Showing posts with label Research. Show all posts
Showing posts with label Research. Show all posts

Thursday, 2 January 2020

फूलबाग नौचौक में बैठे राजा राम...




फूलबाग नौचौक में बैठे राजा राम...

मधुकरशाह महाराज की रानी कुँवरि गणेश ।
अवधपुरी से ओरछा लाई अवध नरेश ।।
सात धार सरजू बहै नगर ओरछा धाम ।
फूल बाग नौचौक में बैठे राजा राम ।।
तुंगारैन प्रसिद्ध है नीर भरे भरपूर ।
वेत्रवती गंगा बहै पातक हरै जरूर ।।
राजा अवध नरेश को सिंहासन दरबार ।
सह समाज विराजे, लिए ढाल तलवार ।।
आकाश में पूर्ण चंद्रमा की दूधिया चमक से आलोकित रामराजा मंदिर का प्रांगण.... चारों ओर जगमग करती रौशनियों को बीच तमाम भक्तगण संध्या आरती गा रहे हैं। कुछ भक्तगण दीपक हाथों में लिए रामराजा सरकार की आरती उतार रहे हैं, तो कुछ भक्तगण पुष्पदल को हाथों में लिए आरती की भाँति उतार रहे हैं। करतल ध्वनि के साथ भी कुछ रामराजा सरकार की आरती में सम्मिलित हैं। उधर रामराजा सरकार राजसी मुद्रा में विराजमान हैं; सह समाज, यानि माता जानकी, भ्राता लक्ष्मण और हनुमान के साथ। रामराजा का दरबार लगा हुआ है। द्वार पर रामराजा की ओर मुँह किये हुए सिपाही तैनात है, शस्त्र-सलामी की मुद्रा में....। रामराजा सरकार की आरती में सम्मिलित होने के लिए एकत्रित सारा जनसमूह भक्तिभाव से भरा हुआ है। सारा वातावरण भक्तिमय हो गया है। आरती के पूर्ण होते ही दरवाजे पर खड़ा सिपाही सलामी शस्त्र की अगली कार्यवाही करता है। उसके द्वारा सलामी देने के बाद रामराजा सरकार का दरबार आम लोगों के दर्शनार्थ खुल जाता है।
आज का रामराजा मंदिर अपने अतीत में रानी कुँवरि गणेशी का महल हुआ करता था। रानी कुँवरि गणेशी बुंदेले राजवंश की दूसरी पीढ़ी में आने वाले राजा मधुकरशाह की ब्याहता थीं। ओरछा राज्य में जितना मान-सम्मान राजा मधुकरशाह को प्राप्त था, उतना ही मान रानी कुँवरि गणेशी जू को मिलता था। आज भी बुंदेलखंड की जनता के बीच ये कमल जू राजा कमलापति रानी के रूप में ख्याति पाते हैं। राजा मधुकरशाह जूदेव के पिता राजा रुद्रप्रताप सिंह गढ़कुंडार से ओरछा आए थे। उस समय वेत्रवती या बेतवा नदी के किनारे इस पूरे इलाके में भयंकर जंगल था। वैसे यह क्षेत्र अपने अतीत के साथ ही धर्म-अध्यात्म-साधना के लिए प्रसिद्ध रहा है। आज के ‘तुंगारैन’, यानि ओरछा के वन-प्रांतर का पुराना नाम ‘तुंगारण्य’ था। बेतवा नदी के किनारे-किनारे फैले घने जंगल में तुंग ऋषि का आश्रम था, ऐसी मान्यता है। कहा जाता है, कि राजा रुद्रप्रताप सिंह शिकार खेलते-खेलते तुंग ऋषि के आश्रम में पहुँच गए। बाद में तुंग ऋषि की प्रेरणा से उन्होंने ओरछा में नगर बसाने का प्रण लिया। वैसे पौराणिक प्रसंगों में उल्लेख मिलता है, कि तुंगक नाम के एक पवित्र वन में दधीचिपुत्र सारस्वत ने अपने शिष्यों को वेद पढ़ाए थे। क्या पता, यह तुंगक वन या तुंगारण्य वही हो...।
कुल मिलाकर राजा रुद्रप्रताप सिंह को बेतवा के किनारे का यह भूभाग, विंध्य की तलहटी का यह क्षेत्र इतना भा गया, कि उन्होंने अपने वंशजों के लिए विक्रम संवत् 1588 की बैशाख शुक्ल पंद्रहवीं तिथि को ओरछा महल का शिलान्यास कर दिया। दुर्योग ऐसा रहा, कि उनके समय में निर्माणकार्य शुरू ही हो पाया था, और उनका देहांत हो गया। इसके बाद उनके पुत्र राजा भारतीचंद्र ने ओरछा राजमहल के निर्माणकार्य को पूरा कराया।
ओरछा दुर्ग के ठीक सामने फूलबाग था, जहाँ राजा भारतीचंद्र ने रनिवास के रूप में नौचौका महल बनवाया। इस महल को यह नाम भी नौ कमरों के कारण मिला। यह महल ओरछा के किले की लगभग हर खिड़की से दिखाई देता है। बुंदेली स्थापत्यकला के इस अनूठे प्रतीक के आबाद होते-होते राजा भारतीचंद्र भी इस दुनिया से चल बसे।
राजा भारतीचंद्र के अनुज मधुकरशाह जू देव को संवत् 1611 में ओरछा की राजगद्दी मिली। उन्होंने आसपास के तमाम जागीरदारों को इकट्ठा करके ओरछा राज्य की विधिवत् स्थापना की। राजा मधुकरशाह के समय दिल्ली में हुमायूँ का शासन था। मुगलों के कई आक्रमणों का उन्होंने मुँहतोड़ जवाब दिया। हुमायूँ और अकबर, दोनों ही राजा मधुकरशाह को अपने कब्जे में नहीं ले पाए। राजा मधुकरशाह जितने वीर थे, उतने ही सौंदर्यप्रेमी और कलाप्रेमी भी थे। उन्होंने ओरछा दुर्ग का विस्तार किया और साथ ही नौचौका महल को व्यवस्थित कराने के बाद अपनी ज्येष्ठ रानी कुँवरि गणेशी जू को सौंप दिया। इस तरह आज का रामराजा मंदिर अपने अतीत में रानी कुँवरि गणेशी का निवास-स्थान बना था।
रानी कुँवरि गणेशी आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। वे श्रीराम की उपासक थीं। राजा मधुकरशाह भी वैष्णवभक्त थे। वे कृष्ण के उपासक थे और राधावल्लभ संप्रदाय में उनकी विशेष आस्था थी। इस कारण वे जुगुलकिशोर जी के मंदिर में कृष्ण की सखी बनकर नृत्यगान किया करते थे। एक छोर पर राजा मधुकरशाह की कृष्णभक्ति थी, तो दूसरे छोर पर रानी कुँवरि गणेशी की रामभक्ति थी। हालाँकि दोनों की आस्थाएँ एक-दूसरे से टकराती नहीं थीं, लेकिन एक दिन बात बिगड़ ही गई। रानी ने कहा, कि आप सखी बनकर मंदिर में नृत्य करते हैं। मंदिर में तमाम लोग आते हैं। उन्हें रोका भी नहीं जा सकता। आप नारी रूप धारण करके प्रजा के सामने नृत्य करने में लीन हो जाते हैं। इससे राजकीय सम्मान और मर्यादा का उल्लंघन होता है। प्रजा पर भी इसका अच्छा असर नहीं पड़ता होगा। राजा मधुकरशाह को रानी की बात चुभ गई। इस पर राजा मधुकरशाह ने कृष्ण की सोलह कलाओं का वर्णन किया, तो रानी ने राम के मर्यादापुरुषोत्तम रूप की दुहाई दी। कुल मिलाकर दो भक्तों का भक्तिभाव आपसी टकराव का कारण बन गया।
