Showing posts with label Research. Show all posts
Showing posts with label Research. Show all posts

Friday, 2 June 2017

मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं




मड़फा दुर्ग : जहाँ कथाएँ आज भी जिंदा हैं

बुंदेलखंड का विंध्य अंचल अपने अतीत से ही अनेक पुरा-कथाओं और मिथकों का केंद्र रहा है। यहाँ कण-कण में ऐसी रोमांचकारी कथाएँ बसी हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्य में भी डाल देती हैं और अपने आकर्षण में जकड़ भी लेती हैं। बाँदा जनपद के कालंजर दुर्ग के माहात्म्य को जानने वाले इतना अवश्य जानते होंगे की शैव-साधना का यह केंद्र एक रात में ही बनकर तैयार हो गया था। देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा ने कालंजर के दुर्ग को एक रात में ही बना दिया था, ऐसी मान्यता है। कालंजर के साथ ही कालंजर के पूर्वोत्तर की ओर लगभग सोलह मील दूर मड़फा का दुर्ग भी उसी रात बनना शुरू हुआ था, जिस रात कालंजर का निर्माण हो रहा था। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जी ने पहले कालंजर का दुर्ग बनाया और उसके तैयार हो जाने के बाद मड़फा के दुर्ग को बनाने का काम शुरू किया। रात बीत गई और मड़फा दुर्ग के पूरी तरह से नहीं बन पाने के कारण यह अधूरा ही रह गया। और वास्तव में यह दुर्ग कभी पूरी तरह से नहीं बन पाया। लोक-जीवन में जीवित यह कथा आज भी मड़फा की वीरानियों में गूँजती है। मड़फा दुर्ग का यह अधूरापन आज भी महसूस किया जा सकता है। इसकी वीरानियों में गुलज़ार होने की कसक आज भी महसूस होती है और इसी कारण बरबस ही लगता है कि यदि यह दुर्ग अधूरा न होता, तो शायद कालंजर से भी सुंदर, मोहक और आकर्षक होता। छत्रपति शिवाजी महाराज के शिवनेरी दुर्ग की भाँति अगम्य ऊँचाई में बना यह दुर्ग इतना समर्थ होता, कि कभी कोई आक्रांता इसे जीत नहीं पाता। वैसे भी इस दुर्ग को अजेय ही कहा जा सकता है, क्योंकि सन् 1780 में छछरिहा के युद्ध के पहले तक इस दुर्ग को जीतने में कोई सफल नहीं हो सका था। पन्ना के बघेल राजा हरिवंश राय और बाँदा के नवाब के बीच हुए छछरिहा के संग्राम के बाद यह दुर्ग अपना अस्तित्व खोता गया।
ऐसी मान्यता है कि महर्षि अर्थवर्ण का आश्रम मड़फा में ही था। महर्षि महाअर्थवर्ण को अथर्वा के नाम से भी जाना जाता है और उनके कारण ही चतुर्थ वेद के रूप में अथर्ववेद को जाना जाता है। महर्षि अथर्वा की पहचान महर्षि वेदव्यास के श्वसुर के रूप में, और इसी कारण मड़फा को वेदव्यास की ससुराल के रूप में भी जानते हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘कृष्ण द्वैपायन व्यास’ में उल्लेख किया है कि एक बार महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती से मिलने के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान- ग्राम हस्तम, जनपद बाँदा) जा रहे थे। रास्ते में वाग्मती नदी (वर्तमान- बागे नदी, बदौसा, बाँदा) के पास कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें पकड़कर मारपीट शुरू कर दी, जिस कारण वेदव्यास बेहोश हो गए। वहाँ से गुजरते हुए महाअर्थर्वण के शिष्यों ने महर्षि व्यास की दयनीय दशा को देखा और उन्हें उठाकर महाअर्थवर्ण के आश्रम में ले आए। महाअर्थवर्ण की पुत्री वाटिका ने बड़ी लगन के साथ महर्षि व्यास की सेवा-सुश्रुषा की। बाद में महर्षि व्यास ने वाटिका से विवाह कर लिया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे व्यासपुत्र सुखदेव के नाम से जाना जाता है।
अपनी जर्जर काया को आयुर्वेद की चिकित्सा के माध्यम से युवा कर लेने वाले महर्षि च्यवन का आश्रम भी मड़फा में था, ऐसी मान्यता है। चरक संहिता सहित आयुर्वेद की अनेक पुस्तकों के रचयिता और सुप्रसिद्ध वैद्य चरक ऋषि का आश्रम भी मड़फा में ही था। लोक-प्रचलित कथाओं और मिथकों का अनूठा संगम मड़फा में देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है कि माण्डव्य ऋषि के आश्रम से इस स्थान का नाम मड़फा पड़ा है। माण्डव्य ऋषि के आश्रम में कण्व ऋषि समेत अनेक ऋषि रहा करते थे। दुष्यंत और शकुंतला की पुरा-ऐतिहासिक गाथा के पुष्पन-पल्लवन का स्थान भी यही माना जाता है। दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा लोकजीवन से आश्रय पाकर आज भी कण-कण में गूँजती है। कण्व ऋषि की पालित पुत्री शकुंतला के पुत्र भरत ने मड़फा में ही शेर के दाँत गिने थे। राजा दुष्यंत के उत्तराधिकारी के रूप में अपने राज्य का विस्तार करके उसने ऐसे प्रतापी शासक का गौरव प्राप्त किया, जिसके नाम पर भरतखंड और भारतवर्ष को जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास भरत के नाम से अनेक गाँव हैं, जो इस कथा के पुष्ट और सच होने को आश्रय प्रदान करते हैं। वेदव्यास के नाम से विकृत होकर बना वतर्मान का बदौसा और भरतकूप के निकट स्थित व्यासकुंड आदि के माध्यम से मड़फा परिक्षेत्र की पौराणिकता को प्रमाणित किया जा सकता है।

