उनका यह उपकार है। जो अपूर्व बात भगवान ने अर्जुन को बताई, वह शब्दों द्वारा प्रकट करने योग्य न थी। परंतु दयाभाव से प्रेरित होकर व्यासजी ने इसे संस्कृत भाषा द्वारा प्रकट कर दिया। गुप्त वस्तु को वाणी का रूप दिया। इस अध्याय के आरंभ में भगवान कहते हैं-
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् ।
यह जो राजविद्या है, यह जो अपूर्व वस्तु है, वह प्रत्यक्ष अनुभव करने की है। भगवान उसे ‘प्रत्यक्षावगम’ कहते हैं। शब्दों में न समाने वाली, परंतु प्रत्यक्ष अनुभव की कसौटी पर कसी हुई यह बात इस अध्याय में बतायी गई है। इससे यह बहुत मधुर हो गया है। तुलसीदासजी ने कहा है-
को  जाने को  जैहे  जम-पुर,   को  सुर-पुर  पर-धाम  को ।
तुलसिहि बहुत भलो लागत, जग-जीवन रामगुलाम को ।।
मरने के बाद मिलने वाले स्वर्ग और उसकी कथाओं से यहाँ क्या काम चलेगा? कौन कह सकता है कि स्वर्ग कौन जाता है और यमपुर कौन जाता है? यदि संसार में चार दिन रहना है, तो राम का गुलाम बनकर रहने में ही मुझे आनंद है, ऐसा तुलसीदासजी कहते हैं। राम का गुलाम होकर रहने की मिठास इस अध्याय में है। प्रत्यक्ष इसी देह में, इन्हीं आँखों से अनुभूत होने वाला फल, जीते जी अनुभव की जाने वाली बातें इस अध्याय में बतायी गयी हैं।3
नवम अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए कथनों का ऐसा विश्लेषण अद्भुत है। तुलसी के राम जहाँ मर्यादा और आदर्श के प्रतीक हैं, वहीं विनोबा के राम मानव-मात्र हैं, जीव-मात्र हैं। यह जगत इसी कारण राममय है। मानव साक्षात् परमात्मा की ही मूर्ति है, इसलिए उसकी सेवा, उसकी भक्ति ही सबसे बड़ी है। संसार में जो प्रत्यक्ष है, उसकी सेवा पर हमें एकाग्र होना चाहिए। स्वर्ग, नर्क की कल्पनाओं में उलझकर अपने सांसारिक कर्मों को जटिल, आत्मकेंद्रित और कृत्रिम नहीं बनाना चाहिए। इसके लिए विनोबा बड़ी सहजता के साथ कृष्ण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि- मोक्ष पर केवल मनुष्य का ही अधिकार नहीं, बल्कि पशु-पक्षी का भी है- यह बात श्रीकृष्ण ने साफ कर दी है।4 इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान श्रीकृष्ण ने इसीलिए बताया था। गोवर्धन पर्वत, जो सबके सामने है, प्रत्यक्ष है। जिस पर हमारा जीवन आश्रित है, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। वह वास्तव में परमात्मा का रूप है। इसी तरह गाय-बैल-अश्व और अन्य जीवधारी भी हैं। उनके प्रति समर्पण का भाव, उनके प्रति भक्ति का भाव रखना सीधे परमात्मा की भक्ति है, क्योंकि वे परमात्मा के ही प्रतिरूप हैं।
कौन्तेय ! जो  खाते  हो करते तथा आहुति जो करो ।
दान तप  जो  करो  वह   सब  मुझे  ही  अर्पण करो ।।
शुभ अशुभ जो फल कर्म बंधन यह किये से मुक्त हों ।
कर्म  सब  अर्पण  करो,  मुझसे  मिलो  अरु मुक्त हो ।।5
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में कर्मयोग और भक्तियोग का सुंदर मेल है। कर्मयोग कर्म करने और फल की इच्छा न करने की बात कहता है। भक्तियोग ईश्वर के साथ भावपूर्ण जुड़ाव की बात कहता है। दोनों ही अलग-अलग दिशाओं पर केंद्रित हैं। नवम अध्याय में इन दोनों को इस प्रकार समीप लाया गया है, जोड़ दिया गया है, कि यह राजयोग बन गया है। यह योग गुह्य भी इसी कारण है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रदर्शित कर्मयोग और भक्तियोग का प्रत्यक्ष नहीं रह जाता, गोपनीय हो जाता है। यह जटिल साधना के साथ अंतरात्मा में केंद्रित हो जाता है। यह भक्ति और कर्म के सौंदर्य को आत्म-तत्त्व के सौंदर्य से जोड़कर श्रेष्ठतम बना देता है। बाबा विनोबा ने दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यवहार में इस श्रेष्ठता को प्रतिष्ठापित करने हेतु राजयोग की अत्यंत सामयिक और सुंदर व्याख्या की है। वे लिखते हैं- फल का विनियोग चित्त-शुद्धि के लिए करना चाहिये। जो काम जैसा हो जाय, वैसा ही उसे भगवान को अर्पण कर दो। प्रत्यक्ष क्रिया जैसे-जैसे होती जाय, वैसे-ही-वैसे उसे भगवान को अर्पण करके मनरतुष्टि प्राप्त करते रहना चाहिए। फल को छोड़ना नहीं है, उसे भगवान को अर्पण कर देना है। यह तो क्या, मन में उत्पन्न होने वाली वासनाएँ और काम-क्रोधादि विकार भी परमेश्वर को अर्पण करके छुट्टी पाना है।6 इस प्रकार के भाव के साथ कर्म किया जाए, तो आज के समय की अनेक विकृतियों का शमन किया जा सकता है। भगवान को अर्पित करने के लिए भक्त जिस प्रकार शुद्ध पुष्प, जल, प्रसाद आदि का यत्न करते हैं, उसी प्रकार शुद्ध और सात्विक कर्मों के अर्पण हेतु वे प्रेरित होंगे। कर्म में शुचिता और पवित्रता स्वतः आ जाएगी। शरीर की प्रत्येक इंद्रिय द्वारा किया गया कार्य ईश्वर को अर्पण किया जाना है, यह मन में रखकर कार्य करना ही ‘राजयोग’ है। बाबा विनोबा द्वारा की गई ऐसी व्याख्या अद्भुत और अनुपम है। वे कहते हैं कि अर्पण करने हेतु विशिष्ट क्रिया का आग्रह नहीं है। कर्ममात्र ईश्वर को अर्पित कर देना है।