नौचौका महल भी उस दिन दो भक्तों की रार-तकरार का साक्षी बना होगा, जिसने इतिहास के पन्नों में अमिट रेख खींच दी। राजा मधुकरशाह ने रानी कुँवरि गणेशी से वृंदावन चलने को कहा। रानी ने अयोध्या चलने की जिद मचाई। राजा मधुकरशाह ने बड़े गुस्से में कहा, कि- “जौ रामजी की एँसई भगत हौ सो अपुने राम को साथई लेके आईयो। नोंई हमखों आपुनो मुँह ना दिखाईयो।” रानी ने भी गुस्से में कहा, कि- “अगर मैं रामजी को अपने साथ न ला पाई, तो मैं लौटकर नहीं आऊँगी, अपना मुँह भी आपको नहीं दिखाऊँगी।” राजपरिवार के गुरु गोस्वामी हरिराम व्यास भी इनके झगड़े को सुलझा नहीं पाए। उन्होंने रानीजू को बहुत समझाया, मगर रानीजू नहीं मानीं। राजा मधुकरशाह भी अपनी जिद पर अड़े रहे। आखिरकार राजा साहब ने वृंदावन का रास्ता पकड़ लिया, और रानी कुँवरि गणेशी अयोध्या की तरफ चल पड़ीं। यह ऐतिहासिक घटना आज भी लोककंठों में जीती है-
रामभक्त बुंदेलवंश में हो गई ऐसी छत्रानी, नगर ओरछा की रानी ।
मधुकरशाह बुंदेलवंश में राजा भये ऐसे दानी, नगर ओरछा रजधानी ।।
राजा बोल उठे कर हाँसी, भारी प्रेम बान की गाँसी ।
कैसी भक्तिन हो गई रानी, लौटियो बिठा गोद सुखरासी ।।
रानी बोली पतिव्रता मैं, पति की सत्य करौ वानी, नगर ओरछा की रानी ।.....
राजा मधुकरशाह तो वृंदावन पहुँच गए, और अपने लाड़लीलाल मदनमोहन जुगुलकिशोरजू की भक्ति में रम गए, लेकिन रानी कुँवरि गणेशी के लिए अयोध्या पहुँचने के बाद जीवन-मरण का संकट ही आ गया था। विक्रम संवत् 1630 की आषाढ़ शुक्ल 12वीं तिथि को रानी कुँवरि गणेशी ने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया था। अयोध्या पहुँचने के बाद वे किस मुँह से ओरछा को वापस लौटेंगी, यह चिंता रानी को सताने लगी। वे सरयू नदी के किनारे बैठकर रामनाम स्मरण करने लगीं। उनकी साधना दिनों-दिन कठिन से कठिनतम होती गई, लेकिन राजा साहब के वचन को पूरा करने का रास्ता उन्हें नहीं सूझा। अंततः रानी कुँवरि ने तय किया, कि वे सरयू में अपने प्राण त्याग देंगी। कहा जाता है, कि ऐसा विचार करके उन्होंने तीन बार सरयू में छलाँग लगाई, लेकिन हर बार वे किनारे पर आ जाती थीं। चौथी बार जब उन्होंने सरयू में छलाँग लगाई, तो उनकी गोद में श्रीराम का विग्रह आ गया।
लोकजीवन में प्रचलित इस घटना के साथ जुड़ी कथा में प्रसंग आता है, कि रानी कुँवरि गणेशी ने रामलला से ओरछा चलने को कहा। रामलला ने कहा, कि मैं अयोध्या छोड़कर ओरछा कैसे चला जाऊँ? मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे साथ मेरा परिवार है। सीता, लक्ष्मण और हनुमान हैं। आप तो मुझ अकेले को ही लेने आईं थीं। रानी ने कहा, कि आप पूरे परिवार सहित चलिये। राम ने पूछा, आप मुझे ओरछा क्यों ले जाना चाहती हैं? रानी ने कहा- हम आपको ओरछा का राजपाट सौंपना चाहते हैं। राम ने कहा, कि हम ओरछा तो चल देंगे, किंतु हमारी पहली शर्त यह है, कि हम पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करेंगे। दूसरी शर्त है, कि हम दिन में ओरछा में रहेंगे और रात्रि में अयोध्या आ जाएँगे। तीसरी शर्त यह है, कि ओरछा की सीमा में हमें जिस स्थान पर बैठा दिया जाएगा, हम वहाँ से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाएँगे। रानी ने कहा, कि हमें आपकी सभी शर्तें स्वीकार हैं।विक्रम संवत् 1630 की श्रावण शुक्ल पंचमी को हुई इस घटना की खबर न केवल अयोध्या में, बल्कि ओरछा तक फैल गई। राजा मधुकरशाह भी रानी कुँवरि के भक्तिभाव से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत ही एक विशाल मंदिर का निर्माण ओरछा में शुरू करा दिया। राजा साहब की इच्छा थी, कि मंदिर ऐसे स्थान पर बने, कि राजमहल से सीधे दर्शन किये जा सकें। इसके साथ ही मंदिर का स्थापत्य एकदम अनूठा और अद्वितीय हो। इसके लिए राजा मधुकरशाह ने बुंदेला स्थापत्य के साथ ही नागर, द्राविड़ और मामल्य स्थापत्य शैली के कलाकारों को आमंत्रित किया और इन शैलियों के मिले-जुले रूप के साथ भव्य मंदिर के निर्माण का काम शुरू हो गया। आज रामराजा मंदिर के बगल में जिस भव्य चतुर्भुज मंदिर को हम देखते हैं, यह वही मंदिर था, जो रामराजा के लिए राजा मधुकरशाह ने बड़ी आस्था और भक्ति के साथ बनवाया था।
दूसरी तरफ रानी कुँवरि गणेशी अयोध्या से श्रीराम के विग्रह को लेकर चलीं। शर्त के अनुसार उन्हें पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करनी थी, और दिन में ही पैदल यात्रा करनी थी। इस कारण रानी को ओरछा पहुँचने में लगभग 08 माह, 27 दिन का समय लग गया। इतनी अवधि में बहुत तेजी के साथ काम करते-करते भी मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो पाया। पूरी तरह से मंदिर तैयार हो जाए, तब तक रामराजा को नौचौका महल में ही विश्राम कराया जाए, ऐसा विचार करके रानी उन्हें अपने साथ अपने नौचौका महल में ले गईं। रानीजू ने अपने आराध्य श्रीराम को भोजन कराने के लिए रसोईघर में बैठा दिया। इसके बाद तो रामराजा वहाँ से उठे ही नहीं। आज जिस स्थान पर रामराजा विराजमान हैं, वह रनिवास का रसोईघर हुआ करता था। मंदिर बनकर तैयार हो जाने के बाद भी रामराजा उस स्थान से नहीं हिले। वहीं पर उनका ओरछा के राजा के रूप में राज्याभिषेक भी हुआ। ओरछा ही नहीं, समूचे बुंदेलखंड में यह सारी घटना लोकजीवन में रच-बस गई।
लोग आज भी बड़ी आस्था और श्रद्धा के भाव से गाते हैं-
“मधुकरशाह नरेश की रानी कुँवरि गणेश, पुक्खन-पुक्खन लाई हैं ओरछे अवध नरेश ।”
“बैठे जिनकी गोद में मोद मान विश्वेश, कौशल्या सानी भईं रानी कुँवरि गणेश ।”
जनआस्था रानी गणेश कुँवरि को माता कौशल्या का, और राजा मधुकरशाह को राजा दशरथ का अवतार बना देती है। श्रीराम के जीवन में पुष्य नक्षत्र का विशेष योग रहा है। उन्होंने इसी नक्षत्र में अपना कमल रूपी नयन शिव को अर्पित किया था, ऐसा भी माना जाता है। इस कारण पुष्य नक्षत्र को बहुत पुनीत-पावन माना जाता है। इसी कारण ओरछा के लिए पुष्य नक्षत्र धार्मिक पर्व के समान महत्त्व-माहात्म्य रखता है।
