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Saturday 3 January 2015

संघर्ष बस संघर्ष : कविताओं में यथार्थ के स्पंदन

संघर्ष बस संघर्ष : कविताओं में यथार्थ के स्पंदन

संघर्ष ऐसी प्रक्रिया है, जो समाज की छोटी से छोटी इकाई से लगाकर बड़ी से बड़ी इकाई तक, स्वयं में सामाजिक इकाई बनकर रह गए आज के व्यक्ति तक इस तरह चलती है, जो कभी असंतोष, असहमति, पीड़ा, विद्रोह को जन्म देती है तो कभी जीवन को गति और सार्थकता देती है। यह प्रक्रिया मानव-मात्र में ही नहीं, समस्त जड़-चेतन में व्याप्त है, युगों-युगों से। संघर्ष की अभिव्यक्ति के विविध माध्यम संघर्ष की सार्थकता के प्रतिमान बनते हैं। जीवन के इस गुण-धर्म से साहित्यकार का वास्ता भी युगों-युगों का है। ऐसे में आज के साहित्यकार का संघर्ष की प्रक्रिया से गहरा जुड़ाव होना स्वतः-स्वाभाविक है।
संघर्ष के साथ आज की कविता का संबंध वर्तमान युगबोध के सापेक्ष है। जीवन की यातनाओं को, भोगे हुए यथार्थ को, समाज की विसंगतियों को और परिवर्तित होते मूल्यों के संक्रमण को कविता में उसी शिद्दत के साथ प्रस्तुत करने, प्रकट करने का सार्थक प्रयास अमृतसर (पंजाब) निवासी शुभदर्शन की काव्य-कृति ‘संघर्ष बस संघर्ष’ में हुआ है। एक जागरूक पत्रकार अपने समय के यथार्थ को, अपने परिवेश को विविध आयामों से देखता भी है, विश्लेषण भी करता है और सत्यान्वेषण की कामना से संप्रेषित भी करता है। ‘संघर्ष बस संघर्ष’ कृति के रचनाकार शुभदर्शन एक पत्रकार होने के नाते स्वयं को इन्ही विशिष्टताओं के साथ कवि-कर्म में उतारते हैं। इसी कारण शुभदर्शन का समीक्ष्य काव्य-संग्रह एक जरूरी दस्तावेज़ भी बन जाता है और यथार्थ को परखने का एक मानदंड भी बन जाता है।
‘संघर्ष बस संघर्ष’ में कवि-पत्रकार शुभदर्शन की सैंतीस कविताएँ संकलित हैं। संग्रह की पहली कविता- घुटन के पैबंद में ही व्यवस्था की विद्रूपताओं के बीच घुटते रहने की पीड़ा फूट पड़ती है-
कब खुलेगा दरवाजा/कब देगा कोई दस्तक/उलाहनों की संकरी गली में/लगी उम्मीदों की हाट पर।। (पृ.19)
भोली थी माँ कविता में माँ के बहाने आधी दुनिया के उस दर्द को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे भोगते रहना कभी मजबूरी लगता है, कभी सरल स्वभाव लगता है तो कभी भावनाओं का व्यापार लगता है। भोली-सी माँ जख्म़ों की चारदीवारी और दुख की छत को घर समझते हुए सबकुछ सहती जाती है। कभी परिवार के लिए, कभी बच्चों की खातिर अपने जीवन को गलाते हुए जब माँ रूपी सुरक्षा कवच टूट जाता है, तब उपजने वाली रिक्तता अहसास दिलाती है कि माँ का होना जीवन में कितनी अहमियत रखता है। वसीयत से मनफी, तस्वीर में अहसास नहीं होता, जड़ उखड़ने से और संघर्ष की विरासत कविताओं में माँ के साथ जुड़कर यथार्थ के विविध आयाम इस तरह प्रस्तुत होते हैं कि एक-एक शब्द चलचित्र के एक-एक दृश्य की तरह दौड़ता नज़र आता है। एक ओर माँ है, सबकुछ न्योछावर करती हुई और दूसरी ओर आज के युग का कृष्णा है-
कृष्ण की खाल में/आ चुका है कंस/कैसे निभेगा/गोपियों का साथ/बलात्कार व सैक्स हिंसा में/बदल गईं हैं--अठखेलियाँ/भारी हो गया है/पाप का गोवर्धन/पूतना का दूध पीते-पीते/अब मथुरा नहीं जाएगा कृष्ण/न ही करेगा वध/किसी कंस का/वह तो व्यस्त है/भरने तिजोरी/स्विस बैंकों के चेस्ट।। (कब बड़े होगे कृष्णा, पृ.123)
माँ के बहाने कवि ने घटती संवेदना, जड़ से उखड़ते जाने की त्रासदी, संस्कारों के संक्रमण, पलायन, गँवई-गाँव की विरासत के बिखराव और मानवीय मूल्यों के विघटन की स्थितियों को परखा है। संस्कार का सॉफ्टवेयर! कविता कंप्यूटर के युग में इन्ही स्थितियों का मार्मिक चित्रण करती है।
शुभदर्शन की कविताओं में गौरैया चिड़िया के रूप में एक और प्रतीक है। गाँवों के घरों में, लोगों के आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव के बीच गौरैया का भी स्थान है। वह मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं की संवाहक है। शहरीकरण, आधुनिकीकरण और सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों का संक्रमण उस गौरैया के लिए घातक बन जाता है। शहर की ओर गौरैया और सैय्याद गौरैया कविताएँ इस प्रतीक को साथ लेकर ऐसा ताना-बाना बुनतीं हैं कि समाज की मानसिकता में आ रहे बदलाव की पूरी तसवीर नज़रों के सामने आ जाती है। इस बदलाव से टकराता कवि अभिशप्त अभिमन्यु बनकर हारने को विवश हो जाता है, फिर भी उसके हाथ में गांडीव थमा दिया जाता है, संघर्षरत रहने के लिए। इसी संघर्ष को, हारकर भी निरंतर संघर्षरत रहने की विवशता को, या अनिवार्यता को कवि अपने लोगों के साथ बाँटता भी है और समाज की मानसिकता का पर्दाफाश भी करता है-
इतने उतावले क्यों हो/दोस्त/इत्मीनान रखो/तुमसे वादा किया है/सच बताने का/--बताऊँगा/जरा रुको/अभी मुझे पूरी करनी है/--आत्मकथा/शायद वहीं से मिल जाएं तुम्हें/उन सवालों के उत्तर/जो/समय-समय पर/तुमने उछाले थे/भरी सभा में/मुझे जलील करने। (आत्मकथा, पृ.89)
समीक्ष्य कृति में कवि का संघर्ष वर्तमान के यथार्थ की विकृतियों के साथ भी होता है और वैचारिकता के स्तर पर जीवन जीने के दर्शन-पक्ष पर उभरती विकृतियों के स्तर पर भी होता है। इसमें सबसे अधिक कचोटने वाली स्थिति संवेदनहीनता की बनती है, जब व्यक्ति अपने परिवेश में घटित होने वाली घटनाओं से इस प्रकार विलग हो जाता है, मानो वह संज्ञाशून्य हो-
भागम-दौड़ के युग में/खिलौना बने संस्कार/चलती-फिरती मूरतें/क्या फर्क है--दोनों में /सोचता है राजा
वे भागदौड़ कर रहे हैं/और हम बिसात पर बैठे निभा रहे हैं/--फ़र्ज/नचा रहे हैं लोगों को/वे भी संवेदनहीन/--हम भी।। (संवेदनाहीन, पृ.86-87)
कवि निहायत दार्शनिक अंदाज़ में कहता है-
संवेदना रिश्तों में होती है/संवेदना घर में होती है/मानवता में भी होती है/--संवेदना/पर दोस्त/जब तन जाती है/अवसादों की भृकुटी/तो मजबूर हो जाता है/--आदमी/उसी संवेदना का गला दबाने/जिसके दावे करते/नहीं थकती जुबान।। (संवेदना और व्यवहार, पृ.88)
समीक्ष्य कृति की लगभग सभी कविताएँ दैनंदिन जीवन की, अपने आस-पास की अनेक स्थूल-सूक्ष्म घटनाओं का तार्किक-भावुक परीक्षण-अन्वेषण करतीं हैं। इनके साथ ही दर्शन का पक्ष भी जुड़ा है, जो सहजता के साथ रास्ता दिखाने का प्रयास भी करता है, बिना उपदेशात्मक प्रपंच का परचम उठाए हुए। बहुआयामी-बहुविध संघर्ष का स्वरूप कविताओं में ऐसा है, जिसे बदलाव की उम्मीद है, जिसमें सकारात्मक वैचारिकी का ऐसा पक्ष है, जो पाठक के मन को उद्वेलित किए बिना नहीं छोड़ता। ‘संघर्ष बस संघर्ष’ की कविताएँ पाठक की संवेदना को झंकृत कर संघर्ष की ओर उन्मुख कर देतीं हैं। गहन मंथन के लिए प्रेरित कर देतीं हैं।
समीक्ष्य कृति की शुरुआत में ही डॉ. रमेश कुंतल मेघ द्वारा किया गया विश्लेषण है। इसके जरिए पुस्तक की प्रभावोत्पादकता में बढ़ोत्तरी हो जाती है। ब्लर्ब पर डॉ. पांडेय शशिभूषण शीतांशु और डॉ. हुकुमचंद राजपाल की टिप्पणियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन सभी को मिलाकर पुस्तक को पढ़ने से पहले पाठक के मन में एक वैचारिक माहौल बन जाता है और पुस्तक अपने उद्देश्य तक सहृदय पाठक को पहुँचाने में सफल हो जाती है। शुभदर्शन की कृति ‘संघर्ष बस संघर्ष’ इसी कारण हिंदी साहित्य के लिए, समय के इतिहास के लिए और वर्तमान के संदर्भ के लिए महत्त्वपूर्ण भी है, संग्रहणीय भी है।
(संघर्ष बस संघर्ष, शुभदर्शन, युक्ति प्रकाशन, दिल्ली-85, वर्ष- 2011, मूल्य- 250/-)

डॉ. राहुल मिश्र

Wednesday 10 December 2014

हिंदी साहित्य के भारतेंदु युग में मूल्य

हिंदी साहित्य के भारतेंदु युग में मूल्य
सामान्य रूप से ‘मूल्य’ शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ होता है और अर्थशास्त्रीय कार्य-व्यवहारों में ‘मूल्य’ शब्द का प्रयोग किसी वस्तु की भौतिक उपादेयता को भौतिक रूप से ही प्रकट करने या सिद्ध करने के अर्थ में होता है। दर्शन के धरातल पर मूल्य का अर्थ अर्थशास्त्रीय ‘मूल्य’ से एकदम अलग और व्यापक होता है।