विनोबा ने सारे जीवन को हरिमय बनाने, अर्थात पावन-पुनीत बनाने का माध्यम राजयोग को ही बताया है। जीवन के हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को, इसकी प्रासंगिकता को वे सरल शब्दों में स्पष्ट करते हैं। वे घर-परिवार से लगाकर समाज तक हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को व्याख्यायित करते हैं। अध्ययन-अध्यापन में राजयोग की महत्ता को विशेष रूप से वे रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि- शिक्षण-शास्त्र में तो इस कल्पना की बड़ी ही आवश्यकता है, लड़के क्या हैं, प्रभु की मूर्तियाँ हैं। गुरु की यह भावना होनी चाहिये कि मैं इन देवताओं की ही सेवा कर रहा हूँ। तब वह लड़कों को ऐसे नहीं झिड़केगा- “चला जा अपने घर। खड़ा रह घंटे भर। हाथ लवाकर। कैसे मैले कपड़े हैं? नाक से कितनी रेंट बह रही है।” बल्कि हलके हाथ से नाक साफ कर देगा, मैले कपड़े धो देगा और फटे कपड़े सीं देगा। यदि शिक्षक ऐसा करे, तो इसका कितना अच्छा परिणाम होगा। मार-पीटकर कहीं अच्छा नतीजा निकाला जा सकता है? लड़कों को भी चाहिये कि वे इसी दिव्य भावना से गुरु को देखें। गुरु शिष्य को हरि मूर्ति और शिष्य गुरु को हरि मूर्ति मानें। परस्पर ऐसी भावना रखकर यदि दोनों व्यवहार करें, तो विद्या तेजस्वी होगी।7
विनोबा का मत है कि ऐसी भावना के साथ जब जीवन में कर्म किये जाएँगे, तब कर्म स्वयं पवित्र हो जाएगा और पाप का भय नहीं रह जाएगा। सब जगह प्रभु विराजमान हैं, ऐसी भावना चित्त में बैठ जाय, तो फिर एक-दूसरे के साथ हम कैसा व्यवहार करें, यह नीतिशास्त्र हमारे अंतःकरण में अपने आप स्फुरने लगेगा।8 ऐसी भावना को कर्म में उतारने के बाद नीतिशास्त्र और व्यवहार-विज्ञान के विशिष्ट अध्ययन की अनिवार्यता नहीं रह जाती है। जब कर्म पवित्र हो जाएगा, तब पाप और पुण्य का अंतर करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी। कर्म स्वतः पुण्यमय और पवित्र हो जाएगा।
इसी आधार पर वे जीवन की सार्थकता को प्रमाणित करते हैं। वे लिखते हैं- गीता में कुल सात सौ ही श्लोक हैं। पर ऐसे भी ग्रंथ हैं, जिनमें दस-दस हजार श्लोक  हैं। किंतु वस्तु का आकार बड़ा होने से उसका उपयोग भी अधिक होगा, ऐसा नहीं कह सकते। देखने की बात यह है कि वस्तु में तेज कितना है, सामर्थ्य कितनी है? जीवन में क्रिया कितनी है, इसका महत्त्व नहीं। ईश्वरार्पण-बुद्धि से यदि एक भी क्रिया की हो, तो वही हमें पूरा अनुभव करा देगी।9 इस प्रकार जीवन में विशिष्ट की प्राप्ति के लिए, मोक्ष के लिए अलग से यत्न करने की, प्रयास करने की बात बाबा विनोबा नहीं करते। वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में, कर्म के किसी भी स्तर पर, किसी भी क्षण पवित्र भावना से कर्म करने और उसे ईश्वर को अर्पित कर देने की क्रिया को ही श्रेष्ठ बताते हैं। वे कहते हैं कि- बोने और फेंक देने में फर्क है। बोया हुआ थोड़ा भी अनंतगुना होकर मिलता है। फेंका हुआ यों ही नष्ट हो जाता है। जो कर्म ईश्वर को अर्पण किया गया है, उसे बोया हुआ समझो। उससे जीवन में अनंत आनंद भर जायगा, अपार पवित्रता छा जायगी।10
भक्तियोग और कर्मयोग के संयोजन से निःसृत राजयोग की सुंदर, सहज और व्यावहारिक व्याख्या करके बाबा विनोबा ने श्रीमद्भगवद्गीता के उस लोकोपयोगी पक्ष को प्रकाश में लाने का कार्य किया है, जिसे जीवन जीते हुए, सरल और सहज साधना के साथ आत्मसात् किया जा सकता है। आज के जीवन में इसकी प्रासंगिकता समाज के निर्माण के लिए, जीवन की शुचिता के लिए, व्यवहार की पवित्रता के लिए, समर्पण और त्याग के साथ संबंधों के निर्वहन के लिए, और सच्चे अर्थों में मोक्ष की प्राप्ति के लिए है।
संदर्भ-
1. श्रीमद्भगवद्गीता, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ. 117,
2. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, प्रस्तावना,
3. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 122-123,
4. वही, पृ. 126,
