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Tuesday, 11 December 2018

लोसर : परंपरा और संस्कृति का पर्व



लोसर : परंपरा और संस्कृति का पर्व

लदाख अंचल को उसकी अनूठी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जाना जाता है। लदाख के बारे में ह्वेनसांग, हेरोडोट्स, नोचुर्स, मेगस्थनीज, प्लीनी और टॉलमी जैसे यात्रियों ने बताया है। इससे लदाख के अतीत का पता चलता है। किसी भी क्षेत्र के अतीत का पता इतिहास की किताबों और इतिहासकारों से चलता है। लेकिन किसी क्षेत्र के समाज, संस्कृति और वहाँ के लोगों के जीवन की जानकारी उस क्षेत्र के रीति-रिवाजों और तीज-त्योंहारों से मिलती है। लदाख अंचल की अनूठी संस्कृति, यहाँ के लोगों के विचार और समाज का जीवन लदाख के त्योहारों में दिखाई देता है। लदाख अंचल के प्रमुख त्योहारों में बुद्ध पूर्णिमा और लोसर का नाम आता है। इनमें बुद्ध पूर्णिमा धार्मिक त्योहार होता है। इसमें खास तौर पर पूजा-पाठ होते हैं, जबकि लोसर का त्योहार धार्मिक भी होता है, और सामाजिक भी होता है। इस कारण लोसर के त्योहार में लदाख अंचल के साथ ही सारे हिमालयी परिक्षेत्र के समाज, यहाँ की संस्कृति, प्राचीनता और परंपरा की झलक देखने को मिलती है।
 लदाख अंचल के लिए लोसर का त्योहार बहुत खास होता है, क्योंकि सर्दियाँ शुरू होने के साथ ही यह त्योहार लोगों में नई जिंदगी की रौनक बिखेर देता है। गर्मियों में पर्यटकों से गुलज़ार रहने वाले लदाख में ठंढक के आगमन के साथ ही जीवन बदल-सा जाता है। क्या सर्दियों के आने पर लदाख उदासियाँ ओढ़ लेता है? शायद नहीं। क्योंकि लदाख का नववर्ष सर्दियों की शुरुआत के साथ ही नए जोश को लेकर उपस्थित हो जाता है। लदाख के नववर्ष को ही लोसर कहा जाता है। लोसर भोट भाषा के दो शब्दों- ‘लो’ और ‘त्सर’ से मिलकर बना है। ‘लो’ का अर्थ होता है- वर्ष, और ‘त्सर’ का अर्थ होता है- नया। इस तरह से ज्योतिषीय गणना के अनुसार नए वर्ष का त्योहार ही लोसर कहलाता है।
वैसे तो लोसर का मुख्य पर्व भोट पंचांग के हिसाब से ग्यारहवें महीने की अमावस्या को मनाया जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत दसवें महीने में ही हो जाती है। भोट पंचांग के अनुसार दसवें महीने की पंद्रहवीं तिथि से धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ की शुरुआत हो जाती है, जो ग्यारहवें महीने की पाँचवी तिथि तक चलती रहती है। दसवें महीने की पंद्रहवीं तिथि को होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में खास तौर पर विनय के नियमों या सूत्रों का पाठ होता है। इस दिन को विद्वान भिक्षु और महान सिद्ध ग्यालवा लोजंग टकस्पा के स्मृति-दिवस के रूप में भी जाना जाता है। दसवें माह की पच्चीसवीं तिथि को गलदेन ङाछोद का पर्व होता है। यह भी लोसर का पूर्वानुष्ठान होता है। इस तिथि को महासिद्ध चोंखापा की जन्मजयंती और परिनिर्वाण तिथि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महासिद्ध आचार्य चोंखापा को याद करते हुए गोनपाओं में पैंतीस बुद्धों की पूजा की जाती है। भिक्षुगणों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही लोग अपने-अपने घरों में दीपक जलाकर खुशियाँ मनाते हैं। इस दिन छोरतेन, यानि स्तूपों में भी दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है, कि जिस तरह महासिद्ध चोंखापा ने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता के अँधेरों को दूर किया था, उसी तरह लोगों के जीवन में ज्ञान का उजाला फैले, समाज से अज्ञानता दूर हो, बुरी शक्तियाँ दूर हों और सभी का जीवन खुशहाल हो।
लोसर में सबसे ज्यादा रोचक और मजेदार आयोजन दसवें माह की उन्तीसवीं तिथि  होता है। इस दिन ‘गु-थुग’ बनाया जाता है। ‘गु-थुग’ एक खास किस्म का व्यंजन होता है, जो लोसर के त्योहार में ही में बनता है। यह थुग्पा जैसा ही होता है, लेकिन इसकी खासियत इसमें पड़ने वाली चीजों के कारण होती है। भोट भाषा में ‘गु’ का अर्थ होता है- नौ। लोसर के पर्व पर बनने वाले थुग्पा में नौ चीजें डाली जाती हैं, इसी कारण इस व्यंजन को ‘गु-थुग’ कहा जाता है । इसमें सने हुए आटे की लोइयों के बीच में कोयला, मिर्च, नमक, चीनी, रुई, अँगूठी, कागज और सूर्य तथा चंद्रमा की आकृतियाँ आदि नौ चीजों को अलग-अलग भरकर थुग्पा में डाला जाता है। आग में पक जाने के बाद ‘गु-थुग’ को सभी के बीच में बाँटते हैं। खाने से पहले सभी लोग देखते हैं, कि उनके हिस्से में कौन-सी चीज आई है। अलग-अलग लोगों के हिस्से में आने वाली चीजों के मुताबिक व्यक्ति के स्वभाव और गुण के बारे में बताया जाता है। अगर किसी व्यक्ति के हिस्से में कोयला आता है, तो यह माना जाता है कि उसका मन काला है, उसके विचार गंदे हैं। जिस व्यक्ति के हिस्से में मिर्च आती है, उसे कड़वा बोलने वाला या कटुभाषी माना जाता है। रुई पाने वाला सात्विक और सरल स्वभाव का होता है। कागज पाने वाला धार्मिक, सूर्य की आकृति पाने वाला यशस्वी, चंद्रमा की आकृति पाने वाला सुंदर और अँगूठी पाने वाला कंजूस माना जाता है। जिस व्यक्ति के हिस्से में अच्छी चीज आती है, उसे सम्मान मिलता है। जिसके हिस्से में बुरी वस्तु आती है, उसे अपमानित होना पड़ता है। इस तरह लोसर के त्योहार में वर्षभर के कामों का ब्यौरा निकलकर आ जाता है। वैसे तो यह मनोरंजन के लिए ही होता है, लेकिन इसके पीछे यह संदेश छिपा होता है, कि साल-भर अच्छे काम ही करने चाहिए, नहीं तो सबके सामने अपमानित होना पड़ेगा। इससे अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
इसके अगले दिन, यानि दसवें माह की तीसवीं तिथि या अमावस्या को लोग सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से मृतकों या पितृदेवताओं के लिए भोजन लेकर उनके समाधि-स्थल पर जाते हैं। शाम के समय गोनपाओं, छोरतेनों और घरों में दीप जलाए जाते हैं। अमावस्या की रात को जगमगाते दीपकों के बीच लदाख की धरती जगमगा उठती है। इसी दिन शाम के समय हरएक घर से मशाल या ‘मे-तो’ निकाले जाते हैं, जिन्हें लेकर लोग पूरे गाँव या मोहल्ले में घूमते हैं। इन्हें घुमाते हुए लोग आवाज लगाते जाते हैं, कि सारी बुराइयाँ, सारी बुरी और नकारात्मक शक्तियाँ यहाँ से चली जाएँ। ग्यारहवें मास की प्रतिपदा को, अर्थात् पहली तिथि को लोग नए-नए कपड़े पहनकर अपने-अपने इष्टदेव की पूजा करते हैं। सगे-संबंधी और परिचित-मित्र एक-दूसरे के घर शुभकामनाएँ देने जाते हैं। इस मौके में नवविवाहिताएँ भी अपने घर जाकर बड़ों के चरण छूकर प्रणाम करती हैं। इस दिन साल भर पकवान खिलाने वाले चूल्हे को भी प्रणाम किया जाता है, और पूजा की जाती है। लोसर के पर्व पर बच्चों को नए-नए कपड़े मिलते हैं और सभी लोग अपने परिजनों, मित्रों को उपहार भी देते हैं।
ग्यारहवें मास की द्वितीया को, अर्थात् दूसरी तिथि को पङोन, यानि महाभोज का आयोजन होता है, जिसमें सभी लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते हैं। इस मौके पर स्त्रियों और पुरुषों के बीच छङ-लू नामक प्रतियोगिता होती है। इस मौके पर भक्तिभाव और वीरता के लोकगीत गाए जाते हैं। लोकगीतों द्वारा उन सैनिकों को भी शुभकामनाएँ दी जाती हैं, जो लोसर के त्योहार में अपने घर नहीं पहुँच पाते हैं। लदाख की धरती वीरों की धरती मानी जाती है। आज भी यहाँ के तमाम सैनिक देश की सेवा में लगे हुए हैं। इन वीरों का उत्साह बढ़ाने के लिए ही वीर रस से भरे हुए लोकगीत गाए जाते हैं। इसके पीछे एक ऐतिहासिक घटना भी नज़र आती है।
ऐसा माना जाता है, कि लदाख में लोसर का पर्व तिब्बती पंचांग के अनुसार ही मनाया जाता था, मगर लदाख के प्रतापी शासक राजा जमयङ नमग्याल के साथ जुड़ी एक घटना के कारण लोसर का पर्व तिब्बती लोसर से एक महीने पहले मनाया जाने लगा। मान्यता है, कि सोलहवीं शती. में राजा जमयङ नमग्याल के शासक बनते ही बल्तिस्तान में विद्रोह हो गया। यह घटना लोसर के एक महीने पहले की थी।  ऐसी संभावना थी कि लोसर के पहले युद्ध समाप्त नहीं हो पाएगा। इस कारण राजा जमयङ नमग्याल ने युद्ध में जाने से पहले ही लोसर मनाने की घोषणा कर दी। इस तरह भोट पंचांग के अनुसार दसवें महीने से ही लोसर पर्व के आयोजन की परंपरा चल पड़ी और आज भी इस परंपरा को देखा जा सकता है। उस समय युद्ध में जाने वाले वीर सैनिकों के अंदर जोश भरने के लिए वीरतापूर्ण लोकगीत गाये गए होंगे। आज लोसर में वीर-गीतों को गाने के रिवाज के पीछे भी यही कारण देखा जा सकता है।
ऐसा भी माना जाता है, कि लदाख के ठंढे मौसम और यहाँ की कृषि-व्यवस्था के कारण लोसर पर्व की तिथियों में अंतर है। लदाख में एक फसल ही पैदा होती है और खेती-किसानी का सारा काम अक्टूबर महीने तक पूरा हो जाता है। नवंबर के समाप्त होते-होते नई फसल का अनाज भी घर पहुँच जाता है। नया सत्तू और आटा भी तैयार हो जाता है। इस तरह लोसर में पूजा-पाठ के लिए नई फसल से सामग्री भी तैयार हो जाती है, और काम-काज की व्यस्तता भी नहीं रहती। इस कारण लोसर पर्व का उत्साह दुगुना हो जाता है। कारण चाहे जो भी हों, मगर ठंढक की दस्तक के साथ ही उल्लास और उमंग से भरा यह पर्व पुरातनकाल से ही लदाख अंचल की अपनी विशिष्ट पहचान को, अपनी अनूठी परंपराओं को सँजोए हुए है।
लदाख अंचल भौगोलिक रूप से जितना बड़ा है, उतनी ही विविधताएँ भी यहाँ पर देखी जा सकती हैं। नुबरा, चङथङ, जङ्स्कर और शम आदि क्षेत्रों में लोसर पर्व के साथ जुड़ी लोकपरंपराओं के अलग-अलग रंग देखे जा सकते हैं। इन लोकपरंपराओं में बहुत रोचक है, यहाँ की स्वाँग की परंपरा। प्राचीनकाल में स्वाँग की परंपरा सारे लदाख में अलग-अलग तरीके से मनाई जाती थी, मगर आधुनिक जीवन-शैली के कारण यह परंपरा लदाख अंचल के दूरदराज के गाँवों में ही सिमटकर रह गई है। जिस समय लदाख में मनोरंजन के साधन उपलब्ध नहीं रहे होंगे, उस समय लोगों के मनोरंजन के लिए, और उनकी धार्मिक भावनाओं की पुष्टि के लिए यह लोक-परंपरा बहुत कारगर रही होगी। इसमें लदाख के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग किस्म के स्वाँग करने की परंपरा है। लेह शहर के नजदीक चोगलमसर गाँव में होने वाले अबी-मेमे; ञे, बसगो, अलची गाँवों में होने वाले लामा-जोगी; हेमिशुगपाचन में होने वाले खाछे-कर-नग; स्क्युरबुचन में होने वाले अपो-आपी और वनला में होने वाले दो बाबा नामक स्वाँग बहुत प्रसिद्ध हैं। इन स्वाँगों में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इन स्वाँगों में नसीहतें ही नहीं, इतिहास की झलक भी देखी जा सकती है और लदाख अंचल के साथ जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक संबंधों को भी देखा जा सकता है। लामा-जोगी नामक स्वाँग में उस पुराने लदाख को देखा जा सकता है, जिसमें कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए आने वाले जोगी या साधु-संन्यासी नजर आते हैं। पुराने ज़माने में बौद्ध भिक्षु, यानि लामाओं जैसी जिंदगी जीने वाले साधु-संन्यासियों को देखकर ही शायद लामा-जोगी स्वाँग का विचार आया होगा। इस स्वाँग में नवमी तिथि को लामा-जोगी अभिमंत्रित अनाज, जैसे गेहूँ-जौ आदि लेकर गाँवों में घूमते हैं और इन्हें छिटककर विघ्न-बाधाओं को दूर करते हैं। वे हरएक घर पर जाते हैं। घर का मुखिया लामा-जोगी के माथे पर सत्तू का तिलक लगाता है और ऊनी मुकुट पर ऊन चढ़ाता है। लामा-जोगी के आशीर्वाद से घर-परिवार, और गाँव में बुरी शक्तियाँ नष्ट होती हैं और सुख समृद्धि आती है। लामा-जोगी का यह स्वाँग प्राचीन लदाख को अतीत के भारत से जोड़ने वाला है। इस स्वाँग के माध्यम से प्राचीन भारत की सिद्ध-श्रावक-श्रमण परंपरा के सुनहरे इतिहास को भी याद किया जा सकता है। यह स्वाँग भारतवर्ष में लदाख अंचल के विशिष्ट और अभिन्न सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक सहकार की झलक दिखाता है। इस स्वाँग के माध्यम से लदाख अंचल के स्वर्णिम और गौरवपूर्ण अतीत के पन्ने खुलते चले जाते हैं। भावनात्मक जुड़ाव की झलक पेश करने वाले लामा-जोगी जैसे स्वाँगों का लोसर में विशेष आकर्षण होता है।
लोसर में कुत्ते, बिल्लियों, गाय, बछड़ों आदि को भी खाना खिलाया जाता है। नई फसल का उत्सव भी इसमें होता है। इस तरह लोसर का त्योहार सभी जीवधारियों के प्रति प्रेम के साथ ही सहजीवन और सह-अस्तित्व का भाव भी दिखाता है।
इस तरह लोसर का त्योहार अपनी विविधताओं के साथ, उमंग और उल्लास के साथ सर्दियों की ठिठुरन के बीच नया जोश, नई उमंग भर जाता है। लोसर का त्योहार उल्लास और उमंग के साथ ही लदाख के गौरवपूर्ण अतीत को, विनय की शिक्षाओं को, और नीति-नैतिकता की नसीहतों को साथ लेकर आता है। सीमित संसाधनों के बीच, जीवन की जटिलताओं के बीच लोसर के पर्व पर थिरकते पाँव बताते हैं कि जीना भी एक कला है और अपनी तहजीब के विविध रंगों को समेटकर लोसर के दीपकों की जगमगाहट के बीच बिखेर देना ही कठिन जीवन की कड़ी चुनौतियों के लिए सटीक जवाब है। एक बाल कविता के साथ लोसर की ढेर सारी शुभकामनाएँ-