समुद्रतल से 1240 फीट ऊँचाई पर स्थित मड़फा के दुर्ग में गुप्तकालीन स्थापत्य के साथ ही चंदेलकालीन स्थापत्य की जर्जर उपस्थिति ही सही, मगर यह इस दुर्ग की प्राचीनता को, और साथ ही इसकी भव्यता को बखानती जरूर है। मड़फा के दुर्ग ने गुजरात से आए बघेलवंशी शासक व्याघ्रदेव को भी आकर्षित किया था। 1290 विक्रमी संवत् में व्याघ्रदेव ने यहाँ आकर मुकुंददेव चंद्रावत की कन्या सिंधुमती से विवाह किया और मड़फा दुर्ग बघेल शासकों के आधिपत्य में आ गया। वीरसिंह देव, वीरभान देव और रामचंद्र बघेल ने यहाँ पर शासन किया। बाद में बघेल शासकों ने अपनी राजघानी को रीवा स्थानांतरित कर दिया। इस तरह लगभग दो सौ वर्षों तक बघेलों के शासन की गवाही भी मड़फा दुर्ग के कण-कण में दिखती है। मड़फा के नजदीक ही गोंडरामपुर नामक एक गाँव है। यह गाँव गोंड शासकों की उपस्थिति को सँजोए हुए है। गोंड शासकों की वंशावली में रानी दुर्गावती का नाम भी आता है। मड़फा के दुर्ग ने रानी दुर्गावती की वीरता की गाथा को भी विस्मृत नहीं किया है।
मड़फा दुर्ग की जटिल संरचना का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ पर बाहरी लोगों का आना आज भी उतना ही कठिन है, जितना कि पुराने जमाने में रहा होगा। इसी कारण अठारहवीं शताब्दी के मध्य में टीफेन्थलर नामक एक डच पादरी ही शायद सबसे पहले यहाँ पहुँचा होगा और उसने ही यहाँ के बारे में, यहाँ की भौगोलिक संरचना और यहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व का वर्णन किया होगा, क्योंकि उसके पहले के किसी इतिहासकार ने इसका उल्लेख नहीं किया है। टीफेन्थलर लिखता है कि उस समय इसे मण्डेफा के नाम से जाना जाता था। सन् 1804 में कर्नल मेसलबैक ने रात्रि में यहाँ पर आक्रमण किया था, ताकि इस क्षेत्र को हिंसक खूँखार कब्जेदारों से खाली कराया जा सके। बाद में उसने भी इस क्षेत्र को छोड़ देना ही उचित समझा। तब से आज तक यह क्षेत्र कमोबेश उपेक्षित ही रहा है।
जनश्रुतियों में प्रचलित है कि यहाँ से गुजरते हुए एक जैन व्यापारी को अकूत संपदा प्राप्त हुई थी। इस धन का धर्मार्थ में उपयोग करते हुए मड़फा दुर्ग में उसने जैन मंदिरों का निर्माण कराया। दुर्ग में मठ की आकृति के एक ध्वंसावशेष के समीप ही जैन मंदिर भी बने हुए हैं। पंचरथ योजना के अनुरूप बने इन जैन मंदिरों का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त हो चुका है और गर्भगृह में कोई मूर्ति भी नहीं है। गर्भगृह से दूर एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है। शायद इस मूर्ति को गर्भगृह से निकालकर यहाँ रखा गया है। इस भग्न मूर्ति में तीन फीट लंबी और एक फीट चौड़ी पादपीठिका है, जिसमें शिलालेख है। संस्कृत में लिखे इस शिलालेख के अनुसार 1408 माघ सुदी 5 रविवार को मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई है। इस शिलालेख के अनुसार छीतम ने अपने पिता गोसल और माता सलप्रण, अपने पितामह धने तथा मातामही तोण का नामोल्लेख किया है और गोसल के पुत्र छीतम ने इस मूर्ति की स्थापना कराई है। पादपीठ में अंकित शिलालेख के आधार पर इस मूर्ति को तेरहवीं शताब्दी का माना जा सकता है। मड़फा दुर्ग में लगभग दो मीटर ऊँची ऋषभनाथ की एक अन्य प्रतिमा भी है। यह प्रतिमा काफी हद तक सुरक्षित है, जबकि कई अन्य मूर्तियाँ भग्न स्थिति में हैं।
मड़फा में तांडव नृत्य करते शिव की दुर्लभ मूर्ति भी है। इसमें शिव अपने हाथों में विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र लिए हुए हैं। पादतल में एक राक्षस पड़ा हुआ है। नए मंदिर का निर्माण कराकर इस प्रतिमा को सुरक्षित करने का प्रयास स्थानीय लोगों द्वारा किया गया है। शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का आगमन भी होता है। इस मंदिर से लगभग आठ सौ मीटर दूर एक आश्रम बना हुआ है। यहाँ पर जल-प्रबंधन का प्राचीन और दुर्लभ प्रयोग देखा जा सकता है। यहाँ पर चट्टान को काटकर एक कुंड जैसा बनाया गया है, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल इकट्ठा होता रहता है और वर्षा नहीं होने पर भी इसमें जल उपलब्ध रहता है। इस जलकुंड के समीप एक कच्चा तालाब भी है। ऐसी मान्यता है कि इस तालाब में स्नान करने पर चर्मरोग नष्ट हो जाते हैं। जलकुंड और तालाब को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्ग में पर्याप्त प्रबंध किए गए थे, ताकि युद्ध आदि की स्थिति में दुर्ग के अंदर संसाधनों की कमी न पड़े। चंदेलों के आठ प्रमुख दुर्ग में से एक मड़फा भी है और यहाँ मिलने वाले भग्नावशेष इस दुर्ग के अजेय होने की गवाही स्वयं ही दे देते हैं। इन भग्नावशेषों के साथ जुड़ी अनेक रोचक कथाएँ लोक-जीवन में कब से हैं, इनका अनुमान लगाना भी अपने आप में एक रोचक और रोमांचकारी खोज से कम नहीं होगा।
मड़फा दुर्ग के किस्से आज भी हैं, मगर ये किस्से किसी भरत के नहीं; माण्डव्य, अथर्वा, वेदव्यास, च्यवन और चरक जैसे ऋषियों-महर्षियों के नहीं, वरन् आतंक और दहशत के पर्याय दस्युओं और अपराधियों के हैं। इन किस्सों के पीछे मड़फा का ऐतिहासिक, भौगोलिक और पौराणिक महत्त्व छिप गया है। यहाँ रात की बात तो दूर, दिन में भी जाने से लोगों को डर लगता है। यहाँ वेदव्यास को उपचार के लिए ले जाने वाले महर्षि अथर्वा के शिष्यों की संततियाँ नहीं, बल्कि लूटने और यहाँ तक कि जीवन का भी हरण कर लेने वाले आधुनिक भारत के क्रूर आक्रांताओं का विचरण होता रहता है। मड़फा दुर्ग की अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ धन के लालच की भेंट चढ़ गईं। धन के लालच में ही हाथी दरवाजा, मंदिरों के गर्भगृह और ऐतिहासिक निर्मितियाँ खोद डाली गईं। यहाँ के दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य को डकैतों और अपराधियों के छिपने के सुगम ठिकानों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। विकास के संकेत भी यहाँ देखे नहीं जा सकते। यह दुर्ग, जो एक समय में अजेय था, अजेय आज भी है, मगर विकास के लिए। आज भी मड़फा दुर्ग तक जाने के लिए पगडंडियाँ ही हैं, जो मानपुर, कुरहम या खमरिया गाँव से होकर जाती हैं। मड़फा दुर्ग की यह दयनीय त्रासदी है, जो अधूरेपन के अपने दर्द को देवताओं के अभियंता विश्वकर्मा के समय से आज तक बखान रही है। कालंजर का दुर्ग पर्यटन के विश्व-स्तरीय मानचित्र पर है, मगर मड़फा आज भी उपेक्षित है। मड़फा दुर्ग को आज की कथाओं से उबारकर अतीत की कथाओं तक ले जाने के लिए प्रयास अपेक्षित हैं और इन प्रयासों के लिए मड़फा का अजेय दुर्ग आज विजित होने की प्रत्याशा में कृशकाय होकर भी खड़ा है।
डॉ. राहुल मिश्र



(नगरपालिका परिषद्, हटा, जनपद- दमोह, मध्यप्रदेश द्वारा प्रकाशित और डॉ. एम.एम. पांडे द्वारा संपादित बुंदेली दरसन- 2017 में प्रकाशित)