दर्शन के क्षेत्र में मूल्य को उसके व्यापक अर्थों में परिभाषित और व्याख्यायित करने की परंपरा पाश्चात्य दर्शन के प्रभाव से भारत में विकसित हुई है। भारतीय दर्शन जिन आदर्श तत्त्वों की स्थापना की बात कहता है, उनकी उपादेयता का मूल्यांकन करके पाश्चात्य दर्शन ‘मूल्यवाद’ की अवधारणा को स्थापित करता है। इतना ही नहीं, पाश्चात्य दर्शन पारलौकिक या अभौतिक तत्त्वों के साथ ही लौकिक या भौतिक तत्त्वों की उपादेयता का विचार भी करता है और उन्हें अलग-अलग वर्गों में विभक्त करके मानव तथा मानवता के लिए उपयुक्तता के क्रम का निर्धारण भी करता है। इस प्रकार मूल्यवाद के अंतर्गत वे सभी तत्त्व एवं पदार्थ समाहित हो जाते हैं, जो मानव की इच्छाओं से पूर्णतः या अंशतः जुड़े हुए होते हैं।
दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में ‘मूल्य’ के व्याख्याता अर्बन ने इसी आधार पर मूल्यों के निम्न प्रकार बताए हैं।
1.         शारीरिक मूल्य- जिससे शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है; अन्न, भोजन आदि।
2.         आर्थिक मूल्य- धन, संपत्ति आदि।
3.         मनोरंजन का मूल्य- खेल आदि मन लगाने की वस्तुएँ।
4.         साहचर्य का मूल्य- मित्रता आदि।
5.         चारित्रिक मूल्य- सच्चाई, ईमानदारी आदि।
6.         सौंदर्य संबंधी मूल्य- कला, सुंदरता, चित्रकारी आदि।
7.         बौद्धिक मूल्य- ज्ञान।
8.         धार्मिक मूल्य- ईश्वर, आत्मा आदि।
इनमें से शारीरिक मूल्य, आर्थिक मूल्य और मनोरंजन का मूल्य जैविक मूल्यों के अंतर्गत आते हैं। साहचर्य का मूल्य और चारित्रिक मूल्य सामाजिक मूल्यों के अंतर्गत आते हैं। सौंदर्य संबंधी मूल्य, बौद्धिक मूल्य और धार्मिक मूल्य आध्यात्मिक मूल्यों के अंतर्गत आते हैं।1
इन सभी मूल्यों के अंतर्गत मानवीय कार्य-व्यवहारों से लेकर समाज और विश्व तक की गतिविधियाँ, कार्य-व्यवहार और दिशा-दशा संचालित होती है, नियंत्रित होती है। डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ‘मूल्य’ को व्याख्यायित करते हुए लिखते हैं कि, “हमारे आचरणों और व्यवहारों का समूहीकरण ही ‘मूल्य’ नामक धारणा के रूप में स्थापित होता है। ये धारणाएँ ही हमारे व्यवहारों का निर्देशन करतीं और आदर्शों की स्थापना करती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य अच्छे-बुरे और सही-गलत की पहचान और घोषणा करता है। इसीलिए जीवन की परिस्थितियों में परिवर्तन होने के साथ-साथ मूल्यों में भी परिवर्तन होता है।”2 जीवन के साथ साहित्य के समानुपातिक संबंध होते हैं और इसीलिए मूल्यों का यह परिवर्तन साहित्य में भी स्पष्ट परिलक्षित होता है।
साहित्य समाज का दर्पण है, यह उक्ति साहित्य साथ समाज के संबंधों को व्याख्यायित करने के लिए सर्वाधिक प्रयुक्त होती रही है और आज भी प्रयोग की जाती है। यदि इस आधार पर देखा जाए तो मूल्यवाद  के साथ साहित्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है। इसके साथ ही साहित्य समाज का दीपक होता है, इस उक्ति पर विचार किया जाए तो निस्संदेह स्वीकार करना होगा कि जब समाज मूल्यों से विलग होकर अपनी ऊर्जा को मानवताविरोधी गतिविधियों में लगाना प्रारंभ कर देता है, तब साहित्य उदात्त मानवीय मूल्यों की दुहाई देकर दीपक की भाँति समाज को सही रास्ता दिखाने का कार्य करता है। इस प्रकार मूल्यवाद  के साथ साहित्य के घनिष्ठ अंतर्संबंधों को जाना-समझा जा सकता है।
मूल्यवाद  की अवधारणा हिंदी साहित्य में घोषित तौर पर दिखाई नहीं देती, इसके बावजूद हिंदी साहित्य के इतिहास के युग निर्धारण में साहित्य के साथ जुड़े मानवीय मूल्यों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हिंदी साहित्येतिहास के आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल का कालनिर्धारण कालखंड विशेष में प्रचलित मूल्यों का प्रतिनिधि प्रतीत होता है। हिंदी साहित्य के इतिहास के आधुनिक काल में भी मूल्य की यह अवधारणा स्पष्ट परिलक्षित होती है।
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की शुरुआत भारतेंदु युग से होती है। हिंदी साहित्येतिहासकारों ने सन् 1857 की प्रथम स्वाधीनता क्रांति को आधार बनाकर हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के प्रारंभ का कालखंड निर्धारित किया है। सन् 1850 में भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म और उनके साहित्यिक अवदान को ध्यान में रखकर आधुनिक युग के प्रथम उपविभाजन, सन् 1857 से सन् 1900 ई. को भारतेंदु युग की संज्ञा दी गई है। अर्बन द्वारा निर्धारित किए गए मानवीय मूल्यों के आधार पर भारतेंदु युग का मूल्यांकन इस युग की साहित्यिक विशिष्टताओं को जानने-समझने हेतु महत्त्वपूर्ण है।
सन् 1857 की क्रांति भारतीय समाज के लिए एकदम अभूतपूर्व घटना थी। इस क्रांति ने भारतीय समाज की दिशा और दशा को परिवर्तित किया। समाज के साथ ही साहित्य में, विचारों में बदलाव के एक नए दौर की शुरुआत हुई। परिवर्तन की इस प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि, “अंग्रेजों ने अपनी आर्थिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक नीतियों में परिवर्तन किया। इस देश के लोग भी नये संदर्भ में कुछ नया सोचने और करने के लिए बाध्य हुए। साहित्य मनुष्य के बृहत्तर सुख-दुःख के साथ पहली बार जुड़ा। यह प्रक्रिया भारतेंदु के समय में हुई, वह भी गद्य के माध्यम से। आधुनिक जीवन-चेतना की जैसी चिनगारियाँ गद्य में दिखायी पड़ीं, वैसी पद्य में नहीं।”3
भारतेंदु युग में गद्य के माध्यम से विकसित हुई आधुनिक जीवन-चेतना और नवीन वैचारिकता की सीधा संबंध बौद्धिक मूल्य, चारित्रिक मूल्य, साहचर्य का मूल्य और सौंदर्य संबंधी मूल्य से है। भारतेंदु युग के पूर्ववर्ती रीतिकाल में साहित्य जिस प्रकार मनोरंजन के मूल्य, शारीरिक मूल्य और आर्थिक मूल्य से जुड़कर अनुत्पादक हो चुका था, उस परंपरा को त्यागकर भारतेंदु युग में साहित्य का पुनर्जागरण हुआ। भारतेंदु युगीन काव्य एवं गद्य साहित्य की प्रवृत्तियों का मूल्यांकन इस तथ्य को प्रभावी रूप से स्थापित करने हेतु महत्त्वपूर्ण होगा।
राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत आदर्शवादी काव्य-चेतना का प्रारंभ भारतेंदु युग से होता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस काव्य-चेतना के प्रवर्तक कवि थे। “उन्होने अपनी विभिन्न रचनाओं में धार्मिक पाखंडों, सामाजिक दुराचारों एवं राजनीतिक पराधीनता का दिग्दर्शन स्पष्ट रूप में करवाया है।”4 भारतेंदु युग में राष्ट्र का अर्थ छोटे-छोटे रजवाड़ों, रियासतों में बँटे भारत को एक सूत्र में बाँधने के आशय से था। वीरगाथा कालीन प्रवृत्तियों से अलग हटकर और क्षेत्रीय संकीर्णता को त्यागकर समूचे भारत को एक राष्ट्र की दृष्टि से देखने की यह नई शुरुआत आदर्श मानवीय मूल्यों की स्थपना का सर्वथा नवीन आयाम है। इसी से जुड़ा हुआ पक्ष राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य भाषा का है। बुंदेली, बघेली, अवधी, ब्रज आदि क्षेत्रीय बोलियों में बँटे संपूर्ण हिंदी भाषी क्षेत्र को एक सूत्र में बाँधने का कार्य भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने किया। समूचे देश को जोड़ने और आपसी वैमनस्य को समाप्त करके अंग्रेजों के खिलाफ संगठित करने में भारतेंदु युगीन साहित्य का योगदान एक ओर अभूतपूर्व और मूल्यवान है तो दूसरी ओर साहचर्य का मूल्य साहित्य के माध्यम से समाज में स्थापित करने के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