रामराजा ओरछा के राजा हैं, इस कारण उनका वैभव भी राजसी है। इस मंदिर में श्रीराम का विग्रह अन्य राममंदिरों से अलग है, क्योंकि यहाँ राम राजसी मुद्रा में बैठे हुए हैं। उनकी आरती का समय भी एकदम निश्चित है, जिसे किसी भी दशा में बदला नहीं जा सकता। पिछले लगभग साढ़े चार सौ वर्षों से घड़ी की सुई देखकर इतने नियमित तरीके से रामराजा सरकार की आरती होती है, कि आरती के समय से आप अपनी घड़ी मिला सकते हैं। रामराजा सरकार ओरछा के राजा हैं, इस कारण ओरछा की सीमा के अंदर अन्य किसी को भी सलामी नहीं दी जाती है, भले ही वह अतिविशिष्ट पदधारी व्यक्ति क्यों न हो। सन् 1887 ई. के बाद लगभग समूचा बुंदेलखंड ‘यूनियन जैक’ के अधीन आ गया था। इसके साथ ही ओरछा राज्य को 17 तोपों की सलामी का अधिकार दिया गया था। यह सलामी भी ओरछा के किसी राजा को नहीं, बल्कि रामराजा सरकार को ही मिलती थी। आजादी के बाद राज्यों-रियासतों के भारत संघ में विलय के बाद राजवंशों को मिलने वाली सलामी समाप्त हो गई थी, लेकिन ओरछा राज्य में रामराजा को सलामी आज भी दी जाती है।
बुंदेलखंड के लोगों को आज भी इस बात का गर्व है, कि अयोध्या ने श्रीराम को वनवासी बना दिया, लेकिन हमने उन्हें राजपाट दिया है। आज भी लोग बड़े गर्व के साथ गाते हैं-
“अवध की रानी ने तो वनवासी बनाए राम, पर मधुकर की रानी ने रामराजा बनाए हैं ।”
यह गर्व का भाव लोकगीतों और लोककथाओं में ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के चरित्र में, रानी कुँवरि गणेशी-महाराजा मधुकरशाह के व्यक्तित्व और कृतित्व में भी रचा-बसा हुआ है। जिस समय देश के बड़े हिस्से में मुगलों का शासन था; उस समय असुरक्षा, आतंक, अन्याय, अत्याचार और अराजकता से भरे माहौल में देश की निरीह जनता का नेतृत्व करने के स्थान पर, उसे मार्गदर्शन देने की जगह राजशक्ति या राजे-रजवाड़े आपसी कलह और अंतर्द्वंद्व से जूझ रहे थे। हिंदी साहित्य का भक्तियुग (संवत् 1375 से संवत् 1700 विक्रमी तक) अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभा रहा था। भक्तकवि जनता को राह दिखाने का प्रयास कर रहे थे। ऐसे जटिल समय में, जबकि तमाम राजाओं-राजपरिवारों के लिए स्वयं के अहं की तुष्टि और व्यक्तिगत स्वार्थ ही महत्त्वपूर्ण हो गए थे, उस समय एकमात्र ओरछा राज्य का राजपरिवार ही ऐसा था, जिसने राम को राजा बनाकर समाज को नीति-नैतिकता और आदर्शों पर चलने का रास्ता दिखाया था। जटिल, विषम और संघर्षपूर्ण स्थितियों के बीच महाराजा मधुकरशाह अपने आत्मसम्मान और आत्मगौरव के साथ डटकर खड़े हुए थे। उनको मिली टीकमशाह की उपाधि इसकी साक्षी है।
ओरछा राजमहल में एक धुँधला-सा भित्तिचित्र आज भी राजा मधुकरशाह की वीरता और उनके आत्मसम्मान की गौरवगाथा कहता है। इस चित्र में अकबर का दरबार लगा हुआ है। आसपास कुछ कुत्ते जीभ निकाले हुए खड़े हैं, और उनके बीच में महाराजा मधुकरशाह अपनी तलवार निकाले हुए तनकर खड़े हैं। कहा जाता है, कि अकबर ने एक बार यह राजाज्ञा निकाली, कि उसके दरबार में कोई भी दरबारी-सामंत तिलक लगाकर, माला पहनकर नहीं आएगा। राजा मधुकरशाह ने बुंदेलखंड के राजाओं-सामंतो से कहा, कि वे अपमानित करने वाली इस राजाज्ञा का बहिष्कार करें। सभी ने इसके लिए सहमति तो दे दी, लेकिन वे डर के कारण सूने माथे के साथ दरबार में पहुँच गए। दूसरी तरफ राजा मधुकरशाह नाक की नोक से माथे तक लंबा तिलक लगाकर पहुँचे। अकबर के द्वारा अवमानना का कारण पूछने पर वे तलवार निकालकर खड़े हो गए। उनकी निर्भीकता और साहस को देखकर दूसरे राजा और सामंत भी राजा मधुकरशाह के समर्थन में खड़े  हो गए। स्थिति को बदलते देख अकबर ने कहा, कि आपके धर्मपालन और आपकी निर्भीकता को देखकर मैं बहुत प्रभावित हूँ। तब से राजा मधुकरशाह को टीकमशाह की उपाधि मिल गई और बुंदेलखंड में मदुकरशाही तिलक का नया चलन भी शुरू हो गया। टीकमगढ़ नगर के अस्तित्व में आने की कहानी भी इसी प्रसंग से जुड़ी हुई है।
मुगलों के लिए बुंदेला शासकों को कब्जे में लेना आसान नहीं था। इस कारण वे मजबूरी में मैत्री-भाव रखते थे, और अंदर ही अंदर ईर्ष्या का भाव रखते थे। महाराजा मधुकरशाह और उनके पुत्र राजा वीरसिंह जू देव के शासनकाल में ओरछा राज्य को अपने कब्जे में लेना मुगलों के लिए संभव नहीं रहा। जिस समय शाहजहाँ आगरा की गद्दी पर बैठा, उस समय राजा वीर सिंह के पुत्र जुझार सिंह ओरछा के राजा थे। जुझार सिंह की स्वतंत्रता शाहजहाँ की आँखों में खटकती थी, लेकिन जुझार सिंह को जीत पाना उसके लिए संभव नहीं था। इसलिए उसने छल-छद्म का सहारा लिया। राजा जुझार सिंह के अनुज दिमान हरदौल बहुत वीर और पराक्रमी थे। उन्होंने अपने विश्वस्त सैनिकों की बुंदेली सेना बना रखी थी, जो हर समय उनके साथ रहती थी, और मुगलों के हर आक्रमण का मुँहतोड़ जवाब देती थी। राजा जुझार सिंह अकसर ओरछा से बाहर रहते थे। इसका लाभ उठाकर उनके दोगले सरदार हिदायत खाँ ने दिमान हरदौल और रानी चंपावती के बीच देवर-भाभी के पवित्र संबंध पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। राजा जुझार सिंह हिदायत खाँ की चाल को समझ नहीं पाए और अपनी रानी चंपावती से सतीत्व की परीक्षा देने के लिए दिमान हरदौल को विष पिलाने की जिद पर अड़ गए। रानी चंपावती ने बहुत समझाया, लेकिन राजा जुझार सिंह टस से मर नहीं हुए। अंततः दिमान हरदौल ने विषपान करके मर्यादा, नैतिकता की अनूठी मिसाल कायम की।