Sunday, 21 May 2017



निराला के काव्य की पड़ताल करती एक महत्त्वपूर्ण किताब

(निराला के काव्य में राष्ट्रीय चेतना)
बीसवीं सदी के सिद्धहस्त कवि और बहुमुखी प्रतिभा के धनी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का व्यक्तित्व और कृतित्व उनके नाम के अनुकूल ही है। उनकी रचनाओं में जैसी विविधता, व्यापकता और समग्रता देखने को मिलती है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। इसी कारण स्वनामधन्य कविश्री निराला को समग्रता के साथ मूल्यांकन के पटल पर उतार पाना कठिन ही नहीं, दुष्कर कार्य भी है। निराला के गद्य में जहाँ एक ओर समाज का यथातथ्य चित्रण है; वहीं दूसरी ओर मनोभाव, सामयिक प्रश्नाकुलताएँ और कथ्य की व्यापकता चित्रित होती है। इसी प्रकार निराला के काव्य में एक ओर छायावाद की प्रवृत्तियों के अनुरूप कल्पना, रहस्य-रोमांच और प्रकृति का सुंदर चित्रण है, तो दूसरी ओर समाज और राष्ट्र के प्रति एक समर्पित साहित्यिक का जीवन-दर्शन है। प्रयोगधर्मी निराला कभी किसी स्तर पर एक स्थिति, विचार, विचारधारा या मनोभाव को पकड़कर नहीं बैठते, वरन् नदी के प्रवाह के समान उनकी वैचारिक गति, भावों-संवेदनाओं का प्रसार और परिवर्तित-परिवर्धित होतीं भावजन्य अभिव्यक्तियाँ अद्भुत और अनूठेपन के साथ सहृदय पाठक को अपने साथ ले चलती हैं। इसी कारण सूर्य और निराला के प्रिय बादल के समयानुकूल संयोजन से आकाश में बन जाने वाले इंद्रधनुष की भाँति निराला का काव्य-संसार बहुरंगी बन जाता है। इसका एक-एक रंग अपनी विलक्षण प्रभावोत्पादकता से रोमांचित कर देने वाला है।
निराला के इंद्रधुनष-सम काव्य-संसार की एक रश्मि को अपने शोध का विषय बनाकर डॉ. स्नेहलता शर्मा ने उस दीप्ति से साक्षात्कार कराने का प्रयास किया है, जिसके बल पर हिंदी साहित्य गर्वोन्नत है। डॉ. स्नेहलता शर्मा की कृति- निराला के काव्य में राष्ट्रीय चेतना इसी प्रयास का पुस्तकाकार माध्यम है। समीक्ष्य कृति अपनी विशिष्टता भी इसी कारण रखती है, क्योंकि राष्ट्रीय चेतना के स्वर को, उसके प्रवाह और विस्तार को निराला के समग्र काव्य-संसार में देखना और उसे विश्लेषित करते हुए एक स्थान पर उपलब्ध कराना सरल कार्य नहीं है। समीक्ष्य कृति में अतीत के उस गौरवपूर्ण कालखंड को संदर्भ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसकी विनाशलीला को देखकर पुनः जागरण होता है। भारतीय जागरण काल के साथ अतीत के गौरवपूर्ण कालखंडों का स्मरण भी जुड़ जाता है। निराला की राष्ट्रीय चेतना से संपृक्त कविताओं का आधार इसी बिंदु पर तैयार होता है। इस प्रकार क्रमबद्ध और व्यवस्थित सामग्री का संकलन राष्ट्रीय चेतना के पक्षों को केवल स्पष्ट ही नहीं करता, वरन् अपने व्यापक रूप में, व्यवस्थित-क्रमबद्ध अध्ययन में अनेक ऐसे अनछुए-अनजाने पक्षों को भी प्रकट कर देता है, जो प्रायः चलन में नहीं होने के कारण विस्मृत हो चुके हैं। विषय की सटीक प्रस्तुति हेतु समीक्ष्य कृति को पाँच अध्यायों में बाँटा गया है।
समीक्ष्य कृति का प्रथम अध्याय है- राष्ट्र का स्वरूप : राष्ट्र के रूप में भारत, इतिहास। इस अध्याय में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एकता के विविध अंगों को; एवं भाषागत, परंपरागत एकता के संदर्भों को प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार भारतवर्ष के रूप में इस विशाल भूखंड की निर्मिति को आदिकाल से लगाकर वर्तमान तक देखने का प्रयास हुआ है। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीयता के भाव के समग्र प्रस्तुतीकरण का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि लेखिका ने उन तत्त्वों को भी खुले मन से विश्लेषित किया है, जो अतीत से लगाकर वर्तमान तक हावी हैं और राष्ट्रीय चिंतनधारा के अवरोधक भी हैं। इसे विश्लेषित करते हुए उल्लेख किया गया है कि- इस देश में वैर-फूट का यह भाव इतना प्रबल क्यों रहा, इसके भी कारण हैं। बड़ी-बड़ी नदियों और बड़े-बड़े पहाड़ों के गुण अनेक हैं, लेकिन उनमें एक अवगुण भी होता है कि वे जहाँ रहते हैं, वहाँ देश के भीतर अलग-अलग क्षेत्र बना देते हैं और इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के भीतर एक तरह की प्रांतीयता या क्षेत्रीय जोश पैदा हो जाता है। पहाड़ों और नदियों ने भारत को भीतर से काटकर उसके अनेक क्षेत्र बना दिए और संयोग की बात है कि कई क्षेत्रों में ऐसी जनता का जमघट हो गया, जो कोई एक क्षेत्रीय भाषा बोलने वाली थी। (पृष्ठ- 15) इस विविधता के बीच संस्कृत और संस्कृति के माध्यम से उन सूत्रों को खोजने का काम भी इस अध्याय में कुशलतापूर्वक हुआ है, जिनके कारण अलग-अलग कालखंडों में विविधता में एकता कायम हुई और भारतीय नवजागरण के दौरान सारा देश एकसाथ उठ खड़ा हुआ।
समीक्ष्य कृति का द्वितीय अध्याय- भारतीय जागरण काल है। यह अध्याय भारतीय नवजागरण के विविध पक्षों का मूल्यांकन करता है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के विशद-व्यापक विवेचन के साथ ही इनके माध्यम से उदित होने वाली राष्ट्रीय काव्यधारा की पड़ताल इस अध्याय में की गई है। ‘राष्ट्रीय काव्यधारा के विविध सोपान’ उपशीर्षक के अंतर्गत भारतेंदु युग, द्विवेदी युग और द्विवेदी युगोत्तर काव्यधारा में राष्ट्रीय चेतना के विविध पक्षों का सर्वांगपूर्ण प्रस्तुतीकरण इस अध्याय में उल्लेखनीय है। समीक्ष्य कृति का तृतीय अध्याय है- छायावादी काव्य में राष्ट्रीय चेतना। इस अध्याय में छायावाद की उत्पत्ति के उन सूत्रों को तलाशने का प्रयास किया गया है, जो प्रायः चर्चा के केंद्र में नहीं  रहे हैं। इसके साथ ही छायावाद के दो स्तंभों- पंत और निराला की काव्य-साधना के प्रवाह को भी इस अध्याय में विश्लेषित किया गया है। इसी विश्लेषण के क्रम में पुस्तक बताती है- पंत वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन के पश्चात एक नए जगत, भौतिक समृद्धि से संबद्ध विचारधारा प्रधान चिंतनलोक में पदार्पण करते हैं। निराला भी बेला, नए पत्ते, कुकुरमुत्ता आदि में परिवर्तित दृष्टिकोण लेकर उपस्थित हुए हैं। (पृष्ठ- 141) इसी अध्याय में उल्लेख है कि- कहीं-कहीं निजी सुख-दुःखात्मक अनुभूति को, छायावादी कवियों ने, युग को जगाने के लिए शंखनाद में भी परिवर्तित कर दिया है। क्षुद्रता और निराशा के कुहरे में न डूबकर जीवन के दुःख- द्वंद्वों को चुनौती के रूप में स्वीकार कर प्राणपण से जूझने की प्रेरणा देने वाले ये विचार छायावादी काव्य का एक अल्प ज्ञात या किसी सीमा तक उपेक्षित पक्ष भी प्रस्तुत करते हैं। साथ ही जीवन के मूल-मंत्रों को ध्वनित करने वाले उपयोगी तत्त्व एवं जीवन को उज्ज्वल, महान और वरेण्य बनाने की प्रेरणा भरने वाले ये अंश छायावादी कवियों के उस महान उत्तरदायित्व के निर्वाह के सूचक भी हैं, जिसे साहित्यकार होने के नाते स्वयं किया है। (पृष्ठ- 145) इस प्रकार तृतीय अध्याय तक आते-आते पुस्तक में ऐसे तत्त्व स्पष्ट होने लगते हैं, जिनका आश्रय पाकर निराला के काव्य में राष्ट्रीय चेतना मुखर होती है।
समीक्ष्य कृति का चतुर्थ अध्याय इसी के अनुरूप है। इस अध्याय को शीर्षक दिया गया है- निराला के काव्य में राष्ट्रीय चेतना। इस अध्याय में निराला की समग्र काव्य-यात्रा को तीन अलग-अलग खंडों में बाँटकर विश्लेषित किया गया है। निराला की सारा जीवन अभावों और संघर्षों से भरा रहा। इसी कारण निराला के लिए उस भारत को देखना सुलभ हो सका, जिसके लिए राष्ट्रीय चेतना की अनिवार्यता थी। और इसी अनिवार्यता को निराला ने अपनी लेखनी का ध्येय बना लिया था। इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला काव्य के शाश्वत माध्यम से जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों को तोड़ने का भगीरथ संकल्प लेकर ही जन्मे और मानव के जीवन से अभावों को मिटा देने हेतु अनंत संघर्ष करते हुए जीवित रहे और गरल-पान करते-करते शिवत्व प्राप्त करते हुए स्वर्गवासी हुए। निराला ने असंतोषपूर्ण वातावरण में रहकर अपनी नूतन काव्याभिव्यक्ति द्वारा विद्रोही स्वर फूँका और जनजागरण की नवज्योति जगाने का पुनीत कार्य किया। इसी कारण डॉ. रामविलास शर्मा ने निराला को नई प्रगतिशील धारा का अगुवा कहकर उनके व्यक्तित्व का सम्मान किया है। निराला का जीवन विभिन्न असमानताओं, असंगतियों एवं अभावों से भरा था, किंतु परिस्थितयों ने कवि को उद्बुद्ध एवं जागरूक बनाकर उसे अन्याय के प्रति संघर्ष की शक्ति दी। यही शक्ति निराला में राष्ट्रीय चेतना के रूप में उभरकर आई, जिसने कवि को राष्ट्रीय गौरव की शाश्वत अभिव्यक्ति की प्रेरणा दी। (पृष्ठ- 195) निराला की अनेक चर्चित कविताओं के आलोक में राष्ट्रीय चेतना के इस स्वर को विश्लेषित करने का सटीक और सफल प्रयास इस अध्याय में परिलक्षित होता है। सन1920 से 1961 तक विस्तृत निराला के काव्य-संसार की व्यापक पड़ताल और गहन मंथन से निःसृत स्थापनाओं को इस अध्याय में स्थान मिला है। इसके साथ ही निराला की साहित्य-साधना से जुड़े ऐसे ज्वलंत पक्ष, जो चर्चित नहीं हो सके और जिनको जानना निराला के संदर्भ में आवश्यक है, उन्हें भी इस अध्याय में विश्लेषित किया गया है।
समीक्ष्य कृति का पंचम अध्याय है- निराला के काव्य में राष्ट्रीय काव्यधारा की सीमाएँ। इस अध्याय में निराला की काव्यधारा को व्यापक अर्थों में विश्लेषित किया गया है। यह अध्याय स्थापना देता है कि निराला ही छायावाद के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने अपने पौरुष के बल पर संघर्षों और अभावों से टक्कर ली है। वे पंत और प्रसाद की परंपरा से अलग संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहे और संघर्ष की यह चेतना व्यक्ति से उठकर समाज तक, व्यष्टि से समष्टि तक व्यापक होती जाती है। निराला के लिए उनका निजी जीवन-संघर्ष इसी कारण उनकी कमजोरी नहीं बन पाता है। एक समय के बाद, विशेषकर अपनी इकलौती पुत्री के देहावसान के बाद विक्षिप्त-से हो जाने वाले निराला अपने जीवन के संघर्षों को देश-काल-समाज के संघर्षों के साथ एकाकार कर लेते हैं। इसी कारण उनका अपना भोगा हुआ सत्य जब कागजों पर उतरता है, तो उसके तीखेपन को पचा पाना सरल नहीं रह जाता है। निराला के काव्य-संसार में राष्ट्रीय-चेतना की उत्पत्ति और विकास को इसी की परिणति के रूप में भी देखा जा सकता है।
निराला का कवि राष्ट्रीय चेतना का अपराजेय नायक है। उसका राष्ट्र-प्रेम केवल अतीत के स्वर्णिम इतिहास को आधार नहीं बनाता और न ही वर्तमान की विषम परिस्थितियों से त्रस्त होकर वह रो उठता है। अपितु वह पूर्ण निष्ठा एवं आस्था से असत्य, अशिव एवं असुंदर का ध्वंस करके सत्य, शिव एवं सुंदर का सृजन करता है। छायावादी कवियों पर ‘पलायनवादी होने का आरोप लगाने वाले आलोचकों के लिए’ निराला का आशावाद एवं कर्मठता प्रश्नचिह्न बन गये हैं। राष्ट्र-चेतना की प्रेरणा देते हुए निराला का अदम्य स्वर यों गूँजा था-
पशु नहीं, वीर तुम / समर शूर क्रूर नहीं / काल चक्र में हो दले / आज तुम राज कुँवर / समर सरताज। (पृष्ठ- 271)
समीक्ष्य कृति के अंत में निष्कर्ष के तौर पर पाँचों अध्यायों का निचोड़ प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही संदर्भ ग्रंथ सूची भी पुस्तक की प्रामाणिकता को स्थापित करने में योगदान देती है। कुल मिलाकर निराला के काव्य-संसार को नवीन दृष्टि से देखने का यह अभिनव प्रयास सिद्ध होता है। तथ्यों का सटीक प्रस्तुतीकरण, तार्किकता और विषय का विवेचन समीक्ष्य कृति को महत्त्वपूर्ण बना देता है। इस कारण यह कृति शोध-कर्ताओं के साथ ही सहृदय पाठकों के लिए उपयोगी भी है और संग्रहणीय भी है।
डॉ. राहुल मिश्र
समीक्षित कृति- निराला के काव्य में राष्ट्रीय चेतना
डॉ. स्नेहलता शर्मा
प्रथम संस्करण 2013
अन्नपूर्णा प्रकाशन, साकेत नगर, कानपुर- 208 014
मूल्य- 600/-   
(नूतनवाग्धारा, बाँदा, संयुक्तांक : 28-29, वर्ष : 10, मार्च 2017 अंक में प्रकाशित )