बौद्धिक मूल्य के स्तर पर भी भारतेंदु युगीन साहित्य खरा उतरता है। जहाँ एक ओर अंग्रेजों के विरोध में उस युग के साहित्यकार लगे हुए थे, वहीं दूसरी ओर खुले हृदय से अंग्रेजी भाषा के साहित्य की विशिष्टताओं को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात् भी कर रहे थे। संस्कृत साहित्य के साथ ही अंग्रेजी साहित्य का हिंदी अनुवाद भारतेंदु युग की अपनी विशेषता है। भारतेंदु मंडल के कवि श्रीधर पाठक ने अंग्रेजी की अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों का खड़ीबोली हिंदी और ब्रजभाषा में अनुवाद किया। बौद्धिक मूल्य के साथ ही सौंदर्य संबंधी मूल्य और मनोरंजन का मूल्य भारतेंदु युग में प्रचलित समस्यापूर्ति की काव्य पद्धति में देखने को मिलता है। “कवियों की प्रतिभा और रचनाकौशल को परखने के लिए कविगोष्ठियों और कवि-समाजों में कठिन-से-कठिन विषयों पर समस्यापूर्ति करायी जाती थी। भारतेंदु द्वारा काशी में स्थापित कविता-वर्द्धिनी-सभा, कानपुर का रसिक समाज, बाबा सुमेर सिंह द्वारा निज़ामाबाद (ज़िला आज़मगढ़) में स्थापित कवि-समाज आदि ऐसे मंच थे, जहाँ नियमित रूप से कवि गोष्ठियाँ होती थीं और समस्यापूरण को प्रतियोगिता के रूप में प्रोत्साहन दिया जाता था। प्रतिष्ठित कवि इसमें भाग लेने में संकोच नहीं करते थे और नये कवियों का इससे यथेष्ट उत्साहवर्द्धन होता था।”5
भारतेंदु युगीन हास्य-व्यंग्य भले ही मनोरंजन के मूल्य से जुड़ा हुआ हो, मगर इसमें भी सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रदर्शन इतनी गहराई के साथ उभरता है कि हास्य-व्यंग्य में सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों की उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता। प्रस्तुत है एक बानगी-
जग  जानैं  इंगलिश  हमैं,  वाणी  वस्त्रहिं  जोय।
मिटै बदन कर श्याम रंग-जन्म सुफल तब होय।।
और
मुँह जब लागै तब नहिं छूटे, जाति  मान  धन सब  कुछ  लूटे।
पागल कर मोहिं करे खराब, क्यों सखि सज्जन? नहीं सराब।।
भारतेंदु युगीन साहित्य में परिलक्षित धार्मिक मूल्यों पर साहचर्य के मूल्यों, चारित्रिक मूल्यों और बौद्धिक मूल्यों का समावेश मिलता है। भारतेंदु युगीन भक्ति-भावना कड़े धार्मिक बंधनों में जकड़ी हुई नहीं थी, वरन् सभी धर्मों, मतों पंथों के समन्वय से; व्यावहारिकता और खुलेपन से तथा देश के प्रति अनुराग से जुड़कर विकसित हुई थी। फलतः ऐसी भक्ति-भावना ने समाज को जोड़ने का कार्य किया और भक्ति से जोड़कर राष्ट्रप्रेम की अलख जगाने का कार्य किया। भारतेंदु युगीन भक्ति भावना ने धार्मिक पाखंडों, कुरीतियों का भी जमकर विरोध किया। इस प्रकार भारतेंदु युगीन काव्य की भक्ति-भावना विषयक प्रवृत्ति भी उच्चतम मूल्यों की स्थापना के मापदण्ड पर खरी उतरती है।
भारतेंदु युगीन कवियों ने रीतिकालीन दरबारी काव्य परंपरा को त्यागकर जनता की समस्याओं का निरूपण व्यापक रूप में किया है। भारतेंदु युगीन काव्य की सामाजिक चेतना नारी-शिक्षा, विधवाओं की दुर्दशा, छुआछूत, भेदभाव जैसी सामाजिक समस्याओं के विरोध में खड़ी होती है। इस बदलाव के संदर्भ में डॉ. साधना शाह लिखती हैं कि, “अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण चीजों को देखने-परखने के हमारे रवैये में अंतर आया। सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की गई। परंपरागत धार्मिक साहित्य और नवीन औद्योगिक युग के बीच अंतर्विरोध सामने आया। हमने महसूस किया कि हम जिस तरह का जीवन जी रहे हैं। वह अप्रगतिशील और दकियानूसी है। परिणामतः सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में हमारे मध्ययुगीन बोध के खिलाफ जनमत बनने लगा। लोग आधुनिक मूल्यों के प्रति आकृष्ट होने लगे।”6
भारतेंदु युगीन गद्य साहित्य में नवीन मूल्यों की स्थापना की प्रवृत्ति काव्य की अपेक्षा सशक्त रूप में दृष्टिगत होती है। इसका प्रमुख कारण गद्य की यथार्थ से निकटता और अभिव्यक्ति की सशक्तता है। भारतेंदु युग में हिंदी नाटकों से ही गद्य की शुरुआत होती है। इस तथ्य के पीछे नाटकों की सामाजिकता, सम्प्रेषण की प्रभावोत्पादकता और नाटकों के मंचन का सांगठनिक कौशल (Unity of Action, Time & Place) कार्य करता है। “ब्राह्मसमाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज  और आगे चलकर स्वयं भारतेंदु द्वारा संस्थापित तदीय समाज के नामकरण, और उनके कार्यक्रम इस मान्यता को भली-भाँति पुष्ट करते हैं। इधर नाटक सभी साहित्य और कला-माध्यमों के बीच अपनी प्रकृति में सर्वाधिक सामाजिक है। रंगमंच पर उसका प्रस्तुतीकरण अनेक प्रकार के कलाकारों के सहयोग से होता है, वैसे ही उसका आस्वादन समाज के रूप में किया जाता है।”7 मनोरंजन के मूल्य के साथ ही साहचर्य के मूल्य की स्थापना का साहित्य में और समाज में इससे बढ़कर कोई दूसरा उदाहरण खोज पाना असंभव की हद तक कठिन होगा।
भारतेंदु युग को हिंदी उपन्यासों की शुरुआत का युग भी माना जाता है। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में भारतेंदु मंडल के लेखक ठाकुर जगन्मोहन सिंह के उपन्यास श्यामा स्वप्न का उल्लेख करना प्रासंगिक और समीचीन होगा। “जिस नवोदित उत्तर भारतीय मध्य वर्ग की आशा-आकांक्षाओं और जीवन मूल्यों के बहुविध तनावों की दृष्टि से हिंदी उपन्यास का उदय हुआ, श्यामा स्वप्न  उस प्रक्रिया को स्थगित और निलंबित करने वाला उपन्यास है।”8 संभवतः इसी कारण श्यामा स्वप्न  की तीव्र-तीक्ष्ण आलोचना उस युग में हुई और यह क्रम वर्तमान में भी जारी है। तत्कालीन समाज में प्रचलित मूल्यों से अलग हटने पर साहित्य को भी आलोचना का शिकार बनना पड़ता है। इससे अलग हिंदी के पहले उपन्यासकार की प्रतिष्ठा प्राप्त लाला श्रीनिवास दास के उपन्यास परीक्षा गुरु  में तत्कालीन समय और समाज की स्थितियों का, बदलते मानव-मूल्यों का सटीक प्रस्तुतीकरण हुआ है। लाला श्रीनिवास दास परीक्षा गुरु  की भूमिका में इसका खुलासा कर देते हैं- “इस पुस्तक के रचनेमैं मुझको महाभारतादि संस्कृत, गुलिस्ताँ वगैरे फ़ारसी, स्पेक्टेटर, लार्ड बेकन, गोल्डस्मिथ, विलियम कूपर आदिके पुराने लेखों और स्त्रीबोध आदिके बर्तमान रिसालौंसे बड़ी सहायता मिली है। इसलिए इन सबका मैं बहुत उपकार माना हूँ...”9
कमोबेश ऐसे ही तथ्य तत्कालीन निबंध साहित्य और नवोदित कहानी विधा के साथ जुड़े हैं। पुनर्जागरण के प्रभाव के फलस्वरूप समाज में प्रतिष्ठित होते जा रहे उदात्त मानवीय मूल्य भारतेंदु युगीन साहित्य में प्रतिष्ठित होकर समाज को एक नई दिशा और नवीन वैचारिक शक्ति प्रदान करने का कार्य कर रहे थे। अर्बन द्वारा बताए गए शारीरिक और आर्थिक मूल्यों की, अर्थात् साहित्य सृजन के माध्यम से जीविका चलाने और साहित्य को अर्थार्जन का माध्यम बनाने की प्रवृत्ति तत्कालीन साहित्याकारों में नहीं थी।
तर्कबुद्धिवादी दार्शनिक नीत्शे ने मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन की बात कही है। “उसने समस्त मूल्यों के मूल्यांकन पर बल दिया है। उनमें यदि प्राचीन मूल्य शक्ति उपार्जन की कसौटी पर खरे उतरें तो उन्हें वर्तमान समय के लिए भी मूल्यवान माना जा सकता है। यह मानव मूल्यों का परीक्षण है।”10 भारतेंदु युगीन साहित्य में नीत्से की इस अवधारणा को भी देखा जा सकता है, जो पूर्ववर्ती साहित्यिक युगों से भारतेंदु युग में आई है।
समग्रतः, हिंदी का भारतेंदु युगीन साहित्य उत्कृष्टतम मानवीय मूल्यों की स्थापना के मानदण्ड पर खरा उतरता है। अपनी पूर्ववर्ती युगीन प्रवृत्तियों को त्यागकर, समय और समाज की आवश्यकता के अनुरूप सार्थक मूल्यों को आत्मसात कर भारतेंदु युगीन साहित्य ने ज्ञान के प्रति मानवीय आग्रह को न केवल तृप्त किया है, वरन् इसी आधार पर हिंदी के आधुनिक युग की आधारशिला रखकर हिंदी साहित्य को नई दिशा देने का सार्थक प्रयास भी किया है।

संदर्भ:
1.   नीतिशास्त्र की रूपरेखा, अशोक कुमार वर्मा, मोतीलाल बनारसीदास, नई दिल्ली, 1954, पृ॰ 206
2.   स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 1996, पृ॰ 31