5. श्रीमद्भगवद्गीता का पद्यानुवाद, गणेश मिश्र ‘बनरा’, साहित्य मंदिर प्रेस, लखनऊ, प्रथम सं. 1937, पृ. 33-34,
6. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 130,
7. वही, पृ. 138
8. वही, पृ. 139,
9. वही, पृ. 141,
10.  वही, पृ. 141 ।
डॉ. राहुल मिश्र
(अखिल भारतीय साहित्य परिषद् व गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के संयुक्त तत्त्वावधान में नई दिल्ली में दिनांक 25-26 मार्च, 2018 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र)

Thursday, 26 October 2017

वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य


वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य

भारतवर्ष की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था धर्मप्रधान रही है और प्रमुख तत्त्व के रूप में भक्ति की व्याप्ति को भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में देखा जा सकता है। भारतीय विद्वानों के साथ ही अनेक विदेशी विद्वानों ने इस तथ्य पर अपनी सहमति दी है। भक्ति के विविध स्वरूपों का, विभिन्न मतों-संप्रदायों का विकास और विस्तार इस धारणा को निरंतर पुष्ट करता रहा है। इसके साथ युगानुरूप चेतना और उपासकों-भक्तों के वैचारिक संघर्षों के साथ मतों-संप्रदायों का उत्थान-पतन भी होता रहा है। ब्रह्मपुराण में एक श्लोक आता है-
ब्रह्मा कृत युगे पूज्यः स्त्रेतायां यज्ञउच्चते।
द्वापरे पूज्यते विष्णुरहं पूज्यश्चतुर्ष्वापि।। (33.20)
इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा का संप्रदाय कृतयुग (सतयुग) में प्रचलित था। त्रेतायुग में वैदिक संप्रदाय अपनी यज्ञप्रधान व्यवस्था के साथ प्रचलित हुआ। द्वापर युग में वैष्णव भक्ति प्रचलित हुई और शिव की पूजा-उपासना प्रत्येक युग में प्रचलित रही है। यह श्लोक भारतीय उपासना-पद्धतियों और मतों-संप्रदायों के विकास-क्रम को भी स्पष्ट करता है। इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा की उपासना सबसे पुरानी थी। आज सगुण एवं निर्गुण उपासना जगत् में ब्रह्मा के नाम कोई संप्रदाय नहीं चलता। शताब्दियों के पहले ही अन्य संप्रदायों ने उसे दबा दिया और ब्रह्मा को अपने संप्रदायों के प्रतिष्ठाताओं की अपेक्षा गौण स्थान प्रदान किया। यह प्राचीन जातियों पर नवागत जातियों के विजय का परिचायक है। ब्रह्मा संप्रदाय भारत का प्राचीनतम संप्रदाय था। वेदपूर्व युग के अवैदिक ब्राह्मण जाति के बीच में यह लोकप्रिय रहता था। अनेक देवताओं तथा संप्रदायों का जन्म इसी से हुआ। अतएव ब्रह्मा के संप्रदाय को संप्रदायों का पिता मानना गलत नहीं होगा। वैदिक धर्म से संघर्ष करके वह परिक्षीण हो गया। शिव के शापवश ब्राह्म के संप्रदाय के लुप्त होने की कथा शैव धर्मावलंबियों के नाशकारी आक्रमण की परिचायक है। जैन, बौद्ध, शैव एवं वैष्णव धर्मों ने उसको आत्मसात् करने में पर्याप्त विजय पाई।1  वैदिक संप्रदाय कर्मकांडों पर आधारित था और वैदिक साहित्य भी ज्ञान-तत्त्व को प्रधानता देता था। इस कारण वैदिक साहित्य यज्ञ और नियम के विधानों में इस तरह उलज्ञा कि उसमें पौरोहित्य की प्रधानता हो गई, जिसने कालांतर में ऐसे विरोध को जन्म दिया, जिसकी परिणति वैष्णव भक्ति के रूप में प्रकट हुई। वैदिक धर्म में वर्णित देव-मंडल में विष्णु को प्रधान स्थान प्राप्त नहीं था, किंतु कालांतर में उपासना-शास्त्र के प्रधान देवता के रूप में विष्णु को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। विष्णु को उपास्य मानकर प्रचलित होने वाले वैष्णव धर्म की व्यापकता के पीछे उसकी धार्मिक, दार्शनिक स्थापनाओं की विशेषता थी और साथ ही समन्वय की अपूर्व भावना भी थी-
किरात  हूणांध्र-पुलिंद  पुल्कसा  आभीर-लङ्का  यवनाश्वशादयः ।
यो न्यै च या या यदुपाश्रया श्रयाः शुद्धन्ति तस्यै प्रभविष्णवे नमः ।।
भारतवर्ष की अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता के नितांत विलक्षण स्वरूप को प्रकाशित करता श्रीमद्भागवत् का यह श्लोक एक ओर भारतवर्ष के गौरवपूर्ण इतिहास का साक्ष्य प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर इसमें विष्णु का आश्रय लेकर ब्राह्मण पौरोहित्यवाद के खिलाफ जन-संघर्ष मुखर होता है। भारत में बाहर से आने वाली अनेक जातियों और धर्मों के आक्रांता स्परूप को परिवर्तित और परिशुद्ध करके आत्मसात् कर लेने की यह प्रवृत्ति ऐतिहासिक और भौगोलिक सीमाओं में अद्भुत है। हूण, यवन, ग्रीक, आंध्र और पुलिंद आदि बाह्य आक्रमणकारी जातियों ने विष्णु की उपासना का आश्रय लिया और विष्णु के नाम से प्रवर्तित वैष्णव धर्म को समृद्ध किया। वैष्णव धर्म के प्रमुख ग्रंथ भागवत में इसी कारण उनका उल्लेख आदरपूर्वक किया गया है। ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी में वैष्णव भक्ति-धारा के आंदोलन के रूप में विकसित होने का प्रमुख कारण जैन और बौद्ध धर्मों का विकास भी माना जा सकता है। इस संदर्भ में भगवतशरण उपाध्याय लिखते हैं- भागवतधर्म को पुष्टि अधिकतर निम्नश्रेणी के लोगों से मिली। इसके पश्चातकाल में तो इसके गुरुओं तक में अधिकतर निम्नवर्गीय अछूत तक हुए। और एक समय तो बौद्ध-धर्म और भागवत-धर्म की सीमायें एक हो गईं, जब बुद्ध, वैष्णवों के अवतार मान लिये गये और उनकी मूर्ति पुरी के विष्णु मंदिर में जगन्नाथ के रूप में स्थापित की गई। आज भी इस मंदिर के प्राचीरों के भीतर वर्णविधान नहीं है और आर्य जाति, निम्नवर्ण, सवर्ण और अछूत तक एक साथ प्रसाद पाते हैं। इन बौद्ध-धर्म और भागवत-धर्म के सम्मिलित प्रहार ने कम से कम परिणाम रूप में ब्राह्मण वर्णव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया। भागवत धर्म में काफी संख्या में विदेशीय विजातीय भी सम्मिलित हुए थे उन्होंने उस धर्म को अपने कंधे दिये। द्वितीय सदी ईस्वी पूर्व के अंत में तक्षशिला के यवन (ग्रीक) राजा अन्तलिखिद ने शुंग वंशीय काशिपुत्र भागभद्र के पास विदिशा के दरबार में हेलियोपोर नाम का अपना ग्रीक राजदूत भेजा था। वह हेलियोपोर वैष्णव हो गया और बेस नगर में विष्णु के नाम पर उसने एक स्तम्भ खड़ा करवाया।2 विष्णु का वामन अवतार भी वैष्णव धर्म के विकास की तीव्र प्रक्रिया और इसके असीमित भौगोलिक विस्तार की विशिष्टता को व्याख्यायित करता है, जिसमें वामन के रूप में तीन पगों में ही सारी धरती को नाप लेने का प्रसंग आता है। ऋग्वेद में वर्णित है-
इदं विष्णुविर्चक्रमे त्रेधानिदधे पदम्। समूलमस्य पांसुरे।। (122-7)
भागवतधर्म के आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत में विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन है। श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध में राम के और दशम स्कंध में कृष्ण के अवतार का वर्णन है। ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व जिस तरह राम को विष्णु का अवतार मान लिया गया था, उसी तरह कृष्ण को भी विष्णु का अवतार मान लिया गया था। इस तरह राम और कृष्ण, दोनों ही भागवत धर्म के प्रमुख आराध्य के रूप में प्रचलित हुए। इतना अवश्य है कि भागवत धर्म में कृष्ण की महत्ता अपेक्षाकृत अधिक प्रतीत होती है। राम का स्वरूप लोकरक्षक के रूप में विकसित हुआ और इस कारण रामकथा ने, रामभक्ति ने वैचारिक गंभीरता और सामाजिक मर्यादा को केंद्र में रखकर विकास किया। वैष्णव धर्म का अंग होने के बावजूद रामभक्ति की धारा अलग तरीके से विकसित हुई और भागवत धर्म या वैष्णव धर्म का प्रसंग उठने पर प्रायः कृष्ण की लीलाओं का वर्णन ही रूढ़ होने लगा।
कृष्ण का लोकरंजक स्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों के लिए अपेक्षाकृत सुगम और सुग्राह्य हुआ। डॉ. भण्डारकर के अनुसार प्राचीनकाल में वैष्णव धर्म, मुख्यतः तीन तत्त्वों के योग से उत्पन्न हुआ था। पहला तत्त्व तो यह विष्णु नाम ही है, जिसका वेद में उल्लेख सूर्य के अर्थ में मिलता है। दूसरा तत्त्व नारायण धर्म का है, जिसका विवरण महाभारत के शान्तिपर्व के नारायणीय उपाख्यान में है। और तीसरा तत्त्व वासुदेव मत का है। यह वासुदेव मत वसुदेव नामक एक ऐतिहासिक पुरुष (समय 600 ई.) के इर्द-गिर्द विकसित हुआ था। इन्हीं तीनों तत्त्वों ने एक होकर वैष्णव धर्म को उत्पन्न किया। लेकिन, उसमें कृष्ण के ग्वाल रूप की कल्पना और राधा के साथ उनके प्रेम की कथा बाद में आयी और ये कथाएँ, शायद, आर्येतर जातियों में प्रचलित थीं।