आया आया लोसर1 आया,
ढेरों  खुशियाँ  संग   लाया,
ठंडक से सहमे  लोगों  को,
मस्ती  का   मौसम   भाया,
आया आया लोसर  आया।
झूम-झूमकर   गाना   गाते,
गाने  के  संग  नाच है सुंदर,
बज उठते हैं दमन2 के बोल,
सुरनाने  उत्साह  बढ़ाया,
आया  आया लोसर  आया।
आचो4    आते     आचे5   आती,
मिलजुल कर सब साथ में होते,
सबके संग कुछ समय  बिताया,
आया   आया   लोसर   आया।
मिट जाते झगड़े झंझट सब
कौन  हैं  मेरे  कौन  तुम्हारे,
बीती  बातें  सभी भुलाकर,
सबको  गले  लगाने  आया,
आया  आया  लोसर आया।
बनती खूब  सिवइयाँ मीठी,
सज जाते  हर घर हर द्वारे,
जगमग जगमग धरती होती,
हर मन को  चमकाने आया,
आया आया लोसर  आया।
नौ तरह  की चीज़  मिलाकर
नौवें    दिन     होता    तैयार
कहते लोग गुथुक6 है जिसको
आमाँ7  ने  सबको  पिलवाया,
आया  आया  लोसर   आया।
किसने  अच्छे  कर्म   किये  हैं,
किसने   बुरे   किये    हैं   काम,
किस्मत अच्छी बुरी है किसकी,
जादू की पुड़िया  को  खोलकर,
अच्छा   बुरा    बताने    आया,
आया   आया   लोसर   आया।
1.तिब्बती पंचांग के अनुसार सर्दियों में मनाया जाने वाला पर्व 2. नगाड़ा जैसा वाद्य यंत्र 3. बीन जैसा वाद्य यंत्र 4. बड़ा भाई (तिब्बती) 5. बड़ी बहन (तिब्बती) 7. लोसर में बनने वाला एक प्रकार का पेय पदार्थ जिसमें मेवे के साथ कोयला आदि नौ चीजें मिलाई जातीं हैं 8. माँ (तिब्बती)
(आकाशवाणी, लेह से दिनांक 11 दिसंबर, 2018 को प्रातः 09 बजकर 10 मिनट पर प्रसारित)
राहुल मिश्र