3.   हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. बच्चन सिंह, संपादक- डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा, सं. 2011, पृ॰ 401
4.   हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, द्वितीय खण्ड, डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त, लोकभारती, इलाहाबाद, सं. 2004, पृ॰ 18
5.   हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. बच्चन सिंह, संपादक- डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा, सं. 2011, पृ॰ 446-447
6.   हिंदी कहानी : संरचना और संवेदना, डॉ. साधना शाह, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000, पृ॰ 14
7.  हिंदी गद्य : विन्यास और विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती, इलाहबाद, 1996, पृ॰ 130
8.  श्यामा स्वप्न : समय, समाज और सामाजिक से उदासीन आख्यान, मधुरेश, कथाक्रम,लखनऊ, अप्रैल-जून 2008, पृ॰ 12
9.  वेब रेफ़रेंस, www.hindisamay.com/upanyas/pariksha_guru.htm
10.  नीतिशास्त्र की रूपरेखा, अशोक कुमार वर्मा, मोतीलाल बनारसीदास, नई दिल्ली, 1954, पृ॰ 213
डॉ. राहुल मिश्र

निर्गुण तथा सगुण पंथ के प्रतिनिधि कवि

सी. बी. खेडगीज् महाविद्यालय, अक्कलकोट, सोलापुर (महाराष्ट्र) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी, दिनांक- 20-21 दिसंबर, 2013 हेतु विषय स्थापना
निर्गुण तथा सगुण पंथ के प्रतिनिधि कवि
भारत की दक्षिण काशी के नाम से विख्यात सोलापुर के उत्तर की ओर स्थित अहमदनगर और पश्चिम की ओर स्थित सतारा का भक्ति-काव्य परंपरा में अद्वितीय योगदान है। भगवान दत्तात्रेय के अवतार स्वामी समर्थ महाराज की नगरी अक्कलकोट से लगभग 100 किलोमीटर दूर पंढरपुर तीर्थ हिंदी साहित्य की उस परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसकी चर्चा के लिए हम सभी यहाँ उपस्थित हैं। अहमदनगर के आपेगाँव के संत ज्ञानेश्वर और सतारा के नरसीबामणी गाँव के संत नामदेव पंढरपुर की वारी (यात्रा) के माध्यम से प्रचलित हुए वारकरी संप्रदाय के प्रमुख संत माने जाते हैं। मुक्ताबाई, संत तुकाराम और संत एकनाथ ने इस परंपरा को समृद्ध-सशक्त किया। वारकरी संप्रदाय के साथ ही महानुभाव संप्रदाय के प्रवर्तक स्वामी चक्रधर ने भी भक्ति-काव्य परंपरा के विकास में योगदान दिया। इस प्रकार इस क्षेत्र से ऐसी भक्ति परंपरा का उदय हुआ, जिसे विविध संप्रदायों, पंथों- नाथ, महानुभाव, वारकरी, मालकरी आदि में बाँटकर भी देखा जा सकता है और समग्र धारा के रूप में भी देखा जा सकता है। भक्ति-काव्य की इस परंपरा ने संत नामदेव के नेतृत्व में उत्तर भारत में उदित हो रही भक्ति-काव्य परंपरा को सक्षम और समर्थ बनाने में अद्वितीय योगदान दिया।
महानुभाव संप्रदाय में निर्गुण की अपेक्षा सगुण को अधिक महत्त्व दिया गया, जबकि परवर्ती वारकरी संप्रदाय के संतों ने ब्रह्म को अनादि, नित्य, ज्ञानमय, अव्यक्त, निर्गुण और सर्वव्यापक मानते हुए निर्गुण रूप को भी महत्त्व दिया और निर्गुण ईश्वर ही सगुण के रूप में अवतरित होता है, यह कहकर सगुण रूप को भी महत्त्व दिया। इसके साथ ही महाराष्ट्र में संतकाव्य परंपरा के आदिकवि मुकुंदराज (1127-1200 ई.) ने अपने ग्रंथ ‘विवेक सिंधु’ (1190 ई.) में सगुण, निर्गुण, गुरु का महत्त्व, ब्रह्म, जीव, माया आदि विषयों का प्रतिपादन जनसाधारण की भाषा में किया। भारतवर्ष की संतकाव्य परंपरा का यह पहला काव्यग्रंथ माना जाता है।
संत शब्द का सामान्य अर्थ सज्जन होता है। मराठी व बाद में हिंदी कवियों ने ‘संत’ शब्द का अपने वर्ग के लिए इतना अधिक प्रयोग किया कि इस शब्द के साथ उनका गहरा और अभिन्न संबंध स्थापित हो गया। महात्मा चक्रधर, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत निवृत्तिनाथ, संत सोपानदेव और संत एकनाथ आदि संत कवियों के द्वारा रचित भक्ति-काव्य इसी आधार पर कोई विभाजक रेखा नहीं खींचता है। मराठी संत कवियों द्वारा सृजित भक्ति-काव्य प्रेरणास्रोत बनकर, एक आंदोलन का स्वरूप लेकर जब उत्तर भारत की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ करता है, तब बड़ा बदलाव उत्तर भारत की भक्ति-काव्य परंपरा में देखने को मिलता है।
 उपासनाभेद का आश्रय लेकर सगुण और निर्गुण पंथ जैसे दो वर्गों की कल्पना की गई और हिंदी साहित्येतिहासकारों ने इसी आधार पर समग्र भक्ति साहित्य को विभाजित किया। सगुण पंथ में लीलावतार, भगवद्नुग्रह का भरोसा, परलोक या स्वर्ग-नर्क की कल्पना, लीला का माहात्म्य, वर्ण-व्यवस्था की स्वीकार्यता, साकार के प्रति भक्ति और बाह्य लालित्य होता है। निर्गुण पंथ में ब्रह्मानुभूति, आत्मविश्वास का बल, सत्कर्मों द्वारा संसार को ही स्वर्ग बनाना, वर्ण-व्यवस्था का विरोध, निराकार के प्रति भक्ति, अंतःसौंदर्य की गरिमा और विश्वात्मा प्रभु के विश्वव्यापी अस्तित्व में आस्था होती है।
हिंदी साहित्य के इतिहास के अध्ययन में हम सामान्यतः इन्हीं तथ्यों का अध्ययन करते हैं। इसके साथ ही सगुण पंथ के अंतर्गत विष्णु के दो अवतारों- राम और कृष्ण काव्य के आधार पर क्रमशः रामकाव्य परंपरा और कृष्णकाव्य परंपरा का अध्ययन करते हैं। निर्गुण पंथ में संतकाव्य परंपरा या ज्ञानमार्गी शाखा और सूफ़ीकाव्य परंपरा या प्रेममार्गी शाखा के दो वर्गों का अध्ययन करते हैं। कृष्णकाव्य परंपरा  वल्लभ संप्रदाय (श्री वल्लभाचार्य, तेलुगु), चैतन्य संप्रदाय (चैतन्य महाप्रभु, नवद्वीप, बंगाल) और राधावल्लभ संप्रदाय (श्री हित हरिवंश) का आश्रय लेकर विकसित हुई। इसके प्रतिनिधि कवि सूरदास ने ब्रजभाषा में कृष्ण भक्ति, काव्य और संगीत की ऐसी त्रिवेणी का सृजन किया है, जिसमें प्रेम, भक्ति और अध्यात्म एक-दूसरे से मिल जाते हैं। निर्गुण और सगुण का भेद नहीं रह जाता है। महाकवि सूर का कवित्व उच्चता की उस सीमा पर स्थापित है, जहाँ तक पहुँच पाना अन्य के लिए संभव नहीं है। इसी कारण तानसेन कह उठते हैं- किंधौं सूर की सर लग्यौ, किंधौं सूर की पीर, किंधौं सूर को पद सुन्यौ, तन मन धुनत सरीर।
निर्गुण पंथ की प्रेममार्गी शाखा या सूफ़ीकाव्य परंपरा को प्रायः सूफ़ी कवियों, फ़ारसी मसनवियों द्वारा विकसित माना जाता है। वस्तुतः महाभारत की रोमांसिक चेतना के साथ ही हरिवंश पुराण, वृहत्कथा, संस्कृत गद्यकाव्य और अपभ्रंश जैनकाव्य परंपरा के क्रमिक विकास को तथाकथित सूफ़ीकाव्य परंपरा में देखा जा सकता है। इस परंपरा के प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने महाकाव्य पद्मावत में नीति और दर्शन के भारतीय संस्करण को उतारा है। सांप्रदायिक टकराहट से स्वयं को मुक्त रखकर न्याय और अन्याय के स्थूल-सूक्ष्म संघर्ष, मानवीय कर्म और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया की गाथा जायसी को पृथिवी पुत्र (वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार) बना देती है और पद्मावत को लोक से शिष्ट में संक्रमण का काव्य बना देती है।
निर्गुण पंथ की संतकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि कबीर और सगुण पंथ की रामकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास हैं, जिनके हिंदी साहित्य में योगदान विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभ अवसर पर हम सब उपस्थित हैं और जिनके कृतित्व के विविध पक्षों पर व्यापक विचार-विमर्श के सहभागी बन रहे हैं।