दिमान हरदौल के व्यक्तित्व ने बुंदेलखंड के लोकजीवन में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, कि आज भी उनके नाम के चबूतरे हर गाँव में मिलते हैं। पवित्र संबंधों की दुहाई देने के लिए, मर्यादित-संयमित-वीरत्व से पूर्ण जीवन को स्मरण करने के लिए शादी-विवाह-शुभकार्यों का पहला निमंत्रण भी दिमान हरदौल को दिया जाता है। दिमान हरदौल का बैठका रामराजा मंदिर के बाईं ओर है। लोग उनको स्मरण करते हुए आज भी गाते हैं- “बुंदेला देसा के हो, लाला प्यारे भले हैं लछारेओ ना।” बुंदेलखंड के प्यारे लाला हरदौल को कभी न भुलाने, कभी ना छोड़ने की बात करते ये ‘हरदौल के गीत’ ओरछा ही नहीं, सारे बुंदेलखंड की अनूठी पहचान गढ़ते हैं।
चतुर्भुज मंदिर, रामराजा सरकार का नौचौका महल, और हरदौल का बैठका एक क्रम के साथ ओरछा नगरी में स्थापित हैं। विशालकाय-भव्य चतुर्भुज मंदिर को छोड़कर रानी कुँवरि गणेशी के महल में विराजने वाले रामराजा देवत्व को तजकर नरश्रेष्ठ के रूप में मर्यादा-नैतिकता-आदर्श जीवन की पराकाष्ठा को लेकर नौचौका महल में विराजते हैं। राजा के रूप में प्रतिष्ठित मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का सामान्य मानव के रूप में, हमारे अपने जैसे लोगों के बीच में मर्यादित-संस्कारित, नीति-नैतिकतापूर्ण, वीरत्व-नायकत्व से विभूषित जीवन का उत्कृष्ट साक्ष्य हरदौल के रूप में उपस्थित होता है। इस कारण हरदौल बैठका जीवंत तीर्थ की प्रतिष्ठा को पाता है। यही सब मिलकर ओरछा के, समूचे बुंदेलखंड के चरित्र को गढ़ता है। इसी कारण ओरछा के कण-कण में तीर्थ रमता है, बसता है। ओरछा निवासी राकेश अयाची जी  के शब्दों में-
मधुकरशाह श्रेष्ठ राजा थे कुँवरि गणेशी रानी ।
राजा रामचंद्र की प्रतिमा जिनकी अमर निशानी ।।
देवतुल्य हरदौल लला थे सच्चे प्रेम पुजारी ।
जिनके कारण पूजा होती घर-घर आज तुम्हारी ।।
किसी देव से निम्न नहीं है कण-कण पूज्य तुम्हारा ।
धन्य-धन्य है श्रेष्ठ ओरछे, शत-शत नमन हमारा ।।

(हिंदी प्रचार-प्रसार सोसायटी, अमृतसर, पंजाब द्वारा प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिकी- बरोह के जून, 2019 अंक में प्रकाशित, संपादक- डॉ. शुभदर्शन)
डॉ. राहुल मिश्र

Monday, 30 April 2018

राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार






राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं  धर्म्यं सुसुखं कर्तुमाव्ययम् ।।1
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम दोषदृष्टि रहित हो, भक्त हो, इसलिए मैं इस परम गोपनीय ज्ञान को, जो विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण है, उसे बताऊँगा। तुम इस ज्ञान को जानकर इस दुःखरूपी संसार से मुक्त हो जाओगे। यह विज्ञानसम्मत और तर्कपूर्ण ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है। यह समस्त गोपनीय ज्ञानों का राजा है। यह पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्म से युक्त है। यह सुगम और अविनाशी है। गीता का नवम अध्याय उस ज्ञान की बात से शुरू होता है, जिसे विज्ञानसम्मत अर्थात तथ्यों पर खरा उतरने वाला बताया गया है। यह अत्यंत गोपनीय भी है, अर्थात यह सर्वसुलभ नहीं है, किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग जानकर और उस मार्ग पर चलकर यदि इस विज्ञानसम्मत ज्ञान को ग्रहण कर लिया जाए, इसे जीवन में उतार लिया जाए, तो यह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगा, इसके प्रत्यक्ष फल प्राप्त होंगे। धर्म से युक्त ऐसे विशिष्ट ज्ञान की विवेचना करने के कारण गीता में इस अध्याय का अपना विशिष्ट स्थान है।
धर्म, आस्था और भक्ति के रूढ़ अर्थों से अलग गीता व्यवहार की दृष्टि से, दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यापार की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न भाष्यकारों, विद्वानों और तर्कशास्त्रियों ने इस कारण गीता का समग्र विवेचन विभिन्न तरीकों-पद्धतियों से किया है। विनोबा भावे द्वारा दिये गए गीता-प्रवचन इस संदर्भ एकदम अलग स्थान रखते हैं। गीता के समस्त अध्यायों पर दिये गए उनके प्रवचन पुस्तकाकार उपलब्ध हैं। अपने प्रवचनों को उन्होंने आम जनता के उपयोगार्थ केंद्रित किया है। वे ‘गीता प्रवचन’ की प्रस्तावना में लिखते हैं- इनमें तात्विक विचारों का आधार छोड़े बगैर, लेकिन किसी वाद में न पड़ते हुए, रोज के कामों की बातों का ही जिक्र किया गया है।.... यहाँ श्लोकों के अक्षरार्थ की चिंता नहीं, एक-एक अध्याय के सार का चितंन है। शास्त्र-दृष्टि कायम रखते हुए भी शास्त्रीय परिभाषा का उपयोग कम-से-कम किया है। मुझे विश्वास है कि हमारे गाँव वाले मजदूर भाई-बहन भी इसमें अपना श्रम-परिहार पाएँगे।2 इस प्रकार विनोबा के गीता-प्रवचन की समाज से निकटता और उनके प्रवचनों की लौकिक दृष्टि स्वतः प्रमाणित हो जाती है। पूज्य साने गुरुजी ने विनोबा के प्रवचनों को शब्दबद्ध किया। मराठी और हिंदी में विनोबा का ‘गीता प्रवचन’ एक अलग किस्म के भाष्य के रूप में, गीता को आत्मसात करने की नई दृष्टि के रूप में इस प्रकार सामने आ सका।
बाबा विनोबा के लिए श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का दर्शन-मात्र नहीं है, वरन् जीवन को जीने की कला है, एक पद्धति है। वे इसी कारण गीता के विविध अध्यायों का विवेचन शास्त्र के स्थान पर लोक के आधार पर करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का नवाँ अध्याय इस कारण उनके लिए विशिष्ट हो जाता है, क्योंकि वे इस अध्याय के माध्यम से जीवन जीने की उस पद्धति को व्याख्यायित करते हैं, जो उनके समय की अनिवार्यता और आवश्यकता थी। वे गीता के नवम अध्याय पर प्रवचन की शुरुआत में ही कहते हैं-