Monday, 9 July 2018

बलखङ चौक से दीवानों की गली तक



बलखङ चौक से दीवानों की गली तक

आज न जाने क्यों धरती के उस निहायत छोटे-से टुकड़े पर लिखने के लिए कलम उठ गई। धरती का वह टुकड़ा, जो इतना छोटा-सा है, कि कुल जमा दो-सवा दो सौ कदमों से नापा जा सकता है। अगर कोई यह समझ बैठे, कि इन दो सौ-सवा दो सौ कदमों को वह ज्यादा से ज्यादा एक घंटे में तय कर लेगा, तो ऐसा भी संभव नहीं है। यह सफ़र सैकड़ों वर्षों का है। ऊन के धागों की तरह उलझे अतीत को सुलझाकर सीधा-सरल करने का है। हमारे जैसे कई लोगों ने सैकड़ों वर्षों के इस सफ़र को सैकड़ों बार तय किया होगा, मगर आज तक यह सफ़र पूरा हो पाया, कहना कठिन है। शायद इसी कारण बलखङ चौक से दीवानों की गली तक के दौ सौ कदमों के सफ़र को शब्दों में नापने की प्रबल इच्छा मुखर हो उठी, फिर पन्नों में बिखर पड़ी।
मध्य एशिया के चौराहे पर स्थित वह बड़ा बाजार, जो आकार में बहुत छोटा है, उसे अगर अपनी आत्मीय निकटता के कारण हमारे जैसे सिरफिरे लोग दुनिया की छत पर स्थित सबसे पुराना बाजार भी कह दें, तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, यह पुराना बाजार केवल उत्पादों या वस्तुओं के व्यापार के लिए ही नहीं, वरन् संस्कृतियों-तहजीबों-जीवन जीने के रंग-ढंगों की अदला-बदली के लिए भी अपनी अनूठी पहचान रखता है, फलतः इसे बाजार की परंपरागत परिभाषा तोड़ने वाला अनूठा बाजार भी कहा जा सकता है। अगर इस अनूठे-अतुलनीय बाजार को समूचे लदाख की जीवन-धारा कह दिया जाए, तो शायद शब्दों की बेमानी हो जाएगी। लदाख अंचल का धड़कता हुआ दिल अगर है, तो वह लेह बाजार ही है। इसीलिए सुदूर अतीत से लगाकर आँखों के सामने नजर आते वर्तमान तक लदाख अंचल की हर हरारत को लेह बाजार अपने में गिनता है, गुनता है, बुनता है। इसीलिए बलखङ चौक से लगाकर दीवानों की गली तक का एक फेरा लगाए बिना किसी भी पर्यटक की, किसी भी यात्री की लदाख यात्रा पूरी नहीं मानी जा सकती। इतना ही नहीं, लेह के आसपास के गाँवों में रहने वाला कोई व्यक्ति अगर लेह आया है, तो लेह बाजार का एक फेरा लगाए बिना उसकी यात्रा भी पूर्णता को प्राप्त नहीं होती। लब्बो-लुबाब यह, कि बड़े-बड़े राजाओं-वजीरों से लगाकर जेब में हाथ डाले फोकट टहलने वाले अदने-से लोगों तक के लिए धरती का यह सुंदर-सा, छोटा-सा टुकड़ा आकर्षण का केंद्र रहा है।
बलखङ चौक कहने के लिए तो चौक है, मगर चौक जैसा कुछ नजर आता नहीं है। यहाँ दो तिराहों का मिलन है, और चारों दिशाओं की ओर जाते रास्तों को केवल महसूस किया जा सकता है। वैसे बलखङ चौक में एक बात और भी महसूस होती है, जो इस चौक के अपने नाम के साथ जुड़ी पहचान को खूबसूरत तरीके से सामने लाती है। बलखङ चौक से पूरब की ओर थोड़ा नीचे उतरने पर दाहिनी ओर एक सँकरी-सी गली अंदर जाती दिखती है, जो एकदम से बाजार की शक्ल अख्त़ियार कर लेती है। पुराने ढर्रे की छोटी-बड़ी कई दुकानें, जिनमें बर्तनों के साथ ही फटिंग (सूखी खूबानियाँ), छुरपे (याक के दूध का सूखा पनीर), पाबू (चमड़े के देशी जूते) जैसी लदाखी वस्तुएँ बिकती दिखाई देती हैं। इनके साथ ही देशी होटल, या कहें कि ‘चाय पर चर्चा’ और अड्डेबाजी के लिए मुफीद कुछ दुकानें भी हैं, जो सुबह से शाम तक गुलज़ार रहती हैं। इनमें थुक्पा (लदाखी नमकीन सेवइयाँ), पाबा (जौ के आटे में खड़ी मसूर दाल मिलाकर बनाया गया लदाखी व्यंजन), मोमोस, सोलज़ा (मीठी दूधवाली चाय), गुर-गुर (नमकीन मक्खन वाली चाय), तागी (नानवाई की तंदूरी रोटियाँ) और समोसा जैसे व्यंजनों की उपलब्धता रहती है। महँगे होटलों जैसी परंपरा यहाँ पर नहीं मिलती। एक गुर-गुर चाय के साथ आप घंटों बैठकर यहाँ गप्पें मार सकते हैं। ये दुकानें नुबरा, पुरिग और शम आदि इलाकों के बल्तियों की हैं। लदाख की प्रजातिगत व्यवस्था में मोन, दरद और बल्ती प्रजातियों का प्रभुत्व रहा है। आठवीं शताब्दी के बाद तिब्बत की तरफ से आने वाली भोट प्रजाति का वर्चस्व स्थापित होने के बाद दरद और मोन प्रजातियाँ हाशिये पर सिमटती गईं। बल्ती समुदाय की स्थिति अपेक्षाकृत सुदृढ़ रही।
बल्ती समुदाय को आर्यों की भारतीय-ईरानी शाखा और मंगोलों की मिश्रित प्रजाति का माना जाता है। हालाँकि बल्तियों के नाक-नख़्श-रंग और कद-काठी को देखकर मंगोलों की मिश्रित प्रजाति का कहा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। वैसे तो रेशम मार्ग में होने वाले व्यापार के साथ बल्तियों का वजूद बलखङ में स्थापित हो गया होगा, मगर लदाख में हुई राजनीतिक उथल-पुथल ने बड़े रोचक और रोमांचकारी तरीके से बल्तिस्तान के साथ लदाख को जोड़ दिया। यह घटना है, सन् 1600 ई. के आसपास की, जब बल्तिस्तान में खरच़े के सुलतान और चिगतन के सुलतान के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई थी; उसी समय लदाख के शासक राजा जमयङ नमग्यल अपने राजनीतिक लाभ के लिए दोनों के बीच कूद पड़े। अंत में हुआ यह, कि सारे बल्ती शासक इकट्ठे हो गए और स्करदो के बल्ती सुलतान अली मीर के नेतृत्व में राजा जमयंग नमग्यल को फोतो-ला दर्रे के पास ही घेर लिया। राजा जमयङ नमग्यल को सुलतान अली मीर ने कैद कर लिया और बल्ती सेना ने लदाख की अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहरों को तहस-नहस कर डाला। बाद में सुलतान अली मीर ने राजा जमयङ नमग्यल के सामने शर्त रखी, कि अगर वे इस्लाम कुबूल कर लें, सुलतान की पुत्री ग्यल खातून से शादी कर लें और उससे उत्पन्न पहली संतान को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दें, तो उन्हें आजाद कर दिया जाएगा। राजा ने अपनी जान बचाने के लिए इन शर्तों को स्वीकार कर लिया। कहा जा सकता है, कि ये शर्तें निहायत अपमानजनक थीं, किंतु रानी ग्यल खातून की सूझबूझ और महासिद्ध स्तगछ़ङ् रसपा के प्रभाव के कारण यह शर्त आने वाले समय में लदाख के लिए बदलाव की बयार लेकर आई।
बल्ती राजपरिवार से आई रानी ग्यल खातून अत्यंत कलाप्रेमी थी, इस कारण उसके साथ कई बल्ती संगीतकार, चित्रकार आदि भी लदाख पहुँचे। राजा जमयंग नमग्यल के वंशज और रानी ग्यल खातून के पुत्र राजा सेङगे नमग्यल ने सन् 1616 ई. में लदाख का राजपाट सँभाला। उस समय राजा अल्पवयस्क थे, इस कारण रानी ग्यल खातून ही राजकीय कार्यों को संचालित करती थीं। ऐसा माना जा सकता है, कि इस समय बलखङ के आसपास बल्ती व्यापारियों और कलाकारों की बस्ती विधिवत स्थापित हुई होगी। आवास को लदाखी भाषा में ‘खङ’ कहा जाता है। इस तरह बल्तियों के आवास के कारण कहलाए बलखङ से जुड़कर बलखङ चौक प्रसिद्ध हुआ होगा, ऐसा कहा जा सकता है।