Tuesday, 23 February 2016


रेडियो वार्त्ता, आकाशवाणी, लेह
विज्ञान और विकास
मानव सभ्यता के विकास के साथ विज्ञान का गहरा संबंध है। आज विकास के जिन आयामों को हम अपने आसपास देखते हैं, वे सभी विज्ञान के माध्यम से ही संभव हो सके हैं। अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों में हमने चंद्रमा ही नहीं, मंगल ग्रह तक उपस्थिति दर्ज कराई है। नगरों और महानगरों में ऊँची-ऊँची बहुमंजिला इमारतों में, सूचना और संचार क्रांति से समृद्ध नगरों और गाँवों में, उन्नत तकनीक से संपन्न उद्यमों और कृषिकार्यों में नए प्रयोगों को, विज्ञान के प्रभाव को देखा जा सकता है। विकास के ये सारे मानक विज्ञान के माध्यम से ही संभव हो सके हैं। दुनिया-भर में हो रहीं नित नवीन खोजों ने, नए-नए अनुसंधानों ने भौतिक विकास को इतनी गति प्रदान की है कि आज मानव जीवन अनेक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण हो गया है। विज्ञान की भूमिका को भौतिक विकास के संदर्भ में अपने आसपास होते बदलावों के माध्यम से समझा जा सकता है।

विज्ञान और विकास के संबंध का एक अन्य पक्ष मानव के जिज्ञासु स्वभाव से भी जुड़ा हुआ है। भदंत आनंद कौसल्यायन अपने निबंध संस्कृति में लिखते हैं कि आसमान में चमकते तारों और ग्रह-नक्षत्रों को जानने की जिज्ञासा, मानव-जीवन को संस्कारों व गुणों से सुसंस्कृत करने वाले ज्ञान के प्रति जिज्ञासा ने विकास के उस पक्ष को समृद्ध किया है, जिसकी जरूरत हमेशा ही मानवता के लिए रही है। इस प्रकार विज्ञान की अनिवार्यता केवल भौतिक विकास के लिए ही नहीं रही है, बल्कि आध्यात्मिक और सहज मानवीय गुणों के विकास के लिए भी रही है। इस प्रकार विज्ञान को मानव सभ्यता के विकास की कहानी से जोड़कर भी देखा जा सकता है। आदिमानव या वनमानुष पेड़ों में रहा करता था। जब उसने धरती पर उतरकर मानव का रूप लिया, तब उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वह अन्य जीवधारियों की तरह बलशाली नहीं था। उसके पास अन्य जीवधारियों की तरह शिकार करके अपना जीवन चलाने की शक्ति भी नहीं थी। वह शेर की तरह वन का राजा नहीं था। वह हाथी की तरह बलशाली, हिरन की तरह फुर्तीला या पक्षियों की तरह उड़ने में सक्षम भी नहीं था। अन्य जीवधारियों की तुलना में उसके पास जो शक्ति थी, वह थी उसके सोचने-विचारने की ताकत और उसके दो हाथ। मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीवधारी है, जो अपने दो पैरों के बल पर भाग सकता है और अपने दो हाथों से काम कर सकता है। मनुष्य ने अपने सोचने-विचारने की ताकत के बल पर ही न केवल धरती पर एकाधिकार स्थापित किया, वरन् दूसरे ग्रहों तक अपनी पहुँच बनाई। यह विज्ञान का ही चमत्कार है, जिसने आदिमानव को आज के जैसा सभ्य-सुसंस्कृत बनाया।