यह अध्याय गीता के मध्य भाग में खड़ा है। सारी महाभारत के मध्य गीता और गीता के मध्य यह नवाँ अध्याय। अनेक कारणों से इस अध्याय को पावनता प्राप्त हो गई है। कहते हैं कि ज्ञानदेव ने जब अंतिम समाधि ली, तो उन्होंने इस अध्याय का जप करते हुये प्राण छोड़ा था। इस अध्याय के स्मरण मात्र से मेरी आँखें छलछलाने लगती हैं और दिल भर आता है। व्यासदेव का यह कितना बड़ा उपकार है, केवल भारतवर्ष पर ही नहीं, सारी मनुष्य-जाति पर उनका यह उपकार है। जो अपूर्व बात भगवान ने अर्जुन को बताई, वह शब्दों द्वारा प्रकट करने योग्य न थी। परंतु दयाभाव से प्रेरित होकर व्यासजी ने इसे संस्कृत भाषा द्वारा प्रकट कर दिया। गुप्त वस्तु को वाणी का रूप दिया। इस अध्याय के आरंभ में भगवान कहते हैं-
राजविद्या  राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् ।
यह जो राजविद्या है, यह जो अपूर्व वस्तु है, वह प्रत्यक्ष अनुभव करने की है। भगवान उसे ‘प्रत्यक्षावगम’ कहते हैं। शब्दों में न समाने वाली, परंतु प्रत्यक्ष अनुभव की कसौटी पर कसी हुई यह बात इस अध्याय में बतायी गई है। इससे यह बहुत मधुर हो गया है। तुलसीदासजी ने कहा है-
को  जाने को  जैहे  जम-पुर,   को  सुर-पुर  पर-धाम  को ।
तुलसिहि बहुत भलो लागत, जग-जीवन रामगुलाम को ।।
मरने के बाद मिलने वाले स्वर्ग और उसकी कथाओं से यहाँ क्या काम चलेगा? कौन कह सकता है कि स्वर्ग कौन जाता है और यमपुर कौन जाता है? यदि संसार में चार दिन रहना है, तो राम का गुलाम बनकर रहने में ही मुझे आनंद है, ऐसा तुलसीदासजी कहते हैं। राम का गुलाम होकर रहने की मिठास इस अध्याय में है। प्रत्यक्ष इसी देह में, इन्हीं आँखों से अनुभूत होने वाला फल, जीते जी अनुभव की जाने वाली बातें इस अध्याय में बतायी गयी हैं।3
नवम अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए कथनों का ऐसा विश्लेषण अद्भुत है। तुलसी के राम जहाँ मर्यादा और आदर्श के प्रतीक हैं, वहीं विनोबा के राम मानव-मात्र हैं, जीव-मात्र हैं। यह जगत इसी कारण राममय है। मानव साक्षात् परमात्मा की ही मूर्ति है, इसलिए उसकी सेवा, उसकी भक्ति ही सबसे बड़ी है। संसार में जो प्रत्यक्ष है, उसकी सेवा पर हमें एकाग्र होना चाहिए। स्वर्ग, नर्क की कल्पनाओं में उलझकर अपने सांसारिक कर्मों को जटिल, आत्मकेंद्रित और कृत्रिम नहीं बनाना चाहिए। इसके लिए विनोबा बड़ी सहजता के साथ कृष्ण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि- मोक्ष पर केवल मनुष्य का ही अधिकार नहीं, बल्कि पशु-पक्षी का भी है- यह बात श्रीकृष्ण ने साफ कर दी है।4 इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान श्रीकृष्ण ने इसीलिए बताया था। गोवर्धन पर्वत, जो सबके सामने है, प्रत्यक्ष है। जिस पर हमारा जीवन आश्रित है, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। वह वास्तव में परमात्मा का रूप है। इसी तरह गाय-बैल-अश्व और अन्य जीवधारी भी हैं। उनके प्रति समर्पण का भाव, उनके प्रति भक्ति का भाव रखना सीधे परमात्मा की भक्ति है, क्योंकि वे परमात्मा के ही प्रतिरूप हैं।
कौन्तेय ! जो  खाते  हो करते तथा आहुति जो करो ।
दान तप  जो  करो  वह   सब  मुझे  ही  अर्पण करो ।।
शुभ अशुभ जो फल कर्म बंधन यह किये से मुक्त हों ।
कर्म  सब  अर्पण  करो,  मुझसे  मिलो  अरु मुक्त हो ।।5
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में कर्मयोग और भक्तियोग का सुंदर मेल है। कर्मयोग कर्म करने और फल की इच्छा न करने की बात कहता है। भक्तियोग ईश्वर के साथ भावपूर्ण जुड़ाव की बात कहता है। दोनों ही अलग-अलग दिशाओं पर केंद्रित हैं। नवम अध्याय में इन दोनों को इस प्रकार समीप लाया गया है, जोड़ दिया गया है, कि यह राजयोग बन गया है। यह योग गुह्य भी इसी कारण है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रदर्शित कर्मयोग और भक्तियोग का प्रत्यक्ष नहीं रह जाता, गोपनीय हो जाता है। यह जटिल साधना के साथ अंतरात्मा में केंद्रित हो जाता है। यह भक्ति और कर्म के सौंदर्य को आत्म-तत्त्व के सौंदर्य से जोड़कर श्रेष्ठतम बना देता है। बाबा विनोबा ने दैनंदिन जीवन के कार्य-व्यवहार में इस श्रेष्ठता को प्रतिष्ठापित करने हेतु राजयोग की अत्यंत सामयिक और सुंदर व्याख्या की है। वे लिखते हैं- फल का विनियोग चित्त-शुद्धि के लिए करना चाहिये। जो काम जैसा हो जाय, वैसा ही उसे भगवान को अर्पण कर दो। प्रत्यक्ष क्रिया जैसे-जैसे होती जाय, वैसे-ही-वैसे उसे भगवान को अर्पण करके मनरतुष्टि प्राप्त करते रहना चाहिए। फल को छोड़ना नहीं है, उसे भगवान को अर्पण कर देना है। यह तो क्या, मन में उत्पन्न होने वाली वासनाएँ और काम-क्रोधादि विकार भी परमेश्वर को अर्पण करके छुट्टी पाना है।6 इस प्रकार के भाव के साथ कर्म किया जाए, तो आज के समय की अनेक विकृतियों का शमन किया जा सकता है। भगवान को अर्पित करने के लिए भक्त जिस प्रकार शुद्ध पुष्प, जल, प्रसाद आदि का यत्न करते हैं, उसी प्रकार शुद्ध और सात्विक कर्मों के अर्पण हेतु वे प्रेरित होंगे। कर्म में शुचिता और पवित्रता स्वतः आ जाएगी। शरीर की प्रत्येक इंद्रिय द्वारा किया गया कार्य ईश्वर को अर्पण किया जाना है, यह मन में रखकर कार्य करना ही ‘राजयोग’ है। बाबा विनोबा द्वारा की गई ऐसी व्याख्या अद्भुत और अनुपम है। वे कहते हैं कि अर्पण करने हेतु विशिष्ट क्रिया का आग्रह नहीं है। कर्ममात्र ईश्वर को अर्पित कर देना है।