बलखङ चौक के दूसरी ओर बने एक बगीचेनुमा खाली मैदान की दीवार के किनारे-किनारे तमाम विक्रेता अपनी परंपरागत वेशभूषा धारण किए हुए फटिंग, काजू, बादाम और देशी मक्खन आदि बेचते दिखाई देते हैं। इनमें से अधिकांश डोगपा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले हैं। डोगपा समुदाय को आर्य प्रजाति के भारतीय-ईरानी समूह का माना जाता है। इन्हें दा-हानु के दरद के रूप में जाना जाता है। ‘दरद’ के रूप में इन्हें पहचानना भी अपने आप में एक रोमांचकारी कल्पना है। श्रीरामकथा-वाचक कैलास के अधिपति शिवजी के रूप-सौंदर्य का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं-
कुंद इंदु दर गौर सरीरा । भुज प्रलंब परिधन मुनि चीरा ।। (01/106/06)
वे शिवजी की देह को दर, अर्थात् शंख के समान वर्ण वाला बताते हैं। संभव है, कि दरदिस्तान के दरदों के लिए यह पहचान उनकी ‘दर देह’, उनके गौरवर्ण, सुगठित-स्वस्थ शरीर, शंख समान सुंदर ग्रीवा आदि के कारण मिली हो। भले ही यह कल्पना-मात्र हो, किंतु इस कल्पना के माध्यम से पुरातन सांस्कृतिक सूत्रों को जोड़ने वाले ये दरद बलखङ चौक में अपनी उपस्थिति से एक सुंदर-सुखद अनुभूति को सहसा उपजा देते हैं। डोगपा समुदाय को आभूषणों और पुष्पों से बहुत प्रेम है, ऐसा सहज ही दिखाई दे जाता है। स्थानीय ‘टूरिस्ट-गाइड’ इनका परिचय भी बड़े रोचक तरीके से ‘गमला पार्टी’ के रूप में कराते हैं। बड़ी लंबी लटकनों वाले आभूषणों के साथ ही रंग-बिरंगी टोपी में कई तरह के फूलों को सजाए डोगपा समुदाय के लोग रास्ते चलते किसी भी व्यक्ति को सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। इनके चेहरे पर खिली मुसकान, सर्दी के दिनों में रूखी-सूखी धरती पर सुगंधित पुष्पों की अनुभूति को साझा करती गमलेनुमा टोपी और इनकी सहजता-सरलता हर समय देखी जा सकती है। आप इनके साथ खड़े होकर आसानी से फोटो खिंचवा सकते हैं।
किसी ‘गमला पार्टी’ की दुकान के साथ खड़े होकर पश्चिम की ओर देखें, तो सामने जामा मसजिद अह्ली सुन्नती दिखाई देती है। कहा जाता है कि सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लदाख में तिब्बत की सेना ने हमला कर दिया था। उस समय मुगल सेना ने तिब्बती आक्रांताओं का डटकर मुकाबला किया था और लदाख को बचाया था। इस घटना के बाद दिल्ली के मुगल दरबार की शर्तों के अधीन लेह के मुख्य बाजार में इस जामा मसजिद का निर्माण राजा देलेग नमग्यल के शासनकाल में हुआ। वैसे मुगल दरबार का प्रत्यक्ष और बड़ा हस्तक्षेप लदाख अंचल में नहीं रहा, किंतु इस मसजिद के माध्यम से मुगल साम्राज्य की यादें लदाख अंचल के साथ जुड़ी हुई हैं।
बलखङ चौक से जामा मसजिद तक बिखरी रंग-बिरंगी रौशनियों और चहल-पहल की गवाहियों को दर्ज करती लेह बाजार की मुख्य सड़क है। अतीत से वर्तमान तक अनेक बदलाव इसने देखे हैं। आज का लेह बाजार जितनी गगनचुंबी इमारतों और रंग-बिरंगी रौशनियों से जगमग करता दिखाई देता है, उतना इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशक से पहले नहीं था। इसका मतलब यह भी नहीं, कि लेह बाजार में रौनक नहीं होती थी। अंतर केवल इतना था, कि उस समय पक्की दुकानें गिनी-चुनी ही थीं, और दो-तीन मंजिला दुकानें तो थी हीं नहीं। इसके विपरीत आज पुरानी अदा वाली कच्ची ईंटों से बनी दुकानें एक या दो ही बची हैं, जो गुजरे अतीत की थोड़ी-सी झलक दिखा जाती हैं। लेह बाजार के सौंदर्यीकरण ने एक नई मादकता को अजीबोगरीब ढंग से बिखेर दिया है। लेह बाजार में घुसते ही एक ऊँचा-सा मंचनुमा प्लेटफार्म बन गया है, जिसका असल काम तो वाहनों के प्रवेश को रोकना है, मगर यह कभी-कभी दूसरी भूमिका भी निभा लेता है। ‘म्यूजिकल कंसर्ट’ और ‘ओपन एयर डांस शो’ जैसे आयातित आयोजनों के लिए यह एक अच्छा मंच बन जाता है। लेह घूमने आने वालों के लिए ऐसे आयोजन रोचक हो जाते हैं।
यह बदलाव भले ही इक्कीसवीं सदी के आधुनिक लेह बाजार को पेश करता हो, मगर बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है। आसपास के गाँवों से ताजी हरी सब्जियाँ लेकर आने वाली लदाखी महिलाओं की ‘फुटपाथिया दुकानें’ दोपहर के चढ़ते ही सज जाती हैं। शायद घर के सारे कामकाज निबटाकर, खेतों से सब्जियाँ निकालकर ये महिलाएँ पूरी मुस्तैदी और तरो-ताजगी के साथ उपस्थित होती होंगी। भली बात यह है कि लदाख में अब भी पुराने देशी बीज उपलब्ध हैं, इस कारण देशी टमाटर, महकती धनिया-मेथी, मिठास से भरी मटर और लदाख की अपनी पहचान में शामिल ताजी खूबानियों से सजी दुकानें अपनी तरफ बरबस ही आकृष्ट कर लेती हैं। उम्रदराज दुकानदार को ‘आमा-ले, जूले’ अभिवादन करके आप तसल्ली से बैठकर खरीददारी कर सकते हैं। थोड़ा-बहुत हँसी-मजाक इस खरीददारी को रोचक बना देता है। अपने खेत का ही उत्पाद है, सो ‘आमा-ले’ आपको एक-दो खूबानियाँ या मटर की कुछ फलियाँ यूँ ही खाने के लिए दे सकती हैं। कम से कम इन ‘फुटपाथिया दुकानों’ में व्यावसायिक प्रतिबद्धता की जटिलता देखने को नहीं मिलेगी। वैसे पहाड़ी संस्कृति ऐसी मानी जाती है, जहाँ महिलाएँ ही सबसे ज्यादा खपती हैं, और अपने बूते परिवार की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की ताकत रखती हैं। इससे कहीं आगे अगर महिला सशक्तिकरण के सच्चे-सटीक उदाहरण को खोजना हो, तो इसके लिए लदाख की महिलाओं से बेहतर उदाहरण मिलना कठिन ही लगता है।
बदलाव तो लेह बाजार में स्थित हिंदू धर्मशाला की इमारत में भी देखने को नहीं मिलता है। आसपास की गगनचुंबी इमारतों और आलीशान दुकानों के बीच अपने कच्चे और पुराने ढर्रे के अटारीनुमा भवन के साथ आज भी कायम हिंदू धर्मशाला गौरवपूर्ण अतीत की साक्ष्य प्रतीत होती है। लेह से यारकंद तक का रास्ता रेशम मार्ग या सिल्क रूट का सहायक मार्ग माना जाता था। लेह में होशियारपुर और कुल्लू आदि के व्यापारी भी बड़ी संख्या में आते थे। व्यापारियों के लिए लेह में कई सराय और धर्मशालाएँ रही होंगी, मगर आज लेह में धर्मशाला के नाम पर यही एक धर्मशाला दिखाई पड़ती है। हिंदू धर्मशाला की पुरातनता का बोध इसमें लगे टीन के बोर्ड से भी हो जाता है। बोर्ड के मुताबिक धर्मशाला का अस्तित्व 23 भाद्रों, संवत् 1994 से है। हो सकता है, कि यह बोर्ड जीर्णोद्धार के बाद लगाया गया हो। अगर बोर्ड में उल्लिखित तिथि को ही आधार मान लें, तो अस्सी हिमपात और लदाखी बसंत हिंदू धर्मशाला ने भी देखे हैं। डोगरा शासकों के शासन को, रेशम मार्ग में होने वाली व्यापारिक गतिविधियों के अवसान को, देश की आजादी को, और फिर आज की आधुनिकता में बदलते अपने आसपास के परिवेश को, परिस्थितियों को हिंदू धर्मशाला ने देखा है, सुना है।