3 इस तरह वैष्णव धर्म वैदिक और अवैदिक विचारधाराओं के संघर्ष के फलस्वरूप विकसित हुआ और इसमें कृष्ण के ग्वाल रूप, कृष्ण का श्याम वर्ण, उनके नृत्य-गायन और उनकी रासलीलाएँ उत्तर और दक्षिण के समन्वय के रूप में देखी जा सकतीं हैं। दक्षिण के तिरुमाल या मायोन या कन्नन, उनकी प्रिया नाम्पिन्ने को राधा और कृष्ण के रूप में देखा जा सकता है। दक्षिण भारत में दूसरी-तीसरी शताब्दी से प्रचलित भक्ति-विषयक कविताएँ पाण्डित्य के स्तर पर प्रभावशाली न होते हुए भी आम जनता में भक्ति की धारणा को पुष्ट करने में समर्थ थीं। इन कविताओं का संपादन सर्वप्रथम आलवार कवि नाथमुनि ने किया और यह संग्रह प्रबंधम् के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विष्णु के लोकप्रचलित अवतारों के प्रति आस्था, कर्म के प्रति निष्ठा, सादगी, सहजता, सरलता, समन्वय, समर्पण और निष्काम भक्ति के सुगम संस्करण को पूर्णता के साथ पाने हेतु प्रबंधम् अपेक्षाकृत सफल सिद्ध हुआ होगा, जिसके कारण भक्ति की अविरल धारा का प्रवाह दक्षिण में बहा, जिसमें आलवार संतों-भक्तों का योगदान अविस्मरणीय है। प्रत्येक आलवार का समय निश्चित करने में मतभेद अवश्य है। परन्तु, इस बात पर प्रायः सभी लोग सहमत हैं कि ये बारह विशिष्ट आलवार ईसा की तीसरी सदी से लेकर नवीं सदी तक के बीच हुए हैं। अतएव, यह बात पूर्ण रूप से निश्चित है कि प्रपत्ति, शरणागति, आत्म-समर्पण और एकान्तनिष्ठा से विभूषित भक्ति का सम्यक् विकास और प्रचार आलवारों के साहित्य द्वारा नवीं सदी के पूर्व ही संपन्न हो चुका था तथा उस समय तक दक्षिण की जनता भक्ति से, पूर्णतः, विभोर भी होने लगी थी।4 उत्तर में फैले हुए वेद-विरोधी आंदोलनों के कारण हिंदुत्व का शुद्ध रूप खिसककर दक्षिण चला गया था। यही कारण है कि जिन दिनों उत्तर भारत के बौद्ध-सिद्ध धर्म के बाह्योपचारों की खिल्ली उड़ा रहे थे, उन्हीं दिनों दक्षिण के आलवार और नायनार संत शिव और विष्णु के प्रेम में पागल हो रहे थे।5
बौद्ध-सिद्ध-नाथ परंपराओं के साथ संघर्ष की प्रवृत्ति कालांतर में स्थानांतरित होकर विदेशों से आगत धर्म के साथ स्थापित हुई, फलस्वरूप एक नए आंदोलन का सूत्रपात हुआ। भारत की पुरातन भक्ति-परंपरा के संघर्ष के कालखंड से लेकर नवागत इस्लाम के साथ संघर्ष के कालखंड में दक्षिण भारत का अपना योगदान रहा। आठवीं शती से लेकर सोलहवीं शती तक भारतीय धर्म और दर्शन के क्षेत्र में जिन महानुभावों ने कार्य किया, उनमें बहुसंख्यक का आविर्भाव दक्षिण में ही हुआ था; यथा- शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्क, माध्व, सायण, बल्लभ आदि। इन मनीषियों ने परंपरागत धर्म एवं दर्शन की नयी-नयी व्याख्याएँ प्रस्तुत करके समस्त भारत की हिंदू जनता को धार्मिक नेतृत्व प्रदान किया।6 समस्त भारतवर्ष में भक्ति-आंदोलन के प्रणेता के रूप में दक्षिण के आलवार और नायन्मार कवियों-संतों के पूर्ववर्ती और परवर्ती अनेक भक्त आचार्यों, संतों, कवियों ने अनेक मतों- पंथों-संप्रदायों को वैचारिक आधार देकर स्थापित किया। दक्षिण भारत में प्रायः 600 ई. के आसपास विकसित हुए आंदोलन के उत्तर भारतीय संस्करण और उसके पूर्वापर संबंधों में विभिन्न मतों-पंथों-संप्रदायों को देखा जा सकता है। इनमें से प्रत्येक नवीन विचारधारा या संप्रदाय की उत्पत्ति पूर्ववर्ती या समकालीन संप्रदाय के विरोध और संप्रदाय-विशेष के अनुयायियों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर आधारित होती थी। सुधारवादी संतों के देहावसान के बाद उनके शिष्य अपने गुरू की पूजा शुरू करते थे और उनके नाम से नया पंथ चला देते थे।7 इस प्रकार अनेक विद्वान आचार्यों और संप्रदायों की विस्तृत परंपरा को देखा जा सकता है। उनकी उत्पत्ति और विकास के क्रम का प्रवाह तमिल-तेलगू-कन्नड़-मलयालम और फिर मराठी भाषाओं के क्षेत्रों से होता हुआ हिंदीभाषी क्षेत्रों तक पहुँचा। इनके विकास-क्रम में आने वाला वारकरी संप्रदाय अपनी विशिष्टता के कारण न केवल महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, वरन् इस संप्रदाय में भक्ति आंदोलन के दोनों सोपानों के वैशिष्ट्य-विकास के व्यवस्थित क्रम को भी देखा जा सकता है।
वारकरी संप्रदाय के आराध्य देव विट्ठल या विठोबा और रुक्मिणी या रखुमाई की आराधना महाराष्ट्र में अत्यंत प्राचीन है। दक्षिण में जब आर्यों का प्रवेश हुआ, तब यहाँ के मूल आदिवासियों के प्रमुख उपास्य का भी आर्यीकरण अवश्य हुआ होगा। इसी समन्वयीकरण के ही कार्यस्वरूप पंढरपुर के विठोबा-विट्टल-विष्णु के बालरूप माने गये और अवतार भी समझे गये।8 पंढरपुर के विट्ठल के साथ भक्त पुंडलीक की कथा भी प्रचलित है। भक्त पुंडलीक को ऐतिहासिक माना जाए, या काल्पनिक माना जाए, इसे लेकर विद्वानों के बीच मतभेद भले ही हो, मगर लोक-धारा में भक्त पुंडलीक की मातृ-पितृभक्ति प्रसिद्ध है। वे विठोबा का वरदान पाने से ज्यादा जरूरी अपने माता-पिता की सेवा मानते हैं।