विनोबा ने सारे जीवन को हरिमय बनाने, अर्थात पावन-पुनीत बनाने का माध्यम राजयोग को ही बताया है। जीवन के हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को, इसकी प्रासंगिकता को वे सरल शब्दों में स्पष्ट करते हैं। वे घर-परिवार से लगाकर समाज तक हर क्षेत्र में इसकी उपादेयता को व्याख्यायित करते हैं। अध्ययन-अध्यापन में राजयोग की महत्ता को विशेष रूप से वे रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि- शिक्षण-शास्त्र में तो इस कल्पना की बड़ी ही आवश्यकता है, लड़के क्या हैं, प्रभु की मूर्तियाँ हैं। गुरु की यह भावना होनी चाहिये कि मैं इन देवताओं की ही सेवा कर रहा हूँ। तब वह लड़कों को ऐसे नहीं झिड़केगा- “चला जा अपने घर। खड़ा रह घंटे भर। हाथ लवाकर। कैसे मैले कपड़े हैं? नाक से कितनी रेंट बह रही है।” बल्कि हलके हाथ से नाक साफ कर देगा, मैले कपड़े धो देगा और फटे कपड़े सीं देगा। यदि शिक्षक ऐसा करे, तो इसका कितना अच्छा परिणाम होगा। मार-पीटकर कहीं अच्छा नतीजा निकाला जा सकता है? लड़कों को भी चाहिये कि वे इसी दिव्य भावना से गुरु को देखें। गुरु शिष्य को हरि मूर्ति और शिष्य गुरु को हरि मूर्ति मानें। परस्पर ऐसी भावना रखकर यदि दोनों व्यवहार करें, तो विद्या तेजस्वी होगी।7
विनोबा का मत है कि ऐसी भावना के साथ जब जीवन में कर्म किये जाएँगे, तब कर्म स्वयं पवित्र हो जाएगा और पाप का भय नहीं रह जाएगा। सब जगह प्रभु विराजमान हैं, ऐसी भावना चित्त में बैठ जाय, तो फिर एक-दूसरे के साथ हम कैसा व्यवहार करें, यह नीतिशास्त्र हमारे अंतःकरण में अपने आप स्फुरने लगेगा।8 ऐसी भावना को कर्म में उतारने के बाद नीतिशास्त्र और व्यवहार-विज्ञान के विशिष्ट अध्ययन की अनिवार्यता नहीं रह जाती है। जब कर्म पवित्र हो जाएगा, तब पाप और पुण्य का अंतर करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी। कर्म स्वतः पुण्यमय और पवित्र हो जाएगा।
इसी आधार पर वे जीवन की सार्थकता को प्रमाणित करते हैं। वे लिखते हैं- गीता में कुल सात सौ ही श्लोक हैं। पर ऐसे भी ग्रंथ हैं, जिनमें दस-दस हजार श्लोक  हैं। किंतु वस्तु का आकार बड़ा होने से उसका उपयोग भी अधिक होगा, ऐसा नहीं कह सकते। देखने की बात यह है कि वस्तु में तेज कितना है, सामर्थ्य कितनी है? जीवन में क्रिया कितनी है, इसका महत्त्व नहीं। ईश्वरार्पण-बुद्धि से यदि एक भी क्रिया की हो, तो वही हमें पूरा अनुभव करा देगी।9 इस प्रकार जीवन में विशिष्ट की प्राप्ति के लिए, मोक्ष के लिए अलग से यत्न करने की, प्रयास करने की बात बाबा विनोबा नहीं करते। वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में, कर्म के किसी भी स्तर पर, किसी भी क्षण पवित्र भावना से कर्म करने और उसे ईश्वर को अर्पित कर देने की क्रिया को ही श्रेष्ठ बताते हैं। वे कहते हैं कि- बोने और फेंक देने में फर्क है। बोया हुआ थोड़ा भी अनंतगुना होकर मिलता है। फेंका हुआ यों ही नष्ट हो जाता है। जो कर्म ईश्वर को अर्पण किया गया है, उसे बोया हुआ समझो। उससे जीवन में अनंत आनंद भर जायगा, अपार पवित्रता छा जायगी।10
भक्तियोग और कर्मयोग के संयोजन से निःसृत राजयोग की सुंदर, सहज और व्यावहारिक व्याख्या करके बाबा विनोबा ने श्रीमद्भगवद्गीता के उस लोकोपयोगी पक्ष को प्रकाश में लाने का कार्य किया है, जिसे जीवन जीते हुए, सरल और सहज साधना के साथ आत्मसात् किया जा सकता है। आज के जीवन में इसकी प्रासंगिकता समाज के निर्माण के लिए, जीवन की शुचिता के लिए, व्यवहार की पवित्रता के लिए, समर्पण और त्याग के साथ संबंधों के निर्वहन के लिए, और सच्चे अर्थों में मोक्ष की प्राप्ति के लिए है।
संदर्भ-
1. श्रीमद्भगवद्गीता, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ. 117,
2. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, प्रस्तावना,
3. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 122-123,
4. वही, पृ. 126,
5. श्रीमद्भगवद्गीता का पद्यानुवाद, गणेश मिश्र ‘बनरा’, साहित्य मंदिर प्रेस, लखनऊ, प्रथम सं. 1937, पृ. 33-34,
6. गीता प्रवचन, विनोबा, अनुवादक- हरिभाऊ उपाध्याय, अखिल भारत सर्व-सेवा-संघ-प्रकाशन, राजघाट, काशी, सं. 1956, पृ. 130,
7. वही, पृ. 138
8. वही, पृ. 139,
9. वही, पृ. 141,
10.  वही, पृ. 141 ।
डॉ. राहुल मिश्र
(अखिल भारतीय साहित्य परिषद् व गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के संयुक्त तत्त्वावधान में नई दिल्ली में दिनांक 25-26 मार्च, 2018 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र)

Sunday, 15 October 2017

रघुपति भगति सजीवनि मूरी


रघुपति भगति सजीवनि मूरी

रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।
(तुलसीदास कहते हैं कि रघुपति की भक्ति संजीवनी की जड़ की तरह है। यह भक्ति कंद या फल की भाँति सामने दिखाई देने वाली नहीं है। इसी कारण इसे आसानी से पाया नहीं जा सकता। इसे जमीन को खोदकर निकालना पड़ा है। जटिल और कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इसी कारण रघुपति की भक्ति सरल नहीं है, सभी के लिए सुलभ नहीं है। आखिर ऐसे दुर्लभ और जटिल आराध्य रघुपति कौन हैं? उनकी भक्ति, जो संजीवनी मूल या संजीवनी की जड़ की भाँति दुर्लभ और जटिल है, वह कैसी है, और उसे किस प्रकार पाया जा सकता है? उसे पाने के लिए कौन-से प्रयास करने पड़ते हैं और उसे पाने के लिए किस प्रकार की योग्यता की, किन-किन उपरणों की जरूरत पड़ती है? उसका विशद वर्णन बाबा तुलसी ने इस प्रसंग में किया है।)
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ।।
नाथ मोहिं निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी ।।1