यह अलग बात है, कि आज इसकी देखरेख करने वाले लोगों में से बहुत कम ही इसके गौरवपूर्ण अतीत पर कुछ बता पाएँ। प्रसिद्ध घुमक्कड़शास्त्री और हिमालयी धर्म-संस्कृति-अध्यात्म-दर्शन को यत्नपूर्वक खोजकर सामने लाने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी लदाख यात्राओं के दौरान इसी हिंदू धर्मशाला में रुका करते थे, ऐसी मान्यता है। इसी धर्मशाला के किसी एकांत कक्ष में बैठकर उन्होंने लदाख के बारे में अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया होगा। अगर सच में ऐसा है, तो हिंदू धर्मशाला घुमक्कड़ी में रुचि रखने वाले लोगों के लिए तीर्थस्थान से कम नहीं।

वैसे एक अद्भुत और अनूठा तीर्थस्थान जामा मसजिद के ठीक पीछे भी है। यह ऐसा तीर्थस्थान है, जहाँ आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व ही पर्यावरण संरक्षण और हरियाली के संवर्धन का संदेश दिया गया था, वह भी लदाख के बर्फीले रेगिस्तान में बैठकर। सन् 1517 ई. में गुरु नानक अपनी दूसरी उदासी के दौरान लदाख पधारे थे, और लेह में भी उन्होंने समय बिताया था। ऐसी मान्यता है कि गुरु नानक ने अपनी दातून को यहाँ पर जमीन में खोंस दिया था, जिसने कालांतर में एक विशाल वृक्ष का रूप ले लिया। उस विशाल वृक्ष को आज भी देखा जा सकता है। गुरु नानक की दातून के कारण इस स्थान को गुरुद्वारा दातून साहिब कहा जाता है। लदाख की धरती भले ही रूखी-सूखी हो, किंतु यहाँ पर क़लम जैसे तनों को धरती में रोप देने पर वे भरे-पूरे वृक्ष का रूप ले लेते हैं। इस विशिष्टता को देखते हुए गुरुद्वारा दातून साहिब के प्रति आस्था बलवती हो जाती है। अगर देखा जाए, जो गुरुद्वारा दातून साहिब अन्य गुरुद्वारों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ गुरु नानक की उपस्थिति को अनुभूत किया जा सकता है, विशालकाय वृक्ष के माध्यम से।
गुरुद्वारा दातून साहिब के आसपास नानवाई की कई दुकाने हैं, जहाँ तंदूरी रोटी बनती है। लदाख के अतिरिक्त देश-भर में इस तरह नानवाई की दुकानें मिलना दुर्लभ हैं, क्योंकि इनका संबंध रेशम मार्ग के व्यापारियों से रहा है। लदाखी में ‘तागी’ के नाम से अपनी पहचान रखने वाली और आज के हिसाब से तंदूरी रोटी का आगमन यारकंद से यहाँ पर हुआ। रेशम मार्ग के व्यापारी अपनी यात्रा के लिए इन्हीं रोटियों को ले जाते थे। इस तरह नानवाई का काम भी यहाँ एक व्यवसाय के रूप में विकसित हो गया। रेशम मार्ग बंद हो जाने के बाद ये यहीं पर बस गए। यहीं पर आज का ‘सेंट्रल एशियन म्यूज़ियम’ भी है, जो रेशम मार्ग के चलन के समय इबातगाह और शरणगाह हुआ करता था। आजादी के बाद के वर्षों में कुछ संस्कृतिप्रेमी जागरूक नागरिकों ने इसे संग्रहालय का रूप दे दिया, जिसमें रेशम मार्ग से जुड़ी अनेक स्मृतियों को संचित करके रखा गया है। ऐसा कहा जाता है, कि आज के ‘सेंट्रल एशियन म्यूजियम’ के आसपास कहीं डोगरा शासकों की कुलदेवी का छोटा-सा मंदिर भी हुआ करता था, जिसे जनरल जोरावर सिंह ने बनवाया था।
स कथा-यात्रा के घुमावदार मोड़ की तरह जामा मसजिद से दाहिनी ओर, और एक बार फिर दाहिनी ओर मुड़कर मोरावियन मिशन चर्च और स्कूल तक पहुँचा जा सकता है। वैसे तो जामा मसजिद के पीछे नानवाई की दुकानों के बीच से होकर भी एक सँकरी-सी गली मोरावियन चर्च और स्कूल तक पहुँचती है। ऐसा माना जाता है कि लदाख में ईसाई मिशनरियों का आगमन 800 ई. के आसपास ही हो गया था, किंतु यहाँ की विषम जलवायु और निरंतर प्रतिकूलता के कारण मिशनरी यहाँ प्रभावहीन ही रहे। समूचे भारतवर्ष में ब्रिटिश शासन स्थापित हो जाने के बाद प्रोटेस्टेंट ईसाई मिशनरियों का एक दल ‘हिमालयी मिशन’ की महत्त्वाकांक्षी योजना बनाकर लदाख पहुँचा था। उस समय कश्मीर के महाराजा ने इस मिशन को लदाख में चलाने की अनुमति नहीं दी, फलतः ‘मिशनरी’ हिमाचलप्रदेश के लाहुल-स्पीति क्षेत्र के मुख्यालय केलङ में बस गए और वहीं से उन्होंने लदाखी लोगों पर अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया। बाद में ब्रिटिश हुक्मरानों के अनुरोध के बाद महाराज कश्मीर ने अनुमति प्रदान की और सन् 1885 में मोरावियन मिशन की स्थापना लदाख में हुई। आज के मोरावियन मिशन चर्च व स्कूल का बड़ा योगदान लदाख में शिक्षा, विशेषकर आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार में रहा है।
मोरावियन स्कूल के आसपास का इलाका चङ्स्पा के नाम से जाना जाता है। अगर बलखङ चौक बल्तियों के नाम से आबाद है, तो चङ्स्पा भी चङ्थङ के लोगों के कारण अपनी पहचान कायम किए हुए है। वैसे ‘चङ्’ का अर्थ होता है- उत्तर। इस तरह उत्तर की दिशा से आने वाले लोगों को भी चङ्स्पा कहा जाता है। चङ्स्पा, यानि चङ्थङ के निवासी घुमंतू होते थे, इस कारण उनकी आबादी यहाँ पर नहीं दिखाई देती है। चङ्थङ के व्यापारी भी लेह बाजार में आते थे। ये मुख्य रूप से नमक और पश्मीना भेड़ की ऊन आदि का व्यापार किया करते थे। चङ्थङ की छ़ोकर और छ़ोरुल झीलों में बनाए जाने वाले नमक का व्यापार करने वाले चङ्स्पा व्यापारियों के तंबुओं से बनने वाली अस्थायी बस्तियाँ शायद रेशम मार्ग के बंद होने के बाद उजड़ गई होंगी, मगर नाम आज भी जिंदा है। आज के चङ्स्पा में बिखरती पर्यटकों की रौनक को देखकर इसके सुनहरे अतीत को कल्पना में सँजोया जा सकता है। बलखङ चौक से चलते हुए दीवानों की गली तक का सफ़र भी यहीं आकर पूरा होता है। देश की आजादी के बाद के वर्षों में लदाख ने बहुत-कुछ बदलता हुआ देखा। इस समय तक रेशम मार्ग का व्यापार भी बंद हो चुका था। सीमाएँ खिंच गईं थीं, जिन्होंने अखंड भारतवर्ष की संततियों को बाँटकर पड़ोसी बना दिया था। जिस समय सारी दुनिया, और विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप तमाम उथल-पुथल और हलचलों में तंग था, उस समय भी चङ्स्पा में कैसी रौनक होती थी, उसका बड़ा मोहक वर्णन लदाख में तैनात तत्कालीन सेना-प्रमुख कर्नल पी. एन. कौल ने अपनी पुस्तक ‘फ्रंटियर कॉलिंग’ में किया है।
कर्नल कौल अतीत की स्मृतियों को सँजोते हुए अपनी पुस्तक में बताते हैं कि मोरावियन मिशन स्कूल के बगल में सेना की छावनी होती थी, और छावनी के बगल से एक झरना बहता था। झरना इसलिए विशेष महत्त्व का था, क्योंकि लेह की आबादी के लिए पीने का पानी उपलब्ध कराने वाला यह इकलौता ठिकाना था। शाम को अपनी-अपनी गगरियाँ लिए पानी भरने को महिलाओं-युवतियों का आगमन यहाँ पर होता था। इसी रंगत और रौनक के कारण कर्नल कौल ने रास्ते को ‘लवर्स लेन’ नाम दे दिया। अब शायद आप भी समझ ही गए होंगे, कि यही वह दीवानों की गली है, जहाँ आज भी अजीब-सी गुलाबी रंगत चढ़ी रहती है।
भारतवर्ष के अनेक गाँवों की अनूठी पहचान उनके पनघट होते हैं। बड़े-बड़े ‘कॉफ़ी हाउसेज़’ और ‘किटी पार्टीज़’ जैसी आयातित व्यवस्थाओं से बहुत पहले महिलाओं के लिए पनघट और पुरुषों के लिए अथाइयाँ-चौपालें अपने सुख-दुःखों को बाँटने, कुछ मनोरंजन करने और भविष्य की तमाम कार्य-योजनाओं को बनाने का सहज-सरल-सरस मंच उपलब्ध करा देती थीं। भारतवर्ष के अनेक गाँवों में जीवित-जीवंत परंपरा को लेह में देखकर कर्नल कौल इसका जिक्र किए बिना नहीं रह सके, ऐसा सरलता के साथ कहा जा सकता है।
आज दीवानों की गली का वह खूबसूरत झरना सिमट गया है। आसपास उग आए सीमेंट-कंक्रीट के बड़े-बड़े होटलों ने यहाँ की नैसर्गिक सुंदरता को सोख लिया है। घरों में चलने वाली ‘वाटर सप्लाई’ ने पनघट के ‘कान्सेप्ट’ को पुराना साबित कर दिया है। बदलाव की बयार ने स्वाभाविक-सरल और सहज आत्मीय मिलन को व्यावसायिक और बनावटी बना दिया है। सर्दियों की दुपहरी और गर्मियों की साँझ में आज भी ‘लवर्स लेन’ या दीवानों की गली गुलज़ार होती है, मगर पहले जैसी बात अब कहाँ?
बलखङ चौक से लगाकर दीवानों की गली तक अब सबकुछ बदला-सा दिखाई देता है। लेह बाजार के ऊपर प्रहरी की तरह खड़ा ‘लेह पैलेस’ अपने निर्माणकर्ता धर्मराज सेङ्गे नमग्यल को आज भी याद करता है। लेह दोसमो-छे, यानि लेह का सालाना धर्मानुष्ठान आज भी मनाया जाता है। उस समय की अनूठी घुड़सवारी और घुड़सवारों के स्वागत में लेह बाजार में छङ् (लदाखी सोमरस) लेकर कतारबद्ध खड़ी होने वाली महिलाओं को अपने वीर योद्धाओं का उत्साहवर्धन करते हुए देखने वाला लेह बाजार आज पर्यटकों के स्वागत में सजा दिखाई देता है। बलखङ चौक से दीवानों की गली, यानि पूरब से चलते हुए पश्चिम तक पहुँचते-पहुँचते लगभग दौ सौ कदमों में हम बदलती भौगौलिक स्थितियों-सामाजिक संरचनाओं से ही नहीं गुज़र जाते, वरन् तहजीबों-संस्कृतियों के कई पड़ावों को भी पार कर जाते हैं। कई बार बलखङ की अड्डेबाजी से किसी बड़े और महँगे ‘कॉफ़ी हाउस’ में भी पहुँच जाते हैं, खुद को आधुनिक दिखाने के फेर में।









डॉ. राहुल मिश्र

(बाँदा, उत्तरप्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘मुक्तिचक्र’ के प्रवेशांक, जून-2018 में प्रकाशित; संपादक- गोपाल गोयल)