अगर भारतीय विज्ञान की परंपरा की चर्चा की जाए, तो कहा जा सकता है कि जिस समय यूरोपीय घुमक्कड़ जातियाँ अपनी बस्तियाँ बनाना सीख रही थीं, उस समय भारत में सिंधु घाटी के लोग सुनियोजित ढंग से नगर बनाकर रहने लगे थे। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, चन्हूदड़ो, बनवाली, सुरकोटड़ा आदि स्थानों पर हुई खुदाई से पता लगता है कि इन नगरों के भवन पक्की ईंटों के बने हुए थे। यहाँ से जहाजों द्वारा विदेशी व्यापार होता था। यहाँ के नागरिक आवागमन के लिए बैलगाड़ियों का प्रयोग करना जानते थे। माप-तौल का उन्हें ज्ञान था। वे काँसे के बने औजारों का उपयोग करते थे। सोने-चाँदी के आभूषणों का प्रयोग किया जाना स्पष्ट करता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के विकसित होने तक खनन विद्या की जानकारी भी सुलभ हो चुकी थी। ये लोग सूती और ऊनी वस्त्र बनाना भी भली-भाँति जानते थे। वैदिक काल में भारतीयों को 27 नक्षत्रों का ज्ञान हो चुका था। लगध नामक ऋषि ने ज्योतिष वेदांग में तत्कालीन खगोल विद्या का व्यापक वर्णन किया है। गणित और ज्यामिति के साथ ही वैमानिकी और चिकित्साशास्त्र आदि क्षेत्रों में विज्ञान के व्यापक विस्तार को देखा जा सकता है। आर्यभट, वरःमिहिर, ब्रह्मगुप्त, बोधायन, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, कणाद और सवाई जयसिंह तक प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों की लंबी परंपरा को देखा जा सकता है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उस समय श्रेष्ठता की ऊँचाइयों पर स्थापित किया था। जर्मनी के प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी कॉपरनिकस से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व आर्यभट ने पृथ्वी की गोलाकार आकृति और इसके अपनी धुरी पर घूमने की पुष्टि कर दी थी। आइजक न्यूटन द्वारा खोजे गए गुरुत्वाकर्षण के नियम से हजार वर्ष पहले ही आचार्य ब्रह्मगुप्त ने बता दिया दिया था कि धरती में अपना बल होता है, जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचे रखता है। यूरोपीय विद्वान ब्रुक टेलर (Brook Taylor) ने गणित का जो ज्ञान सोलहवीं शताब्दी में दिया, उसे वरःमिहिर ने अपने ग्रंथ सूर्य सिद्धांत में छठी शताब्दी में ही बता दिया था। यूरोपीय गणितज्ञ लैम्बर्ट ने सन् 1761 में पाई के तर्कहीन (Irrational) होने का सिद्धांत दिया था, जबकि आर्यभट ने लैम्बर्ट से लगभग ग्यारह सौ वर्ष पूर्व ही वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात (पाई) का मान 3.1416 निकालकर सिद्ध कर दिया था कि पाई का यह मान अतुलनीय (Irrational) है। कणाद ऋषि ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में ही सिद्ध कर दिया था कि विश्व का हर पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना है। छठी शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त ने शून्य को प्रयोग में लाने के नियम निर्धारित कर दिए थे। पेल इक्वेशन के नाम से प्रसिद्ध वर्ग समीकरण का हल जॉन पेल से लगभग हजार वर्ष पूर्व आचार्य ब्रह्मगुप्त ने दे दिया था।
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत का गौरवशाली अतीत रहा है। चिकित्सा विज्ञान की यह सुदीर्घ परंपरा अथर्ववेद में विकसित हो गई थी। महर्षि चरक द्वारा लिखी गई चरक संहिता काय चिकित्सा का पहला ग्रंथ है। जीवक कौमारभच्च बालरोग विशेषज्ञ थे। अनेक बौद्ध ग्रंथों में उनके चिकित्सा ज्ञान की प्रशंसा मिलती है। वे भगवान बुद्ध के निजी वैद्य भी थे। सुश्रुत संहिता के रचयिता सुश्रुत को आज सारे संसार में प्लास्टिक सर्जरी का जनक माना जाता है। महर्षि पतंजलि ने योग के माध्यम से शरीर को रोगमुक्त रखने का उपाय बताया था। आज सारा संसार योग की शक्ति को स्वीकार कर रहा है। चिकित्सा विज्ञान के साथ ही वास्तु, स्थापत्य और शिल्प के क्षेत्र में भारत की प्रगति को सारा संसार स्वीकार करता है। कुतुबमीनार के निकट स्थापित महरौली का लौह स्तंभ लगभग 1700 वर्षों से ज्यों-का-त्यों खड़ा है। उसमें जंग का नामोनिशान तक नहीं है। कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में स्थापित लौह स्तंभ भी इसी प्रकार का है।
नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के साथ ही ओदांतपुरी (वर्तमान बिहार), नागार्जुनकोंडा (वर्तमान आंध्रप्रदेश), जगद्दला (वर्तमान पश्चिम बंगाल), वलभी (वर्तमान गुजरात), वाराणसी (वर्तमान उत्तरप्रदेश), कांचीपुरम (वर्तमान तमिलनाडु), मणिखेत (वर्तमान कर्नाटक), शारदापीठ (वर्तमान कश्मीर), पुष्पगिरि (वर्तमान उड़ीसा) और सोमपुरा (वर्तमान बांग्लादेश) आदि पुरातन भारत के ऐसे महान शिक्षाकेंद्र हैं, जिन्होंने विश्व को अपार ज्ञानराशि वितरित की है। ज्ञान-विज्ञान-दर्शन की अनेक शाखाओं का विस्तार इन्हीं शिक्षाकेंद्रों से हुआ। इसी कारण पाश्चात्य मूर्धन्य मनीषी लुई जैकलिएट ने भारत के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा है कि- ऐ प्राचीन वसुंधरे! मनुष्य जाति का पालन करने वाली, पोषणदायिनी तुझे प्रणाम है। श्रद्धा, प्रेम, कला और विज्ञान को जन्म देने वाली भारत भूमि को प्रणाम है।’ (संदर्भ- आर्य संस्कृति का प्रथम विश्वविद्यालय विक्रमशिला’, विक्रमशिला का इतिहास, परशुराम ठाकुर ब्रह्मवादी, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2013, पृ. 71)
भारत के संदर्भ में विज्ञान और विकास को, इनके मध्य संबंधों को अतीत से जुड़े इन तथ्यों के माध्यम से समझा जा सकता है। ये तथ्य भारतीय परंपरा में विज्ञान और विकास के अंतःसंबंधों के प्रतिमान हैं। मध्ययुग की शुरुआत और फिर भारत में व्यापारी के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन तक का अंतराल अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। इस दौर में विज्ञान और विकास का क्रम वैसा स्मरणीय नहीं कहा जा सकता, जैसा अपने अतीत में था। ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के साथ ही भारत ने उस औद्योगीकरण को जाना, जिसे पश्चिमी देश पहले ही अपना चुके थे। पाश्चात्य देशों के विज्ञान को पुरातन भारतीय परंपरा का ही आयातित संस्करण कहा जा सकता है, क्योंकि प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को प्रायः आधार बनाकर यांत्रिकी या मशीनीकरण का विकास पश्चिमी देशों में हुआ था। प्राचीन भारतीय परंपरा ने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यंत तीव्र विकास अवश्य किया था, किंतु यांत्रिक या मशीनी स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की थी। आधुनिक और पुरातन वैज्ञानिक परंपरा के बीच बड़ा अंतर यांत्रिकी या मशीनीकरण के विकास का था। यांत्रिकी के विकास से विज्ञान में अनेक रास्ते खुले। रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं के विस्तार ने एक ओर मानव जीवन को सुखमय बनाया, तो दूसरी ओर विभीषक हथियारों ने, मानवताविरोधी अनुसंधानों ने जीवन को भयग्रस्त भी बना दिया।
स्वाधीन भारत ने आधुनिक विज्ञान को स्वीकार करते हुए अपने विकास के लिए, और वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए संकल्पबद्ध होकर कार्य किया है। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा, डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर, डॉ. सी.वी.रमण, डॉ. एम.एन. साहा, डॉ. जगदीशचंद्र बोस, डॉ. नॉरमन बोरलाग, डॉ. बीरबल साहनी और डॉ. हरगोविंद खुराना से लगाकर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तक भारतीय वैज्ञानिकों की ऐसी समृद्ध परंपरा देखी जा सकती है; जिन्होंने कृषि, चिकित्सा, सूचना-संचार, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों को न केवल समृद्ध किया है, वरन् वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को भी स्थापित किया है। अत्यंत कम लागत में मंगल ग्रह की यात्रा करके भारत ने अपनी मेधा से विश्व को चमत्कृत कर दिया है।
विज्ञान का अर्थ होता है- विशिष्ट ज्ञान। यह विशिष्ट ज्ञान ही विकास को गति देता है और विकास की कामना ही विशिष्ट ज्ञान की खोज के लिए प्रेरित करती है। इस तरह विज्ञान और विकास एक-दूसरे के पूरक होते हैं, अन्योन्याश्रित होते हैं। भारतीय परंपरा में विज्ञान और विकास के साथ नीति, मर्यादा, आस्था और धर्मभीरुता जैसे गुण भी जुड़े रहे हैं। भारतीय संदर्भ में विज्ञान की पुरातन परंपरा जहाँ इन गुणों से जुड़ी रही है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक विज्ञान के साथ भी इन गुणों का समावेश देखने को मिलता है। इसी कारण अतीत से लगाकर वर्तमान तक भारतीय परंपरा उस विकास को सदा से नकारती रही है, जो मानवता के लिए, सृष्टि के लिए और धर्म-आस्था के लिए घातक हो। शुद्ध भौतिकता को बढ़ावा देने के प्रश्न पर ही धर्म और विज्ञान में विरोध की बात उठती है। एक ओर भौतिक विकास भी आवश्यक है, तो दूसरी ओर आध्यात्मिक विकास भी अनिवार्य है। पाश्चात्य परंपरा में विज्ञान और विकास के संबंधों की घनिष्ठता के बीच आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य दूर ही रह जाते हैं और इसी कारण वहाँ के समाजों में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ पैदा होने लगती हैं। आज की जीवनशैली में भारत देश भी अनेक विसंगतियों, सामाजिक समस्याओं और विकृतियों से अगर जूझ रहा है, तो उसके पीछे पाश्चात्य प्रभाव ही है।
हिंदी के जाने-माने साहित्यकार धर्मवीर भारती ने अपने नाटक अंधायुग में व्यास के मुख से ब्रह्मास्त्र के भयानक खतरों का वर्णन कराया है। अंधायुग में व्यास जी कहते हैं कि-
लेकिन नराधम / ये दोनों ब्रह्मास्त्र अभी / नभ में टकरायेंगे / सूरज बुझ जाएगा। / धरा बंजर हो जाएगी।।
इन पंक्तियों में ब्रह्मास्त्र के खतरों का जो संकेत दिया गया है, उसमें आधुनिक युग के विज्ञानबोध को देखा जा सकता है। इन पंक्तियों में खतरा परमाणु हथियारों का है। परमाणु हथियारों का ध्वंसात्मक प्रयोग आज की पीढ़ी के लिए बड़ा खतरा है और धर्मवीर भारती की इन पंक्तियों में इस खतरे को देखा जा सकता है। विज्ञान के माध्यम से ऐसा अंधा विकास भारतीय परंपरा का नहीं है। इसी कारण विज्ञान और विकास के साथ धर्म को जोड़ने की बातें की जाने लगीं हैं। विकास की गति को रोका नहीं जा सकता और विकास के लिए विज्ञान अनिवार्य है। अगर विज्ञान को नैतिकता, मानवता और आध्यात्मिकता के बंधन में नहीं रखा जाएगा, तो उसके परिणाम व्यक्ति से लगाकर समाज और राष्ट्र तक के लिए घातक होंगे। आज 26/11 की विभीषक घटना से लगाकर एक व्यक्ति के मन में पनपती हताशा, कुंठा, हिंसा, आक्रोश और क्रूरता की भावनाएँ विज्ञान और विकास के बीच धर्म के तत्त्व के लुप्त हो जाने के कारण उत्पन्न हो रही हैं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया में जिस तरह गाँव-कस्बे से लगाकर नगरों-महानगरों तक, देश के कोने-कोने से विदेशों तक अपसंस्कृति का विस्तार होता जा रहा है, उसके पीछे आधुनिक विज्ञान से संचालित विकास की अनियंत्रित गति के दुष्परिणाम ही हैं। कोरे भौतिकतावाद पर आधारित विज्ञान और उससे होते विकास के दुष्परिणामों को नियंत्रित करने की सामर्थ्य आध्यात्मिकता में ही है। परमपावन चौदहवें दलाई लामा की प्रेरणा से स्थापित माइंड एंड लाइफ इंस्टीट्यूट और साइंस, रिलीजन एंड डेवलपमेंट जैसी परियोजनाएँ इस दिशा में कार्य कर रहीं हैं। सन् 1987 से परमपावन दलाई लामा स्वयं इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। उनका कथन है कि विज्ञान, तकनीक और भौतिक विकास हमारी सारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। हमें अपने भौतिक विकास को करुणा, सहिष्णुता, क्षमा, संतोष और आत्मानुशासन जैसे मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है, जिससे हमारा भौतिक और आंतरिक विकास एकसाथ हो सके। इसी में विकास की पूर्णता है और यही विज्ञान की सार्थकता है। विज्ञान और विकास के संदर्भ में यह पुरातन भारतीय पंरपरा ही विश्व के लिए कल्याण का मार्ग सुलभ करा सकती है।  
डॉ. राहुल मिश्र
        (आकाशवाणी, लेह से दिनांक 09 नवंबर, 2015 को प्रातः 0910 बजे प्रसारित)