9 पुंडलीक की कर्मठता और माता-पिता के प्रति उनकी भक्ति-भावना को देखकर वरदान देने आए विठोबा को पुंडलीक ने रुकने के लिए कहा, तो विठोबा ने पूछा कि मैं कहाँ पर आसन ग्रहण करूँ? इस पर पुंडलीक ने एक ईंट उनकी ओर फेंककर उसपर बैठने को कहा। जब पुंडलीक विठोबा के पास आए, तब पुंडलीक ने वरदान माँगा कि इसी रूप में वे अपने भक्तों को दर्शन देते रहें, तब से पुंडलीक की फेंकी ईंट पर विठोबा अपने दोनों हाथ कमर में रखे हुए खड़े हैं। देवशयनी एकादशी में विठोबा (विट्ठल) अपने शयन के लिए नहीं जाते और अपने भक्तों के लिए अनेकानेक वर्षों से इसी प्रकार खड़े हुए हैं। विठोबा का यह स्वरूप लोकदेवता का है, जिसने भाषा-भूषा-जाति-पंथ के भेद को मिटा दिया। विठोबा को पंडरगे, पंढरीनाथ, पांडुरंग और विठाई माउली आदि नामों से भी जाना जाता है।10 इसी विट्ठल देवता को अपनी भक्ति में रँगकर प्रस्तुत करते हुए अनेक भक्त कवियों ने अपनी-अपनी मानसिकता के अनुसार अलग-अलग रूप दिया। अनेक कहानियों, प्रसंगों, घटनाओं का काव्यात्मक सृजन किया। महिलाओं ने विट्ठल को अपनी भावना में रँगकर अपने निकट देखा, मानवीय रूप दिया। विट्ठल और रखुमाई के प्रेम-प्रसंगों को लेकर अपने मन की अनेक मधुर कल्पनाओं को चित्रमय अभिव्यक्ति दी। कुछ ऐसी रचना भी मिलती हैं, जहाँ विट्ठल-रखुमाई के साथ जनाबाई को जोड़कर प्रेम-त्रिकोण की परिकल्पनाएँ की गयी हैं। सारांश विट्ठल सामान्य जनता का भावनात्मक आलंबन दैवत था। इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है, भारत में जनता विशिष्ट देवता का एकांतिक समर्थन या विरोध नहीं करती। अपनी रुचियों, प्रवृत्तियों, स्वप्नों, विचारों, उद्देश्यों के अनुसार देवता की मूर्ति और जीवन को ढालती है, अपने मिथकों की सर्जना करती है। ‘विट्ठल’ यही वह मूर्ति है। परिणामतः सभी प्रकार की समभावना को यहाँ स्थान है। दुर्गा भागवत जी ने तो विट्ठल को महाराष्ट्र, आंध्र, कर्नाटक की एकात्म संस्कृति का प्रतीक माना है।11 इस परंपरा की प्राचीनता को खोजना असंभव की हद तक कठिन कार्य है। भक्त पुंडलीक के सदृश्य भक्ति को धारण करते हुए अपने आराध्य के प्रति अपने समर्पण को प्रकट करने के लिए गले में तुलसी की माला धारण करने वाले भक्त-समाज को मालकरी संप्रदाय का नाम कब मिला और कालांतर में विट्ठल के दर्शन के लिए भक्त समूहों की वारी (यात्रा) की परंपरा को वारकरी संप्रदाय कब कहा जाने लगा, इसके विषय में विद्वानों ने अपने अनुमान के आधार पर भले ही काल-निर्धारण करने की कोशिश की हो, मगर वारकरी संप्रदाय के नाम से प्रसिद्धि पाने वाली यह भक्ति-धारा, जिसका संबंध पंढरपुर के विठोबा से जुड़ता है, उसने भक्ति आंदोलन में अपने अनूठे स्वरूप का सर्जन किया है।
डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर अपने शोध-ग्रंथ में उद्धृत करते हैं कि- वारकरी संप्रदाय अपने उत्पादकों के नाम से नहीं चला है। वैदिक धर्म के विरुद्ध आवाज इस संप्रदाय ने नहीं उठाई, वरन् उसके तत्त्वों से ही मानवी समता भूमि पर समन्वय करते हुए इस संप्रदाय ने अपना विकास किया है।12 ये तथ्य प्रमाणित करते हैं कि वारकरी संप्रदाय वैदिक धर्म के विरोध के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले भक्ति आंदोलन के प्रभाव से उत्पन्न नहीं हुआ, वरन् अपने प्राचीनतम स्वरूप को समयानुकूल परिवर्तित करते हुए विकसित हुआ है। यह तथ्य ब्रह्म संप्रदाय के साथ इस संप्रदाय के केंद्र पंढरपुर की समकालीनता को भी सिद्ध करता है।
संत ज्ञानेश्वर या ज्ञानदेव ने वारकरी संप्रदाय के तात्विक और दार्शनिक आधार को तैयार करने का काम किया। उन्होंने लोक-प्रचलित भाषा में ज्ञानेश्वरी गीता और अमृतानुभव आदि ग्रंथों का सृजन किया। नामदेव ने अपने अभंग पदो के माध्यम से वारकरी संप्रदाय की लोकप्रियता का विस्तार पंजाब तक किया। नामदेव के साथ ही सांवता माली, जनाबाई, रोहीदास चर्मकार, चोखा महार और नरहरि सोनार आदि भी इस संप्रदाय के विकास में सहायक हुए। ज्ञानदेव के भाई निवृत्तिनाथ, सोपाननाथ और बहन मुक्ताबाई ने वारकरी संप्रदाय के विकास में योगदान दिया। संत भानुदास ने विजयनगर से विट्ठल की मूर्ति वापस लाकर पंढरपुर में मंदिर का भव्य निर्माण करवाया। एकनाथ ने वाराणसी में एकनाथी भागवत का सृजन करके ज्ञान के साथ ही कीर्तन-भजन के माध्यम से भक्ति के सहज स्वरूप को विकसित किया। संत तुकाराम ने अभंग पदों की रचना और उनके संकीर्तन के प्रसार के साथ वारकरी संप्रदाय को समृद्ध किया। इसी तरह निळोबा ने भी विठोबा की भक्ति का प्रसार किया। इनके साथ ही वारकरी संप्रदाय की समन्वय भावना से प्रभावित होकर कीर्तन करनेवाले मुस्लिम कीर्तनिए भी इस संप्रदाय के साथ में आए और यह परंपरा आज भी देखी जा सकती है।13 इस वारकरी पंथ में निम्न जातियों के संतों को भी उनकी साधना के आधार पर सम्मान का स्थान मिला है। इसीलिए नामदेव को खेचर को गुरु मानने में संकोच नहीं हुआ। ज्ञानेश्वर के सखा, सहचर, मित्र, बंधु नामदेव के आत्मीय जनों का परिदृश्य देखने पर पता चलता है कि मध्ययुग में एक महान ‘संत जाति’ निर्मित हो रही थी, जो शूद्र जातिभेदों से ऊपर उठकर श्रद्धेय गं.भा. सरदार के शब्दों से ‘अध्यात्मनिष्ठ मानवतावाद’ का प्रभावपूर्ण आलोक वितरित कर रही थी।14  