सन् 1880 के आसपास रामकुमार विद्यालंकार द्वारा रचित ‘कबिरेर संक्षिप्त जीवनचरित’ के साथ कबीर का व्यवस्थित अध्ययन प्रारंभ होता है। आचार्य क्षितिमोहन सेन कृत ‘कबीर’ (1942), रवींद्रनाथ टैगोर और ऐवेलिन अंडरहिल द्वारा अनूदित ‘वन हंड्रेड पोयम्स ऑफ़ कबीर’ (1914), अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध कृत ‘कबीर वचनावली’ (1916), रेवरेंड अहमदशाह कृत ‘द बीजक ऑफ़ कबीर’ (1917), रेवरेंड एफ. ई. के. कृत ‘कबीर एंड हिज़ फॉलोअर्स’ (1931) और उसके बाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत ‘कबीर’ (1942), डॉ. श्यामसुंदरदास कृत ‘कबीर ग्रंथावली’ बेल्जियम के निवासी विनान्द एम कैलेवर्त्त के शोध-ग्रंथ ‘द मिलेनियम कबीर वाणी’ आदि रचनाओं की चर्चा कबीर के विस्तृत और व्यवस्थित अध्ययन के संदर्भ में की जा सकती है। इन सभी अध्ययन ग्रंथों को अगर देखें तो यह सरलता के साथ कहा जा सकता है कि हिंदी में कबीर पर अध्ययन-अनुसंधान बहुत बाद में शुरू हुआ और परिमाण की दृष्टि से भी यह कम ही ठहरता है।
हिंदी में कबीर के अध्ययन की शुरुआत के साथ ही कुछ अवधारणाओं का विकास होता है। कबीर के सामान्य अध्ययन में हम सामान्य रूप से यह जानते हैं या जान पाते हैं कि उनके काव्य संस्कार सूफ़ी परंपरा पर आश्रित हैं, जिनमें इस्लाम के एकेश्वरवाद का प्रभाव परिलक्षित होता है। उनके काव्य सृजन में हिंदू परंपरा को कोई रचनात्मक योगदान नहीं है। कबीर के निर्गुण ब्रह्म की उपासना के पीछे पुरातन भक्ति परंपरा की तीक्ष्ण आलोचना है। ज्ञानमार्ग की कट्टरता कबीर की साधना-पद्धति का प्रमुख अंग थी। ऐसी ही अनेक मान्यताएँ कबीर के संदर्भ में प्रचलित हैं, जिनका हम सामान्य तौर पर अध्ययन करते हैं।
वस्तुतः कबीर का सम्यक् मूल्यांकन किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि निर्गुण अद्वैतवाद, सगुण वैष्णव भक्ति, बौद्ध सहजयान, नाथ पंथ, इस्लाम या सूफ़ी मत जैसे किसी भी वर्ग में कबीर को रखना संभव नहीं है। कबीर के काव्य संस्कार में इन सभी का समन्वय देखा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व में परस्पर विरोधी तत्त्वों का सामंजस्य इस तरह मिलता है कि विरोधी तत्त्व भी एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। कबीर में एक ओर अक्खड़पन है तो दूसरी ओर दीनता और हीनता का भाव भी है। बड़े-बड़े दार्शनिकों-चिंतकों के विचारों को ‘कागद की लेखी’ कहकर अक्खड़पन दिखाने वाले कबीर ‘धण मैली पिय ऊजला, लाग सकूँ न पाँव’ कहकर अपनी असीमित दीनता को भी सहजता के साथ प्रकट कर देते हैं।
संकीर्ण भौतिकवाद और यथार्थवाद के विपरीत व्यापक करुणा, सर्वहित की कामना, सच्ची भक्ति-भावना, समाजहित पर केंद्रित विचार और अनुभूति की व्यापकता कबीर की रचनाओं में देखने को मिलती है। कबीर को समझने के लिए ज्ञान की नहीं, अनुभूति की, सच्चे मन और भाव की जरूरत पड़ती है। कबीरदास लिखते हैं-
कबीर का घर सिखर पर, जहाँ सिलहली गैल।
पाँव न टिके पिपीलक, लोगनि लादे बैल।।
संभवतः इसी कारण कबीर की लोकप्रियता हर तरह के बंधनों से मुक्त थी, लोक-व्यवहार में विस्तृत थी। कबीर ने अपनी रचनाधर्मिता का स्वरूप विभिन्न धर्मों, मतों, पंथों का सामान्यीकरण करके, विज्ञानीकरण करके बनाया। इस तरह सभी के लिए अपना-सा लगने वाला, सभी के लिए अपनत्व से, प्रेम से भरा हुआ विश्व धर्म स्थापित करना कबीर के चिंतन की मौलिक उपलब्धि है। इसके लिए वे कभी ज्ञान की आँधी आने की बात कहते हैं तो कभी-
कामी   क्रोधी   लालची,  इनसे भक्ति  न होय।
भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय।।                                       
कहकर भक्ति के सच्चे स्वरूप की स्थापना करते हैं।  
भक्ति का विलक्षण और उदात्त स्वरूप गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व में भी प्रकट होता है। अपनी समन्वयात्मक दृष्टि को अपनी भक्ति भावना के साथ जोड़कर लोकमंगल की साधना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास की स्थिति लोकनायक से कम नहीं आँकी जा सकती। जाने-माने इतिहासकार गोस्वामी तुलसीदास के संदर्भ में अपनी पुस्तक ‘अकबर दि ग्रेट मुगल’ में लिखते हैं- Tulsidas is the tallest tree in the magic garden of medieval Hindu Poesy. वे आगे लिखते हैं- That was the greatest man of his age in India- greater even than Akbar himself in as much as the conquest of the hearts and minds of millions of men and women effected by the poet was an achievement infinitely more lasting and important than any or all the victories gained in war by the Monarch. अपने ग्रंथ Indian Antiquary (1893) में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन लिखते हैं- If we take the influence exercised by him at the present time as our test, he is one of the three or four great writers of Asia….Over the whole Gangetic Valley his great work [ The Ramayan] is better known than Bible is in England.
रूस के प्रसिद्ध विद्वान वरान्निकोव ने रामचरितमानस का रूसी भाषा में पद्यबद्ध अनुवाद किया। रेवरेण्ड एटकिन्स ने अंग्रेजी में मानस का अनुवाद किया। ऐसे ही तमाम अध्ययन-अनुसंधान कार्य तुलसीदास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विदेशों में हुए हैं या विदेशी विद्वानों द्वारा हुए हैं। ये तथ्य, ये कथन उस विश्वधर्म की व्यापकता और वैश्विक स्वीकार्यता को इंगित करते हैं, जिसकी स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने की, विशेषकर रामचरितमानस के माध्यम से। भारत वर्ष के धुर देहातों में बहुत से ऐसे लोगों को तुलसी का मानस कंठस्थ है, जिन्हें अक्षरज्ञान भी नहीं है, जो लिख-पढ़ भी नहीं सकते हैं।
भूगोल के बंधनों से, काल के बंधनों से मुक्त बाबा तुलसी का मानस एक ग्रंथ मात्र नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के बौद्धिक, कलात्मक और भावुक ग्रंथों का समन्वित रूप है। यह जीवनोपयोगी भी है, गंभीर भी है और बौद्धिक-दार्शनिक तत्त्वों से युक्त भी है। राम की गूढ़ कथा एक ओर निर्गुण, निराकार परमात्मा को हमारे अपने समाज का व्यक्ति बना देती है तो दूसरी ओर परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर सत्य और प्रेम की रक्षा की, मर्यादा के पालन की ऐसी सीख दे जाती है, जो अनपढ़ के लिए भी सहज और सुग्राह्य हो जाती है-
कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
रामचरितमानस के अतिरिक्त विनयपत्रिका तुलसी की प्रौढ़, सशक्त कृति है। विनयपत्रिका में बाबा तुलसी के जीवन के वृहद-व्यापक अनुभव हैं, तुलसी की विनयमूलक भक्ति का उत्कृष्ट स्वरूप है। मानवतावादी दृष्टिकोण है और गूढ़ दार्शनिक चिंतन भी है। कृष्णगीतावली, दोहावली, बरवै रामायण आदि विविध ग्रंथ भी अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं। उनकी सभी कृतियाँ किसी भी युग की सीमाओं में या भौगोलिक क्षेत्र के बंधनों में बँधी हुई नहीं है।
पाश्चात्य जीवन शैली के ‘माइक्रो फैमिली कल्चर’ और टूटती-बिखरती ‘फैमिली वैल्यूज़’ के घातक दुष्परिणामों से बचने के लिए रामचरितमानस के रूप में हमारे पास ऐसा अमोघ अस्त्र है, जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान जीवन में उत्तरोत्तर बढ़ रही है। रामकथा को आधार बनाकर अनेक भक्त कवियों ने उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं, किंतु रामकथा को लोक-व्यवहार से, लोक-जीवन की मान्यताओं-मर्यादाओं और समाज की मानवीय अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने का काम बाबा तुलसी ने ही किया है। बाबा तुलसी ने मानस के माध्यम से समूचे परिवार के मर्यादित आचरण को समग्रता के साथ प्रस्तुत किया है। इसके बाद भी तुलसीदास और उनकी कालजयी कृति ‘रामचरितमानस’ प्रायः दूषित आलोचना के भँवर में फँस जाती है।
अगर कबीर के राम राजा दशरथ के पुत्र राजकुमार राम नहीं, बल्कि निर्गुण ब्रह्म के प्रतीक हैं, तो तुलसी के राम भी दशरथनंदन मात्र नहीं, बल्कि मर्यादा के प्रतीक हैं, मर्यादापुरुषोत्तम हैं। अपने व्यापक अर्थों में कबीर के राम और तुलसी के राम एक ही हैं। दोनों में एक तत्त्व- मर्यादा की उपस्थिति है।
कबीर हरदी पीयरी चूना उज्जल भाइ, रामसनेही यूँ मिले, दून्यू बरन गँवाइ।। (कबीर)