Wednesday, 27 May 2015

हिंदी आलोचना का विकास-क्रम और भविष्य की दिशा-दशा




हिंदी आलोचना का विकास-क्रम और भविष्य की दिशा-दशा

आलोचना शब्द की उत्पत्ति लुच् धातु से हुई है। इसका अर्थ होता है, देखना। समाज और साहित्य के मध्य स्थापित संबंधों को देखने का कार्य आलोचना के माध्यम से होता है। साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता को स्थापित करते हुए पाठकों के बीच साहित्य को ले जाना और इस संबंध को उत्तरोत्तर विकसित करते जाना आलोचना की बुनियादी प्राथमिकता होती है। इस कारण आलोचना स्वतंत्र साहित्यिक विधा होती है। भारतीय साहित्य में आलोचना की दीर्घ एवं विकसित परंपरा काव्य-तत्त्व के अनुसंधान की जिज्ञासा को तृप्त करने हेतु विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से संपृक्त रहकर निरंतर प्रवाहित होती रही है। इस कारण उसका स्वरूप शास्त्रीय एवं सैद्धांतिक रहा है। भारतीय आलोचना रचनाओं के परीक्षण या मूल्यांकन मात्र तक सीमित नहीं रही। संभवतः इन्ही कारणों से भारतीय आलोचना को ‘अलंकार-शास्त्र’ या ‘काव्य-शास्त्र’ जैसे स्वतंत्र शास्त्र के रूप में, स्वतंत्र विधा के रूप में जाना जाता है।
रस-सिद्धांत की स्थापना करने वाली आचार्य भरत मुनि की रचना नाट्यशास्त्र (लगभग 150 ई.) को भारतीय साहित्य में आलोचना की सर्वप्रथम कृति माना जाता है। भरत मुनि ने इस सिद्धांत की स्थूल रूप-रेखा ही प्रस्तुत की थी, किंतु परवर्ती विद्वानों- भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनवगुप्त, धनंजय, विश्वनाथ प्रभृति- ने इसके विभिन्न पक्षों का और अधिक विश्लेषण-विवेचन प्रस्तुत करते हुए इसे पर्याप्त स्पष्ट एवं विकसित रूप प्रदान किया है। वस्तुतः रस-सिद्धांत भारतीय साहित्यशास्त्र की सर्वोत्तम एवं गौरवपूर्ण उपलब्धि है, जिस पर परवर्ती युग का अधिकांश आलोचनात्मक साहित्य आधारित है।1
अलंकार सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत, वक्रोक्ति सिद्धांत आदि के निरूपण, व्याख्या, समन्वय और संशोधन का क्रम भरत मुनि से लेकर सत्रहवीं शती के अंत तक चलता रहा। उदाहरण या सूक्ति के माध्यम से कुछ विशिष्ट कृतियों के सामान्य गुण-दोषों की स्फुट चर्चा के अतिरिक्त विस्तृत समीक्षा इस कालखंड में प्राप्त नहीं होती है। संस्कृत के ‘काव्यशास्त्र’ या ‘क्रियाकल्प’ से रस-संचय करके प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं के साहित्यकारों ने इस विधा को समृद्ध किया। हिंदी-काव्य के विकास के कालखंड में, मध्यकाल में केशव, चिंतामणि, भिखारीदास आदि कवियों ने संस्कृत काव्यशास्त्र के कुछ प्रमुख एवं प्रचलित सिद्धांतों को लेकर ग्रंथों की रचना की। हिंदी के आधुनिक काल की शुरुआत के पूर्व हिंदी पद्य में रचे गए काव्यशास्त्रीय ग्रंथ भले ही मौलिक न रहे हों और संस्कृत काव्यशास्त्र के पद्यानुवाद तक सीमित रह गए हों, तथापि भारतीय साहित्य की काव्यशास्त्रीय परंपरा को हिंदी के आधुनिक युग से जोड़ने की कड़ी का दायित्व इन ग्रंथों ने निभाया है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
हिंदी के आधुनिक युग की शुरुआत के साथ साहित्य में अनेक बदलाव परिलक्षित होते हैं। आधुनिक युग में गद्य का विस्तार और विकास भी होता है। हिंदी साहित्य के आधुनिक स्वरूप के उदय एवं इसके विस्तार में भारतेंदु हरिश्चंद्र का अमूल्य योगदान है। आधुनिक हिंदी साहित्य के जन्मदाता एवं पोषक विराट् साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य के सभी उपेक्षित अंगों का विकास किया था, अतः आलोचना साहित्य भी उनके युग-परिवर्तनकारी करों के स्पर्श से वंचित कैसे रह सकता था। यदि संस्कृत के प्रथम आचार्य भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ लिखा तो आधुनिक हिंदी के जनक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘नाटक’ की रचना की।2  सन् 1883 में प्रकाशित इस कृति में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्र के साथ ही यूरोप के नाट्यसाहित्य का उल्लेख करते हुए पाश्चात्य समीक्षा-साहित्य का समन्वय भारतीय साहित्य-शास्त्र के साथ किया। यह ऐसा प्रस्थान-बिंदु कहा जा सकता है, जहाँ से आधुनिक आलोचना विधा की शुरुआत मानी जाती है। प्रारंभिक हिंदी आलोचना संस्कृत आलोचना पर ही आधारित थी। जब तक खड़ीबोली का उदय हुआ तब तक विदेशी साहित्य से हम प्रभावित होने लगे थे। खासकर हिंदी गद्य साहित्य के साथ ऐसा हुआ और उसके लिए जिस आलोचना का उदय हुआ, वह कई मामलों में पश्चिम की हू-ब-हू नकल था। साहित्य और आलोचना दोनों पर पश्चिम के साहित्य और आलोचना के न केवल प्रभाव को देखा जा सकता है, वरन् कई बार पूरे-पूरे अनुवाद को हम पाते हैं।3 भारतेंदु युग में विकसित हुई साहित्यिक विधाओं का पोषण प्रायः अनूदित साहित्य के माध्यम से हुआ। इस कारण आलोचना की नवोदित धारा पर भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। यदि सकारात्मक पक्ष को देखा जाए तो आलोचना के क्षेत्र में नवीन संभावनाओं के सृजन हेतु भारतेंदु और उनकी परंपरा में चलने वाले बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन, बालकृष्ण भट्ट, गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, और अंबिकादत्त व्यास आदि ने अमूल्य योगदान दिया। आनंद कादंबिनी और हिंदी प्रदीप पत्रिकाओं में प्रकाशित आलोचनाओं को हिंदी आलोचना की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।
हिंदी आलोचना के विकास का दूसरा चरण द्विवेदी युग से शुरू होता है। सरस्वती के संपादक के रूप में सन् 1930 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का हिंदी आलोचना के क्षेत्र में अवतरण हुआ। उन्होंने संस्कृत के कई कवियों की समीक्षा की। उनके द्वारा रचित ‘विक्रमांकदेव चरित’ ‘नैषधचरित चर्चा’ और ‘कालिदास की निरंकुशता’ आदि निबंध कृतियों के परिचय के साथ ही कृति और कवि, दोनों के गुण-दोषों का निष्पक्ष विवेचन करते हैं। ‘कवि और कविता’ नामक निबंध में द्विवेदी जी ने कवि-कर्म और कवि-कर्म की परिणति, दोनों की स्पष्ट, व्यावहारिक और सामयिक आलोचना करके जो निष्कर्ष दिए हैं, वे वर्तमान में भी प्रासंगिक बने हुए हैं। द्विवेदी युग के अन्य प्रसिद्ध आलोचकों में मिश्र बंधु (गणेशबिहारी मिश्र, श्यामबिहारी मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र), पं. पद्मसिंह शर्मा, कृष्णबिहारी मिश्र और लाला भगवानदीन का नाम आता है। मिश्र बंधु द्वारा रचित हिंदी नवरत्न, मिश्र बंधु विनोद; पद्मसिंह शर्मा द्वारा रचित बिहारी सतसई की भूमिका; कृष्णबिहारी मिश्र द्वारा रचित देव और बिहारी तथा लाला भगवानदीन द्वारा रचित बिहारी और देव आदि ग्रंथ हिंदी आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्व रखते हैं। वस्तुतः द्विवेदी-युगीन साहित्य भारतेंदु-युगीन साहित्य की ही भाँति प्रेरणा देने का कार्य अधिक करता है। उस काल की प्रधान दृष्टि यही थी,  आलोचना भी इस दृष्टि से प्रभावित थी। आचार्य द्विवेदी इसका प्रतिनिधित्व करते थे। चूँकि पुनर्जागरणकालीन भारत आगे बढ़ने के लिए कृत संकल्प था, अतः रीतिकालीन प्रवृत्तियों पर नई यानि वैज्ञानिक और सामाजिक प्रवृत्तियाँ हावी हो रहीं थीं। भारतेंदु द्वारा प्रारंभ किए हुए कार्य को आचार्य द्विवेदी ने आगे बढ़ाया- मुख्यतः आलोचना और संपादन के क्षेत्र में।4