हिंदी साहित्येतिहास में भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास की कीर्ति का अक्षय स्रोत श्रीरामचरितमानस है। युगदृष्टा, क्रांतिदर्शी और कालजयी कवि गोस्वामी तुलसीदास की यह कृति रामभक्ति का एक माध्यम-मात्र नहीं है, वरन् इसमें युगानुरूप चेतना के ऐसे तत्त्व विद्यामान हैं, जो भक्तिकालीन स्थितियों-परिस्थितियों से लगाकर वर्तमान तक अपनी प्रासंगिकता को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इसी कारण देश और काल की परिधि में मानस को नहीं बाँधा जा सकता है। जब प्रश्न साहित्य की सामर्थ्य का उठता है, और साहित्य की प्रासंगिकता-उपादेयता को देश-काल-परिस्थिति की कसौटी में परखने का यत्न होता है, तो मानस को सदैव और सर्वत्र खरा पाते हैं। यह अलग विषय है, कि आज की विकृत और कुत्सित मानसिकता ने मानस को जाति-धर्म-वर्ग के दायरे में बाँधकर इसके लोकमंगलकारी और लोककल्याणकारी पक्षों को विस्मृत कर दिया है।
श्रीरामचरितमानस का आकार वस्तुतः रामभक्त तुलसी की दास्यभक्ति भावना से पुष्ट होकर बनता है, किंतु मानस के प्रणयन में प्रारंभ से पूर्णता की ओर चलते हुए राम की कथा जैसे-जैसे अपने चरम पर पहुँचती है, वैसे-वैसे क्रमशः नीति-नियम और जीवन की व्यावहारिकताओं के पक्ष उद्घाटित होने लगते हैं। उत्तरकांड तक पहुँचते-पहुँचते हम उस धरातल पर उतरने लगते हैं, जहाँ रामभक्त तुलसी की लेखनी विशालकाय समाज को उसकी दिशाहीनता, पथभ्रष्टता और असहायता से मुक्त कराने के लिए छटपटाती प्रतीत होती है।
श्रीरामचरितमानस का उत्तरकांड इसी कारण अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। बालकांड से लगाकर लंकाकांड तक जिस मनोभूमि को वे खाद-पानी देकर, उर्वर बनाकर तैयार करते हैं, उसमें बीज बोने का कार्य उत्तरकांड में होता है। यहाँ वे स्वयं उपदेशक की भाँति उपदेश नहीं देते, वरन् संवाद शैली में अपनी बात को रखते हैं। वे उपदेशक, प्रचारक या गुरु के रूप में स्वयं को प्रस्तुत नहीं करते। वे नेपथ्य में रहकर अपनी बात को कहते हैं। उत्तरकांड में संवादों का एक क्रम है। रामकथा से निःसृत नवनीत को लोक तक संप्रेषित करने के क्रम में कागभुशुंडि और लोमश ऋषि का संवाद है, जहाँ सगुण और निर्गुण के मध्य श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता का द्वंद्व चर्चा में आता है। इस संवाद के माध्यम से बाबा तुलसी अत्यंत सरलता के साथ यह स्पष्ट करते हैं, कि माया से आच्छादित रहने वाला जड़ जीव ब्रह्म सदृश नहीं हो सकता।2 अतः सगुण रूप की आराधना और उससे मन के विकारों का शमन ही युगानुरूप, सर्वस्वीकार्य और सहज होगा।
इसके अगले क्रम में कागभुशुंडि और गरुड़ का संवाद आता है। लोमश ऋषि और कागभुशुंडि के मध्य संवाद का अगला चरण कागभुशुंडि और गरुड़ के संवाद में प्रत्यक्ष होता है, जहाँ गरुड़ कागभुशुंडि से निवेदन करते हैं, कि यदि आप मुझ पर कृपावान हैं, और मुझे अपना सेवक मानते हैं, तो कृपापूर्वक मेरे सात प्रश्नों के उत्तर दीजिए। गरुड़ जी प्रश्न करते हैं-
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब तें दुर्लभ कवन सरीरा ।।
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोइ संछेपहिं कहहु बिचारी ।।
संत असंत मरम तुम जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ।।
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ।।
मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ।।3
गरुड़ प्रश्न करते हैं कि हे नाथ! सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है। कौन सबसे बड़ा दुःख है। कौन सबसे बड़ा सुख है। साधु और असाधु जन का स्वभाव कैसा होता है। वेदों में बताया गया सबसे बड़ा पाप कौन-सा है। इसके बाद वे सातवें प्रश्न के संबंध में कहते हैं कि मानस रोग समझाकर बतलाएँ, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।
गरुड़ के प्रश्न के उत्तर में कागभुशुंडि कहते हैं कि मनुष्य का शरीर दुर्लभ और श्रेष्ठ है, क्योंकि इस शरीर के माध्यम से ही ज्ञान, वैराग्य, स्वर्ग, नरक, भक्ति आदि की प्राप्ति होती है।4 वे कहते हैं कि दरिद्र के समान संसार में कोई दुःख नहीं है और संतों (सज्जनों) के मिलन के समान कोई सुख नहीं है।5 मन, वाणी और कर्म से परोपकार करना ही संतों (साधुजनों) का स्वभाव होता है।6 किसी स्वार्थ के बिना, अकारण ही दूसरों का अपकार करने वाले दुष्ट जन होते हैं। वेदों में विदित अहिंसा ही परम धर्म और पुण्य है, और दूसरे की निंदा करने के समान कोई पाप नहीं होता है।7
गरुड़ के द्वारा पूछे गए सातवें प्रश्न का उत्तर अपेक्षाकृत विस्तार के साथ कागभुशुंडि द्वारा दिया जाता है। सातवें और अंतिम प्रश्न के उत्तर में प्रायः वे सभी कारण निहित हैं, जो अनेक प्रकार के दुःखों का कारण बनते हैं। इस कारण बाबा तुलसी मानस रोगों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह तें दुख पावहिं सब लोगा ।।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह तें पुनि उपजहिं बहु सूला ।।
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ।।
प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ।।8
कागभुशुंडि कहते हैं कि मानस रोगों के बारे में सुनिए, जिनके कारण सभी लोग दुःख पाते हैं। सारी मानसिक व्याधियों का मूल मोह है। इसके कारण ही अनेक प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। शरीर में विकार उत्पन्न करने वाले वात, कफ और पित्त की भाँति क्रमशः काम, अपार लोभ और क्रोध हैं। जिस प्रकार पित्त के बढ़ने से छाती में जलन होने लगती है, उसी प्रकार क्रोध भी जलाता है। यदि ये तीनों मनोविकार मिल जाएँ, तो कष्टकारी सन्निपात की भाँति रोग लग जाता है। अनेक प्रकार की विषय-वासना रूपी मनोकांक्षाएँ ही वे अनंत शूल हैं, जिनके नाम इतने ज्यादा हैं, कि उन सबको जानना भी बहुत कठिन है।