 जाके प्रिय न राम वैदेही, तजिए ताहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही। (तुलसी)
काव्यशास्त्रीय विभेदों को अलग रखकर, सगुण-निर्गुण की विभाजक रेखा को मिटाकर और ऐसे ही अन्य विभेदों को, प्रचलित भ्रांतियों-धारणाओं को हटाकर विचार किया जाए तो महाराष्ट्र से, पंढरपुर से चलकर उत्तर भारत में और फिर सारे विश्व में प्रचारित-प्रसारित होने वाली विश्वधर्म की संकल्पना के संवाहक के रूप में कबीर और तुलसी की भूमिका अद्वितीय है, अनुपम है।
हिंदी में तुलसी और कबीर के व्यवस्थित, समग्र, सचेत अध्ययन की स्थिति को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है। कबीर और तुलसी के संदर्भ में विदेशी विद्वानों के कथनों और उनके द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर इस धारणा को पुष्ट किया जा सकता है। कबीर और तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अध्ययन-अनुसंधान की शुरुआत के बहुत पहले से इन दोनों का स्थान लोक-व्यवहार में उच्चतम स्थिति पर था। गाँवों-कस्बों में टिमटिमाते दिये की रोशनी में रात-रातभर रामचरितमानस का पाठ करते अनपढ़ लोग, बात-बात पर मानस की चौपाइयों का उल्लेख करके मर्यादित लोकजीवन की स्थापना करते सामान्य जन तुलसी की लोक-स्वीकार्यता का उनके प्रति अगाध श्रद्धा के साक्ष्य हैं। इसी तरह गाँवों की चौपालों में रात-रातभर कबीरी (कबीर के भजन) गाते लोग, गाँवों-कस्बों में स्थापित कबीर गद्दियाँ लोक-जीवन में कबीर के उच्चतम स्थान को प्रकट करतीं हैं। लोक-व्यवहार में, लोक-जीवन में कबीर और तुलसी की स्थिति समाज-सुधारक, चिंतक, पथ-प्रदर्शक और सच्चे संत की थी। वहाँ कबीर और तुलसी आलोचना के पात्र नहीं थे, बल्कि आगाध जन-श्रद्धा और जन-आस्था से जुड़े थे। कबीर और तुलसी के लोक-व्यवहार से शिष्ट साहित्य में आने के साथ ही यह स्थिति बदलने लगी। इन दोनों भक्त कवियों की, विशेषकर तुलसी की ऐसी व्यापक और वीभत्स आलोचना शुरू हुई, जिसने लोक-व्यवहार और शिष्ट साहित्य, दोनों को दिशाहीन कर दिया।
प्रायः विदेशों से आयातित सामग्री या चिंतन या दिशा-निर्देश अपना अलग महत्त्व रखते हैं और प्रायः गर्वानुभूति भी देते हैं। यह प्रायः कच्चे माल का विदेश जाना और वहाँ से निर्मित माल के आयातित होने जैसा है। हम गर्व करते हैं, जब हमें कोई बाहरी यह बताता है कि अमुक मूल्यवान धरोहर हमारे पास है। हम अपनी धरोहर की महत्ता का मूल्यांकन स्वयं नहीं कर पाते। हजारों वर्षों की गुलामी के कारण शायद हमारी मानसिकता में यह दोष लग गया है। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।     
हिंदी के भक्ति-काव्य की चारों धाराओं का, इनके प्रतिनिधि कवियों का अध्ययन पुरानी परिपाटी पर, रटे-रटाए सिद्धांतों पर और घिसी-घिसाई अवधारणाओं पर होता रहा है। युगीन परिस्थितियों के अनुरूप, परिवर्तित मूल्यों के सापेक्ष और अपने मूल्यांकन के स्वतः मूल्यांकन की प्रक्रिया पर चलना जीवंत-जागृत साहित्य का लक्षण होता है। इसी आधार पर सगुण और निर्गुण पंथ के प्रतिनिधि कवियों का मूल्यांकन अपेक्षित है। पाश्चात्य चिंतनधारा में प्रचलित कुछ शब्द, जैसे- आदर्शवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद और मूल्यवाद आदि को आयातित करके हम अपनी धरोहर की समृद्धि का विस्मरण कर बैठते हैं। इसी कारण पश्चिम के चश्मे से अपनी धरोहर को देखने का प्रयास करने लगते हैं। संत कबीर और तुलसी के कृतित्व का इसी आधार पर मूल्यांकन आधुनिक संकल्पना की देन है, जबकि पाश्चात्य चिंतनधारा के अनेक तत्त्वों से अधिक और समृद्ध तत्त्व तुलसी और कबीर के कृतित्व में उपलब्ध हैं। मूल्यांकन और अनुसंधान की इस आधुनिक नवोदित परंपरा का अपना महत्त्व है। यह सार्थक और सफल होगा, यदि इसमें पूर्वाग्रह और पक्ष-विपक्ष के निम्नस्तरीय विचारों को अलग ही रखा जाए।
यह अत्यंत सुखद संयोग है कि अक्कलकोट की इस पावन-पुनीत नगरी में तुलसी और कबीर के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा हो रही है। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र से प्रारंभ हुई भक्ति-काव्य परंपरा ने समूचे देश को, विश्व को प्रभावित किया था। तुलसी और कबीर उसी परंपरा के संवाहक थे। आज नए समय में नई भूमिका के लिए यह परिसंवाद संगोष्ठी अगर इतिहास को दुहरा सकेगी, तो संगोष्ठी की सार्थकता भी स्थापित होगी और मानवता का कल्याण भी हो सकेगा।
डॉ. राहुल मिश्र

Tuesday 1 July 2014

IMPORTANCE OF KALACHAKRA कालचक्र का महत्व

कालचक्र का महत्त्व
कालचक्र अनुष्ठान का बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा में अपना विशेष स्थान है। भारत की पुरातन पूजा परंपरा में कालचक्र का विशेष महत्त्व रहा है। कालचक्र संस्कृत भाषा का शब्द है। भोट भाषा में इसे दुस-खोर-वङ-छेन कहा जाता है। काल का सरल अर्थ समय होता है और चक्र का अर्थ निरंतर गतिमान रहने वाला पहिया होता है। इस तरह कालचक्र का सीधा सा अर्थ समय का चक्र होता है। कालचक्र या समय का चक्र प्रकृति से अपना संबंध बनाए रखते हुए ज्योतिषशास्त्र के द्वारा विचार करके सूक्ष्म आंतरिक ऊर्जा के विकास और आध्यात्मिक चेतना को जगाने के अभ्यास के मेल से बनने वाला तांत्रिक ज्ञान होता है।
बौद्ध धर्म में चार प्रकार की तांत्रिक साधनाएँ बताई गईं हैं। चर्यातंत्र और क्रियातंत्र मूल रूप से तांत्रिक साधनाएँ नहीं हैं, जबकि योगतंत्र और अनुत्तरयोगतंत्र में तांत्रिक साधना होती है। अनुत्तरयोगतंत्र के तीन उपविभाजन होते हैं। इनमें पहला मातृतंत्र या प्रज्ञातंत्र है, दूसरा पितृतंत्र या योगतंत्र है और तीसरा अद्वयतंत्र है। कालचक्रतंत्र अद्वयतंत्र का मूल ग्रंथ माना जाता है। कालचक्रतंत्र के विषय की व्यापकता को देखते हुए इसे कालचक्रयान नाम भी दिया गया है। कालचक्रतंत्र का मूल ग्रंथ संस्कृत में है, जो पाँच खंडों में विभाजित है। बौद्ध तंत्रों में मूलतंत्र, भाष्यतंत्र और लघुतंत्रों की परंपरा मिलती है। कालचक्रतंत्र के अनेक भाष्यतंत्र और लघुतंत्र वर्तमान में उपलब्ध हैं। आचार्य अभयाकर गुप्त, आचार्य धर्माकरशांति, आचार्य विमलप्रभाकर और आचार्य नारोपाद द्वारा कालचक्र पर भाष्यग्रंथ और टीकाएँ लिखी गईं हैं, जिन्हें कालचक्रतंत्र के ज्ञान के लिए प्रमाणिक माना जाता है।
ईसा की तीसरी और छठवीं शताब्दी के बीच बौद्ध धर्म में इन तांत्रिक साधनाओं का उदय हुआ। इन साधनाओं का जन्म दक्षिण भारत में आंध्रप्रदेश के श्रीधान्यकटक क्षेत्र में हुआ। वर्तमान में यह क्षेत्र गुंटूर जिले के अमरावती और धरनीकोटा नामक शहरों के द्वारा जाना जाता है। इसी क्षेत्र में स्थित श्रीपर्वत तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र बना। संभवतः इसी क्षेत्र में प्रख्यात बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का जन्म हुआ था। नागार्जुन ने बौद्ध तांत्रिक साधनाओं पर अनेक भाष्य लिखे, अनेक रचनाएँ कीं। महायान परंपरा की शिक्षाओं की अपेक्षा तंत्र साधना की शिक्षा अत्यंत गुप्त रूप से दी जाती थी, और पात्र-अपात्र का विचार करके इन शिक्षाओं को दिया जाता था, इस कारण इसे गुह्यसमाजतंत्र नाम मिला। गुह्यसमाजतंत्र की उत्पत्ति दक्षिण भारत में हुई और दक्षिण भारत के सातवाहन शासकों के साथ ही महा-मेघवाहन, मौर्य, इक्ष्वाकु, पल्लव, सालकायना, विष्णु-कुंदिन, चालुक्य और विजयनगर शासकों ने गुह्यसमाजतंत्र साधना के विस्तार के लिए संसाधन उपलब्ध कराने और पर्याप्त संरक्षण प्रदान करने का कार्य किया। सातवाहन वंश के राजा हाल ने द्वितीय शताब्दी में आर्य नागार्जुन के लिए श्रीपर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। कृष्णा और गोदावरी नदियों के किनारे बसे नागार्जुनकोंडा, अमरावती और धरनीकोटा नगरों में गुह्यसमाजतंत्र साधना का विस्तार हुआ। नागार्जुनकोंडा में मिले एक अभिलेख से पता चलता है कि इस क्षेत्र में स्थाविरों के संघ बने थे, जिनके माध्यम से कश्मीर, गांधार, चीन, किरात (वर्तमान तिब्बत और उसके आसपास हिमालय की तराई का इलाका), तोसलि (वर्तमान ओडिशा), यवन (वर्तमान अफगानिस्तान) और ताम्रपर्णी द्वीप (वर्तमान श्रीलंका) में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ। ऐसी मान्यता है कि श्रीधान्यकटक क्षेत्र से ही मूल कालचक्र ज्ञान प्रसारित हुआ था। प्रसिद्ध तिब्बती विद्वान तारानाथ के अनुसार भगवान् बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के अगले वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को श्रीधान्यकटक के महान स्तूप के पास ही कालचक्र का ज्ञान प्रसारित किया था। उन्होंने इसी स्थान पर कालचक्र मंडलों का सूत्रपात भी किया था। संभवतः इसी कारण जापान के बुश्शोकाई फाउंडेशन और नोरबूलिंगका इंस्टीट्यूट के अनुरोध पर परमपावन दलाई लामा ने भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण की 2550 वीं जयंती पर सन् 2006 में श्रीधान्यकटक में 31 वीं कालचक्र पूजा आयोजित की थी।