Tuesday, 27 September 2016


लदाख का धार्मिक नृत्य- छम


हिमालय के उच्चतम शिखरों में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा अपनी अनूठी धार्मिक विशिष्टताओं और इन विशेषताओं के साथ मिलकर विकसित हुई अनूठी संस्कृति के कारण युगों-युगों से धर्मभीरुओं को, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। हिमालय में फैली बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का जीवित-जीवंत केंद्र लदाख है, जहाँ पर आज भी इस अनूठी संस्कृति की, इसकी धार्मिक व्यवस्था की झलक देखी जा सकती है। यह परंपरा जहाँ एक ओर भारत के गौरवपूर्ण अतीत को अपने में समेटे हुए है, वहीं दूसरी ओर तिब्बत से आने वाली सांस्कृतिक-धार्मिक व्यवस्था यहाँ पर जीवंत हो उठी है। लदाख अपने अतीत से ही देश-दुनिया के लिए जिज्ञासाओं के भंडार की तरह रहा है। देश-दुनिया में होते आधुनिकीकरण से बेखबर लदाख अंचल अपनी अनूठी धार्मिक व्यवस्था को, धार्मिक व्यवस्था में निहित विशेषताओं को बचाए रहा है। लदाख की सामाजिक व्यवस्था आज भी धार्मिक परंपराओं में बँधी हुई है और लदाख का समाज आज भी धर्मभीरु है। धर्म के प्रति आस्था और इस आस्था की दृढ़ता अपनी निरंतर गतिशीलता के साथ आज भी देश-दुनिया के पर्यटकों को, श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। लदाख में विभिन्न तिथियों में होने वाले धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों और पर्वों-त्योहारों की लंबी सूची है। महायान बौद्ध परंपरा के सिद्धांतों का भौतिक पक्ष इन अनुष्ठानों, पर्वों और त्योहारों में देखा जा सकता है। लदाख के गृहस्थ बौद्ध धर्मानुयायियों के दैनिक पूजा-कर्म के साथ ही बौद्ध मठों-मंदिरों, अर्थात् गोनपाओं में आयोजित होने वाले पूजा-अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व है। लदाख की गोनपाएँ यहाँ की धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतीक हैं। वैसे तो इन गोनपाओं में वर्ष-पर्यंत पूजा-अनुष्ठान होते रहते हैं, मगर वार्षिक अनुष्ठानों का अपना विशेष महत्त्व होता है। लदाख की कुछ प्राचीन और विशिष्ट गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के दौरान होने वाला धार्मिक नृत्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। इस नृत्य को छम कहा जाता है। यह धार्मिक नृत्य गोनपाओं के भिक्षुओं द्वारा किया जाता है और इसमें प्रशिक्षित भिक्षुगण विभिन्न प्रकार के मुखौटे लगाकर नृत्य करते हैं। इस कारण इस धार्मिक नृत्य को मुखौटा नृत्य भी कहा जाता है।
छम नृत्य मूल रूप से तांत्रिक अनुष्ठान के अंतर्गत होने वाला नृत्य होता है। यह तांत्रिक नृत्यानुष्ठान महायान बौद्ध परंपरा का विशिष्ट अंग है। महयान परंपरा में वर्णित धर्मरक्षकों, धर्मपालों, देव-देवियों, डाकिनियों और अन्य दैवीय स्वरूपों के प्रतीक के रूप में बने हुए मुखौटे और वस्त्र धारण करके इस विशिष्ट तांत्रिक नृत्यानुष्ठान को संपन्न किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि छम नृत्य की उत्पत्ति भगवान बुद्ध के समय उनके द्वारा ही हुई थी। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कर्नाटक में स्थित श्रीधान्यकटक नामक तीर्थक्षेत्र में भगवान बुद्ध ने महायान परंपरा के विनेयजनों को उपदेश दिया। अपने उपदेश में उन्होंने अनुत्तरयोग तंत्र भूमि-पूजा, जिसे त्सई-छो-ग कहा जाता है, के बारे में बताते हुए नृत्य करने की विधि बताई। यह नृत्य सामान्य नृत्य नहीं, वरन् शत्रु-नाश के लिए देव, डाकिनी, धर्मरक्षकों आदि के मुखौटे एवं वस्त्र धारण करके किया जाने वाला तांत्रिक नृत्यानुष्ठान था। भगवान बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेश के अनुरूप राजा इंद्रबोधि ने इस नृत्यानुष्ठान की विधि का प्रचार-प्रसार किया। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान आर्य नागार्जुन के कर्मक्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध कर्नाटक के नागार्जुनकोंडा नामक स्थान में हुए उत्खनन में नृत्य के लिए बने प्रांगण के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि तांत्रिक नृत्यानुष्ठान की, छम की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसी कालखंड में जैन परंपरा में भी धार्मिक नृत्यानुष्ठान की परंपरा प्रचलित हुई थी। जैन संन्यासी मंदिरों में रात-रातभर नृत्यानुष्ठान किया करते थे। जैन परंपरा में प्रचलित रासग्रंथों में वर्णित कथाओं का नृत्याभिनय जैन परंपरा में साधना-पद्धति के रूप में प्रचलित था। कमोबेश इसी प्रकार की परंपरा छम में देखी जा सकती है। अंतर केवल इतना ही है कि जैन मंदिरों में होने वाला रास तांत्रिकनृत्य नहीं होता, जबकि बौद्ध धर्म की महायान परंपरा में होने वाला छम तांत्रिक नृत्य होता है।
कर्नाटक के श्रीधान्यकटक और नागार्जुनकोंडा से चलकर छम नृत्य की परंपरा तिब्बत में विकसित हुई। नौवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में तिब्बत के शासक ठ्रिसङ्-दे-च़न के आमंत्रण पर आचार्य शांतिरक्षित भारत से तिब्बत गए और वहाँ पर महयान बौद्ध परंपरा का विस्तार करने हेतु एक बौद्ध विहार के निर्माण की शुरुआत की, मगर विहार के निर्माण में अनेक प्रकार की बाधाएँ पैदा होने लगीं। तब उन्होंने गुरु पद्मसंभव को आमंत्रित करने हेतु धर्मराज ठ्रिसङ्-दे-च़न से अनुरोध किया। गुरु पद्मसंभव तंत्रविद्या के प्रकांड विद्वान थे। गुरु पद्मसंभव ने आमंत्रण स्वीकार किया और तिब्बत में पहुँचकर दोर्जे-गुर-छम नामक तांत्रिक नृत्यानुष्ठान करके विहार के निर्माण में बाधक तत्त्वों को समाप्त किया। इस प्रकार तिब्बत में समये नामक बौद्ध विहार की स्थापना हुई, जो तिब्बत में छम नृत्य के विकास का पहला केंद्र बना। कालांतर में संस्कृत ग्रंथों के तिब्बती भाषा में हुए अनुवाद के माध्यम से तिब्बत में छम नृत्यानुष्ठान की विधियों का, इसकी बारीकियों और इसके प्रयोजन का अध्ययन सुलभ हुआ।
लदाख में तिब्बत से आने वाली महायान बौद्ध परंपरा के साथ ही छम या मुखौटा नृत्य की परंपरा प्रचलित हुई। ऐसी मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव का लदाख में आगमन हुआ था और उन्होंने वर्तमान करगिल जनपद के जङ्स्कर क्षेत्र में स्थित कनिका स्तूप के निकट तांत्रिक साधना की थी। संभव है कि उन्होंने इस स्थान की नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक नृत्यानुष्ठान भी किया हो। इस प्रकार लदाख की विभिन्न प्राचीन गोनपाओं में छम की परंपरा प्रचलित हुई। लदाख की सभी प्रमुख गोनपाओं में वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के समय भिक्षुओं द्वारा धर्मरक्षकों, धर्मपालों, रक्षकों, देव, डाकिनियों आदि के मुखौटे लगाकर, उनके हस्त-प्रतीकों को धारण करके छम नृत्यानुष्ठान करने की प्राचीन परंपरा देखने को मिलती है। छम नृत्य की विभिन्न मुद्राएँ धार्मिक कार्यों में बाधा पहुँचाने वाले शत्रुओं को, नकारात्मक शक्तियों का शमन करने की प्रक्रिया प्रदर्शित करती हैं। इनमें नकारात्मक शक्तियों को बाँधना, कुचलना, काटना आदि शामिल होता है। बौद्ध धर्म की महायान साधना परंपरा में चार प्रकार के संप्रदाय हैं। इन्हें सा-क्या, कर्ग्युद, ञिङमा और गेलुग के नाम से जाना जाता है। इन चारों संप्रदायों में सामान्य भिन्नताएँ होती हैं। लदाख में इन चारों संप्रदायों के विशिष्ट जनों द्वारा, रिनपोछे द्वारा छम का प्रारंभ किया गया। लदाख में प्रत्येक संप्रदाय से संबद्ध प्रमुख गोनपाओं में होने वाले छम नृत्यों में भी सामान्य विभेद होता है। यह भिन्नता मुखौटों, नृत्य के दौरान पद संचालन, नर्तकों के आगे-पीछे मुड़ने की विधि, पदचाल की संख्या और वाद्य यंत्रों के प्रयोग की विधियों में होता है। ये विभिन्नताएँ सामान्य दर्शकों को समझ में नहीं आ सकतीं।
लदाख की गोनपाओं में छम नृत्यानुष्ठान प्रायः कृष्णपक्ष की अठारहवीं से उनीसवीं तिथियों में या अठाईसवीं से उनतीसवीं तिथियों में आयोजित किए जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि जिस तरह कृष्णपक्ष में चंद्रमा की रोशनी क्रमशः घटती जाती है, उसी तरह छम के प्रभाव से नकारात्मक शक्तियों की, धर्मशासन को हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं की शक्ति भी क्रमशः घटती जाती है। लदाख में स्थित विभिन्न प्रमुख गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम की तिथियाँ अलग-अलग होती हैं, साथ ही छम में प्रदर्शित होने वाले दैवीय स्वरूपों में भी अंतर होता है। भोटी पंचांग के अनुसार पाँचवें माह की नवमी एवं दशमी तिथियों को हेमिस छेसचू के अवसर पर हेमिस गोनपा में छम का आयोजन होता है। हेमिस गोनपा में गुरु छ़नग्यद (अष्टगुरु पद्मसंभव) के साथ ही देव, डाकिनी और धर्मरक्षकों का नृत्यानुष्ठान होता है। भोटी पंचाङ के छठे मास की नवमी एवं दशमी तिथियों में डगथोग गोनपा में छेसचू या दशमी उत्सव के अवसर पर वज्रपाणि तथा गुरु छनग्यद का छम होता है। चेमड़े गोनपा में भोटी पंचाङ के नौवें माह की अट्ठाइसवीं एवं उनतीसवीं तिथि पर वङछोग अनुष्ठान के अवसर पर महाकाल एवं अन्य धर्मरक्षकों का छम होता है। इन्हीं तिथियों में डगथोग गोनपा में होने वाले वङ्छोग अनुष्ठान में वज्रकुमार, युमखोर लोग्यद दनमा, दस रौद्र और ल्हमो आदि का छम होता है। इस तरह लदाख की विभिन्न गोनपाओं में धर्मराज महाकाल के माता-पिता का छम, षड्भुज महाकाल, श्वेत महाकाल, वैश्रवण, हिरण और चमरी आदि का छम होता है। छम नृत्यानुष्ठान में पाई जाने वाली ये विविधताएँ अलग-अलग कथा-सूत्रों के माध्यम से श्रद्धालुओं की धर्मपिपासा को शांत करती हैं।
छम नृत्यानुष्ठान में मुखौटों का विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि मुखौटों के माध्यम से ही स्वरूपों का पता चलता है। छम में प्रयुक्त होने वाले मुखौटे लकड़ी या मिट्टी के बने होते हैं। मुखौटों के रंग और उनके आकार धर्मरक्षक, देव, डाकिनी और अन्य दैवीय स्वरूपों के अनुसार होते हैं। मुखौटे प्रायः नीले, पीले, सफेद और लाल रंग के होते हैं। धर्मरक्षकों के लिए कंकाल के आकार वाले मुखौटे और वस्त्र होते हैं। छम नृत्य करने वाले भिक्षुओं के लिए वस्त्र भी विशेष प्रकार के होते हैं। रेशमी छम-वस्त्रों को पङखेब कहा जाता है। छम नृत्य के दौरान तलवार, कपाल, त्रिशूल, कील और धनुष-बाण आदि भी धारण किए जाते हैं। छम के दौरान काली टोपी धारण करने वाले साधक के प्रतीक होते हैं, जो शत्रु-नाशक कपाल के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का विनाश करते हुए दिखते हैं। छम नृत्यानुष्ठाने के लिए संगीत-ध्वनियाँ भी विशिष्ट होती हैं और साथ ही वाद्य-यंत्र भी अलग होते हैं। छम नृत्य के लिए प्रयोग होने वाला रगदोङ ताँबे से बना लंबा-सा तुरहीनुमा वाद्ययंत्र होता है, जिसे दो या तीन हिस्सों में अलग किया जा सकता है। रगदोङ को बजाने के लिए विधिवत् शिक्षा लेनी पड़ती है और परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी पड़ती है। रगदोङ की छम नृत्य में मुख्य भूमिका होती है, क्योंकि इसकी धुन पर ही छम नृत्य का संचालन होता है। बुगजल बड़े आकार के मंजीरे या खतल के समान होता है। स्ङा बड़े आकार की गोलाकार लकड़ी का बना हुआ वाद्ययंत्र होता है और इसे एक लंबी धनुषाकार लकड़ी द्वारा बजाया जाता है।
छम नृत्यानुष्ठान गोनपा के विशाल प्रांगण में खुले आसमान के नीचे किया जाता है। यह प्रांगण प्रायः मुख्य मंदिर के सम्मुख होता है। छम नृत्य के दौरान प्रायः उन देवी-देवताओं या धर्मरक्षकों के थङ्का चित्र भी प्रदर्शित किए जाते हैं, जिनका छम होता है। खुले आसमान के नीचे होने वाले इस तांत्रिक अनुष्ठान में प्राकृतिक आपदाएँ, जैसे- बरसात, आँधी आदि न आएँ, इसके लिए भी पूजा की जाती है, तत्पश्चात छम का प्रारंभ होता है। गोनपाओं में आयोजित होने वाले छम नृत्यानुष्ठान को देखने के लिए तमाम श्रद्धालुगण एकत्रित होते हैं। यह नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं, वरन् तांत्रिक अनुष्ठान के लिए होता है, इस कारण इसके दर्शन-मात्र से ही व्यक्ति की सारी विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं। छम नृत्य को देखना शुभ माना जाता है। इस कारण आस्थावान श्रद्धालु छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ के लिए उमड़ पड़ते हैं और खुले आसमान के नीचे श्रद्धाभाव से करबद्ध होकर अपने कल्याण की कामना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवों और धर्मरक्षकों के मुखौटों के दर्शन से ही जीवन में विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं और चित्त को असीमित शांति मिलती है।
लदाख अंचल की गोनपाओं में अलग-अलग तिथियों में आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान लदाख की धर्मभीरु जनता के लिए जीवन के संघर्षों को, जीवन की जटिलताओं और मुसीबतों को झेलने की ताकत देते हैं। छम नृत्यानुष्ठान के दर्शन-लाभ से उनकी आस्था की पुष्टि ही नहीं होती, वरन् उन्हें जीवन जीने की नई दिशा भी मिलती है। विश्व के कल्याण का भाव, सभी जीवों के कल्याण का बोध; सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और करुणा जैसे उदात्त गुणों का विकास भी होता है। संभवतः इसी कारण छम नृत्य के प्रति पर्यटकों की जिज्ञासा भी देखने को मिलती है और प्रतिवर्ष अनेक देशी-विदेशी पर्यटक छम नृत्यानुष्ठान का दर्शन करने के लिए लदाख की यात्रा करते हैं। भारत की पुरातन धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा के संरक्षित स्वरूप के साथ ही हिमालय अंचल की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के रूप में लदाख में प्रचलित छम नृत्य का अपना अतुलनीय स्थान है।  
कार्यकारी संपादक- नूतनवाग्धारा