हिंदी साहित्य के शुरुआती कालखंड में, भारतेंदु युग में रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा में सैद्धांतिक आलोचना के अतिरिक्त ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली गद्य में लिखी गई टीकाओं और इतिहास ग्रंथों में कवि-परिचय के रूप में लिखी गई परिचयात्मक आलोचना का सूत्रपात हुआ। द्विवेदी युग में सैद्धांतिक आलोचना, परिचयात्मक आलोचना के अतिरिक्त तुलनात्मक एवं मूल्यांकनपरक आलोचना, अन्वेषण एवं अनुसंधानपरक आलोचना तथा व्याख्यात्मक आलोचना का विकास हुआ। द्विवेदी युग के परवर्ती छायावाद युग में साहित्य की अन्य विधाओं के नए दौर में प्रवेश करने के साथ ही हिंदी आलोचना में भी एक नए युग का सूत्रपात हुआ। उपन्यास और कहानी विधाओं के विकास के साथ ही कविता और नाटक में उदित होती नवीन प्रवृत्तियों के विवेचन और विश्लेषण हेतु आलोचना विधा की अनिवार्यता नए ढंग से स्थापित हुई और आलोचना विधा का विकास-विस्तार सामयिक आवश्यकता बनकर उभरा। इसके साथ छायावादी काव्य-प्रवृत्ति अपने अनूठेपन के कारण आलोचना के केंद्र में आई और इसके पक्ष-विपक्ष में प्रकाशित हुई आलोचनाओं ने आलोचना विधा के विस्तार में अप्रत्याशित योगदान दिया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस कालखंड में सैद्धांतिक आलोचना को भारतीय साहित्य-चिंतन परंपरा और पाश्चात्य साहित्य चिंतन परंपरा के समन्वय से समृद्ध करके गांभीर्य और वैविध्य प्रदान किया। आचार्य शुक्ल ने गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास और जायसी के काव्य-गुणों के विवेचन के साथ ही हिंदी साहित्य का इतिहास और चिंतामणि आदि ग्रंथों का सृजन करके सैद्धांतिक आलोचना के साथ ही ऐतिहासिक और व्यावहारिक आलोचना के विकास में योगदान दिया। शुक्ल जी की परंपरा में चलते हुए कृष्णशंकर शुक्ल, विश्वनाथप्रसाद मिश्र, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, डॉ. गुलाबराय, आचार्य बलदेव उपाध्याय और रामदहिन मिश्र आदि आलोचकों ने अपने प्रयासों से हिंदी आलोचना को समृद्ध किया।
डॉ. नगेंद्र भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल से प्रभावित थे। वे मूलतः रसवादी आलोचक माने जाते हैं। डॉ. नगेंद्र ने सैद्धांतिक आलोचना के साथ ही व्यावहारिक और मनोविश्लेषणात्मक आलोचना के क्षेत्र में योगदान दिया। भारतीय साहित्यशास्त्र के साथ पाश्चात्य साहित्यशास्त्र के समन्वय और इनके समन्वित रूप को प्रकाश में लाने का अभूतपूर्व कार्य डॉ. नगेंद्र ने किया। डॉ. नगेंद्र को छायावाद के पक्षधर आलोचक के रूप में भी जाना जाता है। डॉ. नगेंद्र के साथ ही आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और शांतिप्रिय द्विवेदी ने छायावाद का पक्ष लिया। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी छायावादी, स्वच्छंदतावादी, रसवादी, सौष्ठववादी और अध्यात्मवादी समीक्षक माने जाते हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी कृति, हिंदी साहित्य की भूमिका(1940 ई.) के माध्यम से ऐतिहासिक आलोचना को स्थापित किया। कबीर, सूर और तुलसी आदि के मूल्यांकन में द्विवेदी जी की मानवतावादी और समाजकेंद्रित आलोचनात्मक दृष्टि देखने को मिलती है। बाबू गुलाबराय ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की सैद्धांतिक आलोचना का अनुसरण करने के साथ ही व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के परवर्ती युग में हिंदी आलोचना का क्षितिज व्यापक होता गया। आलोचना की विविध पद्धतियों और अलग-अलग दिशाओं में अनेक आलोचक सक्रिय हुए। अनेक आलोचकों को किसी एक वर्ग में रख पाना भी शुक्लोत्तर युग में संभव नहीं रहा। अब तक चली आ रही आलोचनात्मक पद्धतियों से हटकर मार्क्सवादी आलोचना, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आलोचना, शैलीवैज्ञानिक आलोचना और नई आलोचना जैसी नवीन पद्धतियों का विस्तार हुआ। शिवदानसिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त और डॉ. रामविलास शर्मा मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिनिधि आलोचक माने जाते हैं। डॉ. देवराज, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और देवराज उपाध्याय दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाते हैं। मार्क्सवाद और मनोविश्लेषणवाद जैसी आलोचना की ऐतिहासिक पद्धतियों का निषेध कर ‘नयी आलोचना’ पनपने लगी। साहित्य में रूपवादी आलोचना, शैलीविज्ञान, संरचनावादी, नयी समीक्षा से भाषावादी आलोचना का तुमुलनाद गूँज उठा। इस बीच अच्छी बात यह हुई कि अब आलोचना केवल कविता-केंद्रित आलोचना न रहकर उपन्यास, कहानी, नाटक, रंगमंच, निबंध, रेखाचित्र आदि सभी गद्य विधाओं को साथ लेकर बढ़ने व पनपने लगी। इस स्थिति ने हिंदी-आलोचना का सैद्धांतिक और व्यावहारिक स्तर पर क्षेत्र काफी विस्तृत कर दिया है।5  
साहित्य की विविध विधाओं की आलोचना के प्रकाश में आने के साथ ही आलोचना विधा में सक्रिय विद्वानों की संख्या भी तीव्र गति से बढ़ी है। उन सभी का उल्लेख कर पाना भी संभव नहीं है, किंतु इतना अवश्य है कि आलोचना के क्षेत्र-विस्तार का यह सुखद पक्ष है। नाटक और रंगमंच सहित गद्य की विविध विधाओं से जुड़े साहित्यकारों की हिंदी आलोचना में उपस्थिति ने विविधता का, विचारों का फैलाव किया है। साहित्यिक पत्रिकाओं का योगदान भी हिंदी आलोचना के विकास में अभूतपूर्व है। सरस्वती, प्रतीक, आलोचना आदि पत्रिकाओं के बाद नये पत्ते, नयी कविता, निकष, कखग, पहल, दस्तावेज, पूर्वग्रह और समास आदि पत्रिकाओं ने साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से आलोचना को सर्वथा नवीन आयाम दिया है। साहित्यिक पत्रकारिता के साथ अंतरक्रिया में, और उससे स्वतंत्र भी, हिंदी आलोचना ने यों एक लंबी यात्रा की है। भारतेंदु तथा प्रेमघन के साथ शास्त्रीय और गुण-दोष कथन शैली से आरंभ करके आलोचना मिश्र बंधुओं के साथ निर्णयात्मक, और पद्मसिंह शर्मा के साथ तुलनात्मक दौर में आती है। फिर रामचंद्र शुक्ल के माध्यम से अपने व्याख्यात्मक-विवेचनात्मक रूप में एकबारगी वयस्क होकर वह विकास की कई नई दिशाओं को एकसाथ उद्घाटित करती है। और इसी क्रम में आगे अर्थ संवर्धन की या कि सर्जनात्मक भूमिका अपनाकर अपने रूप में गुणात्मक परिवर्तन लाती है।6 हिंदी आलोचना के इस विस्तार और तथाकथित नई आलोचना को ‘विश्वग्राम’ की अवधारणा के मानदंड पर खरा उतरते हुए भी अनुभूत किया जा सकता है।