उत्तर भारत में भक्ति-आंदोलन का स्वरूप प्रायः दार्शनिक विवेचनों और सांप्रदायिक कट्टरता पर आधारित रहा, साथ ही संतों की अलग-अलग गद्दियों, आचार्यों की विविध मान्यताओं के निर्माण ने ऐसी व्यापकता का सृजन किया, जिसे सरलता के साथ वर्गीकृत कर देना हिंदी साहित्येतिहास के आचार्यों के लिए सुलभ हुआ। जिस समय उत्तर भारत में महिलाओं को साधना में बाधक समझा जा रहा था, मीरां को विष दिया जा रहा था, उस समय मुक्ताबाई और जनाबाई आदि की प्रेरणा से महिलाएँ भी वारकरी की वारी में खुलकर भागीदारी कर रही थीं। जिस समय उत्तर भारत में सगुण-निर्गुण और रामभक्ति-कृष्णभक्ति के दायरे बँध रहे थे, उस समय भी वारकरी संप्रदाय के संत इन सबके समन्वय के लिए समग्र निष्ठा के साथ लगे हुए थे। सगुण और निर्गुण की कट्टरता उत्तर भारत में इतनी ज्यादा थी कि गोस्वामी तुलसीदास को ‘सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा’ कहकर स्थिति को संभालने का प्रयास करना पड़ा। वारकरी पंथ समन्वय का अद्भुत रूप है। विविध हिंदू जातियों, लोक समुदायों के आराध्य दैवतों का समन्वित रूप वारकरी पंथ का आराध्य दैवत है- विट्ठल। गोप, मछुवारे, धनगर इत्यादि निम्न जात के लोगों ने भी विट्ठल में अपने दैवत को देखा और शिवभक्तों ने शिव का रूप भी। नामसंकीर्तन की महत्ता को व्यक्त करते समय ज्ञानेश्वर ने लिखा है- ‘कृष्ण-विष्णु-हरि-गोविंद । एयां नामांचे निखिल प्रबंध.’ अर्थात् कृष्ण, विष्णु, हरि या गोविंद किसी भी नाम से देवता का संकीर्तन किया जा सकता है।15 पंढरपुर को दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है, जिससे यहाँ पर शैव संप्रदाय के साथ संबंधों को समझा जा सकता है।
उपासनाभेद का आश्रय लेकर उत्तर भारत में विकसित हुई भक्ति-धारा में ‘संत’ की उपाधि निर्गुण धारा के लिए रूढ़ हो गई, जबकि महाराष्ट्र में ‘संत’ की उपाधि सज्जन और निष्काम-समर्पित भक्ति की धारा में डूब जाने वालों के लिए थी। इसी आधार पर ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ आदि को जनसामान्य ने ‘संत’ की उपाधि से विभूषित किया। ‘संत’ की उपाधि के कारण उत्तर भारतीय भक्ति परंपरा में इनका वर्गीकरण भी कर दिया गया, जिसे वारकरी संप्रदाय की परंपरा और उसकी जीवंत-जागृत चेतना के आधार पर तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है। वैष्णव धारा के प्रमुख ग्रंथ के रूप में मान्य गीता को वैदिक आडंबरों और पौरोहित्य के विरुद्ध संघर्ष का, विरोध का काव्य भी माना जाता है।15 गीता की टीका के रूप में ज्ञानेश्वर द्वारा लिखी गई ज्ञानेश्वरी गीता में किसी का विरोध नहीं, बल्कि लोकभाषा में रचित यह काव्य-ग्रंथ समाज को एकजुट करने और नीति का मार्ग दिखाने में अप्रतिम सिद्ध हुआ है। इस ग्रंथ के प्रणयन के माध्यम से संत ज्ञानेश्वर ने जीवन की ओर देखने, जीवन को सफल-सार्थक बनाने की सीख दी है। संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी, संत एकनाथ की एकनाथी भागवत और संत तुकाराम की गाथा को वारकरी संप्रदाय की प्रस्थानत्रयी के रूप में देखा जा सकता है, जिनमें किसी के विरोध के स्थान पर सकारात्मक भाव की प्रधानता है, इसी कारण वारकरी संप्रदाय में किसी भी मत-संप्रदाय-विचारधारा और यहाँ तक कि धर्मों के समन्वय को देखा जा सकता है। सभी धर्मों-मतों-पंथों की मूल भावना के समग्र रूप को, विराट के साथ एकाकार होने के भाव को इसी कारण वारकरी संप्रदाय में देखा जा सकता है। वारकरी संप्रदाय की यह विशिष्टता अद्भुत है। इसके साथ ही वारकरी संप्रदाय की एक अन्य विशिष्टता को रेखांकित करना अनिवार्य हो जाता है। मालकरी भक्त गले में तुलसी की माला धारण करते थे और अपने-अपने स्तर पर पूजा-उपासना करते थे। परवर्ती वारकरी भक्तों ने भक्ति के सामाजिक संस्करण को तैयार किया और इस तरह दूर-दराज से चलने वाली कीर्तन मंडलियों के माध्यम से आत्मानंद के सागर में डूबते-तिरते भक्तों ने सामाजिक जीवन, सहकार, संगठन और सामाजिक एकीकरण की ऐसी भावना का विकास किया, जिसे अन्यत्र खोजना संभव नहीं है।