बाबा तुलसी इस प्रसंग में अनेक प्रकार के मानस रोगों, जैसे- ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, जलन, दुष्टता, मन की कुटिलता, अहंकार, दंभ, कपट, मद, मान, तृष्णा, मात्सर्य (डाह) और अविवेक आदि का वर्णन करते हैं और शारीरिक रोगों के साथ इनकी तुलना करते हुए इन मनोरोगों की विकरालता को स्पष्ट करते हैं।9
यहाँ मनोरोगों की तुलना शारीरिक व्याधियों से इस प्रकार और इतने सटीक ढंग से की गई है, कि किसी भी शारीरिक व्याधि की तीक्ष्णता और जटिलता से मनोरोग की तीक्ष्णता और जटिलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का रोग प्रत्यक्ष होता है और शरीर में परिलक्षित होने वाले उसके लक्षणों को देखकर जहाँ एक ओर उपचार की प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर व्याधिग्रस्त व्यक्ति को देखकर अन्य लोग उस रोग से बचने की सीख भी ले सकते हैं। सामान्यतः मनोरोग प्रत्यक्ष परिलक्षित नहीं होता, और मनोरोगी भी स्वयं को व्याधिग्रस्त नहीं मानता है। इस कारण से बाबा तुलसी ने मनोरोगों की तुलना शारीरिक रोगों से करके एकदम अलग तरीके से सीख देने का कार्य किया है।
कागभुशुंडि कहते हैं कि एक बीमारी-मात्र से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और यहाँ तो अनेक असाध्य रोग हैं। मनोरोगों के लिए नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान आदि अनेक औषधियाँ हैं, किंतु ये रोग इन औषधियों से भी नहीं जाते हैं।10 इस प्रकार संसार के सभी जीव रोगी हैं। शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग से दुःख की अधिकता हो जाती है। इन तमाम मानस रोगों को विरले ही जान पाते हैं। जानने के बाद ये रोग कुछ कम तो होते हैं, मगर विषय-वासना रूपी कुपथ्य पाकर ये साधारण मनुष्य तो क्या, मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो जाते हैं।11
मनोरोगों की विकरालता का वर्णन करने के उपरांत इन रोगों के उपचार का वर्णन भी होता है। कागभुशुंडि के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर भरोसा करते हुए विषयों की आशा को त्यागकर संयम का पालन करने पर श्रीराम की कृपा से ये समस्त मनोरोग नष्ट हो जाते हैं।12
रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।13
इन मनोरोगों के उपचार के लिए श्रीराम की भक्ति संजीवनी जड़ की तरह है। श्रीराम की भक्ति को श्रद्धा से युक्त बुद्धि के अनुपात में निश्चित मात्रा के साथ ग्रहण करके मनोरोगों का शमन किया जा सकता है। यहाँ तुलसीदास ने भक्ति, श्रद्धा और मति के निश्चित अनुपात का ऐसा वैज्ञानिक-तर्कसम्मत उल्लेख किया है, जिसे जान-समझकर अनेक लोगों ने मानस को अपने जीवन का आधार बनाया और मनोरोगों से मुक्त होकर जीवन को सुखद और सुंदर बनाया।
यहाँ पर श्रीराम की भक्ति से आशय कर्मकांडों को कठिन और कष्टप्रद तरीके से निभाने, पूजा-पद्धतियों का कड़ाई के साथ पालन करने और इतना सब करते हुए जीवन को जटिल बना लेने से नहीं है। इसी प्रकार श्रद्धा भी अंधश्रद्धा नहीं है। भक्ति और श्रद्धा को संयमित, नियंत्रित और सही दिशा में संचालित करने हेतु मति है। मति को नियंत्रित करने हेतु श्रद्धा और भक्ति है। इन तीनों के सही और संतुलित व्यवहार से श्रीराम का वह स्वरूप प्रकट होता है, जिसमें मर्यादा, नैतिकता और आदर्श है। जिसमें लिप्सा-लालसा नहीं, त्याग और समर्पण का भाव होता है। जिसमें विखंडन की नहीं, संगठन की; सबको साथ लेकर चलने की भावना निहित होती है। जिसमें सभी के लिए करुणा, दया, ममता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य जैसे उदात्त गुण परिलक्षित होते हैं। श्रद्धा, भक्ति और मति का संगठन जब श्रीराम के इस स्वरूप को जीवन में उतारने का माध्यम बन जाता है, तब असंख्य मनोरोग दूर हो जाते हैं। स्वयं का जीवन सुखद, सुंदर, सरल और सहज हो जाता है। जब अंतर्जगत में, मन में रामराज्य स्थापित हो जाता है, तब बाह्य जगत के संताप प्रभावित नहीं कर पाते हैं।
इसी भाव को लेकर, आत्मसात् करके विसंगतियों, विकृतियों और जीवन के संकटों से जूझने की सामर्थ्य अनगिनत लोगों को तुलसी के मानस से मिलती रही है। यह क्रम आज का नहीं, सैकड़ों वर्षों का है। यह क्रम देश की सीमाओं के भीतर का ही नहीं, वरन् देश से बाहर कभी गिरमिटिया मजदूर बनकर, तो कभी प्रवासी बनकर जाने वाले लोगों के लिए भी रहा है। सैकड़ों वर्षों से लगाकर वर्तमान तक अनेक देशों में रहने वाले लोगों के लिए तुलसी का मानस इसी कारण पथ-प्रदर्शक बनता है, सहारा बनता है। आज के जीवन की सबसे जटिल समस्या ऐसे मनोरोगों की है, मनोविकृतियों की है, जिनका उपचार अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के पास भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में तुलसीदास का मानस व्यक्ति से लगाकर समाज तक, सभी को सही दिशा दिखाने, जीवन को सन्मार्ग में चलाने की सीख देने की सामर्थ्य रखता है।
संदर्भ-
1. गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, लोकभारती टीका, योगेंद्रप्रताप सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम सं. 1999, 7/1-2/121, पृ. 947,
2. वही, 7/111, पृ. 934,
3. वही, 7/3-7/121, पृ. 947,
4. वही, 7/9-10/121, पृ. 947,
5. वही, 7/13/121, पृ. 947,
6. वही, 7/14/121, पृ. 948,
7. वही, 7/22/121, पृ. 948,
8. वही, 7/28-32/121, पृ. 948,
9. वही, 7/33-37/121, पृ. 949,
10.        वही, 7/दोहा 1-2/121, पृ. 949,
11.        वही, 7/1-4/122, पृ. 949-950,
12.        वही, 7/5-6/122, पृ. 950,
13.  वही, 7/7/122, पृ. 950 
डॉ. राहुल मिश्र

(अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास के जबलपुर अधिवेशन- 2017 में प्रस्तुत एवं साहित्य परिक्रमा के 15वाँ वार्षिक अधिवेशन विशेषांक, अक्टूबर-दिसंबर, 2017 में प्रकाशित)