श्रीधान्यकटक से गुह्यसमाजतंत्र साधना और कालचक्र पूजा-साधना का विस्तार उत्तर भारत की ओर हुआ। ईसा की आठवीं शताब्दी के मध्य से नौवीं शताब्दी के मध्य तक कालचक्र पूजा-साधना आधुनिक पाकिस्तान की स्वात घाटी के ओड्डियान (उर्ग्यान) तक विकसित हो गई। इसी अवधि में पाल शासकों के संरक्षण में नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में तंत्र-साधना के अध्ययन की शुरुआत हुई। ईसा की दसवीं शताब्दी के मध्य में कालचक्रतंत्र ग्रंथ की रचना हुई। आठवीं और बारहवीं शताब्दी के मध्य मठों और विश्वविद्यालयों से निकलकर चौरासी सिद्धों के माध्यम से तंत्र-साधना का विकास हुआ। इसी कालखंड में समूचे हिमालय परिक्षेत्र में गुह्यसमाजतंत्र साधना के अंतर्गत कालचक्र पूजा-साधना का विकास हुआ। कालांतर में दक्षिण भारत सहित उत्तर भारत और हिमालयी परिक्षेत्र के अतिरिक्त अन्य हिस्सों में प्रचलित वज्रयान बौद्ध परंपरा सिमटने लगी। जिस समय देश-दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तंत्र-साधना का प्रभाव कम होता जा रहा था, उस समय तिब्बत के धर्मभीरु शासक इस परंपरा को संरक्षण प्रदान कर रहे थे। लदाख अंचल समेत हिमालय की गोद में बसे भारतीय क्षेत्रों और नेपाल-भूटान आदि देशों में इस परंपरा का प्रभाव बना रहा।
बौद्ध ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सारा ब्रह्माण्ड या संसार एक चक्र में बँधा हुआ होता है। यह चक्र चार स्थितियों- शून्य, स्वरूप, अवधि और विध्वंस से मिलकर बना होता है। कालचक्र तीन प्रकार का होता है। बाहरी, आंतरिक और वैकल्पिक कालचक्र। इन तीनों प्रकार के कालचक्र में शून्य, स्वरूप, अवधि और विध्वंस की स्थितियाँ होती हैं।
कालचक्र का बाहरी स्वरूप समय के मापन पर आधारित होता है। ग्रहों, नक्षत्रों की गति से हम समय के चक्र को जान सकते हैं। इसी तरह जन्म, जीवन और मरण की स्थितियों में काल की गति या समय चक्र चलता है। इस संसार में प्रत्येक जीवधारी काल, अर्थात् समय की गति से बँधा होता है। संसार के अन्य जीवधारियों की तुलना में मनुष्य सबसे अधिक समझदार, ज्ञानवान और विवेकवान होता है। मानव-सभ्यता का विकास भी इसी कारण हुआ है। मानव-सभ्यता के विकास-क्रम में बाहरी परिवेश और आंतरिक स्थितियों को जानने-समझने की चेतना का विकास भी हुआ। अंतरिक्ष विज्ञान और समय की गति को जानने की उत्सुकता भी मानव-सभ्यता के विकास के साथ ही उत्पन्न हुई। सौरमंडल की गति के वैज्ञानिक पक्ष और दार्शनिक पक्ष को कई तरीकों से व्याख्यायित किया गया। इसी से कालचक्र या समयचक्र की अवधारणा का विकास भी हुआ। सूरज का एक नाम कालचक्र भी होता है। सौरमंडल में सूरज के इर्द-गिर्द ग्रहों-उपग्रहों की चक्राकार गति चलती रहती है। सौरमंडल के ग्रहों-नक्षत्रों की गति की तरह सजीव और साथ ही निर्जीव वस्तुओं की गति चलती रहती है। उनकी उत्पत्ति के लिए एक वातावरण का निर्माण होता है, फिर उन्हें उत्पन्न होना होता है, उन्हें एक निश्चित अवधि तक सक्रिय रहना होता है और फिर उन्हें नष्ट हो जाना होता है। कालचक्रतंत्र की शून्य, स्वरूप, अवधि और विध्वंस की स्थितियों को कालचक्र के बाहरी स्वरूप में देखा जा सकता है। जन्म, बचपन, युवावस्था, वृद्धावस्था और मृत्यु का यह चक्र भौतिक जगत् में दिखाई पड़ता है। कालचक्र के बाहरी विधान के अनुरूप हम मौसम के बदलावों का अनुभव करते हैं। मौसम के बदलने के कारण शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभावों का हम अनुभव करते हैं।
संसार में कालचक्र की आंतरिक गति मानव-मन के अलग-अलग भावों और विचारों के लगातार बदलने पर आधारित होती है। आंतरिक जगत् में भी गति होती है। यह गति मानव-मन और विचारों में होती है। बचपन से लगाकर वृद्धावस्था तक ज्ञान, विवेक और समझ के अलग-अलग स्तर इसी गति को प्रकट करते हैं। इसी तरह राग, द्वेष, मद, लोभ, मोह, अहंकार, लालच, क्रोध आदि चित्तवृत्तियाँ भौतिक जगत् की स्थितियों के सापेक्ष मानव-मन में समय-समय पर उत्पन्न होती रहती हैं और नष्ट होती रहती हैं। कालचक्र की आंतरिक गति हमारे कर्मों के प्रभाव से परिवर्तित होती है और उसे हम महसूस करते हैं। इसी तरह मन, वाणी, कर्म की परिशुद्धि करके सम्यक् संबोधि प्राप्त करना भी कालचक्र की आंतरिक गति का लक्षण होता है। काल की इस गति को समझने की चेतना का विकास करने वाले साधक परिवर्तन की प्रक्रिया को जान-समझ पाते हैं। सामान्य मनुष्य इस गति को, इस चक्र को नहीं समझ पाते हैं।
काल के इस चक्र में परस्पर विरोधी तत्त्व शामिल होते हैं। इसमें कल्याणकारी तत्त्व भी होते हैं और अकल्याणकारी तत्त्व भी होते हैं। इन तत्त्वों का प्रभाव और व्यक्ति-विशेष में इन तत्त्वों की उपस्थिति उसके कर्मों के कारण होती है। कर्म का संयोग मन और वाणी से होता है। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली तत्त्व मानव-मन होता है। काल के चक्र को समझकर अगर मानव-मन की, आंतरिक जगत् के चक्र की परिशुद्धि कर दी जाए तो वाणी और कर्म की परिशुद्धि का मार्ग सुलभ हो जाता है। कालचक्र की वैकल्पिक गति बाहरी और आंतरिक कालचक्र के बीच तालमेल बनाने और मन, वाणी, कर्म के परिशोधन की इसी जटिल विधि पर आधारित होती है। कालचक्र अनुष्ठान और कालचक्र पूजा का विधान इसी वैकल्पिक गति पर आधारित होता है। मन, वाणी और कर्म की शुद्धि से; काय, वाक् और चित्त की शुद्धि से त्रिस्तरीय साधना सफल हो जाती है और आत्मज्ञान अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।
साधना के विभिन्न स्वरूप इसी पूर्णता की प्राप्ति के माध्यम बनते हैं। तंत्र के माध्यम से ऐसी साधना का स्वरूप कालचक्र में होता है। कालचक्र पूजा के लिए बनाए जाने वाले रेत मंडल में सारे संसार का स्वरूप बना होता है। इसमें दसों दिशाएँ होतीं हैं। सकारात्मक और नकारात्मक भाव होते हैं। सकारात्मक भावों की रक्षा के लिए रक्षक होते हैं, धर्मपाल होते हैं और नकारात्मक भावों से लड़ने के लिए शक्तिशाली योद्धा भी होते हैं। कालचक्र मंडल में बुद्ध के 722 स्वरूप होते हैं। कालचक्र पूजा-अभिषेक के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली रेत और धार्मिक कृत्य के लिए जल का प्रयोग भी अपने प्रतीकात्मक अर्थ रखते हैं। जिस तरह बारीक रेत को मुट्ठी में बंद करके नहीं रखा जा सकता है, वह झर-झर करके बंद मुट्ठी से निकल जाती है, और जिस तरह जल को मुट्ठी में रोककर नहीं रखा जा सकता, उसी तरह का स्वभाव काल का भी होता है, समय का भी होता है। समय की गति को पहचानकर उसका सार्थक उपयोग कालचक्र के प्रतीक आधारित महत्त्व को स्पष्ट करता है।