समग्रतः, महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय को विशिष्टताओं के उस पुंज के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें पुरातन भक्ति और उपासना के समस्त संप्रदायों, पद्धतियों, विशेषताओं की ज्योति प्रज्ज्वलित होती है। वारकरी संप्रदाय को परंपरा के क्रम में सीधे उस विधान से जोड़ा जा सकता है, जिसमें मानव-सभ्यता के विकास के साथ आराध्य और आराधक के, उपास्य और उपासक के संबंधों की उत्पत्ति हुई, विकास हुआ। सगुण और निर्गुण के समन्वय के साथ ही जैन-बौद्ध मतों का समन्वय भी पंढरपुर में देखा जा सकता है, कुछ विद्वानों ने अपने शोधों में ऐसा सिद्ध किया है। वारकरी संप्रदाय की इस विशेषता के पीछे भी लोकदेवता विट्ठल की भूमिका को देखा जा सकता है। मतों और संप्रदायों के आपसी विभेदों और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयासों में भक्ति के वास्तविक स्वरूप को भुला देने वाली मान्यताओं के लिए, विद्वान आचार्यों के लिए वारकरी संप्रदाय ने एक दिशा देने का काम किया, संभवतः इसी कारण विठोबा और उनके भक्तों के बीच का संबंध युगों-युगों की यात्रा करके आज भी समन्वय, सौहार्द और अद्धितीय भक्ति-भावना को जीवंत किए हुए है। समूचा पंढरपुर आज भी विट्ठल-विट्ठल के गजर से भरा है। आज भी पताकाओं को लिए हुए भक्तों की टोलियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। हरिकीर्तनों की धूम वहाँ पर मची रहती है और वहाँ चोखा (महार होकर भी) गले लग जाता है।                                    
विट्ठल विट्ठल गजरी । अवधी दुमदुमली पंढरी
होतो नामाचा गजर । दिंहयापताकांचे भार
निवृत्ति ज्ञानदेव सोपान । अपार वैष्णव ते जन
हरिकीर्तनाथो दाटी । तेथे चोखा घानली मिठो ।
संदर्भ-
1. उपासना प्रणालियों तथा भक्ति संप्रदायों का विकास, भक्ति-आंदोलन और साहित्य, डॉ. एम जॉर्ज, प्रगति प्रकाशन, आगरा, प्रथम सं. 1978, पृ. 139,
2. भारतीय चिन्तन की द्वन्द्वात्मक प्रगति, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, जनवाणी प्रेस एण्ड पब्लिकेशनस् लि., बनारस, प्रथम सं. 1950, पृ. 54-55,
3. आर्य और आर्येतर संस्कृतियों का मिलन, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 98,
4. भक्ति आन्दोलन और इस्लाम, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 377,
5. इस्लाम का हिंदुत्व पर प्रभाव, संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल, राजेंद्रनगर, पटना, प्रथम सं. 1956, पृ. 366,
6. पौराणिक भक्ति आंदोलन : सामान्य पृष्ठभूमि, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास- प्रथम खंड, डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 179,
7. उपासना प्रणालियों तथा भक्ति संप्रदायों का विकास, भक्ति-आंदोलन और साहित्य, डॉ. एम जॉर्ज, प्रगति प्रकाशन, आगरा, प्रथम सं. 1978, पृ. 137-138,
8. वैष्णव धर्म और दर्शन का क्रमिक विकास, हिंदी एवं मराठी के वैष्णव संत साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा,1968, पृ. 67,
11. मराठी कविता में सर्वधर्म समभाव, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 27,
12. वैष्णव मतों की विभिन्न शाखाएँ संप्रदाय और उनका हिंदी मराठी क्षेत्र में क्रमिक विकास, हिंदी एवं मराठी के वैष्णव संत साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ. नरहरि चिन्तामणि जोगलेकर, जवाहर पुस्तकालय, मथुरा,1968, पृ. 133,
13. मध्यकालीन हिंदी मराठी के संत कवि, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 12,
14. वही, पृ. 12,
15. मराठी कविता में सर्वधर्म समभाव, मराठी साहित्य : परिदृश्य, चंद्रकांत म. बांदिवडेकर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 1997, पृ. 27,
16. गीता-दर्शन अथवा संघर्ष, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, जनवाणी प्रेस एण्ड पब्लिकेशंस लि., बनारस, प्रथम सं. 1950, पृ. 27-40 ।

{लालबहादुर शास्त्री कॉलेज आफ आर्ट्स, सायंस एंड कॉमर्स, सतारा (महाराष्ट्र) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र एवं तन्वी प्रकाशन, 857,ब, शनिवार पेठ, सातारा (महाराष्ट्र) द्वारा प्रकाशित (ISBN 978-81-934308-5-9), संपादक- डॉ. भरत सगरे, सहसंपादक- डॉ. विट्ठल नाईक}