हिंदी आलोचना के भविष्य की दशा-दिशा का विवेचन करने के पूर्व आलोचना के वर्तमान, अर्थात् नई आलोचना की प्रवृत्ति का मूल्यांकन करना समीचीन होगा। प्रगतिवादी आलोचना के बाद अस्तित्व में आई नई आलोचना में व्यक्तिवाद और पूँजीवाद की प्रबलता है। इस आलोचना में भारतीय काव्यशास्त्र लगभग पूर्णतः उपेक्षित हो गया है और वह पश्चिमी चिंतन और आलोचना पर पूर्णतः निर्भर हो गई है। ‘नई आलोचना’ ही नहीं, स्वातंत्र्योत्तर काल की नई लगभग संपूर्ण हिंदी आलोचना एक ओर पश्चिमी आलोचकों, दूसरी ओर अस्तित्ववाद, मानववाद, यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, प्रभाववाद, आधुनिकतावाद, उत्तरआधुनिकतावाद, संरचनावाद इत्यादि वादों और तीसरी ओर ‘नई आलोचना’, नवअरस्तूवादी आलोचना, शैलीविज्ञान, समाजशास्त्रीय आलोचना आदि पश्चिमी आलोचना-पद्धतियों का लगभग पूर्णतः अनुसरण करने लग गई है।7 पश्चिम के विचार और वस्तुओं का अनुकरण करना और पाश्चात्य अंधानुकरण में पड़कर अपने संसाधनों को गौण मानना आजकल की प्रवृत्ति बन गई है और आधुनिकता का, उत्तर आधुनिकता का पर्याय बन गई है। हिंदी आलोचना के क्षेत्र में भी यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि आज के वैश्वीकृत समाज में आलोचना के पुराने मानदंड बड़े काम के नहीं सिद्ध हो सकते। किसी भी आलोचना-पद्धति का स्थिर और जड़ होना गतिशील साहित्य का अवरोधक होता है, परंतु ‘आलोचना के पुराने औजार बाक्स’ में कुछ उपकरण हो सकते हैं, जो थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ भारतीय उत्तर-आधुनिक आलोचना को नया रूप दे सकने में समर्थ हों।8
हिंदी आलोचना के क्षेत्र में पुरानी पीढ़ी के आलोचकों की सक्रियता ही सम्प्रति दिखाई देती है। युवा पीढ़ी के आलोचकों की संख्या लगभग नहीं के बराबर है। उनकी उपस्थिति भी जो है, उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी तरफ साहित्यिक अनुशासन और साहित्यिक लगाव की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। अखबारों में साहित्य के लिए जगह नहीं। पत्रकार और रचनाकार का जैसा रचनात्मक संबंध पिछली सदी के पूर्वार्द्ध के बरसों में निर्मित हुआ था, वह पूरी तरह विघटित हो चुका है। उनके बीच अपाट्य खाई खुद गई है। अनियतकालीन पत्रिकाओं की बाढ़ वास्तविक सर्जक या आलोचकीय प्रतिभा की पहचान या प्रतिष्ठा को सुनिश्चित करने में असमर्थ है। ‘अपनी डफली अपना राग’ वाला मुहावरा हू-ब-हू चरितार्थ हो रहा है।9 पश्चिमी साहित्य ने अतिवाद से बचते हुए साहित्य के अनुशासन को इस तरह से स्थापित किया है कि उनका आलोचनाशास्त्र श्रेष्ठ विधा के रूप में विकसित हुआ। हिंदी में यह काम हुआ, किंतु बहुत बाद में और अत्यंत मंथर गति से। वाद, विमर्श और समाजशास्त्रीय दर्शन की परिधियों को तोड़कर आलोचना-बोध के सर्वमान्य प्रादर्श के निर्माण की महती आवश्यकता वर्तमान में है। इस कमी के कारण साहित्य और पाठक के बीच की दूरी बढ़ रही है। हालाँकि इसका एक बड़ा कारण हिंदीभाषी क्षेत्रों में व्याप्त अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और ऐसे ही कई सामाजिक कारण भी हैं, इसके बावजूद आलोचना के दायित्व को भुलाया नहीं जा सकता है। सामयिक साहित्य यदि सामान्य हिंदी पाठक के लिए बोधगम्य नहीं होता तो इसका बहुत बड़ा उत्तरदायित्व हिंदी आलोचना पर है। साहित्य में बढ़ती हुई दुरूहता, दुर्बोधता, सूक्ष्मता, प्रतीकात्मकता और बिंब-विधान की प्रमुखता आदि के कारण आज का साहित्य- विशेषतः कविता, नाटक और कहानी- सामान्य पाठक के लिए अलंघ्य पर्वत शिखर बनता जा रहा है। आलोचना उसकी सहायता नहीं कर रही। आलोचना में भी असाधारण शब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। पाठक का दिग्भ्रमित होना आलोचना की विफलता है।10  
वर्तमान आलोचना के साथ ‘चौककवाद’ का पक्ष भी जुड़ा है। बहुत सारे साहित्यकार अपनी प्रसिद्धि के लिए, चर्चा में बने रहने के लिए प्रायः उन बातों का जिक्र करते हैं, जो साहित्य की मर्यादा के एकदम विपरीत होती हैं। इसके अतिरिक्त स्वयं को स्थापित करने के लिए दूसरे को अपमानित करने, लांछन लगाने की हद तक भी कई साहित्यकार, आलोचक पहुँच जाते हैं। मूल्यहीनता की यह स्थिति भी हिंदी आलोचना के वर्तमान एवं भविष्य के लिए घातक है।
समग्रतः, भारतीय साहित्यशास्त्र की समृद्ध परंपरा से रस-संचय कर विकसित हुई हिंदी आलोचना अपने उद्भव के साथ ही साहित्य और समाज के मध्य सेतु बनकर, साहित्य की स्वीकार्यता का मानदंड बनकर अपने दायित्वों का सम्यक् पालन करती रही है। ‘विश्वग्राम’ की संकल्पना के साहित्यिक पक्ष के रूप में पाश्चात्य चिंतनधारा को आत्मसात् करते हुए भारतीय साहित्यशास्त्र के साथ सामंजस्य बैठाकर हिंदी आलोचना के भविष्य को समृद्ध किया जा सकता है। हिंदी आलोचना के सफल, सार्थक भविष्य के लिए पुरानी पीढ़ी के आलोचकों द्वारा युवा आलोचकों को प्रोत्साहन देना और संसाधन उपलब्ध कराना अपेक्षित है तो युवा आलोचकों को मूल्यहीनता, अनुशासनहीनता, चौककवाद और विचारों की संकीर्णता से ऊपर उठकर पक्षपात रहित होकर आलोचना के दायित्व का निर्वहन करना होगा। इन प्रयासों के माध्यम से हिंदी आलोचना के भविष्य की दिशा भटकाव से बचते हुए समृद्धि की ओर उन्मुख होगी और हिंदी आलोचना विधा अपनी सार्थकता के साथ स्थापित हो सकेगी।
संदर्भ-
1.                       हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, द्वितीय खंड, गणपतिचंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, वर्ष 2004, पृ. 475
2.                       वही, पृ. 476
3.                       वेब रेफ़रेंस www.srijangatha.com/mulyankan13 july2011
4.                       हिंदी आलोचना, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दसवीं आवृत्ति वर्ष 2007, पृ. 31
5.                       हिंदी साहित्य का इतिहास, संपा. डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा (उप्र), वर्ष 2011, पृ. 786
6.                       हिंदी गद्य : विन्यास और विकास, डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, वर्ष 2002, पृ. 220
7.                       हिंदी साहित्य का इतिहास, संपा. डॉ. नगेंद्र, मयूर पेपरबैक्स, नोयडा (उप्र), वर्ष 2011,  पृ. 801-802
8.                       समकालीन आलोचना का दायित्व, भवदेव पांडेय, मित्र : एक, संपा. मिथिलेश्वर, अंक-1 वर्ष 2003, पृ. 73
9.                       बदलते परिप्रेक्ष्य में आलोचना की अपेक्षित भूमिका, रमेशचंद्र शाह, मित्र : एक, संपा. मिथिलेश्वर, अंक-1 वर्ष 2003, पृ. 92

10.                   स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली, वर्ष 1996, पृ. 207

डॉ. राहुल मिश्र

(प्रताप महाविद्यालय, अमलनेर, जलगाँव (महाराष्ट्र) में आयोजित नगेंद्र और समकालीन आलोचना की दिशाएँ,  राष्ट्रीय परिसंवाद, दिनांक 03-04 मार्च, 2014 में प्रस्तुत शोध-पत्र)