कालचक्रतंत्र के साथ शंबाला के धर्मभीरु राजाओं का मिथक भी जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि शंबाला का धर्मराज्य एक बार फिर से कायम होगा, इसके लिए धर्मयुद्ध होगा और विधर्मियों का संसार से सफाया होगा, धर्म का शासन स्थापित होगा। इस मिथक की परमपावन दलाई लामा ने बड़ी स्पष्ट और व्यावहारिक व्याख्या की है। उनका कहना है कि बौद्ध धर्म शांति और अहिंसा को मानने वाला है। इसमें धर्मयुद्ध का मतलब लोगों से युद्ध करना नहीं, बल्कि संसार में फैली बुराइयों से, दूषित चित्तवृत्तियों से लड़कर, उन्हें हराकर मानवता के, विश्वकल्याण के, सत्य-शांति-अहिंसा के धर्म का शासन स्थापित करना है।
ऐसा माना जाता है कि बौद्ध तंत्र-साधना में कालचक्रतंत्र की उत्पत्ति बहुत बाद में हुई। गुह्यसमाजतंत्र के एक अंग के रूप में, अनुत्तरयोगतंत्र की एक शाखा के रूप में कालचक्रतंत्र का उद्भव और विकास हुआ। नालंदा, राजगीर और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के माध्यम से कालचक्रतंत्र का प्रचार-प्रसार हुआ, किंतु कालांतर में कालचक्रतंत्र का महत्त्व बौद्धतंत्रों में लगातार बढ़ता गया। इसी कारण विमलप्रभाकर और अन्य टीकाकारों ने, बौद्ध आचार्यों ने कालचक्रतंत्र को तंत्रराज, आदिबुद्ध और बृहदादिबुद्ध नाम दिए हैं। क्षणभंगवाद, शून्यवाद, अनीश्वरवाद, अनात्मवाद, कर्मवाद, निर्वाण आदि बौद्ध मत, दर्शन और मान्यताएँ कालचक्रतंत्र-साधना में प्रकट होतीं हैं। इसी कारण बौद्ध धर्म के वर्तमान स्वरूप में कालचक्र-साधना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संभवतः इसी कारण परमपावन चौदहवें दलाई लामा ने कालचक्र अनुष्ठान को बौद्ध धर्म की सर्वोच्च पूजा-साधना के रूप में स्थापित किया है। उनके द्वारा कालचक्रतंत्र की जटिल पद्धति का सरल संस्करण तैयार किया गया है। उनके द्वारा कालचक्रतंत्र की व्याख्या वर्तमान वैज्ञानिक युग के अनुरूप की गई है। इस कारण कालचक्र अनुष्ठान के प्रति देश-दुनिया में जनस्वीकार्यता बढ़ी है। जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा के भेदभाव से हटकर कालचक्र अनुष्ठान के साथ देश-दुनिया की आस्था भी इसी कारण जुड़ी है।     
परमपावन चौदहवें दलाई लामा के संरक्षण में भारत की पुरातन परंपरा और हिमालयी परिक्षेत्र की अपनी अनूठी पहचान आज स्वयं को सुरक्षित रख पा रही है। परमपावन दलाई लामा ने विशिष्ट कालचक्र साधना को विश्वकल्याण, विश्वशांति और विश्वबंधुत्व जैसे महान मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर पुरातन-परंपरागत साधना-पद्धति को एक नया आयाम दिया है और इसे विश्वव्यापी भी बनाया है। परमपावन दलाई लामा के संरक्षण में अब तक बत्तीस कालचक्र अनुष्ठान संपन्न हो चुके हैं। इनमें से पहले दो अनुष्ठान तिब्बत की राजधानी ल्हासा के नोरबूलिङका मठ में संपन्न हुए हैं। बारह कालचक्र अनुष्ठान विदेशों में संपन्न हुए हैं और शेष अठारह कालचक्र अनुष्ठान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में संपन्न हुए हैं।
दुनिया के तमाम मत, पंथ, संप्रदाय इस बात पर जोर देते हैं कि समाज में आपसी सौहार्द, समन्वय, भाईचारा और बंधुत्व की भावना का विकास हो। इसके लिए सभी मत-संप्रदाय विशेष प्रयास भी करते हैं और धार्मिक विधानों के माध्यम से सौहार्द-समन्वय स्थापित करते हैं। इसके लिए सभी मत-संप्रदाय एक निश्चित क्रम के अनुसार नियत समयांतराल में बड़े धार्मिक आयोजन करते हैं। ऐसे आयोजनों या विधानों में धर्म-विशेष के मानने वाले लोग आपसी भेदभाव को भुलाकर एकसाथ समय गुजारते हैं, धार्मिक आयोजनों में शरीक होते हैं। बौद्ध धर्म में आयोजित होने वाली कालचक्र पूजा के केंद्र में भी इस भावना को देखा जा सकता है। यह धार्मिक पूजा-अनुष्ठान का सामाजिक पक्ष है, जिसके मूल में मानवता की भावना निहित होती है, सामाजिक समरसता की भावना निहित होती है। अन्य धर्मों और मतों के द्वारा वृहद स्तर पर आयोजित किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों और आयोजनों-विधानों की तुलना में बौद्ध धर्म की परंपरागत कालचक्र पूजा का स्थान श्रेष्ठ है। अन्य धर्मों की तरह बौद्ध धर्म की कालचक्र पूजा में शामिल होने के लिए जाति-धर्म का कोई बंधन नहीं है। 28 दिसंबर, 2011 से 10 जनवरी, 2012 तक बोधगया में हुई 32 वीं कालचक्र पूजा में हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता रिचर्ड गेर के साथ ही देश-विदेश के लगभग तीन लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे। इन श्रद्धालुओं में बड़ी संख्या दूसरे धर्मों को मानने वाले लोगों की थी। धार्मिक भेदभाव, क्षेत्रीय भेदभाव और भाषाई भेदभाव को भुलाकर सबको इस पूजा में शामिल करने की पवित्र भावना बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता को सिद्ध करती है। विश्वकल्याण के लिए, सारे संसार के सुख के लिए, समृद्धि के लिए और सत्य, शांति, अहिंसा, दया, करुणा, क्षमा जैसे महान मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए समर्पित कालचक्र पूजा इसी कारण अपना विशेष महत्त्व रखती है। दुनिया भर में अब तक संपन्न हो चुकी 32 कालचक्र पूजा के आयोजनों के सार्थक और जनकल्याणकारी पक्ष उभरकर सामने आए हैं। सारे संसार में कम से कम इस बात की चर्चा का माहौल तो बना ही है कि इस संसार को बचाने के लिए बौद्ध धर्म के मूल में स्थित भावना को; सत्य, शांति, अहिंसा, करुणा और दया-क्षमा जैसे गुणों को संरक्षित-संवर्धित किया जाए। इस दिशा में कालचक्र पूजा एक ऐसे सशक्त माध्यम के रूप में प्रचारित-प्रसारित हुई है, जिसने सारे संसार को बौद्ध धर्म के मानवतावादी और विश्वकल्याणकारी पक्ष से परिचित कराया है। इसी कारण परमपावन दलाई लामा के संरक्षण में आयोजित किए गए 32 कालचक्र अनुष्ठानों ने उत्तरोत्तर सफलता अर्जित की है और सारे संसार को मानवता के धर्म के साथ जोड़ने में अद्भुत योगदान दिया है। 03 से 14 जुलाई 2014 तक लेह-लदाख में होने वाला 33 वाँ कालचक्र अनुष्ठान सफल और सार्थक होगा, इसमें संदेह नहीं है।     
कालचक्र का धार्मिक महत्त्व जितना अधिक है, उतना ही सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व भी है। कालचक्र अनुष्ठान एक अवसर है, एक सुखद संयोग है, पुरातन धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को संरक्षित रखने का। इससे भी बड़ा पक्ष सामाजिक महत्त्व का है। कालचक्र अनुष्ठान के अवसर पर देश-दुनिया के तमाम लोग जाति और धर्म का भेदभाव मिटाकर एकजुट होते हैं। अमीर और गरीब का, ऊँच और नीच का भेद इस अवसर पर मिट जाता है। केवल एक ही ध्येय, केवल एक ही लक्ष्य सामने होता है, मानवता के कल्याण का, विश्व की शांति का, बंधुत्व और भाईचारे का। भौतिकतावाद, जाति-धर्म, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, भाषा-भूषा और सांस्कृतिक विभेद के बंधनों में जकड़े संसार को उसके इन बंधनों से मुक्त होने का रास्ता दिखाने वाली कालचक्र पूजा का सामाजिक पक्ष और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। समाज को एक सूत्र में बाँधने और संपूर्ण आर्यावर्त की पुरातन-परंपरागत विश्वबंधुत्व की भावना को; सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया की भावना को बल प्रदान करने के लिए और मानवता के उच्च आदर्शों की स्थापना के लिए कालचक्र पूजा का बड़ा महत्त्व है। कालचक्र अनुष्ठान दुनिया-भर के उन लोगों को एकसाथ लाने का महान अनुष्ठान भी है, जो लोग मानवता के पक्षधर हैं, जिनके मन में करुणा, दया, सत्य, शांति और अहिंसा जैसे महान मानवीय मूल्यों के प्रति श्रद्धा है, आस्था है। निश्चित रूप से कालचक्र पूजा-अभिषेक का मानवता के कल्याण में, समस्त चराचर जगत् के कल्याण में योगदान रहा है और आगे आने वाले समय में भी रहेगा। 03 से 14 जुलाई 2014 तक लेह-लदाख में होने वाली 33 वीं कालचक्र पूजा के अवसर पर होने वाले महासंगम के परिणाम कल्याणकारी होंगे और सुखद भी होंगे।    
डॉ. राहुल मिश्र
(रेडियो वार्त्ता, आकाशवाणी लेह, दिनांक- 30 जून, 2014, प्रातः 0830 बजे प्रसारित)