       (दूरदर्शन केंद्र, लेह द्वारा वृत्तचित्र निर्माण एवं दिनांक 01 अप्रैल, 2016 को 1730 से 1800 बजे तक प्रसारित।) 

Saturday, 24 September 2016

लदाख की थङ्का चित्रकला

लदाख की थङ्का चित्रकला

हिमालय के ऊँचे-ऊँचे पहाड़, आसमान को छूते हुए। पहाड़ों की चोटियों पर चमकती सफेद बर्फ। साफ, धुले हुए जैसे दिखने वाले नीले गगन में तैरते रूई के गोलों जैसे बादलों के झुंड। सूरज की रोशनी में लालिमा से भरी बादलों की टुकड़ियाँ। प्रकृति के इस मनमोहक नजारे को लदाख की धरती पर देखा जा सकता है। लदाख में प्रचलित चित्रकलाओं में प्रकृति के ऐसे नज़ारे देखने को मिलते हैं। लदाख धर्म और साधना की भूमि रही है, इसलिए यहाँ की अधिकांश चित्रकला भी धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाले चित्र इस क्षेत्र में बहुत पुराने समय से प्रचलित रहे होंगे, इसलिए लदाख की गोनपाओं में सुशोभित पट्टचित्र, जिन्हें स्थानीय भाषा में थङ्का कह जाता है, उनमें ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य को देखा जा सकता है। मोटे कपड़े में बने हुए बुद्ध, बोधिसत्व, तांत्रिक देवी-देवताओं और तांत्रिक मंडलों आदि के चित्रों को थङ्का कहा जाता है। अगर अतीत में उतरकर देखें, तो इन पट्टचित्रों या थङ्काओं में लदाख के अतीत की झाँकी देखने को मिलती है।
लदाख के इस प्राकृतिक सौंदर्य के बीच जीवन की जटिलता भी कम नहीं है। आवागमन के साधनों की, संसाधनों की और दैनिक जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं की कमी यहाँ के जीवन को जटिल बना देती है। जब जीवन कठिन हो जाता है और जीवन की कठिनाइयों से जूझने के लिए कोई बाहरी रास्ता नज़र नहीं आता, तब एक ही रास्ता बचता है- आस्था का। अतीत में, जब जीवन की जटिलताएँ बहुत ज्यादा थीं, उस समय आस्था भी प्रबल थी। इसी कारण पूजा और साधना के लिए विविध माध्यमों का विकास हुआ। साधकों और तपस्वियों के लिए साधना के अलग रूप हो सकते हैं, मगर आम जनता के लिए उन कठिन रास्तों को अपनाना कठिन होता है। शायद इसी जरूरत ने आम जनता के लिए आस्था के फलने-फूलने के माध्यमों का विकास किया। बौद्ध धर्म में इसी कारण मूर्तियों, स्तूपों, चित्रों, देवालयों और मठों को पूजा एवं साधना में विशेष स्थान मिला। संस्कृत में श्लोक है-
संबुद्धचित्र-  मूर्त्यादिस्तूपसद्धर्मसंमुखः ।
पुष्पैः धूपैः पदार्थैश्च यथाप्राप्तैः सुपूजयेत् ।।
अर्थात्, भगवान् बुद्ध के चित्र, मूर्ति, स्तूप आदि सद्धर्म के प्रतिरूप हैं। इनके समक्ष अपनी भक्ति-भावना को प्रकट करना ही सच्चा धर्म है। इसलिए पुष्प, धूप और अन्य पूजा-सामग्री के साथ पूरी आस्था के साथ इनकी पूजा करनी चाहिए। इससे पुण्य का लाभ होता है। इसी कारण भगवान् बुद्ध की मूर्तियाँ, उनके चित्र और स्तूप आदि की पूजा का विशेष विधान लदाख अंचल में देखने को मिलता है। विभिन्न परंपराओं तथा शैलियों से संपन्न ये कलाएँ  बोधिप्राप्ति के लिए उपयोगी बनकर लदाख के जनजीवन में गहराई तक उतरी हुई हैं। बौद्ध धर्म में शमथ, अर्थात् मन की शांति पाने का प्रयास ही साधना के प्रथम चरण में होता है। इस प्रकार शमथ या मन की शांति ही साधना की पहली सीढ़ी है, जिसे पाने के बाद अभिज्ञा बल, अर्थात् समझने-विचारने की शक्ति प्राप्त होती है। इस अभिज्ञा बल की साधना से सम्बोधि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार सम्बोधि के स्तर तक पहुँचने के लिए साधकों को शमथ की पहली सीढ़ी चढ़नी होती है, जो मूर्ति तथा चित्रकलाओं के माध्यम से पाई जा सकती है। आचार्य दीपांकर श्रीज्ञान अतिशा ने इसी कारण शमथ की साधना हेतु मूर्ति तथा चित्रकलाओं के महत्त्व पर बल दिया है।
लदाख अंचल अपने अतीत से ही बौद्ध साधना का प्रमुख केंद्र रहा है और यहाँ पर अनेक कलाओं का विकास भी होता रहा है, जिनका महत्त्व बौद्ध धर्म की साधनाओं में, विभिन्न साधना-पद्धतियों में है। स्तूपों, मूर्तियों और भित्तिचित्रों के साथ ही लदाख अंचल में प्रचलित थङ्का चित्रकला इसी कारण अपना विशेष महत्त्व रखती है। लदाख में थङ्का चित्रकला के विकास का इतिहास भी बहुत रोचक और विविधता से भरा हुआ है। भोट भाषा में एक धर्मशासक जिग-तुल का उल्लेख मिलता है, जिन्हें भारतीय परंपरा में राजा भयजित के रूप में जाना जाता है। राजा भयजित ने एक ब्राह्मण के दिवंगत बेटे को पुनः जीवित करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर ब्राह्मण के बेटे का चित्र बनाया और ब्रह्मा जी ने उसे जीवन दिया। इस प्रकार राजा भयजित को संसार के पहले चित्रकार के रूप में जाना गया। राजा भयजित या जिग-तुल से ब्रह्मा जी ने कहा कि जिस तरह पर्वतों में मेरु श्रेष्ठ है, पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, उसी तरह विभिन्न कलाओं में चित्रकला श्रेष्ठ है, इसलिए चित्रकला को प्रोत्साहित करो। इसके उपरांत ही ब्रह्मलोक के राजा और विश्वकर्मा जी ने चित्रकला की शिक्षा उपलब्ध कराई और इसके लाभ को, इससे होने वाले धर्मार्थ को जनता के लिए सुलभ कराया। चित्रकला की उत्पत्ति एवं विकास से संबंधित इस लोककथा का वर्णन बौद्ध ग्रंथ तंग्युर में मिलता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार चित्रकला का उद्भव वर्तमान बिहार के मगध राज्य में हुआ। यहाँ के राजा बिंबिसार और राजा उत्तायण घनिष्ठ मित्र थे और एक-दूसरे को बहुमूल्य उपहार भेजा करते थे। एक बार उत्तायण ने बहुमूल्य मणि बिबिंसार को भेजी। बदले में बिंबिसार ने उन्हें भगवान बुद्ध का चित्र भेजना सुनिश्चित किया। भगवान बुद्ध की अलौकिक छवि से ऐसी विलक्षण किरणें निकलने लगीं कि चित्रकारों को चित्र बनाना ही कठिन हो गया और तब भगवान बुद्ध ने कहा कि कपड़े पर पड़ रही मेरी छाया को ही रंग दो। इस तरह बने हुए चित्र को बिंबिसार ने अपने मित्रको उपहारस्वरूप भेजा और यहीं से चित्रकला की शुरुआत हुई। बौद्ध ग्रंथों में भी भगवान बुद्ध के चित्र बनाने की कला का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में विनय सूक्त, मंजुश्री मूलकल्प और समवरोदया तंत्र आदि का उल्लेख किया जा सकता है। लदाख में थङ्का चित्रकला के विकास को इन कथाओं और ग्रंथों में देखा जा सकता है।


लदाख में थङ्का चित्रकला के विस्तार की एक धारा कश्मीर से आई। कहा जा सकता है कि लदाख अंचल में चित्रकला का प्रारंभिक आगमन कश्मीर से ही हुआ। कश्मीर में हर्ष के समय से ही कुछ ऐसे चित्रकार थे, जिन्हें राजकीय संरक्षण प्राप्त था। कश्मीर में नाग शैली के साथ ही गौड़ीय और कोंकणी शैली भी प्रचलित थी, जो लदाख अंचल के निचले इलाकों में प्रचलित हुई। लदाख में थङ्का चित्रकला की दूसरी धारा तिब्बत से आई। तिब्बत में थङ्का चित्रकला की परंपरा नेपाल और चीन से पहुँची। सातवीं शताब्दी में तिब्बत के राजा स्रोंङ्-चेन-गम्पो ने नेपाल की राजकुमारी भृकुटी देवी और चीन की राजकुमारी कोंग-जोङ् से विवाह किया था। इन दोनों के साथ ही नेपाली चित्रकला शैली और चीनी चित्रकला शैली का तिब्बत में विस्तार हुआ। इस कारण दोनों रानियों को तारादेवी के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा भी प्राप्त हुई है। नेपाली और चीनी चित्रकला परंपरा मूलतः भारतीय ही थी, जो स्थान और समय के अनुरूप अपने परिवर्तित रूप में तिब्बत में विकसित हुई। ग्यारहवीं शताब्दी में तिब्बत के प्रख्यात अनुवादक लोचावा रिंचेन जङ्पो के साथ कश्मीरी चित्रकला परंपरा भी तिब्बत पहुँची। इस तरह तिब्बत में कश्मीरी, पाल, चीनी, नेपाली, मंगोलियाई और खोतानी चित्रकलाओं के संगम से एक नई चित्रकला परंपरा का उदय हुआ। तिब्बत में विकसित हुई इस चित्रकला परंपरा में दो प्रमुख पद्धतियाँ प्रचलित हुईं। इनमें मन्-रिस् चित्रकला परंपरा का विकास नेपाल की शैली के प्रभाव में हुआ। इसमें नीले, हरे और सुनहरे चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है। करमा-गरङिस् या गरचित्र परंपरा का विकास चीनी शैली से हुआ। इसमें हलके रंगों का प्रयोग होता है। तिब्बत का त्सङ् नामक स्थान थङ्का चित्रकला के अध्ययन-अध्यापन एवं निर्माण के लिए प्रसिद्ध था और यहाँ पर विकसित हुई थङ्का चित्रकला शैली को स्थान-नाम के अनुसार त्सङ्-रिस् नाम मिला। लदाख के भिक्षुगणों ने प्रायः यहीं से अध्ययन करके लदाख में त्सङ्-रिस् नामक चित्रकला शैली को विकसित किया। इस कारण लदाख में त्सङ्-रिस् थङ्का चित्रकला अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है।    
जिस समय कश्मीर सहित दुनिया के तमाम देशों में बौद्ध धर्म की महायान परंपरा का अस्तित्व सिमट रहा था, उस समय तिब्बत में यह परंपरा फल-फूल रही थी। लदाख अंचल के अनेक भिक्षु और बौद्ध विद्वान ज्ञानार्जन के लिए तिब्बत जाते थे। लदाख से तिब्बत आवागमन का यह क्रम तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के आसपास अपने चरम पर था। चूँकि महायान साधना पद्धति में चित्रकला का महत्त्वपूर्ण स्थान था, इस कारण लदाख के भिक्षुओं को चित्रकला का ज्ञान अनिवार्य रूप से प्राप्त करना होता था। वे लदाख लौटते समय थङ्का चित्रों के साथ ही इनके निर्माण का ज्ञान भी अपने साथ लाए और कालांतर में लदाख में थङ्का चित्रकला की उस परंपरा का विकास हुआ, जिसे आज हम जीवंत रूप में लदाख की धार्मिक परंपराओं और रिवाजों में देखते हैं। लदाख में विभिन्न कलाओं का विकास पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में हुआ। इसी अवधि में लदाख में थङ्का चित्रकला भी विकसित हुई। लदाख की अनेक गोनपाओं में इस अवधि के थङ्का चित्रों को देखा जा सकता है। इनमें से कई थङ्का चित्र अत्यंत दुर्लभ हैं और धार्मिक महत्त्व के साथ ही यहाँ के निवासियों की कलाप्रियता को भी प्रदर्शित करते हैं।
थङ्का चित्रों को बनाना अत्यंत पुनीत और धार्मिक कार्य माना जाता है। इस कारण थङ्का चित्रकारों को बौद्ध धर्म में बताए गए शील और विनय का पालन करना अनिवार्य होता है। बदलते परिवेश में भले ही नियमों में शिथिलता आई हो, गमर आज भी तङ्का चित्रकार बड़ी सरल और विनम्र जीवन-शैली व्यतीत करते देखे जा सकते हैं। थङ्का चित्रों को बनाने के लिए जिस मोटे कपड़े का प्रयोग होता है, उसे काशिका कहा जाता है। काशी से आने के कारण ही संभवतः इसे काशिका कहा जाता है। कपड़े को चित्रांकन के लिए तैयार करने से पहले गुनगुने पानी में गोंद और चूना मिलाकर भिगोया जाता है, फिर उसे लकड़ी के बने साँचे में कस दिया जाता है। इसे धूप में सुखाने के बाद चूने का पानी छिड़ककर घिसा जाता है। कड़ी मेहनत के बाद यह चित्रांकन के लिए तैयार होता है। थङ्का चित्रों के निर्माण के लिए शास्त्रीय विधि से माप और रंगों का चयन किया जाता है। देवी-देवताओं, धर्मपालों और मंडलों के चित्र-निर्माण हेतु निश्चित माप और रंग-संयोजन होता है। माप और रंग-संयोजन के आधार पर थङ्का चित्र कई प्रकार के होते हैं। लदाख में विभिन्न प्रकार के थङ्का चित्रों को बनाने का प्रचलन है। इनमें त्सोन-थङ् थङ्का विभिन्न प्रकार के तैलीय रंगों को सफेद पृष्ठभूमि में उकेरकर करके बनाई जाती है। सेर-थङ् थङ्का में सोने की परत पर सिंदूरी रंग से चित्रण किया जाता है। ङुल-थङ् में छोन-थङ् और सेर-थङ् का मिश्रण होता है। नग-थङ् थङ्का का निर्माण सफेद कपड़े पर काले रंग की पृष्ठभूमि देकर सुनहरे रंग के साथ रंगकर किया जाता है। थग-डुब थङ्का का निर्माण सोने और चाँदी के धागों से किया जाता है। छ़ेम-डुब थङ्का का निर्माण अनेक धागों की कढ़ाई के द्वारा किया जाता है। रेशमी वस्त्र पर गोस-डु थङ्का का निर्माण होता है, जबकि लेन-देबस् थङ्का में सफेद कपड़े पर कपड़ों के रंग-बिरंगे टुकड़ों को चिपकाकर चित्राकृति दी जाती है। तैलीय रंगों के प्रयोग की सुगमता के कारण वर्तमान में त्सोन-थङ् थङ्का के निर्माण का प्रचलन देखा जा सकता है।
थङ्का निर्माण की प्रकिया में सबसे पहले खाका बनाने का काम होता है, जिसे नक्-च्यत् कहा जाता है। खाके में रंग भरने के काम को त्सोन कहते हैं। रंगों के संयोजन और उनके विस्तार को शिब-छा कहते हैं। चित्र में रंगों को गहरा करके छाया दर्शाने का काम कम-म्दंग्स (skam mdangs) कहलाता है। चित्र में सोने की जैसी चमक पैदा करने हेतु ग्जी (gzi) और सुनहरे रंग से किनारा करने के लिए सेर-च्यत् का कार्य संपन्न किया जाता है और अंत में आँखों के निर्माण स्च्यन-फस के साथ चित्र अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। बने हुए चित्र को उपयोग के लिए तैयार करने और सुरक्षित रखने हेतु सुंदर-से रंग-बिरंगे आयताकार कपड़े कोङ्-शम् में बीचोबीच सिल दिया जाता है। कपड़े के दोनों किनारों पर सुंदर नक्काशीदार बेलनाकार लकड़ी लगाई जाती है, जिस पर कपड़े को लपेटा जा सके। इस प्रकार थङ्का चित्र तैयार हो जाता है।

लदाख की धार्मिक परंपराओं में थङ्का चित्रों का बहुत महत्त्व होता है। इन्हें गोनपाओं में प्रदर्शित किया जाता है। लदाख की अनेक प्रमुख प्राचीन गोनपाओं में अनेक बहुमूल्य थङ्काएँ हैं। इनमें से कई थङ्काएँ पाँच से दस मीटर तक लंबी भी हैं। ये प्राचीन बहुमूल्य थङ्काएँ गोनपाओं के वार्षिक पूजा-अनुष्ठान के समय श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ प्रदर्शित की जाती हैं। बेशकीमती थङ्काओं के साथ ही विभिन्न देवी-देवताओं, अर्हतों, धर्मपालों, तांत्रिक मंडलों की अनेक थङ्काएँ भी गोनपाओं में श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ प्रदर्शित की जाती हैं। लदाख की लोकपरंपरा में थङ्का चित्रकलाओं को जीवित-जीवंत रखने के लिए अनूठी व्यवस्था की गई है। समाज के धनी व्यक्ति अकसर गंभीर बीमारियों से बचने के लिए या किसी गंभीर बीमारी से बच जाने पर थङ्का चित्र का निर्माण कराकर गोनपा में भेंट करते हैं। इसके साथ ही अपने दिवंगत प्रियजन की आत्मा की शांति के लिए भी लोग थङ्का चित्रों का निर्माण कराते हैं और उन्हें गोनपाओं में चढ़ाते हैं। लोकपरंपरा में जीवित रहने के कारण थङ्का चित्रों के निर्माण की पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। लदाख अंचल में थङ्का चित्रकला को संरक्षित एवं सवर्द्धित करने हेतु जम्मू-कश्मीर के हस्तशिल्प विभाग द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। आजकल परंपरागत थङ्का चित्रकला के साथ चित्रांकन की आधुनिक पद्धतियों के संयोजन से चित्रांकन की नई तकनीक विकसित हुई है, जिसकी आजकल बहुत माँग है। लदाख में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को भी थङ्का चित्र बहुत प्रभावित करते हैं और वे भी अत्यंत आस्था के साथ इन्हें खरीदते हैं।
इस प्रकार लदाख अंचल में थङ्का चित्रकला अपने गौरवपूर्ण अतीत के साथ लदाख में बौद्ध धर्म की अपनी अनूठी धार्मिक पहचान को सहेजे हुए है। लदाख की थङ्का चित्रकला के माध्यम से एक ओर भारतीय चित्रकला संरक्षित है, तो दूसरी ओर यह थङ्का चित्रकला देश-दुनिया को अपने अनोखे आध्यात्मिक ज्ञान से आलोकित भी कर रही है।
कार्यकारी संपादक- नूतनवाग्धारा


      (दूरदर्शन केंद्र, लेह-लदाख द्वारा वृत्तचित्र-निर्मा एवं दिनांक 13 नवंबर, 2015 को 1800 बजे प्रसारित)
(एक तिब्बती थङ्का चित्रकार)